क्षत्रियों/राजपूतों का ऐतिहासिक महत्व



भारत में वर्ण-व्यवस्था की शुरुआत से पहले ही क्षत्रियों के अस्तित्व की जानकारी उपलब्ध है। ऋग्वेद में अनेक स्थानों पर "क्षत्र" एवं "क्षत्रिय" शब्द का प्रयोग किया गया है। ऋग्वेद में "क्षत्रिय" शब्द का प्रयोग शासक वर्ग के व्यक्तित्व का सूचक है। यहाँ "क्षत्र" का प्रयोग प्रायः शूरता एवं वीरता के अर्थ में हुआ है, जिसका अभिप्राय लोगों की रक्षा करना तथा गरीबों को संरक्षण देना था। यहाँ क्षत्रिय शब्द का प्रयोग राजा के लिए किया गया है। अतः समाज में क्षत्रियों का एक समूह बन गया, जिसने शौर्य, वीरता और भूस्वामी के रूप में अपना आधिपत्य स्थापित किया और शासक के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

उत्तर वैदिक काल तक क्षत्रियों को राजकुल से संबंधित मान लिया गया। इस वर्ग के व्यक्ति युद्ध-कौशल और प्रशासनिक योग्यता में अग्रणी माने जाने लगे। यह समय क्षत्रियों के उत्कर्ष का समय था। इस काल में क्षत्रियों को वंशानुगत अधिकार मिल गया था तथा वे शस्त्र और शास्त्र के ज्ञाता भी बन गए थे। इस प्रकार राजा, जो क्षत्रिय होता था, वह राज्य और धर्म दोनों पर प्रभावी हुआ। पुरोहितों पर राजा का इतना प्रभाव पड़ा कि वे राजा का गुणगान करने लगे तथा उन्हें महिमामंडित करने के लिए दैवी गुणों से अलंकृत किया और उन्हें देवत्व प्रदान किया। अपनी शक्ति के प्रभाव से राजा को अदण्डनीय घोषित किया गया।

राजपद एवं राजा की प्रतिष्ठा के साथ क्षत्रियों की प्रतिष्ठा में भी वृद्धि हुई। वृहदारण्यक उपनिषद् में कहा गया है कि क्षत्रिय से श्रेष्ठ कोई नहीं है। ब्राह्मण का स्थान उसके बाद आता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य-शक्ति से सम्पन्न क्षत्रिय, जो ब्राह्मणों के रक्षक और पालक थे, सामाजिक क्षेत्र में श्रेष्ठ स्वीकार किए गए। ब्राह्मणों की श्रेष्ठता का आधार उनका बौद्धिक एवं दार्शनिक होना था। इसका ह्रास हुआ और क्षत्रिय इन क्षेत्रों में भी अग्रणी हुए। राजा जनक, प्रवाहण जाबालि, अश्वपति, कैकेय और काशी नरेश अजातशत्रु ऐसे शासक थे, जिनसे शिक्षा-दीक्षा ग्रहण करने ब्राह्मण आते थे। पौरोहित्य, याज्ञिक क्रियाओं तथा दार्शनिक गवेषणाओं में भी क्षत्रियों ने ब्राह्मणों के एकाधिकार को चुनौती दी। इन परिस्थितियों में क्षत्रियों ने ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को अस्वीकार किया। महाभारत में तो यहाँ तक कहा गया कि ब्राह्मणों को क्षति से बचाने के कारण ये "क्षत्रिय" कहे गए। इस प्रकार क्षत्रियों ने शस्त्र और शास्त्र दोनों के ज्ञाता होकर अपनी श्रेष्ठता स्थापित की।


 


इस पूर्ण भू-भारत के चप्पे-चप्पे को अपने रक्त से सींचने वाले क्षत्रिय वंश के पूर्वज ही तो थे। इनकी कितनी सुन्दर समाज-व्यवस्था, कितनी आदर्श परिवार-व्यवस्था, कितनी निष्कपट राज-व्यवस्था, कितनी कल्याणकारी अर्थव्यवस्था और कितनी ऊँची धर्म-व्यवस्था थी। आज भी क्षत्रिय वंश और भारत को उन व्यवस्थाओं पर गर्व है। ये व्यवस्थाएँ क्षत्रिय वंश द्वारा निर्मित, रक्षित और संचालित थीं। इसके उपरान्त विश्व-साहित्य के अनुपम ग्रन्थ महाभारत और रामायण इसी काल में निर्मित हुए। गीता जैसा अमूल्य रत्न भी इसी वंश की कहानी कहता है, जिसका मूल्यांकन आज का विद्वान न कर सका है और न कर सकता है। इन दोनों ग्रन्थों में क्षत्रिय वंश के पूर्वजों की गौरवगाथाएँ और महिमा का वर्णन है, जिन्होंने विश्व-विजय की थी और इस भू-खण्ड के चक्रवर्ती सम्राट रहे थे। महाभारत का युद्ध दो भाइयों के परिवार का साधारण गृह-युद्ध नहीं था। वह धर्म और अधर्म का युद्ध था, जो क्षत्रिय धर्म के औचित्य और स्वरूप को स्थिर रखने का उदाहरण था।

परम ब्रह्म परमात्मा के रूप में जिस भगवान कृष्ण की भक्ति का भागवत में वर्णन किया गया है, वे 16 कलाओं से परिपूर्ण भगवान कृष्ण भी तो हमारे पूर्वज थे। यह जाति अति आदर्शवान, उच्च, निर्भीक और अद्वितीय है। वह अधर्म, अन्याय, अत्याचार, असत्य और उत्पीड़न के सामने झुकना या नतमस्तक होना नहीं जानती तथा वह पराजय व पतन को भी विजय और उल्लास में बदलना जानती है। रघुवंशियों की गौरवगाथा और उज्ज्वल महिमा का वर्णन रघुवंश में दिया गया है। इसे पढ़ने पर मन आनन्दित और आत्मा पुलकित हो उठती है।

परम श्रद्धेय अयोध्यापति श्रीराम रघुवंशी भी तो हमारे पूर्वज थे। उनके गौरव व बड़प्पन की तुलना संसार में किसी से नहीं की जा सकती। यही नहीं, बौद्ध धर्म और जैन धर्म के प्रवर्तक तथा अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले क्षत्रिय पुत्र भगवान बुद्ध और क्षत्रिय पुत्र महावीर ही तो थे, जिन्होंने उस समय देश को अहिंसा का पाठ पढ़ाया। अतः इस वसुन्धरा में क्षत्रिय जाति को छोड़कर कोई अन्य जाति विद्यमान नहीं है, जिसके पीछे इतना साहित्यिक बल, प्रेरणा के स्रोत तथा जिसकी गौरवमयी गरिमा एवं शौर्य का वर्णन इतने व्यापक और प्रभावपूर्ण ढंग से हुआ हो। अपने सम्मान और कुल-गौरव की रक्षा के लिए वीरांगनाओं ने अग्नि-स्नान (जौहर) और धारा (तलवार) स्नान किया है। मैं यह मानने के लिए कभी तैयार नहीं हूँ कि जिस जाति और वंश के पास इतनी अमूल्य तथा अटूट साहित्यिक निधि हो, वह स्वयं अपने ऊपर गर्व नहीं कर सकती।

सतयुग का इतिहास हमें वैदिक वाङ्मय के रूप में देखने को मिलता है। वैदिक और उत्तरवैदिक साहित्य में तत्कालीन जीवन-दर्शन, समाज-व्यवस्था आदि का सांगोपांग चित्रण मिलता है। त्रेता और द्वापर युगों के इतिहास पर समस्त पौराणिक साहित्य भरा पड़ा है। वाल्मीकि रामायण और महाभारत उसी इतिहास के दो अमूल्य ग्रन्थ हैं। महाभारत काल के पूर्व का हजारों वर्षों का इतिहास क्षत्रिय इतिहास मात्र है। महाभारत काल के पश्चात् लगभग डेढ़ हजार वर्ष का इतिहास भारतीय इतिहास की दृष्टि से अंधकार का युग कहा जा सकता है, पर यह बताने में हमें तनिक भी संकोच नहीं है कि उस समय का समस्त भारत और आस-पास के प्रदेशों पर क्षत्रियों का सर्वभौम प्रभुत्व था।

मौर्यकाल का इतिहास तिथिवार और क्रमवार उपलब्ध है। मौर्यकाल से लेकर मुसलमानों के आक्रमण तक भारत की क्षत्रिय जाति सर्वभौम प्रभुत्व सम्पन्न जाति रही है। इस्लामी प्रभुत्व के समय में भी जौहर और शाका करके जीवित रहने वाली, मर-मरकर पुनः जीवित होने वाली क्षत्रिय जाति का इतिहास हिन्दू भारत का इतिहास है। अतः मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि संसार के प्राचीनतम सभ्य देश भारत के इतिहास में से क्षत्रिय इतिहास निकाल देने के उपरान्त कुछ भी नहीं बचता। अतः दूसरे शब्दों में यह कहा जाए कि मूलतः क्षत्रियों का इतिहास ही भारत का इतिहास है।


इस प्रकार महान और व्यापक हिन्दू संस्कृति के अन्तर्गत क्षत्रियों (राजपूतों) की अपनी एक विशिष्ट संस्कृति रही है। यह विशिष्ट संस्कृति कालान्तर में विशिष्ट आचार-विचार, विशिष्ट भाषा, विशिष्ट साहित्य, विशिष्ट इतिहास, विशिष्ट कला-कौशल, विशिष्ट राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक व्यवस्थाओं के कारण और भी सबल बनी है।

अतः राजपूत एक ऐसा वंश है, जिसके स्वयं के राजनियम, राजविधान तथा शासन-प्रणाली सभ्य संसार के इतिहास में सबसे अधिक समय तक प्रचलित रहे हैं तथा सबसे अधिक कल्याणकारी और सफल सिद्ध हुए हैं। बीच-बीच में कुछ राजाओं द्वारा अपने अलग नियम तथा प्रजा के अमंगलकारी कार्यों के कारण पूरे क्षत्रिय वंश को बुरा नहीं कहा जा सकता। जहाँ राजपूतों ने एक ओर भारतीय संस्कृति की रक्षा की, वहीं दूसरी ओर उन्होंने अपनी स्वयं की विशिष्ट संस्कृति का निर्माण किया। यह विशिष्ट राजपूत संस्कृति आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परिलक्षित होती है।

यहाँ मैं कहना चाहूँगा कि सभी क्षत्रिय शासक निरंकुश नहीं थे, बल्कि इनके समय में शिक्षा, कला, संगीत और संस्कृति की अद्भुत उन्नति हुई थी। कई तो स्वयं इसके पारखी भी थे और अनेक गरीबों के मित्र एवं संरक्षक थे। वे उन्हें सहायता एवं भोजन देते थे। इनमें महाराज हर्ष सबसे अग्रणी थे। वे बैस क्षत्रिय ही तो थे और अपनी बहन से माँगकर कपड़े पहनते थे।

बैसवाड़े में गंगा तट पर बहुत से महत्वपूर्ण स्थान हैं, जिनकी खुदाई कर हम अपने प्राचीन इतिहास को उजागर कर सकते हैं। यहाँ समय-समय पर प्राचीन तथा पुरातात्त्विक महत्व की वस्तुएँ, सिक्के, बर्तन और हथियार मिलते रहते हैं, जिससे हमारी प्राचीन सभ्यता का ज्ञान होता है। बैसवाड़ा का गंगा तटीय इलाका इन प्राचीन एवं पुरातात्त्विक वस्तुओं की खान है।

निश्चित रूप से यह कहना कठिन है कि कितने लाख वर्ष पहले हमारे पूर्वजों ने इस वर्ण-व्यवस्था को अपनाकर सामाजिक जीवन में एक महत्त्वशाली अनुशासन की व्यवस्था की थी। अतएव अतीत के उस सुदूर प्रभात में भी मानवता के लालन-पोषण और उसके लौकिक तथा पारलौकिक उत्कर्ष के लिए यदि कोई वर्ण उत्तरदायी था, तो वह वर्ण मुख्य रूप से क्षत्रिय ही था और यदि कोई जाति तथा व्यक्ति उत्तरदायी था, तो वह क्षत्रिय ही था।

पौराणिक काल के जम्बूद्वीप पर एकछत्र राज की यदि किसी जाति ने स्थापना की, तो वह एकमात्र क्षत्रिय ही थी। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस पृथ्वी को वर्तमान आकार और स्वरूप देने वाले तथा इसका दोहन कर समस्त जीवनोपयोगी सामग्री उपलब्ध कराने वाले व्यक्ति क्षत्रिय राजा पृथु ही थे। हिमालय से लेकर सुदूर दक्षिण तक तथा प्रशान्त महासागर से लेकर ईरान के अति पश्चिमी भाग तक के भू-खण्ड के अतिरिक्त पूर्वी भाग और असम पर भी क्षत्रियों का ही शासन था। यहाँ तक कि देवासुर संग्राम में देवताओं ने क्षत्रियों का तेज, क्षात्र-शक्ति और अन्तर्दृष्टि देखकर ही उनसे सहायता प्राप्त की।

एक ओर क्षत्रियों द्वारा रक्षित शान्ति के समय वेदों की रचना हुई तथा सर्वभौमिक सिद्धान्तों के प्रणेता उपनिषदों के अधिकांश आचार्य क्षत्रिय ही थे। कोई आज बता सकता है कि संसार में वह कौन-सी जाति है, जिसमें अवतरित मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की भारत के आधे से अधिक नर-नारी परमेश्वर के रूप में उपासना करते हैं? तथा कौन बता सकता है कि वह कौन-सी जाति है, जिसमें पुरुषोत्तम योगीराज भगवान कृष्ण अवतरित हुए? क्या कोई बता सकता है कि वह कौन-सी जाति थी, जिसके काल में वाल्मीकि रामायण, महाभारत एवं गीता की रचना हुई? क्या कोई बता सकता है कि सर्वप्रथम शान्ति और अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले बौद्ध धर्म के प्रवर्तक भगवान बुद्ध और जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान महावीर किस जाति के थे? इन सब प्रश्नों का उत्तर है—"क्षत्रिय"।



जिस समय संसार की अन्य जातियाँ अपने पैरों पर लड़खड़ाते हुए उठने का प्रयास कर रही थीं, उस समय भारतवर्ष में क्षत्रिय महान साम्राज्यों के अधिष्ठाता थे। वे साहित्य, कला, वैभव, ऐश्वर्य, सुख और शान्ति के जन्मदाता थे। स्वर्णयुगीन भारत, ज्ञानगुरु भारत और विश्व-विजयी भारत के शासक क्षत्रिय ही तो थे। विदेशी आक्रमणकारी यवन, शक, हूण और कुषाण जातियों को क्षत्रियों के बाहुबल के सामने नतमस्तक होना पड़ा था। यह क्षत्रिय ही तो थे, जिन्होंने इन आक्रमणकारी जातियों के अस्तित्व तक को भारत में आज ऐतिहासिक खोज बना दिया है। हम उन पूर्वजों को कैसे भुला सकते हैं, जिन्होंने देश भर में शौर्य और तेज के बल से प्रबल राज्यों का निर्माण कर इतिहास में राजपूत काल को अमर कर दिया।

इसके बाद इस्लाम धर्म का प्रबल तूफान उठा और भारत की प्राचीन संस्कृतियों, सुव्यवस्थित साम्राज्यों तथा दीर्घकालीन व्यवस्थाओं को एक के बाद एक करके धराशायी कर दिया। भारत में इन आक्रमणकारियों का सामना मुख्य रूप से क्षत्रियों को ही करना पड़ा। साम्राज्य नष्ट हुए, जातियाँ समाप्त हुईं, स्वतंत्रता विलुप्त हुई, पर संघर्ष बन्द नहीं हुआ।

क्या कोई इतिहासकार बता सकता है कि राजपूतों के अतिरिक्त संसार में कोई अन्य जाति हुई है, जिसने धर्म और सम्मान की रक्षा के लिए सैकड़ों शाके किए हों? क्या राजपूत नारियों के अतिरिक्त अन्य कोई ऐसी नारियाँ संसार में हुई हैं, जिन्होंने हँसते-हँसते जौहर कर प्राणों की आहुति दी हो तथा धारा (तलवार) स्नान किया हो? इसका उदाहरण इतिहास में अन्यत्र नहीं मिलेगा।

इस्लाम धर्म का प्रभाव सैकड़ों वर्षों तक क्षत्रियों से टकराकर निस्तेज होकर स्वतः शान्त हो गया। कितने आश्चर्य की बात है कि क्षत्रिय राज्यों के पश्चात् स्थापित होने वाला मुस्लिम राज्य, क्षत्रिय राज्यों से पहले ही समाप्त हो गया।

महात्मा बुद्ध के प्रभाव से अधिकांश क्षत्रियों ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और अहिंसा पर विश्वास करने लगे। अशोक महान एक शक्तिशाली राजा के रूप में उदित हुए। उसके बाद महाराजा हर्षवर्धन, जो कि एक बैस क्षत्रिय राजा थे, शीलादित्य के नाम से प्रसिद्ध हुए और एक चक्रवर्ती राजा का रूप लिया। जिनका शासन नर्मदा के उत्तर से नेपाल तक तथा अफगानिस्तान और ईरान से लेकर पूर्व में असम तक था और जिसके सम्मुख कोई भी राजा सिर नहीं उठा सकता था। उन्होंने भी अन्त में बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। साथ ही अधिकतर क्षत्रिय जाति ने भी बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और इनके बाद कोई प्रभावशाली उत्तराधिकारी न होने के कारण उनका राज्य छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त हो गया।

बौद्ध धर्म समाज की शाश्वत आवश्यकता एवं सुरक्षा के लिए अनुपयोगी सिद्ध हुआ। उसने राष्ट्र की स्वाभाविक क्षात्र-शक्ति को निस्तेज, पंगु और सिद्धान्तहीन बना दिया। वह राष्ट्र पर बाहरी आक्रमणों के समय असफल सिद्ध होने लगा। अतएव क्षत्रियों ने क्षात्रधर्म के प्रतिपादक वैदिक धर्म की पुनः स्थापना की, परन्तु शक्तिशाली केन्द्रीय शासन के अभाव में राजपूत राजा आपस में युद्ध करते-करते छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गए। जिसका लाभ मुस्लिम काल में मुस्लिम आक्रान्ताओं को मिला और क्षत्रिय अपनी शक्ति को क्षीण करते रहे तथा अपने अस्तित्व के लिए लड़ते रहे। वे भगवान कृष्ण के उपदेशों का पालन करते रहे, परन्तु संघर्ष को कभी विराम नहीं दिया।

भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि वास्तव में धर्मयुद्ध से बढ़कर कल्याणकारी कर्तव्य क्षत्रिय के लिए और कुछ नहीं—

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते॥

और यदि धर्मयुद्ध तथा संग्राम को क्षत्रिय नहीं करता, तो वह स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप का भागी होता है—

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥


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क्षमामूर्ति संत एकनाथ जी महाराज



भारत की संत परम्परा में एकनाथ जी महाराज का अपना विशेष स्थान है। भक्त श्रेष्ठ भानु प्रताप के पुत्र चक्रपाणि और चक्रपाणि के पुत्र सूर्यनारायण के घर लगभग 1590 संवत में एक बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम एकनाथ रखा गया। इनकी माता का नाम रुक्मणी था। बालक के जन्म के समय मूल नक्षत्र था जिसके प्रभाव से बालकपन में ही इनके माता पिता का देहांत हो गया। जब बालक एकनाथ अनाथ हो गया, तब इनका लालन-पालन इनके पितामह ने किया। 12 वर्ष की आयु में बालक एकनाथ के जीवन में घटना घटित होती है जब वे एक शिवालय में कीर्तन कर रहे थे तो रात्रि के अन्तिम पहर में आकाशवाणी होती है, ‘‘जाओ! देवगढ़ में जनार्दन पंत के दर्शन करो।’’ आकाशवाणी को सुनकर एकनाथ जी देवगढ़ की ओर चल पड़े और वहाँ उन्हें संवत् 1602 में जनार्दन पंत के दर्शन हुए। गुरुदेव श्री जनार्दन पंत ने एकनाथ जी को आश्रम की भोजन व्यवस्था का कार्य सौंप दिया। एक दिन एक पाई का हिसाब न मिलने के कारण वे पूरी रात हिसाब मिलाने में लगे रहे और जैसे ही उन्हें अपनी भूल ज्ञात हुई, वे अत्यधिक प्रसन्न होकर गुरुजी के पास आये। गुरुजी बोले, पुत्र! जब तुम एक पाई की भूल ज्ञात होने पर इतने प्रसन्न हो, तो जीवन की भूल जान लेने पर कितने प्रसन्न होंगे? कहा जाता है कि गुरुदेव जनार्दन पंत साक्षात् भगवान दत्तात्रेय थे।
 

एकनाथ जी के जीवन में बहुत से चमत्कार देखने एवं सुनने को मिलते हैं। कहा जाता है कि कृष्णा एवं गोदावरी नदियाँ भी मनस्वी रूप धारण कर आपकी कथा सुनने को आती थीं। एकनाथ जी महाराज दृढ़ विश्वास के साथ कथा का वर्णन करते थे। आपके जीवन की एक घटना इस प्रकार है- एक बार वे रामकथा कह रहे थे- प्रसंग था अशोक वाटिका में सीता जी एवं हनुमान का संभाषण। इसमें एकनाथ जी महाराज बोले कि अशोक वाटिका में सफेद रंग के पुष्प थे, इस पर श्री हनुमान जी ने प्रकट हो कर कहा कि वाटिका के पुष्प लाल रंग के थे। इस पर एकनाथ जी ने कहा, नहीं! पुष्प सफेद रंग के थे। श्री हनुमान जी ने कहा कि आप माँ जानकी जी से पूछ लीजिए। श्री जानकी जी ने कहा कि वत्स हनुमान ठीक कह रहे हैं, वाटिका के पुष्प लाल रंग के ही थे। पुनः एकनाथ जी ने अपने पक्ष पर जोर देकर कहा कि अशोक वाटिका में पुष्प सफेद रंग के ही थे, लाल रंग के नहीं। अब ये तीनों वादी भगवान श्री रामचंद्र जी के पास आये और भगवान के सम्मुख अपना पक्ष रखा। तब भगवान ने विवाद को निपटाते हुए कहा कि अशोक वाटिका के पुष्प सफेद रंग के थे परन्तु हनुमान जी एवं जानकी जी को क्रोध के कारण सफेद रंग के पुष्प लाल रंग के दिखाई पड़ रहे थे। यह एकनाथ जी महाराज का दृढ़ विश्वास था। इस संदर्भ में गोस्वामी जी कहते हैं-
बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु।
राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु।। मानस उत्तर. दो.-10

दूसरी घटना
एक बार एकनाथ जी महाराज अपनी संत मण्डली के साथ गोमुख से गंगा जल लेकर सेतुबंध रामेश्वरम की ओर जा रहे थे, रामेश्वरम के निकट समुद्र के रेत में एक गधा प्यास से व्याकुल होकर कातर दृष्टि से देख रहा था। एकनाथ जी ने अपनी काँवर में उपस्थित जल पिलाकर संत मण्डली से कहा कि यदि आप अपनी काँवर का जल भी इस गधे को पिला दें तो इसके प्राण बच सकते हैं। इस पर संत मण्डली ने विरोध तो प्रकट किया परन्तु एकनाथ जी महाराज के निवेदन को टाल न सके जैसे ही गधे ने गंगाजल ग्रहण किया, साक्षात भगवान गौरी शंकर प्रकट हो गये।

तीसरी घटना
एक बार एकनाथ जी महाराज ने अपने पितरों को श्राद्ध करने के लिए बहुत स्वादिष्ट भोजन बनवाया तथा श्राद्ध का भोजन ग्रहण करने के लिए ब्राह्मणों को आमंत्रित किया। ब्राह्मणों के आने से पूर्व ही कुछ महर जाति के लोग वहाँ से गुजर रहे थे, भोजन की सुगंध से प्रभावित होकर उन्होने कहा कि अहा! कितने सुंदर एवं स्वादिष्ट व्यंजनों की सुगंध आ रही है। एकनाथ जी के इतना सुनने पर आपने महर जाति के लोगों को रोक कर भोजन करवाया। इसके पश्चात् ब्राह्मणों ने जब यह सुना तो वे बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने श्राद्ध ग्रहण करने से इनकार कर दिया तत्पश्चात् घटना कहती है कि पितरों ने साक्षात प्रकट होकर श्राद्ध ग्रहण किया।
 
चौथी घटना
एक बार कुछ चोरों ने चोरी करने के उद्देश्य से एकनाथ जी के घर में प्रवेश किया, घर का सम्पूर्ण सामान इकट्ठा कर, जब वे चलने लगे तो अंधे हो कर सामान से टकराकर गिरने लगे। इसी समय एकनाथ जी महाराज की समाधि टूटी तो इन्होंने चोरों को दृष्टि देकर सामान भी साथ दे दिया।

पाँचवी घटना
एक बार पैथड़ में एक वेश्या रहती थी। वेश्या के विषय में तो सभी लोग जानते ही हैं। एक दिन वेश्या एकनाथ जी महाराज से मिलने गयी और महाराज श्री से निवेदन भी किया कि आप मेरा स्थान भी पवित्र कीजिए। इस पर एकनाथ जी ने कहा, ‘‘अवश्य। एकनाथ जी महाराज ने समाज की संकीर्ण रूढि़ को तोड़कर वेश्या के घर जाकर, उसे परम पवित्र कर दिया। घटना कहती है कि उसी दिन से वेश्या भगवद्भजन करने लग गयी।

छटी घटना
एक दिन अत्यधिक वर्षा हो रही थी। अर्द्धरात्रि के समय चार ब्राह्मण एकनाथ जी महाराज के घर पहुंचे। कई दिनों से लगातार वर्षा के कारण घर पर सूखे ईंधन का अभाव था। एकनाथ जी को ब्राह्मणों की सेवा के लिए सूखे ईंधन की आवश्यकता थी, तो इन्होंने अपने पलंग को तोड़कर सूखे ईंधन की व्यवस्था करके, ब्राह्मणों की यथा योग्य सेवा की।

सातवीं घटना
एकनाथ जी महाराज का गोदावरी स्नान करने का नित्य का नियम था। एक दिन प्रातः जब महाराज जी गोदावरी स्नान करके लौट रहे थे, तब सराय के पास रहने वाले एक मुसलमान युवक ने उनके ऊपर कुल्ला कर दिया। महाराज श्री पुनः गोदावरी स्नान के लिए चल पड़े, लौटने पर मुसलमान युवक ने पुनः अपनी करतूत दोहरा दी। यह क्रम 108 वार तक चला। 108 वीं बार युवक का हृदय द्रवीभूत हो गया। उसने एकनाथ जी महाराज के चरण पकड़कर क्षमा याचना की। इस पर महाराज जी ने कहा, ‘‘बेटा! तू धन्य है, तेरी कृपा से आज एकादशी के दिन मेरा 108 बार गोदावरी स्नान हो गया। इसी परिप्रेक्ष्य में संत कवि कहते हैं-
जो सहि दुख परछिद्र दुुरावा। बंदनीय जेंहि जग जस पावा।।
मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू।। मानस बाल. दो. 01-06,07

आठवीं घटना
एक बार कुछ असामाजिक तत्वों ने मिलकर प्रस्ताव बनाया कि एकनाथ जी महाराज को क्रोधित किया जाए। उनमें से एक युवक ने अपने सभी साथियों के समक्ष संकल्प किया कि वह एकनाथ जी को क्रोधित कर सकता है। युवक ने योजनानुसार कार्य करना शुरू किया। वह जूते पहन कर एकनाथ जी महाराज की रसोई में घूमने लगा और घर को दूषित करने का प्रयोजन करने लगा। एकनाथ जी महाराज की धर्मपत्नी घर को बुहार रहीं थीं, तो वह उछल कर उनकी पीठ पर बैठ गया। एकनाथ जी ने उसे ऐसा करते देखकर अपनी पत्नी से कहा, ‘‘बच्चा आपकी पीठ पर बैठा है, उसे चोट नहीं लगनी चाहिए।’’ तब उनकी पत्नी ने कहा, ‘‘यह तो मेरे बच्चे जैसा है। मैं इसे अपने बच्चे की तरह रखूँगी तथा दुलार करूँगीं।’’ इतना सुनते ही युवक की सम्पूर्ण शरारत सिर के बल दौड़ गयी। उसने दोनों से क्षमा माँगी।


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महाराज छत्रसाल



पन्ना नरेश महाराज चम्पतराय जी बडे़ धर्मनिष्ठ एवं स्वाभिमानी शासक थे। ज्येष्ठ शुक्ल तृृतीया विक्रम सम्वत 1706 को  बालक  छत्रसाल  का  उनके  मोर पहाड़ी के जंगल में जन्म हुआ। उस समय मुगल सम्राट शाहजहां की सेना चारों ओर से घेरा डालने के प्रयत्न में थी। इसलिए इनके पिता ने पुत्र जन्म का उत्सव नहीं मनाया था। पिता की मृृत्यु के पश्चात् 13 वर्ष की अवस्था तक छत्रसाल को ननिहाल में रहना पड़ा और उसके बाद वह पन्ना चले आए और चाचा सुजानराव ने बड़ी सावधानी  से  उन्हें  नैतिक  शिक्षा  दी। आरम्भ से ही छत्रसाल के मन में मुगलों के अत्याचारों से भारत को मुक्त कराने की आकांक्षा थी।

महाराज चम्पतराय का शरीरान्त हो  जाने  पर  युवराज  छत्रसाल  अपने पिता के संकल्प को पूरा करने के लिए सिंहासन पर बैठे। उस समय दिल्ली के सिंहासन पर औरंगजेब बैठ चुका था। उन्हें छत्रपति शिवाजी महाराज से बड़ी प्रेरणा मिली और छत्रपति शिवाजी की सलाह  के  अनुसार  ही  उन्होंने  अपनी शक्ति से मुगलों से अपनी जन्मभूमि को मुक्त कराने का बीड़ा उठाया। उन्होंने सबसे पहले झांसी को अपना निशाना बनाया और बलपूर्वक झांसी पर अधिकार कर लिया। 

1671 ई0 में जलायून, (जालौन) में उनका घोर संग्राम हुआ और सन 1680 में हमीरपुर पर भी उन्होंने अपना राज्य स्थापित कर लिया।  मुगलों ने कूटनीतिक चाल से आपको फांसने की कोशिश की लेकिन छत्रसाल जहां महान शक्तिशाली थे वहीं बडे़ नीतिज्ञ भी थे। वे समझ गए कि दिल्लीपति उनसे सीधी टक्कर नहीं लेकर नवाब अहमदखान के द्वारा उन्हें घेरना चाहता है। छत्रसाल ने तुरंत पेशवा बाजीराव प्रभु से सहायता मांगी और फिर महाराष्ट्र और बुंदेलों की संयुक्त सेना ने बुंदेलखण्ड को स्वतंत्र करा के हिन्दू गौरव की पताका लहरा दी।

वीररस के शिरोमणि कवि भूषण को केवल दो ही व्यक्तियों को अपनी शौर्य गाथा का केन्द्र बनाना रास आया। उन्होंने  लिखा-‘शिवा  को  सराहों,  के सराहों  छत्रसाल  कौं’  छत्रसाल  के राजकवि लाल ने ‘छत्र प्रकाश’ में उनके शौर्य का बहुत ही सुंदर वर्णन किया है। बुंदेलखण्ड की प्रजा उन्हें साक्षात् देवता मानती थी। अपनी प्रजा के दुःख में वे सदैव ही दुःखी हो उठते थे। छत्रसाल महाराज के हृदय में अंत तक हिन्दू धर्म के उद्धार की तीव्र ज्वाला प्रज्ज्वलित रही। मुगलों से लोहा लेते हुए इस महान धर्मरक्षक  ने  अपने  आपको  भारत  की पवित्र भूमि में विलीन कर दिया। आपकी जीवनी देशभक्तों को सदा प्रेरित करती रहेगी।


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