बचपन में स्कूल में गयी जाने वाली प्रार्थना वह शक्ति हमें दो दयानिधे



Wah Shakti Hame Do Dayanidhe Lyrics

वह शक्ति हमें दो दयानिधे, कर्तव्य मार्ग पर डट जावें ।
पर सेवा पर उपकार में हम, निज जीवन सफल बना जावें ।।
 
हम दीन दुखी निबलों विकलों, के सेवक बन सन्ताप हरें ।
जो हों भूले भटके बिछुड़े, उनको तारें ख़ुद तर जावें ।।
 
छल-द्वेष-दम्भ-पाखण्ड- झूठ, अन्याय से निशदिन दूर रहें ।
जीवन हो शुद्ध सरल अपना, शुचि प्रेम सुधारस बरसावें ।।
 
निज आन मान मर्यादा का, प्रभु ध्यान रहे अभिमान रहे ।
जिस देश जाति में जन्म लिया, बलिदान उसी पर हो जावें ।।
 
 
बचपन में स्कूल में गयी जाने वाली प्रार्थना वह शक्ति हमें दो दयानिधे आज भी जब हम कहीं किसी स्कूल के पास से गुजरते सुनते है तो शरीर में गजब का संचार उत्पन्न कर देती है इसकी मधुर गान, यह प्रार्थना मानो सभी मनोरथ को सिद्ध करती प्रतीत होती है।


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रैकवार क्षत्रिय वंश कुल देवी



raikwar kuldevi durga mata
रैकवार क्षत्रिय वंश कुल देवी

रैकवार क्षत्रिय वंश एवं कुलदेवी परम्परा

कुलदेवता – देवबाबा (भगवान श्रीराम),
कुलदेवी – माँ विंध्यवासिनी (दुर्गा माता),
कुल – सूर्यवंशी,
गुरु – शुक्राचार्य,
गोत्र – भारद्वाज,
नदी – सरयू माता,
पक्षी – बाज,
पवित्र वृक्ष – नीम,
प्रवर – भारद्वाज, बार्हस्पत्य एवं अंगिरस,
मंत्र – गोपाल मंत्र,
वेद – यजुर्वेद,
शाखा – वाजसनेयी माध्यंदिन,
तथा सूत्र – पारस्कर गृह्यसूत्र

इस प्रकार रैकवार क्षत्रिय वंश का उपर्युक्त विवरण विभिन्न क्षत्रिय इतिहास ग्रंथों एवं वंशावलियों में प्राप्त होता है।

रैकवार क्षत्रिय वंश की कुलदेवी

रैकवार वंश के आदि पुरुष महाराजा राकादेव जी माने जाते हैं। उनकी इष्ट देवी माता दुर्गा थीं, इसलिए रैकवार वंश की कुलदेवी भी माता दुर्गा को माना जाता है। ऐसा वर्णित है कि महाराजा राकादेव जी ने रैकागढ़ बसाया था तथा वे भाद्रपद (भादों) मास के अंतिम बुधवार को अपनी कुलदेवी की विशेष पूजा-अर्चना किया करते थे।

रैकवार वंश में बालक के जन्म, बालक-बालिका के विवाह तथा अन्य सभी शुभ एवं मांगलिक अवसरों पर कुलदेवी की पूजा का विशेष विधान है। इस पूजा में हल्दी, अक्षत, सुपारी, लौंग तथा पीले चावल का उपयोग किया जाता है। परम्परानुसार कुलदेवी की पूजा परिवार के कुलक्रम के अनुसार ज्येष्ठ पुत्र, ज्येष्ठ पौत्र, ज्येष्ठ प्रपौत्र तथा ज्येष्ठ पड़पौत्र एवं उनकी धर्मपत्नियों द्वारा सम्पन्न की जाती है, यद्यपि इसमें पूरे परिवार की सहभागिता रहती है।

समय के साथ महाराजा राका जी के वंशजों द्वारा रैकवार वंश का विस्तार हुआ। रैकागढ़ स्टेट से निकलकर महाराजा सल्देव जी, महाराजा बल्देव जी तथा भैरवानंद जी के वंशजों ने रामनगर-धमेड़ी (बाराबंकी) तथा बहराइच जनपद के बौड़ी, रेहुवा, चहलारी और हरिहरपुर क्षेत्रों में रैकवार वंशीय राज्य एवं तालुकेदारियाँ स्थापित कीं।

रैकवार वंश में कुलदेवी माता दुर्गा की पूजा की यह परम्परा प्राचीन काल से चली आ रही है। आज भी विभिन्न क्षेत्रों में बसे रैकवार परिवारों में शुभ अवसरों पर माता दुर्गा की विधिवत पूजा की जाती है। यह विश्वास किया जाता है कि कुलदेवी की कृपा से परिवार की रक्षा, समृद्धि एवं वंश की उन्नति होती है।

इतिहास में वर्णित है कि जब रैकवार वंश के वीर शासकों और योद्धाओं ने युद्धों में भाग लिया, तब वे रणभूमि में जाने से पूर्व अपनी कुलदेवी की आराधना अवश्य करते थे। महाराजा प्रताप शाह, महाराजा बालभद्र सिंह, राजा नरपति सिंह तथा राजा बख्तावर सिंह ने भी 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध करने से पूर्व माता दुर्गा की पूजा-अर्चना की थी।

शास्त्रों में कहा गया है कि जिस कुल में कुलदेवी प्रसन्न रहती हैं, उस कुल की अनेक पीढ़ियाँ सुख, समृद्धि और यश के साथ जीवन व्यतीत करती हैं। प्रत्येक वंश की एक अधिष्ठात्री देवी होती हैं, जिनकी विशेष अवसरों पर पूजा की जाती है। कुलदेवी को प्रसन्न रखने का सर्वोत्तम उपाय है कि परिवार के सभी सदस्य श्रद्धा एवं विधिपूर्वक उनकी आराधना करें। साथ ही श्राद्ध पक्ष में पितृ-तर्पण एवं पितरों के स्मरण की परम्परा का पालन करना भी आवश्यक माना गया है, जिससे कुल पर पितरों एवं कुलदेवी दोनों का आशीर्वाद बना रहता है।

रैकवार वंश की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विशेषताएँ

रैकवार क्षत्रिय समाज स्वयं को भगवान श्रीराम के इक्ष्वाकु सूर्यवंश की परम्परा से सम्बद्ध मानता है। यही कारण है कि भगवान श्रीराम को कुलदेवता तथा सरयू माता को पवित्र नदी के रूप में विशेष सम्मान दिया जाता है। रैकवार समाज में रामनवमी, विजयादशमी तथा दीपावली जैसे पर्व विशेष श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाए जाते हैं। धार्मिक आस्था, कुल-परम्पराओं के पालन तथा पूर्वजों के प्रति सम्मान की भावना इस समाज की प्रमुख विशेषताओं में रही है।

रैकवार शब्द की उत्पत्ति के विषय में विभिन्न मत प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार यह नाम रैकागढ़ अथवा राका राज्य से सम्बद्ध है, जिसके संस्थापक महाराजा राकादेव जी थे। उनके वंशज आगे चलकर रैकवार कहलाए। समय के साथ यह वंश अवध, पूर्वांचल तथा मध्य गंगा-घाटी के अनेक क्षेत्रों में फैल गया और विभिन्न स्थानों पर राज्य, तालुकेदारी तथा जमींदारी व्यवस्थाओं की स्थापना की।

रैकवार समाज में कुलदेवी माता विंध्यवासिनी की विशेष आराधना की जाती है, जिन्हें आदिशक्ति दुर्गा का ही स्वरूप माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य जैसे नामकरण, मुंडन, विवाह, गृहप्रवेश अथवा नवीन कार्यारम्भ से पूर्व कुलदेवी का स्मरण एवं पूजन करना शुभ माना जाता है। यह विश्वास है कि कुलदेवी की कृपा से परिवार, वंश और समाज की रक्षा होती है तथा समृद्धि एवं यश की प्राप्ति होती है।

रैकवार वंश की सांस्कृतिक पहचान में बाज पक्षी और नीम वृक्ष का विशेष स्थान है। बाज वीरता, साहस, सतर्कता और स्वाभिमान का प्रतीक माना जाता है, जबकि नीम पवित्रता, आरोग्य और दीर्घायु का प्रतीक है। इसी प्रकार सरयू माता के प्रति श्रद्धा इस वंश की धार्मिक चेतना का अभिन्न अंग रही है।

इतिहास में रैकवार क्षत्रिय समाज ने अनेक युद्धों और संघर्षों में अपनी वीरता का परिचय दिया है। विशेष रूप से अवध क्षेत्र में इस वंश के अनेक शासकों एवं जमींदारों ने विदेशी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष किया। चहलारी के राजा नरपति सिंह सहित अनेक रैकवार वीरों ने 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और राष्ट्र तथा स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया।

रैकवार समाज में ज्येष्ठ पुत्र को कुल-परम्पराओं का संरक्षक माना जाता है। कुलदेवी पूजा, पितृ-तर्पण तथा अन्य पारिवारिक धार्मिक अनुष्ठानों में उसकी विशेष भूमिका होती है। यह परम्परा पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंश की धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित रखने का कार्य करती रही है। आज भी रैकवार समाज अपने गौरवशाली इतिहास, धार्मिक आस्थाओं, कुल-परम्पराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को संजोए हुए भारतीय संस्कृति की समृद्ध परम्परा का प्रतिनिधित्व करता है।



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