समास की परिभाषा, भेद व प्रकार - हिंदी व्याकरण



समास की परिभाषा
'समास' शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है छोटा – रूप । अतः जब दो या दो से अधिक शब्द अपने बीच की विभक्तियों का लोप कर जो छोटा रूप बनाते हैं उसे समास, सामासिक शब्द या समस्त पद कहते है। किसी समस्त पद या सामासिक शब्द को उसके विभिन्न पदों एवं विभक्ति सहित पृथक करने की क्रिया को समास का विग्रह कहते हैं।
समास छः प्रकार के होते है –
  1. अव्ययीभाव समास - अव्ययीभाव समास - अव्यय और संज्ञा के योग से बनता है और इसका क्रिया विशेष के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसमें प्रथम पद (पूर्व पद) प्रधान होता है। इस समस्त पद का रूप किसी भी लिंग, वचन आदि के कारण नहीं बदलता है।
  2. तत्पुरुष समास - वह समास है जिसमें बाद का अथवा उत्तर पद प्रधान होता है तथा दोनों पदों के बीच का कारक-चिन्ह लुप्त हो जाता है।
  3. द्वन्द्व समास - जिस समास के दोनों पद प्रधान होते हैं तथा विग्रह करने पर 'और', 'अथवा', 'या', 'एवं' लगता हो, वह 'द्वंद्व समास' कहलाता है।
  4. बहुब्रीहि समास - जिसमें दोनों पद अप्रधान हों तथा दोनों पद मिलकर किसी तीसरे पद की ओर संकेत करते हैं, उसमें 'बहुव्रीहि समास' होता है।
  5. द्विगु समास - जिसमें पूर्वपद संख्यावाचक विशेषण हो, इसमें समूह या समाहार का ज्ञान होता है।
  6. कर्म धारय समास - जिसमें उत्तर पद प्रधान हो तथा पूर्व पद व उत्तर पद में उपमान-उपमेय अथवा विशेषण-विशेष्य सम्बन्ध हो, वह 'कर्मधारय समास' कहलाता है।
अव्ययीभाव समास 
  1. समास में प्रायः ) पहला पद प्रधान होता हैं ।
  2. पहला पद या पूरा पद अव्यव होता है । ( वे शब्द जो लिंग, वचन, कारक, काल के अनुसार नहीं बदलते, उन्हें अव्यय कहते है )
  3. यदि एक शब्द की पुनरावृत्ति हो और दोनों शब्द मिलकर अव्यव की तरह प्रयुक्त हो, वहाँ भी अव्ययीभाव समास होता है ।
  4. संस्कृत के उपसर्ग युक्त पद भी अव्ययीभाव समास होते है
    • आजन्म -  जन्म से लेकर
    • आजीवन - जीवन-भर
    • आमरण -  म्रत्यु तक
    • घर-घर -  प्रत्येक घर
    • धडाधड -  धड-धड की आवाज के साथ
    • निडर - डर के बिना
    • निस्संदेह - संदेह के बिना
    • प्रतिदिन -  प्रत्येक दिन
    • प्रतिवर्ष - हर वर्ष
    • बेशक - शक के बिना
    • भरपेट- पेट भरकर
    • यथाकाम -  इच्छानुसार
    • यथाक्रम - क्रम के अनुसार
    • यथानियम -  नियम के अनुसार
    • यथाविधि- विधि के अनुसार
    • यथाशक्ति - शक्ति के अनुसार
    • यथासाध्य -  जितना साधा जा सके
    • यथासामर्थ्य - सामर्थ्य के अनुसार
    • रातों रात -  रात ही रात में
    • हर रोज़ - रोज़-रोज़
    • हाथों हाथ - हाथ ही हाथ में
तत्पुरुष समास 
  1. तत्पुरुष समास में दूसरा पद ( पर पद ) प्रधान होता है अर्थात विभक्ति का लिंग , वचन दूसरे पद के अनुसार होता है।
  2. इसका विग्रह करने पर कर्ता व संबोधन की विभक्तियों ( ने, हे, ओ, अरे, ) के अतिरिक्त किसी भी कारक की विभक्ति प्रयुक्त होती है तथा विभक्तियों के अनुसार ही इसके उपभेद होते है । जैसे –
    कर्म तत्पुरुष ( को )
    • कृष्णार्पण = कृष्ण को अर्पण
    • नेत्र सुखद = नेत्रों को सुखद
    • वन – गमन = वन को गमन
    • जेब कतरा = जेब को कतरने वाला
    • प्राप्तोदक = उदक को प्राप्त
    करण तत्पुरुष ( से / के द्वारा )
    • ईश्वर – प्रदत्त = ईश्वर से प्रदत्त
    • हस्त – लिखित = हस्त (हाथ) से लिखित
    • तुलसीकृत = तुलसी द्वारा रचित
    • दयार्द्र = दया से आर्द्र
    • रत्न जड़ित = रत्नों से जड़ित
    सम्प्रदान तत्पुरुष ( के लिए )
    • हवन – सामग्री = हवन के लिए सामग्री
    • विद्यालय = विद्या के लिए आलय
    • गुरु – दक्षिणा = गुरु के लिए दक्षिणा
    • बलि – पशु = बलि के लिए पशु
    अपादान तत्पुरुष ( से पृथक )
    • ऋण – मुक्त = ऋण से मुक्त
    • पदच्युत = पद से च्युत
    • मार्ग भृष्ट = मार्ग से भृष्ट
    • धर्म – विमुख = धर्म से विमुख
    • देश – निकाला = देश से निकाला
    सम्बन्ध तत्पुरुष ( का, के, की )
    • मन्त्रि – परिषद = मन्त्रियों की परिषद
    • प्रेम – सागर = प्रेम का सागर
    • राजमाता = राजा की माता
    • अमचूर = आम का चूर्ण
    • रामचरित राम का चरित
    अधिकरण तत्पुरुष ( में, पे, पर )
    • वनवास = वन में वास
    • जीवदया = जीवों पर दया
    • ध्यान – मगन = ध्यान में मगन
    • घुड़सवार = घोड़े पर सवार
    • घृतान्न = घी में पक्का अन्न
    • कवि पुंगव = कवियों में श्रेष्ठ
द्वन्द्व समास
  1. द्वन्द्व समास में दोनों पद प्रधान होते है।
  2. दोनों पद प्रायः एक दूसरे के विलोम होते है, सदैव नही।
  3. इसका विग्रह करने पर ‘और’, अथवा ‘या’ का प्रयोग होता है ।
    • अन्न – जल = अन्न और जल
    • अपना – पराया = अपना या पराया
    • कृष्णार्जुन = कृष्ण और अर्जुन
    • खरा-खोटा - खरा या खोटा
    • गुण-दोष - गुण और दोष
    • जलवायु = जल और वायु
    • ठण्डा-गरम - ठण्डा या गरम
    • दाल – रोटी = दाल और रोटी
    • धर्माधर्म = धर्म या अधर्म
    • नर-नारी - नर और नारी
    • पाप – पुण्य = पाप और पुण्य
    • फल – फूल = फल और फूल
    • भला – बुरा = भला और बुरा
    • भाई-बहन - भाई और बहन
    • माता – पिता = माता और पिता
    • यशपायश = यश या अपयश
    • राजा-प्रजा - राजा एवं प्रजा
    • राधा-कृष्ण - राधा और कृष्ण
    • शस्त्रास्त्र = शस्त्र और अस्त्र
    • शीतोष्ण = शीत या उष्ण
    • सीता-राम - सीता और राम
    • सुरासुर = सुर या असुर
बहुब्रीहि समास
  1. बहुब्रीहि समास में कोई भी पद प्रधान नही होता है।
  2. इसमें प्रयुक्त पदों के सामान्य अर्थ की अपेक्षा अन्य अर्थ की प्रधानता रहती है।
  3. इसका विग्रह करने पर ‘वाला’, है, जिसका, जिसकी, जिसके, वह आदि आते है।
    • गजानन = गज का आनन है जिसका वह अर्थात् गणेश
    • गिरिधर = गिरी को धारण करने वाला है जो वह
    • घनश्याम - घन के समान श्याम है जो अर्थात् 'कृष्ण'
    • चतुर्भुज = चार भुजाएँ है जिसकी वह अर्थात् विष्णु
    • त्रिनेत्र = तीन नेत्र है जिसके वह अर्थात् शिव
    • दशानन - दस हैं आनन जिसके अर्थात् 'रावण'
    • निशाचर - निशा में विचरण करने वाला अर्थात् 'राक्षस'
    • नीलकण्ठ - नीला है कण्ठ जिसका अर्थात् 'शिव'
    • पीताम्बर - पीत है अम्बर जिसका अर्थात् 'कृष्ण'
    • महावीर - महान् वीर है जो अर्थात् 'हनुमान'
    • मुरारी = मुर का अरि है जो वह
    • मृत्युंजय - मृत्यु को जीतने वाला अर्थात् 'शिव'
    • लम्बोदर - लम्बा है उदर जिसका अर्थात् 'गणेश'
    • षडानन = षट अर्थात् छः, आनन है जिसके वह अर्थात् कार्तिकेय
कर्मधारय और बहुव्रीहि समास में अंतर
कर्मधारय में समस्त-पद का एक पद दूसरे का विशेषण होता है। इसमें शब्दार्थ प्रधान होता है।
  • जैसे - नीलकंठ = नीला कंठ।
बहुव्रीहि में समस्त पद के दोनों पदों में विशेषण-विशेष्य का संबंध नहीं होता अपितु वह समस्त पद ही किसी अन्य संज्ञा आदि का विशेषण होता है। इसके साथ ही शब्दार्थ गौण होता है और कोई भिन्न अर्थ ही प्रधान हो जाता है।
  • जैसे - नीलकंठ = नीला है कंठ जिसका शिव।


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आईपीसी की धारा 498-ए के अपराध के अंतर्गत बचाव व सजा सुप्रीम कोर्ट के परिपेक्ष में





धारा 498-ए आईपीसी

जब आईपीसी में धारा 498-ए को शामिल किया गया था, तब समाज ने, विशेषकर उन परिवारों ने जिनकी बेटियाँ दहेज के कारण ससुराल में प्रताड़ित होती थीं या घर से निकाल दी जाती थीं, राहत महसूस की। लोगों को लगा कि विवाहिता बेटियों के लिए एक सुरक्षा कवच प्रदान किया गया है। इससे दहेज के लिए बहुओं को प्रताड़ित करने वाले परिवारों में भी भय का वातावरण बना। प्रारंभ में कई लोग इस कानून से मिलने वाले लाभों से अनभिज्ञ थे, लेकिन धीरे-धीरे लोग इसका सदुपयोग करने लगे। परंतु कुछ ही समय बाद इस कानून का ऐसा दुरुपयोग शुरू हुआ कि यह वर पक्ष के लोगों को डराने वाला एक शस्त्र बन गया। आइए जानते हैं कि आईपीसी की धारा 498-ए क्या कहती है।

जो कोई किसी स्त्री का पति या पति का नातेदार होते हुए उस स्त्री के प्रति क्रूरता करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकती है, दंडित किया जाएगा तथा जुर्माने से भी दंडनीय होगा।

स्पष्टीकरण— इस धारा के प्रयोजनों के लिए "क्रूरता" का अभिप्राय निम्नलिखित है—

(क) जानबूझकर किया गया कोई ऐसा आचरण, जो ऐसी प्रकृति का हो जिससे स्त्री को आत्महत्या करने के लिए प्रेरित करने की संभावना हो अथवा उसके जीवन, अंग या स्वास्थ्य (चाहे वह मानसिक हो या शारीरिक) को गंभीर क्षति या खतरा उत्पन्न हो; या

(ख) किसी स्त्री को इस उद्देश्य से तंग करना कि वह या उससे संबंधित कोई व्यक्ति किसी संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति की अवैध मांग को पूरा करे, अथवा ऐसी मांग पूरी न करने के कारण उसे प्रताड़ित किया जा रहा हो।

दहेज प्रताड़ना तथा ससुराल में महिलाओं पर अत्याचार के अन्य मामलों से निपटने के लिए कानून में सख्त प्रावधान किए गए हैं। महिलाओं को ससुराल में सुरक्षित वातावरण मिले, इसके लिए कानून में पुख्ता व्यवस्था की गई है। दहेज प्रताड़ना से बचाने के लिए वर्ष 1983 में आईपीसी की धारा 498-ए का प्रावधान किया गया। इसे दहेज प्रताड़ना निरोधक प्रावधान के रूप में जाना जाता है। यदि किसी महिला को दहेज के लिए मानसिक, शारीरिक अथवा अन्य किसी प्रकार से प्रताड़ित किया जाता है, तो उसकी शिकायत पर इस धारा के अंतर्गत मामला दर्ज किया जाता है। इसे संज्ञेय अपराध की श्रेणी में रखा गया है तथा यह गैर-जमानती अपराध है। दहेज के लिए ससुराल में प्रताड़ित करने वाले सभी व्यक्तियों को आरोपी बनाया जा सकता है। पति के केवल उन्हीं रिश्तेदारों के विरुद्ध दहेज प्रताड़ना अथवा दहेज मृत्यु से संबंधित मामला बन सकता है, जो रक्त संबंध, दत्तक संबंध अथवा वैवाहिक संबंध के दायरे में आते हों। इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने Arnesh Kumar v. State of Bihar, (2014) 8 SCC 273 में महत्वपूर्ण व्यवस्था दी।

आईपीसी की धारा 498-ए के अंतर्गत सजा

इस धारा के अंतर्गत दोषी पाए जाने पर अधिकतम तीन वर्ष तक के कारावास का प्रावधान है। यदि किसी विवाहित महिला की मृत्यु संदिग्ध परिस्थितियों में होती है और यह मृत्यु विवाह के सात वर्ष के भीतर हुई हो, तो पुलिस आईपीसी की धारा 304-बी के अंतर्गत मामला दर्ज करती है।

वर्ष 1961 में बना दहेज प्रतिषेध अधिनियम एक सुधारात्मक कानून है। इस कानून की धारा 8 के अनुसार दहेज देना और लेना, दोनों ही संज्ञेय अपराध हैं। दहेज देने के मामले में धारा 3 के अंतर्गत मामला दर्ज हो सकता है, जिसके तहत अपराध सिद्ध होने पर कम-से-कम पाँच वर्ष के कारावास का प्रावधान है। धारा 4 के अनुसार दहेज की मांग करना भी अपराध है। यदि विवाह से पूर्व लड़का पक्ष दहेज की मांग करता है, तब भी इस धारा के अंतर्गत मामला दर्ज किया जा सकता है।

धारा 498-ए और उसका दुरुपयोग

अदालतों में आज भी धारा 498-ए के अनेक मुकदमे लंबित हैं तथा ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें यह माना गया कि इस धारा का महिला पक्ष द्वारा दुरुपयोग किया गया। यह कानून आपराधिक प्रकृति का है, किंतु इसका स्वरूप पारिवारिक है। किसी भी पारिवारिक विवाद को दहेज प्रताड़ना के विवाद का रूप देना अपेक्षाकृत सरल है। एक विवाहिता की मात्र शिकायत पर यह मामला दर्ज हो जाता है। कई बार परिवार के सभी सदस्यों को अभियुक्त के रूप में नामजद कर दिया जाता है और उन्हें जेल भेज दिया जाता है, क्योंकि यह एक गैर-जमानती, संज्ञेय तथा असमझौतायोग्य अपराध है।

कई पुरुष इस धारा के अंतर्गत मुकदमे लड़ रहे हैं और अदालतों के चक्कर काट रहे हैं, किंतु उन्हें राहत नहीं मिल पा रही है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी कुछ मामलों में धारा 498-ए के दुरुपयोग की चर्चा की है। Sushil Kumar Sharma v. Union of India (2005) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इसके दुरुपयोग को "लीगल टेररिज्म" तक कहा था।

राजेश शर्मा बनाम स्टेट ऑफ यूपी का मामला

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति ए. के. गोयल और न्यायमूर्ति यू. यू. ललित की पीठ ने Rajesh Sharma v. State of U.P., AIR 2017 SC 3869 के मामले में दहेज प्रताड़ना के मामलों की जांच के संबंध में दिशा-निर्देश जारी किए। याचिका में दहेज कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए आवश्यक निर्देश जारी करने की मांग की गई थी।

क्या हैं दिशा-निर्देश

  • ऐसे मामलों में न्याय प्रशासन को सिविल सोसायटी का सहयोग लेना चाहिए।

  • देश के सभी जिलों में परिवार कल्याण समिति का गठन किया जाए, जिसका गठन जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा किया जाए।

  • समिति में विधिक स्वयंसेवक, सामाजिक कार्यकर्ता तथा सेवानिवृत्त व्यक्ति शामिल हों।

  • पुलिस अथवा मजिस्ट्रेट के समक्ष आने वाले प्रत्येक मामले को समिति के पास भेजा जाए।

  • समिति सभी पक्षों से बातचीत कर एक माह के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करे। समिति दोनों पक्षों से दूरभाष पर भी बातचीत कर सकती है।

  • समिति की रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद ही पुलिस अथवा मजिस्ट्रेट आगे की कार्रवाई पर विचार करें।

  • रिपोर्ट प्राप्त होने तक किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी न की जाए।

  • यदि मामले में समझौता हो जाता है, तो जिला न्यायाधीश द्वारा नामित मजिस्ट्रेट मामले का निस्तारण कराएंगे और तत्पश्चात मामला उच्च न्यायालय को भेजा जाएगा, जिससे समझौते के आधार पर प्रकरण समाप्त किया जा सके।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा — कब गिरफ्तारी हो और कब नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 41 में गिरफ्तारी के अधिकारों का उल्लेख किया गया है। अतः गिरफ्तारी करते समय निम्नलिखित बातों से संतुष्ट होना आवश्यक है—

अदालत ने कहा कि Arnesh Kumar v. State of Bihar के मामले में पहले ही यह व्यवस्था दी जा चुकी है कि बिना किसी ठोस कारण के गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए। अर्थात् गिरफ्तारी के संबंध में आवश्यक सुरक्षा उपाय पहले से ही उपलब्ध हैं। विधि आयोग ने भी सुझाव दिया था कि ऐसे मामलों को अधिक समझौतामूलक बनाया जाए तथा निर्दोष व्यक्तियों के मानवाधिकारों की उपेक्षा न की जाए। इसलिए न्याय प्रशासन में सहयोग हेतु सिविल सोसायटी की भागीदारी आवश्यक है।

  • सात वर्ष तक की सजा वाले मामलों में बिना उचित औचित्य के गिरफ्तारी नहीं की जाएगी।

  • 2 जुलाई, 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सात वर्ष तक की सजा वाले मामलों में पुलिस केवल एफआईआर दर्ज होने के आधार पर गिरफ्तारी नहीं कर सकती। गिरफ्तारी के लिए पर्याप्त कारण होना आवश्यक है।

  • दहेज प्रताड़ना सहित सात वर्ष तक की सजा वाले अपराधों में यदि पुलिस पर्याप्त आधार के बिना गिरफ्तारी करती है, तो उसके विरुद्ध कार्रवाई की जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति सी. के. प्रसाद और न्यायमूर्ति पी. सी. घोष की पीठ ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में कहा था कि किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी केवल इस आधार पर नहीं की जा सकती कि अपराध गैर-जमानती और संज्ञेय है तथा पुलिस को ऐसा करने का अधिकार प्राप्त है। पुलिस को गिरफ्तारी को न्यायोचित ठहराना आवश्यक होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि सीआरपीसी की धारा 41 के अनुसार सात वर्ष तक की सजा वाले गैर-जमानती मामलों में भी गिरफ्तारी से पूर्व पुलिस को यह संतुष्ट होना होगा कि गिरफ्तारी आवश्यक है।

अदालत ने सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे अपने पुलिस अधिकारियों को यह आदेश जारी करें कि दहेज प्रताड़ना अर्थात् धारा 498-ए के मामलों में एफआईआर दर्ज होते ही आरोपी को गिरफ्तार न किया जाए, बल्कि पहले यह सुनिश्चित किया जाए कि गिरफ्तारी आवश्यक है।

पुलिस जब आरोपी को मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करे, तो उसे यह कारण भी बताना होगा कि गिरफ्तारी क्यों आवश्यक थी। यदि इन निर्देशों का पालन नहीं किया जाता है, तो संबंधित पुलिस अधिकारी के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई तथा न्यायालय की अवमानना की कार्यवाही की जा सकती है। यदि बिना पर्याप्त कारण के किसी आरोपी को हिरासत में लिया जाता है, तो संबंधित मजिस्ट्रेट के विरुद्ध भी उच्च न्यायालय कार्रवाई कर सकता है।

  • पुलिस जब अभियुक्त को न्यायालय में प्रस्तुत करे, तो गिरफ्तारी की आवश्यकता के कारण स्पष्ट करे।

  • यदि पुलिस को यह आशंका हो कि अभियुक्त पुनः अपराध कर सकता है, तो गिरफ्तारी की जा सकती है।

  • यदि अभियुक्त द्वारा गवाहों को प्रभावित करने, धमकाने अथवा साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने की संभावना हो, तो गिरफ्तारी की जा सकती है।

  • यदि विवेचना के लिए गिरफ्तारी आवश्यक प्रतीत हो, तो पुलिस गिरफ्तारी कर सकती है।

  • यदि गिरफ्तारी नहीं की जाती है, तो पुलिस दो सप्ताह के भीतर मजिस्ट्रेट को इसका कारण बताएगी।

  • यदि बिना पर्याप्त कारण के किसी व्यक्ति को हिरासत में रखा जाता है, तो संबंधित मजिस्ट्रेट के विरुद्ध उच्च न्यायालय कार्रवाई कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार यदि पुलिस इन निर्देशों का पालन नहीं करती है, तो उसके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई तथा न्यायालय की अवमानना की कार्यवाही की जाएगी।

हाई कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णय

दिल्ली उच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायमूर्ति जे. डी. कपूर ने वर्ष 2003 में अपने एक निर्णय में कहा था कि एक ऐसी प्रवृत्ति विकसित हो रही है, जिसमें कई बार पत्नी न केवल अपने पति, बल्कि उसके सभी रिश्तेदारों को भी ऐसे मामलों में अभियुक्त बना देती है। धारा 498-ए वैवाहिक संबंधों की नींव को प्रभावित कर रही है और यह समाज के हित में नहीं है। अनेक मामलों में जैसे ही पति और उसके परिजनों को जेल भेजा जाता है, तलाक का मुकदमा दायर कर दिया जाता है। इसका परिणाम यह हुआ है कि तलाक के मामलों में वृद्धि हुई है। न्यायालय ने यह भी कहा था कि धारा 498-ए से संबंधित मामलों में, जहाँ कोई गंभीर शारीरिक चोट का मामला न हो, उन्हें समझौतामूलक बनाए जाने पर विचार किया जाना चाहिए।

अगस्त, 2008 में दिल्ली उच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायमूर्ति कैलाश गंभीर ने कहा था कि पुलिस दहेज प्रताड़ना के मामलों में लापरवाहीपूर्वक एफआईआर दर्ज नहीं करेगी, बल्कि इसके लिए पहले संबंधित क्षेत्र के डीसीपी स्तर के अधिकारी की अनुमति प्राप्त करेगी। दहेज प्रताड़ना और अमानत में खयानत से संबंधित मामलों में यह अनुमति आवश्यक होगी। न्यायालय ने यह भी कहा कि जब ऐसा कोई मामला किसी अधिवक्ता के पास आए, तो उसे पहले सामाजिक दायित्व निभाते हुए दोनों पक्षों में समझौते का प्रयास करना चाहिए।

दहेज प्रताड़ना कानून

वर्ष 1983 में आईपीसी में संशोधन कर धारा 498-ए (दहेज प्रताड़ना) का प्रावधान जोड़ा गया। इसके अतिरिक्त, दहेज प्रताड़ना की शिकायत पर पुलिस प्रायः धारा 498-ए के साथ धारा 406 (अमानत में खयानत) के अंतर्गत भी मामला दर्ज करती है।

दहेज प्रताड़ना के अपराध में अधिकतम तीन वर्ष के कारावास का प्रावधान है। यह असमझौतायोग्य अपराध है, अर्थात यदि दोनों पक्ष आपसी सहमति से विवाद समाप्त करना चाहते हैं, तब भी उन्हें उच्च न्यायालय में प्रार्थना-पत्र प्रस्तुत करना होगा और उच्च न्यायालय के आदेश के पश्चात ही मामला समाप्त किया जा सकता है।

दहेज मृत्यु (धारा 304-बी)

वर्ष 1986 में आईपीसी में धारा 304-बी (दहेज मृत्यु) का प्रावधान जोड़ा गया। यदि विवाह के सात वर्ष के भीतर किसी महिला की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो जाती है और यह प्रमाणित हो कि उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया जा रहा था, तो दहेज प्रताड़ना के साथ-साथ दहेज मृत्यु का मामला भी बनता है।

इस अपराध में न्यूनतम सात वर्ष के कारावास तथा अधिकतम आजीवन कारावास का प्रावधान है।



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भारतीय दंड संहिता की धारा आईपीसी 151 आईपीसी





जो भी कोई व्यक्ति पांच या अधिक व्यक्तियों के किसी जनसमूह जिससे सार्वजनिक शांति में भंग होने की सम्भावना हो, जबकि ऐसे सभी जनसमूहों को बिखर जाने का समादेश विधिपूर्वक दे दिया गया हो, तब पर जानबूझकर शामिल हो या बना रहे, को किसी एक अवधि के लिए कारावास की सजा जिसे छह महीने तक बढ़ाया जा सकता है, या आर्थिक दंड या दोनों से दंडित किया जाएगा।

सजा एवं अपराध की प्रकृति - छह महीने कारावास या जुर्माना या दोनों यह एक जमानती, संज्ञेय अपराध है और किसी भी न्यायधीश द्वारा विचारणीय है। यह अपराध समझौता करने योग्य नहीं है।




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