आयु वृद्धि के साथ रोग से छुटकारा प्राप्त करने का मंत्र




आयु वृद्धि एवं रोग शांति के लिए महामृत्युंजय मंत्र

महामृत्युंजय मंत्र

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

महामृत्युंजय मंत्र को भगवान शिव का अत्यंत प्रभावशाली और कल्याणकारी मंत्र माना गया है। सनातन परंपरा में इसका जप स्वास्थ्य, मानसिक शांति, रोग निवारण, आयु वृद्धि तथा संकटों से रक्षा के लिए किया जाता है।

हवन विधि

मंत्र-जप की पूर्णता के पश्चात हवन करना शुभ माना गया है। सामान्य हवन सामग्री में निम्न वस्तुएँ सम्मिलित की जा सकती हैं—

  • बिल्व फल

  • तिल

  • चावल

  • चन्दन

  • पंचमेवा

  • जायफल

  • गुग्गुल

  • गुड़

  • सरसों

  • धूप

  • घी

इन सभी सामग्री को मिलाकर महामृत्युंजय मंत्र के साथ आहुति दें।

विभिन्न उद्देश्यों के लिए विशेष हवन सामग्री

रोग शांति हेतु

  • दूर्वा

  • गुडूची (गिलोय) का लगभग चार इंच का टुकड़ा

  • घी

श्री एवं समृद्धि प्राप्ति हेतु

  • बिल्व फल

  • कमल बीज

  • खीर

ज्वर शांति हेतु

  • अपामार्ग

मृत्यु-भय निवारण हेतु

  • जायफल एवं दही

शत्रु बाधा निवारण हेतु

  • पीली सरसों

पूर्णाहुति

हवन के अंत में सूखे नारियल में घी भरकर तथा खीर के साथ पूर्णाहुति प्रदान करें।

तर्पण एवं मार्जन

हवन के पश्चात तर्पण और मार्जन किया जाता है।

  • कांसे या पीतल के पात्र में जल और गौ-दूध मिलाएँ।

  • अंजलि द्वारा तर्पण करें।

  • तर्पण के समय मूल मंत्र के अंत में "तर्पयामि" जोड़ें।

  • मार्जन के समय मूल मंत्र के अंत में "मार्जयामि" जोड़ें।

दशांश नियम

शास्त्रीय विधान के अनुसार—

  • जप का दशांश हवन।

  • हवन का दशांश तर्पण।

  • तर्पण का दशांश मार्जन।

  • मार्जन का दशांश शिवभक्तों एवं ब्राह्मणों को भोजन।

ब्राह्मण एवं शिवभक्त भोजन

सामर्थ्य के अनुसार 1, 3, 5, 9 या 11 ब्राह्मणों अथवा शिवभक्तों को भोजन कराकर उनका आशीर्वाद ग्रहण करना शुभ माना गया है।

विशेष टिप्पणी

महामृत्युंजय मंत्र के जप से पूर्व या नित्य रूप से महामृत्युंजय कवच का पाठ भी किया जा सकता है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा, नियम और विश्वासपूर्वक किए गए मंत्र-जप एवं उपासना से मानसिक शांति, आध्यात्मिक बल तथा स्वास्थ्य लाभ की प्राप्ति होती है।

नोट: रोग की स्थिति में मंत्र-जप एवं धार्मिक अनुष्ठान आध्यात्मिक सहारा प्रदान कर सकते हैं, किन्तु इन्हें चिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। उचित चिकित्सा और चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।



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यौन पहचान - Sexual Identity



पुरुष, महिला, दोनों अथवा दोनों के मिश्रित रूप के रूप में स्वयं के बारे में व्यक्ति की आंतरिक समझ को लिंग पहचान (Gender Identity) कहा जाता है। यह इस बात को व्यक्त करती है कि व्यक्ति स्वयं को किस रूप में समझता है और स्वयं को किस नाम या पहचान से संबोधित करता है। किसी व्यक्ति की लिंग पहचान जन्म के समय निर्धारित किए गए उसके लिंग के समान भी हो सकती है और उससे भिन्न भी।

मनुष्य स्वाभाविक रूप से लिंग पहचान, लिंग अभिव्यक्ति, यौनिकता तथा रोमांटिक आकर्षण की अत्यंत विविध अवस्थाओं में पाए जाते हैं। फिर भी संयुक्त राज्य अमेरिका सहित विश्व के अनेक देशों में लोगों को उनकी यौन अभिविन्यास (Sexual Orientation) और लिंग पहचान के आधार पर भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार तथा कभी-कभी हिंसा का भी सामना करना पड़ता है।

अपनी यौन पहचान को समझने और स्वीकार करने की प्रक्रिया से गुजर रहे युवाओं के लिए अपने माता-पिता या परिवार के सामने अपनी पहचान व्यक्त करना अक्सर सबसे बड़ी चुनौती होती है। दूसरी ओर, जिन लोगों की वे परवाह करते हैं, उनसे स्वीकृति और समर्थन प्राप्त होना उनके लिए राहत, आत्मविश्वास और मानसिक शक्ति का महत्वपूर्ण स्रोत बन सकता है।

यौन अभिविन्यास (Sexual Orientation) से तात्पर्य उस भावनात्मक, रोमांटिक या यौन आकर्षण से है, जो किसी व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों के प्रति अनुभव होता है तथा जिनके साथ वह संबंध स्थापित करना चाहता है। यौन अभिविन्यास के प्रमुख रूपों में विषमलैंगिक (Heterosexual), समलैंगिक (Gay), लेस्बियन (Lesbian), उभयलिंगी (Bisexual) तथा अलैंगिक (Asexual) शामिल हैं।

Sexual Identity

विभिन्न यौन अभिविन्यास एवं पहचानें

समलैंगिकता (Homosexuality)

समलैंगिकता (Homosexuality) समान लिंग के व्यक्तियों के प्रति भावनात्मक, रोमांटिक अथवा यौन आकर्षण के पैटर्न को दर्शाती है। Lesbian शब्द का प्रयोग सामान्यतः उन महिलाओं के लिए किया जाता है जो अन्य महिलाओं के प्रति आकर्षित होती हैं, जबकि Gay शब्द का प्रयोग सामान्यतः उन पुरुषों के लिए किया जाता है जो अन्य पुरुषों के प्रति आकर्षित होते हैं। यद्यपि कई संदर्भों में Gay शब्द का उपयोग समलैंगिक महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए भी किया जाता है।

उभयलैंगिकता (Bisexuality)

उभयलैंगिकता (Bisexuality) एक से अधिक लिंगों अथवा पुरुषों और महिलाओं दोनों के प्रति भावनात्मक, रोमांटिक या यौन आकर्षण को व्यक्त करती है। उभयलैंगिक पहचान का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति दोनों लिंगों के प्रति समान रूप से आकर्षित हो। सामान्यतः ऐसे व्यक्ति, जिनकी किसी एक लिंग के प्रति विशेष लेकिन अनन्य (Exclusive) प्राथमिकता नहीं होती, स्वयं को उभयलैंगिक के रूप में पहचान सकते हैं।

अलैंगिकता (Asexuality)

अलैंगिकता (Asexuality) से तात्पर्य दूसरों के प्रति यौन आकर्षण की अनुपस्थिति अथवा यौन गतिविधियों में बहुत कम या बिल्कुल रुचि न होने से है। यह एक व्यापक स्पेक्ट्रम है, जिसके अंतर्गत अनेक उप-पहचानें आती हैं। अलैंगिकता को यौन संयम (Abstinence) या ब्रह्मचर्य (Celibacy) से अलग माना जाता है, क्योंकि यह व्यक्ति की यौन अभिविन्यास से संबंधित पहचान है, न कि कोई स्वैच्छिक जीवन-शैली।

अरोमांटिकता (Aromanticism)

अरोमांटिकता (Aromanticism) उस स्थिति को दर्शाती है जिसमें व्यक्ति दूसरों के प्रति बहुत कम या कोई रोमांटिक आकर्षण अनुभव नहीं करता। ऐसे व्यक्तियों में रोमांटिक संबंध बनाने की इच्छा या प्रवृत्ति अत्यंत सीमित अथवा अनुपस्थित हो सकती है।

पैनसेक्सुअलिटी (Pansexuality)

पैनसेक्सुअलिटी (Pansexuality) किसी व्यक्ति के प्रति उसकी लिंग पहचान या जैविक लिंग की परवाह किए बिना आकर्षण को दर्शाती है। पैनसेक्सुअल व्यक्ति स्वयं को कभी-कभी "लिंग-अंधा" (Gender-blind) भी कहते हैं, अर्थात् उनके लिए किसी व्यक्ति का लिंग या सेक्स रोमांटिक अथवा यौन आकर्षण का निर्णायक कारक नहीं होता। कुछ विद्वान पैनसेक्सुअलिटी को उभयलैंगिकता का विस्तृत रूप भी मानते हैं।

बहुलैंगिकता (Polysexuality)

बहुलैंगिकता (Polysexuality) का अर्थ कई, किंतु सभी नहीं, लिंगों के प्रति आकर्षण होना है। इस पहचान का उपयोग कुछ लोग उभयलैंगिकता (Bisexuality) के विकल्प के रूप में करते हैं, क्योंकि उनके अनुसार "उभयलैंगिक" शब्द दो लिंगों की अवधारणा तक सीमित माना जा सकता है। बहुलैंगिक व्यक्ति अनेक लिंगों के प्रति आकर्षित हो सकते हैं, परंतु आवश्यक नहीं कि वे सभी लिंगों के प्रति आकर्षण अनुभव करें।

सैपियोसेक्सुअलिटी (Sapiosexuality)

सैपियोसेक्सुअलिटी (Sapiosexuality) किसी व्यक्ति की बुद्धिमत्ता (Intelligence) के प्रति आकर्षण को दर्शाती है। इस शब्द का उपसर्ग Sapio- लैटिन भाषा से लिया गया है, जिसका संबंध ज्ञान और बुद्धि से है। सैपियोसेक्सुअल व्यक्ति समलैंगिक, विषमलैंगिक अथवा उभयलैंगिक भी हो सकते हैं। सामान्यतः इसे स्वतंत्र यौन अभिविन्यास के बजाय आकर्षण की एक विशेष प्रवृत्ति माना जाता है।

यह शब्द 2014 में व्यापक चर्चा में आया, जब डेटिंग वेबसाइट OkCupid ने इसे अपने उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्ध पहचान विकल्पों में शामिल किया। इसके बाद इस अवधारणा पर व्यापक बहस हुई। कुछ आलोचकों ने इसे अभिजात्यवादी (Elitist), भेदभावपूर्ण या दिखावटी भी बताया।

संबंध अराजकता (Relationship Anarchy)

संबंध अराजकता (Relationship Anarchy) एक संबंध-दर्शन (Relationship Philosophy) है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता और स्वैच्छिक संबंधों पर बल देता है। यह पारंपरिक संबंध संरचनाओं तथा पूर्वनिर्धारित सामाजिक अपेक्षाओं को चुनौती देता है। इसके अंतर्गत मित्रता और प्रेम-संबंधों के बीच कठोर पदानुक्रम को स्वीकार नहीं किया जाता तथा प्रत्येक संबंध को उसके प्रतिभागियों द्वारा निर्धारित मानदंडों के आधार पर विकसित होने दिया जाता है।

विषमलैंगिकता (Heterosexuality)

विषमलैंगिकता (Heterosexuality) विपरीत लिंग के व्यक्तियों के प्रति भावनात्मक, रोमांटिक अथवा यौन आकर्षण को दर्शाती है। सामान्यतः Straight शब्द का प्रयोग विषमलैंगिक व्यक्तियों के लिए किया जाता है। विश्वभर में विषमलैंगिकता सबसे व्यापक रूप से पाई जाने वाली यौन अभिविन्यास श्रेणी मानी जाती है।



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भीष्म द्वादशी महत्व, पूजन विधि एवं मंत्र




भीष्म द्वादशी

भीष्म द्वादशी माघ मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को आती है। मान्यता है कि इस दिन व्रत करने से उत्तम संतान की प्राप्ति होती है और यदि संतान है तो उसकी प्रगति होती है। इसके साथ ही सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होकर सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। भीष्म द्वादशी को गोविंद द्वादशी भी कहते हैं।

धर्म एवं ज्योतिष के अनुसार माघ मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को भीष्म द्वादशी का व्रत किया जाता है। इस दिन विशेष रूप से भगवान विष्णु का तिल से पूजन किया जाता है तथा पवित्र नदियों में स्नान और दान करने का विधान है। इससे मनुष्य को शुभ फलों की प्राप्ति होती है।

हमारे धार्मिक ग्रंथ पद्मपुराण में माघ मास के माहात्म्य का वर्णन किया गया है, जिसमें कहा गया है कि पूजा करने से भी भगवान श्रीहरि को उतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी माघ मास में स्नान करने मात्र से होती है। अतः सभी पापों से मुक्ति और भगवान वासुदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को माघ-स्नान अवश्य करना चाहिए।

महाभारत में उल्लेख है कि जो मनुष्य माघ मास में तपस्वियों को तिल का दान करता है, वह कभी नरक का दर्शन नहीं करता। माघ मास की द्वादशी तिथि को दिन-रात उपवास करके भगवान माधव की पूजा करने से मनुष्य को राजसूय यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। इस प्रकार माघ मास के स्नान और दान की अपूर्व महिमा बताई गई है।

यह भी मान्यता है कि भीष्म द्वादशी का व्रत करने से सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। शास्त्रों में माघ मास की प्रत्येक तिथि को पर्व माना गया है। यदि असमर्थता के कारण पूरे मास का नियम न निभाया जा सके, तो तीन दिन अथवा एक दिन का माघ-स्नान व्रत भी किया जा सकता है। इस माह की भीष्म द्वादशी का व्रत यदि पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और पवित्रता के साथ किया जाए, तो यह मनुष्य के सभी कार्य सिद्ध करके उसे पापों से मुक्ति प्रदान करता है। अतः इस दिन के पूजन-अर्चन का विशेष महत्व है।

भीष्म द्वादशी की पौराणिक कथा

भीष्म द्वादशी के संबंध में प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार राजा शांतनु की रानी गंगा ने देवव्रत नामक पुत्र को जन्म दिया। पुत्र के जन्म के पश्चात गंगा, पूर्व प्रतिज्ञा के अनुसार, राजा शांतनु को छोड़कर चली गईं। गंगा के वियोग में राजा शांतनु अत्यंत दुखी रहने लगे।

कुछ समय बाद राजा शांतनु गंगा नदी पार करने के लिए मत्स्यगंधा नामक कन्या की नाव में बैठे और उसके रूप-सौंदर्य पर मोहित हो गए। उन्होंने उसके पिता के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। परंतु मत्स्यगंधा के पिता ने शर्त रखी कि उनकी पुत्री से उत्पन्न संतान ही हस्तिनापुर की उत्तराधिकारी बनेगी। यही मत्स्यगंधा आगे चलकर सत्यवती के नाम से प्रसिद्ध हुई।

राजा शांतनु इस शर्त को स्वीकार नहीं कर सके, किंतु वे चिंता में रहने लगे। जब देवव्रत को पिता की चिंता का कारण ज्ञात हुआ, तब उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा कर ली। पुत्र की इस महान प्रतिज्ञा से प्रसन्न होकर राजा शांतनु ने उन्हें इच्छा-मृत्यु का वरदान दिया। इसी भीषण प्रतिज्ञा के कारण देवव्रत आगे चलकर भीष्म पितामह के नाम से विख्यात हुए।

महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह कौरवों की ओर से युद्ध कर रहे थे। उनके अद्वितीय युद्ध-कौशल के कारण कौरवों का पलड़ा भारी पड़ने लगा। तब भगवान श्रीकृष्ण ने शिखंडी को उनके सामने खड़ा कर दिया। अपनी प्रतिज्ञा के कारण भीष्म ने शिखंडी पर शस्त्र नहीं उठाया और अपने अस्त्र-शस्त्र त्याग दिए। अवसर पाकर अन्य योद्धाओं ने उन पर बाणों की वर्षा कर दी, जिससे वे शर-शय्या पर लेट गए।

कहा जाता है कि सूर्य के दक्षिणायन होने के कारण भीष्म पितामह ने तत्काल प्राण नहीं त्यागे। उन्होंने सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की और तत्पश्चात अपने प्राण त्यागे। उनके सम्मान में माघ मास की द्वादशी तिथि को विशेष पूजन का विधान किया गया, इसलिए यह तिथि भीष्म द्वादशी कहलाती है।

मान्यता है कि भगवान विष्णु ने स्वयं यह व्रत भीष्म पितामह को बताया था और उन्होंने इसका पालन किया था। इसी कारण इसका नाम भीष्म द्वादशी पड़ा। यह व्रत एकादशी के अगले दिन द्वादशी को किया जाता है। यह व्रत रोगों का नाश करने वाला तथा समस्त पापों को हरने वाला माना गया है।

भीष्म द्वादशी व्रत का महत्व

माघ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को भीष्म द्वादशी अथवा गोविंद द्वादशी कहा जाता है। इस व्रत को करने से संतान-सुख, धन-धान्य, सौभाग्य तथा समृद्धि की प्राप्ति होती है।

पद्मपुराण में वर्णित है कि माघ मास में स्नान करने से भगवान श्रीहरि विशेष रूप से प्रसन्न होते हैं। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को माघ-स्नान अवश्य करना चाहिए।

इस दिन प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लें। भगवान विष्णु का केले के पत्ते, पंचामृत, सुपारी, पान, तिल, मौली, रोली, कुमकुम तथा फलों से पूजन करें। दूध, शहद, केला, गंगाजल, तुलसी-पत्र और मेवा मिलाकर पंचामृत तैयार करें तथा भगवान को भोग लगाएँ। इसके पश्चात भीष्म द्वादशी की कथा सुनें अथवा पढ़ें।

भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी का पूजन एवं स्तुति करें। पूजन के बाद चरणामृत और प्रसाद का वितरण करें। ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा और तिल का दान अवश्य दें। ब्राह्मण-भोजन के पश्चात ही स्वयं भोजन करें। इस दिन "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः" मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है।

पूजा-विधि

  1. भीष्म द्वादशी के दिन प्रातः स्नान आदि करके व्रत का संकल्प लें।

  2. भगवान विष्णु का केले के पत्ते, फल, पंचामृत, सुपारी, पान, तिल, मौली, रोली, कुमकुम एवं दूर्वा से पूजन करें।

  3. दूध, शहद, केला, गंगाजल, तुलसी-पत्र तथा मेवा मिलाकर पंचामृत तैयार करें और भगवान को अर्पित करें।

  4. भीष्म द्वादशी की कथा सुनें अथवा पढ़ें।

  5. माता लक्ष्मी सहित अन्य देवताओं की स्तुति करें।

  6. पूजा के पश्चात चरणामृत एवं प्रसाद का वितरण करें।

  7. ब्राह्मणों को भोजन कराएँ तथा दक्षिणा दें।

  8. ब्राह्मण-भोजन के पश्चात ही स्वयं भोजन करें।

  9. परिवार के कल्याण, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति की प्रार्थना करें।

मान्यता

मान्यता है कि भीष्म द्वादशी का व्रत करने से सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना करनी चाहिए। ब्राह्मणों को भोजन कराकर सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा देनी चाहिए। इस दिन स्नान-दान करने से सुख, सौभाग्य, धन और संतान की प्राप्ति होती है। ब्राह्मणों को भोजन कराने के पश्चात ही स्वयं भोजन करना चाहिए। यह उपवास समस्त पापों का नाश करता है तथा जीवन में संतोष, शांति और समृद्धि प्रदान करता है।



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