परमवीर चक्र विजेता अब्‍दुल हमीद



अब्दुल हमीद

अब्दुल हमीद का जन्म 1 जुलाई, 1933 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में स्थित धरमपुर नामक छोटे से गाँव में एक गरीब मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम मोहम्मद उस्मान था। परिवार की आजीविका चलाने के लिए कपड़ों की सिलाई का कार्य किया जाता था। लेकिन अब्दुल हमीद का मन इस काम में बिल्कुल नहीं लगता था। उनका मन तो कुश्ती, दंगल और दाँव-पेंचों में रमता था, क्योंकि पहलवानी उन्हें विरासत में मिली थी। उनके पिता और नाना दोनों ही प्रसिद्ध पहलवान थे।

बचपन से ही लाठी चलाना, कुश्ती लड़ना, बाढ़ के समय नदी पार करना, फौज और युद्ध के सपने देखना तथा गुलेल से सटीक निशाना लगाना उनकी विशेषताओं में शामिल था। वे इन सभी कार्यों में अपने साथियों से आगे रहते थे।

उनका एक गुण सबसे उल्लेखनीय था—दूसरों की सहायता करना, जरूरतमंद लोगों के काम आना तथा अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना। वे अन्याय को किसी भी स्थिति में सहन नहीं करते थे।

ऐसी ही एक घटना उनके गाँव में घटी। एक गरीब किसान की फसल को जबरन काटकर ले जाने के लिए वहाँ के एक जमींदार ने लगभग पचास गुंडों को भेजा। जब अब्दुल हमीद को इस बात का पता चला, तो उन्हें यह अन्याय सहन नहीं हुआ। वे अकेले ही उन गुंडों से भिड़ गए। उनके साहस और दृढ़ता के सामने सभी गुंडों को पीछे हटना पड़ा और अंततः उस गरीब किसान की फसल बच गई।

एक अन्य अवसर पर उन्होंने अपने प्राणों की परवाह किए बिना गाँव में आई भीषण बाढ़ के दौरान डूब रही दो युवतियों की जान बचाई। इस प्रकार उन्होंने अदम्य साहस, परोपकार और मानवता का परिचय दिया।



अब्दुल हमीद का बचपन

अब्दुल हमीद की बचपन से ही इच्छा एक वीर सैनिक बनने की थी। वे अपनी दादी से अक्सर कहा करते थे—“मैं फौज में भर्ती होऊँगा।” जब उनकी दादी कहतीं—“अपने पिता की सिलाई की मशीन चलाओ,” तब वे दृढ़ता से उत्तर देते—“हम जइब फौज में! तोहरे रोकले ना रुकब हम, समझलू।”

दादी को उनकी जिद के आगे झुकना पड़ता और कहना पड़ता—“अच्छा-अच्छा, जइय फौज में।” यह सुनकर हमीद बहुत प्रसन्न हो जाते। इसी प्रकार वे अपने पिता मोहम्मद उस्मान से भी सेना में भर्ती होने की जिद करते थे और कपड़ा सिलने के पारिवारिक व्यवसाय को अपनाने से इंकार कर देते थे।

सेना में भर्ती

इक्कीस वर्ष की आयु में अब्दुल हमीद जीविका की तलाश में रेलवे में भर्ती होने के लिए गए, किंतु उनके संस्कार और देशभक्ति की भावना उन्हें सेना में भर्ती होकर राष्ट्र-सेवा करने के लिए प्रेरित कर रही थी। अतः उन्होंने वर्ष 1954 में एक सैनिक के रूप में अपने सैन्य जीवन की शुरुआत की।

27 दिसम्बर, 1954 को उन्हें ग्रेनेडियर्स इन्फैंट्री रेजिमेंट में शामिल किया गया। जम्मू-कश्मीर में तैनाती के दौरान वे पाकिस्तान से आने वाले घुसपैठियों पर कड़ी निगरानी रखते थे और उन्हें करारा जवाब देते थे।

इसी दौरान उन्होंने इनायत अली नामक एक कुख्यात घुसपैठिये और डाकू को पकड़ने में सफलता प्राप्त की। उनके इस साहसिक कार्य से प्रभावित होकर सेना ने उन्हें पदोन्नति प्रदान की और वे लांस नायक बना दिए गए।

वर्ष 1962 में जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया, उस समय अब्दुल हमीद पूर्वोत्तर सीमांत क्षेत्र (नेफा—वर्तमान अरुणाचल प्रदेश) में तैनात थे। यद्यपि उस युद्ध में उन्हें अपनी वीरता का व्यापक प्रदर्शन करने का अवसर नहीं मिल सका, फिर भी उनके मन में सदैव यह आकांक्षा बनी रही कि वे युद्धभूमि में असाधारण पराक्रम दिखाकर शत्रु को परास्त करें और मातृभूमि की रक्षा में अपना सर्वोच्च योगदान दें।

1965 का युद्ध

8 सितम्बर 1965 की रात पाकिस्तान द्वारा भारत पर आक्रमण किए जाने पर भारतीय सेना के जवान उसका मुकाबला करने के लिए डटकर खड़े हो गए। वीर अब्दुल हमीद तरनतारन जिले के खेमकरण सेक्टर में सेना की अग्रिम पंक्ति में तैनात थे।

पाकिस्तान ने उस समय के लगभग अपराजेय माने जाने वाले अमेरिकी पैटन टैंकों के साथ खेमकरण सेक्टर के असल उताड़ गाँव पर हमला कर दिया। भारतीय सैनिकों के पास न तो पर्याप्त टैंक थे और न ही अत्याधुनिक भारी हथियार, किंतु उनके पास मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर कर देने का अदम्य साहस था। भारतीय सैनिक अपनी साधारण .303 रायफल और एल.एम.जी. के सहारे पैटन टैंकों का सामना कर रहे थे।

हवलदार वीर अब्दुल हमीद के पास एक "गन-माउंटेड जीप" थी, जो विशाल पैटन टैंकों की तुलना में मानो एक खिलौना प्रतीत होती थी। किंतु उन्होंने असाधारण साहस और युद्ध-कौशल का परिचय देते हुए अपनी जीप पर लगी गन से पैटन टैंकों के कमजोर हिस्सों पर सटीक निशाना साधना प्रारम्भ किया और एक-एक करके उन्हें ध्वस्त करने लगे।

अब्दुल हमीद के इस अद्वितीय पराक्रम को देखकर अन्य सैनिकों का भी उत्साह बढ़ गया। देखते ही देखते पाकिस्तानी सेना में भगदड़ मच गई। वीर अब्दुल हमीद ने अपनी गन-माउंटेड जीप से सात पाकिस्तानी पैटन टैंकों को नष्ट कर दिया। कुछ ही समय में भारत का असल उताड़ गाँव पाकिस्तानी पैटन टैंकों की कब्रगाह बन गया।

किन्तु पीछे हटती पाकिस्तानी सेना का पीछा करते समय उनकी जीप पर एक गोला आकर गिरा, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए। अगले दिन, 9 सितम्बर 1965 को उन्होंने वीरगति प्राप्त की। हालांकि, उनके निधन की आधिकारिक घोषणा 10 सितम्बर को की गई।

सम्मान और पुरस्कार

1965 के भारत-पाक युद्ध में असाधारण वीरता और अद्वितीय साहस का परिचय देने के लिए हवलदार अब्दुल हमीद को मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से अलंकृत किया गया।

28 जनवरी 2000 को भारतीय डाक विभाग ने वीरता पुरस्कार विजेताओं के सम्मान में पाँच डाक टिकटों का एक विशेष सेट जारी किया, जिसमें वीर अब्दुल हमीद के सम्मान में तीन रुपये मूल्य का एक सचित्र डाक टिकट भी शामिल था। इस डाक टिकट पर जीप पर सवार होकर रिकॉइललेस राइफल से निशाना साधते हुए वीर अब्दुल हमीद का चित्र अंकित किया गया है।

चौथी ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट ने उनकी स्मृति में उनकी कब्र पर एक समाधि का निर्माण कराया है। प्रत्येक वर्ष उनकी शहादत दिवस पर वहाँ मेले का आयोजन किया जाता है। असल उताड़ गाँव के निवासी उनके नाम पर एक डिस्पेंसरी, पुस्तकालय और विद्यालय का संचालन करते हैं।

सैन्य डाक सेवा ने भी 10 सितम्बर 1979 को उनके सम्मान में एक विशेष आवरण (Special Cover) जारी किया था। वीर अब्दुल हमीद की वीरता, राष्ट्रभक्ति और बलिदान आज भी देशवासियों को प्रेरित करते हैं। समूचा राष्ट्र उनके अद्वितीय साहस को श्रद्धापूर्वक नमन करता है।


अब्दुल हमीद प्रश्नोत्तरी

अब्दुल हमीद ने कितने टैंक तोड़े थे?

परमवीर चक्र विजेता अब्दुल हमीद ने 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध (1965 Indo-Pak War) में अपना पराक्रम दिखाया था। 'असल उत्तर की लड़ाई' (Battle of Asal Uttar) में हमीद ने अकेले ही पाकिस्तान के आठ पैटन टैंक बर्बाद कर दिए। पंजाब के तरनतारन जिले में एक गाँव है—असल उताड़।

अब्दुल हमीद ने दुश्मन के टैंकों को कैसे नष्ट किया?

इस बार हमीद ने देर न करते हुए अपनी जीप संभाली और टैंकों की ओर निकल पड़े। सामने से फायरिंग भी हो रही थी, लेकिन हमीद को कपास की खड़ी फसल का लाभ मिला और दुश्मन उन्हें सीधे निशाने पर नहीं ले सका। हमीद ने पहले प्रमुख टैंक को नष्ट किया और फिर अपनी स्थिति बदलकर दो और टैंकों को ध्वस्त कर दिया।

वीर अब्दुल हमीद कैसे शहीद हुए थे?

साल 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान वीर अब्दुल हमीद ने पाकिस्तानी दुश्मनों के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी थी। उन्होंने पाकिस्तान के सात पैटन टैंकों के परखच्चे उड़ा दिए थे। इसी दौरान वे शहीद हो गए थे।

अब्दुल हमीद कब शहीद हुए थे?

युद्धक्षेत्र में ही 10 सितम्बर, 1965 को अब्दुल हमीद शहीद हुए, लेकिन तब तक वे अप्रतिम शौर्य की अविस्मरणीय दास्तान लिख चुके थे। इससे पहले कि अब्दुल हमीद की जाँबाज़ी का किस्सा याद करें, आइए उनके निजी जीवन के बारे में जानते हैं। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के धरमपुर गाँव में 1 जुलाई, 1933 को हमीद का जन्म हुआ था।

अब्दुल हमीद को परमवीर चक्र कब मिला?

10 सितम्बर, 1965 को अब्दुल हमीद ने देश पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। मरणोपरांत परमवीर चक्र (भारत का सर्वोच्च वीरता पदक) से सम्मानित अब्दुल हमीद को 'टैंक डिस्ट्रॉयर' के नाम से जाना जाता है।

1965 के युद्ध में शहीद वीर अब्दुल हमीद को कौन-से वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया?

उनकी नज़र 4 ग्रेनेडियर्स के कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद के पोस्टर पर पड़ी। अब्दुल हमीद को 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में खेमकरण सेक्टर में पाकिस्तान के कई पैटन टैंकों को नष्ट करने के लिए परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

अब्दुल हमीद को परमवीर चक्र क्यों मिला?

अविचलित रहकर सी.क्यू.एम.एच. अब्दुल हमीद ने लगातार गोलीबारी जारी रखी और गंभीर रूप से घायल होने से पहले अपनी टुकड़ी को पाकिस्तान के सात टैंकों को नष्ट करने के लिए प्रेरित किया। उनकी विशिष्ट बहादुरी, प्रेरक नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।



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एक अंग्रेज जिलाधिकारी पर श्री राम कृपा



मधुरांतकम चेंगलपेट जिले का एक छोटा-सा शहर है, जो मद्रास (वर्तमान में चेन्नई) से पांडिचेरी के रास्ते पर है। वहां पर श्री रामचन्द्र जी का एक छोटा-सा मंदिर है। उस मंदिर के नजदीक एक बड़ी झील भी है। मद्रास से पांडिचेरी जाने वालों को उसी सड़क से जाना पड़ता है, जो मधुरांतकम की उस झील के बांध पर है। वह झील इतनी सुन्दर और काफी बड़ी है कि जिन लोगों को उस रास्ते पर जाना पड़ता है, उन लोगों का मन उस झील की तरफ आकर्षित हो जाता है और वे लोग उस झील के सुन्दर और मनोहर दृश्य को कभी भूल नहीं सकते।
उपर्युक्त झील और श्री रामचन्द्र जी के मंदिर के बारे में एक विचित्र लेकिन सच्ची कहानी प्रचलित है, जिससे मालूम होता है कि एक ईसाई अंग्रेज साहब भी श्री रामचन्द्र जी के भक्त बन सके और उनको भगवान के दर्शन भी मिले थे।
bhagwan shri ram


बात १८८२ ई० की है। उस समय लियानल प्राइस साहब चेंगलपेट जिले के कलक्टर थे। उनको मधुरांतकम की झील देखने की बड़ी इच्छा हुई। झील इतनी बड़ी थी कि उसके आस-पास के कई गाँवों की खेती बारी के लिये उसका जल पर्याप्त था। लेकिन दुर्भाग्य से हर साल बरसात में जब झील भर जाती थी, तब उसका बाँध टूटकर सारा पानी बाहर चला जाता था और झील हमेशा सूखी-की-सूखी ही रह जाती थी।
इलाके वाले प्रतिवर्ष गर्मी के दिनों में उस झील के बांध की मरम्मत करते थे। हर साल मरम्मत के समय मि० प्राइस खुद वहाँ आकर पड़ाव डालते और अपनी मौजूदगी में ही सारा काम कराते थे। बरसात में बाढ़ से इसका बाँध हर साल टूट जाया करता था। कलक्टर साहब की झील की बड़ी चिंता होती थी। सन् १८८२ में भी सदा की तरह झील की मरम्मत शुरू हुई। स्वयं कलेक्टर साहब उसका निरीक्षण कर रहे थे। एक बार आप मंदिर के पास से निकले। उनकी इच्छा हुई कि चलकर मन्दिर देख आवें।
वे मंदिर में आये। ब्राह्मणों ने उनको मंदिर दिखाया। साहब ने देखा कि एक स्थान पर ढेरों पत्थर जमा हैं। साहब ने ब्राह्मणों से पत्थरों के जमा कर रखने का कारण पूछा। ब्राह्मणों ने जवाब दिया- 'साहब! श्री सीता जी का मंदिर बनाना है। लेकिन उसके लिये हम लोग सिर्फ पत्थर ही जमा कर सके हैं। शेष काम के लिये काफी धन जमा करने में हम असमर्थ हैं। ऐसे सत्कार्य के सफलतापूर्वक सिद्ध होने में धन का अभाव ही एक बाधा हो रही है। ' 'मुझे भी तुम्हारी देवी जी से एक प्रार्थना करने दो।'
वहां के भक्त ब्राह्मण अपनी-अपनी मनोवृत्ति के अनुसार भगवान श्री रामचंद्र जी और माता सीताजी के गुणों और महिमाओं का वर्णन करने लगे। उसे सुनकर साहब ने उन लोगों से पूछा- 'क्या तुम लोग विश्वास करते हो कि तुम्हारी देवी भक्तों की मनोकामना पूरी करेंगी ?"
ब्राह्मणों ने दृढ़तापूर्वक जवाब दिया- 'निस्सन्देह।' कलक्टर साहब ने फिर पूछा-'अच्छा, यदि मैं भी तुम्हारी देवी जी से कुछ प्रार्थना करूं तो मेरी भी इच्छा उनकी कृपा से पूरी होगी?' ब्राह्मणों ने जवाब दिया जरूर।' तब साहब ने उन लोगों से कहा, 'यदि तुम लोगों की बात सच हो तो मैं भी तुम्हारी देवी जी से प्रार्थना करता हूँ कि इस झील की रक्षा, जिसकी मरम्मत हर साल हो रही है और पीछे जिसका नाश भी होता आ रहा है, यदि तुम्हारी देवी जी की कृपा से हो जाये, तो तुम्हारी देवी जी का मंदिर बनाने का भार मैं अपने ऊपर लूँगा।' प्रार्थना करके साहब वहां से लौट गए। मरम्मत का काम पूरा हो जाने के बाद साहब अपने घर चले गये।
फिर वर्षा शुरू हुई। साहब को बड़ी चिंता लगी। अबकी बार साहब घर में चुप न बैठ सके। उन्होंने मधुरांतकम में अपना पड़ाव डाला। एक रात को बहुत जोर से पानी बरस रहा था। इतने जोर से वृष्टि हो रही थी कि उस समय बाहर निकलना भी बहुत कठिन था। साहब बहुत अधीर हो उठे। उनको जरा भी चैन न मिला। वे तुरंत हाथ में छतरी लेकर झील की तरफ लपके। उनके दो नौकर, जो उस समय जाग रहे थे, पीछे-पीछे चले। उनको साहब के काम पर बड़ा अचरज हो रहा था।
साहब झील के बांध पर आकर खड़े हो गये। आकाश से मूसलाधार वृष्टि हो रही थी। रह-रहकर बिजली चमकती थी। बिजली के प्रकाश में साहब ने देखा कि झील पानी से ठसाठस भरी है। अब यदि थोड़ा भी जल उसमें ज्यादा पड़ जाएगा तो बस, सारा परिश्रम व्यर्थ हो जायेगा।
साहब घबड़ाये हुए वहाँ आकर खड़े हो गये, जहाँ हर साल बांध टूटता था। लेकिन वहाँ उन्हें कहीं टूट जाने का कोई लक्षण नहीं दिखाई पड़ा। अकस्मात् वहाँ बिजली की रोशनी दीख पड़ी। उस तेज:पुंज के बीच में श्याम और गौर वर्ण के दो सुन्दर युवक हाथ में धनुष-बाण लिए खड़े नजर आये। उन दोनों के सुन्दर और सुदृढ़ शरीर और उनके अनुपम रूप-लावण्य को देखकर साहब को बड़ा अचंभा हुआ। एक साथ आश्चर्य और भय का अनुभव होने लगा। वे एकाग्र दृष्टि से उसी तरफ देखने लगे, जहाँ दोनों वीर खड़े थे। अब साहब को पक्का विश्वास हो गया कि वे दोनों अलौकिक और अतुलनीय हैं। साहब अपनी छतरी और टोपी दूर फेंक कर उन करुणा मूर्तियों के पैरों पर गिर पड़े और हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगे।
नौकरों को साहब का यह अद्भुत आचरण देखकर संदेह हुआ कि कहीं हमारे साहब पागल तो नहीं हो गये। वे दोनों दौड़कर साहब के पास आये और घबड़ाये हुए से पूछने लगे– 'साहब! आपको क्या हो गया?" साहब उन लोगों से गद्गद स्वर में कहने लगे- 'नादानो। उधर देखते नहीं हो ?' देखो उधर, उधर ! कैसे सुन्दर दो सुन्दर और बलवान् युवक हाथों में धनुष-बाण लिये खड़े हैं। उनके चारों ओर बिजली की रोशनी सी  फैल रही है। उनमें एक हैं श्याम वर्ण के और दूसरे गौर वर्ण के। उनकी आँखों से करुणा की मानो वर्षा हो रही है। उनको देखते ही हमारी व्यग्रता मिटती जा रही है। अभी उन दोनों को देख लो। उधर देखो, उधर !!!'
नौकरों को कुछ भी दिखाई नहीं पड़ा। साहब को पूरा विश्वास हो गया कि स्वयं श्री रामचन्द्रजी और लक्ष्मण जी ने ही झील की रक्षा की। दूसरे दिन सवेरे ही मधुरांतकम के लोगों ने पहली बार देखा कि झील पानी से परिपूर्ण है। लोगों के आनन्द की कोई सीमा न थी। साहब ने अपने कथनानुसार दूसरे ही दिन से श्रीसीताजी के मंदिर का काम शुरू कर दिया। जब तक मंदिर का काम पूरा न हुआ, तब तक वे वहीं रहे। जिस दिन झील की रक्षा हुई, उस दिन से वहाँ के श्री रामचंद्र जी का नाम पड़ा 'एरि कात्त पेरुमाल' अर्थात 'भगवान जिसने झील की रक्षा की है।'
श्री जानकी जी के मंदिर में एक पत्थर पर तमिल में यह बात खुदी हुई है, जिसके माने यह है कि, 'यह धर्म कार्य जान कंपनी की जागीर - कलेक्टर लियानल प्राइसका है।' इस विचित्र घटना से हम लोगों को मालूम होता है कि एक अंग्रेज ईसाई सज्जन श्री रामचंद्र जी के भक्त बनकर उनके दर्शन पा सके और श्रीसीता जी के मन्दिर के निर्माता बने। जो मनुष्य भगवान का सच्चा भक्त है और भगवान पर विश्वास करके उनको मानता है, वह चाहे जिस कुल का भी क्यों न हो, उसपर दया सिन्धु भगवान की पूर्ण रूप से अनुकम्पा रहती है।

संकलन


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लंगोट पहनने के फायदे और लाभ



जब भी लंगोट का नाम आता है, तो मन में सबसे पहले हनुमान जी का स्मरण होता है, क्योंकि उन्हें सदैव लंगोट धारण किए हुए चित्रित किया जाता है। लंगोट साधकों का भी प्रतीक माना जाता है, क्योंकि प्राचीन काल में अनेक साधु-संत साधना के समय अपने शरीर पर लंगोट के अतिरिक्त कोई अन्य वस्त्र धारण नहीं करते थे। ऐसे साधक आज भी कहीं-कहीं देखने को मिल जाते हैं।

इसके अतिरिक्त, लंगोट ब्रह्मचर्य का भी प्रतीक माना जाता है, क्योंकि यह विश्वास किया जाता है कि जो व्यक्ति लंगोट धारण करता है, उसका अपनी कामेच्छा और इंद्रियों पर अधिक नियंत्रण रहता है।

लंगोट त्रिकोणाकार आकार का एक अंतःवस्त्र है, जिसे प्रायः कुश्ती करने वाले पहलवान तथा व्यायाम करने वाले व्यक्ति अपने अभ्यास के दौरान पहनते हैं। अभ्यास के समय यह शरीर के गुप्त अंगों को ढके रखने के साथ-साथ उन्हें चोट से भी सुरक्षित रखता है। इसके अतिरिक्त भी लंगोट की अनेक विशेषताएँ बताई जाती हैं।

लंगोट में किसी विशेष रंग को अनिवार्य नहीं माना जाता, किंतु लाल रंग का लंगोट विशेष रूप से लोकप्रिय है। इसके पीछे लोगों के अपने-अपने मत हैं। कोई इसे आस्था से जोड़ता है, तो कोई इसे चिकित्सा-शास्त्र से संबंधित मानता है।

पूर्वकाल में अनेक लोग और साधु ब्रह्मचर्य का पालन करते थे, जिसके कारण वे सदैव लंगोट धारण किए रहते थे। उनका मानना था कि लंगोट कामेच्छा पर नियंत्रण बनाए रखने में सहायक होता है।

Langot Nappies Pahanne ke Fayde Laabh

अक्सर आपने पहलवानों को लंगोट पहने हुए देखा होगा, जो अखाड़े में अभ्यास या कुश्ती करते हैं। अखाड़े में जाने वाले लोग लंगोट पहनना आवश्यक मानते हैं। लंगोट भारतीय पुरुषों द्वारा लंगोटी अथवा अंतःवस्त्र के रूप में पहना जाने वाला एक पारंपरिक वस्त्र है। मलयालम भाषा में इसे "लैंकोटी" या "लंगोटी" कहा जाता है। लंगोट को "कौपीन" भी कहा जाता है।

अब केवल अखाड़ों में ही नहीं, बल्कि कुछ जिमों में भी कठिन व्यायाम और जटिल वर्कआउट के दौरान लंगोट पहनना आवश्यक माना जाने लगा है। आइए जानते हैं कि लंगोट पहनना पुरुषों के स्वास्थ्य के लिए कितना महत्वपूर्ण माना जाता है।

अखाड़े में व्यायाम या कुश्ती के समय पुरुष लंगोट अवश्य पहनते हैं। लंगोट कोई नई परंपरा नहीं है, बल्कि वैदिक काल से ही हमारे देश में पुरुष इसे अंतःवस्त्र के रूप में धारण करते आ रहे हैं। समय के साथ पुरुषों का यह पारंपरिक अंतःवस्त्र मुख्यतः अखाड़ों, योगाभ्यास और पारंपरिक व्यायाम तक सीमित होकर रह गया है।

लंगोट को विभिन्न नामों से जाना जाता है, जैसे—कौपीनम्, कौपीन, लंकौटी, लंगौटी और लंगोट। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार अंतःवस्त्र के रूप में लंगोट पहनना पुरुषों के जननांगों के लिए लाभकारी माना जाता रहा है। इतना ही नहीं, कुछ लोगों का यह भी मानना है कि यह यौन स्वास्थ्य और वैवाहिक जीवन को बेहतर बनाए रखने में सहायक हो सकता है।

हालाँकि, इन मान्यताओं के संबंध में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के निष्कर्ष भिन्न हो सकते हैं, इसलिए स्वास्थ्य संबंधी किसी भी दावे को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझना आवश्यक है।

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लंगोट का संबंध केवल परंपरा, अखाड़ों और व्यायाम से ही नहीं, बल्कि पुरुषों के स्वास्थ्य से भी जोड़ा जाता है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार लंगोट पहनना पुरुषों के शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ उनके प्रजनन स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है। यही कारण है कि प्राचीन काल से पहलवान, साधक और व्यायाम करने वाले लोग लंगोट धारण करते रहे हैं।

आपने अक्सर अखाड़ों में जाने वाले पहलवानों को लंगोट पहने देखा होगा। उनके लिए लंगोट केवल एक वस्त्र नहीं, बल्कि व्यायाम और अनुशासन का आवश्यक अंग माना जाता है। लंगोट व्यायाम के दौरान शरीर के संवेदनशील अंगों को सहारा प्रदान करता है तथा उन्हें अनावश्यक झटकों और चोटों से बचाने में सहायक माना जाता है।

इसी कारण आज भी कुछ जिमों और पारंपरिक व्यायाम केंद्रों में कठिन एवं जटिल वर्कआउट के दौरान लंगोट पहनने की सलाह दी जाती है, जबकि कुछ स्थानों पर इसे अनिवार्य भी किया गया है। पारंपरिक दृष्टिकोण से यह माना जाता है कि लंगोट पहनने से शरीर में स्थिरता बनी रहती है और पुरुषों के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि नियमित रूप से लंगोट धारण करने से पुरुषों के यौन स्वास्थ्य और वैवाहिक जीवन को लाभ मिल सकता है। हालांकि, इस संबंध में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के निष्कर्ष अलग हो सकते हैं। इसलिए स्वास्थ्य संबंधी किसी भी दावे को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझना आवश्यक है।

आइए जानें कि परंपरागत मान्यताओं और व्यायाम पद्धतियों में लंगोट को पुरुषों के स्वास्थ्य के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों माना गया है।

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अन्तःवस्त्र के रूप में लंगोट को पारंपरिक रूप से ऊर्जा-संरक्षण और शारीरिक सुरक्षा का साधन माना गया है। लंगोट बाँधने का सबसे बड़ा लाभ अंडकोश (टेस्टिकल्स) को सहारा और सुरक्षा प्रदान करना माना जाता है। पारंपरिक मान्यता के अनुसार अत्यधिक शारीरिक श्रम या भारी व्यायाम के कारण कभी-कभी अंडकोशों में सूजन आ सकती है, जिसे आम बोलचाल की भाषा में "पानी भर जाना" भी कहा जाता है। माना जाता है कि लंगोट अंडकोशों को उचित सहारा देकर ऐसी समस्याओं की संभावना को कम करने में सहायक होता है।

इसके अतिरिक्त लंगोट निचले उदर (लोअर एब्डॉमेन) की मांसपेशियों को भी सहारा प्रदान करता है। जिन लोगों को भारी व्यायाम या कठिन शारीरिक श्रम के कारण पेट के निचले हिस्से में तनाव अथवा सूजन की शिकायत रहती है, उनके लिए भी इसका उपयोग लाभकारी माना जाता है।

दौड़ते समय भी लंगोट पहनने की परंपरा रही है, क्योंकि यह शरीर के संवेदनशील अंगों को स्थिरता प्रदान करता है और अनावश्यक झटकों से बचाने में सहायक माना जाता है। इसी कारण पहलवान, व्यायामकर्ता और अखाड़ों में अभ्यास करने वाले लोग लंबे समय से इसका उपयोग करते आ रहे हैं।

यद्यपि लंगोट किसी भी रंग का हो सकता है, फिर भी लाल रंग का लंगोट विशेष रूप से लोकप्रिय माना जाता है। पारंपरिक दृष्टि से लाल रंग अनुशासन, शक्ति और उत्साह का प्रतीक माना जाता है। यह रंग भगवान हनुमान से भी जुड़ा हुआ माना जाता है। अधिकांश अखाड़ों में हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित होती है और वहाँ लाल रंग का विशेष महत्व होता है। इसी कारण अनेक पहलवान और साधक लाल रंग का लंगोट धारण करना पसंद करते हैं।

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जिस प्रकार हमारे पूर्वज लंगोट का उपयोग करते थे, उसे देखकर कहा जा सकता है कि लंगोट हमारी परंपराओं का एक महत्वपूर्ण अंग है। किंतु आज की पीढ़ी को हमारे पुराने रीति-रिवाजों और परंपराओं के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है, जिसके परिणामस्वरूप वे इन बातों से वंचित रह जाते हैं।

हमारी वर्तमान पीढ़ी को लंगोट के महत्व के बारे में बहुत कम जानकारी है और यही कारण है कि हम अपनी पारंपरिक धरोहर को धीरे-धीरे पीछे छोड़ते जा रहे हैं। इसका प्रभाव भविष्य में हमारी सांस्कृतिक पहचान पर पड़ सकता है।

मांगलिक कार्यों, विशेषकर रामचरितमानस के अखंड पाठ, विभिन्न यज्ञों, महायज्ञों तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में जो ध्वज स्थापित किया जाता है, उसका आकार प्रायः लंगोट के समान माना जाता है। इसे ब्रह्मचर्य, संयम और ऊर्जा-संरक्षण का प्रतीक माना जाता है। इस प्रकार यह आत्मसंयम और शक्ति-संचय का संदेश देता है।

कुल मिलाकर, लंगोट को ऊर्जा-संरक्षण और अनुशासन का प्रतीक-चिह्न माना गया है। आज भी बाल-ब्रह्मचारी हनुमान जी सहित अनेक देवी-देवताओं को लंगोट अर्पित किया जाता है। अनेक स्थानों पर मनोकामना पूर्ण होने पर लंगोट चढ़ाने की परंपरा आज भी जीवित है और श्रद्धापूर्वक निभाई जाती है।

वाराणसी घाट पर लंगोट पहना हुआ व्‍यक्ति
वाराणसी घाट पर लंगोट पहना हुआ व्‍यक्ति

क्या है लंगोट?

लंगोट वास्तव में पुरुषों का एक अंडरगारमेंट (अंतःवस्त्र) है। इसे पुरुषों का पारंपरिक अंतःवस्त्र भी कहा जाता है। यह बिना सिला हुआ (Unstitched) त्रिकोणाकार कपड़ा होता है, जिसे विशेष रूप से पुरुष जननांगों, अर्थात् अंडकोष (टेस्टिकल्स) और लिंग (पेनिस) को ढकने एवं सहारा देने के लिए बनाया जाता है। इसे बाँधने का एक विशेष तरीका होता है, जिसके कारण इसे पुरुषों के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है।

लंगोट का अर्थ

लंगोट शब्द को परंपरागत रूप से दो भागों में समझाया जाता है—

लंगोट = लं + गोट

अर्थात् जो "लं" और "गोट" दोनों को संभालकर रखे तथा उनकी रक्षा करे, उसे लंगोट कहा जाता है। यह इसकी लोक-प्रचलित व्याख्या है।

लंगोट कैसे पहनी जाती है?

लंगोट देखने में भले ही साधारण प्रतीत होती हो, किंतु इसे बाँधने का एक विशेष तरीका होता है। इसे किसी अनुभवी पहलवान, व्यायाम प्रशिक्षक अथवा अखाड़े में जाकर सीखा जा सकता है।

लंगोट को अंडकोष और लिंग के चारों ओर इस प्रकार बाँधा जाता है कि उन्हें पर्याप्त सहारा मिले तथा अनावश्यक दबाव भी न पड़े। पारंपरिक मान्यता के अनुसार यह अंडकोषों को स्थिर रखने में सहायक होता है।

लंगोट बाँधने की विधि

लंगोट के मुख्यतः तीन भाग होते हैं—

  1. ऊपरी भाग में दोनों ओर पतली डोरियाँ (रस्सियाँ) होती हैं।

  2. इन डोरियों को कमर पर बाँधा जाता है।

  3. इसके बाद लंगोट के तीसरे भाग को पीछे की ओर रखा जाता है।

  4. फिर उसे नीचे से प्राइवेट पार्ट के साथ ऊपर की ओर लाकर कमर पर बँधी दोनों डोरियों के बीच से निकाला जाता है।

  5. अंत में उसे पुनः पीछे की ओर ले जाकर दोनों डोरियों के मध्य सुरक्षित रूप से फँसा दिया जाता है।

इस प्रकार लंगोट शरीर पर ठीक प्रकार से बँध जाती है और आवश्यक सहारा प्रदान करती है।

Langot Nappies Pahanne ke Fayde Laabh


लंगोट कैसे पहनें

लंगोट एक प्रकार का अंतःवस्त्र (अंडरवियर) है, जिसे पारंपरिक रूप से भारतीय उपमहाद्वीप में पुरुषों द्वारा पहना जाता है। जॉकस्ट्रैप के समान यह कपड़े के एक त्रिकोणीय भाग से बना होता है, जिसके ऊपरी हिस्से में बाँधने के लिए डोरियाँ होती हैं तथा नीचे की ओर कपड़े की एक लंबी पट्टी होती है। एक बार इसे सही स्थान पर स्थापित कर लेने के बाद, इसकी पट्टियों को उचित ढंग से लपेटना और बाँधना अपेक्षाकृत सरल होता है।

कुछ लोग भारोत्तोलन (वेट लिफ्टिंग), योगाभ्यास अथवा कुश्ती जैसे खेलों के दौरान लंगोट पहनते हैं, क्योंकि इसे जननांगों को सहारा और सुरक्षा प्रदान करने वाला वस्त्र माना जाता है।

लंगोट बाँधना

1. लंगोट का एक भाग ऐसा होता है, जहाँ आप उसकी सिलाई (सीम) को महसूस कर सकते हैं, और दूसरा भाग ऐसा होता है जहाँ सिलाई का अनुभव नहीं होता। अधिक आराम के लिए लंगोट पहनते समय उसका बिना सिलाई वाला भाग शरीर की ओर रखना चाहिए। इसके बाद लंगोट को सही स्थिति में रखकर आगे की बाँधने की प्रक्रिया पूरी की जाती है।

2. त्रिकोण के लंबे, सपाट किनारे को, जिससे दो पट्टियाँ जुड़ी होती हैं, अपनी पीठ के ऊपरी भाग पर रखें। प्रत्येक हाथ में एक-एक पट्टी पकड़ें और उन्हें शरीर के सामने की ओर लाएँ, ताकि कपड़ा अच्छी तरह तना रहे। इस स्थिति में कपड़े की लंबी पट्टी अथवा त्रिकोण का निचला सिरा आपके पीछे तथा दोनों पैरों के बीच लटका रहना चाहिए।

3. कपड़े के लंबे टुकड़े को अपने पैरों के बीच से होते हुए ऊपर की ओर खींचें। अपने पैरों के बीच हाथ ले जाकर कपड़े को पकड़ें। इसे अपने पैरों के बीच से ऊपर खींचें और ध्यान रखें कि कपड़ा सीधा तथा बिना सिलवटों के रहे। इसके बाद इसे अपनी कमर तक लाएँ और उसके सिरे को अपने कंधे पर डाल दें। कपड़े को कसकर खींचते समय यह सुनिश्चित करें कि आपके गुप्तांग शरीर के साथ सटे हुए रहें और पीछे की ओर व्यवस्थित हों। लंबे टुकड़े को कंधे पर डाल देने से वह सामने की गाँठ बाँधते समय रास्ते में नहीं आता और लंगोट को ठीक प्रकार से बाँधने में सुविधा होती है।

4. डोरियों को अपने सामने लाएँ और उन्हें एक बार आपस में पार करें। इसके बाद उन्हें खींचकर कस लें और एक डोरी को दूसरी डोरी के ऊपर इस प्रकार लपेटें, जैसे आप चौकोर गाँठ (Square Knot) या जूते के फीते बाँधना शुरू करते हैं। ध्यान रखें कि यह गाँठ आपकी प्राकृतिक कमर (Natural Waist) के स्तर पर बँधे।

5. डोरियों को पीछे की ओर ले जाकर पुनः क्रॉस करें। डोरियों को कसकर खींचते हुए उन्हें अपनी पीठ के चारों ओर लपेटें। फिर उन्हें एक-दूसरे के ऊपर से गुजारते हुए क्रॉस करें और विपरीत दिशाओं से पुनः सामने की ओर ले आएँ। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान डोरियों को पर्याप्त रूप से कसा हुआ रखें, ताकि लंगोट अपनी जगह पर मजबूती से बनी रहे।

6. डोरियों को सामने की ओर लाकर एक सुरक्षित गाँठ बाँधें। डोरियों को शरीर के ठीक मध्य में बाँधने के बजाय कूल्हे के किसी एक ओर थोड़ा हटकर बाँधें। इससे लंगोट बँधने के बाद अधिक आरामदायक महसूस होगा। इसके बाद डोरियों को अच्छी तरह कस लें और फिर उन्हें धनुषाकार (Bow Knot) में बाँधें, जैसे आप जूते के फीते बाँधते हैं। इससे लंगोट सुरक्षित रूप से अपनी जगह पर बनी रहेगी। चाहें तो धनुषाकार गाँठ के स्थान पर चौकोर गाँठ (Square Knot) भी बाँध सकते हैं।


7. कपड़े के लंबे टुकड़े को पीछे की ओर सुरक्षित करें। कपड़े के लंबे टुकड़े को अपने कंधे से नीचे उतारें और उसे उस गाँठ के ऊपर रखें, जिसे आपने अभी बाँधा है। इसके बाद पीछे की ओर से अपने पैरों के बीच हाथ ले जाकर कपड़े के सिरे को पकड़ें और उसे अपने पैरों के बीच से पीछे की ओर खींचें। कपड़े को अच्छी तरह तना हुआ रखें और फिर उसके सिरे को पीछे स्थित त्रिकोण के ऊपरी भाग अथवा कमर पर बँधी डोरियों के बीच सुरक्षित रूप से खोंस दें। इस प्रकार लंगोट पूरी तरह से सुरक्षित हो जाती है और अपनी जगह पर मजबूती से बनी रहती है।

 

कार्डियो के समय है जरूरी

जब भी आप कोई जटिल एक्सरसाइज या कठिन वर्कआउट करें, उस समय लंगोट अवश्य पहनें। यह पुरुषों के गुप्तांगों के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी माना जाता है। इससे उन पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ता। कार्डियो एक्सरसाइज करते समय भी आप इस प्रकार अपना ध्यान रख सकते हैं।

सेहत से है लंगोट का संबंध

लंगोट को पारंपरिक रूप से पुरुषों के अंडकोषों (टेस्टिकल्स) के लिए लाभकारी माना जाता है। कई बार अत्यधिक वर्कआउट या शारीरिक श्रम के कारण इस क्षेत्र में असुविधा या दर्द की शिकायत हो सकती है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी प्रजनन क्षमता बनाए रखने के लिए अंडकोषों के स्वास्थ्य का ध्यान रखना आवश्यक माना जाता है।

कई बार अंडकोषों में पानी भर जाने जैसी समस्याएँ भी हो सकती हैं, जो व्यक्ति के स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती हैं। पारंपरिक मान्यता के अनुसार लंगोट इन समस्याओं से बचाव में सहायक माना जाता है।

स्किन-फ्रेंडली

लंगोट की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह सामान्यतः सूती (कॉटन) कपड़े से बनाया जाता है। सूती कपड़ा त्वचा के लिए अनुकूल माना जाता है और इससे रैशेज या अन्य त्वचा संबंधी समस्याओं की संभावना अपेक्षाकृत कम रहती है। इसे स्किन-फ्रेंडली माना जाता है तथा यह अनावश्यक गर्मी उत्पन्न नहीं होने देता। इसी कारण इसे पुरुषों के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी माना जाता है।

क्या लंगोट बाँधना जरूरी है?

लंगोट बाँधने के संभावित लाभों के बारे में ऊपर बताया जा चुका है। बहुत से लोग वर्षों से जिम में अभ्यास कर रहे हैं और लंगोट का उपयोग नहीं करते, फिर भी उन्हें कोई विशेष समस्या नहीं होती। ऐसे लोग सपोर्टर या टाइट अंडरवियर का भी उपयोग करते हैं।

हालाँकि यह भी आवश्यक नहीं है कि यदि किसी अन्य व्यक्ति को कोई समस्या नहीं हुई, तो आपको भी कभी कोई समस्या न हो। दूसरी बात यह है कि कई लोग अपनी व्यक्तिगत स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में खुलकर चर्चा नहीं करते।

यदि आपको लंगोट पहनने से किसी प्रकार की एलर्जी या असुविधा नहीं है, तो इसे पहनने में संकोच करने की आवश्यकता नहीं है। यह आपकी व्यायाम-तैयारी का एक हिस्सा माना जा सकता है। जैसे स्पोर्ट्स शूज, ट्रैक पैंट और टी-शर्ट व्यायाम की तैयारी का हिस्सा होते हैं, उसी प्रकार पारंपरिक व्यायाम पद्धतियों में लंगोट को भी तैयारी का एक आवश्यक अंग माना गया है।

यदि आप भारतीय व्यायाम परंपराओं से जुड़ाव रखते हैं, तो लंगोट धारण करना उन परंपराओं के प्रति सम्मान का एक प्रतीक भी माना जा सकता है। पारंपरिक मान्यता है कि व्यायाम से पूर्व लंगोट पहनने से मन और शरीर कठिन परिश्रम के लिए अधिक अनुशासित एवं तैयार महसूस करते हैं।



लंगोट पहनने के फायदे

  • लंगोटी शारीरिक व्यायाम या योगाभ्यास के दौरान हड्डियों और अंगों के विस्थापन तथा तंत्रिकाओं पर पड़ने वाले खिंचाव को रोकने में सहायक मानी जाती है।

  • लंगोट पहनने से पुरुषों के टेस्टिकल्स अर्थात् अंडकोषों की सेहत अच्छी रहती है। कई बार अधिक वर्कआउट या मेहनत करने की वजह से उनका आकार बढ़ जाता है, जिससे उनमें दर्द होने लगता है।

  • वैज्ञानिक मानते हैं कि प्रजनन क्षमता बनाए रखने के लिए टेस्टिकल्स की सेहत का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है। कई बार इनमें पानी भर जाने की समस्या भी हो जाती है, जो यौन जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।

  • पारंपरिक मान्यता के अनुसार यह ऊर्जा को पूरे शरीर में संतुलित रूप से प्रवाहित करने में सहायक होता है।

  • लंगोटी के उपयोग से व्यायाम या योगाभ्यास के दौरान ऊर्जा, शक्ति और सहनशक्ति प्राप्त होती है।

  • लंगोट की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह सामान्यतः सूती (कॉटन) कपड़े से बना होता है, जिससे किसी भी प्रकार के रैशेज या अन्य त्वचा संबंधी समस्याओं की संभावना कम रहती है। इसे स्किन-फ्रेंडली माना जाता है तथा इससे अनावश्यक गर्मी उत्पन्न नहीं होती। इसलिए भी लंगोट पहनना पुरुषों की सेहत के लिए अच्छा माना जाता है।

  • जब भी आप कोई भारी एक्सरसाइज या वर्कआउट करते हैं, तो लंगोट एक प्रकार का सहारा प्रदान करता है। इसे पहनने से व्यायाम के दौरान पुरुषों के गुप्तांगों पर अधिक दबाव नहीं पड़ता और वे अधिक आराम महसूस करते हैं।

  • पारंपरिक रूप से अंतःवस्त्र के रूप में लंगोट पहनना पुरुषों के जननांगों के लिए लाभकारी माना जाता है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि यह यौन जीवन को बेहतर बनाने में सहायक होता है।

  • पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार अंतःवस्त्र लंगोट कामेच्छा पर नियंत्रण बनाए रखने में सहायक माना जाता है। साथ ही यह अंडकोषों को चोट से बचाने में भी मदद करता है, विशेषकर साइकिल, मोटरसाइकिल आदि से गिरने पर लगने वाली चोटों से। दौड़ने, चलने, योगासन करने तथा व्यायाम करने में भी इसे सुविधाजनक माना जाता है।

लंगोट पहनने के कोई नुकसान नहीं हैं

लंगोट बाँधने का सबसे बड़ा फायदा आपके टेस्टिकल्स अर्थात् अंडकोषों को पहुँचता है। कई बार अधिक मेहनत करने की वजह से उनका आकार बढ़ जाता है। आम भाषा में हम यह भी कहते हैं कि उनमें पानी भर गया है। यदि एक बार ऐसा हो जाए, तो कई मामलों में उसके उपचार के लिए शल्य-चिकित्सा (ऑपरेशन) की आवश्यकता पड़ सकती है।

लंगोट अंडकोषों को सहारा देकर रखता है, जिससे पारंपरिक मान्यता के अनुसार पानी भरने जैसी समस्याओं की संभावना कम हो जाती है। इसके अतिरिक्त इससे लोअर एब्डॉमेन (पेट के निचले हिस्से) की मांसपेशियों को भी सहारा मिलता है। जिन लोगों के पेट के निचले हिस्से में अधिक भारी कसरत करने से सूजन आ जाती है, उन्हें भी इसका उपयोग करना चाहिए।

दौड़ते समय भी लंगोट पहनना लाभकारी माना जाता है, क्योंकि इससे शरीर के संवेदनशील अंगों को स्थिरता मिलती है। वैसे तो लंगोट किसी भी रंग का हो सकता है, लेकिन लाल लंगोट विशेष रूप से लोकप्रिय माना जाता है। लाल रंग अनुशासन का प्रतीक माना जाता है। यह रंग बजरंग बली से भी जुड़ा हुआ है। अखाड़ों में सामान्यतः हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित होती है और वहाँ लाल रंग का विशेष महत्व माना जाता है।

लंगोट और सपोर्टर

वर्तमान समय में लंगोट के स्थान पर अधिकांश लोग इलास्टिक सपोर्टर का उपयोग करते हैं। यह लंगोट की तरह ही सहारा प्रदान करता है, किंतु इसे बाँधने की आवश्यकता नहीं होती। इसका उपयोग भी लंगोट की तरह ही किया जाता है।

हालाँकि, यह लंगोट से भिन्न होता है। लंगोट और सपोर्टर दोनों का उद्देश्य समान हो सकता है, लेकिन उनकी संरचना अलग होती है। जिस प्रकार अंडरवियर और निक्कर दोनों वस्त्र हैं, किंतु उनका उपयोग अलग-अलग होता है, उसी प्रकार लंगोट और सपोर्टर भी भिन्न प्रकार के अंतःवस्त्र हैं।

सपोर्टर के ऊपरी भाग में एक इलास्टिक बेल्ट या रबर लगी होती है। इसके अतिरिक्त, ग्रोइन एरिया (जंघा-मूल क्षेत्र) में कपड़े की दोहरी परत होती है, जिसका उपयोग ग्रोइन गार्ड लगाने के लिए किया जाता है। शेष संरचना काफी हद तक अंडरवियर के समान होती है।

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