प्रथम स्वरूप माता शैलपुत्री First Form of Goddess- Shailputri Stuti Mantra



वन्दे वांछितलाभाय चंद्रार्धक्रतशेखराम !
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम !!

Vande Vanchhitalabhay chandrardhakritshekharam !
Vrisharudham Shooldharam Shailputreem Yashasvineem !!

Shailputri Stuti Mantra

Meaning (Hindi) -
शैलपुत्री माता जो यशस्विनी हैं, जिनके मस्तक पे आधा चन्द्र सुशोभित है, जो वृष पे आरुड़ हैं , इच्छित लाभ देने वाली हैं, उनकी हम वंदना करते हैं !!

Explanation-
Shailputri is one of many names of goddess Parvati. She is called Shail-bala or Shail-putri because she was born as Himalaya's Daughter. Himalaya, being a mountain( parvat or Shail), she is called parvati or shail-putri. Navratre's first day is devoted to Shailputri mata. She rides on Vrash (Bull), she has Shool (Trident) in one of her hands, there is half-moon on her crown, she is benefitial for whatever one wishes.


।।  ॐ ऐं ह्री क्लीं चामूण्डायै विच्चे ॐ शैलपुत्री देव्यै नम: ।।
वन्दे वांछितलाभाय चन्दार्धकृतशेखराम। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम्।।

नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप माता शैलपुत्री का पूजन किया जाता है। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वत राज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री(शैलजा) पड़ा। इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को 'मूलाधर' चक्र में स्थित करते हैं और यहीं से उनकी योग साधना का प्रारंभ भी होता है। वृषभारूढ़ माता शैलपुत्री के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है। अपने पूर्वजन्म में ये प्रजापति दक्ष के घर की कन्या के रूप में उत्पन्न हुईं थीं। तब इनका नाम 'सती' था और इनका विवाह भगवान शंकरजी से हुआ था। माता सती ने अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया और "शैलपुत्री" नाम से विख्यात हुईं। पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं। उपनिषद की कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व- भंजन किया था। पूर्वजन्म की भांति ही वे इस बार भी शिवजी की ही अर्धांगिनी बनीं। नवदुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियाँ अनंत हैं।











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दुर्गा सप्त श्लोकी (All Mantras With Meaning)



श्री दुर्गा सप्तश्लोकी (व्याकरण-शुद्ध एवं परिष्कृत प्रस्तुति)

शिव उवाच

देवि त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्यविधायिनि।
कलौ हि कार्यसिद्ध्यर्थमुपायं ब्रूहि यत्नतः॥

भावार्थ :
हे देवी! आप भक्तों के लिए सहज सुलभ तथा समस्त कार्यों को सिद्ध करने वाली हैं। कलियुग में मनुष्यों की कामनाओं एवं कार्यों की सिद्धि के लिए जो श्रेष्ठ उपाय हो, उसे कृपापूर्वक बताइए।

देव्युवाच

शृणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्टसाधनम्।
मया तवैव स्नेहेनाम्बास्तुतिः प्रकाश्यते॥

भावार्थ :
हे देव! सुनिए, मैं कलियुग में समस्त अभिलषित फलों को प्रदान करने वाले साधन का वर्णन करती हूँ। आपके प्रति स्नेहवश मैं इस अम्बास्तुति को प्रकट कर रही हूँ।

विनियोग

ॐ अस्य श्रीदुर्गासप्तश्लोकीस्तोत्रमन्त्रस्य नारायण ऋषिः,
अनुष्टुप् छन्दः,
श्रीमहाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वत्यो देवताः,
श्रीदुर्गाप्रीत्यर्थं सप्तश्लोकीदुर्गापाठे विनियोगः।

भावार्थ :
इस श्रीदुर्गा सप्तश्लोकी स्तोत्र के ऋषि नारायण हैं, छन्द अनुष्टुप् है तथा महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती इसकी देवता हैं। श्री दुर्गा की प्रसन्नता के लिए इसका पाठ किया जाता है।

ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति॥

भावार्थ :
वह भगवती महामाया देवी ज्ञानियों के चित्त को भी बलपूर्वक आकर्षित करके मोह में डाल देती हैं।

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता॥

भावार्थ :
हे दुर्गे! आपका स्मरण करने पर समस्त प्राणियों का भय दूर हो जाता है और शांतचित्त होकर स्मरण करने पर आप शुभ बुद्धि प्रदान करती हैं। दारिद्र्य, दुःख और भय का नाश करने वाली देवी! आपके अतिरिक्त ऐसा कौन है जिसका हृदय सदैव दूसरों के उपकार के लिए करुणा से भरा रहता हो?

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

भावार्थ :
हे नारायणी! आप समस्त मंगलों में श्रेष्ठ मंगलमयी, कल्याणस्वरूपा, सभी पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरणागतों की रक्षिका, त्रिनेत्रधारिणी तथा गौरी हैं। आपको नमस्कार है।

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

भावार्थ :
हे नारायणी देवी! आप शरणागत, दीन और पीड़ित जनों की रक्षा में सदैव तत्पर रहती हैं तथा सभी की पीड़ाओं का हरण करती हैं। आपको नमस्कार है।

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥

भावार्थ :
हे दुर्गे! आप समस्त रूपों में विराजमान, समस्त जगत की अधीश्वरी और सभी शक्तियों से सम्पन्न हैं। हमें सभी प्रकार के भय से रक्षा प्रदान करें। आपको नमस्कार है।

रोगानशेषानपहंसि तुष्टा
रुष्टा तु कामान्सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां
त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥

भावार्थ :
हे देवी! प्रसन्न होने पर आप सभी रोगों का नाश कर देती हैं और अप्रसन्न होने पर मनुष्यों की समस्त अभिलाषाओं को नष्ट कर देती हैं। जो आपकी शरण में आते हैं, वे कभी संकटग्रस्त नहीं होते तथा वे स्वयं भी दूसरों को आश्रय देने योग्य बन जाते हैं।

सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥

भावार्थ :
हे त्रैलोक्य की अधीश्वरी! जिस प्रकार आप तीनों लोकों की समस्त बाधाओं का निवारण करती हैं, उसी प्रकार हमारे शत्रुओं और विघ्नों का भी नाश करें।

फलश्रुति :
दुर्गा सप्तश्लोकी का श्रद्धापूर्वक नित्य पाठ करने से भय, रोग, दुःख, बाधा तथा संकट दूर होते हैं और देवी की कृपा से सुख, शांति, समृद्धि एवं आत्मबल की प्राप्ति होती है।


श्री दुर्गा सप्तश्लोकी का महत्व

दुर्गा सप्तश्लोकी मार्कण्डेय पुराण के दुर्गा सप्तशती (चण्डी पाठ) से ग्रहण किए गए सात अत्यंत प्रभावशाली श्लोकों का संग्रह है। मान्यता है कि कलियुग में जब लोगों के पास सम्पूर्ण दुर्गा सप्तशती का पाठ करने का समय या सामर्थ्य न हो, तब केवल इन सात श्लोकों का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से भी देवी दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

दुर्गा सप्तश्लोकी की विशेषताएँ

  1. दुर्गा सप्तशती का सार
    • इसे सम्पूर्ण दुर्गा सप्तशती का सार माना जाता है।
    • सात श्लोकों में देवी के स्वरूप, शक्ति, करुणा और संरक्षण का वर्णन है।
  2. संकट निवारक स्तोत्र
    • भय, रोग, शत्रु, आर्थिक संकट, मानसिक तनाव और पारिवारिक समस्याओं में इसका पाठ विशेष लाभकारी माना गया है।
  3. कलियुग का सरल साधन
    • शिवजी के प्रश्न के उत्तर में स्वयं आदिशक्ति ने इसे कलियुग में सर्वकामना सिद्ध करने वाला साधन बताया है।


पाठ करने का समय

  • प्रतिदिन प्रातः या सायंकाल।
  • नवरात्रि में विशेष फलदायी।
  • अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी तिथि पर।
  • शुक्रवार एवं मंगलवार को।
  • किसी महत्वपूर्ण कार्य के आरम्भ से पहले।

पाठ की सरल विधि

  1. स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. देवी दुर्गा की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाएँ।
  3. "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" मंत्र का 11 बार जप करें।
  4. दुर्गा सप्तश्लोकी का पाठ करें।
  5. अंत में देवी से अपनी प्रार्थना करें।
  6. आरती एवं क्षमा-प्रार्थना करें।

दुर्गा सप्तश्लोकी से प्राप्त होने वाले पारंपरिक लाभ

  • मानसिक शांति
  • आत्मविश्वास में वृद्धि
  • भय का नाश
  • रोगों से रक्षा
  • शत्रु एवं बाधा शमन
  • पारिवारिक सुख-शांति
  • आर्थिक स्थिरता
  • आध्यात्मिक उन्नति

शाक्त परंपरा में एक प्रसिद्ध मान्यता है कि यदि किसी व्यक्ति के पास सम्पूर्ण दुर्गा सप्तशती पढ़ने का समय न हो, तो वह श्रद्धापूर्वक दुर्गा सप्तश्लोकी का नित्य पाठ करे। इसे देवी की कृपा प्राप्त करने का अत्यंत सरल और प्रभावी साधन माना गया है।






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ॐ श्री गणेशाय नमः । Shri Ganeshaya Namaha



Shri Ganeshaya Namaha

ॐ श्री गणेशाय नमः । Shri Ganeshaya Namaha
सुमुखश्चैकदंतश्च कपिलो गजकर्णकः ।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो गणाधिपः ।
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ।
विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥


श्री सङ्कष्टनाशन गणेश स्तोत्रम्
नारद उवाच।
प्रणम्य शिरसा देवं गौरी पुत्रं विनायाकम्।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यम् आयुष्कामार्थसिद्धये॥१॥
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम्।
तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतर्थकम्॥२॥
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम्॥३॥
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम्॥४॥
द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं परम्॥५॥
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम्॥६॥
जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत्।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः॥७॥
अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत्।
तस्य विद्या भवेत् सर्वा गणेशस्य प्रसादतः॥ ८॥
॥इति श्रीनारदपुराणे सङ्कष्टनाशनं नाम गणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥



॥श्री गणेशाय नमः॥
श्री प्रज्ञाविवर्धनाख्यं कार्तिकेय स्तोत्रंम्
स्कन्द उवाच।
योगिश्वरो महासेनः कार्तिकेयोऽग्निनन्दनः।
स्कन्दः कुमारः सेनानीः स्वामी शङ्करसम्भवः॥१॥
गाङ्गेयस्ताम्रचूडश्च ब्रह्मचारी शिखिध्वजः।
तारकारिरुमापुत्रः क्रौञ्चारिश्च षडाननः॥२॥
शब्दब्रह्म समुद्रश्च सिद्धः सारस्वतो गुहः।
सनत्कुमारो भगवान् भोगमोक्षफलप्रदः॥३॥
शरजन्मा गणाधीशपूर्वजो मुक्तिमार्गकृत्।
सर्वागमप्रणेता च वञ्छितार्थप्रदर्शनः॥४॥
अष्टाविंशतिनामानि मदियानीतियः पठेत्।
प्रत्यूषं श्रद्धया युक्तो मूको वाचस्पतिर्भवेत॥५॥
महामन्त्रमयानीति मम नामानुकीर्तनम्।
महाप्रज्ञामवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा॥६॥
॥ इति श्रीरुद्रयामले प्रज्ञाविवर्धनाख्यं श्रीमत्कार्तिकेयस्तोत्रं सम्पूर्णं॥














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