गायत्री मंत्र
ॐ भूर्भुवः स्वः ।
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि ।
धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
अर्थ – हम उस सृष्टिकर्ता, प्रकाशमान, परम तेजस्वी परमात्मा का ध्यान करते हैं। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे।
इस मंत्र के जप से ज्ञान की प्राप्ति होती है तथा मन शांत और एकाग्र रहता है। ललाट पर तेज और आभा का विकास होता है। गायत्री माता के विभिन्न स्वरूपों का उनके मंत्रों सहित जप करने से दरिद्रता, दुःख और कष्टों का नाश होता है तथा निःसंतानों को संतान-प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है।
गायत्री मंत्र के चौबीस अक्षर
गायत्री मंत्र में चौबीस (24) अक्षर हैं। ऋषियों ने इन अक्षरों में बीजरूप से विद्यमान उन शक्तियों को पहचाना है जिन्हें चौबीस अवतार, चौबीस ऋषि, चौबीस शक्तियाँ तथा चौबीस सिद्धियाँ कहा जाता है। गायत्री मंत्र के ये चौबीस अक्षर चौबीस शक्ति-बीज माने गए हैं। गायत्री मंत्र की उपासना से इन शक्तियों और सिद्धियों का लाभ प्राप्त होता है।
1. तत्
देवता – गणेश
शक्ति – सफलता शक्ति
फल – कठिन कार्यों में सफलता, विघ्नों का नाश, बुद्धि की वृद्धि।
2. स
देवता – नरसिंह
शक्ति – पराक्रम शक्ति
फल – पुरुषार्थ, वीरता, शत्रुनाश तथा आक्रमणों से रक्षा।
3. वि
देवता – विष्णु
शक्ति – पालन शक्ति
फल – संरक्षण, आश्रितों की रक्षा तथा योग्यताओं की वृद्धि।
4. तु
देवता – शिव
शक्ति – कल्याण शक्ति
फल – अनिष्ट का विनाश, कल्याण, आत्मपरायणता एवं निश्चय शक्ति।
5. व
देवता – श्रीकृष्ण
शक्ति – योग शक्ति
फल – कर्मयोग, सौन्दर्य, सरसता, अनासक्ति एवं आत्मनिष्ठा।
6. रे
देवी – राधा
शक्ति – प्रेम शक्ति
फल – प्रेमभाव, द्वेष का नाश।
7. णि
देवी – लक्ष्मी
शक्ति – धन शक्ति
फल – धन, पद, यश एवं भौतिक समृद्धि।
8. यं
देवता – अग्नि
शक्ति – तेज शक्ति
फल – तेज, प्रतिभा, सामर्थ्य और शक्ति की वृद्धि।
9. भ
देवता – इन्द्र
शक्ति – रक्षा शक्ति
फल – रोग, शत्रु, चोर एवं अन्य भय से रक्षा।
10. र्गो
देवी – सरस्वती
शक्ति – बुद्धि शक्ति
फल – मेधा, विवेक, दूरदर्शिता एवं ज्ञान-वृद्धि।
11. दे
देवी – दुर्गा
शक्ति – दमन शक्ति
फल – विघ्नों पर विजय, दुष्टों का दमन।
12. व
देवता – हनुमान
शक्ति – निष्ठा शक्ति
फल – निर्भयता, कर्तव्यपरायणता एवं ब्रह्मचर्य।
13. स्य
देवी – पृथ्वी
शक्ति – धारण शक्ति
फल – धैर्य, सहनशीलता, गंभीरता और स्थिरता।
14. धी
देवता – सूर्य
शक्ति – प्राण शक्ति
फल – आरोग्य, दीर्घायु, विकास एवं विचारों का शोधन।
15. म
देवता – श्रीराम
शक्ति – मर्यादा शक्ति
फल – संयम, सौम्यता, मैत्री एवं मर्यादा-पालन।
16. हि
देवी – श्रीसीता
शक्ति – तप शक्ति
फल – पवित्रता, नम्रता, शील एवं सात्त्विकता।
17. धि
देवता – चन्द्र
शक्ति – शान्ति शक्ति
फल – चिंता, क्रोध, लोभ और मोह का नाश।
18. यो
देवता – यम
शक्ति – काल शक्ति
फल – समय का सदुपयोग, जागरूकता एवं निर्भयता।
19. यो
देवता – ब्रह्मा
शक्ति – उत्पादक शक्ति
फल – सृजन क्षमता एवं संतान-वृद्धि।
20. नः
देवता – वरुण
शक्ति – रस शक्ति
फल – सरलता, करुणा, माधुर्य एवं कलाप्रेम।
21. प्र
देवता – नारायण
शक्ति – आदर्श शक्ति
फल – उच्च चरित्र, आदर्श जीवन एवं नेतृत्व क्षमता।
22. चो
देवता – हयग्रीव
शक्ति – साहस शक्ति
फल – उत्साह, वीरता एवं विपत्तियों से संघर्ष की क्षमता।
23. द
देवता – हंस
शक्ति – विवेक शक्ति
फल – सत्-असत् का निर्णय, आत्मसंतोष एवं सत्संगति।
24. यात्
देवता – तुलसी
शक्ति – सेवा शक्ति
फल – लोकसेवा, सत्यनिष्ठा, आत्मशान्ति एवं परोपकार।
गायत्री उपासना से हर कार्य संभव
गायत्री, गीता, गंगा और गौ—ये भारतीय संस्कृति की चार आधारशिलाएँ मानी गई हैं। श्रीकृष्ण ने गीता में भी मनुष्य के कल्याण के लिए गायत्री और ॐ के महत्व का संकेत दिया है। वेदों में गायत्री को आयु, प्राण, शक्ति, कीर्ति, धन और ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली देवी कहा गया है। उनकी उपासना से साधक को इन दिव्य गुणों की प्राप्ति होती है।
गायत्री मंत्र का लाभ
महर्षि वेदव्यास कहते हैं कि जैसे पुष्पों में मधु और दूध में घृत साररूप होता है, वैसे ही समस्त वेदों का सार गायत्री है। यदि गायत्री साधना सिद्ध हो जाए तो वह कामधेनु के समान सभी उचित इच्छाओं को पूर्ण करने वाली बन जाती है।
गायत्री मंत्र का श्रद्धापूर्वक एवं नियमित जप करने से—
आध्यात्मिक चेतना का विकास होता है।
बुद्धि एवं स्मरण शक्ति बढ़ती है।
मन की शुद्धि होती है।
दुःख एवं कष्टों का निवारण होता है।
आत्मबल और तेज में वृद्धि होती है।
साधक के चारों ओर आध्यात्मिक संरक्षण का कवच निर्मित होता है।
देवी-देवताओं के गायत्री मंत्र
काली गायत्री
ॐ कालिकायै च विद्महे, श्मशानवासिन्यै धीमहि, तन्नो घोरा प्रचोदयात्॥
कृष्ण गायत्री
ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे, वासुदेवाय धीमहि, तन्नः कृष्णः प्रचोदयात्॥
गणेश गायत्री
ॐ एकदन्ताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥
दुर्गा गायत्री
ॐ कात्यायन्यै विद्महे, कन्याकुमार्यै धीमहि, तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्॥
राम गायत्री
ॐ दशरथाय विद्महे, सीतावल्लभाय धीमहि, तन्नो रामः प्रचोदयात्॥
रुद्र गायत्री
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे, महादेवाय धीमहि, तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥
लक्ष्मी गायत्री
ॐ महादेव्यै विद्महे, विष्णुपत्न्यै धीमहि, तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्॥
विष्णु गायत्री
ॐ नारायणाय विद्महे, वासुदेवाय धीमहि, तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥
सरस्वती गायत्री
ॐ वाग्देव्यै विद्महे, ब्रह्मपत्न्यै धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात्॥
हनुमान गायत्री
ॐ आञ्जनेयाय विद्महे, वायुपुत्राय धीमहि, तन्नो हनुमान् प्रचोदयात्॥
इस प्रकार करें गायत्री मंत्र का जप
गायत्री मंत्र का जप सूर्योदय से लगभग दो घंटे पूर्व से लेकर सूर्यास्त के एक घंटे बाद तक किया जा सकता है। मानसिक (मौन) जप किसी भी समय किया जा सकता है। सामान्यतः प्रातः और सायं संध्या का समय सर्वोत्तम माना गया है।
नियमित रूप से 108 बार गायत्री मंत्र का जप करने से—
बुद्धि प्रखर होती है।
स्मरण शक्ति बढ़ती है।
अध्ययन में एकाग्रता आती है।
व्यक्तित्व में तेज और आकर्षण बढ़ता है।
विवेक एवं निर्णय क्षमता का विकास होता है।
स्वामी विवेकानन्द ने गायत्री को “सद्बुद्धि का मंत्र” कहा है और इसे मंत्रों का मुकुटमणि बताया है।
गायत्री जयंती पर क्या करें?
अन्न का दान करें।
भंडारा या अन्नक्षेत्र का आयोजन करें।
लोगों को शीतल जल पिलाएँ।
पक्षियों के लिए जल-पात्र रखें।
गायत्री मंत्र जप एवं हवन करें।
गुड़ और गेहूँ का दान करें।
धार्मिक पुस्तकों का दान करें।
पवित्र नदी में स्नान करें।
फलाहार व्रत रखें।
श्री आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें।
सत्य भाषण का संकल्प लें।
सूर्य देव की उपासना करें।
जय माँ गायत्री। 🙏🌺