अलीगढ़ में बच्ची के साथ दरिंदगी, देश मौन नहीं रह सकता



मैं अलीगढ विषय पर कुछ नहीं लिखना चाह रहा था किन्तु कल एक पत्रकार मित्र ने इस विषय पर लिखने वालों को हिन्दू-मुस्लिम के नजरिये से लिखने वालों को लाइक बटोरने के लिए लिखने वाला घोषित किया और यहाँ तक घोषित किया कि बच्ची के साथ कोई जघन्यता हुई ही नहीं, और कठुआ बनाम अलीगढ़ घोषित कर वैमनष्यता फैलाया जा रहा है।

वास्तव में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में ढाई साल की बच्ची के साथ जो दरिंदगी हुई है उससे सुनकर, उसे देखकर पूरा देश हिल गया है। ढाई साल की बच्ची जो अभी ठीक से खड़ी भी नहीं हो पाती होगी उसके साथ जाहिद और असलम ने जो हैवानियत की उसे किसी की भी रूह कांप जाएगी।

बच्ची के घरवालों ने जाहिद को 40 हजार रुपये उधार दिए थे, जिनमें 35 हजार रुपये तो उसने वापस कर दिए थे लेकिन बाकी पांच हजार रुपये मांगने पर जाहिद ने अपनी बेइज्जती की बात कही थी। जाहिद और असलम ने महज़ 5000 के लिए ढाई साल की बच्ची को बेरहमी से मार डाला।

जाहिद ने चेतावनी दी थी कि पैसे मांगने का खामियाजा भुगतना पड़ेगा और दो जून को बच्ची का क्षत—विक्षत शव उसके घर के पास एक कूड़े के ढेर में दबा पाया गया। पोस्टमार्टम में मौत का कारण लेफ्ट चेस्ट पर पिटाई, सारी रिब्स टूटी हुई, लेफ्ट लेग फ्रेक्चर, सर में चोट, सीधा हाथ कंधे की तरफ से कटा होना, बहुत ज़्यादा पिटाई, बॉडी में कीड़े पड़ जाना जिससे हड्डी तक एक्सपोज़ होना बताया गया है।

अलीगढ में दुष्कर्म हुआ या नहीं हुआ यह जाँच का विषय है किंतु हत्या जितनी वीभत्स रूप से की गयी वह मानवता को शर्मसार करने वाली रही है। असलम की हकीकत यह भी है कि इसके खिलाफ पहले से ही अपहरण, दुष्कर्म और गुंडा ऐक्ट सहित पांच मुकदमे दर्ज हैं। टप्पल थाने में ही उसके खिलाफ अपनी ही बेटी से दुष्कर्म करने और एक बच्चे का अपहरण करने का केस भी दर्ज है।

इस देश को प्रश्न पूछने का हक़ है उन लोगो से जो लोग कठुआ और अक्लाख प्रकरण पर प्रखर होकर आगे आते है वो लोग दिल्ली और अलीगढ की घटनाओ पर क्यों मौन हो जाते है। मुझे लाइक न करें पर मुझे देश के ऐसे तत्वों से जो असहिष्णुता के मुद्दे पर खड़े होते है और आज मौन है उनसे प्रश्न पूछने से नहीं रोक सकते है।


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