पश्चिमोत्तानासन योग विधि, लाभ और सावधानी



पश्चिमोत्तानासन

पश्चिमोत्तानासन करने में पीठ में खिंचाव उत्पन्न होता है, इसलिए इसे पश्चिमोत्तानासन कहा जाता है। पश्चिमोत्तानासन से शरीर की सभी मांसपेशियों में खिंचाव होता है, इसलिए इसे बैठकर किए जाने वाले आसनों में एक महत्वपूर्ण आसन माना गया है। ‘पश्चिम’ का अर्थ शरीर का पिछला भाग अर्थात पीठ होता है। शीर्षासन की भाँति इस आसन का भी महत्वपूर्ण स्थान है।

पश्चिमोत्तानासन का नियमित अभ्यास करने से मेरुदंड में मजबूती एवं लचीलापन आता है, जिससे कुंडलिनी जागरण में सहायता मिलती है तथा वृद्धावस्था में भी रीढ़ की हड्डी झुकती नहीं है। इस आसन के नियमित अभ्यास से शरीर की चर्बी और मोटापा कम किया जा सकता है तथा मधुमेह में भी लाभ मिलता है। इसके माध्यम से स्त्रियों के योनिविकार, मासिक धर्म संबंधी समस्याएँ तथा प्रदर आदि रोगों में लाभ मिलता है। यह गर्भाशय संबंधी समस्याओं में भी सहायक माना जाता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से भी यह एक महत्वपूर्ण आसन है। साथ ही मेरुदंड की विभिन्न समस्याओं, जैसे पीठ-दर्द, पेट के रोग, यकृत, तिल्ली, आँतों तथा गुर्दों से संबंधित विकारों में भी लाभकारी माना जाता है।

पश्चिमोत्तानासन (Paschimottanasana) बैठकर किया जाने वाला योगासन है। यह योगासन जानुशीर्षासन से मिलता-जुलता है। इसमें मुख्य रूप से मेरुदंड, पैर, घुटनों के नीचे की नसें तथा कमर सक्रिय रहती हैं। यह आसन विशेष रूप से उस समय लाभकारी होता है, जब शरीर थका हुआ हो।

How To Do Paschimottanasana
How To Do Paschimottanasana

पश्चिमोत्तानासन के लाभ (Benefits of Paschimottanasana)

इस आसन से शरीर के पिछले भाग में मौजूद तनाव दूर होता है। यह योग मुद्रा मेरुदंड एवं पैरों की मांसपेशियों के लिए अत्यंत लाभदायक है। जब आप अत्यधिक थके हुए या अस्वस्थ होते हैं, तब इसका अभ्यास शरीर के तनाव और थकान को कम करके ताजगी प्रदान करता है।

इसके प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं—

  • इस आसन के अभ्यास से अच्छी नींद आती है तथा अनिद्रा की समस्या में लाभ मिलता है।

  • उच्च रक्तचाप, बांझपन तथा मधुमेह जैसी समस्याओं में भी यह लाभकारी माना जाता है।

  • नियमित अभ्यास से शरीर की चर्बी और मोटापा कम होता है।

  • क्रोध, सिरदर्द, साइनस तथा अनिद्रा के उपचार में भी सहायता मिलती है।

  • प्रसव के बाद इसका नियमित अभ्यास महिलाओं के शरीर को पुनः संतुलित बनाने तथा पेट एवं कूल्हों की अतिरिक्त चर्बी कम करने में सहायक होता है। साथ ही मासिक धर्म को नियमित करने में भी लाभकारी माना जाता है।

  • नितंबों को सुडौल बनाता है।

  • पाचन क्रिया को बेहतर बनाता है तथा कब्ज एवं खट्टी डकार जैसी समस्याओं में राहत देता है।

  • इसके नियमित अभ्यास से किडनी, लिवर, गर्भाशय एवं अंडाशय अधिक सक्रिय होते हैं।

  • पूरे शरीर के साथ-साथ सिर और गर्दन की मांसपेशियों में खिंचाव उत्पन्न होता है, जिससे तनाव, चिंता तथा मानसिक समस्याओं में लाभ मिलता है।

  • क्रोध और चिड़चिड़ापन कम होता है तथा मन शांत रहता है।

  • रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाने में सहायक होता है।

  • यौन शक्ति में वृद्धि तथा श्रोणि अंगों को सुदृढ़ बनाने में सहायक माना जाता है।

  • आध्यात्मिक उन्नति में भी सहायक माना जाता है।

  • वीर्य दोष, नपुंसकता तथा कुछ यौन विकारों में लाभकारी माना जाता है।

  • पूरे शरीर में रक्तसंचार को बेहतर बनाता है, जिससे शारीरिक दुर्बलता दूर होकर शरीर सुदृढ़, फुर्तीला और स्वस्थ बना रहता है।

  • बहुमूत्र, गुर्दे की पथरी तथा बवासीर जैसी समस्याओं में भी लाभकारी माना जाता है।

  • पेट की मांसपेशियों में खिंचाव होने से पेट एवं उसके आसपास जमी अतिरिक्त चर्बी कम करने में सहायता मिलती है।

  • यह एक ऐसा आसन है जो शारीरिक लाभों के साथ-साथ मानसिक एवं आध्यात्मिक लाभ भी प्रदान करता है। इससे मन शांत होता है तथा ब्रह्मचर्य के पालन की भावना सुदृढ़ होती है।

  • बच्चों को उचित मार्गदर्शन में यह आसन कराया जाए तो उनके शारीरिक विकास में सहायता मिल सकती है।

(Benefits of Paschimottanashana

योग अवस्था (Paschimottanasana Posture and Technique)

जब आप पहली बार इस योग का अभ्यास करते हैं, तब घुटनों की नसों में तनाव के कारण पैरों को पूरी तरह सीधा रख पाना कठिन हो सकता है। ऐसी स्थिति में घुटनों पर अधिक बल नहीं देना चाहिए। आवश्यकता होने पर मोड़े हुए कंबल पर बैठकर अभ्यास किया जा सकता है।

योगाभ्यास के दौरान आगे झुकते समय इस बात का ध्यान रखें कि पेट और छाती भी आगे की ओर झुकें। मेरुदंड की हड्डियों में खिंचाव बना रहे, इसका ध्यान रखते हुए अपनी क्षमता के अनुसार आगे झुकने का प्रयास करें।


पश्चिमोत्तानासन करने की विधि (Paschimottanasana Steps)

  1. सबसे पहले स्वच्छ वातावरण में चटाई, योगा मैट या दरी बिछाकर पीठ के बल लेट जाएँ।

  2. दोनों पैरों को सीधा फैलाकर आपस में मिलाकर रखें तथा पूरे शरीर को सीधा रखें।

  3. दोनों हाथों को धीरे-धीरे ऊपर उठाते हुए सिर के पीछे जमीन पर टिकाएँ।

  4. इसके बाद दोनों हाथों को तेजी से ऊपर उठाते हुए कमर के ऊपरी भाग को उठाकर बैठने की स्थिति में आएँ।

  5. धीरे-धीरे दोनों हाथों से पैरों के अंगूठों को पकड़ने का प्रयास करें।

  6. इस क्रिया के दौरान हाथ और पैर सीधे रखें तथा नाक को घुटनों से स्पर्श कराने का प्रयास करें।

  7. अब आप पश्चिमोत्तानासन की स्थिति में हैं।

  8. इस क्रिया को 10–10 सेकंड के अंतराल पर विश्राम लेते हुए 3 से 5 बार करें।

  9. आसन करते समय श्वास की गति सामान्य रखें।

  10. जिन व्यक्तियों को लेटी हुई अवस्था से अचानक उठने में कठिनाई होती है, वे बैठी हुई अवस्था से ही इस आसन का अभ्यास कर सकते हैं।


पश्चिमोत्तानासन करते समय सावधानियाँ (Paschimottanasana Precautions)

किसी भी आसन का अभ्यास करते समय लाभ के साथ-साथ सावधानियों का ध्यान रखना आवश्यक है। पश्चिमोत्तानासन करते समय निम्नलिखित सावधानियाँ रखें—

  • गर्भवती महिलाओं को यह आसन नहीं करना चाहिए।

  • घुटने, कंधे, पीठ, गर्दन, नितंब, हाथ या पैर में गंभीर समस्या होने पर इसका अभ्यास न करें।

  • कमर में दर्द या रीढ़ की हड्डी में किसी प्रकार की समस्या होने पर इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए।

  • पीठ एवं कमर के दर्द तथा डायरिया से पीड़ित व्यक्तियों को यह आसन नहीं करना चाहिए।

  • यदि पेट के किसी अंग का ऑपरेशन हुआ हो, तो इसका अभ्यास न करें।

  • शरीर में किसी प्रकार की हालिया सर्जरी हुई हो, तो इस आसन से बचें।

  • अभ्यास के दौरान किसी भी प्रकार की समस्या होने पर योग विशेषज्ञ की सलाह लें।

  • रीढ़ की हड्डी में गंभीर रोग होने पर यह आसन बिल्कुल न करें।

  • स्लिप डिस्क, साइटिका, अस्थमा तथा अल्सर से पीड़ित लोगों को इसका अभ्यास करने से परहेज करना चाहिए।



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सालम मिश्री के आयुर्वेदिक गुण और कर्म



सालम पंजा (Salam Panja) एक गुणकारी जड़ी-बूटी है, जो बल एवं वीर्यवर्धक, पौष्टिक तथा नपुंसकता का नाश करने वाली मानी जाती है। इसके कंद का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। यह बलवर्धक, गुरु (भारी), शीतवीर्य, वात-पित्त शामक, वात-नाड़ियों को शक्ति प्रदान करने वाली, शुक्रवर्धक तथा पाचक होती है। अधिक समय तक समुद्री यात्रा करने वाले व्यक्तियों में उत्पन्न होने वाले रक्तविकार, कफजन्य रोग, रक्तपित्त आदि रोगों में भी यह लाभकारी मानी जाती है। इसकी पैदावार पश्चिमी हिमालय तथा तिब्बत के 8,000 से 12,000 फीट की ऊँचाई वाले क्षेत्रों में होती है।


सालम मिश्री (Salam Mishri) को संस्कृत में बीजागंध, सुरदेय, द्रुतफल तथा मुंजातक, पंजाबी में सलीब मिश्री, फ़ारसी में सालब मिश्री, बंगाली में सालम मिछरी, गुजराती में सालम तथा अंग्रेज़ी में सैलेप (Salep) कहा जाता है। यह पौधों के भेद के अनुसार देशी (भारत में उत्पन्न होने वाली) तथा विदेशी (आयातित) दो प्रकार की मानी जाती है। देशी सैलेप का वानस्पतिक नाम यूलोफिया कैम्पेस्ट्रिस (Eulophia campestris) तथा यूलोफिया उंडुलाटा (Eulophia undulata) है। विदेशी अथवा फ़ारसी सैलेप का वानस्पतिक नाम ऑर्किस लैटिफोलिया (Orchis latifolia) तथा ऑर्किस लैक्सीफ्लोरा (Orchis laxiflora) है। विदेशी या फ़ारसी सैलेप भारत में फ़ारस (ईरान) तथा अन्य देशों से आयात की जाती है। इसके कंदों का उपयोग मुख्यतः बलवर्धक, पुष्टिकारक एवं औषधीय प्रयोजनों के लिए किया जाता है।

 

सैलेप मुंजातक-कुल अर्थात् ऑर्किडेसी (Orchidaceae) परिवार का पौधा है। यह समशीतोष्ण हिमालयी प्रदेशों में कश्मीर से भूटान तक, तथा पश्चिमी तिब्बत, अफगानिस्तान, फारस (ईरान) आदि देशों में पाया जाता है हिमालय में पाए जाने वाले सैलेप के पौधे लगभग 6 से 12 इंच ऊँची झाड़ियों के रूप में होते हैं। इनकी पत्तियाँ तने के ऊपरी भाग के समीप स्थित होती हैं। पत्तियाँ लंबी, संकरी तथा रेखाकार होती हैं। इसके पुष्पदंड मूल भाग से निकलते हैं और उन पर नीले अथवा बैंगनी रंग के सुंदर पुष्प खिलते हैं। इसके भूमिगत कंद ही औषधीय दृष्टि से सर्वाधिक उपयोगी माने जाते हैं।

पौधे की जड़ें कंदयुक्त होती हैं और देखने में पंजे अथवा हथेली के समान प्रतीत होती हैं। ये स्वाद में मीठी, पौष्टिक तथा स्वादिष्ट होती हैं। औषधि अथवा टॉनिक के रूप में पौधे के कंदों, जिन्हें सालम मिश्री या सालम पंजा कहा जाता है, का ही उपयोग किया जाता है।

बाजार में मुख्य रूप से दो प्रकार की सालम मिश्री उपलब्ध होती है— सालम पंजा तथा लहसुनी सालम (सालम लहसुनिया)। सालम पंजा के कंद गोल, चपटे तथा हथेली के आकार के होते हैं, जबकि लहसुनी सालम के कंद शतावरी की भाँति लंबे, गोल तथा देखने में लहसुन की छिली हुई कलियों जैसे होते हैं।

इसके अतिरिक्त सालम बादशाही (चपटे टुकड़ों के रूप में), सालम लाहौरी तथा सालम मद्रासी (नीलगिरि क्षेत्र से प्राप्त) भी कुछ मात्रा में बाजार में उपलब्ध होते हैं। इनमें पंजा सालम का मूल्य सर्वाधिक होता है तथा गुणों की दृष्टि से भी इसे सर्वोत्तम माना जाता है।

उपयोग

सालम मिश्री का प्रयोग अकेले अथवा अन्य औषधीय घटकों के साथ किया जाता है। इसके चूर्ण को दूध में उबालकर औषधि के रूप में दिया जाता है। इसे विभिन्न पौष्टिक पाकों में भी मिलाया जाता है। यूनानी चिकित्सा पद्धति में इसका उपयोग विभिन्न माजूनों के निर्माण में किया जाता है। इसके अतिरिक्त इसका हरीरा बनाकर भी सेवन कराया जाता है।

संग्रह एवं भंडारण

औषधीय उपयोग के लिए कंदों को छाया में अच्छी तरह सुखाया जाता है। इसके बाद इन्हें वायुरुद्ध (एयर-टाइट) पात्रों में भरकर ठंडे, सूखे तथा नमी रहित स्थान पर सुरक्षित रखा जाता है।

उत्तम सालम मिश्री की पहचान

उत्तम गुणवत्ता की सालम मिश्री का रंग हल्का क्रीमी अथवा मलाई जैसा होता है। यह देखने में गूदेदार एवं अर्धपारदर्शी (पारभासी) होती है तथा तोड़ने पर चमकदार दिखाई देती है। इसमें कोई विशेष तीव्र गंध नहीं होती तथा यह स्वभाव से लुआबी (म्यूसीलेज युक्त) होती है।

सालम कंद का संघटन

सालम मिश्री के कंदों में म्यूसीलेज (Mucilage) पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। इसके अतिरिक्त इसमें प्रोटीन, पोटैशियम, फॉस्फेट तथा क्लोराइड भी उपस्थित होते हैं, जो इसके पौष्टिक एवं औषधीय गुणों में योगदान देते हैं।


सालम मिश्री के आयुर्वेदिक गुण एवं कर्म

आयुर्वेद के अनुसार सालम मिश्री स्वाद में मधुर, गुण में गुरु (भारी) तथा स्निग्ध (चिकनाई प्रदान करने वाली) होती है। इसका स्वभाव शीतल होता है तथा इसका विपाक भी मधुर माना गया है।

मधुर रस के गुण

सालम मिश्री मधुर रस प्रधान औषधि है। मधुर रस मुख में जाते ही प्रसन्नता प्रदान करता है। यह शरीर की धातुओं का पोषण एवं वृद्धि करता है। यह बलवर्धक होता है तथा वर्ण, केश, इन्द्रियों एवं ओज को बढ़ाता है। मधुर रस शरीर को पुष्ट करता है, दुग्धवृद्धि में सहायक होता है तथा जीवनीय एवं आयुवर्धक माना गया है।

मधुर रस स्वभाव से गुरु (देर से पचने वाला) होता है। यह वात, पित्त तथा विष का शमन करता है। किंतु मधुर रस का अत्यधिक सेवन मेदवृद्धि तथा कफजन्य रोगों का कारण बन सकता है। इसके अधिक सेवन से मोटापा (स्थूलता), मंदाग्नि, प्रमेह, गलगंड आदि रोग उत्पन्न होने की संभावना रहती है।

शीत वीर्य

आयुर्वेद में वीर्य का अर्थ उस शक्ति से है, जिसके द्वारा कोई द्रव्य अपना कार्य करता है। आचार्यों ने वीर्य को मुख्यतः दो प्रकार का माना है— उष्ण और शीत

शीत वीर्ययुक्त औषधियों के सेवन से मन प्रसन्न रहता है। ये जीवनीय, स्तम्भनकारक तथा रक्त एवं पित्त को शुद्ध एवं संतुलित करने वाली मानी जाती हैं।

मधुर विपाक

विपाक का अर्थ है— जठराग्नि के संयोग से पाचन के उपरांत उत्पन्न अंतिम रस। जब शरीर के पाचक रस किसी पदार्थ का पूर्ण पाचन कर लेते हैं और उसके सार तथा मल का पृथक्करण हो जाता है, तब जो अंतिम प्रभाव या रस प्राप्त होता है, उसे उस पदार्थ का विपाक कहा जाता है।

सालम मिश्री का विपाक मधुर है। मधुर विपाक गुरु होता है तथा मल-मूत्र के निष्कासन में सहायक माना जाता है। यह कफ एवं स्निग्धता का पोषण करता है। साथ ही शरीर की शुक्र धातु, जिसमें पुरुष का वीर्य तथा स्त्री का आर्तव सम्मिलित है, की वृद्धि करता है। इसके सेवन से शरीर में पोषक धातुओं के निर्माण एवं संवर्धन में सहायता मिलती है।

सालम मिश्री के लाभ

सालम मिश्री का प्रयोग मुख्य रूप से धातुवर्धक तथा पुष्टिकारक औषधि के रूप में किया जाता है।

  • यह क्षय रोग (टीबी) में लाभकारी मानी जाती है।

  • इसके सेवन से बहुमूत्र, खूनी पेचिश तथा धातु-क्षीणता में लाभ मिलता है।

  • यह शरीर का वजन बढ़ाने में सहायक मानी जाती है।

  • सालम पंजा अथवा सालम मिश्री बलवर्धक तथा शीतवीर्य होती है।

  • यह पाचन में गुरु (भारी) तथा तृप्तिदायक होती है।

  • यह मांसधातु की वृद्धि करने में सहायक मानी जाती है।

  • स्वाद में मधुर तथा वीर्यवर्धक होती है।

  • इसकी तासीर शीतल होती है।

  • यह स्तम्भनकारक तथा रक्त एवं पित्त को शुद्ध करने वाली मानी जाती है।

  • अम्लपित्त (एसिडिटी), पेट के अल्सर तथा पेट से संबंधित अन्य विकारों में लाभकारी मानी जाती है।

  • यह बलकारक, शुक्रजनक, रक्तशोधक, कामोद्दीपक, वीर्यवर्धक तथा अत्यंत पौष्टिक होती है।

  • मस्तिष्क एवं मज्जातंतुओं के लिए उत्तेजक एवं पोषक मानी जाती है।

  • पाचन नलिका में जलन होने पर इसका उपयोग किया जाता है।

  • तंत्रिका-दुर्बलता, मानसिक एवं शारीरिक थकावट, पक्षाघात, लकवा, दस्त तथा अम्लपित्त के कारण उत्पन्न पाचन तंत्र की कमजोरी एवं क्षय रोगों में इसके प्रयोग से लाभकारी परिणाम प्राप्त होने का उल्लेख मिलता है।

  • यह शरीर के वात एवं पित्त दोषों के शमन में सहायक मानी जाती है।

सालम मिश्री के औषधीय उपयोग

सालम मिश्री का उपयोग मुख्य रूप से शक्तिवर्धक, बलवर्धक, वीर्यवर्धक, शुक्रवर्धक तथा कामोद्दीपक औषधि के रूप में किया जाता है। इसके चूर्ण को दूध में उबालकर सेवन करने से इसके पौष्टिक एवं स्वास्थ्यवर्धक गुणों का लाभ प्राप्त किया जा सकता है। अन्य औषधीय द्रव्यों के साथ मिलाकर सेवन करने पर इसकी उपयोगिता और बढ़ जाती है।

यौन दुर्बलता, कम कामेच्छा, वीर्य की मात्रा, संख्या एवं गुणवत्ता में वृद्धि तथा वीर्य के अनैच्छिक स्राव को नियंत्रित करने के उद्देश्य से सालम मिश्री के चूर्ण को उसके दुगुनी मात्रा के बादाम चूर्ण के साथ मिलाकर सुरक्षित रखा जाता है। इसका लगभग 10 ग्राम मिश्रण दिन में दो बार दूध के साथ सेवन करने का उल्लेख पारंपरिक ग्रंथों में मिलता है।

मांसपेशियों के पुराने दर्द में - बराबर मात्रा में सालम मिश्री और पिप्पली के चूर्ण को मिलाकर रखें। प्रतिदिन आधा से एक चम्मच की मात्रा में, दिन में दो बार, बकरी के दूध के साथ सेवन करने से पुराने मांसपेशीय दर्द में लाभ बताया गया है।

प्रमेह एवं बहुमूत्रता में - सालम मिश्री, सफेद मुसली तथा काली मुसली के चूर्ण को समान मात्रा में मिलाकर रखें। इसका आधा से एक चम्मच चूर्ण दिन में दो बार सेवन करने से प्रमेह एवं बहुमूत्रता में लाभ का उल्लेख मिलता है।

यौन दुर्बलता में - 100 ग्राम सालम पंजा तथा 200 ग्राम बादाम की गिरी को बारीक पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण की 10 ग्राम मात्रा मीठे दूध के साथ प्रातः खाली पेट तथा रात्रि में सोने से पूर्व लेने से दुबलापन दूर होने तथा यौन शक्ति में वृद्धि होने का वर्णन मिलता है।

शुक्रमेह, शीघ्रपतन एवं स्वप्नदोष में - सालम पंजा, सफेद मुसली तथा काली मुसली को 100-100 ग्राम लेकर बारीक चूर्ण बना लें। इसका आधा चम्मच चूर्ण प्रतिदिन सुबह-शाम मीठे दूध के साथ लेने से शुक्रमेह, शीघ्रपतन तथा स्वप्नदोष में लाभ बताया गया है।

जीर्ण अतिसार में - सालम पंजा का एक चम्मच चूर्ण दिन में तीन बार छाछ के साथ लेने से पुराने अतिसार में लाभ मिलता है। इसे आमवात तथा पेचिश में भी उपयोगी माना गया है।

प्रदर रोग में - सालम पंजा, शतावरी तथा सफेद मुसली को समान मात्रा में लेकर बारीक चूर्ण बना लें। इसका एक चम्मच चूर्ण मीठे दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करने से पुराने श्वेत प्रदर तथा उससे होने वाले कमर दर्द में लाभ बताया गया है।

वात प्रकोप में - सालम पंजा तथा पिप्पली को बारीक पीसकर आधा चम्मच चूर्ण सुबह-शाम बकरी के मीठे दूध के साथ सेवन करने से वात तथा श्वास के प्रकोप में लाभ का उल्लेख मिलता है।

धातुपुष्टि के लिए - सालम पंजा, विदारीकंद, अश्वगंधा, सफेद मुसली, बड़ा गोखरू तथा अकरकरा— प्रत्येक 50-50 ग्राम लेकर बारीक चूर्ण बना लें। इसका एक चम्मच चूर्ण सुबह-शाम मीठे दूध के साथ लेने से धातुपुष्टि होती है तथा स्वप्नदोष में लाभ मिलता है।

प्रसवोत्तर दुर्बलता में - सालम पंजा और पिप्पली को पीसकर तैयार किए गए चूर्ण का आधा चम्मच सुबह-शाम मीठे दूध के साथ सेवन करने से प्रसव के बाद होने वाली शारीरिक दुर्बलता में लाभ बताया गया है।

सफेद पानी (श्वेत प्रदर) की समस्या में - सालम मिश्री, सफेद मुसली, काली मुसली, शतावरी तथा अश्वगंधा के चूर्ण को समान मात्रा में मिलाकर रखें। इसका आधा से एक चम्मच चूर्ण प्रतिदिन एक बार सेवन करने से श्वेत प्रदर की समस्या में लाभ का उल्लेख मिलता है।

सावधानियाँ / दुष्प्रभाव / कब प्रयोग न करें

  • सालम मिश्री का अत्यधिक सेवन आँतों के लिए हानिकारक माना गया है।

  • इसके संभावित दुष्प्रभावों की निवृत्ति हेतु सोंठ का प्रयोग किया जा सकता है।

  • इसके अभाव में सफेद मुसली का उपयोग विकल्प के रूप में किया जाता है।

  • इसका सेवन व्यक्ति की पाचन-शक्ति के अनुसार ही करना चाहिए।

  • इसके सेवन से शरीर के वजन में वृद्धि हो सकती है।

  • यह कुछ व्यक्तियों में कब्ज उत्पन्न कर सकती है।

सालम मिश्री के चूर्ण की औषधीय मात्रा

सालम मिश्री के चूर्ण का सेवन सामान्यतः 6 ग्राम से 12 ग्राम तक की मात्रा में किया जा सकता है। औषधीय उपयोग के लिए लगभग एक से दो चम्मच चूर्ण को एक कप दूध में उबालकर सेवन करना उपयुक्त माना जाता है।

सालम पंजा से निर्मित दो उत्तम आयुर्वेदिक योग

1. विदार्यादि चूर्ण

घटक द्रव्य एवं निर्माण विधि

  • विदारीकंद – 50 ग्राम

  • सालम पंजा – 50 ग्राम

  • अश्वगंधा – 50 ग्राम

  • सफेद मुसली – 50 ग्राम

  • बड़ा गोखरू – 50 ग्राम

  • अकरकरा – 50 ग्राम

सभी द्रव्यों का अत्यंत महीन चूर्ण बनाकर अच्छी तरह मिला लें तथा स्वच्छ एवं वायुरुद्ध शीशी में भरकर सुरक्षित रखें।

लाभ

इस चूर्ण का एक-एक चम्मच प्रातः एवं रात्रि को कुनकुने मीठे दूध के साथ सेवन करने से पौरुष शक्ति तथा स्तम्भन शक्ति में वृद्धि होती है। यह धातुओं को पुष्ट करता है, जिससे शीघ्रपतन एवं स्वप्नदोष जैसी समस्याओं में लाभ मिलता है। यह योग बाज़ार में भी इसी नाम से उपलब्ध रहता है।


2. रतिवल्लभ चूर्ण

घटक द्रव्य एवं निर्माण विधि

  • सालम पंजा – 50 ग्राम

  • बहमन सफेद – 50 ग्राम

  • बहमन लाल – 50 ग्राम

  • सफेद मुसली – 50 ग्राम

  • काली मुसली – 50 ग्राम

  • बड़ा गोखरू – 50 ग्राम

तथा—

  • छोटी इलायची के दाने – 25 ग्राम

  • गिलोय सत्व – 25 ग्राम

  • दालचीनी – 25 ग्राम

  • गावजवां के फूल – 25 ग्राम

  • मिश्री – 125 ग्राम

सभी द्रव्यों को पृथक-पृथक बारीक कूट-पीसकर महीन चूर्ण बना लें। तत्पश्चात सभी को अच्छी तरह मिलाकर शीशी में भरकर सुरक्षित रखें।

लाभ

इस चूर्ण का एक-एक चम्मच प्रातः एवं रात्रि को कुनकुने मीठे दूध के साथ लगभग दो माह तक सेवन करने से धातु-दौर्बल्य, जननांगों की शिथिलता तथा नपुंसकता में लाभ मिलता है। इससे यौनोत्तेजना एवं पौरुष बल में वृद्धि होती है। शीघ्रपतन, धातु-स्राव तथा धातु के पतलेपन जैसे विकारों में भी लाभ प्राप्त होता है। यह शरीर को पुष्ट एवं बलवान बनाता है तथा मन में उत्साह और उमंग का संचार करता है।

इनमें से किसी एक योग का नियमित रूप से पूरे शीतकाल में सेवन करना लाभकारी माना गया है।

पथ्य–अपथ्य

  • तेज मिर्च-मसाले वाले भोजन से परहेज करें।

  • तले हुए पदार्थों का सेवन न करें।

  • इमली, अमचूर तथा अन्य अधिक खटाई वाले पदार्थों से बचें।

  • सात्त्विक एवं संतुलित आहार का सेवन करें।

  • आचार-विचार की शुद्धता बनाए रखें।

  • पर्याप्त निद्रा, संयम तथा नियमित दिनचर्या का पालन करें।

नोट: उपर्युक्त योग एवं उनके लाभ पारंपरिक आयुर्वेदिक ग्रंथों एवं लोक-प्रचलित चिकित्सा विवरणों पर आधारित हैं। किसी भी औषधि का नियमित अथवा चिकित्सीय उपयोग करने से पूर्व योग्य आयुर्वेदाचार्य या चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।


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सत्‍ता के दौर में भाजपा कार्यकर्ता का दर्द भरा अंत




स्‍व. रमेश शर्मा इलाहाबाद के बाहर भले हम जैसे सामान्‍य कार्यकर्ताओं के लिये सामान्‍य नाम हो किन्‍तु इलाहाबाद जिले शर्मा जी की ऐसे धाक रही है कि शायद ही कोई ऐसा राष्‍ट्रीय नेता रहा हो जो इलाहाबाद से संबंध रखता हो शर्मा जी को नही जानता था। इलाहाबाद जिलें मे भाजपा की कोई बैठक या रैली रही हो जहां उनकी उपस्थिति न होती हो। ऐसे ही भाजपा के वरिष्‍ठ नेता श्री शर्मा जी का हृदय गति रूक जाने के कारण पिछले दिनों मे स्‍वर्गवास हो गया।

स्‍व. शर्मा जी की इस असमयिक मृत्‍यु को भाजपा के शीर्ष नेताओं द्वारा की गई राजनैतिक हत्‍या कहा जाये तो अतिशयोक्ति नही होगा। सत्‍ता सिर्फ नेताओं और उनके चाटुकारों की होती है कार्यकार्ताओं की नही यह शिद्ध हो गया है। उत्तर प्रदेश के सरकार बने लगभग 14 माह होने को रहे थे। आश्‍वासनों के दौर मे श्‍ार्मा जी की सरकारी वकील आस जब टूट गई जब उत्‍तर प्रदेश के सरकारी वकीलों की अन्तिम सूची मे भी उनका नाम नही आया। स्‍व. शर्मा जी उस शीशे की भातिं टूट गई जिसका जीवन भर खूब उपयोग किया और जब नया दौर आया तो उस शीशे को अपनों द्वारा ही पत्‍थर मार कर तोड़ दिया जाता है।

मै स्‍व. शर्मा जी का हंसता हुआ चेहरा भुला नही पा रहा हूं। संगठन से जुडाव और अधिवक्‍ता होने के नाते स्‍व. शर्मा जी से घर पर, हाईकोर्ट परिसर और कार्यक्रमों मे अक्‍सर बात होती थी और संगठन की ओर से हाईकोर्ट मे सरकारी वकील न बनाये जाने की उपेक्षा की चर्चा करते थे कि आखिर अपना संगठन हम जैसे पुराने लोगों को इग्‍नोर कर के कैसे ऐसे लोगो को मौज करने दे रहा है जिनका न कभी संघ से तालुकात रहा है और न ही भाजपा संगठन से, कौन सी योग्‍यता लेकर वो पैदा हुये जो हम लोगों के पास नही है। शर्मा जी की यह बातें झकझोर कर रख देती है उनका इशारा कही न कही सरकारी वकीलों की नियुक्तियों मे धन के प्रभाव की ओर रहा था।

कोई भी व्‍यक्ति ऐसा बतायें कि शर्मा जी के अंदर सरकारी वकील बनने की कौन सी योग्‍यता नही थी कि सरकार की 3 लिस्‍ट आई और तीनों लिस्‍ट मे उनका नही नही था। यह तो कार्यकर्ता के मुंह पर तमाचा है कि संगठन मे दर्री और कुर्सी लगाने वालों की औकात नही होती है, सरकारी वकील की।

हाईकोर्ट के अवकाश के बाद मेरा एक चैम्‍बर मे जाना हुआ जो मे विश्‍वविद्यालय के समय के मित्र रहे है और वो और उनका परिवार सपा मे काफी प्रभावी राजनीति करते है। उनका कहना कि इस बार जीए की लिस्‍ट मेरे चैम्‍बर के 4 लोग आपकी सरकार मे पैसे के दम शासकीय अधिवक्ता नियुक्त हुये है और आप अपनी सरकार की छवि और सुसाशन की बात करते हो, फिर बोला कि तुम सबकी छोड़ो सबसे बड़े संघी बनते हो खुद कहा हो आपनी भगवा सरकार मे।

कुछ भी ऐसे तानों से शर्मा जी भी अछूते नही रहे होगे, वों तो बड़े नेता थे और विरोधियों से उनके कई गुना ज्‍यादा अच्‍छे सम्‍बन्‍ध रहे होगें और मुझे तो एक ताने से रूबरू होना पड़ा उन्‍हे तो उनके कद के हिसाब से बहुत कुछ सुनना पड़ा होगा। कही न कही उनका हर ताने का एक जवाब रहा होगा कि अभी जीए ही लिस्‍ट आने दो देखना एजीए-1 से कम नही मिलेगा किन्‍तु जी की लिस्‍ट पर‍िस्थितियां हृदयाघाती थी ही और वह इस सदमे से निराशा थे ही और अंतोगत्‍वा अपनी पार्टी को सैंकडों लाईयां जितवाने वाले शर्माजी अपनी पार्टी से अपनी ही लड़ाई हार बर्दास्‍त न कर सकें और अचानक हृदयाघात के कारण प्राण त्‍याग दिये।

समाचार पत्रो मे पढ़ने को मिला कि क्‍या राज्‍यपाल तो क्‍या मंत्री-उपमुख्‍यमंत्री सभी ने शर्मा को जी मृत्‍योंपरांत श्रद्धांजंली देते हुये क्‍या क्‍या उपधियां नही दी किन्‍तु शर्मा जी के जीवित रहते सरकारी वकील नही बनवा सके। कारण स्‍पष्‍ट है कि अपनी सरकार मे उनसे पैसा मांगने की औकात किसी मे थी नही और जैसा सुनने मे आ रहा है और हकीकत भी प्रतीत हो रही है कि अपनी सरकार मे बिना पैसा सरकारी वकील बनना सम्‍भव था भी नही।
स्‍व. शर्मा जी आज अपने मध्‍य नही है किन्‍तु हम सब के समक्ष बहुत से अनुत्‍तरित प्रश्‍न छोड गये है !


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