पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’: संक्षिप्त जीवनी



पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र' का जन्म विक्रमी संवत् 1957 (सन् 1900 ई.) की पौष शुक्ल अष्टमी की रात्रि साढ़े आठ बजे उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले की चुनार तहसील के सद्दूपुर नामक मुहल्ले में हुआ था। इनके पिता श्री बैजनाथ पाण्डेय, कौशिक गोत्रोत्पन्न सरयूपारीण ब्राह्मण थे।

इनके पिता श्री बैजनाथ पाण्डेय बड़े तेजस्वी, सात्त्विक तथा वैष्णव हृदय के व्यक्ति थे। उनकी आजीविका मुख्यतः पूजा-पाठ द्वारा चलती थी। पूर्वजों से प्राप्त सम्मानित प्रतिष्ठा के कारण गाँव में सभी लोग उनका आदर-सम्मान करते थे।

'उग्र' के प्रपितामह श्री सुदर्शन पाण्डेय सिद्धपुरुष थे। उनके सिद्धिबल से प्रभावित होकर काशी नरेश ने उन्हें 108 बीघा भूमि, जिसमें चार कुएँ तथा दो आम के बाग सम्मिलित थे, दान स्वरूप प्रदान की थी। इनके पितामह श्री हरसू पाण्डेय एक राजा के यहाँ राजपुरोहित थे।

इनकी माता का नाम जयकली था। वे अत्यन्त उग्र, कराल तथा क्षत्राणी स्वभाव की महिला थीं। परम क्रोधिनी होने के साथ-साथ वे अत्यन्त भोली एवं सरल भी थीं। वे अत्यधिक परिश्रमी थीं। अतः 'उग्र' को जो उग्रता और निर्भीकता प्राप्त हुई, वह उन्हें अपनी माता से संस्कार रूप में मिली थी।

'उग्र' के बहन-भाइयों की संख्या एक दर्जन तक पहुँची, परन्तु उनमें से अधिकांश उत्पन्न होते ही अथवा वर्ष-दो वर्ष के होते-होते ईश्वर को प्यारे हो गए। पहले भाइयों के नाम उमाचरण, देवीचरण, श्रीचरण, श्यामचरण, रामचरण आदि थे। बच्चों की अकाल मृत्यु से भयभीत होने के कारण 'उग्र' के जन्म पर थाली तक नहीं बजाई गई और जन्मते ही उन्हें बेच दिया गया।

स्वयं उपन्यासकार 'उग्र' ने कहा है— "सो, जन्मते ही मुझे यारों ने बेच डाला, और किसी कीमत पर? महज टके पर एक। उसका भी गुड़ मँगाकर मेरी माँ ने खा लिया था। अपने पहले उस टके में से एक छदाम भी नहीं पड़ा था, जो मेरे जीवन का संपूर्ण दाम था।"

'उग्र' का 'बेचन' नाम जन्मते ही बिकने का सूचक है। यह नाम उत्तर भारत के पूर्वी जिलों में प्रचलित था तथा अहीरों, कोरियों आदि निम्नवर्गीय जातियों में अधिक पाया जाता था। ब्राह्मण वंश में जन्म लेने पर भी इनके परिवार वालों ने यह साधारण नाम इन्हें इसलिए प्रदान किया कि ये अकाल मृत्यु का ग्रास न बनें। "यह नाम तिलस्मी गंडा बना और 67 वर्ष तक ये जीवन-संग्राम के योद्धा बने रहे। काल को इनका मन्द नाम पसन्द न आया और ये उसका ग्रास बनने से बचते रहे।"

उग्र के आरम्भिक जीवन, व्यक्तित्व और साहित्य पर उनके बड़े तथा मँझले भाइयों का पर्याप्त प्रभाव पड़ा। बालक बेचन केवल दो वर्ष छह माह के थे कि उनके पिता का देहान्त हो गया। उनके मँझले भाई पितामरण के कुछ ही दिनों बाद बड़े भाई तथा भाभी से झगड़कर अयोध्या चले गए और साधु बनकर मण्डलियों में अभिनय करने लगे।

बड़े भाई ने अपनी पत्नी और माता के आभूषण जुआ-यज्ञ में स्वाहा कर दिए तथा घर के बर्तन-भाँड़ों तक को बेच डाला। इस सम्बन्ध में वे लिखते हैं— "जब भी मेरे घर में जुआ जमता, भाई की आज्ञा से दरवाजे पर बैठकर मैं गली के दोनों नाके ताड़ता रहता कि पुलिस वाले तो नहीं आ रहे हैं। अवश्य ही इस ड्यूटी के बदले पैसा-दो-पैसा मुझे भी किसी परिचित जुआरी से मिलता रहा होगा।"

उग्र के बड़े भाई घोर पियक्कड़ तथा वेश्यागामी थे। उनका प्रभाव बालक बेचन के संस्कारों पर इतना अधिक पड़ा कि वे अपने जीवन तथा साहित्य में इन बुराइयों को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से उतारे बिना न रह सके।

इनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था, जहाँ निर्धनता ने अपना साम्राज्य स्थापित कर रखा था। आय के साधन अत्यन्त सीमित थे, जिससे पेट भर भोजन भी नहीं मिल पाता था। बड़ी कठिनाई से यदि प्रातः भोजन मिलता, तो रात्रि को व्रत रखना पड़ता। ऐसी स्थिति में उनकी शिक्षा-दीक्षा का प्रश्न ही नहीं उठता था।

आँख खोलते ही जीवन-ग्रन्थ का जो पृष्ठ उन्हें देखने को मिला, वह शिक्षा-दीक्षा को चौपट करने वाला था। उसी से वे जीवन के कटु यथार्थ की ओर अधिक आकर्षित हुए और उसकी खोज में दूर, बहुत दूर तक निकल गए। उनका साहित्यिक दृष्टिकोण भी घोर यथार्थवादी बना। नरक बुरा होने पर भी उनका प्रिय जीवन-संगी बन गया।

"इस प्रकार कथाकार ब्राह्मण-वंश में जन्म लेकर भी ब्राह्मण-ब्राह्मणियों की अपेक्षा शूद्र-शूद्राणियों की ओर अधिक आकृष्ट रहा और शूद्र, खानाबदोश एवं बंजारे उसे अपने अंग से प्रतीत होते रहे।"

जिस समय बालक को वात्सल्य, समुचित शिक्षा और नैतिक वातावरण की आवश्यकता होती है, उस समय 'उग्र' इनसे नितान्त रहित होकर अभावों और विपन्नताओं का जीवन व्यतीत कर रहे थे। "जीवन को स्वर्ग और नरक दोनों ही का सम्मिश्रण कहा जाए तो मैंने नरक के आकर्षक सिरे से जीवन दर्शन आरम्भ किया और बहुत देर, बहुत दूर तक उसी राह चलता रहा। इस बीच में स्वर्ग की केवल सुनता ही रहा मैं।" 'उग्र' के ये शब्द उनके बचपन का यथार्थ चित्रण उपस्थित करते हैं। उनके साहित्य में नाटकीयता का जो अपूर्व सौष्ठव मिलता है, उसका मूलस्रोत उनका वह जीवन है, जिसमें वह रामलीला मण्डलियों के साथ वर्षों घूमते रहे और समय-समय पर कई प्रकार का अभिनय भी करते रहे। इनके दो बड़े भाई पहले से ही रामलीला में अभिनय करते थे।

अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् 'उग्र' विजयदशमी के अवसर पर होने वाली रामलीला में कोई न कोई भूमिका निभाया करते थे। भाई के कहने पर इन्होंने एक-दो बार सीता का अभिनय किया। जब 'उग्र' के भाई अयोध्या की रामलीला मण्डली में थे, तब उन्होंने इनको बनारस की मण्डली में अपने किसी मित्र के संरक्षण में छोड़ दिया। इस समय इनकी अवस्था आठ या नौ वर्ष की थी। कुछ समय पश्चात् इनके भाई ने इन्हें अयोध्या की मण्डली में बुला लिया। यहाँ इन्हें आठ-दस रुपये मासिक पर लक्ष्मण और जानकी का अभिनय करने का काम दिया गया। रामलीला के विभिन्न पात्रों के संवाद कंठस्थ करने के अतिरिक्त वे एक वैरागी पखावजी से संगीत भी सीखा करते थे। रामलीला के दिनों में ही 'उग्र' का परिचय श्रीरामचरितमानस से हुआ और इन्हीं दिनों में ही इन्होंने सुलझे हुए साधुओं को निष्ठापूर्वक रामायण का पारायण करते हुए देखा। 'उग्र' का रामायण-अनुराग इतना प्रगाढ़ हुआ कि इस ग्रन्थ के विविध अंश इन्होंने कंठस्थ कर लिए। "रामलीला मण्डलियों से सम्बन्धित जीवन का यदि कोई सुखद प्रभाव 'उग्र' पर पड़ा तो वह यह था कि उनका जीवन दर्शन रामायण में वर्णित आदर्शों से पर्याप्त रूप से प्रभावित हुआ।" वे राम, तुलसी और तुलसी की कृतियों, विशेषकर रामचरितमानस और विनय पत्रिका के अनन्य प्रशंसक बन गए। इन रचनाओं के अनेक उद्धरण उनकी कृतियों में यत्र-तत्र दृष्टिगोचर होते हैं।

बेचन पाण्डेय को रामलीलाओं की ओर प्रेरित करने वाली घरेलू परिस्थितियाँ ही थीं, परन्तु समयानुसार इनकी अपनी चित्तवृत्तियाँ भी इस कार्य में रमने लगीं और ये विभिन्न रामलीला-मण्डलियों में भरत, लक्ष्मण, सीता आदि के अभिनय बड़े मनोयोग से करते रहे। 'उग्र' अपने दूसरे भाई के साथ महन्त राममनोहर दास की रामलीला मण्डली में कार्य करने लगे। इस मण्डली में इन्होंने अलीगढ़, दलीपपुर, फैज़ाबाद, प्रतापगढ़, मेरठ, दिल्ली, कटनी आदि स्थानों का भ्रमण किया। "विभिन्न स्थानों में लक्ष्मण और सीता की भूमिका करते और सहस्र जनों से अपने पैरों की अर्चना करवाते।" उस समय लोग ऐसी धार्मिक भूमिकाएँ करने वालों को ही भगवान् समझ बैठते थे, लेकिन वे रामलीला मण्डली के सदस्यों से परिचित नहीं थे। परन्तु चौबीस घण्टे इस मण्डली में रहने वाले 'उग्र' ने जो-जो कुकृत्य देखे, उसका वर्णन अपने अधिकतर उपन्यासों में कर चुके हैं। जब इनकी आयु 11-12 वर्ष के लगभग थी तो ये मण्डली के विलास-जाल के कुप्रभाव में आने लगे। महन्त राममनोहर दास की राम मण्डली पाप लोलुप कार्यों में लिप्त थी। "महन्त किसी न किसी लड़के पर रीझकर उसी के साथ रात्रि व्यतीत करते।" बेचन शर्मा इन कुकृत्यों से बचे रहे, क्योंकि वे अपने दो हट्टे-कट्टे भाइयों के संरक्षण में थे। 'अपनी खबर' में उग्र ने लिखा है - "लीलाधारी लोग स्वरूपों के साथ अनैतिक कार्य भी अवसर मिलने पर किया करते थे। मण्डली के अन्य लोग जैसे अधिकारी, भण्डारी, श्रृंगारी और लीलाधारी भी इन छोकरों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार करते।" उग्र अपने विषय में लिखते हैं - "अपने तेजस्वी भाइयों के कारण ये मेरा कुछ न बिगाड़ सके।" राममनोहर दास की मण्डली पाप कृत्यों से भरी पड़ी थी। इस राम मण्डली में 'उग्र' का पहला और अंतिम प्रेम पनपा। ये एक सत्रह वर्षीया सुन्दरी अभिरामा श्यामा पर मोहित हो गए। वह विवाहिता थी और रामलीला देखने के लिए प्रायः आती थी। उग्र स्टेज पर अपनी भूमिका निभाते हुए इन्हें निहारा करते थे। इनका प्रेम वासना न होकर केवल भावनात्मक था, लेकिन राममनोहर मण्डली ने इस सुन्दरी के साथ व्यभिचार करके इसे यौन रोग से ग्रसित कर दिया। संयोगवश उन्हीं दिनों उसका पति आ गया और उसे समझते देर न लगी। पति ने उत्तेजित होकर उसका अंग-अंग दाग दिया और वह चिकित्सालय में लाई जाने पर भी बच न सकी, उसने दम तोड़ दिया। इस घटना का आतंक उग्र के मानसपटल पर ऐसा पड़ा कि इनकी प्रत्येक कहानी एवं उपन्यास में नारी की भूमिका में श्यामा की प्रतिछाया दिखाई पड़ती है। इस दुःखद प्रसंग के बारे में उग्र ने स्वयं लिखा है - "मेरा प्रथम और अन्तिम प्रेम भी वही था।" 12 वर्ष की आयु में घटी इस घटना ने उग्र की विचारधारा को नया मोड़ दिया। रामलीला मण्डली से इनका जी उचाट हो गया और वापिस चुनार आ गए।

चुनार आने के पश्चात् उनके पुत्रहीन चाचा ने उन्हें विधिवत् गोद लिया। 14 वर्ष की आयु में ये चुनार के चर्च स्कूल में तृतीय श्रेणी में पढ़ने लगे। अभी ये छठी कक्षा में पहुँचे ही थे कि इनकी चाची ने एक सुन्दर बालक को जन्म दिया, जिससे इनके चाचा-चाची के प्यार में कटुता आ गई। विधि-विहीन दत्तक पुत्र बनने के कारण उसे पुनः कठोर धरती पर पटक दिया गया। उसके चाचा-चाची परिवार सहित काशी चले गए और उसे पुनः कसाई समान क्रूर बड़े भाई के चरणों में आना पड़ा। शिक्षा, खान-पान आदि की कठिनाइयाँ उसे सताने लगीं और वह विचित्र संकट में फँस गया। इन्हें जो उग्रता अपनी माता के संस्कारों के रूप में प्राप्त हुई थी, उसी ने विद्यार्थी जीवन तथा साहित्यिक जीवन में विस्तार पाया। छठी कक्षा में अध्ययन करते समय वह उग्रता प्रथम बार एक भयानक रूप में प्रस्फुटित हुई। "उनके एक अध्यापक थे मौलवी लियाकत अली, जो उर्दू-फारसी आदि पढ़ाया करते थे। मौलवी के विचार हिन्दू-विरोधी थे और अध्यापन के समय वे ऐसी बातें कह जाया करते थे, जिनसे हिन्दू विद्यार्थियों की भावनाओं को ठेस पहुँचती थी।" एक दिन मौलवी ने विद्यार्थियों से कहा - "हिन्दुओं के देवता मेरे पाजामें में बंद रहते हैं।" यह सुनकर अनेक हिन्दू-छात्रों में विद्रोह की अग्नि भड़क उठी। सभी ने इन मौलवी को सबक सिखाने की ठानी। लेकिन पहल कौन करे? उग्र पढ़ने से बचना चाहते थे, इसलिए यह मुसीबत अपने ऊपर ले ली और प्रिंसिपल को तार अपने नाम से भिजवा दिया - "मौलवी लियाकत अली, मिशन टीचर, इन्सल्ट्स आवर रिलीजियस फीलिंग्स, नो सैटिस्फैक्टरी इन्क्वायरी बेचन पाण्डे।" तार पाते ही मुख्याध्यापक तुरन्त स्कूल पहुँचे, लेकिन भय से उस दिन उग्र अनुपस्थित रहे, जिसके कारण इनका नाम स्कूल से काट दिया गया और मौलवी की भी कठोर भर्त्सना की गई। इस प्रकार चुनार के स्कूल से इनकी शिक्षा खत्म हो गई।

पुनः उग्र काशी की शरण में गए। इन्होंने यहीं पढ़ने की प्रार्थना की। चाचा ने इन पर कृपा करके इन्हें बनारस के विख्यात हिन्दू कॉलेजिएट स्कूल की छठी कक्षा में प्रवेश दिलवा दिया। प्रधान अध्यापक काली प्रसन्न चक्रवर्ती की इन पर असीम कृपा थी, जिनकी शरण में इन्होंने छठी, सातवीं कक्षा उत्तीर्ण की, लेकिन इनके चाचा ने इन्हें अपने से अलग कर दिया। तब काली प्रसन्न चक्रवर्ती ने काशी के बाबू शिवप्रसाद जी के नाम एक पत्र लिखकर भेजा, जिससे उग्र की शिक्षा, खान-पान, रहने की निःशुल्क व्यवस्था हो गई। एक वर्ष तक ये सभी सुविधाओं को प्राप्त करते रहे, लेकिन अपने उग्र स्वभाव को न बदल सके, जिसके कारण दोबारा इनकी शिक्षा रूक गई। ये वार्षिक परीक्षा में फेल हो गए और वापिस चुनार आ गए। इनकी शिक्षा यहीं तक सीमित थी।

उग्र जी के उग्र स्वभाव को सर्वाधिक उत्तेजना उनके बड़े भाई के अनुचित एवं अनैतिक आचरण ने ही दी, वह उस कसाई के समान थे जो कभी सन्तुष्ट नहीं होता। इसी से बेचन को अपना घर संसार का सबसे बड़ा कारावास लगता था। बड़े भैया की अनुपस्थिति में दस रुपये का नोट हाथ लगते ही ये धोती-कमीज पहने, एक अंगोछा लिए घर से भागकर कलकत्ता चले गए। कलकत्ता में जिन विश्वनाथ त्रिपाठी (पड़ोसी भाई) से मिलना था, वे चुनार के लिए रवाना हो चुके थे। एक सप्ताह के बाद श्री विश्वनाथ कलकत्ता आ गए। उन्हीं की कृपा से इन्हें आर. एल. बर्मन कम्पनी में एक रुपया प्रतिदिन की नौकरी मिली। अभी महीना खत्म भी न हुआ था कि बड़े भाई का चुनार पहुँचने के लिए पत्र आ गया और इन्हें बिना सूचना दिए चुनार जाना पड़ा, जिसके कारण इन्हें पूरे महीने का वेतन भी न मिला। यह इनके जीवन की पहली और अन्तिम नौकरी थी। चुनार आकर इन्होंने साहित्य-सृजन को अपना लक्ष्य बनाया। आर. एल. बर्मन कम्पनी में नौकरी करते वक्त इनका राजनीतिज्ञों से भी वास्ता पड़ता था। घुमक्कड़ प्रवृत्ति होने के कारण इन्होंने कटु यथार्थ देखे और अनुभव किए। ये वाराणसी, कलकत्ता, बम्बई, इन्दौर, दिल्ली आदि महानगरों में घूमे तथा स्वस्थ एवं अस्वस्थ जीवन को अपनी रचनाओं में प्रतिपादित किया।

"बेचन की पहली रचना 'ध्रुवधारणा' नामक खण्डकाव्य थी।" पाण्डुलिपि का संशोधन लाला भगवानदीन ने किया। 'अपनी खबर' आत्मकथा में उग्र लिखते हैं, "मुझमें यदि कुछ प्रतिभा थी तो उसे लालाजी के मात्र आशीर्वाद का पोष प्राप्त हुआ। पढ़ा वह मुझे न पाये।" "दूसरी कृति थी 'महात्मा ईसा' जिसका संशोधन लालाजी ने किया और पुनर्वाचन प्रेमचन्द ने।" इस युग के साहित्यकारों में ईर्ष्या की भावना न होकर सद्भावना थी, जिसके तहत ये एक-दूसरे की सहायता करते रहते। उग्र को भी अनेक साहित्यकारों ने सराहा एवं इनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। अपनी आत्मकथा में 'उग्र' लिखते हैं - "पहले सौ में से सौ साहित्यकार ऐसे होते थे जो कहीं ज़रा भी प्रतिभा, ज़रा भी प्रसाद देखते ही उसका यथोचित आदर करते थे। आज जैसे वह चली ही गई है।"

उग्र का साहित्यिक जीवन सन् 1920 से प्रारम्भ होता है। इन्होंने शहीद मैक्स्विनी पर एक लम्बी कविता लिखी, जो कि 'आज' में प्रकाशित हुई। 'आज' में प्रकाशित होने वाली यह पहली कविता थी। इसके कुछ दिन पश्चात् ही 'उग्र' की पहली कहानी 'गांधी आश्रम' आज में छपी। 'आज' में कार्यरत बाबूराव विष्णु पराड़कर जी ने उग्र के लेखन कार्य को हर प्रकार से प्रोत्साहित किया। "पराड़कर जी के विषय में भी उग्र कह चुके हैं कि उनकी साहित्य के प्रति रुचि जगाने में पराड़कर जी की अहम भूमिका रही है।" कई वर्षों तक लिखते रहने से इनकी लेखनी में परिपक्वता आ गई थी। 'आज' के द्वारा ही इन्हें बनारस एवं सम्पूर्ण उत्तरप्रदेश में ख्याति प्राप्त हुई।

सन् 1921 से उग्र का साहित्यिक एवं पत्रकारिता का जीवन प्रारम्भ हुआ। इनके जीवन में गांधी जी के व्यक्तित्व का प्रभाव दिखता है। उग्र ने अनेक बार गांधी के भाषणों को सुना और उनसे प्रभावित भी हुए। अपनी रचनाओं में देश की विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए गांधीवादी सुझावों का प्रतिपादन किया। इनके लिए सन् 1927 से 1929 तक के वर्ष विवादास्पद और कोलाहलकारी रहे। इन्हीं वर्षों में ये 'मतवाला' के साथ जुड़े एवं कुछ विवादास्पद रचनाओं का निर्माण भी इसी दौरान हुआ, जैसे- 'चॉकलेट', 'दिल्ली का दलाल', 'बुधुआ की बेटी' आदि। इसमें 'चॉकलेट' कहानी संग्रह पर जितना बवंडर उठा, शायद इतना किसी और साहित्यिक रचना पर हुआ हो। चॉकलेट के विरुद्ध 'घासलेट आन्दोलन' चला। महात्मा गांधी ने 'चॉकलेट' को अनेक बार पढ़ा एवं सराहा, लेकिन आलोचकों ने इन्हें मानसिक पीड़ा पहुँचाई, जिससे ये विरक्त हो गए। उग्र के शब्दों में - "मैंने सोचा - परे करो इस हिन्दी को। चरने दो उन्हें, चरा रही है मेरी चर्चा, चलो बम्बई चलो।"

जब इनका साहित्य से जी उचाट हो गया, तब ये फिल्मी दुनिया से जुड़ गए और सन् 1930 से 1938 तक फिल्मों में लेखन का कार्य करते रहे। फिल्म निर्माता, निर्देशक इनके पास आते और इनसे कहानी, संवाद, गीत लिखवा ले जाते। "राम विलास, सजीव मूर्ति, पतित पावन, अहिल्योद्धार, राधामोहन, जन्म के लाल आदि चित्र इन्हीं की लेखनी से उतरे थे।" सिनेमा जगत् में रहते हुए इन्होंने कहानी, संवाद और गीत लेखक की हैसियत से जीवनयापन किया। जीवन के कटु सत्य एवं सिनेमा जगत् के घृणित कृत्य और खोखलेपन को इन्होंने बड़ी निकटता से देखा। साहित्य के प्रति पुनः इनका रुझान सन् 1938 में जागृत हुआ, जब ये इन्दौर में थे। वहाँ रहकर इन्होंने अपनी रचनाओं द्वारा सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक जीवन की विद्रूपताओं का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत किया। जितने साल ये फिल्मी दुनिया में रहे, उतने साल ये साहित्यिक दुनिया से कटे रहे। यह हिन्दी का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा। सन् 1929 से 1938 के बीच इनके दो उपन्यास 'शराबी' और 'सरकार तुम्हारी आँखों में' मिले। सन् 1945 में वे पुनः बम्बई चले गए और भारत स्वतन्त्र होने तक वहीं रहे। सन् 1950-53 तक ये कलकत्ता रहे एवं अनेक घृणित कृत्य देखे। इन्होंने अपने उपन्यासों में कलकत्ता को 'भोग भरी रखेली' भी कहा है। जब इनका मन यहाँ से भी उचाट हो गया, तब ये दिल्ली चले गए और यहाँ आकर 'कढ़ी में कोयला' और 'फागुन के दिन चार' उपन्यास लिखे।

सन् 1953 में जब ये दिल्ली आए थे, तब ये पंजाबी बस्ती, सब्ज़ी मण्डी में रहे। उग्र अपनी रचनाओं के स्वयं प्रकाशक भी बने। इन्होंने 'उग्र प्रकाशन' की स्थापना की और इस सम्बन्ध में अपनी कटु अनुभूतियों को बताते हुए कहा - "ये पंक्तियाँ लिखते समय मेरी उम्र 54 वर्ष चार महीने और चार दिन है। मैं तो ढीठ या निर्लज्ज या क्रूर या उग्र होने से अभी भी तगड़ा हूँ, नहीं तो मेरे बराबर वाले अनेक मित्र न जाने कभी के निज कर्मानुसार नरक या स्वर्ग की राह लग गए, लेकिन मैं आपसे पूछूँ कि इस अर्थ युग में, ऐसी आर्थिक दुर्व्यवस्था में मेरे जैसे कटु-कषाय उग्र यदि कुछ दिनों के लिए, खुदा न करे, बीमार पड़ जाएँ या कलम घिसकर चना-चबेना जुटाने में असमर्थ हो जाएँ तो क्या होगा? ...अस्तु अब सिवा इसके कि मैं सारी पुस्तकें स्वयं छाप लूँ और बिक्री का प्रबन्ध करूँ, मेरे लिए दूसरा कोई चारा नहीं।" सन् 1957 से ये यमुना पार कृष्णनगर में रहने लगे। वहाँ इन्होंने 'हिन्दी पंच' पत्र का सम्पादन किया। 23 मार्च 1967 को प्रातः 3 बजे इन्होंने अपने जीवन की अन्तिम साँस ली। उग्र पुरानी पीढ़ी के विशिष्ट लेखक रहे एवं अपनी कलम के माध्यम से समाज के सड़े-गले रूप को चित्रित किया। ये जीवन भर उपेक्षित रहे और अन्तिम समय में भी इन्हें उपेक्षा ही मिली। डॉ. प्रभाकर माचवे के कथनानुसार - "उनके शव के साथ बीस-पच्चीस साहित्यकार, मुहल्ले के थोड़े से लोग एवं नए-पुराने कुछ ही पत्रकार उपस्थित थे। विश्वविद्यालय, हड़ताली अखबारों आदि से कोई न गया। यह कैसी दिल्ली है? पैंतीस लाख में दो तिहाई तो हिन्दी भाषी होंगे और श्मशान में पच्चीस-तीस लेखक, चार प्रकाशक और उतने ही लोग।"

उग्र जी का साहित्यिक अवदान

उग्र ने साहित्य की अनेक विधाएँ - कहानियाँ, उपन्यास, एकांकी, नाटक, संस्मरण लिखकर हिन्दी साहित्य को सम्पन्न किया, जिनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है:

कहानियाँ:

  • पोली इमारत: इसमें 'चूनरी के साथ', 'चौड़ा छुरा', 'उरूज', 'आजादी के आठ दिन पहले', 'मूर्खा', 'वीभत्स', 'जल्लाद', 'बदमाश', 'आँखों में आँसू', 'जुआरी', 'बाजरा', 'दूध के कार्ड', 'नौ हजार नौ सौ निन्यानवे', 'समाज के चरण', 'ब्राह्मण के चरण', 'ब्राह्मण द्रोही', 'घोड़े की जीवनी', 'पोली इमारत' आदि बीस कहानियों को संग्रहीत किया गया है।

  • चित्र-विचित्र: इसमें 'पिशाची', 'ब्लैक एण्ड व्हाइट', 'जब सारा आलम रोता है', 'मूसल ब्रह्म', 'गंगा गंगदत्त और गांगी', 'सोसायटी ऑफ डेविल्स', 'काने का ब्याह', 'मूर्खों का मीना बाजार', 'सनकी अमीर', 'प्राइवेट इंटरव्यू', 'न्यूज़रूल', 'कम्युनिस्ट दरवाजे पर', 'चित्र-विचित्र' नामक 13 कहानियाँ हैं।

  • यह कंचन सी काया: इसमें 12 कहानियाँ हैं - 'कला का पुरस्कार', 'चाँदनी', 'मलंग', 'दितवारिया', 'प्रस्ताव स्वीकार', 'करुण कहानी', 'हत्यारा समाज', 'स्वदेश के लिए', 'संगीत समाधि', 'सुधारक' और 'कंचन सी काया'।

  • कालकोठरी: इसमें चौदह कहानियां हैं - 'पंजाब की महारानी', 'देशद्रोह', 'रेन ऑफ टेरर', 'एक भीषण स्मृति', 'सिख सरदार', 'प्यारी पताका', 'पागल', 'कर्तव्य और प्रेम', 'वीर कन्या', 'पत्रिका पताका', 'नादिरशाही', 'निहिलिस्ट', 'भीष्म संतोष' और 'काल कोठरी'।

  • ऐसी होली खेलो लाल: इसमें चौदह कहानियाँ हैं - 'उसकी माँ', 'टॉम डिक, हैरी एण्ड कम्पनी लिमिटेड', 'मेरी माँ', 'दिल्ली की बात', 'दोज़ख नरक', 'ईश्वर द्रोही', 'खुदा के सामने', 'शाप', 'खुदाराम', 'नागा परसिंहदास', 'वह दिन', 'माँ कैसे मरी', 'जैतू में' और 'ऐसी होली खेलो लाल' आदि।

  • मुक्ता: इस संग्रह में 'प्रार्थना', 'रिसर्च', 'भ्रम', 'मुक्ता', 'टीला और गड्ढा', 'दोज़ख की आग', 'नेता का स्थान', 'देशभक्त', 'रेशमी', 'लाइन पर', 'फुलझड़ी', 'आचार्य लाल बुझक्कड़', 'प्यारी तलवार', 'तीन कलाकारों की एक भूल', 'तब महाराजकुमारी को नींद आई', 'घूंघट के पट खोल री', 'अवतार' और 'महाराजाधिराज' आदि 18 कहानियाँ हैं।

  • चॉकलेट: 'हे सुकुमार', 'व्यभिचारी प्यार', 'जेल में', 'पालट', 'हम फिदाये लखनऊ', 'कमरिया नागिन सी बल खाये' और 'चॉकलेट चर्चा' आदि 8 कहानियाँ।

नाटक: 'सनकी अमीर', 'महात्मा ईसा', 'गंगा का बेटा', 'डिक्टेटर', 'आवारा', 'अन्नदाता माधव महाराज महान्' आदि।

एकांकी: 'राम करै सौ होय'

कविता: इनकी कविताओं के नाम 'कंचन घट', 'चन्द्रोदय', 'राष्ट्रीय गान', 'चमकीली चर्चाएँ', 'पर घूँघट का टार', 'साध', 'साहित्य' और 'मृत्यु गीत' हैं। (उपर्युक्त रचनाओं में से अधिकांश अभी तक उपलब्ध नहीं हैं क्योंकि इनकी अनेक रचनाओं पर ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था।)

संस्मरण: व्यक्तिगत - यह चरित्र-चित्रणों का एक संग्रह है। इसमें 13 स्कैच संकलित हैं: 1. शिवोहम्-शिवोहम्, 2. मैं और भगवतीचरण वर्मा, 3. होशियार पागल, 4. आदरणीय श्री कृष्ण दत्त पालीवाल, 5. काटजू और कल्चर, 6. सिंहल विजय, 7. नौ वर्ष बाद मैं संयुक्त प्रदेश में, 8. बम्बई बनाम बनारस, 9. हमारा पीड़ित पत्रकार, 10. देवालय और वेश्यालय, 11. पायल झनक-झनक बाजे, 12. बनारस फिर से बसे तो बेहतर और 13. प्रदर्शनी।

आत्मकथा: अपनी खबर - जीवन के कड़वे-मीठे अनुभवों को इन्होंने बहुत ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है।

आलोचना: इन्होंने पं. रामनरेश त्रिपाठी रचित 'तुलसीदास और उनकी कविता', डॉ. श्यामसुन्दर दास कृत 'मेरी आत्मकहानी', भारती भंडार द्वारा प्रकाशित 'ईरान के सूफी कवि', 'दिनकर' आदि पर निर्भीक व कटु आलोचनाएँ लिखी हैं।

उग्र के उपन्यासों का सर्वेक्षण: सन् 1923 से 1963 तक उग्र ने हिन्दी जगत् को उपन्यास साहित्य प्रदान कर समृद्ध किया। इन्होंने दस उपन्यास - 'चन्द हसीनों के खुतूत', 'दिल्ली का दलाल', 'बुधुआ की बेटी', 'शराबी', 'सरकार तुम्हारी आँखों में', 'घण्टा', 'जी जी जी', 'कढ़ी में कोयला', 'फागुन के दिन चार', 'जुहू' लिखे। ग्यारहवाँ अधूरा उपन्यास 'गंगा माता' है।



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कवि कैलाश गौतम का जीवन और साहित्य



 

कैलाश गौतम: जीवन और साहित्य

हिन्दी और भोजपुरी बोली के रचनाकार कैलाश गौतम का जन्म चन्दौली जनपद के डिग्घी गांव में 8 जनवरी 1944 को हुआ। शिक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और प्रयाग विश्वविद्यालय में हुई। लगभग 37 वर्षों तक इलाहाबाद आकाशवाणी में विभागीय कलाकार के रूप में सेवा करते रहे। व्यक्तित्व को देखें तो कैलाश गौतम एक सावधान लेखन-कर्मी के रूप में कौशल के साथ विनम्र, प्रेरक सहायक होने का सकारात्मक परिचय देते हैं। वे चक्रव्यूह में घिरे योद्धा की तरह जीवन-समर में जूझते हुए नज़र आये। इलाहाबाद में भी अन्दर ही अन्दर लोग उनसे बरबस ईर्ष्या रखते थे। हिन्दुस्तानी अकादमी में उनकी नियुक्ति के समय ही नहीं, बल्कि अनेक अवसरों पर उन्हें अकारण ही ईर्ष्या का सामना करना पड़ा। लेकिन, वे सारे व्यूह-जालों को काटते हुए अपनी मंज़िलें पार करते गए।

कर्तव्य की दृष्टि से देखें तो कैलाश गौतम के पांच आयाम स्पष्ट दिखाई देते हैं- खड़ी बोली में आंचलिक लोकतत्व को जिस रूप और परिमाण में कैलाश गौतम ने समेटा है, अन्य किसी रचनाकार में यह क्षमता नज़र नहीं आती। खड़ी बोली में ही दोहे की पुनर्स्थापना 'धर्मयुग' के माध्यम से कैलाश गौतम ने ही की थी। जैसे दुष्यन्त कुमार को नागरी गजल को आन्दोलन के रूप में स्थापित करने का श्रेय दिया जाता है, उसी प्रकार दोहा-आंदोलन का पुरोधा निश्चित रूप से कैलाश गौतम को माना जायेगा। इन दोनों रचनाकारों ने काव्य के स्तर पर उर्दू के रचनाकारों को भी गहराई के साथ प्रभावित किया है। हिन्दी-उर्दू की नई गजल कहने वाले रचनाकारों और दोहाकारों के गले में दुष्यन्त और कैलाश के ताबीज देखे जा सकते हैं।

कैलाश गौतम के सर्जक का बड़ा प्रखर रूप उनके नवगीतों में द्रष्टव्य है। उनके नवगीत जहां एक ओर सामाजिक यथार्थ को स्वर देते हैं, वहीं मानसिक रागभाव की तरलता को भी बरकरार रखते हैं। लोकतत्व का छौंक नवगीतों को एक अलग सौंधापन देता है। रंगमय चाक्षुषबिम्ब अमूर्त को मूर्त रूप प्रदान करते हैं। यह विज्ञानपरक आधुनिकता का द्योतक है। व्यंग्यकार के रूप में कैलाश गौतम की रचनाएं उन्हें जन-समूह से जोड़ती हैं। उनके व्यंग्यों का तीखापन जैसा खड़ी बोली में रहता है, वैसा ही भोजपुरी में भी। सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और मानसिक विषमताएं अपने पूरे ज़रूरीपन के साथ पाठक-श्रोता को सहज रूप से सहमत करने में सक्षम हैं। जो शालीनता बहु-प्रचारित पाखण्डी परफॉर्मर्स में बिलकुल नदारद है, वह कैलाश में जैविक गुण-सूत्रों के रूप में विद्यमान है।

रेडियो-लेखन कैलाश के आशु-सृजन की ऐसी मंजूषा है जो केन्द्रीय योजनाओं की तात्कालिक अपेक्षा की पूर्ति के रूप में प्रचुर सामग्री प्रस्तुत करती है। इसमें रूपक, नाटक, झलकियां आदि सभी द्रष्टव्य हैं। छंदेतर कविताएं युगीन यथार्थ की खिड़की खोलने के अलावा कैलाश गौतम के विधागत पूर्वाग्रह से मुक्ति का रास्ता प्रशस्त करती हैं। कैलाश गौतम का धारावाहिक उपन्यास 'आज' दैनिक के रविवासरीय अंकों में आंचलिक-बोध के सजीव चित्रण की क्षमता की ओर इंगित करता है।

कवि कैलाश गौतम उत्सवधर्मी रचनाकार थे। जीवन की रागानुभूतियां उन्हें भीतर तक उत्तेजित और प्रेरित करती थीं। इसीलिए भौजी, सियाराम, राग-रंग से भरे स्नेह सम्बन्ध, मेले-ठेले, पर्व उनके गीतों की अनुभूति में समाये हुए थे। मंच संचालन में विनोदप्रियता तथा चुटीली टिप्पणियां उनके व्यक्तित्व से जुड़ी हुई थीं जो गोष्ठियों को गरिमा प्रदान करती थीं। बेहद सहज, आत्मीय और बेबाक संवेदनशील कवि कैलाश गौतम जी मूलतः नवगीत के चितेरे थे। डिग्घी गांव में जन्मे कैलाश गौतम जी शिक्षा के लिए इलाहाबाद आये और यहीं के होकर रह गये। उनका पूरा जीवन साहित्य को समर्पित था। प्रयाग की गंगा-जमुनी संस्कृति उनके रग-रग में समाई थी। जिस सरलता और सहजता के साथ आम आदमी के दुख और सुखों को कविता में संजोया, वह अत्यंत मर्मस्पर्शी था।

गांव की कच्ची मिट्टी की महक और उनके गीतों में जिजीविषा थी। आज की चकाचौंध भरी ज़िन्दगी से अलग 'चना और चबेना' में कविता का सौन्दर्य शास्त्र तलाशता यह कवि सभी से हटकर था। वह सहृदयता, ज़िन्दादिली, सहजता, आत्मीयता और संजीदगी का मिला-जुला अक्स थे। ऊर्जा से भरे हुए लोगों से गपियाते, ठहाका लगाते, आज यहां तो कल वहां, हमेशा ही जल्दी में लेकिन संजीदा। हर किसी को महत्वपूर्ण बनाते हुए, जो कोई भी मिला उनका गहरा आत्मीय बन गया; सबको लगता गौतम जी उनके सबसे निकट हैं। इतना लोकप्रिय, इतना ज़िन्दादिल शख्स कभी समाप्त नहीं होता है।

प्रयाग की माटी में पनपे कैलाश गौतम यहां की साहित्यिक विरासत के पुरजोर नुमाइंदे थे। पंत, महादेवी, निराला, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, उपेन्द्र नाथ अश्क जैसे स्तम्भों के साथ एक नाम और जुड़ गया। भले ही आज साहित्यिक जगत, मित्रों और आत्मीयों के बीच एक वीरानगी है, पर जनकवि अपने शब्दों, कृतियों और गीतों के बीच इतना कुछ छोड़ गये हैं जो साहित्यिक चिंतकों के बीच विरासत का काम करेगा और प्रयाग की धरती उसकी सुगंध से महकती रहेगी। वह ज़मीन से जुड़े हुए रचनाकार ही नहीं, बल्कि एक सच्चे मनुष्य थे जिन्होंने 'मानुष सत्य' को जाना था और आम आदमी की संवेदना को छोटे-छोटे सपनों में बुना था। वे अपनी कविताओं में चरित्रों को गढ़ते हुए आमजन से रूबरू होते रहे।

दरअसल लोकजीवन ही उनका अपना जीवन था। चाहे आम बात-व्यवहार हो, जिस इंसानी जज़्बे के साथ वह मुखातिब होते थे, उसके पीछे उनका यह गहरा लोक संस्कार ही था। मंचीय कविता में उनकी जीवंत उपस्थिति के साथ-साथ पेशे के रूप में आकाशवाणी के ग्रामीण कार्यक्रमों में उनकी अत्यंत लोकप्रिय भागीदारी इसके ज्वलंत साक्ष्य हैं। रेडियो नाटक, पटकथा लेखन, गीतों के अलावा हास्य व्यंग्य और अखबारों में स्तम्भ-लेखन उनकी अभिव्यक्ति के ऐसे ही अन्य माध्यम थे। जब कवि सम्मेलनों की परम्परा में गिरावट आयी थी, तो उसे उन्होंने स्वस्थ हास्य और कुशल संचालन से जैसे उबार लिया हो। बड़ी बात यह है कि उसकी संकीर्ण रसिकता पर अंकुश लगाते हुए उन्होंने सामान्य सुख-दुख के साथ प्रखर जन-पक्षधरता का भी समावेश किया। कहीं विडम्बनाओं में निर्ममता से नश्तर लगाये तो कहीं सुन्दर बहुरंगी लोक-छवियों के गुलदस्ते सजा दिये।

अपने जीवन के अंतिम समय में आकाशवाणी से रिटायरमेंट के बाद कैलाश गौतम इलाहाबाद में हिंदुस्तानी एकेडमी के अध्यक्ष पद पर कार्यरत थे। ग्रामीण जीवन के बिम्बों के इस प्रयोगधर्मी कवि का निधन 9 दिसंबर 2006 को हुआ। उन्हें अखिल भारतीय मंचीय कवि परिषद की ओर से 'शारदा सम्मान', महादेवी वर्मा साहित्य सहकार न्यास की ओर से 'महादेवी वर्मा सम्मान', उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का 'राहुल सांकृत्यायन सम्मान' सहित मुम्बई का 'परिवार सम्मान', 'लोक भूषण सम्मान', 'सुमित्रानन्दन पंत सम्मान' और 'ऋतुराज सम्मान' से भी सम्मानित किया गया। अपने वाराणसी प्रवास के दौरान कैलाश गौतम 'आज' और 'गांडीव' जैसे दैनिक पत्र समूह से भी जुड़े रहे। 'सन्मार्ग' के लिए भी उन्होंने नियमित स्तम्भ लिखे।


कैलाश गौतम की मशहूर कविता- पप्पू के दुल्हिन
पप्पू के दुल्हिन की चर्चा कालोनी के घर घर में,
पप्पू के दुल्हिन पप्पू के रखै अपने अंडर में
पप्पुवा इंटर फेल और दुलहिया बीए पास हौ भाई जी
औ पप्पू अस लद्धड़ नाहीं, एडवांस हौ भाई जी
कहे ससुर के पापा जी औ कहे सास के मम्मी जी
माई डियर कहे पप्पू के, पप्पू कहैं मुसम्मी जी
पप्पू की दुल्हन पूरे कालोनी में चर्चित है, पप्पू को अपने अंडर में रखती है, पप्पू 12वीं फेल हैं और दुल्हन स्नातक पास है, एडवांस है, ससुर को पापा और सास को मम्मी बुलाती है। पप्पू को 'माई डियर' कहती है जबकि पप्पू उसे 'मोसम्मी जी' कहते हैं।

बहु सुरक्षा समिति का गठन
बहु सुरक्षा समिति बनउले हौ अपने कॉलोनी में
बहुतन के ई सबक सिखौले हौ अपने कॉलोनी में
औ कॉलोनी के कुल दुल्हनिया एके प्रेसिडेंट कहैंली
और एकर कहना कुल मानेली एकर कहना तुरंत करैली
पप्पू के दुल्हिन के नक्शा कालोनी में हाई हौ
ढंग एकर बेढब हौ सबसे रंग एके एकजाई हो
अपने कॉलोनी में उसने बहु सुरक्षा समिति का गठन किया है, कई लोगों को सबक सिखा चुकी है, कॉलोनी में सभी महिलाएं इसका कहना मानती हैं और प्रेसीडेंट कहती हैं।

पप्पू भी जान गया है कि किसलिए 'माई डियर' बुलाती है
औ कॉलोनी के बुढ़िया बुढ़वा दूरे से परनाम करैले
भीतरे भीतर सास डरैले भीतरे भीतर ससुर डरैले
दिन में सूट रात में मैक्सी, न घुंघटा न अँचरा जी
देख देख के हसं पड़ोसी मिसराइन औ मिसरा जी
अपने एक्को काम न छुए कुल पप्पु से करवावैले
पप्पुओ जान गयल हौ काहें माई डियर बोलावैले
कॉलोनी के सभी वृद्ध महिला-पुरुष इससे डरते हैं और दूर से ही प्रणाम करते हैं। दिन में सूट, रात में मैक्सी पहनती है, पड़ोस के मिश्रा जी और उनकी पत्नी देखकर हंसते हैं। खुद कोई काम नहीं करती, सभी काम पप्पू से करवाती है अब तो पप्पू भी जान गया है कि किसलिए 'माई डियर' बुलाती है।
चौराहेबाजी, हाहा ही ही सब कुछ छूट गया है
छूट गइल पप्पू के बीड़ी औ चौराहा छूट गइल
छूट गइल मंडली रात के ही ही हा हा छूट गइल
हरदम अप टू डेट रहैले मेकअप दोनों जून करैले
रोज बिहाने मलै चिरौंजी गाले पे निम्बुवा रगरै
पप्पू ओके का छेड़िहैं ऊ खुद छेड़ेले पप्पू के
जइसे फेरे पान पनेरिन ऊ फेरेले पप्पू के
पप्पू का रात का टहलना, चौराहेबाजी, हाहा ही ही सब कुछ छूट गया है, हमेशा अप टू डेट रहते हैं, दोनों टाइम मेकअप करते हैं। गाल पर नींबू और चिरौंजी मलते है। पप्पू उसको नहीं छेड़ पाते बल्कि वो खुद पप्पू को छेड़ती है।
एक दिन पप्पू के जेब से वो लव लेटर पा गई
पप्पू के जेबा एक दिन लव लेटर ऊ पाई गइल
लव लेटर ऊ पाई गइल, पप्पू के शामत आई गइल
मुंह पर छीटा मारै उनके आधी रात जगावैले
इ लव लेटर केकर हउवे ओनही से पढ़वावैले
लव लेटर के देखते पप्पुवा पहिले तो सोकताइ गइल
झपकी जैसे फिर से आइल पप्पुवा उहै गोताई गइल
एक दिन पप्पू के जेब से वो लव लेटर पा गई, फिर क्या था, पप्पू पर तो जैसे आफत आ गई। आधी-आधी रात को मुंह पर छींटे मार-मार कर वो पप्पू को जगाती थी और पूछती थी कि ये लव लेटर किसका है, उन्हीं से पढ़वाती भी थी।

अंदाज के एक तीर छोड़ दिया
मेहर छींटा मारे फिर फिर पप्पुवा आँख न खोलत हौ
संकट में कुकरे के पिल्ला जैसे कूँ कूँ बोलत हौ
जैसे कत्तो घाव लगल हौ हाँफ़त औ कराहत हौ
इम्तहान के चिट एस चिटिया मुंह में घोंटल चाहत हौ
सहसा हँसे ठठाकर पप्पुवा फिर गुरेर के देखलस
अँधियारन में एक तीर ऊ खूब साधकर मरलस
पप्पू को कई बार पानी के छींटे मारी लेकिन वो अभी आंख नहीं खोल रहा। संकट के समय जैसे कुत्ते के पिल्ले कूं-कूं बोलते हैं या कहीं घाव के चलते कराह रहे हों वैसे ही उसकी स्थिति है। परीक्षा के चिट की तरह वो लव लेटर को घोंट जाना चाहता है। अचानक उसे कोई उपाय सूझ गया और पहले तो ठठाकर हंसा फिर गुरेर कर पत्नी की तरफ देखा और अंधेरे में अंदाज के एक तीर छोड़ दिया।

अच्छा ! देखो, इधर आओ और सुनो !
अच्छा देखा एहर आवा बात सुना तू अइसन हउवे
लव लेटर लिखै के हमरे कॉलेज में कम्पटीसन हउवे
हमरो कहना मान मुसमिया रात आज के बीतै दे
सबसे बढ़िया लव लेटर पे पुरस्कार हौ, जीतै दे
अच्छा ! देखो, इधर आओ और सुनो ! ऐसा है कि हमारे कॉलेज में कल लव लेटर लिखने का कम्पटीसन है। मोसम्मी मेरी बात मान लो और आज की रात बीत जाने दो क्योंकि जो सबसे बढ़िया लव लेटर लिखेगा, उसे पुरस्कार मिलेगा इसलिए मुझे जीतने दो।


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देवेश ठाकुर - व्यक्ति परिचय, व्यक्तित्व तथा रचनाधर्मिता



देवेश ठाकुर प्रयोगधर्मी तथा बहुआयामी साहित्यकार हैं। वे एक साथ कवि, कहानीकार, उपन्यासकार, समीक्षक, संपादक शोधक, शोध निर्देशक आदि हैं। उनके जीवनवृत्त, व्यक्तित्व, रचनाधर्मिता आदि की हम क्रम से जानकारी लेते हैं।
देवेश ठाकुर - व्यक्ति परिचय, व्यक्तित्व तथा रचनाधर्मिता

जन्म तथा जन्म स्थान - देवेश ठाकुर ने अपने नाम तथा जन्म के बारे में स्वयं कहा है कि, - "मैं - देवेश ठाकुर उर्फ दलजीत सिंह उर्फ दरबार सिंह ठाकुर उर्फ मुन्ना उर्फ दादा उर्फ दुर्गा उर्फ देबू आत्मज ठाकुर, दीवान सिंह नेगी और आनंदी देवी, ग्राम दाडिम, मल्लस सल्ट, जिला अलमोडा, उत्तराखंड। जन्म तिथी: स्कूल प्रमाणपत्र के अनुसार: 22 जुलाई, 1933।" देवेश ठाकुर के स्नेही सुदेश कुमार देवेश जी के नाम के बारे में लिखते हैं कि, "देवेश को घर में 'मुन्ना' कहकर पुकारा जाता था। वैसे उसका बचपन का नाम दलजीत सिंह है। देवेश की माताजी ने एक बार बातों-बातों में मुझे बताया था कि वह अपने ननिहाल में पैदा हुआ था। उसका नाम दलजीत रखा और उसके जन्म की सूचना उसके पिता को दे दी गई। उसके पिता तब बद्रीनाथ में तैनात थे। पिता को भगवान के दरबार में अपने बेटे के जन्म की सूचना मिली। इसलिए उसका नाम दरबार सिंह रखा। स्कुल-कॉलेज तक उसका यही नाम चलता रहा। देहरादून मे जब वह एम.ए. के प्रथम वर्ष में पढ रहा था, तब उसकी पहली कविता - पुस्तक छपी। उस पर उसका नाम 'देवेश ठाकुर' ही गया। बाद में एम.ए. पास करने के बाद बम्बई आने पर उसने कानूनी रूप से अपना नाम 'देवेश ठाकुर' करवा लिया"।

माता-पिता, भाई-बहन - देवेश ठाकुर के पिताजी का गाँव दाड़िम। पिताजी दस-ग्यारह साल के थे तब देवेश जी के दादाजी का निधन हुआ। उसके बाद घर-परिवार की ड़ोर उनके सबसे बड़े भाई के हाथ में आ गयी। बडे़ भाई की कठोरता से तंग आकर पिताजी घर से भाग गए और रानीखेत पहुँच गए। वहाँ छोटी-मोटी नौकरी करके जिंदगी शुरू कर दी। बाद में वे सेना में कांस्टेबल के रूपमें नियुक्त हो गए। 27-28 साल की उम्र में पैठानी गाँव की सात साल की लड़की से उनकी शादी हो गई। देवेश ठाकुर का जन्म नानी के घर अर्थात पैठानी में हुआ। देवेश ठाकुर के दो भाई और एक बहन थे। बहन होने के बाद उनकी माताजी घर में कन्या आ गयी इसलिए बहुत खुश हुई।
शिक्षा - जैसे की ऊपर कहा गया देवेश जी का जन्म नानी के यहाँ अर्थात् पैठानी में हुआ। वहीं पर उन्हें अक्षर-ज्ञान कराया गया और दो दर्जे तक की पढ़ाई बटूलियाँ स्कूल में हो गई। बाद में पिताजी के तबादले के कारण बिजनौर, चाँदपुर और नजीबाबाद इस प्रकार उनके स्कुललगातार बदलते रहे। नजीबाबाद के एकमात्र सरकारी स्कुल में पाँचवी कक्षा में रिक्त स्थान न होने के कारण उन्हें फिर से चैथी कक्षा में दाखिल करवा दिया था। इससे वे बहुत दुःखी हुए। परिणाम स्वरूप पढ़ाई से उनका मन ऊब गया। धीर-धारे वहाँ उन्हें दोस्त मिलते गऐ और वे उस परिवेश में घुलमिल गए। सब एक साथ मौज-मस्ती करने लगे। उनका अधिकांश समय गिल्ली-डंडा खेलने, सड़कों पर पहिया चलाने, पतंग उड़ाने और छोटी-छोटी बातों पर लड़ने और झगड़ने में बीतने लगा। बाद में छोटे भाई और बहन के साथ खेलने में उनका समय बीतने लगा। सन् 1948 में उनके पिताजी रिटायर हो गए। तब वे दसवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। रिटायर होने के बाद आर्थिक तंगी के कारण उनके पिताजी काफी चिंतित और उदास रहने लगे। एक दिन उन्होंने देवेश जी से कहा, "दुर्गा, तू पढा़ई में ध्यान क्यों नहीं लगाता। तू पढ़लेगा तो अपने भाई-बहन को भी पढा लेगा। मैं तो आब रिटायर हो गया हूँ। 50-55 रूपए पेंशन मिलेगे उससे क्या होगा। दसवीं की परीक्षा शुरू हो गयी। परीक्षा के लिए माँ श्रध्दानुसार उन्हें एक चम्मच दही चटाती और सर पर हाथ फेरकर उन्हें शुभकामनाएँ देती। आखिरकार परीक्षा खत्म हो गयी और देवेश जी द्वितीय श्रेणी में पास हों गये।
उनके पिताजी चाहते थे किं इंटर पास करके देवेश पुलिस सब-इन्स्पेक्टर बन जाये। इसलिए नगीना में उनका दाखिला करवा लिया। उन्होंने इंटर की परीक्षा दे दी। बाद में मिलिट्री में उन्हें दाखिल करवाने के प्रयास हुए। वहाँ दुबली तबीयत के कारण असफल हो गये। बाद में आर्थिक तंगी के बावजूद देहरादून में बी.ए. के लिए उनका दाखिला करवाया गया। बी.ए. और एम.ए. के दौरान उनका जीवन बड़ा ही संघर्षमय बीता। एम.ए. के परिणाम घोषित होने पर पता चला देवेश जी द्वितीय श्रेणी में पास हो गये। नौकरी की आवश्यकता के कारण उन्होंने बी.एड. पूरा होने के पूर्व 'बाम्के एज्युकेशन सर्विसेज' के द्वारा असिस्टैट लेक्चरर के पद पर नियुक्ति हो गयी। तभी उन्होंने पं. नंद दुलारे वाजपेयी के निर्देशन में सागर विश्वविद्यालय के अंतर्गत पीएचडी. के लिए पंजीकरण किया और 1961 में पीएचडी. की डिग्री मिल गयी। बाद में वाजपेयी के आदेशानुसार उन्होंने डी.लिट. के लिए कार्य करना शुरू किया और हिन्दी साहित्य में विश्वविद्यालयीन उच्चतम् उपाधि डि.लिट. भी अर्जित की।

नौकरियाँ - देवेश जी का असली संघर्षमय जीवन बी.ए. तथा एम.ए. के दौरान शुरू हो गया। आर्थिक दृष्टि से उन्हें बड़ा संघर्ष करना पड़ा। अपनी पढा़ई पूरी करने के लिए उन्हें टयुषन लेना पड़ा। इतना ही नहीं होटल में मैनेजर बनकर ग्राहकों की जुठी प्लेटें भी उठाने का काम किया। गर्मियोंकी छुट्टियों में अपने घर न जाकर अखबार बाँटने का काम किया। जब उनके पास खाने के लिए कुछ नहीं होता तब वे खाने के समय पर दोस्तों के घर जाते और उनको वहाँ खाना मिल जाता। बी.ए. की परीक्षा देने के बाद पैसा कमाने के हेतु से वे दिल्ली चले गये। वहाँ जुतों के डिब्बे को साफ करने का काम भी किया। प्रतिकूल परिस्थिति के बावजूद भी उन्होंने आशावादी बनना स्वीकार किया।
एम.ए. में द्वितीय श्रेणी पाने के बाद एक प्राइमरी स्कूल में उन्हें पढा़ने का काम मिल गया। लेकिन पढ़ाने की ट्रेनिंग न होने के कारण 'हफ्ते भर बाद वहाँ से मेरी यह कहकर छुट्टी कर दी गयी कि मुझे पढ़ाना नहीं आता।" बाद में बी.एड. का ट्रेनिंग पूरा होने से पहले 'बाम्के एजुकेशन सर्विसेज' के अंतर्गत 'सिड़नहम' कॉलेज में असिस्टैंट लेक्चरर के पद पर नियुक्ति हो गयी। इसलिए देहरादून में बी.एड. की ट्रेनिंग छोड़कर वे बम्बई चले गये। वहाँ नौकरी ज्वाइन की। देवेश ठाकुर के शब्दों मे 'सिड़नहम कॉलेज में मेरे दिन बडे़ अच्छे बीते। मुझसे पहले दिनेश यहाँ आ चुका था। मैं उसी के साथ 'शेरे पंजाब हॉस्टल' में रहने लगा। कॉलेज में मेरे विभागाध्यक्ष प्रो. चंदुलाल दुबे ने मुझे बहुत सहयोग दिया। जब तक वे बम्बई में रहे, हर रोज घर से मेरा लंच लेकर आते रहें।" उनका तबादला होने के बाद देवेश जी विभागाध्यक्ष बनें। बाद में उनकी बदली राजकोट में हो गयी। लेकिन वहाँ का वातावरण उनको रास नहीं आया। उन्होंने इस्तीफा दिया और वे बम्बई लौट आये। बम्बई में राम नारायण रूइया कॉलेज में सहजता से उनको नौकरी मिल गयी, वहाँ पर 33 वर्षों तक वे कार्यरत रहें और 1993 में वहाँ पर सेवानिवृत्त हुए।

पारिवारिक जीवन - देवेश जी का विवाह पंजाब के सुविख्यात कामरेड पद्म विभूषण सत्यपाल डंग की बहन सुशीला जी, जो दिल्ली के लेडी हार्डिंग हॉस्पिटल में सिस्टर इंचार्ज थी, उनसे 1961 में हुआ। उन्होंने देवेश जी के हर सुख-दुःख में बखूबी साथ निभाया। दिसम्बर 1962 में उनकी पहली बेटी आभा का जन्म हुआ। जो की आज डॉक्टर है और उन्होंने एम.डी. और डीएनबी के सिवा लंदन में जाकर दो साल की लीवर ट्रांसप्लैंट की ट्रेनिंग ली है। गैस्टोएन्ट्रोलाॅजी की वह विशेषज्ञ भी है। दिसम्बर 1963 में उनकी छोटी बेटी आरती का जन्म हुआ। जो स्थानीय कॉलेज में इकाॅनाॅमिक्स की वरिष्ठ प्रवक्ता है। देवेश जी ने दोनों बेटियों का विवाह भी सादे ढंग से किया। इसके बारे में डॉ. रोहिणी देवबालन का कथन है कि "कोई शर्त नहीं, कोई धार्मिक पाखण्ड नहीं। कोई लेन-लेन नहीं। कोई मंत्रोच्चार नहीं। दोनों की रजिस्टर्स मैरिज। दोनों के अत्यन्त सम्मानित परिवारों में विवाह किया। देवेश सर की अपनी बच्चियों से बड़ी दोस्ती है, आभा-आरती दोनों ही सर को पिता से ज्यादा मित्र समझती है। सौभाग्य से उनको दोनों दामाद भी ऐसे ही मिले हैं जिनके साथ सर का व्यवहार सम्बन्धियों जैसा नहीं, बल्कि फक्कड़ दोस्तों जैसा अधिक है। आभा के पति भी लीवर ट्रांसप्लैट के सर्जन है। दोनों जसलोक और भाटिया अस्पताल में विशेषज्ञ हैं। दोनों बेटियाँ उनके घर-संसार में सुखी हैं। "कामयाब आदमी के पीछे औरत का हाथ होता है।" इसी हिसाब से देखा जाऐ तो देवेश जी के यशश्वी जीवन के पीछे भी उनकी पत्नी सुशीला जी का अनमोल सहकार्य ही है। परिवार की अधिक से अधिक जिम्मेदारी उठाने के कारण ही देवेश जी अपनी 'साहित्य-साधना' कर पायें। सुशीला स्वयं कहती है कि, "वैवाहिक जीवन में अनेक-अनेक कठिन मौकों पर हमने समझदारी बरती है और मिलकर हर स्थिति का सामना किया है और सफलता के साथ किया है।" आगे वह कहती हैं कि, "वैसे मैं जानती हूँ कि यह घर मेरी वजह से ही चल रहा है अन्यथा इनकी आदतें इस घर को न जाने कहाँ ले जाती। फिर भी यह क्यों न माने कि ये मूलतः एक अच्छे, हँसोड़, समझदार और जिन्दादिल इन्सान हैं, इनकी अव्यवस्था में भी एक व्यवस्था हैं।" पत्नी तथा अपने परिवार के साथ-साथ उनके दोस्तों का योगदान भी कम नहीं है। कॉलेज के दिनों से लेकर आज तक उनके सच्चे और आत्मीय दोस्तों ने प्रामाणिकता से अपनी मित्रता निभाई है। उनके परम स्नेही सुदेश कुमार का सुशीला जी के बारे में कथन है कि, "शीला भाभी बहुत सहज, संतुलित और शालीन हैं। मैं तो यह सोचता हूँ कि आज देवेश जो भी बन पाया है, उस में 50 प्रतिशत से अधिक भाग शीला भाभी का हैं। वे देवेश की पत्नी भी है, प्रेमिका भी हैं, दोस्त भी हैं और माँ और बहन भी हैं।" वैवाहिक जीवन में दोनों के वैचारित ताल-मेल से ही जीवन सुखकर हो जाता है तथा हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है। देवेश जी और सुशीला जी के सम्बन्धों को देखकर यह बात सोलह आना सच लगती है।
अपने पूरे जीवन में उन्होंने अपने तत्वों के साथ कभी समझौता नहीं किया। जो गलत है उसे गलत ही ठहराया गया है। किसी भी परिस्थिति में गलत को सही मानने की गलती नहीं की। यहाँ तक की अपनी माँ, बहन और भाई के टुच्चे पन को भी सही-सही दर्शाया। परिवारवालों की स्वार्थी प्रवृत्ति के कारण 37 वर्ष की आयु में उनका पहला बड़ा हृदयाघात हुआ। जिसके परिणाम स्वरूप 1995 में 'ओपन हार्ट सर्जरी' करवानी पडी। ऐसी परिस्थिति में सुशीला जी ने खास खयाल रखा। पारिवारिक संघर्ष के बावजूद देवेश जी ने परिस्थितियों का सामना किया, आशावादी बनकर।

साहित्य का आरंभ - देवेश ठाकुर का भी अधिकांश साहित्यकारों की तरह साहित्य का प्रारंभ काव्यलेखन से ही हुआ। देवेश जी का शिक्षा पूरी करने के लिए संघर्ष चल ही रहा था। एम.ए. के समय उनकी दोस्ती साहित्यिक तथा साहित्य पे्रमी दोस्तों से हो गयी। उनके साथ रहने के कारण देवेश जी में भी साहित्य की रूचि निर्माण हुई और वे भी युवावस्था में कविताएँ लिखने लगे। देवेश ठाकुर ने अपने साहित्य के आरंभ के बारे में स्वयं कहा हैं कि, "देहरादून में पहली बार मुझे अपने परिवारवालों से अलग रहना पड़ा। घर की बड़ी याद आती थी। अकेली घड़ियों में या तो मैं रोता था या कविता करता था। इस तरह मैं समझता हूँ मेरा अकेलापन ही मेरे लिखने की शुरूआत का कारण बना।" देहरादून का वातावरण बड़ा साहित्यिक था। वहाँ पर स्थानीय काव्य-गोष्ठियाँ होती थी। उनमें श्रीराम शर्मा 'प्रेम', मनोहरलाल 'श्रीमान' और अपना सहपाठी 'कुल्हड' आदि लोकप्रिय कवि सहभागी रहते थे। कवि सम्मेलन होते थे। उनमें नीरज हंस कुमार तिवारी, देवेश जी के मित्र देवराज 'दिनेश' आदि भी सहभागी होते थे। इनकी प्रेरणा से देवेश जी की 'काव्य-साधना' आगे बढती गई। एम.ए. के प्रथम वर्ष में 'वैनगार्ड' नामक स्थानीय पत्रिका में उनकी कविताएँ छपने लगी। बाद में 'मयुरिका' नाम का पहला काव्य संकलन प्रकाशित हुआ। 1956 में उनका 'अन्तर-छाया' नामक खंडकाव्य प्रकाशित हुआ।
देवेश ठाकुर के एक और मित्र प्रा. दिनेश कुकरेती का कथन है कि "कॉलेज में और शहर में भी आए दिन छोटे-मोटे कवि सम्मेलन तथा साहित्य गोष्ठियाँ होती रहती थी। इसी वातावरण से प्रभावित होकर हम दो-चार मित्रों ने 'तरूण-साहित्य मण्डल' नाम से छोटी सी संस्था संगठित की थी। जिसकी प्रथम दो-तीन गोष्ठियाँ बंगाली-मौहल्ले के उस कमरे में धूमधाम से आयोजित की गई जो देवेश एवं सुदेश का निवास-स्थान था।" इस प्रकार काव्य से देवेश ठाकुर का साहित्यिक प्रवास शुरू हो गया। जो आगे चलकर उपन्यास कहानी, समीक्षा, शोध आदि की तरफ बढता ही गया। साहित्य के प्रति उनकी अपनी एक अलग रूचि है। इसके बारे में दिनेश कुकरेती का मत द्रष्टव्य है, "पुस्तकों से देवेश का प्रारम्भ से ही प्यार रहा है, पढ़ने का ही नहीं, संग्रह का भी शौक है। भीषण अर्थाभाव के दिनों में भी वह पुस्तकें खरीदता रहता था। बम्बई में होटल निवास के दिनों में ही उसका ट्रंक कपड़ों की जगह पुस्तकों से भर गया था।" साहित्य के प्रति रूचि, लगन तथा जिज्ञासा के कारण 500 पृष्ठों का शोध-प्रबंध उन्होंने 18 महीनों में पूरा कर लिया। जिसके परिणाम स्वरूप 1961 में उन्हें पीएच.डी. की उपाधि मिल गयी।

सम्मान एवं उपाधियाँ - देवेश ठाकुर के 'शून्य से शिखर तक', और 'शिखर पुरुष' दोनों उपन्यास महाराष्ट्र राज्य हिन्दी अकादमी द्वारा पुरस्कृत हैं। उनका डी.लिट्. का शोध-प्रबंध 'आधुनिक हिंदी साहित्य की मानवतावादी भूमिकाएँ' - हिन्दी संस्थान, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 'तुलसी पुरस्कार' से पुरस्कृत हैं।


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