नागार्जुन की काव्य-यात्रा
प्रख्यात कवि-कथाकार के रूप में चर्चित नागार्जुन का पूरा नाम श्री वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' 'नागार्जुन' है। 1911 ई. की ज्येष्ठ पूर्णिमा को जन्मे नागार्जुन का मूल निवास स्थान तरौनी, जिला दरभंगा, बिहार है। उन्होंने परंपरागत प्राचीन पद्धति से संस्कृत की शिक्षा ग्रहण की। सुविख्यात प्रगतिशील कवि-कथाकार स्वभाव से आवेगशील, लेकिन गंभीर भी थे। ये राजनीति और जनता के मुक्ति-संघर्षों में सक्रिय एवं रचनात्मक हिस्सेदारी के प्रति सजग थे। हिन्दी के अतिरिक्त मैथिली, संस्कृत और बँगला में भी आपने उपयोगी काव्य-रचनाएँ प्रस्तुत की हैं। संस्कृत और मैथिली में ये 'यात्री' नाम से कविताएँ लिखते थे।
कालिदास और नागार्जुन, दोनों महाकवि इस देश के अद्भुत घुमक्कड़ कवि हैं। तुंग हिमालय के कंधों पर छोटी-बड़ी कई झीलें देखकर दोनों यात्री कवियों ने निज के ही उन्माद-गीत लिखे हैं। प्रकृति के कवि या तो जीवन से क्षेत्रन्यास ले लेते हैं या व्यक्तिवाद के हित में ललित लोकायतन बनाकर जन-जीवन से ही दूर हो जाते हैं। 'सोज़े वतन' के प्रेमचंद और नागार्जुन किसान भारतवर्ष के ऐसे अनूठे रचनाकार हैं, जो व्यापक और ठोस दबी हुई दूब का रूपक बन चुके हैं। मैथिली काव्य-संग्रह 'पत्रहीन नग्न गाछ' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हिन्दी कविता के लिए मध्य प्रदेश शासन द्वारा 'मैथिलीशरण गुप्त' सम्मान तथा संपूर्ण साहित्य-साधना के लिए उत्तर प्रदेश शासन द्वारा 'भारत-भारती' पुरस्कार एवं बिहार सरकार के शिखर सम्मान से सम्मानित किया गया।
नागार्जुन की कविताओं को पढ़-सुनकर कोई भी सहज ही आज़ादी के आर-पार के भारतीय जन-इतिहास से परिचित हो सकता है। ये इस देश के मनुष्यों की संपूर्ण गतिविधियों में शरीक रचनाएँ हैं। एक ऐसे रचनाकार की रचनाएँ, जो हमेशा अपने समय, उस समय के बीच घटती राष्ट्रीय, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक घटनाओं तथा हादसों के रू-ब-रू खड़ा है। उनकी नज़र से कोई चीज़ छूटती नहीं।
युगधारा— 'युगधारा' नागार्जुन जी का पहला काव्य-संकलन है। 'निराला' जी की 'अनामिका' जिस तरह आधुनिक कविता का श्रेष्ठतम संकलन है, उसी तरह नागार्जुन जी की 'युगधारा' पक्षधर कविता का आधार निर्मित करने वाला विशिष्ट संकलन रहा है। निराला और नागार्जुन, दोनों किसान और नारी की मुक्ति की प्रगतिशील भूमिका पर ज़ोर देने वाले महाकवि हैं। दोनों महाकवियों ने देश के 'तुच्छ से तुच्छ जन' की जीवनी पर कहानी, काव्य-रूपक और गीत लिखे हैं। दोनों महाकवि कभी साधारण जनों से अलहदा नहीं हुए।
प्रकाशचन्द्र गुप्त ने 'युगधारा' संग्रह के संबंध में लिखा है कि— "नागार्जुन नई पीढ़ी के कवियों में अपना विशेष स्थान रखते हैं। 'नागार्जुन' और 'सुमन' के समान कवियों का विकास हिन्दी कविता के भविष्य का निर्णायक होगा। नागार्जुन दो शैलियों में कविता करते रहे हैं। एक शैली संस्कृत की पदावली से मोह रखती है, दूसरी में वे जन-गीतों की परंपरा अपनाते हैं। 'युगधारा' में पहली श्रेणी की कविताएँ ही अधिक हैं, किन्तु दोनों शैलियों के बीच कोई सुस्पष्ट रेखा भी नहीं है।
ये कविताएँ काफ़ी लोकप्रिय हो चुकी हैं। इन्हें एक स्थान पर एकत्र पाकर पाठक कृतज्ञ होंगे। नागार्जुन ने जन-ज्वाला को अपने काव्य का आभूषण बनाया है। उनकी रचनाएँ जन-संघर्षों को बल देती हैं। हमें आशा है कि इस संग्रह का हिन्दी में अभूतपूर्व स्वागत होगा और नागार्जुन की वाणी की शक्ति दिन-दूनी, रात चौगुनी बढ़ेगी। हिन्दी कविता और जनता की अभिलाषाओं-आकांक्षाओं दोनों के लिए यह शुभ होगा।"
'रवि ठाकुर' कविता में नागार्जुन, रवीन्द्रनाथ ठाकुर से यह आशीष माँगते हैं— "मन मेरा स्थिर हो। नहीं लौटूँ, चिर चलूँ, कैसा भी तिमिर हो। प्रलोभन में पड़कर बदलूँ नहीं रुख।" यही आज तक की प्रगतिशील कविता की उद्बोधन-दृष्टि रही है। 'पक्षधर' कविता और 'युगधारा' आज की कविता का पर्यायवाची दस्तावेज़ बन चुके हैं। हिन्दी में 'युगधारा' और नागार्जुन मानवीय इतिहास के आधार-स्तंभ हैं। हिन्दी की जातीय चेतना यूरोप, एशिया, अमेरिका या अफ्रीका अर्थात तीसरी दुनिया की जनता के सर्वाधिकार की कविता है। नागार्जुन अपराजेय किसान-कवि हैं। 'युगधारा' उसी जनकवि का प्रथम संकलन है।
"इस संकलन में आई रचनाओं के संबंध में कुछ सूचनाएँ अति आवश्यक हैं— सन् 1943 तक कवि 'यात्री' नाम से लिखते रहे। 'रवि ठाकुर' और 'बादल को घिरते देखा है' रचनाओं के साथ रचयिता का यही नाम छपा था। उसके बाद 'यात्री' का नाम हमें मैथिली साहित्य में कवि और कथाकार के रूप में अब भी प्राप्त होता है। 'नागार्जुन' का नाम हिन्दी-जगत में और 'यात्री' का नाम मैथिली-जगत में प्रख्यात है— दोनों वास्तव में एक ही व्यक्ति की अभिधाएँ हैं।"
प्रत्यक्ष राजनीति की वामपक्षी प्रवृत्तियों ने नागार्जुन को जनसाधारण से संयुक्त कर दिया, फिर वे आसान से आसान भाषा में लिखने लगे। फिर भी मुक्तछंद और अतुकांत शैलियों को उन्होंने तिलांजलि नहीं दी। दोहा, चौपाई, रोला, छप्पय, नचारी, सोहर और पद्यबद्ध कथक शैली— अभिव्यक्ति के लिए वे कोई भी लोकप्रिय छंद अपनाने को तैयार रहते हैं। खेद की बात है कि इस प्रकार की कोई रचना इस संकलन में प्रकाशित नहीं है।
शोषित और पीड़ित वर्गों के प्रति कवि की सहानुभूति कृत्रिम नहीं है। उनका जन्म नितांत दरिद्र कुल में हुआ। गरीबी के कारण उन्होंने स्कूल-कॉलेज का मुँह नहीं देखा। मूर्ख रह जाने की विभीषिका ने संस्कृत पढ़ने के विकल्प को स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। आज भी उनका कोई निश्चित काम नहीं है। मानो फटीचरी ही नागार्जुन की जीवन-सहचरी रही हो। अपनी मैथिली रचनाओं के कुछ रूपांतर वे इस संकलन में डालना चाहते थे, परंतु पुस्तक का कलेवर अधिक न फूलाने के हमारे मनोभाव को जानकर कवि इस ओर से निर्लिप्त हो गए। दूसरे संकलन में उनकी मैथिली रचनाओं के रूपांतर पर्याप्त मात्रा में संकलित हैं।
इस संकलन की कोई भी रचना अप्रकाशित नहीं है। समय-समय पर पत्र-पत्रिकाओं ने इन्हें छापा है। इनमें से कुछ रचनाएँ बार-बार पूरी की पूरी उद्धृत की जाती रही हैं ('बादल को घिरते देखा है', 'रवि ठाकुर' आदि)। गांधी जी की हत्या के अगले ही दिन प्रकाशित 'तर्पण' को अठारह पत्र-पत्रिकाओं ने स्वयं छापा था, जबकि 'शपथ' को ग्यारह पत्र-पत्रिकाओं ने पूर्णतः या अंशतः प्रकाशित किया था। सांप्रदायिकता के विरुद्ध कवि की यह उद्दीप्त ललकार बिहार सरकार बर्दाश्त नहीं कर सकी थी। गांधी जी की मृत्यु के संबंध में नागार्जुन की चार रचनाएँ— 'तर्पण', 'मत क्षमा करो', 'गोडसे' और 'शपथ'— प्रकाशित हुई थीं।
इस संग्रह की प्रारम्भिक कविता 'जन-वंदना' में उन्होंने आम जन-जीवन का गुणगान करते हुए यह उद्घोषित करना चाहा है कि जनता में असीम शक्तियाँ निवास करती हैं, जिन्हें पहचानने की आवश्यकता है—
"हे कोटिशीर्ष, हे कोटिबाहु, हे कोटिचरण!
युग की लक्ष्मी, भव की विभूति कर रही तुम्हारा
स्वयं वरण।
तुम महिमामंडित परम्पराओं के वाहन,
तुम साधारण, तुम निर्विशेष।"
'भिक्षुणी' कविता में नारी-जीवन के अन्तर्द्वन्द्व को बड़ी सहजता लेकिन मार्मिकता के साथ नागार्जुन ने प्रस्तुत किया है। बौद्ध धर्म के प्रभाव से परिपूर्ण इस कविता में उन्होंने तत्कालीन परिवेश और महिलाओं की स्थिति का तार्किक वर्णन किया है। वे लिखते हैं—
"बैठ गई भिक्षुणी टेककर घुटने,
तीन बार उसने
सादर प्रणाम किया
झुक-झुक अमिताभ को।
फिर उठ खड़ी हुई, चारों ओर देखा,
हतप्रभ-सी, मानो शिशिर-शशिलेखा।"
इसी क्रम में आपकी 'पाषाणी' कविता का उल्लेख मिलता है, जहाँ महर्षि गौतम के श्राप से अभिशप्त उनकी पत्नी अहिल्या का कारुणिक वर्णन मिलता है—
"गौतम-दार, अहल्या मेरा नाम,
यहीं-कहीं होंगे मुनि भी, हे राम!
दिया उन्होंने मुझको यह अभिशाप—
'परनर-दूषित, पुंश्चली, तेरी देह
हो जाए निस्पंद, कुलिश-पाषाण!'"
नागार्जुन की कविता 'चन्दना' एक प्रकार की कथात्मक कविता का उदाहरण प्रस्तुत करती है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, नारी की दयनीय स्थिति, नारी के उत्थान के प्रति प्रयास तथा सामान्य और संभ्रांत वर्ग के भाव— यही विशेषताएँ इस कविता को ऊँचा उठाती हैं। बच्चों के क्रय-विक्रय, दास-प्रथा और बाल-श्रम जैसी कुप्रथाओं का चित्रण इस कविता में सर्वत्र देखने को मिलता है। यहाँ एक अन्य समस्या भी दृष्टिगत होती है कि महिलाएँ ही महिलाओं की सबसे बड़ी शत्रु साबित होती हैं। चन्दना के पालन-पोषण को लेकर धनावह सेठ बड़े उत्साहित और आशावान हैं। वह उसे अपनी पुत्री-सदृश देखते हैं, लेकिन सेठानी को इसमें छल और भावी आशंका दिखाई देती है—
"ऊँट का आरोही
ले गया लड़की को
हाट में बेचने।
सबल, स्वस्थ, सुन्दर, फुर्तीले, स्वामिभक्त
बिकते थे जहाँ हजारों दास-दासीजन।
सुस्मित, प्रियदर्शन
आठ-नौ बरस की
कुमारी बसुमति।
देखते ही उसको तत्क्षण खरीद लिया
धनावह सेठ ने मुँह-माँगे दाम पर,
ले जाकर घर में सेठानी को सौंप दिया।"
खिचड़ी विप्लव देखा हमने
प्रस्तुत संग्रह में उनकी आठवें दशक में लिखी कविताएँ संकलित हैं। यह आठवाँ दशक हमारे देश के इतिहास में व्यापक हलचलों, आंदोलनों, टकरावों, सत्ता-परिवर्तनों, दमन, जुर्म और उनके प्रतिरोधों के महत्त्वपूर्ण वर्षों का काल रहा है। इस सबका नागार्जुन से बेहतर गवाह कौन हो सकता है, क्योंकि वे स्वयं इस सबके बीच रहे। इन कविताओं में यह सम्पूर्ण इतिहास एक नए रचनात्मक तेवर में मूर्त हुआ है। ये कविताएँ स्वयं में भारतीय जन-मन में हो रही सुगबुगाहट का दस्तावेज भी हैं, तो आंदोलन की ललकार भी; संघर्ष के बीच की लय और ताल भी हैं, तो स्थापित व्यवस्था पर आक्रमण भी; और साथ ही विकल्प के रूप में उभरती राजनीति से मोहभंग भी। लेकिन इससे भी बड़ी और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ये कविताएँ आम शोषित, पीड़ित और उपेक्षित जन-गण के पक्ष में लिखी गई हैं— वस्तु और रूप, सब कुछ का चुनाव उसी के तहत हुआ है।
"नागार्जुन संपूर्ण क्रांति में शामिल हुए— जयप्रकाश नारायण और रेणु के साथ। लालू यादव से उनकी प्रगाढ़ता उसी समय हुई होगी। आपातकाल में जेल गए। फिर छूट आए। संपूर्ण क्रांति से मोहभंग हुआ। मोहभंग क्यों हुआ, संपूर्ण क्रांति के समर्थक दलों का वर्ग-चरित्र क्या था— इस सबका प्रभाव नागार्जुन पर जेल में पड़ा होगा। उस दौर में लिखी कविताओं के संकलन का नाम है— 'खिचड़ी विप्लव'।"
इस संग्रह की एक प्रसिद्ध कविता 'जयप्रकाश पर पड़ी लाठियाँ लोकतंत्र की' उस समय के समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण पर केन्द्रित है, जिसमें कवि ने बड़ी बेबाकी से तत्कालीन परिस्थितियों का यथार्थ वर्णन किया है—
"एक और गांधी की हत्या होगी अब क्या?
बर्बरता के भोग चढ़ेगा योगी अब क्या?
पोल खुल गई शासक दल के महामंत्र की!
जयप्रकाश पर पड़ी लाठियाँ लोकतंत्र की!"
नागार्जुन के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए विश्वनाथ त्रिपाठी जी कहते हैं—
"नागार्जुन का कृतित्व ही नहीं, उनका व्यक्तित्व भी कालजयी है। नागार्जुन बुजुर्गों के साथ बुजुर्ग, जवानों के साथ जवान और बच्चों के साथ बच्चे हैं। जिन लोगों ने उन्हें महिलाओं के साथ घुल-मिलकर बातें करते देखा है, वे सूची को और आगे बढ़ाएँगे। अपनी एक कविता में वे कालिदास से जवाब-तलब करते हैं— 'कालिदास सच-सच बतलाना...'। उनका जीवन-अनुभव व्यापक है। कबीरदास की भाँति वे अनेक परस्पर-विरोधी प्रवृत्तियों के समुच्चय हैं। जीवन के प्रति गहरी आसक्ति है। तीव्र सौन्दर्यानुभूति के रचनाकार हैं और इसीलिए गहरी घृणा तथा तिलमिला देने वाले व्यंग्य के सहज कवि। यह सहजता जटिल अंतर्वस्तु का रूप है।"
नागार्जुन की कविता उस तीन-चौथाई हिन्दुस्तान से संबंधित है, जो राष्ट्रीय उत्पादन और विकास की रीढ़ कहा जा सकता है। पर इस देश में कुछ लोग ऐसे हैं, जो पूँजी के बल पर सारे राष्ट्र के भविष्य और वर्तमान पर कुण्डली मारकर बैठ गए हैं। 'धनकुबेरों' की यह जमात भी नागार्जुन की कविताओं में अक्सर दिखाई दे जाती है। इन्हीं की बदौलत समाज में तिकड़म, शोषण, भ्रष्टाचार और प्रदर्शन का नंगा नाच होता है। धर्म और राजनीति इन्हीं के घर दूल्हा-दुल्हन की तरह ब्याहे जाते हैं।
विदिशा लायंस क्लब में उदास मन से कविता-पाठ के लिए जाते हुए रास्ते में बाबा ने कहा था— "जानते हो, ये लायंस और रोटरी क्लब क्या हैं? समाज-सेवा तो सिर्फ बहाना मात्र है। वस्तुतः ये धनपतियों और सरकारी अफसरों के विवाह-मण्डप हैं। विदेशों की चमक-दमक दिखाने के झरोखे हैं।"
नागार्जुन की कविता का प्रथम संसार यही है। गाँव-देश की धरती, वातावरण, पेड़-पौधे, रीति-रिवाज, बोल-चाल— सबसे उनका निकट का रिश्ता है। यात्री होने के बावजूद वे सबको याद रखते हैं। बाहर से जितने बौने और क्षीण से दिखते हैं, भीतर से उतने ही ऊँचे और भाव-संपन्न हैं। उनकी ऊँचाइयाँ देखनी हों तो उन्हें कविता के बीच पाना होगा। कविता ऊर्ध्वगामी है। उसे साधारण चित्त की यात्रा नहीं कहा जा सकता। इस उदारता में सारी धरती समा जाती है। छायावादी कविता अपनी ऊँचाइयों पर पहुँचते ही दिव्य हो जाती है। नागार्जुन की कविता फिर भी पार्थिव बनी रहती है। वह घनघोर लोकधर्मी है। लोक के प्रति उनकी निष्ठा इतनी प्रखर है कि कला और कलागत सौन्दर्य की दुनिया भी कभी-कभी पीछे छूट जाती है।
नागार्जुन की कविता जहाँ भी इन धनकुबेरों को देखती है, फट पड़ती है। उनका उपहास करती है, उन पर फब्तियाँ कसती है। 'यह उन्मत्त प्रदर्शन', 'पैसा चहक रहा है', 'बोला ढाकुरिया का पानी', 'प्लीज़ एक्सक्यूज़ मी' और 'करने आए हैं चहल-कदमी' जैसी कविताएँ इसी वैभव-संसार के रंग-ढंग, रीति-नीति और जीवन-शैली का उद्घाटन करती हैं।
मैथिली में भी नागार्जुन की कविताओं का 'टोन' वही है, जो हिन्दी में। उन दिनों देश आज़ाद हो चुका था और नेताओं के चरित्र भी खुलने लगे थे। सेठ-साहूकारों और महाजनों की बन आई थी। बड़े-बड़े देशी उद्योगपति और धन्नासेठ दोनों हाथों से अपना घर भरने में लग गए थे। 'रामराज' कविता में कवि ने लिखा—
"रामराज में अबकी रावण नंगा होकर नाचा है,
सूरत-शक्ल वही है भैय्या, बदला केवल ढाँचा है।
नेताओं की नीयत बदली, फिर तो अपने ही हाथों
धरती माता के गालों पर कसकर पड़ा तमाचा है।"
सन् 1951 में कुछ दिनों के लिए नागार्जुन ने वर्धा की 'राष्ट्रभाषा प्रचार समिति' में भी काम किया और अपनी आदत के मुताबिक जल्दी ही वापस लौट आए। इलाहाबाद में रहकर स्वतंत्र रूप से अनुवाद और लेखन-कार्य की कोशिश की। इस बीच नागार्जुन उपन्यासों पर भी हाथ आज़माने लगे थे। 'बलचनमा' पहले मैथिली में लिख डाला था, पर वहाँ उसका कोई बाज़ार नहीं था, इसलिए वर्षों तक पड़ा रहा। धीरे-धीरे कवि ने स्वयं उसे हिन्दी में लिखा, यह सोचते हुए कि—
"मैथिली माँ है, मगर उससे पेट नहीं भरता। हिन्दी पेट भरती है, इसीलिए उसे अपना कलेजा नोचकर चढ़ा देता हूँ।"
इन्हीं दिनों नागार्जुन ने काफ़ी बाल-साहित्य लिखा और गुजराती तथा बँगला उपन्यासों के अनुवाद की ओर बढ़े। संस्कृत के 'मेघदूत' का अनुवाद मुक्तछंद में किया, जो धारावाहिक रूप से 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' में प्रकाशित हुआ। 'गीतगोविन्द' का भी अनुवाद किया। शरत्चन्द्र के उपन्यासों में 'ब्राह्मण की बेटी', 'देहाती दुनिया' तथा अन्य कई कृतियों का अनुवाद-कार्य भी किया।
आपके दिए गए पाठ का यथावत शुद्धीकरण (केवल वर्तनी, व्याकरण, विराम-चिह्न एवं स्पष्ट त्रुटियों का सुधार) इस प्रकार है—
नागार्जुन की काव्य-भूमि
नागार्जुन का लेखन श्रमिक जनता की ओर से किया गया वह अश्वमेध है, जिसमें जड़ पुरातनता और वृद्ध-जर्जर सामंतवाद को आहुति देकर जनवादी चेतना की दिग्विजय की घोषणा की गई है। गरीब ब्राह्मण परिवार का यह औघड़ शब्दकर्मी 'ब्रह्मपिशाच' की तरह न अपनी आत्मचेतन विशिष्टता की उधेड़बुन में पड़ा है, न ही अपने को अद्वितीय और असाधारण मानते हुए पंक्ति-समर्पण की कृपालु मुद्रा ही अपना रहा है। टेलीप्रिंटर की तरह जो जनता के मनोभावों के प्रत्येक क्षण को टंकित करता रहा, जिसने अपनी व्यक्ति-पीड़ा को छिपाए रखा और लोक के सुख-दुःख को ही परम सत्य समझा, उसी का नाम नागार्जुन है।
लोक की पीड़ा और सामाजिक क्षोभ ही उसके लेखन के प्रधान अनुभव हैं। पीड़ित मानवता को शोषण और अनाचार के खिलाफ खड़ा करके वह एक प्रतिरोधक मोर्चाबंदी करता है। नकली समाजवाद और छद्म वामपंथ के उस वातावरण में वह ऐसा कैसे कर सका, इसका सबसे बड़ा कारण उसका भारतीय जनता से गहरा सम्पर्क है। सारे प्रगतिशीलों में जो कवि भारतीय जनता के चूल्हे-चौके तक पहुँचा हुआ है, वह वही है। उसको पढ़ते हुए हम अपनी जनता के सीधे सम्पर्क में आते हैं। उसकी सारी जानकारी कानों-सुनी नहीं, आँखों-देखी है। प्रतीक, उपमान और मुहावरे तक जनता से लिए गए हैं। वह किताबों के जरिए जनता को नहीं जानता। जनता के बीच रहकर अपने शब्द की परीक्षा करता है।
साहित्य और राजनीति की मोटी-मोटी किताबें पढ़कर जो लोग प्रगतिशीलता की तलाश यहाँ करेंगे, उन्हें कोफ्त भी होगी और निराशा भी। किन्तु जो ठेठ जीवन-शैली की खोज करते हुए इधर आएँगे, उनके हाथ बहुत कुछ लगेगा। वे यहाँ उत्साह और उमंग से परिपूर्ण संघर्ष भी पा सकेंगे और चाँदनी रातों को आम के बगीचों में होने वाला स्वस्थ अभिसार भी। प्रगतिशीलता अगर सिर्फ राजनीतिक दृष्टि नहीं है, तो उसकी सर्वतोमुखी प्रतिष्ठा का साहित्य नागार्जुन जैसे विज्ञ लोग ही लिख सके हैं।
प्रकृति, नारी, सौन्दर्य, यौवन और प्रणय के अनुभव भी यहाँ हमें मिलते हैं। पर इसे पढ़ते हुए हमारी दृष्टि लोलुपता के अंजन से अंजित होने के बजाय स्वस्थ रस-बोध से तृप्त हो उठेगी। सौन्दर्य की एक समग्रदर्शी कवि-भावना हमारी चेतना को क्षुद्र आकर्षणों से ऊपर उठाकर भारतीय सौन्दर्य-बोध के उन उच्चतम शिखरों की ओर ले जाएगी, जहाँ रूप की ऊपरी पर्त गुण और स्वभाव की गहरी तथा बारीक छननी में छनकर सहज, संतुलित और मर्यादित हो उठती है।
नागार्जुन नए और पुराने समस्त प्रगतिशीलों में सबसे अधिक संवेदनशील लोकोन्मुख कवि रहे हैं। भारतीय आबादी के जितने स्तरों और रूपों का पता उन्हें है, उतना इस युग में शायद किसी दूसरे को नहीं। दरिद्र किन्तु ब्राह्मण परिवार के सदस्य होने के नाते अपने युग के सामंतों, जागीरदारों से लेकर मध्य जातियों और गरीबी की रेखा को परिभाषित करने वाली जातियों के सम्पर्क की भी सुविधा उन्हें मिली। काशी की विद्वान मंडली और पंडे-पुरोहितों ने उन्हें इसलिए आत्मीयता दी कि वे दरभंगा के मैथिल पं. वैद्यनाथ मिश्र हैं और परम्परागत अर्थों में साहित्याचार्य भी। इसी काशी में नागार्जुन गरीब छात्रों, विधवाओं और उन रिक्शा-इक्का वालों के भी सम्पर्क में आए, जो सामंती और पूँजीवादी समाज-व्यवस्था के शिकार रहे हैं।
यात्री एवं साहित्यकार और सबसे बड़ी बात कि एक संवेदनशील रचनाकार के नाते भी नागार्जुन का एक पाँव कस्बों में ही रहा है तथा दूसरा महानगरों में। महानगर उन्हें लुभा नहीं पाता और कस्बा उन्हें निराश नहीं करता। महानगरों में वे कनॉट प्लेस और चौरंगी के बजाय उन सीलन-भरी बस्तियों में रहते थे, जहाँ आज छोटे-मोटे दुकानदार, ट्यूशनिस्ट अध्यापक, विज्ञापन की खोज में आती-जाती रोजगार खोजती युवतियाँ, कल-कारखानों में काम करने वाले मजदूर तथा कार्यालयों में माथापच्ची करने वाले बाबू रहा करते थे। नागार्जुन यहाँ एक सदस्य की हैसियत से आते-जाते रहते थे। पटना, इलाहाबाद, सागर, विदिशा या तरौनी गाँव, अथवा केदारनाथ अग्रवाल का बाँदा— सब उनके आकर्षण के केन्द्र रहे हैं। घुमंतू स्वभाव ही उन्हें श्रीलंका और तिब्बत भी ले गया। वही उन्हें एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक, एक अनुभव से दूसरे अनुभव तक भी ले जाता है। इसीलिए जन-जीवन की जितनी पकड़ नागार्जुन को है, उतनी केदारनाथ और त्रिलोचन को भी नहीं।
शोषित और पीड़ित वर्गों के प्रति कवि की सहानुभूति कृत्रिम नहीं है। उनका जन्म नितांत दरिद्र कुल में हुआ। गरीबी के कारण स्कूल-कॉलेज का मुँह नहीं देखा। मूर्ख रह जाने की विभीषिका ने संस्कृत पढ़ने के विकल्प को स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। आज भी उनका कोई निश्चित काम नहीं है। फिर फटीचरी ही मानो नागार्जुन की जीवन-सहचरी है। अपनी मैथिली रचनाओं के कुछ रूपान्तर वे इस संकलन में डालना चाहते थे, परन्तु पुस्तक का कलेवर ज्यादा न फूलाने का हमारा मनोभाव जानकर कवि इस ओर से निर्लिप्त हो गए हैं। दूसरे संकलन में उनकी मैथिली रचनाओं का रूपान्तर पर्याप्त मात्रा में संकलित है।
नागार्जुन के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए विश्वनाथ त्रिपाठी जी कहते हैं— "नागार्जुन का कृतित्व ही नहीं, उनका व्यक्तित्व भी कालजयी है। नागार्जुन बुजुर्गों के साथ बुजुर्ग, जवानों के साथ जवान और बच्चों के साथ बच्चे हैं। जिन लोगों ने उन्हें महिलाओं के साथ घुल-मिलकर बातें करते देखा है, वे सूची को और आगे बढ़ाएँगे। अपनी एक कविता में वे कालिदास से जवाब-तलब करते हैं— 'कालिदास सच-सच बतलाना....' उनका जीवन-अनुभव व्यापक है। कबीरदास की भाँति वे अनेक परस्पर-विरोधी प्रवृत्तियों के समुच्चय हैं। जीवन के प्रति गहरी आसक्ति है। तीव्र सौन्दर्यानुभूति के रचनाकार हैं और इसीलिए गहरी घृणा तथा तिलमिला देने वाले व्यंग्य के सहज कवि हैं। यह सहजता जटिल अंतर्वस्तु का रूप है।"
नागार्जुन एवं उनकी कविता के संबंध में डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी जी ने अपनी पुस्तक 'हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास' में लिखा है— "प्रगतिवादी कवियों में नागार्जुन बहुचर्चित हैं। स्वाधीनता संग्राम के दिनों में जैसे अनेक प्रकार के राष्ट्रगान, प्रभाती और उद्बोधन-गीत मुखर शैली में लिखे गए थे, वैसे ही स्वतंत्र भारत के विविध आंदोलनों के लिए गीत और कविताएँ नागार्जुन ने लिखी हैं। उन गानों में निष्ठा अधिक थी, इन कविताओं में व्यंग्य अधिक है, जो सटीक तुकों के प्रयोग से और पैना हो जाता है। आंदोलनों के वैविध्य और बदलते स्वरूप से कवि की आस्था में भी परिवर्तन आते गए हैं— गांधी, मार्क्स, विनोबा, जयप्रकाश अलग-अलग समयों में कवि के नायक रहे। इन आंदोलन-मूलक कविताओं के अतिरिक्त सामान्य जन-जीवन को अंकित करने वाली कुछ कोमल और कुछ तीखी रचनाएँ भी नागार्जुन ने लिखी हैं, जो एक प्रकार से आधुनिक हिन्दी कविता में प्रगतिवाद का रेखांकन मानी जा सकती हैं।"
नागार्जुन की कविताओं को पढ़-सुनकर कोई भी सहज ही आज़ादी के आर-पार के भारतीय जन-इतिहास से परिचित हो सकता है। ये इस देश के मनुष्यों की सम्पूर्ण गतिविधियों में शरीक रचनाएँ हैं। एक ऐसे रचनाकार की रचनाएँ, जो हमेशा अपने समय, उस समय के बीच घटती सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक घटनाओं तथा हादसों के रू-ब-रू खड़ा है। उनकी नज़र से कोई चीज़ छूटती नहीं।
नागार्जुन मुकम्मिल कवि हैं, जीवन की समग्रता के कवि, बेहद गहरे राग के कवि हैं। आदमी और आदमीयत की उच्चतर भावनाओं के चितेरे हैं। भाषा और रचना-शिल्प के वैविध्य में भी नागार्जुन की कविता मानक कविता है। इतनी जीवंत, अनेकरूपा और व्यंजक भाषा तथा छंदों की जितनी समृद्ध दुनिया उनके काव्यलोक में है, अन्यत्र कम ही मिलेगी। आधुनिक कवियों में केवल निराला ही नागार्जुन की कवि-प्रतिभा के बरक्स अपनी छाप मन पर छोड़ते हैं। जनकवि तो वे हैं ही— जनधर्मिता की मिसाल है उनकी कविता।
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