उल्टी के लक्षण, कारण, इलाज, दवा और उपचार



उल्टी आने के कई कारण हो सकते हैं। जब कभी हमारा शरीर किसी ऐसी चीज को ग्रहण कर लेता है जो संक्रमित हो, तो ऐसे में शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र उसे उल्टी के माध्यम से शरीर के बाहर भेज देता है। इसके अलावा भी ज्यादा खा लेने की वजह से, ज्यादा शराब पी लेने की वजह से, एसिडिटी या फिर माइग्रेन की वजह से उल्टी की समस्या होती है। गर्भवती महिलाओं को भी उल्टी की समस्या से काफी परेशान होना पड़ता है। इसके विभिन्न कारणों में स्टोमक के भीतर ब्लीडिंग होना, इन्फेक्शन, इरिटेशन, इन्टेस्टाइन में ब्लॉकेज, बॉडी केमिकल्स और मिनरल्स कम-ज्यादा होना, बॉडी में टॉक्सिसिटी होना भी शामिल हैं।

ultee ke lakshan, kaaran, ilaaj, dava aur upachaar
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  1. उल्टी के कारण कई तरह के हो सकते हैं जिनमें फूड-पॉइजनिंग, इन्फेक्शन, ब्रेन और सेंट्रल नर्वस सिस्टम में समस्या होना या कोई सिस्टमिक डिजीज होना शामिल हैं।
  2. कई बार उल्टी होने का कारण कोई दवाई का साइड इफ़ेक्ट,कैंसर कीमोथेरेपी में उपयोग में ली गई ड्रग्स या फिर रेडिएशन थेरेपी भी हो सकती हैं।
  3. कई बार अल्कोहल, बियर, वाइन और लिक्वर केमिकल-एसीटैल्डिहाइड में बदल जाते हैं,जिसके कारण अगली सुबह जी मिचलाना जैसी फीलिंग आती हैं जिसे हैंग-ओवर कहते हैं।
  4. कुछ बीमारियों में जी घबराना और उल्टी आना आम होता है। जबकि उस समय रोगी में गैस्ट्रो इंटेस्टाइनल ट्रैक्ट या स्टमक का उल्टी के लिए कोई कारण नहीं होता जैसे निमोनिया,हार्ट अटैक और सेप्सिस।
  5. कुछ वाइरल इन्फेक्शन, सर में लगी चोट, गालब्लेडर डिजीज, एपेंडीसाईटीस, माइग्रेन, ब्रेन ट्यूमर, ब्रेन इन्फेक्शन, हाइड्रोसिफेलस (ब्रेन में बहुत सा फ्लूइड जमा होना,सर्जरी में उपयोग आने वाले एनेस्थिशिया के साइड इफ़ेक्ट,स्टोमक प्रोब्लम जैसे ब्लॉकेज (पाइलोरिक ओबस्ट्रेकशन,वो स्थिति जिसके कारण बच्चों में फोर्सफुल थूक बाहर आता हैं) भी उल्टी के कारण हो सकते हैं।
  6. प्रेगनेंसी के दौरान जी मिचलाना और उल्टियां लगातार होती रहती हैं। सामान्यतः शुरुआती कुछ महीनों में मोर्निंग सिकनेस होती हैं लेकिन कई बार ये पूरे 9 महीने भी चल जाती हैं।
आयुर्वेद के अनुसार उल्टी के प्रकार और कारण
 उल्टी आना कोई गंभीर समस्या नहीं है, बल्कि दिनचर्या, खानपान में बदलाव के कारण भी ऐसी समस्याएं हो सकती हैं। लेकिन आयुर्वेद में उल्टी के इन 5 प्रकारों का वर्णन मिलता है।
  1. आगंतुज : इस तरह की उल्टी बदबू, गर्भावस्था, अरूचिकर भोजन, पेट में कीड़े या किसी स्थान विशेष पर जाने से हो सकती है। इस तरह की उल्टी को आगन्तुज छर्दि भी कहते हैं।
  2. कफज : कफ के कारण होने वाली उल्टी इस श्रेणी में आती है। इसमें उल्टी का रंग सफेद और प्रकार गाढ़ा होगा। इसका स्वाद मीठा होता है। मुंह में पानी भरना, शरीर का भारी होना, बार-बार नींद आना, जैसे लक्षण इस प्रकार की उल्टी में होना स्वाभाविक हैं।
  3. त्रिदोषज : त्रिदोषज उल्टी वह होती है जो वात, पित और कफ, तीनों कारणों के चलते होती है। यह गाढ़ी, नीले रंग की या खून की हो सकती है। स्वाद में नमकीन या खट्टी हो सकती है। इसके अलावा पेट में तेज दर्द, भूख में कमी, जलन, सांस लेने में परेशानी और बेहोशी भी इसके लक्षणों में शामिल है।
  4. पित्तज : पित्त की गर्मी के कारण होने वाली उल्टी पित्तज की श्रेणी में आती है। इस स्थिति में पीले, हरे रंग की उल्टी आती है और मुंह का स्वाद बेहद बुरा होती है। इसमें भोजन नली व गले में जलन हो सकती है। सिर घूमना, बेहोशी भी इसके लक्षणों में शामिल है।
  5. वातज : पेट में गैस से होने वाली उल्टी वातज की श्रेणी में आती है। इस तरह की उल्टी कम मात्रा में कड़वी, झाग वाली और पानी जैसी होती है। लेकिन कई बार इसके साथ सिर का दर्द, सीने में जलन, नाभि में जलन, खांसी और आवाज का खराब होना आदि समस्याएं भी होती हैं।
उल्टी रोकने के कुछ अन्य घरेलू इलाज
  1. खाने के तुरंत बाद ना सोयें।
  2. खाने के तुरंत बाद ब्रश ना करें, इससे वोमिट होने के सबसे ज्यादा चांस होते है।
  3. गुलुकोस, एलेक्ट्रोल जैसी चीज पीते रहें।
  4. जितना हो सके आराम करें।
  5. तेज सुगन्धित वाली जगह में ना बैठे, इससे जी और ज्यादा मचलाता है।
  6. बहुत हल्का एवं कम तेल मसाले वाला भोजन लें, एवं धीरे धीरे खाएं।
  7. वोमिट जैसा महसूस होने पर, एक एक घूँट पानी पीते रहें।
उल्टी रोकने के आयुर्वेदिक घरेलू इलाज
  1. अदरक पाचन-तन्त्र के लिए बहुत अच्छा होता हैं और उल्टियाँ रोकने के लिए प्राकृतिक रूप से एंटी-एमेटिक के जैसे काम करता हैं। एक चम्मच अदरक के रस और नीम्बू के रस को मिलाकर दिन में 2-4 बार लेने से उल्टियाँ होना और जी घबराना बंद हो जाता हैं। इसके अलावा अदरक के छोटे टुकड़े मुंह में रखने पर भी थोड़ी देर के लिए आराम मिलता हैं । शहद के साथ अदरक की चाय बनाकर भी ली जा सकती हैं।
  2. अदरक में पेट की हर समस्या से निपटने का इलाज होता है। इसके एक टुकड़े को कूचकर पानी में मिला लीजिए। इसमें एक चम्मच शहद मिलाकर इसका सेवन कीजिए। उल्टी से तुरंत लाभ मिलेगा।
  3. उल्टी आने की स्थिति में दो चार लौंग लेकर दांतों के नीचे दबा लें और इसका रस चूसते रहें। इसका स्वाद उल्टी को तुरंत रोकने में कारगर होता है। यह मुंह की तमाम समस्याओं का भी बेहतरीन निदान है। दांतों की सेंसिटिविटी के लिए लौंग अचूक औषधि है।
  4. उल्टी जैसा जी होने पर नींबू का एक टुकड़ा मुंह में रख लें। इससे उल्टी में काफी राहत मिलती है।
  5. एक चम्मच पुदीने की पत्ती का जूस,नींबू का रस और शहद मिलाकर दिन में 3 बार पीने से भी उल्टियां कम होने लगती हैं।
  6. एप्पल साइडर विनेगर भी बेचैनी को कम करता हैं,यह डीटॉक्सीफिकेशन भी करता हैं,इसमें एंटी-माइक्रोबियल गुण होने के कारण यह फूड-पॉइजनिंग भी सही करता हैं। एक चम्मच एप्पल साइडर विनेगर और एक चम्मच शहद को पानी में मिलाकर पीने से जी घबराना और उल्टी होना कम हो सकता हैं। उल्टी होने के कारण मुंह का खराब स्वाद और गंध भी इससे कम की जा सकती हैं। आधे कप पानी में 1 चम्मच विनेगर मिलाकर पीने से मुंह खराब स्वाद और गंध के कारण बार-बार उल्टियां नहीं होती।
  7. ऐसे में इस समस्या से निपटने के लिए आपको कुछ घरेलू उपाय जरूर आजमाने चाहिए। इससे आपको उल्टी की समस्या से तुरंत आराम मिलता है।
  8. कभी भी उल्टी आने पर पुदीने की चाय बनाकर पी लीजिए या फिर केवल उसकी पत्ती को चबाइए। उल्टी से तुरंत राहत मिल जाएगी।
  9. जामुन के पेड़ की छाल का पाउडर बना ले इसे 10 मिनट के लिए पानी में भिगोकर रखें,और अब इसमें 1 चम्मच शहद मिलाकर रोज 2-3 चम्मच इसे पीये। यह ब्लड शुगर को भी कम करता हैं इसलिए लोग इसे डाईबिटिज में भी पीते हैं।
  10. ताजा संतरे का जूस उल्टी में काफी लाभदायक ट्रीटमेंट है। इसके कई अन्य फायदे भी हैं। जैसे, यह शरीर में ब्लड प्रेशर के नियंत्रण के लिए भी बेहद लाभदायक है।
  11. दालचीनी भी जठर संबंधी समस्याओं को शांत करती हैं। इसे लेने से भी जी मिचलाना और उल्टी होने जैसे समस्याओं में कमी आती हैं। एक कप पानी में आधा चम्मच दालचीनी पाउडर डालकर उबालें और इस पानी को पिए,इसमें शहद भी मिला सकते हैं। हालांकि ये उपाय गर्भवती महिलाओं के लिए उपयुक्त नहीं हैं।
  12. दिन में कई बार सैंफ चबाना उल्टी में बेहद फायदेमंद है। यह मुंह के स्वाद को बदलने के लिए भी प्रयोग किया जाता है। इसे खाने के बाद उल्टी से काफी राहत मिलती है।
  13. नींबू और प्याज का रस भी मिलाकर पीने से उल्टियां कम हो सकती हैं।
  14. पुदीने की चाय भी पाचन तन्त्र को संतुलित रखती हैं। यदि ताज़ी पत्तियां उपलब्ध हो तो उन्हें चबाए लेकिन यदि ना हो तो एक चम्मच सुखी पुदीने की पत्तियों को गर्म पानी में डालकर इसके चाय बनाए।
  15. पेट की एसिडिटी शांत रखने के लिए तथा खाना हजम करने के लिए इलायची भी काफी कारगर उपाय है।
  16. मीठी तुलसी की पत्तियों की खुशबू भी उल्टी को कम करती हैं। इसका जूस बनाकर एक ग्लास गर्म पानी में 2 चम्मच शहद मिलाकर पीने से उल्टी होना और जी मिचलाना कम हो जाते हैं।
  17. यदि डॉक्टर की सलाह ले चुके हो या फिर उल्टी होने का कारण समझ आ चुका हो, तो कुछ घरेलू उपायों से भी लगातार होने वाली उल्टियों को रोका जा सकता हैं।
  18. लौंग भी गैस्ट्रिक इरिटेबिलिटी को कम करती हैं, लौंग की चाय बनाई जा सकती हैं या फिर तले हुए लौंग को शहद के साथ मिलाकर भी लिया जा सकता हैं।


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गुर्दे के पथरी के रामबाण घरेलू उपाय एवं उपचार



किडनी में पथरी होना एक आम समस्या हो गई है। हमारी जिन्दगी में किडनी स्टोन गलत खानपान का नतीजा है और लगातार इसके मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यूरिक एसिड, फास्फोरस, कैल्शियम और ऑक्जेलिक एसिड। यही सारे तत्व स्टोन बनाने के लिए उत्तरदायी होते हैं। कुछ पथरी रेत के दानों की तरह बहुत छोटे आकार के होते हैं तो कुछ मटर के दाने की तरह। इसके साथ ही बहुत अधिक मात्रा में विटामिन डी के सेवन से, डिहाइड्रेशन और अनियमित डाइट की वजह से भी किडनी में स्टोन हो जाता है। आमतौर पर पथरी मूत्र के जरिये शरीर के बाहर निकल जाती है, लेकिन जो पथरी बड़ी होती है वह बहुत ही परेशान करती है। किडनी में स्टोन हो जाने पर पेट में हर वक्त दर्द बना रहता है।
घर के बुजुर्गों के पास अक्सर हर दर्द का इलाज होता है और हम लोगो ने अपने घर में बड़े बुजुर्गों जैसे कि दादा-दादी या नाना-नानी को कहते सुना होगा कि सुबह खाली पेट 3-4 गिलास पानी पीने से पेट की सारी बीमारियां दूर हो जाती हैं। ऐसे ही कितने घरेलू नुस्खे हमें दादी और अन्य लोगों से सुनने को मिले हैं। आज हम पेट और किडनी में पथरी के इलाज के लिए दादी मां के कुछ नुस्खे यानी ऐसे नुस्खे जानेंगे जिन्हें आप घर पर आजमा सकते हैं -
  1. 2-15 दाने बड़ी इलायची, एक चम्मच खरबूजे के बीज की गिरी और दो चम्मच मिश्री एक कप पानी में पीस-मिलाकर सुबह-शाम दो बार पीने से पथरी निकल जाती है।
  2. अजवाइन किडनी के लिए टॉनिक के रूप में काम करता है। किडनी में स्टोन के गठन को रोकने के लिए अजवाइन का इस्तेमाल मसाले के रूप में या चाय में नियमित रूप से किया जा सकता है।
  3. अनार का रस किडनी स्टोन के खिलाफ बहुत ही असरदार और सरल घरेलू उपाय है। अनार के कई स्वास्थ्य लाभ के अलावा इसके बीज और रस में खट्टेपन और कसैले गुण के कारण इसे किडनी स्टोन के लिए प्राकृतिक उपाय के रूप में माना जाता है।
  4. आंवला भी पथरी में बहुत फायदा करता है। आंवला का चूर्ण मूली के साथ खाने से मूत्राशय की पथरी निकल जाती है।
  5. करेला बुहत कड़वा होता है और आमतौर पर लोग इसे कम पसंदकरते हैं, लेकिन किडनी स्टोन के मरीजों के लिए यह रामबाण की तरह है।करेले में मैग्नीशियम और फॉस्फोरस नामक तत्त्व होते हैं,जो पथरी को बनने से रोकते हैं। इसलिए किडनी स्टोन की समस्या पर होनेकरेले का सेवनकरना चाहिए।
  6. किडनी स्टोन को बाहर निकालने के लिए बथुआ का साग बहुत ही कारगर माना जाता है। इसके लिए आधा किलो बथुआ के साग को उबालकर छान लें। अब इसे पानी में जरा सी काली मिर्च, जीरा और हल्का सा सेंधा नमक मिलाकर दिन में चार बार पिए, किडनी स्टोन में फायदा होगा।
  7. किडनी स्टोन से छुटकारा दिलाने में अंगूर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अंगूर प्राकृतिक मूत्रवर्धक के रूप में कार्य करता है, क्योंकि इसमें पोटेशियम और पानी भरपूर मात्रा में होता है। अंगूर में अलबूमीन और सोडियम क्लोराइड बहुत ही कम मात्रा में होते हैं, जिनकी वजह से इन्हें किडनी स्टोन के उपचार के लिए अच्छा माना जाता है।
  8. जीरे और चीनी को समान मात्रा में पीसकर एक-एक चम्मच ठंडे पानी से रोज तीन बार लेने से लाभ होता है और पथरी निकल जाती है।
  9. जैतून के तेल के साथ नींबू का रस मिलाकर सेवन करने से किडनी स्टोन में फायदा होता है। दर्द होने पर 60 मिलीलीटर नींबू के रस में उतनी ही मात्रा में आर्गेनिक जैतून का तेल मिलाकर सेवन करने से इसके दर्द से भी आराम मिलता है। नींबू का रस और जैतून का तेल पूरे स्वास्थ्य के लिए अच्छा रहता है और यह आसानी से उपलब्ध भी हो जाता हैं।
  10. तीन हल्की कच्ची भिंड़ी को पतली-पतली लंबी-लंबी काट लें। कांच के बर्तन में दो लीटर पानी में कटी हुई भिंड़ी ड़ालकर रात भर के लिए रख दें। सुबह भिंड़ी को उसी पानी में निचोड़कर भिंड़ी को निकाल लें। ये सारा पानी दो घंटों के अंदर-अंदर पी लें। इससे किड़नी की पथरी से छुटकारा मिलता है।
  11. तुलसी की चाय पीने से किडनी स्टोन से निजात मिलता है। तुलसी का रस लेने से पथरी को पेशाब के रास्ते निकलने में मदद मिलती है। कम से कम एक महीना तुलसी के पत्तों के रस के साथ शहद लेने से किडनी स्टोन की समस्या से छुटकारा मिल सकता है। तुलसी के कुछ ताजे पत्ते रोजाना चबा भी सकते हैं, यह बहुत ही फायदेमंद है।
  12. नारियल का पानी पीने से पथरी में फायदा होता है। पथरी होने पर नारियल का पानी पीना चाहिए।
  13. पका हुआ जामुन पथरी से निजात दिलाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पथरी होने पर पका हुआ जामुन खाना चाहिए।
  14. प्याज में स्टोन नाशक तत्त्व होते है इसका प्रयोगकर किडनी स्टोन से निजात पा सकते है। लगभग 70 ग्राम प्याज को पीसकर और उसका रस निकालकर पिए। सुबह खाली पेट प्याज के रस का नियमित सेवन करने से पथरी के छोटे-छोटे टुकड़ों में होकर निकल जाती है।
  15. मिश्री, सौंफ, सूखा धनिया लेकर 50-50 ग्राम मात्रा में लेकर डेढ़ लीटर पानी में रात को भिगोकर रख दीजिए। अगली शाम को इनको पानी से छानकर पीस लीजिए और पानी में मिलाकर एक घोल बना लीजिए, इस घोल को पीजिए। पथरी निकल जाएगी।
  16. सहजन की सब्जी खाने से गुर्दे की पथरी टूटकर बाहर निकल जाती है। आम के पत्ते छांव में सुखाकर बहुत बारीक पीस लें और आठ ग्राम रोज पानी के साथ लीजिए, फायदा होगा।
  17. स्टोन की समस्या से निपटने के लिए केले का सेवनकरना चाहिए। इसमें विटामिन बी-6 होता है। विटामिन बी-6 ऑक्जेलेट क्रिस्टल को बनने से रोकता और तोड़ता है। इसके अलावा विटामिन बी-6,विटामिन बी के अन्य विटामिन के साथ सेवनकरना किडनी स्टोन के इलाज में काफी मददगार होता है। एक शोध के मुताबिक विटामिन बी की 100 से 150 मिलीग्राम दैनिक खुराक किडनी स्टोन के उपचार में बहुत फायदेमंद है।
डिस्क्लेमर: घरेलू इलाज के अलावा डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें और जरूरी इलाज शुरू करें।


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प्रयागराज के महत्वपूर्ण धर्मस्थल





प्रयाग का प्राचीन इतिहास

वैसे तो प्रयाग क्षेत्र वैदिक और पौराणिक काल में समादृत रहा है, लेकिन ऐतिहासिक काल में भी इसके महत्व की चर्चा अनेक इतिहासकारों ने की है। जैन धर्म की श्रमण परंपरा में तीर्थंकर आदिनाथ का अक्षयवट के नीचे कैवल्य प्राप्त करना और बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध का धर्म-प्रचार हेतु यहाँ आना इस क्षेत्र की महत्ता का परिचायक है। प्रयाग के प्रतिष्ठानपुर (वर्तमान झूँसी), वत्स देश (कौशाम्बी) तथा अलर्कपुर (अरैल) प्राचीन राज्यों में रहे हैं। प्रतिष्ठानपुर की समकालीनता अयोध्या के सूर्यवंशी नरेश इक्ष्वाकु से मानी गई है। कहा जाता है कि उस समय यहाँ के राजा इला थे। वत्स देश के महाराजा उदयन का वर्णन भी अनेक ग्रंथों में मिलता है।

सम्राट अशोक के शिलालेख-स्तंभ प्रयाग में आज भी सुरक्षित हैं। गुप्तकाल के बाद महाराजा हर्षवर्धन के शासनकाल में प्रयाग की कीर्ति-पताका पूरे विश्व में लहराई थी। कहते हैं कि महाराजा हर्षवर्धन ने ही दो महाकुंभ पर्वों के बीच छठे वर्ष पर कुंभ पर्व आयोजित कराने की परंपरा का सूत्रपात किया था। मध्यकालीन इतिहास में अकबर के दरबारी अबुल फ़ज़ल ने आइने-अकबरी में लिखा है कि हिन्दू लोग प्रयाग को तीर्थराज कहते हैं। यहीं पर गंगा, यमुना और सरस्वती तीनों का संगम है।

प्रयाग और स्वतंत्रता संग्राम

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में प्रयाग की अहम भूमिका रही है। उस समय के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में श्री मदन मोहन मालवीय, सर अयोध्यानाथ, सर सुंदरलाल, मोतीलाल नेहरू आदि ने अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया था। धीरे-धीरे इलाहाबाद स्वाधीनता आंदोलन का केंद्र बनता गया। हिन्दी की प्रसिद्ध पत्रिका सरस्वती यहीं से प्रकाशित हुई। अभ्युदय, स्वराज्य जैसे क्रांतिकारी समाचार-पत्र भी इसी धरती से प्रकाशित हुए और उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। साहित्य, संस्कृति और कला के क्षेत्र में प्रयाग अर्थात् इलाहाबाद का अद्वितीय योगदान है।

प्रयाग का नामकरण एवं माहात्म्य

हमारा देश भारत विश्व की आत्मा कहलाता है और प्रयाग भारत का प्राण कहा गया है। हमारे देश को जीवनदायी शक्तियाँ इसी धरती से मिलती रही हैं। जिस प्रकार सनातन धर्म अनादि कहा जाता है, उसी प्रकार प्रयाग की भी महिमा का कोई आदि-अंत नहीं है। अरण्य और नदी-संस्कृति के बीच जन्म लेकर ऋषियों-मुनियों की तपोभूमि के रूप में पंचतत्त्वों को पुष्पित-पल्लवित करने वाली प्रयाग की धरती देश को सदैव ऊर्जा देती रही है।

प्रकृष्टं सर्वेभ्यः प्रयागमिति गीयते।
दृष्ट्वा प्रकृष्टयागेभ्यः पुष्टेभ्यो दक्षिणादिभिः।
प्रयागमिति तन्नाम कृतं हरिहरादिभिः।।

उत्कृष्ट यज्ञ और दान-दक्षिणा आदि से सम्पन्न स्थल देखकर भगवान विष्णु एवं भगवान शंकर आदि देवताओं ने इसका नाम प्रयाग रख दिया। ऐसा उल्लेख अनेक पुराणों में मिलता है।

तीर्थराज प्रयाग एक ऐसा पावन स्थल है, जिसकी महिमा हमारे सभी धर्मग्रंथों में वर्णित है। तीर्थराज प्रयाग को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रदाता कहा गया है। यह सभी तीर्थों में श्रेष्ठ है। यह वर्णन ब्रह्म पुराण में प्राप्त होता है—

प्रकृष्टत्वात्प्रयागोऽसौ प्राधान्यात् राजशब्दवान्।

अपने प्रकृष्टत्व अर्थात् उत्कृष्टता के कारण यह "प्रयाग" है और प्रधानता के कारण "राज" शब्द से युक्त है।

प्रयाग की महत्ता वेदों और पुराणों में सविस्तार बताई गई है। एक बार शेषनाग से ऋषियों ने यही प्रश्न किया कि प्रयाग को तीर्थराज क्यों कहा जाता है। इस पर शेषनाग ने उत्तर दिया कि एक ऐसा अवसर आया, जब सभी तीर्थों की श्रेष्ठता की तुलना की जाने लगी। उस समय भारत के समस्त तीर्थों को तुला के एक पलड़े पर रखा गया और प्रयाग को दूसरे पलड़े पर; फिर भी प्रयाग का पलड़ा भारी पड़ गया। दूसरी बार सप्तपुरियों को एक पलड़े में रखा गया और प्रयाग को दूसरे पलड़े पर, वहाँ भी प्रयाग वाला पलड़ा भारी रहा। इस प्रकार प्रयाग की प्रधानता सिद्ध हुई और इसे तीर्थों का राजा कहा जाने लगा।

इस पावन क्षेत्र में दान, पुण्य, तप, कर्म, यज्ञादि के साथ-साथ त्रिवेणी संगम का अतीव महत्त्व है। यह सम्पूर्ण विश्व का एकमात्र स्थान है, जहाँ तीन नदियाँ— गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती— मिलती हैं। यहीं से अन्य नदियों का अस्तित्व समाप्त होकर आगे एकमात्र गंगा नदी का महत्त्व शेष रह जाता है।

इस भूमि पर स्वयं ब्रह्माजी ने यज्ञादि कार्य सम्पन्न किए। ऋषियों और देवताओं ने त्रिवेणी संगम में स्नान कर अपने आपको धन्य समझा। मत्स्य पुराण के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर ने एक बार महर्षि मार्कण्डेय से पूछा— "ऋषिवर! यह बताइए कि प्रयाग क्यों जाना चाहिए और वहाँ संगम-स्नान का क्या फल है?"

इस पर महर्षि मार्कण्डेय ने उन्हें बताया कि प्रयाग के प्रतिष्ठान से लेकर वासुकि के हृदयोपरि पर्यंत कम्बल और अश्वतर दो भाग हैं तथा बहुमूलक नाग हैं। यही प्रजापति का क्षेत्र है, जो तीनों लोकों में विख्यात है। यहाँ स्नान करने वाले दिव्य लोक को प्राप्त करते हैं और उनका पुनर्जन्म नहीं होता।

पद्मपुराण कहता है कि यह यज्ञभूमि है। देवताओं द्वारा सम्मानित इस भूमि में यदि थोड़ा भी दान किया जाता है, तो उसका फल अनंत काल तक रहता है।

प्रयाग की श्रेष्ठता के संबंध में यह भी कहा गया है कि जिस प्रकार ग्रहों में सूर्य और नक्षत्रों में चंद्रमा श्रेष्ठ होते हैं, उसी प्रकार तीर्थों में प्रयाग सर्वोत्तम तीर्थ है—

ग्रहाणां च यथा सूर्यो नक्षत्राणां यथा शशी।
तीर्थानामुत्तमं तीर्थं प्रयागाख्यमनुत्तमम्।।

पद्मपुराण के अनुसार प्रयाग में गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है। इन नदियों के संगम में स्नान करने और गंगाजल पीने से मुक्ति मिलती है, इसमें किंचित् भी संदेह नहीं है।

इसी प्रकार स्कंद पुराण, अग्नि पुराण, शिव पुराण, ब्रह्म पुराण, वामन पुराण, बृहन्नारदीय पुराण, मनुस्मृति, वाल्मीकि रामायण, महाभारत, रघुवंश महाकाव्य आदि में भी प्रयाग की महत्ता का विस्तार से वर्णन किया गया है।

वाल्मीकि रामायण में कहा गया है कि श्रीराम अपने वनवास काल में जब ऋषि भारद्वाज से मिलने गए, तो वार्तालाप में ऋषिवर ने कहा— "हे राम! गंगा-यमुना के संगम का जो स्थान है, वह अत्यंत पवित्र है। आप वहाँ भी निवास कर सकते हैं।"

श्रीरामचरितमानस में तीर्थराज प्रयाग की महत्ता का वर्णन अत्यंत रोचक और विस्तृत रूप में किया गया है—

माघ मकरगत रवि जब होई।
तीरथपतिहिं आव सब कोई।।
देव दनुज किंनर नर श्रेनी।
सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनी।।

पूजहिं माधव पद जल जाता।
परसि अछैवट हरषहिं गाता।।
भरद्वाज आश्रम अति पावन।
परम रम्य मुनिवर मन भावन।।

तहँ होइ मुनि ऋषय समाजा।
जाहिं जे मज्जन तीरथ राजा।।

माघ के महीने में त्रिवेणी संगम-स्नान का यह रोचक प्रसंग कुंभ के समय साकार हो उठता है। माघ में साधु-संत प्रातःकाल संगम-स्नान करके कथा कहते हैं तथा ईश्वर के विविध स्वरूपों और तत्त्वों की विस्तार से चर्चा करते हैं।


Kumbh Sangam Prayagraj
Kumbh Sangam Prayagraj


माघ में संगम स्नान क्यों

कुंभ एवं संगम स्नान का महत्व

तीर्थराज प्रयाग में माघ के महीने में, विशेष रूप से कुंभ के अवसर पर, गंगा, यमुना एवं अदृश्य सरस्वती के संगम में स्नान का अत्यंत महत्त्व बताया गया है। अनेक पुराणों में इसके प्रमाण भी मिलते हैं।

ब्रह्म पुराण के अनुसार संगम-स्नान का फल अश्वमेध यज्ञ के समान कहा गया है। अग्नि पुराण के अनुसार प्रयाग में प्रतिदिन स्नान करने का फल उतना ही है, जितना प्रतिदिन करोड़ों गायों के दान से प्राप्त होता है। मत्स्य पुराण में कहा गया है कि दस हजार या उससे भी अधिक तीर्थों की यात्रा का जो पुण्य मिलता है, उतना ही पुण्य माघ मास में संगम-स्नान से प्राप्त होता है।

पद्म पुराण में माघ मास में प्रयाग-दर्शन को दुर्लभ बताया गया है और यदि यहाँ स्नान किया जाए तो उसका महत्त्व और भी बढ़ जाता है। यहाँ मुंडन कराना भी श्रेष्ठ फलदायी माना गया है। मत्स्य पुराण के अनुसार प्रयाग में मुंडन के पश्चात् संगम-स्नान करना चाहिए। स्कंद पुराण के काशी-खण्ड में भी प्रयाग में मुंडन की महत्ता का वर्णन मिलता है।

जैन धर्मावलंबी भी यहाँ केशलुंचन को महत्त्वपूर्ण मानते हैं। आदि तीर्थंकर ऋषभदेव ने अक्षयवट के नीचे केशलुंचन किया था।

प्रयागराज के अन्य महत्त्वपूर्ण धर्मस्थल

प्रयाग में द्वादश माधव और विष्णुपीठ

प्रयागराज के मुख्य देवता भगवान विष्णु माने गए हैं। उन्हें विभिन्न नामों से जाना जाता है। प्रयाग क्षेत्र को स्थानीय स्तर पर माधव क्षेत्र भी कहा जाता है।

द्वादश माधव

  1. श्री त्रिवेणी संगम आदिवट माधव

  2. श्री असि माधव (नागवासुकि मंदिर)

  3. श्री संकटहर माधव (प्रतिष्ठानपुरी)

  4. श्री शंख माधव (छतनाग, मुंशी बागीचा)

  5. श्री आदि वेणी माधव (अरैल)

  6. श्री चक्र माधव (अरैल)

  7. श्री गदा माधव (छिवकी गाँव)

  8. श्री पद्म माधव (बीकर, देवरिया)

  9. श्री मनोहर माधव (जानसेनगंज)

  10. श्री बिन्दु माधव (द्रौपदी घाट)

  11. श्री वेणी माधव (निराला मार्ग, दारागंज)

  12. श्री अनन्त माधव (ऑर्डिनेंस डिपो फोर्ट)

प्रयागराज क्षेत्र के आठ तीर्थ-नायक

प्रयागराज क्षेत्र में आठ प्रमुख तीर्थ-नायकों का भी उल्लेख मिलता है—

त्रिवेणी माधवं सोमं भरद्वाजं च वासुकिम्।
वन्देऽक्षयवटं शेषं प्रयागं तीर्थनायकम्॥

अर्थात् त्रिवेणी, माधव, सोम, भरद्वाज, वासुकि, अक्षयवट, शेष तथा प्रयाग— इन तीर्थ-नायकों को मैं प्रणाम करता हूँ।

यह मान्यता है कि इन सभी पवित्र स्थलों के दर्शन और पूजन से प्रयागराज की तीर्थयात्रा पूर्ण मानी जाती है। विशेषकर कुंभ और माघ मेले के अवसर पर श्रद्धालु इन स्थलों का दर्शन कर धार्मिक पुण्य अर्जित करते हैं।


शंकराचार्य मठ

शंकराचार्य मठ

विद्वता और तपस्या की साक्षात् प्रतिमूर्ति स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती का नाम कौन नहीं जानता? ज्योतिर्मठ-बदरिकाश्रम को अपने तपोबल से जागृत करने वाले इन शंकराचार्य ने प्रयाग के महत्त्व को समझते हुए यहाँ एक मठ की स्थापना का संकल्प लिया।

उन्होंने देखा कि अलोपशंकरी देवी के सम्मुख एक शिव मंदिर स्थित है। स्वामी ब्रह्मानन्द जी को यह स्थान अत्यंत उपयुक्त लगा। यहाँ ज्योतिर्मठ का कार्यालय स्थापित किया गया।

स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी के ब्रह्मलीन होने के पश्चात् उनके शिष्य स्वामी विष्णुदेवानन्द सरस्वती ने इस मठ की गरिमा को बनाए रखा। उनके पश्चात् उनके शिष्य शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती यहाँ निवास करते रहे और मठ की परंपरा को आगे बढ़ाते रहे।


Shankar Viman Mandapam - Prayagraj
Shankar Viman Mandapam - Prayagraj  

शंकर विमान मण्डपम् – प्रयागराज

गंगा तट पर त्रिवेणी बाँध के निकट स्थित खंभों वाले मंदिर की चर्चा होते ही आदि शंकर विमान मण्डपम् की भव्य आकृति आँखों के सामने उभर आती है। कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य स्वामी चंद्रशेखरेन्द्र सरस्वती की प्रेरणा एवं देखरेख में निर्मित यह मंदिर प्रयागराज की धार्मिक एवं सांस्कृतिक गरिमा को और अधिक उन्नत करता है।

अपने प्रकार का यह मंदिर प्रयागराज में अद्वितीय माना जाता है। इसकी वास्तुकला दक्षिण भारतीय मंदिर-शैली पर आधारित है, जो इसे अन्य स्थानीय मंदिरों से विशिष्ट बनाती है। मंदिर में स्थापित सुंदर एवं कलात्मक मूर्तियाँ दक्षिण भारत की समृद्ध शिल्प-परंपरा का उत्कृष्ट परिचय कराती हैं।

गंगा तट के निकट स्थित यह मंदिर श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र है तथा प्रयागराज की आध्यात्मिक विरासत में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।


Bade Hanuman Ji Temple Prayagraj
Bade Hanuman Ji Temple Prayagraj

बड़े हनुमान जी मंदिर, प्रयागराज

गंगा, यमुना तथा अदृश्य सरस्वती के पावन संगम तट पर, त्रिवेणी बाँध के नीचे बड़े हनुमान जी का मंदिर स्थित है। इस मंदिर की प्रतिमा के संबंध में एक जनश्रुति प्रचलित है कि एक निःसंतान वैश्य (वणिक) ने हनुमान जी की एक विशालकाय प्रतिमा बनवाकर उसे नाव में लादकर ले जाना प्रारंभ किया। कहा जाता है कि उसकी नाव उसी स्थान पर आकर रुक गई, जहाँ वर्तमान में बड़े हनुमान जी का मंदिर स्थित है। रात्रि में स्वप्न में उस वैश्य को संकेत मिला कि वह प्रतिमा को इसी स्थान पर छोड़कर चला जाए। वणिक ने वैसा ही किया और अपने घर लौट गया। जनश्रुति के अनुसार उसकी मनोकामना पूर्ण हुई। बाद में इसी स्थान पर बाघम्बरी बाबा को हनुमान जी की प्रतिमा का आभास हुआ। उनके संरक्षण में जब खुदाई कराई गई, तो बड़े हनुमान जी की प्रतिमा प्राप्त हुई। उस प्रतिमा को वहाँ से हटाने का प्रयास किया गया, किन्तु प्रतिमा अपने स्थान से तनिक भी नहीं हिली। अनेक प्रयास असफल होने पर अंततः उसी स्थान पर हनुमान जी के मंदिर का निर्माण कराया गया।

श्री तुलसीदास जी का बड़ा स्थान

तीर्थराज प्रयाग के परम पावन धार्मिक स्थलों में 'श्री तुलसीदास जी का बड़ा स्थान' का अपना विशिष्ट महत्त्व है। यह स्थान वैष्णव सम्प्रदाय के उपासकों की प्रमुख पूजा-स्थली है। प्रयाग के दारागंज मोहल्ले के दक्षिणी छोर पर स्थित यह स्थल पूरे देश में प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि इसकी स्थापना रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी के समकालीन श्री देव मुरारी जी ने की थी, जो स्वयं सिद्ध महात्मा थे। उनके गुरु का नाम श्री तुलसीदास था। उन्हीं के नाम पर इस स्थान का नाम "श्री तुलसीदास का बड़ा स्थान" पड़ा।

रामानन्दाचार्य मठ

प्राचीन भारतीय संतों एवं आचार्यों की परंपरा में श्री शंकराचार्य, माधवाचार्य, रामानुजाचार्य तथा निम्बार्काचार्य का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। स्मरणीय है कि उत्तर भारत में आध्यात्मिक नेतृत्व का श्रेय सर्वप्रथम श्री रामानन्दाचार्य को प्राप्त हुआ। उन्होंने रामभक्ति की धारा को पूरे देश में प्रवाहित कर उत्तर भारत के गौरव को अक्षुण्ण बनाए रखा। उत्तर भारत में रामभक्ति-रसधारा का प्रसार करने वाले श्री रामानन्द प्रयाग के गौरव थे, जिन्होंने सम्पूर्ण भारत को राममय बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी स्मृति में श्री रामानन्दाचार्य मठ का निर्माण किया गया। वर्तमान समय में त्रिवेणी बाँध के दक्षिणी किनारे पर, किले से सटा हुआ यह मठ प्रयाग की धार्मिक एवं सांस्कृतिक गरिमा में वृद्धि कर रहा है।

जंगमबाड़ी मठ

नगर के दारागंज मोहल्ले में जंगमबाड़ी मठ की शाखा स्थापित है। वीरशैव मतावलम्बियों का यह प्रमुख स्थान दशाश्वमेध घाट के निकट स्थित है। कहा जाता है कि वीरशैव मत के प्रतिपादक स्वयं भगवान शिव थे। वीरशैव मतावलम्बियों की विशेषता यह है कि वे अपने शरीर पर सदैव शिवलिंग धारण किए रहते हैं।

शिव मठ एवं सिद्धेश्वर महादेव मंदिर

संगम के निकट दारागंज मोहल्ले में स्थित शिव मठ एक तपस्वी संत की भक्ति, श्रद्धा और संस्कृति-प्रेम का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस मठ का निर्माण उन्होंने अपनी समस्त संपत्ति लगाकर कराया था। दक्षिण भारत के तिरुनेलवेली जिले के वाहकुलम ग्राम निवासी श्री वेंगा शिवन लगभग 160 वर्ष पूर्व अपनी सम्पूर्ण संपत्ति शिव-मंदिर को समर्पित करने के उद्देश्य से प्रयाग आए। यहाँ का धार्मिक वातावरण देखकर उन्होंने यहीं बसने का संकल्प लिया। संस्कृत के विद्वान श्री वेंगा शिवन ने दक्षिण भारतीय तीर्थयात्रियों के निवास एवं सेवा के उद्देश्य से शिव मठ की स्थापना की।

नागवासुकि

प्रयाग के अत्यंत प्राचीन एवं पौराणिक स्थलों में नागवासुकि का विशेष महत्त्व है। वर्तमान में नागवासुकि मंदिर दारागंज (बख्शी) मोहल्ले में स्थित है, जहाँ नागवासुकि की प्राचीन प्रतिमा स्थापित है।

मंदिर में वासुकि मध्य भाग में प्रतिष्ठित हैं। उनके दोनों ओर नाग-नागिन के चार जोड़े विभिन्न मुद्राओं में उत्कीर्ण हैं। मंदिर के पूर्वी द्वार की देहली पर शंख बजाते हुए दो कीचक अंकित हैं, जिनके मध्य दो हाथियों सहित कमल का सुंदर चित्रण किया गया है।

मंदिर के गर्भगृह में फणधारी नाग-नागिन की प्राचीन प्रतिमा स्थापित है। यहाँ विघ्नहर्ता भगवान गणेश की प्रतिमा भी विद्यमान है। नागवासुकि मंदिर प्रयाग की प्राचीन धार्मिक परंपरा, नाग-पूजा और सांस्कृतिक विरासत का महत्त्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।

Nag Vasuki Temple Prayagraj



शक्तिपीठ

अलोप शंकरी देवी

प्रयागराज के प्रमुख शक्तिपीठों में अलोप शंकरी देवी का विशेष महत्त्व है। इसे प्रयाग की ललिता पीठ भी कहा जाता है। अलोपीबाग मोहल्ले में स्थित यह मंदिर महानिर्वाणी पंचायती अखाड़ा के अधीन है और श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र माना जाता है।

इस मंदिर की सबसे विशिष्ट विशेषता यह है कि यहाँ देवी की कोई प्रतिमा स्थापित नहीं है। मंदिर के भीतर एक चौकोर चबूतरा बना हुआ है, जिसके मध्य एक कुंड स्थित है। इस कुंड में सदैव जल भरा रहता है। कुंड के ऊपर मंदिर की छत से एक झूला लटका हुआ है।

मंदिर में देवी के प्रत्यक्ष विग्रह के स्थान पर इसी झूले और पवित्र कुंड की पूजा-अर्चना की जाती है। श्रद्धालु इनकी पूजा कर देवी का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यही विशेषता अलोप शंकरी देवी मंदिर को अन्य शक्तिपीठों से अलग पहचान प्रदान करती है।

जनश्रुति के अनुसार माता सती के शरीर के अंग जहाँ-जहाँ गिरे, वहाँ शक्तिपीठों की स्थापना हुई। प्रयाग की अलोप शंकरी देवी के संबंध में मान्यता है कि यहाँ माता सती का अंतिम अंग "अलोप" (अदृश्य) हो गया था। इसी कारण इस स्थान का नाम अलोप शंकरी पड़ा और यह स्थान शक्तिपीठ के रूप में पूजित हुआ।

आज भी नवरात्र, माघ मेला तथा कुंभ के अवसर पर यहाँ लाखों श्रद्धालु दर्शन एवं पूजन के लिए आते हैं और माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

Alopashankari Maa Temple Prayagraj

माँ ललिता देवी

तीर्थराज प्रयाग स्थित ललिता पीठ अत्यंत प्राचीन एवं प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। इसका उल्लेख मत्स्य पुराण, ब्रह्म पुराण, कुब्जिका तंत्र, रुद्रयामल तंत्र, तंत्र चूड़ामणि, शाक्तानन्द तरंगिणी, गन्धर्व तंत्र तथा देवी भागवत आदि अनेक धार्मिक ग्रंथों में प्राप्त होता है।

इक्यावन (51) शक्तिपीठों में वर्णित ललिता पीठ के संबंध में यह मान्यता प्रचलित है कि यहाँ माता सती की हाथ की उँगलियाँ गिरी थीं। पुराणों में वर्णित इस कथा के अनुसार, जब भगवान शिव माता सती के शरीर को लेकर विचरण कर रहे थे, तब भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के विभिन्न अंग पृथ्वी पर विभिन्न स्थानों पर गिरे, जहाँ शक्तिपीठों की स्थापना हुई। प्रयाग स्थित ललिता पीठ भी उन्हीं पवित्र शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।

यह प्राचीन मंदिर प्रयागराज के मीरापुर मोहल्ले में स्थित है। देवी ललिता को आदिशक्ति का स्वरूप माना जाता है और यहाँ वर्ष भर श्रद्धालुओं का आवागमन बना रहता है। विशेष रूप से नवरात्रि, माघ मेला तथा कुंभ पर्व के अवसर पर बड़ी संख्या में भक्तजन माँ के दर्शन एवं पूजन के लिए आते हैं।

माँ ललिता देवी का यह मंदिर प्रयागराज की धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र है तथा शक्तोपासना की प्राचीन परंपरा का जीवंत प्रतीक माना जाता है।

Maa Lalita Devi Shakti Peeth Prayagraj

 Maa Lalita Devi Shakti Peeth Prayagraj




माँ कल्याणी देवी

Shakti Peeth Maa Kalyani Devi Temple Prayagraj
Shakti Peeth Maa Kalyani Devi Temple Prayagraj

माँ कल्याणी देवी प्रयागराज के प्रमुख एवं प्राचीन शक्तिपीठों में से एक मानी जाती हैं। अलोपशंकरी देवी के प्रसंग में वर्णित 51 शक्तिपीठों की कथा के क्रम में माँ कल्याणी का भी उल्लेख प्राप्त होता है। मत्स्य पुराण के 108वें अध्याय में कल्याणी देवी का वर्णन मिलता है।

प्रयाग माहात्म्य के अनुसार माँ कल्याणी और ललिता देवी को एक ही शक्ति का स्वरूप माना गया है, किन्तु प्रयागराज में इन दोनों का पृथक अस्तित्व एवं स्वतंत्र पूजा-परंपरा विद्यमान है।

ब्रह्मवैवर्त पुराण के तृतीय खंड में वर्णित प्रसंग के अनुसार महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रयाग में भगवती की आराधना कर माँ कल्याणी देवी की 32 अंगुल ऊँची प्रतिमा की स्थापना की थी। इसी कारण यह स्थान प्राचीन काल से शक्ति-उपासना का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।

माँ कल्याणी देवी का यह प्राचीन मंदिर प्रयागराज नगर के कल्याणी देवी मोहल्ले में स्थित है। यहाँ वर्ष भर श्रद्धालुओं का आगमन बना रहता है, जबकि नवरात्रि, माघ मेला तथा अन्य धार्मिक अवसरों पर विशेष भीड़ उमड़ती है।

माँ कल्याणी देवी को कल्याण, सुख, समृद्धि एवं शक्ति की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। प्रयागराज की धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत में इस मंदिर का विशिष्ट स्थान है और यह श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।


Bhardwaj Muni Ashram Prayagraj
Bhardwaj Muni Ashram Prayagraj

महर्षि भरद्वाज

महर्षि भरद्वाज का नाम भारतीय ऋषि-परंपरा में अत्यंत आदर और श्रद्धा के साथ लिया जाता है। वे महान तपस्वी, विद्वान एवं ज्ञानी आचार्य थे। तीर्थराज प्रयाग की धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा में महर्षि भरद्वाज का विशिष्ट स्थान है।

प्रयाग में महर्षि भरद्वाज का उल्लेख भगवान श्रीराम के वनगमन प्रसंग में प्राप्त होता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण वनवास के लिए अयोध्या से प्रस्थान कर प्रयाग क्षेत्र में पहुँचे, तब श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा कि उन्हें अग्नि की लपटें दिखाई दे रही हैं, जिससे प्रतीत होता है कि महर्षि भरद्वाज का आश्रम निकट ही है।

इसके पश्चात् भगवान श्रीराम, माता सीता तथा लक्ष्मण महर्षि भरद्वाज के आश्रम में उनके दर्शन हेतु पहुँचे। महर्षि भरद्वाज ने उनका आदर-सत्कार किया तथा उन्हें आगे के वनवास-मार्ग के संबंध में आवश्यक मार्गदर्शन प्रदान किया।

यह भी प्रमाणित माना जाता है कि रामकथा महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा महर्षि भरद्वाज को सुनाई गई थी। इस प्रकार रामकथा की परंपरा में भी महर्षि भरद्वाज का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

प्रयागराज स्थित भरद्वाज आश्रम आज भी श्रद्धालुओं एवं तीर्थयात्रियों के लिए एक प्रमुख धार्मिक स्थल है, जो महर्षि भरद्वाज की तपस्या, ज्ञान और ऋषि-परंपरा की गौरवशाली स्मृति को संजोए हुए है।


Saraswati Koop Prayagraj
Saraswati Koop Prayagraj

सरस्वती कूप

संगम क्षेत्र में किले के भीतर सरस्वती कूप स्थित है। मान्यता है कि सरस्वती नदी यहाँ इस कूप में दृश्य रूप में विद्यमान है। इसी प्रकार गंगा के पूर्वी तट पर प्रतिष्ठानपुरी (वर्तमान झूँसी) में हंस कूप अथवा हंसतीर्थ स्थित है। इस पवित्र कूप का उल्लेख वाराह पुराण तथा मत्स्य पुराण में प्राप्त होता है।

मत्स्य पुराण के अध्याय 106 में हंसकूप का वर्णन किया गया है, जिसे हंसप्रपतन नाम दिया गया है। इस कूप के निकट एक शिलालेख उत्कीर्ण है, जिसका आशय यह है कि इस हंसरूपी बावली में स्नान करने तथा इसका जल पीने से हंसगति, अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति होती है।

रामचरितमानस में भी गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है—

"भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा।"

वर्तमान समय में महर्षि भरद्वाज का आश्रम प्रयागराज के कर्नलगंज मोहल्ले में, आनंद भवन के समीप स्थित है। इस आश्रम में महर्षि भरद्वाज की प्रतिमा तो नहीं है, किंतु यहाँ भरद्वाजेश्वर शिवलिंग तथा सहस्रफणधारी शेषनाग की भव्य प्रतिमा स्थापित है।

मंदिर के आसपास की भौगोलिक संरचना से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि किसी समय गंगा नदी इसी क्षेत्र से होकर बहती रही होगी, क्योंकि आश्रम ऊँचाई पर स्थित है तथा उसके चारों ओर पर्याप्त ढलान दिखाई देती है।

धार्मिक मान्यता है कि जो तीर्थयात्री प्रयाग आने के बाद भरद्वाज आश्रम के दर्शन नहीं करता, उसकी प्रयाग-यात्रा का पुण्यफल अपूर्ण माना जाता है। इसी कारण श्रद्धालु संगम स्नान के साथ-साथ महर्षि भरद्वाज आश्रम के दर्शन को भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानते हैं।

कोटि तीर्थ (शिवकुटी)

प्रयाग में गंगा के दक्षिणी तट पर स्थित तीर्थ को कोटि तीर्थ कहा गया है। वर्तमान शिवकुटी ही प्राचीन कोटि तीर्थ माना जाता है। पद्म पुराण के अनुसार यहाँ कोटि-कोटि तीर्थों का निवास है। इस कोटि तीर्थ के अधिष्ठाता देव कोटितीर्थेश्वर भगवान शिव कहे गए हैं। इसी स्थान के उत्तर में भार्गव, गालव तथा चामर तीर्थों का भी उल्लेख प्राप्त होता है।

श्री हनुमत निकेतन

नगर के सिविल लाइंस क्षेत्र में कमला नेहरू रोड और स्टेनली रोड के मध्य, ऐतिहासिक पुरुषोत्तम दास टंडन पार्क के समीप स्थित श्री हनुमत निकेतन लगभग साढ़े तीन एकड़ क्षेत्र में सुंदर वाटिकाओं से सुसज्जित है।

Hanumat Niketan Temple, Civil Lines - Temples in Prayagraj

Hanumat Niketan Temple, Civil Lines - Temples in Prayagraj
Hanumat Niketan Temple, Civil Lines - Temples in Prayagraj
Hanumat Niketan Temple, Civil Lines - Temples in Prayagraj

तीर्थयात्रियों, पर्यटकों तथा नगरवासियों की श्रद्धा के केंद्र इस मंदिर के संस्थापक रामलोचन ब्रह्मचारी जी थे। उन्होंने बल, बुद्धि, विद्या और ब्रह्मचर्य के प्रतीक भगवान हनुमान की भव्य प्रतिमा के साथ दक्षिण भाग में श्रीराम, लक्ष्मण एवं माता जानकी तथा उत्तर भाग में सिंहवाहिनी माँ दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर इस मंदिर को राष्ट्र को समर्पित किया।

समुद्र कूप

हंसकूप के दक्षिण की ओर निकट ही एक अन्य कुआँ स्थित है, जिसे समुद्र कूप कहा जाता है। जनश्रुति है कि इस कूप का निर्माण गुप्तवंशीय सम्राट समुद्रगुप्त ने कराया था, इसलिए इसका नाम समुद्र कूप पड़ा। यद्यपि अधिकांश लोग इसका संबंध समुद्र से मानते हैं।

यह अत्यंत गहरा कुआँ है और इसका उल्लेख मत्स्य पुराण में भी प्राप्त होता है। यह स्थान ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।

Samudrakup of Prayagraj is the Historical

अक्षयवट

प्रयागराज की अमूल्य धरोहरों में अक्षयवट का विशेष स्थान है। पद्म पुराण के अनुसार सृष्टि के प्रलयकाल में भी यह वृक्ष विद्यमान रहता है और इसका कभी नाश नहीं होता, इसलिए इसे अक्षयवट कहा जाता है।

पद्म पुराण में इसे श्यामवट नाम से भी संबोधित किया गया है—

श्यामो वटोऽश्यामगुणं वृणोति, स्वच्छायया श्यामलया जनानाम्।
श्यामः श्रमं कृन्तति यत्र दृष्टः स तीर्थराजो जयति प्रयागः।।

अर्थात् जहाँ श्यामवट (अक्षयवट) अपनी शीतल एवं श्यामल छाया से मनुष्यों को दिव्य सात्त्विक गुण प्रदान करता है तथा जहाँ भगवान माधव अपने दर्शन मात्र से भक्तों के पाप और संताप का नाश कर देते हैं, उस तीर्थराज प्रयाग की जय हो।

अक्षयवट का उल्लेख ऋग्वेद में भी प्राप्त होता है। सम्राट हर्षवर्धन के समय भारत आए प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी अपने यात्रा-वृत्तांत में अक्षयवट का वर्णन किया है।


akshayavat

पातालपुरी मंदिर

संगम के निकट स्थित किले के पूर्वी भाग में तहखाने के भीतर स्थित प्राचीन देवालय को पातालपुरी मंदिर कहा जाता है। इसका निर्माण कब और किसके द्वारा कराया गया, इसका स्पष्ट विवरण उपलब्ध नहीं है, किंतु इसकी प्राचीनता का संकेत ह्वेनसांग के वर्णनों से मिलता है।

ह्वेनसांग ने लिखा है—

"नगर में एक शिव मंदिर है, जो अपनी सजावट और चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध है। इसके बारे में कहा जाता है कि यदि कोई यहाँ दान करता है, तो उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है। मंदिर के आँगन में एक विशाल वृक्ष (अक्षयवट) है, जिसकी शाखाएँ और पत्तियाँ दूर-दूर तक फैली हुई हैं।"

वर्तमान में यह क्षेत्र भारतीय सेना के अधीन है तथा मंदिर सामान्यतः माघ मास के दौरान श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोला जाता है।

मंदिर की लंबाई लगभग 84 फीट तथा चौड़ाई 46.5 फीट है। खंभों पर टिकी इसकी छत की ऊँचाई लगभग साढ़े छह फीट है। मंदिर के भीतर गणेश, गोरखनाथ, नरसिंह, शिवलिंग आदि सहित कुल 46 मूर्तियाँ स्थापित हैं।

patalpuri-temple

श्री मनकामेश्वर मंदिर

मनकामेश्वर प्रयागराज के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है। यमुना तट पर स्थित यह भगवान शिव का प्राचीन मंदिर है, जिसमें मनकामेश्वर महादेव विराजमान हैं।

पुराणों में वर्णित इस तीर्थ का विशेष महत्त्व इसलिए माना जाता है कि यहाँ भगवान मनकामेश्वर महादेव के स्मरण, दर्शन एवं पूजन से श्रद्धालुओं की मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। इसी विश्वास के कारण वर्ष भर बड़ी संख्या में भक्त यहाँ दर्शन हेतु आते हैं।

यमुना तट पर स्थित यह मंदिर अपनी धार्मिक आस्था, प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक वातावरण के कारण प्रयागराज के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में गिना जाता है।

 
Sri Mankameshwar Mandir


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