डी.के. बासु के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए दिशा-निर्देश
Guidelines given by Hon'ble Supreme Court in the case of D.K. Basu
पुलिस अगर आपको कर रही हो गिरफ्तार, तो ये हैं आपके कानूनी अधिकार
डी.के. बासु बनाम स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल (1997 (1) एससीसी 416) के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किसी भी गिरफ्तारी के मामले में निम्नलिखित दिशा-निर्देशों का पालन किया जाना अपेक्षित है।
गिरफ्तारी का कार्य कर रहा पुलिस अधिकारी, गिरफ्तारी के समय, गिरफ्तारी का एक ज्ञापन-पत्र तैयार करेगा और यह ज्ञापन-पत्र दो गवाहों द्वारा अनुप्रमाणित किया जाएगा, जो गिरफ्तार व्यक्ति के परिवार के सदस्य या जिस क्षेत्र से गिरफ्तारी की गई है, उस क्षेत्र का कोई सम्मानित व्यक्ति हो सकता है। यह ज्ञापन-पत्र गिरफ्तार व्यक्ति द्वारा भी प्रतिहस्ताक्षरित किया जाएगा तथा इस पर गिरफ्तारी का समय एवं तिथि दर्ज होगी।
वह व्यक्ति जिसकी गिरफ्तारी की गई है या रोककर रखा गया है तथा किसी पुलिस थाना, पूछताछ केन्द्र या अन्य हवालात में अभिरक्षा में रखा जा रहा है, उसे यह अधिकार होगा कि उसके किसी मित्र, रिश्तेदार अथवा उसे जानने या उसका भला चाहने वाले व्यक्ति को यथाशीघ्र सूचित किया जाए कि उसे गिरफ्तार कर लिया गया है और किसी विशेष स्थान पर रखा गया है, जब तक कि गिरफ्तारी के ज्ञापन-पत्र को अनुप्रमाणित करने वाला गवाह स्वयं गिरफ्तार व्यक्ति का ऐसा मित्र या रिश्तेदार न हो।
पुलिस द्वारा गिरफ्तारी का समय, स्थान तथा गिरफ्तार व्यक्ति की अभिरक्षा का स्थान अवश्य अधिसूचित किया जाएगा। जहाँ गिरफ्तार व्यक्ति का कोई अन्य मित्र या रिश्तेदार जिले या शहर से बाहर रहता है, वहाँ कानूनी सहायता संगठनों तथा संबंधित क्षेत्र के पुलिस थानों के माध्यम से गिरफ्तारी के 8 से 12 घंटे के भीतर टेलीग्राम द्वारा सूचना दी जाएगी।
गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी गिरफ्तारी या हवालात में रखे जाने की सूचना अपने किसी मित्र को दिलवाने के अधिकार से अवश्य अवगत कराया जाएगा।
हवालात के स्थान पर व्यक्ति की गिरफ्तारी के संबंध में, उस व्यक्ति के उस मित्र का नाम जिसे गिरफ्तारी की सूचना दी गई है तथा उस पुलिस अधिकारी का नाम एवं पद, जिसकी अभिरक्षा में गिरफ्तार व्यक्ति को रखा गया है, डायरी में दर्ज किया जाएगा।
यदि गिरफ्तार व्यक्ति के शरीर पर कोई छोटा या बड़ा जख्म विद्यमान है, तो उसके निवेदन पर गिरफ्तारी के समय उसकी जांच की जाएगी तथा उसका रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा। गिरफ्तार व्यक्ति तथा गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारी दोनों निरीक्षण ज्ञापन पर हस्ताक्षर करेंगे और इसकी एक प्रति गिरफ्तार व्यक्ति को उपलब्ध कराई जाएगी।
गिरफ्तार व्यक्ति को हवालात में रखने के दौरान प्रत्येक 48 घंटे में अनुमोदित डॉक्टरों की सूची में से किसी एक डॉक्टर द्वारा अथवा निदेशक स्वास्थ्य सेवा द्वारा संबंधित राज्य या संघ राज्य क्षेत्र प्रशासन के लिए नियुक्त डॉक्टर द्वारा चिकित्सा जांच कराई जाएगी। निदेशक स्वास्थ्य सेवा सभी तहसीलों एवं जिलों के लिए ऐसी सूची तैयार करेगा।
उपर्युक्त के संदर्भ में, गिरफ्तारी ज्ञापन सहित सभी दस्तावेजों की प्रतियाँ अभिलेख हेतु मजिस्ट्रेट को भेजी जाएँगी।
गिरफ्तार व्यक्ति को पूछताछ के दौरान अपने वकील से मिलने की अनुमति दी जाएगी, तथापि संपूर्ण पूछताछ के दौरान नहीं।
सभी जिला एवं राज्य मुख्यालयों में एक पुलिस नियंत्रण कक्ष उपलब्ध कराया जाएगा, जहाँ गिरफ्तारी तथा गिरफ्तार व्यक्ति की अभिरक्षा के स्थान के संबंध में गिरफ्तार करने वाले अधिकारी द्वारा गिरफ्तारी के 12 घंटों के भीतर सूचना प्रदान की जाएगी तथा पुलिस नियंत्रण कक्ष के सूचना-पट्ट पर प्रदर्शित की जाएगी।
गिरफ्तारी करने वाले पुलिस अधिकारियों के नाम एवं पदनाम स्पष्ट एवं पठनीय होने चाहिए तथा उनकी पहचान के लिए नाम-पट्ट (Name Tag) लगा होना चाहिए। ऐसे सभी पुलिस अधिकारियों का विवरण, जो गिरफ्तार व्यक्ति की पूछताछ या अभिरक्षा से संबंधित हों, एक रजिस्टर में दर्ज किया जाएगा।
गिरफ्तारी पूर्व
बिना वारंट के गिरफ्तारी की शक्ति का प्रयोग किसी शिकायत की सच्चाई और महत्व तथा संबंधित व्यक्ति की अपराधिता के संबंध में उचित विश्वास होने पर, और साथ ही गिरफ्तारी की आवश्यकता के संबंध में कुछ जांच के उपरांत तर्कसंगत निर्णय पर पहुँचने के बाद ही किया जा सकता है।
(जोगिन्दर कुमार का मामला - (1994) 4 एस.सी.सी. 260)
संज्ञेय अपराध के मामले में केवल शक्ति होने के आधार पर कानून के हिसाब से बिना वारंट के गिरफ्तारी करना न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता है।
जोगिन्दर कुमार के मामले के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने प्रश्न संख्या 54 में घोषणा की कि क्या गिरफ्तारी की शक्ति का प्रयोग उचित रूप से किया गया या नहीं, यह स्पष्ट रूप से न्यायोचित होना चाहिए।
निम्नलिखित में से किसी एक या अन्य परिस्थितियों में संज्ञेय मामले में गिरफ्तारी को न्यायोचित ठहराया जा सकता है:-
ऐसे मामलों में हत्या, डकैती, लूटमार, बलात्कार जैसे गंभीर अपराध शामिल हैं। इन मामलों में संदिग्ध व्यक्ति को भाग जाने से रोकने तथा कानूनी प्रक्रिया से बच न पाने के लिए गिरफ्तारी आवश्यक है।
जब किसी व्यक्ति के हिंसात्मक आचरण पर संदेह हो और उसके द्वारा आगे भी अपराध किए जाने की संभावना हो।
संदिग्ध व्यक्ति को साक्ष्यों को नष्ट करने, गवाहों के साथ छेड़छाड़ करने अथवा अब तक गिरफ्तार न किए गए अन्य संदिग्धों को चेतावनी देने से रोकना आवश्यक हो।
यदि संदिग्ध व्यक्ति एक अभ्यस्त अपराधी है, जो सामान्य प्रकार के या अन्य अपराध कर सकता है।
(राष्ट्रीय पुलिस आयोग की तृतीय रिपोर्ट)
उपर्युक्त जघन्य अपराधों के अतिरिक्त, यदि कोई पुलिस अधिकारी किसी व्यक्ति को पुलिस थाने में उपस्थित होने तथा बिना अनुमति पुलिस थाना न छोड़ने की सूचना जारी करता है, तो गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए।
(जोगिन्दर कुमार का मामला (1994) 4 एस.सी.सी. 260)
जिन अपराधों में जमानत दी जा सकती है, उनमें गिरफ्तारी नहीं की जाएगी, जब तक कि संदिग्ध व्यक्ति के फरार होने की पूर्ण आशंका न हो।
गिरफ्तार करने या पूछताछ करने वाले पुलिस अधिकारी की स्पष्ट पहचान तथा पदनाम सहित नाम का टैग प्रदर्शित होना चाहिए। गिरफ्तार करने या पूछताछ करने वाले पुलिसकर्मी का विवरण उसी समय पुलिस थाने में रखे गए रजिस्टर में दर्ज किया जाना चाहिए।
गिरफ्तार
1. नियमानुसार, गिरफ्तार करते समय जोर-जबरदस्ती नहीं की जाएगी। तथापि, गिरफ्तारी का बलपूर्वक प्रतिरोध किए जाने की स्थिति में न्यूनतम आवश्यक बल का प्रयोग किया जा सकता है। फिर भी यह सुनिश्चित किया जाएगा कि गिरफ्तार किए जा रहे व्यक्ति के शरीर पर कोई दृश्य अथवा अदृश्य चोट न लगे।
2. गिरफ्तार किए जा रहे व्यक्ति की गरिमा की रक्षा की जाएगी। गिरफ्तार व्यक्ति की परेडिंग अथवा सार्वजनिक प्रदर्शन की किसी भी परिस्थिति में अनुमति नहीं होगी।
3. व्यक्ति की गरिमा का सम्मान करते हुए, जोर-जबरदस्ती तथा आक्रामकता के बिना, उसकी गोपनीयता के अधिकार की रक्षा करते हुए तलाशी ली जाएगी। महिलाओं की तलाशी केवल महिला द्वारा ही शालीनता के साथ की जाएगी। (धारा 51(2), दण्ड प्रक्रिया संहिता)
4. हथकड़ी और बेड़ी का कदापि प्रयोग नहीं किया जाएगा। इसे सर्वोच्च न्यायालय ने प्रेम शंकर शुक्ला बनाम दिल्ली प्रशासन (1980) 3 एस.सी.सी. 526 तथा लोकतंत्र के नागरिक बनाम असम राज्य (1995) 3 एस.सी.सी. 743 के निर्णयों में विधि के अनुसार बार-बार स्पष्ट किया है और अनिवार्य बनाया है।
5. जहाँ तक व्यवहारिक रूप से संभव हो, महिला पुलिस अधिकारी को संबद्ध किया जाएगा, जहाँ गिरफ्तार किया जाने वाला व्यक्ति महिला हो। सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले महिलाओं की गिरफ्तारी नहीं की जाएगी।
6. जहाँ किसी बच्चे या किशोर की गिरफ्तारी की जानी हो, वहाँ किसी भी परिस्थिति में बल प्रयोग या पिटाई नहीं की जाएगी। इस उद्देश्य के लिए पुलिस अधिकारी सम्मानित नागरिकों को सम्मिलित करेंगे, ताकि बच्चा या किशोर आतंकित न हो और न्यूनतम बल का प्रयोग किया जाए।
7. जहाँ बिना वारंट के गिरफ्तारी की जाती है, वहाँ गिरफ्तार व्यक्ति को तुरंत गिरफ्तारी का कारण उस भाषा में सूचित किया जाएगा जिसे वह समझता/समझती हो। इस उद्देश्य के लिए यदि आवश्यक हो तो पुलिस सम्मानित नागरिकों की सहायता ले सकती है। गिरफ्तारी का कारण पुलिस रिकॉर्ड में पहले से लिखित रूप में दर्ज किया जाएगा। गिरफ्तार व्यक्ति को लिखित कारण दिखाया जाएगा तथा मांग करने पर उसकी एक प्रति भी दी जाएगी। (धारा 50(1), दण्ड प्रक्रिया संहिता)
8. गिरफ्तार व्यक्ति, अपने द्वारा किए गए निवेदन पर, किसी मित्र, संबंधी या उसे जानने वाले अन्य व्यक्ति को अपनी गिरफ्तारी तथा हिरासत के स्थान की सूचना देने की मांग कर सकता है। पुलिस, जिस व्यक्ति को यह सूचना दी गई है, उसका विवरण एक रजिस्टर में दर्ज करेगी। (जोगिन्दर कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (1994) 4 एस.सी.सी. 260)
9. यदि किसी व्यक्ति को जमानती अपराध के लिए गिरफ्तार किया जाता है, तो पुलिस अधिकारी उसे जमानत पर छोड़े जाने के उसके अधिकार के विषय में सूचित करेगा, ताकि वह जमानत की व्यवस्था कर सके। (धारा 50(2), दण्ड प्रक्रिया संहिता)
10. गिरफ्तार व्यक्ति को उक्त अधिकारों की सूचना देने के अतिरिक्त, पुलिस उसे अपने पसंद के वकील से परामर्श एवं बचाव का अधिकार होने की सूचना भी देगी। उसे यह भी बताया जाएगा कि वह राज्य के खर्च पर निःशुल्क कानूनी सहायता प्राप्त करने का हकदार है। (डी.के. बासु बनाम स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल, 1997 (1) एस.सी.सी. 416)
11. जब गिरफ्तार व्यक्ति को पुलिस थाने लाया जाता है, तो यदि वह इस संबंध में निवेदन करता है, उसे शीघ्र चिकित्सा सहायता प्रदान की जाएगी। उसे इस अधिकार की सूचना भी तुरंत दी जाएगी। जहाँ पुलिस अधिकारी यह पाता है कि गिरफ्तार व्यक्ति को चिकित्सा सहायता की आवश्यकता है, किंतु उसकी स्थिति ऐसी है कि वह निवेदन करने में असमर्थ है, वहाँ पुलिस अधिकारी ऐसी सहायता की शीघ्र व्यवस्था करेगा। इसका विवरण उसी समय रजिस्टर में दर्ज किया जाएगा। महिला द्वारा चिकित्सा सहायता के निवेदन पर पंजीकृत महिला चिकित्सक द्वारा ही जांच की जाएगी। (धारा 53, दण्ड प्रक्रिया संहिता)
12. गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारी द्वारा गिरफ्तारी और हिरासत के स्थान की सूचना अविलंब पुलिस नियंत्रण कक्ष तथा जिला/राज्य मुख्यालय को दी जाएगी। इसके लिए एक निगरानी प्रणाली दिन-रात कार्य करेगी।
13. जैसे ही व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है, गिरफ्तार करने वाला पुलिस अधिकारी उस व्यक्ति के शरीर पर विद्यमान चोट के होने या न होने का विवरण गिरफ्तारी रजिस्टर में दर्ज करेगा। यदि गिरफ्तार व्यक्ति के शरीर पर कोई चोट पाई जाती है, तो वह चोट कैसे लगी, इसका पूर्ण विवरण तथा अन्य आवश्यक ब्यौरा रजिस्टर में दर्ज किया जाएगा, जिस पर गिरफ्तार व्यक्ति और पुलिस अधिकारी दोनों हस्ताक्षर करेंगे। गिरफ्तार व्यक्ति की रिहाई के समय उक्त विवरण के संबंध में पुलिस अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित एक प्रमाण-पत्र उसे प्रदान किया जाएगा।
14. यदि गिरफ्तार व्यक्ति को न्यायालय के आदेश के अधीन पुलिस हिरासत में रखा जाता है, तो हिरासत के दौरान प्रत्येक 48 घंटे में संबंधित राज्य या संघ राज्य क्षेत्र प्रशासन के स्वास्थ्य निदेशक द्वारा अनुमोदित चिकित्सकों के पैनल से नियुक्त किसी प्रशिक्षित चिकित्सा अधिकारी द्वारा उसकी चिकित्सा जांच कराई जाएगी। पुलिस हिरासत से रिहा किए जाने के समय भी उसकी चिकित्सा जांच कराई जाएगी तथा उसे एक प्रमाण-पत्र दिया जाएगा, जिसमें उसके शरीर पर किसी चोट के विद्यमान होने या न होने का उल्लेख होगा।
गिरफ्तारी के बाद
15. गिरफ्तार व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर सक्षम न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। (धारा 56 तथा 57, दण्ड प्रक्रिया संहिता)
16. गिरफ्तार व्यक्ति को पूछताछ के दौरान किसी भी समय अपने वकील से मिलने की अनुमति होगी।
17. पूछताछ स्पष्ट पहचान वाले स्थान पर की जाएगी, जिसे इस प्रयोजन हेतु अधिसूचित किया गया हो। यह स्थान सुलभ होना चाहिए तथा पूछताछ के स्थान की सूचना गिरफ्तार व्यक्ति के मित्रों या परिजनों को अवश्य दी जाएगी।
18. पूछताछ की विधि जीवन, गरिमा तथा स्वतंत्रता के अधिकार और उत्पीड़न एवं अपमानजनक व्यवहार के विरुद्ध अधिकार के अनुरूप होनी चाहिए।
दिशा-निर्देश को लागू करना
19. दिशा-निर्देशों का यथासंभव विभिन्न भाषाओं में अनुवाद किया जाएगा तथा प्रत्येक पुलिस थाने को उपलब्ध कराया जाएगा। इसे पुस्तिका में भी शामिल किया जाएगा, जो प्रत्येक पुलिसकर्मी को दी जाएगी।
20. दिशा-निर्देशों का प्रिंट मीडिया तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अधिकतम प्रचार-प्रसार किया जाएगा। इन्हें प्रत्येक पुलिस थाने में एक से अधिक भाषाओं में सूचना-पट्ट के प्रमुख स्थान पर प्रदर्शित किया जाएगा।
21. पुलिस एक शिकायत निवारण प्रणाली स्थापित करेगी, जो दिशा-निर्देशों के उल्लंघन संबंधी शिकायतों की शीघ्र जांच कर सुधारात्मक कार्रवाई करेगी।
22. जिस सूचना-पट्ट पर दिशा-निर्देश प्रदर्शित किए जाएंगे, उसी पर शिकायत निवारण प्रणाली की स्थिति तथा उस निकाय तक पहुँचने का तरीका भी प्रदर्शित किया जाएगा।
23. इन दिशा-निर्देशों के व्यापक प्रचार-प्रसार को सुनिश्चित करने हेतु न्यायालयों, गैर-सरकारी संगठनों, अस्पतालों तथा विश्वविद्यालयों को भी अनिवार्य रूप से शामिल किया जाएगा।
24. शिकायत निवारण प्रणाली के कार्यकलाप पारदर्शी होंगे तथा उसकी रिपोर्टें सुलभ होंगी।
25. दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करने पर दोषी पुलिस अधिकारी के विरुद्ध तत्काल कार्रवाई की जाएगी। यह कार्रवाई केवल विभागीय जांच तक सीमित नहीं होगी, बल्कि आवश्यकता अनुसार आपराधिक न्याय तंत्र को भी संदर्भित की जाएगी।
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