रस्सी में सर्प का भ्रम



घड़ी ने अभी-अभी नौका घण्टा बजाया था। हिरेन 'सुन्दरवन के बाघ' फिल्म देखने के बाद वापस अपने घर लौट रहा था। रॉयल बंगाल बाघों के अंचल में जाकर इस फिल्म का निर्माण किया गया था। हिरेन उस फिल्म के दृश्यों के बारे में सोचता हुआ चला जा रहा था। चलते-चलते वह सहसा चौंक गया। सामने सड़क पर एक सांप लेटा हुआ था। उस पर उसका पाँव पड़ते-पड़ते रह गया था। बड़े भाग्य से ही उसकी जान बच गयी थी। वह थोड़ा पीछे हटकर और भी अच्छी तरह सांप को देखने लगा। यह एक वैसा ही नाग लग रहा था, जैसा कि उसने कुछ दिनों पूर्व सँपेरे की टोकरी में देखा था।

हिरेन ने सांप से बचने के लिये बगल का एक दूसरा रास्ता पकड़ने की सोची। तभी उसने देखा कि एक व्यक्ति हाथ में टार्च लिये उस सांप की ओर ही चला जा रहा है।हिरेन चिल्लाया-'उधरसे मत जाओ, सड़क पर एक नाग लेटा है।'
वह व्यक्ति बोला-'डरो मत। मेरे साथ आओ। घण्टे भर पहले मैं इसी सड़क से होकर गया था। मैंने तुम्हारे साँप को देख लिया है। वह नाग नहीं, रस्सी का एक टुकड़ा मात्र है।' वह हीरेन को उस जगह ले गया। हिरेन ने टार्च से आलोकित सड़क को स्पष्ट रूपसे देखा तो उसे पता चला कि वहाँ कोई नाग नहीं, बल्कि एक रस्सी पड़ी है। दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े। हिरेन का भय जा चुका था।
कभी-कभी हम एक वस्तु को कुछ दूसरा समझ बैठते हैं और इस कारण हम भ्रमित या भयभीत हो जाते हैं। वेदान्त की मतानुसार रस्सी में सर्प के भय के समान ही हमारे सुख-दुःख, हमारी समस्या, आशंका और चिन्ताएँ एक तरहके भ्रम पर आधारित होती हैं। मूलत: हम पूर्ण और आनन्दमय हैं, तथापि हम अपनेको श्मशान की ओर अग्रसर हो रहे एक लाचार मत्स्य प्राणी के रूपमें देखते हैं। हम लोग ऐसा व्यवहार करते हैं, मानो हमपर जादू कर दिया गया हो और इसीको वेदान्त में माया कहते हैं। जब मायाका जादू टूट जाता है, तब हमें अपने वास्तविक स्वरूपका ज्ञान होता है।

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12 राशि नाम और अक्षर - 12 Rashi Naam



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इसे साफ़ एवं व्यवस्थित सारणी के रूप में इस प्रकार लिखा जा सकता है—

क्रमांकराशिअंग्रेज़ी नामनाम का प्रथम अक्षर
1मेषAriesअ, ल, ई
2वृषभTaurusब, व, उ
3मिथुनGeminiक, छ, घ
4कर्कCancerड, ह
5सिंहLeoम, ट
6कन्याVirgoप, ठ, ण
7तुलाLibraर, त
8वृश्चिकScorpioन, य
9धनुSagittariusफ, ध, भ, ढ
10मकरCapricornख, ज
11कुंभAquariusग, स, श, ष
12मीनPiscesद, च, झ, थ

राशि अनुसार नाम का प्रथम अक्षर

  • मेष राशि – अ, ल, ई

  • वृषभ राशि – ब, व, उ

  • मिथुन राशि – क, छ, घ

  • कर्क राशि – ड, ह

  • सिंह राशि – म, ट

  • कन्या राशि – प, ठ, ण

  • तुला राशि – र, त

  • वृश्चिक राशि – न, य

  • धनु राशि – फ, ध, भ, ढ

  • मकर राशि – ख, ज

  • कुंभ राशि – ग, स, श, ष

  • मीन राशि – द, च, झ, थ

नोट: पारंपरिक वैदिक ज्योतिष में राशि निर्धारण सामान्यतः जन्म नक्षत्र और चंद्र राशि के आधार पर किया जाता है। नाम का प्रथम अक्षर संबंधित नक्षत्र के चरण (पाद) के अनुसार निर्धारित किया जाता है।Rashi Name | 12 Rashi Akshar | 12 Rashi Name | 12 Rashi Ke Naam.

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वेदों और श्रुतियों की जननी देवी गायत्री की जयंती और अवतरण



Gayatri Mantra

गायत्री माता : स्वरूप, अवतरण और महिमा

कौन हैं गायत्री माता? कैसे हुआ उनका अवतरण?

मान्यता है कि चारों वेद, शास्त्र और श्रुतियाँ सभी गायत्री से उत्पन्न हुई हैं। वेदों की उत्पत्ति का कारण होने से इन्हें वेदमाता कहा जाता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश—तीनों देवताओं की आराध्या भी इन्हें ही माना जाता है, इसलिए इन्हें देवमाता भी कहा जाता है। समस्त ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण गायत्री को ज्ञान-गंगा भी कहा जाता है। इन्हें भगवान ब्रह्मा की दूसरी पत्नी के रूप में भी स्वीकार किया गया है।

मान्यता है कि सृष्टि के आदि काल में ब्रह्माजी पर गायत्री मंत्र प्रकट हुआ। मां गायत्री की कृपा से ब्रह्माजी ने गायत्री मंत्र की व्याख्या अपने चारों मुखों से चार वेदों के रूप में की। प्रारंभ में गायत्री का ज्ञान केवल देवताओं तक सीमित था, किन्तु जिस प्रकार राजा भगीरथ कठोर तपस्या द्वारा गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाए, उसी प्रकार महर्षि विश्वामित्र ने भी कठिन साधना करके गायत्री मंत्र की महिमा को जन-जन तक पहुँचाया।

मां गायत्री को पंचमुखी माना गया है

हिंदू धर्म में मां गायत्री को पंचमुखी माना गया है। इसका तात्पर्य यह है कि समस्त ब्रह्मांड जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि (तेज) और आकाश—इन पाँच तत्वों से निर्मित है। संसार के सभी प्राणियों का शरीर भी इन्हीं पाँच तत्वों से बना है।

इस पृथ्वी पर प्रत्येक जीव के भीतर गायत्री प्राणशक्ति के रूप में विद्यमान हैं। यही कारण है कि गायत्री को समस्त शक्तियों का आधार माना गया है। भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रतिदिन गायत्री उपासना को अत्यंत कल्याणकारी माना गया है।

गायत्री जयंती

पुराणों के अनुसार गायत्री जयंती ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। कहा जाता है कि महर्षि विश्वामित्र ने पहली बार गायत्री मंत्र का उच्चारण इसी दिन किया था। इसलिए यह तिथि गायत्री जयंती के रूप में प्रसिद्ध हुई।

अधिकांश वर्षों में गायत्री जयंती गंगा दशहरा के अगले दिन पड़ती है। कुछ परंपराओं में इसे श्रावण पूर्णिमा के अवसर पर भी मनाया जाता है। मान्यता है कि गायत्री जयंती के दिन श्रद्धापूर्वक गायत्री मंत्र का जप करने से यश, कीर्ति, धन, ऐश्वर्य तथा आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है। यदि गायत्री मंत्र का जप विधिपूर्वक, पूर्ण श्रद्धा एवं पवित्रता के साथ किया जाए, तो इसका विशेष फल प्राप्त होता है।

गायत्री माता की महिमा

हिंदू धर्म में मां गायत्री को वेदमाता कहा गया है, क्योंकि सभी वेदों की उत्पत्ति इन्हीं से मानी जाती है। पुराणों में गायत्री देवी को ब्रह्मा, विष्णु और महेश—त्रिमूर्ति के समतुल्य सम्मान दिया गया है। उन्हें समस्त देवताओं की माता तथा देवी सरस्वती, महालक्ष्मी और पार्वती का संयुक्त स्वरूप माना गया है।

गायत्री माता के पाँच मुख और दस भुजाएँ मानी जाती हैं। उनके चार मुख चारों वेदों के प्रतीक हैं, जबकि पाँचवाँ मुख परम दिव्य शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। वे कमलासन पर विराजमान रहती हैं। उनकी दस भुजाएँ दिव्य शक्तियों और भगवान विष्णु के संरक्षणकारी स्वरूप का प्रतीक मानी जाती हैं।

भारतीय संस्कृति में गायत्री माता को संस्कृति की जननी भी कहा गया है। धर्मशास्त्रों के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मां गायत्री का अवतरण हुआ था और इसी स्मृति में गायत्री जयंती मनाई जाती है।

मान्यता है कि मां गायत्री की उपासना से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं तथा जीवन में किसी प्रकार की कमी नहीं रहती। अथर्ववेद में गायत्री उपासना से प्राप्त होने वाले सात प्रमुख प्रतिफलों का उल्लेख मिलता है—आयु, प्राण, प्रजा, पशुधन, कीर्ति, धन और ब्रह्मवर्चस्

ऋषि-मुनियों और महापुरुषों की दृष्टि में गायत्री

गायत्री की महिमा का वर्णन प्राचीन ऋषि-मुनियों से लेकर आधुनिक विचारकों तक ने किया है। वेद, शास्त्र और पुराण तो गायत्री माता की महिमा से परिपूर्ण हैं ही, अथर्ववेद में उन्हें आयु, प्राण, शक्ति, कीर्ति, धन और ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली देवी कहा गया है।

महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास कहते हैं कि जिस प्रकार पुष्पों में मधु और दूध में घी साररूप होता है, उसी प्रकार समस्त वेदों का सार गायत्री है। यदि गायत्री सिद्ध हो जाए, तो वह समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाली दिव्य कामधेनु के समान है।

जिस प्रकार गंगा शरीर और मन को पवित्र करती है, उसी प्रकार गायत्री रूपी ब्रह्मगंगा आत्मा को निर्मल और प्रकाशित करती है।

महर्षि विश्वामित्र का कथन है कि ब्रह्माजी ने तीनों वेदों का सार निकालकर गायत्री मंत्र के रूप में मानवता को प्रदान किया है। गायत्री से बढ़कर पवित्र करने वाला कोई मंत्र नहीं है। जो व्यक्ति नियमित रूप से गायत्री मंत्र का जप करता है, वह पापों से उसी प्रकार मुक्त हो जाता है, जैसे केंचुल छोड़ने पर सर्प।

गायत्री माता के भक्त उन्हें आदिशक्ति के रूप में पूजते हैं। प्रतीकात्मक रूप से गायत्री ज्ञान, विवेक और चेतना की अधिष्ठात्री देवी हैं। उनकी कृपा से अज्ञान का अंधकार दूर होता है और जीवन में प्रकाश, ज्ञान तथा आध्यात्मिक जागृति का उदय होता है। महर्षि विश्वामित्र ने इसी दिव्य ज्ञान को सम्पूर्ण मानवता तक पहुँचाने का महान कार्य किया।


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क्यों कहा जाता है वेदमाता?

गायत्री संहिता के अनुसार— “भासते सततं लोके गायत्री त्रिगुणात्मिका” अर्थात् गायत्री माता सरस्वती, लक्ष्मी और काली—इन तीनों दिव्य शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। ज्ञान, समृद्धि और शक्ति के इन त्रिविध स्वरूपों से ही वेदों के दिव्य ज्ञान का प्रादुर्भाव माना गया है। इसी कारण गायत्री को वेदमाता कहा जाता है।

गायत्री मंत्र के विषय में शास्त्रों में कहा गया है— “सर्वदेवानां गायत्री सारमुच्यते” अर्थात् गायत्री मंत्र समस्त वेदों का सार है। इसलिए गायत्री माता को वेदों की जननी और वेदमाता के रूप में सम्मानित किया गया है।

मां गायत्री का उल्लेख ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, तैत्तिरीय संहिता तथा अन्य वैदिक ग्रंथों में प्राप्त होता है। अनेक उपनिषदों में सावित्री और गायत्री को एक ही शक्ति का स्वरूप बताया गया है। मान्यता है कि वे किसी समय सविता देव (सूर्य) की पुत्री के रूप में प्रकट हुई थीं, इसलिए उनका नाम सावित्री पड़ा। कहा जाता है कि उनका प्रादुर्भाव सविता के मुख से हुआ था। भगवान सूर्य ने उन्हें ब्रह्माजी को समर्पित किया, जिसके कारण वे ब्रह्माणी नाम से भी प्रसिद्ध हुईं।

गायत्री ज्ञान और विज्ञान की मूर्तिमान शक्ति हैं। वे ब्राह्मणों की आराध्य देवी मानी जाती हैं तथा उन्हें परब्रह्मस्वरूपिणी कहा गया है। वेदों, उपनिषदों, पुराणों तथा अन्य धर्मग्रंथों में उनकी महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है।

देवी गायत्री के विवाह की कथा

एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान ब्रह्मा एक महायज्ञ का आयोजन कर रहे थे। शास्त्रों के अनुसार किसी भी यज्ञ, पूजा अथवा धार्मिक अनुष्ठान में विवाहित व्यक्ति को अपनी पत्नी के साथ बैठकर ही कर्म करना चाहिए। पति-पत्नी के संयुक्त रूप से यज्ञ में सहभागी होने पर उसका फल पूर्ण एवं शीघ्र प्राप्त होता है।

यज्ञ के समय किसी कारणवश ब्रह्माजी की पत्नी सावित्री के आने में विलंब हो गया। यज्ञ का शुभ मुहूर्त निकला जा रहा था। ऐसी स्थिति में यज्ञ की पूर्णता के लिए ब्रह्माजी ने गायत्री देवी के साथ विवाह किया और उन्हें अपने साथ यज्ञ में आसन ग्रहण कराया। इसके पश्चात यज्ञ का शुभारंभ हुआ।

इस कथा के कारण गायत्री देवी को भगवान ब्रह्मा की पत्नी तथा ब्रह्माणी के रूप में भी पूजा जाता है। विभिन्न पुराणों में इस प्रसंग के अनेक रूप और विवरण मिलते हैं, किन्तु सभी में गायत्री की दिव्य शक्ति और उनके आध्यात्मिक महत्व का ही प्रतिपादन किया गया है।

गायत्री मंत्र और उसका अर्थ

गायत्री मंत्र

ॐ भूर्भुवः स्वः।
तत्सवितुर्वरेण्यं।
भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥

मंत्र का अर्थ

हम उस परम दिव्य, पवित्र और तेजस्वी परमात्मा (सविता देव) के श्रेष्ठ प्रकाश का ध्यान करते हैं, जो समस्त संसार का सृजनकर्ता, पालनकर्ता और प्रेरणास्रोत है। वह परम दिव्य शक्ति हमारी बुद्धि को प्रकाशित करे, हमें सत्य मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे तथा हमारे जीवन को ज्ञान, विवेक और सद्गुणों से आलोकित करे।

गायत्री मंत्र को वेदों का सार माना गया है। यह केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि ज्ञान, चेतना, आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उत्थान का महान साधन है। नियमित श्रद्धापूर्वक इसके जप से मन, बुद्धि और आत्मा का परिष्कार होता है तथा व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।

Gayatri Mantra

गायत्री मंत्र

ॐ भूर्भुवः स्वः ।
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि ।
धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

अर्थ – हम उस सृष्टिकर्ता, प्रकाशमान, परम तेजस्वी परमात्मा का ध्यान करते हैं। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे।

इस मंत्र के जप से ज्ञान की प्राप्ति होती है तथा मन शांत और एकाग्र रहता है। ललाट पर तेज और आभा का विकास होता है। गायत्री माता के विभिन्न स्वरूपों का उनके मंत्रों सहित जप करने से दरिद्रता, दुःख और कष्टों का नाश होता है तथा निःसंतानों को संतान-प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है।

गायत्री मंत्र के चौबीस अक्षर

गायत्री मंत्र में चौबीस (24) अक्षर हैं। ऋषियों ने इन अक्षरों में बीजरूप से विद्यमान उन शक्तियों को पहचाना है जिन्हें चौबीस अवतार, चौबीस ऋषि, चौबीस शक्तियाँ तथा चौबीस सिद्धियाँ कहा जाता है। गायत्री मंत्र के ये चौबीस अक्षर चौबीस शक्ति-बीज माने गए हैं। गायत्री मंत्र की उपासना से इन शक्तियों और सिद्धियों का लाभ प्राप्त होता है।

1. तत्

देवता – गणेश
शक्ति – सफलता शक्ति
फल – कठिन कार्यों में सफलता, विघ्नों का नाश, बुद्धि की वृद्धि।

2. स

देवता – नरसिंह
शक्ति – पराक्रम शक्ति
फल – पुरुषार्थ, वीरता, शत्रुनाश तथा आक्रमणों से रक्षा।

3. वि

देवता – विष्णु
शक्ति – पालन शक्ति
फल – संरक्षण, आश्रितों की रक्षा तथा योग्यताओं की वृद्धि।

4. तु

देवता – शिव
शक्ति – कल्याण शक्ति
फल – अनिष्ट का विनाश, कल्याण, आत्मपरायणता एवं निश्चय शक्ति।

5. व

देवता – श्रीकृष्ण
शक्ति – योग शक्ति
फल – कर्मयोग, सौन्दर्य, सरसता, अनासक्ति एवं आत्मनिष्ठा।

6. रे

देवी – राधा
शक्ति – प्रेम शक्ति
फल – प्रेमभाव, द्वेष का नाश।

7. णि

देवी – लक्ष्मी
शक्ति – धन शक्ति
फल – धन, पद, यश एवं भौतिक समृद्धि।

8. यं

देवता – अग्नि
शक्ति – तेज शक्ति
फल – तेज, प्रतिभा, सामर्थ्य और शक्ति की वृद्धि।

9. भ

देवता – इन्द्र
शक्ति – रक्षा शक्ति
फल – रोग, शत्रु, चोर एवं अन्य भय से रक्षा।

10. र्गो

देवी – सरस्वती
शक्ति – बुद्धि शक्ति
फल – मेधा, विवेक, दूरदर्शिता एवं ज्ञान-वृद्धि।

11. दे

देवी – दुर्गा
शक्ति – दमन शक्ति
फल – विघ्नों पर विजय, दुष्टों का दमन।

12. व

देवता – हनुमान
शक्ति – निष्ठा शक्ति
फल – निर्भयता, कर्तव्यपरायणता एवं ब्रह्मचर्य।

13. स्य

देवी – पृथ्वी
शक्ति – धारण शक्ति
फल – धैर्य, सहनशीलता, गंभीरता और स्थिरता।

14. धी

देवता – सूर्य
शक्ति – प्राण शक्ति
फल – आरोग्य, दीर्घायु, विकास एवं विचारों का शोधन।

15. म

देवता – श्रीराम
शक्ति – मर्यादा शक्ति
फल – संयम, सौम्यता, मैत्री एवं मर्यादा-पालन।

16. हि

देवी – श्रीसीता
शक्ति – तप शक्ति
फल – पवित्रता, नम्रता, शील एवं सात्त्विकता।

17. धि

देवता – चन्द्र
शक्ति – शान्ति शक्ति
फल – चिंता, क्रोध, लोभ और मोह का नाश।

18. यो

देवता – यम
शक्ति – काल शक्ति
फल – समय का सदुपयोग, जागरूकता एवं निर्भयता।

19. यो

देवता – ब्रह्मा
शक्ति – उत्पादक शक्ति
फल – सृजन क्षमता एवं संतान-वृद्धि।

20. नः

देवता – वरुण
शक्ति – रस शक्ति
फल – सरलता, करुणा, माधुर्य एवं कलाप्रेम।

21. प्र

देवता – नारायण
शक्ति – आदर्श शक्ति
फल – उच्च चरित्र, आदर्श जीवन एवं नेतृत्व क्षमता।

22. चो

देवता – हयग्रीव
शक्ति – साहस शक्ति
फल – उत्साह, वीरता एवं विपत्तियों से संघर्ष की क्षमता।

23. द

देवता – हंस
शक्ति – विवेक शक्ति
फल – सत्-असत् का निर्णय, आत्मसंतोष एवं सत्संगति।

24. यात्

देवता – तुलसी
शक्ति – सेवा शक्ति
फल – लोकसेवा, सत्यनिष्ठा, आत्मशान्ति एवं परोपकार।

गायत्री उपासना से हर कार्य संभव

गायत्री, गीता, गंगा और गौ—ये भारतीय संस्कृति की चार आधारशिलाएँ मानी गई हैं। श्रीकृष्ण ने गीता में भी मनुष्य के कल्याण के लिए गायत्री और ॐ के महत्व का संकेत दिया है। वेदों में गायत्री को आयु, प्राण, शक्ति, कीर्ति, धन और ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली देवी कहा गया है। उनकी उपासना से साधक को इन दिव्य गुणों की प्राप्ति होती है।

गायत्री मंत्र का लाभ

महर्षि वेदव्यास कहते हैं कि जैसे पुष्पों में मधु और दूध में घृत साररूप होता है, वैसे ही समस्त वेदों का सार गायत्री है। यदि गायत्री साधना सिद्ध हो जाए तो वह कामधेनु के समान सभी उचित इच्छाओं को पूर्ण करने वाली बन जाती है।

गायत्री मंत्र का श्रद्धापूर्वक एवं नियमित जप करने से—

  • आध्यात्मिक चेतना का विकास होता है।

  • बुद्धि एवं स्मरण शक्ति बढ़ती है।

  • मन की शुद्धि होती है।

  • दुःख एवं कष्टों का निवारण होता है।

  • आत्मबल और तेज में वृद्धि होती है।

  • साधक के चारों ओर आध्यात्मिक संरक्षण का कवच निर्मित होता है।

देवी-देवताओं के गायत्री मंत्र

काली गायत्री
ॐ कालिकायै च विद्महे, श्मशानवासिन्यै धीमहि, तन्नो घोरा प्रचोदयात्॥

कृष्ण गायत्री
ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे, वासुदेवाय धीमहि, तन्नः कृष्णः प्रचोदयात्॥

गणेश गायत्री
ॐ एकदन्ताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥

दुर्गा गायत्री
ॐ कात्यायन्यै विद्महे, कन्याकुमार्यै धीमहि, तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्॥

राम गायत्री
ॐ दशरथाय विद्महे, सीतावल्लभाय धीमहि, तन्नो रामः प्रचोदयात्॥

रुद्र गायत्री
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे, महादेवाय धीमहि, तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥

लक्ष्मी गायत्री
ॐ महादेव्यै विद्महे, विष्णुपत्न्यै धीमहि, तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्॥

विष्णु गायत्री
ॐ नारायणाय विद्महे, वासुदेवाय धीमहि, तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥

सरस्वती गायत्री
ॐ वाग्देव्यै विद्महे, ब्रह्मपत्न्यै धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात्॥

हनुमान गायत्री
ॐ आञ्जनेयाय विद्महे, वायुपुत्राय धीमहि, तन्नो हनुमान् प्रचोदयात्॥

इस प्रकार करें गायत्री मंत्र का जप

गायत्री मंत्र का जप सूर्योदय से लगभग दो घंटे पूर्व से लेकर सूर्यास्त के एक घंटे बाद तक किया जा सकता है। मानसिक (मौन) जप किसी भी समय किया जा सकता है। सामान्यतः प्रातः और सायं संध्या का समय सर्वोत्तम माना गया है।

नियमित रूप से 108 बार गायत्री मंत्र का जप करने से—

  • बुद्धि प्रखर होती है।

  • स्मरण शक्ति बढ़ती है।

  • अध्ययन में एकाग्रता आती है।

  • व्यक्तित्व में तेज और आकर्षण बढ़ता है।

  • विवेक एवं निर्णय क्षमता का विकास होता है।

स्वामी विवेकानन्द ने गायत्री को “सद्बुद्धि का मंत्र” कहा है और इसे मंत्रों का मुकुटमणि बताया है।

गायत्री जयंती पर क्या करें?

  1. अन्न का दान करें।

  2. भंडारा या अन्नक्षेत्र का आयोजन करें।

  3. लोगों को शीतल जल पिलाएँ।

  4. पक्षियों के लिए जल-पात्र रखें।

  5. गायत्री मंत्र जप एवं हवन करें।

  6. गुड़ और गेहूँ का दान करें।

  7. धार्मिक पुस्तकों का दान करें।

  8. पवित्र नदी में स्नान करें।

  9. फलाहार व्रत रखें।

  10. श्री आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें।

  11. सत्य भाषण का संकल्प लें।

  12. सूर्य देव की उपासना करें।

जय माँ गायत्री। 🙏🌺



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