प्रयागराज के महत्वपूर्ण धर्मस्थल





प्रयाग का प्राचीन इतिहास

वैसे तो प्रयाग क्षेत्र वैदिक और पौराणिक काल में समादृत रहा है, लेकिन ऐतिहासिक काल में भी इसके महत्व की चर्चा अनेक इतिहासकारों ने की है। जैन धर्म की श्रमण परंपरा में तीर्थंकर आदिनाथ का अक्षयवट के नीचे कैवल्य प्राप्त करना और बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध का धर्म-प्रचार हेतु यहाँ आना इस क्षेत्र की महत्ता का परिचायक है। प्रयाग के प्रतिष्ठानपुर (वर्तमान झूँसी), वत्स देश (कौशाम्बी) तथा अलर्कपुर (अरैल) प्राचीन राज्यों में रहे हैं। प्रतिष्ठानपुर की समकालीनता अयोध्या के सूर्यवंशी नरेश इक्ष्वाकु से मानी गई है। कहा जाता है कि उस समय यहाँ के राजा इला थे। वत्स देश के महाराजा उदयन का वर्णन भी अनेक ग्रंथों में मिलता है।

सम्राट अशोक के शिलालेख-स्तंभ प्रयाग में आज भी सुरक्षित हैं। गुप्तकाल के बाद महाराजा हर्षवर्धन के शासनकाल में प्रयाग की कीर्ति-पताका पूरे विश्व में लहराई थी। कहते हैं कि महाराजा हर्षवर्धन ने ही दो महाकुंभ पर्वों के बीच छठे वर्ष पर कुंभ पर्व आयोजित कराने की परंपरा का सूत्रपात किया था। मध्यकालीन इतिहास में अकबर के दरबारी अबुल फ़ज़ल ने आइने-अकबरी में लिखा है कि हिन्दू लोग प्रयाग को तीर्थराज कहते हैं। यहीं पर गंगा, यमुना और सरस्वती तीनों का संगम है।

प्रयाग और स्वतंत्रता संग्राम

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में प्रयाग की अहम भूमिका रही है। उस समय के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में श्री मदन मोहन मालवीय, सर अयोध्यानाथ, सर सुंदरलाल, मोतीलाल नेहरू आदि ने अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया था। धीरे-धीरे इलाहाबाद स्वाधीनता आंदोलन का केंद्र बनता गया। हिन्दी की प्रसिद्ध पत्रिका सरस्वती यहीं से प्रकाशित हुई। अभ्युदय, स्वराज्य जैसे क्रांतिकारी समाचार-पत्र भी इसी धरती से प्रकाशित हुए और उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। साहित्य, संस्कृति और कला के क्षेत्र में प्रयाग अर्थात् इलाहाबाद का अद्वितीय योगदान है।

प्रयाग का नामकरण एवं माहात्म्य

हमारा देश भारत विश्व की आत्मा कहलाता है और प्रयाग भारत का प्राण कहा गया है। हमारे देश को जीवनदायी शक्तियाँ इसी धरती से मिलती रही हैं। जिस प्रकार सनातन धर्म अनादि कहा जाता है, उसी प्रकार प्रयाग की भी महिमा का कोई आदि-अंत नहीं है। अरण्य और नदी-संस्कृति के बीच जन्म लेकर ऋषियों-मुनियों की तपोभूमि के रूप में पंचतत्त्वों को पुष्पित-पल्लवित करने वाली प्रयाग की धरती देश को सदैव ऊर्जा देती रही है।

प्रकृष्टं सर्वेभ्यः प्रयागमिति गीयते।
दृष्ट्वा प्रकृष्टयागेभ्यः पुष्टेभ्यो दक्षिणादिभिः।
प्रयागमिति तन्नाम कृतं हरिहरादिभिः।।

उत्कृष्ट यज्ञ और दान-दक्षिणा आदि से सम्पन्न स्थल देखकर भगवान विष्णु एवं भगवान शंकर आदि देवताओं ने इसका नाम प्रयाग रख दिया। ऐसा उल्लेख अनेक पुराणों में मिलता है।

तीर्थराज प्रयाग एक ऐसा पावन स्थल है, जिसकी महिमा हमारे सभी धर्मग्रंथों में वर्णित है। तीर्थराज प्रयाग को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रदाता कहा गया है। यह सभी तीर्थों में श्रेष्ठ है। यह वर्णन ब्रह्म पुराण में प्राप्त होता है—

प्रकृष्टत्वात्प्रयागोऽसौ प्राधान्यात् राजशब्दवान्।

अपने प्रकृष्टत्व अर्थात् उत्कृष्टता के कारण यह "प्रयाग" है और प्रधानता के कारण "राज" शब्द से युक्त है।

प्रयाग की महत्ता वेदों और पुराणों में सविस्तार बताई गई है। एक बार शेषनाग से ऋषियों ने यही प्रश्न किया कि प्रयाग को तीर्थराज क्यों कहा जाता है। इस पर शेषनाग ने उत्तर दिया कि एक ऐसा अवसर आया, जब सभी तीर्थों की श्रेष्ठता की तुलना की जाने लगी। उस समय भारत के समस्त तीर्थों को तुला के एक पलड़े पर रखा गया और प्रयाग को दूसरे पलड़े पर; फिर भी प्रयाग का पलड़ा भारी पड़ गया। दूसरी बार सप्तपुरियों को एक पलड़े में रखा गया और प्रयाग को दूसरे पलड़े पर, वहाँ भी प्रयाग वाला पलड़ा भारी रहा। इस प्रकार प्रयाग की प्रधानता सिद्ध हुई और इसे तीर्थों का राजा कहा जाने लगा।

इस पावन क्षेत्र में दान, पुण्य, तप, कर्म, यज्ञादि के साथ-साथ त्रिवेणी संगम का अतीव महत्त्व है। यह सम्पूर्ण विश्व का एकमात्र स्थान है, जहाँ तीन नदियाँ— गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती— मिलती हैं। यहीं से अन्य नदियों का अस्तित्व समाप्त होकर आगे एकमात्र गंगा नदी का महत्त्व शेष रह जाता है।

इस भूमि पर स्वयं ब्रह्माजी ने यज्ञादि कार्य सम्पन्न किए। ऋषियों और देवताओं ने त्रिवेणी संगम में स्नान कर अपने आपको धन्य समझा। मत्स्य पुराण के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर ने एक बार महर्षि मार्कण्डेय से पूछा— "ऋषिवर! यह बताइए कि प्रयाग क्यों जाना चाहिए और वहाँ संगम-स्नान का क्या फल है?"

इस पर महर्षि मार्कण्डेय ने उन्हें बताया कि प्रयाग के प्रतिष्ठान से लेकर वासुकि के हृदयोपरि पर्यंत कम्बल और अश्वतर दो भाग हैं तथा बहुमूलक नाग हैं। यही प्रजापति का क्षेत्र है, जो तीनों लोकों में विख्यात है। यहाँ स्नान करने वाले दिव्य लोक को प्राप्त करते हैं और उनका पुनर्जन्म नहीं होता।

पद्मपुराण कहता है कि यह यज्ञभूमि है। देवताओं द्वारा सम्मानित इस भूमि में यदि थोड़ा भी दान किया जाता है, तो उसका फल अनंत काल तक रहता है।

प्रयाग की श्रेष्ठता के संबंध में यह भी कहा गया है कि जिस प्रकार ग्रहों में सूर्य और नक्षत्रों में चंद्रमा श्रेष्ठ होते हैं, उसी प्रकार तीर्थों में प्रयाग सर्वोत्तम तीर्थ है—

ग्रहाणां च यथा सूर्यो नक्षत्राणां यथा शशी।
तीर्थानामुत्तमं तीर्थं प्रयागाख्यमनुत्तमम्।।

पद्मपुराण के अनुसार प्रयाग में गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है। इन नदियों के संगम में स्नान करने और गंगाजल पीने से मुक्ति मिलती है, इसमें किंचित् भी संदेह नहीं है।

इसी प्रकार स्कंद पुराण, अग्नि पुराण, शिव पुराण, ब्रह्म पुराण, वामन पुराण, बृहन्नारदीय पुराण, मनुस्मृति, वाल्मीकि रामायण, महाभारत, रघुवंश महाकाव्य आदि में भी प्रयाग की महत्ता का विस्तार से वर्णन किया गया है।

वाल्मीकि रामायण में कहा गया है कि श्रीराम अपने वनवास काल में जब ऋषि भारद्वाज से मिलने गए, तो वार्तालाप में ऋषिवर ने कहा— "हे राम! गंगा-यमुना के संगम का जो स्थान है, वह अत्यंत पवित्र है। आप वहाँ भी निवास कर सकते हैं।"

श्रीरामचरितमानस में तीर्थराज प्रयाग की महत्ता का वर्णन अत्यंत रोचक और विस्तृत रूप में किया गया है—

माघ मकरगत रवि जब होई।
तीरथपतिहिं आव सब कोई।।
देव दनुज किंनर नर श्रेनी।
सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनी।।

पूजहिं माधव पद जल जाता।
परसि अछैवट हरषहिं गाता।।
भरद्वाज आश्रम अति पावन।
परम रम्य मुनिवर मन भावन।।

तहँ होइ मुनि ऋषय समाजा।
जाहिं जे मज्जन तीरथ राजा।।

माघ के महीने में त्रिवेणी संगम-स्नान का यह रोचक प्रसंग कुंभ के समय साकार हो उठता है। माघ में साधु-संत प्रातःकाल संगम-स्नान करके कथा कहते हैं तथा ईश्वर के विविध स्वरूपों और तत्त्वों की विस्तार से चर्चा करते हैं।


Kumbh Sangam Prayagraj
Kumbh Sangam Prayagraj


माघ में संगम स्नान क्यों

कुंभ एवं संगम स्नान का महत्व

तीर्थराज प्रयाग में माघ के महीने में, विशेष रूप से कुंभ के अवसर पर, गंगा, यमुना एवं अदृश्य सरस्वती के संगम में स्नान का अत्यंत महत्त्व बताया गया है। अनेक पुराणों में इसके प्रमाण भी मिलते हैं।

ब्रह्म पुराण के अनुसार संगम-स्नान का फल अश्वमेध यज्ञ के समान कहा गया है। अग्नि पुराण के अनुसार प्रयाग में प्रतिदिन स्नान करने का फल उतना ही है, जितना प्रतिदिन करोड़ों गायों के दान से प्राप्त होता है। मत्स्य पुराण में कहा गया है कि दस हजार या उससे भी अधिक तीर्थों की यात्रा का जो पुण्य मिलता है, उतना ही पुण्य माघ मास में संगम-स्नान से प्राप्त होता है।

पद्म पुराण में माघ मास में प्रयाग-दर्शन को दुर्लभ बताया गया है और यदि यहाँ स्नान किया जाए तो उसका महत्त्व और भी बढ़ जाता है। यहाँ मुंडन कराना भी श्रेष्ठ फलदायी माना गया है। मत्स्य पुराण के अनुसार प्रयाग में मुंडन के पश्चात् संगम-स्नान करना चाहिए। स्कंद पुराण के काशी-खण्ड में भी प्रयाग में मुंडन की महत्ता का वर्णन मिलता है।

जैन धर्मावलंबी भी यहाँ केशलुंचन को महत्त्वपूर्ण मानते हैं। आदि तीर्थंकर ऋषभदेव ने अक्षयवट के नीचे केशलुंचन किया था।

प्रयागराज के अन्य महत्त्वपूर्ण धर्मस्थल

प्रयाग में द्वादश माधव और विष्णुपीठ

प्रयागराज के मुख्य देवता भगवान विष्णु माने गए हैं। उन्हें विभिन्न नामों से जाना जाता है। प्रयाग क्षेत्र को स्थानीय स्तर पर माधव क्षेत्र भी कहा जाता है।

द्वादश माधव

  1. श्री त्रिवेणी संगम आदिवट माधव

  2. श्री असि माधव (नागवासुकि मंदिर)

  3. श्री संकटहर माधव (प्रतिष्ठानपुरी)

  4. श्री शंख माधव (छतनाग, मुंशी बागीचा)

  5. श्री आदि वेणी माधव (अरैल)

  6. श्री चक्र माधव (अरैल)

  7. श्री गदा माधव (छिवकी गाँव)

  8. श्री पद्म माधव (बीकर, देवरिया)

  9. श्री मनोहर माधव (जानसेनगंज)

  10. श्री बिन्दु माधव (द्रौपदी घाट)

  11. श्री वेणी माधव (निराला मार्ग, दारागंज)

  12. श्री अनन्त माधव (ऑर्डिनेंस डिपो फोर्ट)

प्रयागराज क्षेत्र के आठ तीर्थ-नायक

प्रयागराज क्षेत्र में आठ प्रमुख तीर्थ-नायकों का भी उल्लेख मिलता है—

त्रिवेणी माधवं सोमं भरद्वाजं च वासुकिम्।
वन्देऽक्षयवटं शेषं प्रयागं तीर्थनायकम्॥

अर्थात् त्रिवेणी, माधव, सोम, भरद्वाज, वासुकि, अक्षयवट, शेष तथा प्रयाग— इन तीर्थ-नायकों को मैं प्रणाम करता हूँ।

यह मान्यता है कि इन सभी पवित्र स्थलों के दर्शन और पूजन से प्रयागराज की तीर्थयात्रा पूर्ण मानी जाती है। विशेषकर कुंभ और माघ मेले के अवसर पर श्रद्धालु इन स्थलों का दर्शन कर धार्मिक पुण्य अर्जित करते हैं।


शंकराचार्य मठ

शंकराचार्य मठ

विद्वता और तपस्या की साक्षात् प्रतिमूर्ति स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती का नाम कौन नहीं जानता? ज्योतिर्मठ-बदरिकाश्रम को अपने तपोबल से जागृत करने वाले इन शंकराचार्य ने प्रयाग के महत्त्व को समझते हुए यहाँ एक मठ की स्थापना का संकल्प लिया।

उन्होंने देखा कि अलोपशंकरी देवी के सम्मुख एक शिव मंदिर स्थित है। स्वामी ब्रह्मानन्द जी को यह स्थान अत्यंत उपयुक्त लगा। यहाँ ज्योतिर्मठ का कार्यालय स्थापित किया गया।

स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी के ब्रह्मलीन होने के पश्चात् उनके शिष्य स्वामी विष्णुदेवानन्द सरस्वती ने इस मठ की गरिमा को बनाए रखा। उनके पश्चात् उनके शिष्य शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती यहाँ निवास करते रहे और मठ की परंपरा को आगे बढ़ाते रहे।


Shankar Viman Mandapam - Prayagraj
Shankar Viman Mandapam - Prayagraj  

शंकर विमान मण्डपम् – प्रयागराज

गंगा तट पर त्रिवेणी बाँध के निकट स्थित खंभों वाले मंदिर की चर्चा होते ही आदि शंकर विमान मण्डपम् की भव्य आकृति आँखों के सामने उभर आती है। कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य स्वामी चंद्रशेखरेन्द्र सरस्वती की प्रेरणा एवं देखरेख में निर्मित यह मंदिर प्रयागराज की धार्मिक एवं सांस्कृतिक गरिमा को और अधिक उन्नत करता है।

अपने प्रकार का यह मंदिर प्रयागराज में अद्वितीय माना जाता है। इसकी वास्तुकला दक्षिण भारतीय मंदिर-शैली पर आधारित है, जो इसे अन्य स्थानीय मंदिरों से विशिष्ट बनाती है। मंदिर में स्थापित सुंदर एवं कलात्मक मूर्तियाँ दक्षिण भारत की समृद्ध शिल्प-परंपरा का उत्कृष्ट परिचय कराती हैं।

गंगा तट के निकट स्थित यह मंदिर श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र है तथा प्रयागराज की आध्यात्मिक विरासत में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।


Bade Hanuman Ji Temple Prayagraj
Bade Hanuman Ji Temple Prayagraj

बड़े हनुमान जी मंदिर, प्रयागराज

गंगा, यमुना तथा अदृश्य सरस्वती के पावन संगम तट पर, त्रिवेणी बाँध के नीचे बड़े हनुमान जी का मंदिर स्थित है। इस मंदिर की प्रतिमा के संबंध में एक जनश्रुति प्रचलित है कि एक निःसंतान वैश्य (वणिक) ने हनुमान जी की एक विशालकाय प्रतिमा बनवाकर उसे नाव में लादकर ले जाना प्रारंभ किया। कहा जाता है कि उसकी नाव उसी स्थान पर आकर रुक गई, जहाँ वर्तमान में बड़े हनुमान जी का मंदिर स्थित है। रात्रि में स्वप्न में उस वैश्य को संकेत मिला कि वह प्रतिमा को इसी स्थान पर छोड़कर चला जाए। वणिक ने वैसा ही किया और अपने घर लौट गया। जनश्रुति के अनुसार उसकी मनोकामना पूर्ण हुई। बाद में इसी स्थान पर बाघम्बरी बाबा को हनुमान जी की प्रतिमा का आभास हुआ। उनके संरक्षण में जब खुदाई कराई गई, तो बड़े हनुमान जी की प्रतिमा प्राप्त हुई। उस प्रतिमा को वहाँ से हटाने का प्रयास किया गया, किन्तु प्रतिमा अपने स्थान से तनिक भी नहीं हिली। अनेक प्रयास असफल होने पर अंततः उसी स्थान पर हनुमान जी के मंदिर का निर्माण कराया गया।

श्री तुलसीदास जी का बड़ा स्थान

तीर्थराज प्रयाग के परम पावन धार्मिक स्थलों में 'श्री तुलसीदास जी का बड़ा स्थान' का अपना विशिष्ट महत्त्व है। यह स्थान वैष्णव सम्प्रदाय के उपासकों की प्रमुख पूजा-स्थली है। प्रयाग के दारागंज मोहल्ले के दक्षिणी छोर पर स्थित यह स्थल पूरे देश में प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि इसकी स्थापना रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी के समकालीन श्री देव मुरारी जी ने की थी, जो स्वयं सिद्ध महात्मा थे। उनके गुरु का नाम श्री तुलसीदास था। उन्हीं के नाम पर इस स्थान का नाम "श्री तुलसीदास का बड़ा स्थान" पड़ा।

रामानन्दाचार्य मठ

प्राचीन भारतीय संतों एवं आचार्यों की परंपरा में श्री शंकराचार्य, माधवाचार्य, रामानुजाचार्य तथा निम्बार्काचार्य का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। स्मरणीय है कि उत्तर भारत में आध्यात्मिक नेतृत्व का श्रेय सर्वप्रथम श्री रामानन्दाचार्य को प्राप्त हुआ। उन्होंने रामभक्ति की धारा को पूरे देश में प्रवाहित कर उत्तर भारत के गौरव को अक्षुण्ण बनाए रखा। उत्तर भारत में रामभक्ति-रसधारा का प्रसार करने वाले श्री रामानन्द प्रयाग के गौरव थे, जिन्होंने सम्पूर्ण भारत को राममय बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी स्मृति में श्री रामानन्दाचार्य मठ का निर्माण किया गया। वर्तमान समय में त्रिवेणी बाँध के दक्षिणी किनारे पर, किले से सटा हुआ यह मठ प्रयाग की धार्मिक एवं सांस्कृतिक गरिमा में वृद्धि कर रहा है।

जंगमबाड़ी मठ

नगर के दारागंज मोहल्ले में जंगमबाड़ी मठ की शाखा स्थापित है। वीरशैव मतावलम्बियों का यह प्रमुख स्थान दशाश्वमेध घाट के निकट स्थित है। कहा जाता है कि वीरशैव मत के प्रतिपादक स्वयं भगवान शिव थे। वीरशैव मतावलम्बियों की विशेषता यह है कि वे अपने शरीर पर सदैव शिवलिंग धारण किए रहते हैं।

शिव मठ एवं सिद्धेश्वर महादेव मंदिर

संगम के निकट दारागंज मोहल्ले में स्थित शिव मठ एक तपस्वी संत की भक्ति, श्रद्धा और संस्कृति-प्रेम का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस मठ का निर्माण उन्होंने अपनी समस्त संपत्ति लगाकर कराया था। दक्षिण भारत के तिरुनेलवेली जिले के वाहकुलम ग्राम निवासी श्री वेंगा शिवन लगभग 160 वर्ष पूर्व अपनी सम्पूर्ण संपत्ति शिव-मंदिर को समर्पित करने के उद्देश्य से प्रयाग आए। यहाँ का धार्मिक वातावरण देखकर उन्होंने यहीं बसने का संकल्प लिया। संस्कृत के विद्वान श्री वेंगा शिवन ने दक्षिण भारतीय तीर्थयात्रियों के निवास एवं सेवा के उद्देश्य से शिव मठ की स्थापना की।

नागवासुकि

प्रयाग के अत्यंत प्राचीन एवं पौराणिक स्थलों में नागवासुकि का विशेष महत्त्व है। वर्तमान में नागवासुकि मंदिर दारागंज (बख्शी) मोहल्ले में स्थित है, जहाँ नागवासुकि की प्राचीन प्रतिमा स्थापित है।

मंदिर में वासुकि मध्य भाग में प्रतिष्ठित हैं। उनके दोनों ओर नाग-नागिन के चार जोड़े विभिन्न मुद्राओं में उत्कीर्ण हैं। मंदिर के पूर्वी द्वार की देहली पर शंख बजाते हुए दो कीचक अंकित हैं, जिनके मध्य दो हाथियों सहित कमल का सुंदर चित्रण किया गया है।

मंदिर के गर्भगृह में फणधारी नाग-नागिन की प्राचीन प्रतिमा स्थापित है। यहाँ विघ्नहर्ता भगवान गणेश की प्रतिमा भी विद्यमान है। नागवासुकि मंदिर प्रयाग की प्राचीन धार्मिक परंपरा, नाग-पूजा और सांस्कृतिक विरासत का महत्त्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।

Nag Vasuki Temple Prayagraj



शक्तिपीठ

अलोप शंकरी देवी

प्रयागराज के प्रमुख शक्तिपीठों में अलोप शंकरी देवी का विशेष महत्त्व है। इसे प्रयाग की ललिता पीठ भी कहा जाता है। अलोपीबाग मोहल्ले में स्थित यह मंदिर महानिर्वाणी पंचायती अखाड़ा के अधीन है और श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र माना जाता है।

इस मंदिर की सबसे विशिष्ट विशेषता यह है कि यहाँ देवी की कोई प्रतिमा स्थापित नहीं है। मंदिर के भीतर एक चौकोर चबूतरा बना हुआ है, जिसके मध्य एक कुंड स्थित है। इस कुंड में सदैव जल भरा रहता है। कुंड के ऊपर मंदिर की छत से एक झूला लटका हुआ है।

मंदिर में देवी के प्रत्यक्ष विग्रह के स्थान पर इसी झूले और पवित्र कुंड की पूजा-अर्चना की जाती है। श्रद्धालु इनकी पूजा कर देवी का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यही विशेषता अलोप शंकरी देवी मंदिर को अन्य शक्तिपीठों से अलग पहचान प्रदान करती है।

जनश्रुति के अनुसार माता सती के शरीर के अंग जहाँ-जहाँ गिरे, वहाँ शक्तिपीठों की स्थापना हुई। प्रयाग की अलोप शंकरी देवी के संबंध में मान्यता है कि यहाँ माता सती का अंतिम अंग "अलोप" (अदृश्य) हो गया था। इसी कारण इस स्थान का नाम अलोप शंकरी पड़ा और यह स्थान शक्तिपीठ के रूप में पूजित हुआ।

आज भी नवरात्र, माघ मेला तथा कुंभ के अवसर पर यहाँ लाखों श्रद्धालु दर्शन एवं पूजन के लिए आते हैं और माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

Alopashankari Maa Temple Prayagraj

माँ ललिता देवी

तीर्थराज प्रयाग स्थित ललिता पीठ अत्यंत प्राचीन एवं प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। इसका उल्लेख मत्स्य पुराण, ब्रह्म पुराण, कुब्जिका तंत्र, रुद्रयामल तंत्र, तंत्र चूड़ामणि, शाक्तानन्द तरंगिणी, गन्धर्व तंत्र तथा देवी भागवत आदि अनेक धार्मिक ग्रंथों में प्राप्त होता है।

इक्यावन (51) शक्तिपीठों में वर्णित ललिता पीठ के संबंध में यह मान्यता प्रचलित है कि यहाँ माता सती की हाथ की उँगलियाँ गिरी थीं। पुराणों में वर्णित इस कथा के अनुसार, जब भगवान शिव माता सती के शरीर को लेकर विचरण कर रहे थे, तब भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के विभिन्न अंग पृथ्वी पर विभिन्न स्थानों पर गिरे, जहाँ शक्तिपीठों की स्थापना हुई। प्रयाग स्थित ललिता पीठ भी उन्हीं पवित्र शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।

यह प्राचीन मंदिर प्रयागराज के मीरापुर मोहल्ले में स्थित है। देवी ललिता को आदिशक्ति का स्वरूप माना जाता है और यहाँ वर्ष भर श्रद्धालुओं का आवागमन बना रहता है। विशेष रूप से नवरात्रि, माघ मेला तथा कुंभ पर्व के अवसर पर बड़ी संख्या में भक्तजन माँ के दर्शन एवं पूजन के लिए आते हैं।

माँ ललिता देवी का यह मंदिर प्रयागराज की धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र है तथा शक्तोपासना की प्राचीन परंपरा का जीवंत प्रतीक माना जाता है।

Maa Lalita Devi Shakti Peeth Prayagraj

 Maa Lalita Devi Shakti Peeth Prayagraj




माँ कल्याणी देवी

Shakti Peeth Maa Kalyani Devi Temple Prayagraj
Shakti Peeth Maa Kalyani Devi Temple Prayagraj

माँ कल्याणी देवी प्रयागराज के प्रमुख एवं प्राचीन शक्तिपीठों में से एक मानी जाती हैं। अलोपशंकरी देवी के प्रसंग में वर्णित 51 शक्तिपीठों की कथा के क्रम में माँ कल्याणी का भी उल्लेख प्राप्त होता है। मत्स्य पुराण के 108वें अध्याय में कल्याणी देवी का वर्णन मिलता है।

प्रयाग माहात्म्य के अनुसार माँ कल्याणी और ललिता देवी को एक ही शक्ति का स्वरूप माना गया है, किन्तु प्रयागराज में इन दोनों का पृथक अस्तित्व एवं स्वतंत्र पूजा-परंपरा विद्यमान है।

ब्रह्मवैवर्त पुराण के तृतीय खंड में वर्णित प्रसंग के अनुसार महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रयाग में भगवती की आराधना कर माँ कल्याणी देवी की 32 अंगुल ऊँची प्रतिमा की स्थापना की थी। इसी कारण यह स्थान प्राचीन काल से शक्ति-उपासना का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।

माँ कल्याणी देवी का यह प्राचीन मंदिर प्रयागराज नगर के कल्याणी देवी मोहल्ले में स्थित है। यहाँ वर्ष भर श्रद्धालुओं का आगमन बना रहता है, जबकि नवरात्रि, माघ मेला तथा अन्य धार्मिक अवसरों पर विशेष भीड़ उमड़ती है।

माँ कल्याणी देवी को कल्याण, सुख, समृद्धि एवं शक्ति की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। प्रयागराज की धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत में इस मंदिर का विशिष्ट स्थान है और यह श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।


Bhardwaj Muni Ashram Prayagraj
Bhardwaj Muni Ashram Prayagraj

महर्षि भरद्वाज

महर्षि भरद्वाज का नाम भारतीय ऋषि-परंपरा में अत्यंत आदर और श्रद्धा के साथ लिया जाता है। वे महान तपस्वी, विद्वान एवं ज्ञानी आचार्य थे। तीर्थराज प्रयाग की धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा में महर्षि भरद्वाज का विशिष्ट स्थान है।

प्रयाग में महर्षि भरद्वाज का उल्लेख भगवान श्रीराम के वनगमन प्रसंग में प्राप्त होता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण वनवास के लिए अयोध्या से प्रस्थान कर प्रयाग क्षेत्र में पहुँचे, तब श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा कि उन्हें अग्नि की लपटें दिखाई दे रही हैं, जिससे प्रतीत होता है कि महर्षि भरद्वाज का आश्रम निकट ही है।

इसके पश्चात् भगवान श्रीराम, माता सीता तथा लक्ष्मण महर्षि भरद्वाज के आश्रम में उनके दर्शन हेतु पहुँचे। महर्षि भरद्वाज ने उनका आदर-सत्कार किया तथा उन्हें आगे के वनवास-मार्ग के संबंध में आवश्यक मार्गदर्शन प्रदान किया।

यह भी प्रमाणित माना जाता है कि रामकथा महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा महर्षि भरद्वाज को सुनाई गई थी। इस प्रकार रामकथा की परंपरा में भी महर्षि भरद्वाज का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

प्रयागराज स्थित भरद्वाज आश्रम आज भी श्रद्धालुओं एवं तीर्थयात्रियों के लिए एक प्रमुख धार्मिक स्थल है, जो महर्षि भरद्वाज की तपस्या, ज्ञान और ऋषि-परंपरा की गौरवशाली स्मृति को संजोए हुए है।


Saraswati Koop Prayagraj
Saraswati Koop Prayagraj

सरस्वती कूप

संगम क्षेत्र में किले के भीतर सरस्वती कूप स्थित है। मान्यता है कि सरस्वती नदी यहाँ इस कूप में दृश्य रूप में विद्यमान है। इसी प्रकार गंगा के पूर्वी तट पर प्रतिष्ठानपुरी (वर्तमान झूँसी) में हंस कूप अथवा हंसतीर्थ स्थित है। इस पवित्र कूप का उल्लेख वाराह पुराण तथा मत्स्य पुराण में प्राप्त होता है।

मत्स्य पुराण के अध्याय 106 में हंसकूप का वर्णन किया गया है, जिसे हंसप्रपतन नाम दिया गया है। इस कूप के निकट एक शिलालेख उत्कीर्ण है, जिसका आशय यह है कि इस हंसरूपी बावली में स्नान करने तथा इसका जल पीने से हंसगति, अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति होती है।

रामचरितमानस में भी गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है—

"भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा।"

वर्तमान समय में महर्षि भरद्वाज का आश्रम प्रयागराज के कर्नलगंज मोहल्ले में, आनंद भवन के समीप स्थित है। इस आश्रम में महर्षि भरद्वाज की प्रतिमा तो नहीं है, किंतु यहाँ भरद्वाजेश्वर शिवलिंग तथा सहस्रफणधारी शेषनाग की भव्य प्रतिमा स्थापित है।

मंदिर के आसपास की भौगोलिक संरचना से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि किसी समय गंगा नदी इसी क्षेत्र से होकर बहती रही होगी, क्योंकि आश्रम ऊँचाई पर स्थित है तथा उसके चारों ओर पर्याप्त ढलान दिखाई देती है।

धार्मिक मान्यता है कि जो तीर्थयात्री प्रयाग आने के बाद भरद्वाज आश्रम के दर्शन नहीं करता, उसकी प्रयाग-यात्रा का पुण्यफल अपूर्ण माना जाता है। इसी कारण श्रद्धालु संगम स्नान के साथ-साथ महर्षि भरद्वाज आश्रम के दर्शन को भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानते हैं।

कोटि तीर्थ (शिवकुटी)

प्रयाग में गंगा के दक्षिणी तट पर स्थित तीर्थ को कोटि तीर्थ कहा गया है। वर्तमान शिवकुटी ही प्राचीन कोटि तीर्थ माना जाता है। पद्म पुराण के अनुसार यहाँ कोटि-कोटि तीर्थों का निवास है। इस कोटि तीर्थ के अधिष्ठाता देव कोटितीर्थेश्वर भगवान शिव कहे गए हैं। इसी स्थान के उत्तर में भार्गव, गालव तथा चामर तीर्थों का भी उल्लेख प्राप्त होता है।

श्री हनुमत निकेतन

नगर के सिविल लाइंस क्षेत्र में कमला नेहरू रोड और स्टेनली रोड के मध्य, ऐतिहासिक पुरुषोत्तम दास टंडन पार्क के समीप स्थित श्री हनुमत निकेतन लगभग साढ़े तीन एकड़ क्षेत्र में सुंदर वाटिकाओं से सुसज्जित है।

Hanumat Niketan Temple, Civil Lines - Temples in Prayagraj

Hanumat Niketan Temple, Civil Lines - Temples in Prayagraj
Hanumat Niketan Temple, Civil Lines - Temples in Prayagraj
Hanumat Niketan Temple, Civil Lines - Temples in Prayagraj

तीर्थयात्रियों, पर्यटकों तथा नगरवासियों की श्रद्धा के केंद्र इस मंदिर के संस्थापक रामलोचन ब्रह्मचारी जी थे। उन्होंने बल, बुद्धि, विद्या और ब्रह्मचर्य के प्रतीक भगवान हनुमान की भव्य प्रतिमा के साथ दक्षिण भाग में श्रीराम, लक्ष्मण एवं माता जानकी तथा उत्तर भाग में सिंहवाहिनी माँ दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर इस मंदिर को राष्ट्र को समर्पित किया।

समुद्र कूप

हंसकूप के दक्षिण की ओर निकट ही एक अन्य कुआँ स्थित है, जिसे समुद्र कूप कहा जाता है। जनश्रुति है कि इस कूप का निर्माण गुप्तवंशीय सम्राट समुद्रगुप्त ने कराया था, इसलिए इसका नाम समुद्र कूप पड़ा। यद्यपि अधिकांश लोग इसका संबंध समुद्र से मानते हैं।

यह अत्यंत गहरा कुआँ है और इसका उल्लेख मत्स्य पुराण में भी प्राप्त होता है। यह स्थान ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।

Samudrakup of Prayagraj is the Historical

अक्षयवट

प्रयागराज की अमूल्य धरोहरों में अक्षयवट का विशेष स्थान है। पद्म पुराण के अनुसार सृष्टि के प्रलयकाल में भी यह वृक्ष विद्यमान रहता है और इसका कभी नाश नहीं होता, इसलिए इसे अक्षयवट कहा जाता है।

पद्म पुराण में इसे श्यामवट नाम से भी संबोधित किया गया है—

श्यामो वटोऽश्यामगुणं वृणोति, स्वच्छायया श्यामलया जनानाम्।
श्यामः श्रमं कृन्तति यत्र दृष्टः स तीर्थराजो जयति प्रयागः।।

अर्थात् जहाँ श्यामवट (अक्षयवट) अपनी शीतल एवं श्यामल छाया से मनुष्यों को दिव्य सात्त्विक गुण प्रदान करता है तथा जहाँ भगवान माधव अपने दर्शन मात्र से भक्तों के पाप और संताप का नाश कर देते हैं, उस तीर्थराज प्रयाग की जय हो।

अक्षयवट का उल्लेख ऋग्वेद में भी प्राप्त होता है। सम्राट हर्षवर्धन के समय भारत आए प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी अपने यात्रा-वृत्तांत में अक्षयवट का वर्णन किया है।


akshayavat

पातालपुरी मंदिर

संगम के निकट स्थित किले के पूर्वी भाग में तहखाने के भीतर स्थित प्राचीन देवालय को पातालपुरी मंदिर कहा जाता है। इसका निर्माण कब और किसके द्वारा कराया गया, इसका स्पष्ट विवरण उपलब्ध नहीं है, किंतु इसकी प्राचीनता का संकेत ह्वेनसांग के वर्णनों से मिलता है।

ह्वेनसांग ने लिखा है—

"नगर में एक शिव मंदिर है, जो अपनी सजावट और चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध है। इसके बारे में कहा जाता है कि यदि कोई यहाँ दान करता है, तो उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है। मंदिर के आँगन में एक विशाल वृक्ष (अक्षयवट) है, जिसकी शाखाएँ और पत्तियाँ दूर-दूर तक फैली हुई हैं।"

वर्तमान में यह क्षेत्र भारतीय सेना के अधीन है तथा मंदिर सामान्यतः माघ मास के दौरान श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोला जाता है।

मंदिर की लंबाई लगभग 84 फीट तथा चौड़ाई 46.5 फीट है। खंभों पर टिकी इसकी छत की ऊँचाई लगभग साढ़े छह फीट है। मंदिर के भीतर गणेश, गोरखनाथ, नरसिंह, शिवलिंग आदि सहित कुल 46 मूर्तियाँ स्थापित हैं।

patalpuri-temple

श्री मनकामेश्वर मंदिर

मनकामेश्वर प्रयागराज के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है। यमुना तट पर स्थित यह भगवान शिव का प्राचीन मंदिर है, जिसमें मनकामेश्वर महादेव विराजमान हैं।

पुराणों में वर्णित इस तीर्थ का विशेष महत्त्व इसलिए माना जाता है कि यहाँ भगवान मनकामेश्वर महादेव के स्मरण, दर्शन एवं पूजन से श्रद्धालुओं की मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। इसी विश्वास के कारण वर्ष भर बड़ी संख्या में भक्त यहाँ दर्शन हेतु आते हैं।

यमुना तट पर स्थित यह मंदिर अपनी धार्मिक आस्था, प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक वातावरण के कारण प्रयागराज के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में गिना जाता है।

 
Sri Mankameshwar Mandir


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सांस की बदबू



क्यों आती है सांसों में बदबू? (Why Do You Have Bad Breath?)
साँस की दुर्गंध या मुंह की दुर्गन्ध के रोगी के मुख से एक विशेष दुर्गन्ध (बदबू) आती है जो, सांस के साथ मिली होती है। सांसों की दुर्गन्ध ग्रसित व्यक्ति में चिन्ता का कारण बन सकती है। यह एक गंभीर समस्या बन सकती है किंतु कुछ साधारण उपायों से साँस की दुर्गंध को रोका जा सकता है। साँस की दुर्गंध उन बैक्टीरिया से पैदा होती है, जो मुँह में पैदा होते हैं और दुर्गंध पैदा करते हैं। नियमित रूप से ब्रश नहीं करने से मुँह और दांतों के बीच फंसा भोजन बैक्टीरिया पैदा करता है। लहसुन और प्याज जैसे कुछ खाद्य पदार्थां में तीखे तेल होते हैं। इनसे साँसों की दुर्गंध पैदा होती है, क्योंकि ये तेल आपके फेफड़ों में जाते हैं और मुँह से बाहर आते हैं। साँस की दुर्गंध का एक अन्य प्रमुख कारण धूम्रपान है। साँस की दुर्गंध पर काबू पाने के बारे में अनेक धारणाएं प्रचलित हैं।
सांस की बदबू

कारण
साँसों की अधिकांश दुर्गंध आपके मुंह से शुरू होती है। सांसों की दुर्गंध के कई कारण होते हैं। इनमें से कुछ कारण निम्नलिखित हैं-
  1. दांतों की खराब सफाई और दांत की बीमारियां साँसों की दुर्गंध का कारण हो सकती हैं।
  2. यदि हर दिन ब्रश और कुल्ला नहीं करते हैं, तो भोजन के टुकड़े आपके मुँह में रह जाते हैं।वे बैक्टीरिया पैदा करते हैं और हाइड्रोजन सल्फाइड भाप बनाते हैं। आपके दांतों पर बैक्टीरिया (सड़न) का एक रंगहीन और चिपचिपा फिल्म जमा हो जाता है।
  3. दांतों में और इसके आसपास भोजन के टुकड़ों के टूटने से दुर्गंध पैदा हो सकती है।
  4. पतले तैलीय पदार्थ युक्त भोजन भी साँसों की दुर्गंध के कारण हो सकते हैं।
  5. प्याज और लहसुन इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं, लेकिन अन्य सब्जियां और मसाले भी साँसों में दुर्गंध पैदा कर सकते हैं।
  6. जब ये भोजन पचते हैं और तीखे गंध वाले तेल आपके खून में शामिल होते हैं, तो वे आपके फेफड़ों तक पहुंचते हैं और तब तक आपकी साँसों से बाहर निकलते रहते हैं, जब तक कि वह भोजन आपके शरीर से पूरी तरह खत्म न हो जाये।
  7. प्याज और लहसुन खाने के 72 घंटे बाद तक साँसों में दुर्गंध पैदा कर सकते हैं।
  8. धूम्रपान से आपका मुंह सूखता है और उससे एक खराब दुर्गंध पैदा होती है।
  9. तंबाकू का सेवन करने वालों को दांतों की बीमारी भी होती है, जो सांसों की दुर्गंध का अतिरिक्त स्रोत बनती है।
  10. फेफड़े का गंभीर संक्रमण और फेफड़े में गांठ से साँसों में बेहद खराब दुर्गंध पैदा हो सकती है। अन्य बीमारियां, जैसे कुछ कैंसर और चयापचय की गड़बड़ी से भी साँसों में दुर्गंध पैदा हो सकती है।
  11. साँसों की दुर्गंध का संबंध साइनस संक्रमण से भी है, क्योंकि आपके साइनस से नाक होकर बहने वाला द्रव आपके गले में जाकर सांसों में दुर्गंध पैदा करता है।
  12. लार से आपके मुँह में नमी रहने और मुँह को साफ रखने में मदद मिलती है। सूखे मुँह में मृत कोशिकाओं का आपकी जीभ, मसूड़े और गालों के नीचे जमाव होता रहता है। ये कोशिकाएं क्षरित होकर दुर्गंध पैदा कर सकती हैं। सूखा मुँह आमतौर पर सोने के समय होता है।
उपाय
  1. अत्यधिक कॉफी पीने से बचना चाहिए।
  2. दांतों के डॉक्टर या फार्मासिस्ट द्वारा अनुशंसित माउथवॉश का उपयोग करें।
  3. इलायची और लौंग चूसने से भी सांस की बदबू से निजात मिलता है।
  4. गाजर का जूस रोज पिएं। तन की दुर्गंध दूर भगाने में यह कारगर है।
  5. जीभ साफ करने के लिए जीभी का उपयोग करें और जीभ के अंतिम छोर तक सफाई करें।
  6. ताजी और रेशेदार सब्जियां खाएं।
  7. दुग्ध उत्पाद, मछली और मांस खाने के बाद अपने मुँह को साफ करें।
  8. नहाने से पहले शरीर पर बेसन और दही का पेस्ट लगाएं। इससे त्वचा साफ हो जाती है और बंद रोम छिद्र भी खुल जाते हैं।
  9. नियमित रूप से अपने दांतों के डॉक्टर के पास जाएं और अपने दांतों की अच्छी तरीके से सफाई करायें।
  10. नियमित रूप से दातुन करें।
  11. ब्रश करने के अलावा दांतों के बीच की सफाई के लिए कुल्ला भी करते रहें।
  12. मुँह और दांतों की साफ-सफाई का उच्च स्तर बनाए रखें।
  13. मुँह सूखने लगे, चीनी-मुक्त मुँह गम का इस्तेमाल करें,
  14. सांस की बदबू दूर करने के लिए रोज तुलसी के पत्ते चबाएं।
घरेलू उपाय
इलायची खाएं, खाना खाने के बाद ज्यादा पानी न पिएं, तुलसी के पत्ते और जामुन के पत्ते को बराबर मात्रा में लेकर चबाए, नींबू और गरम पानी का घोल पियें, पान में पुदीना के पत्ते का इस्तेमाल करें, मुलेठी चूसें, लौंग चूसें और सौंफ खाएं।

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मोच आने पर करे यह उपचार



अक्सर चलते-दौड़ते वक्त अक्सर मोच आ जाती है। दर्द होता है और हम मजबूर हो जाते हैं अपना पैर पकड़ कर बैठने के लिए। घुटना और टखना शरीर के दो ऐसे जोड़ हैं, जो चोटिल होते रहते हैं। पैर और पंजे को जोड़ने का काम करता है टखना। टखने के भीतरी लिगामेंट्स बहुत मजबूत होते हैं, जो कम ही परिस्थितियों में चोटिल होते हैं। बाहरी लिगामेंट्स तीन भाग में बंटे होते हैं- सामने, मध्य और पीछे। आमतौर पर मोच आने पर सामने और बीच वाले लिगामेंट्स ही चोटिल होते हैं। टखने के लिगामेंट्स के घायल होने की घटनाएं तब होती हैं, जब पंजा अंदर की ओर मुड़ जाता है। ऐसा असमान भूमि पर चलने से होता है और शरीर का पूरा वजन इन लिगामेंट्स पर पड़ने से वे चोटिल हो जाते हैं।
सामान्य परिस्थितियों में छह से आठ सप्ताह का समय पूरी तरह मोच ठीक होने मे लग जाता है। कई लोगों में लंबे समय तक मोच बनी रहती है। मोच आने पर इंसान एक जगह अपना पैर पकड़कर बैठ जाता है और उसे काफी दर्द झेलना पड़ता है। पैरों में मोच या फिर खिंचाव आने पर काफी सूजन और दर्द पैदा हो जाता है। यह कभी भी हो सकता है, चाहे कुछ ऐसे घरेलू नुस्खे लेकर आए हैं जिन्हें अपनाकर पैर में आई हुई मोच से जल्दी आराम पाया जा सकता है। खेल-कूद में लीन हो या फिर चलते चलते पैर मुड़ जाए और ऐसा होने पर टखनों की मोच आ जाती है जो काफी दर्द भरी होती है।
मोच आने पर अगर हम तुरंत डॉक्टर के पास न जा सके तो उसका भी समाधान है। कुछ खास घरेलू नुस्खों को अपनाकर पैर में आई हुई मोच से जल्दी आराम पाया जा सकता है। यह नुस्‍खे काफी पुराने हैं जिसमें किचन में रखी हुई सामग्रियां काम आ सकती हैं। मोच आने पर इन नुस्खों को आजमाएं और ढेर सारा आराम करें, जिससे कुछ ऐसे घरेलू नुस्खे लेकर आए हैं जिन्हें अपनाकर पैर में आई हुई मोच से जल्दी आराम पाया जा सकता है। जल्द ही ठीक हो सके। इसके बाद अगर ठीक ठाक चल सकने की स्थिति न हो तो तो डॉक्टर के पास जाना बिल्कुल नहीं भूलना चाहिए।

 उपचार
  1. 48 घंटो तक मोच वाली जगह पर किसी भी तरह का दबाव न डालें।
  2. आधा चम्मच हल्दी को दूध के साथ तुरंत सेवन करने से हड्डियों के अंदर की चोट को आराम मिलता है।
  3. एक गिलास गर्म दूध में आधा चम्मच फिटकरी मिलाकर इसका सेवन करने से मोच काफी जल्दी ठीक हो जाएगी।
  4. तुलसी की कुछ पत्तियों को पीसकर पेस्ट बना लें और उसको मोच वाले स्थान पर लगाएं। ऐसा करने से काफी आराम महसूस होगा।
  5. तुलसी के पत्तों के रस तथा सरसों के तेल को एक साथ मिलाकर गर्म कर के मोंच वाले भाग पर रखें। ऐसा दिन में 4-5 बार करें।
  6. थोड़े से बर्फ के टुकड़ों को किसी एक कपड़े में रखकर सूजन वाले जगह पर लगाएं। इससे सूजन कम हो जाती है और दर्द धीरे-धीरे कम होने लगता है।
  7. दो चम्‍मच हल्‍दी में थोड़ा सा पानी मिला कर पेस्ट बना लें। अब इस पेस्ट को हल्का गर्म करके मोच वाली जगह पर लगाएं। फिर 2 घंटे के बाद पैरों को गुनगुने पानी से धो लें।
  8. नमक और सरसों के तेल को गरम करें और मोंच पर रखें। फिर इसे किसी कपड़े से बांध कर रात में सो जाएं, आराम मिलेगा।
  9. पान के पत्ते पर सरसों का तेल लगा कर, उस पत्ते को हल्का गर्म कर के मोच वाले अंग पर बांध लें।
  10. पीड़ा और सूजन में कमी लाने के लिए मोच खाए अंग पर हर घंटे बाद बर्फ या ठंडे पानी की भीगी हुई पट्टियाँ रखें। इससे पीड़ा और सूजन में कमी आती है।
  11. पैर पर अगर मोच आई तो हमेशा पैर को सोते वक्त थोड़ा ऊंचाई पर रखें। इससे मोच की वजह से आई पैर की सूजन में कमी आती है।
  12. पैरों के नीचे तकिया रखें जिससे आपका पैर थोड़ा ऊपर उठ सके। इससे खून एक जगह पर नहीं जम पाएगा और वह पूरे शरीर में सर्कुलेट होगा। इससे पैरों की सूजन कम हो जाएगी।
  13. फिटकरी का आधा चम्‍मच ले कर उसे एक गिलास गर्म दूध में मिक्‍स कर के पी जाएं, इससे चोट जल्दी ठीक हो जाएगी ।
  14. मोच को बैंडेज या पट्टी से बांधने से राहत मिलती है। पैरों में प्लास्टिक बैंडेज बांधिये जिससे पैरों में ब्‍लड सर्कुलेशन भी ठीक रहे। मोच को कस के नहीं बांधना चाहिए नहीं तो उससे खून का दौरा धीमा पड़ जाता है। अगर बैंडेज को कस के बांध लिया तो दर्द बढ जाएगा।
  15. मोच खाए जोड़ को ठीक करने के लिए इलास्टिक की पट्टियों से बांधे।
  16. मोच खाए टखने पर एड़ी से शुरू कर पट्टी को ऊपर की ओर बांधें, ध्यान रहे कि पट्टी बहुत सख्त न हो और हर दो घंटे में खोलते रहें। यदि दर्द और सूजन 48 घंटे में कम न हो तो चिकित्सा सहायता लें।
  17. मोच खाए या टूटे अंग की मालिश कभी भी न करें। इससे कोई लाभ नहीं होता, बल्कि हानि पहुँच सकती है।
  18. मोच वाले स्थान पर एलोवेरा जेल लगाने से आराम मिलेगा।
  19. यदि मोच लगने के तुरंत बाद ही उस जगह पर बर्फ लगा कर सिकाई की जाए तो उस जगह पर सूजन नहीं आती। दर्द को दूर करने के लिये हर 1-2 घंटे में 20 मिनट की बर्फ से सिकाई करनी चाहिये। बर्फ को हमेशा किसी कपड़े में लपेट कर लगाना चाहिए।
  20. शहद और चूने दोनों को बराबर मात्रा में मिला कर मोच वाली जगह पर हल्की मालिश करें।
  21. सूजन को कम करने के लिए बर्फ या आइस पैक को दिन में 4-8 बार जरूर लगाएं।
  22. हल्दी लगाने से पैरों की सूजन कम हो जाती है। हल्दी एक एंटीसेप्टिक गुणों वाला मसाला है जो लंबे समय से प्रयोग में लाई जा रही है। इसे लगाने से आपको मोच में काफी आराम मिल सकता है। 2 चम्‍मच हल्‍दी में थोड़ा सा पानी मिला कर पेस्ट बना कर हल्का गर्म करें और मोच पर लगाएं। फिर 2 घंटे के बाद पैरों को गर्म पानी से धो लें।
मोच आने पर घर में करें ये व्यायाम
  1.  अपना पंजा दरवाजे के पास इस तरह रखें, जिससे एड़ी जमीन पर रहे और पंजा 45 डिग्री के कोण के साथ दरवाजे से थोड़ा ऊंचाई पर रहे। सपोर्ट के लिए दरवाजे को पकड़ लें। अब घुटने को मोड़ते हुए दरवाजे के करीब लाएं। इस खिंचाव को दो मिनट तक बनाए रखें। यदि सुविधाजनक नहीं लग रहा है तो एक ब्रेक लेकर दोबारा ऐसा करें। अगर आप लगातार दो मिनट तक स्ट्रेच कर रहे हैं तो ऐसा एक बार ही करें।
  2. टखने का लचीलापन और उसको गति देने के बाद अब बैठने का व्यायाम करें। एक चटाई बिछा लें। पैरों को पीछे की ओर मोड़ लें। ध्यान रखें कि पैरों की उंगलियां पीछे की ओर से सीधी रहें, अंदर की ओर मुड़ी न हों। अब कूल्हे के हिस्से को एड़ियों पर टिका कर बैठ जाएं। इससे जमीन पर पंजे के सामने के हिस्से पर स्ट्रेच उत्पन्न होगा। स्ट्रेच अधिक बढ़ाने के लिए शरीर के वजन को कूल्हों पर रखें और दो मिनट तक इसी स्थिति में रहें। शुरुआत में इसे कम समय के लिए कर सकते हैं।
  3. पंजे से दीवार पर इसी तरह दबाव बनाए रखें। अब घुटने को अंदर और बाहर की ओर गोल घुमाएं। ऐसा करते हुए दबाव टखने के पीछे के हिस्से की ओर पड़ना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हो रहा है तो अपनी स्थिति को ठीक करें और इसे दोबारा दोहराएं।
प्रश्‍नोत्तरी
  1. मोच आ जाए तो क्या लगाना चाहिए?
    बर्फ से सिकाई - मोच लगने के तुरंत बाद उस जगह पर बर्फ की सिकाई करने से सूजन नहीं आती है। इसके लावा बर्फ की सिकाई करने से दर्द भी दूर हो जाती है। ऐसे में मोच आने पर हर एक से दो घंटे में बर्फ से सिकाई करनी चाहिए। हालांकि सीधे ही बर्फ से सिकाई नहीं करनी चाहिए।
  2. मोच की सबसे अच्छी दवा कौन सी है?
    Arnica और कोलेजन गोल्ड जेल - [7 Oz] एक बहुत ही प्रभावी जेल की ट्यूब। चोट, सूजन, मांसपेशियों की कठोरता, मोच और तनाव के लिए आपकी सबसे अच्छी शर्त।
  3. पैर की मोच कितने दिन में ठीक होती है?
    पैर की मोच कितने दिन में ठीक होती है? पैर की मोच ठीक होने में लगने वाला समय आपकी चोट की गंभीरता पर निर्भर करता है। मामूली मोच दो सप्ताह में ठीक हो सकती है, लेकिन गंभीर मोच को ठीक होने में 6 से 12 सप्ताह लग सकते हैं।
  4. मोच आने पर कौन सी दवाई लेनी चाहिए?
    फिटकरी: एक गिलास गर्म दूध में आधा चम्मच फिटकरी मिलाकर इसका सेवन करें। इसका सेवन करने से मोच काफी जल्दी ठीक हो जाएगी। इमली का पत्ता: इमली के पत्तों में एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-सेप्टिक गुण पाए जाते हैं जो मोच के दर्द में लाभकारी होते हैं। इमली के पत्तों को पीसकर इसमें गुनगुना पानी मिलाकर पेस्ट बना लें।
  5. आपको कैसे पता चलेगा कि यह मोच है या टूट गई है?
    यदि आप कोई हड्डी तोड़ते हैं, तो आपको चटकने की आवाज सुनाई दे सकती है। दर्द का स्रोत। यदि आपको जो दर्द महसूस हो रहा है वह किसी जोड़ के आसपास के मुलायम ऊतकों में है, तो संभवतः यह मोच है। यदि हड्डी पर हल्का दबाव डालने से अत्यधिक दर्द होता है, तो चोट संभवतः फ्रैक्चर है।
  6. क्या मोच वाला पैर रात भर ठीक हो सकता है?
    अधिकांश छोटी-से-मध्यम चोटें 2 से 4 सप्ताह के भीतर ठीक हो जाएंगी। अधिक गंभीर चोटें, जैसे ऐसी चोटें जिनमें कास्ट या बूट की आवश्यकता होती है, को ठीक होने में 6 से 8 सप्ताह तक का लंबा समय लगेगा।
  7. क्या हल्दी मोच के लिए अच्छी है?
    हल्दी: यह हमारे भोजन में अनोखा स्वाद लाने के अलावा और भी बहुत कुछ करती है। इससे हमें दर्द से भी राहत मिलेगी और मोच के कारण होने वाली सूजन भी शांत होगी । इससे रक्त के थक्कों से बचा जा सकता है, रक्त की आपूर्ति बढ़ सकती है और त्वचा और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याओं का समाधान हो सकता है।
    पैर, घुटने, हाथ, उंगली या बाजुओं में अगर आपको किसी प्रकार की चोट, मोच या अंदरूनी घाव महसूस हो रहा है तो आप गेहूं के आटे, घी और हल्दी के लेप का इस्तेमाल कर सकते हैं। इस लेप के इस्तेमाल से आपको बहुत जल्द दर्द में आराम मिलेगा।
  8. पैर में मोच आने के बाद मैं कब चल सकता हूं?
    टखने की मोच का दर्द और सूजन अक्सर 48 घंटों के भीतर ठीक हो जाता है। उसके बाद, आप अपने घायल पैर पर वापस वजन डालना शुरू कर सकते हैं। अपने पैर पर केवल उतना ही वजन डालें जितना शुरू में आरामदायक हो। धीरे-धीरे अपने पूरे वजन तक पहुंचें।
  9. बर्फ से सिकाई कब करनी चाहिए?
    अगर कोई पुरानी चोट भी तुरंत पैदा हुई हो, तो वहां भी बर्फ लगाया जा सकता है, लेकिन ध्‍यान रखना होगा कि तुरंत तेज दर्द हो तभी। चोट वाली जगह पर अगर खून बह रहा हो तब तो जरूर बर्फ से सिकाई करनी चाहिए। लेकिन ध्‍यान रखें कि बर्फ को सीधे कभी चोट पर नहीं रखना चाह‍िए। तौल‍िए में आइस को लपेटकर ही लगाएं।
  10. मोच या हड्डी की चोटों में क्या नहीं करना चाहिए?
    मोच लगने वाली जगह पर कभी भी मसाज न करें। इस दौरान किसी भी तरह की एक्ससाइज करने से बचें। मोच वाले हिस्से को गर्मी न दें। बहुत से लोग मोच करने पर स्टीमबाथ लेते हैं, लेकिन ऐसा करने से बचना चाहिए।
  11. मोच के स्थान पर बर्फ से सिकाई करने से क्या फायदा होता है?
    अगर आपको कहीं मोच आ जाए तो बर्फ की स‍िकाई कर सकते हैं। बर्फ से स‍ेकने पर नसों को आराम म‍िलता है और मोच जल्दी ठीक होती है। अगर कहीं चोट लग जाए तो आइस लगा देनी चाहिए। इससे खून का फ्लो उस जगह रुक जाता है।
  12. क्या मोच चोट लगने से ज्यादा खराब होती है?
    कभी-कभी, मोच टूटने से भी ज्यादा दर्दनाक हो सकती है। मोच आघात के कारण होती है जो स्नायुबंधन को अत्यधिक खींचती है और जोड़ पर तनाव डालती है।
  13. मोच किस प्रकार की चोट है?
    मोच , स्नायुबंधन की चोटें हैं जो किसी जोड़ के भींचने या मुड़ने से उत्पन्न होती हैं । खिंचाव मांसपेशियों या कण्डरा की चोटें हैं, और अक्सर अत्यधिक उपयोग, बल या खिंचाव के कारण होती हैं। टखना सबसे आम तौर पर मोच या खिंचाव वाला जोड़ है।
  14. मोच आने का क्या कारण होता है?
    मोच जोड़ में चोट लगने के कारण अस्थिबंध (लिगामेंट) की क्षमता से अधिक खीच जाने या मॉसपेशीयॉ के फटने के कारण होता है। इस तरह की बीमारियों का किसी तरह के आघात से खास रिश्ता होता है। चोट लगने के साथ ही सूजन शुरू हो जाती है। मोच किसी भी जोड़ में हो सकता है पर ऐड़ी और कलाई के जोड़ पर ज्यादा मोच आती है।
  15. क्या नमक का पानी मोच वाले टखने के लिए अच्छा है?
    कुछ दिनों के बाद, आप अपने टखने को एप्सम नमक के साथ गर्म स्नान में भिगो सकते हैं। चोट लगने के बाद पहले कुछ दिनों के दौरान ठंड लगाना महत्वपूर्ण है। एप्सम नमक दर्द वाली मांसपेशियों और संयोजी ऊतकों को शांत करने में मदद कर सकता है, और यह जोड़ों की कठोरता में मदद कर सकता है। प्रतिदिन 1-2 बार गर्म या थोड़े गर्म स्नान में एप्सम नमक मिलाने का प्रयास करें।
  16. सरसों का तेल मोच के लिए अच्छा है?
    गठिया और गठिया के दर्द से छुटकारा पाने के लिए सरसों के तेल से मालिश करने की सलाह दी जाती है - जो अपने सूजन-रोधी गुणों के लिए जाना जाता है। यह टखनों की मोच और अन्य जोड़ों के दर्द से भी राहत दिला सकता है । सेलेनियम नामक ट्रेस खनिज की उपस्थिति जोड़ों और त्वचा की सूजन से राहत दिलाने में मदद करती है।
  17. मोच वाले टखने में कितनी देर तक चोट लगती है?
    यदि यह सीधी चोट थी, मूल्यांकन की आवश्यकता नहीं थी और आपको कोई झटका नहीं लगा था, तो आप उम्मीद कर सकते हैं कि लिगामेंट ठीक होने तक लक्षण 10 से 12 सप्ताह तक बने रहेंगे। एक बार जब आपके टखने में मोच आ गई, तो भविष्य में चोट लगने की संभावना अधिक होती है। टखने की आस्तीन या लेस-अप ब्रेस अतिरिक्त समर्थन और स्थिरता प्रदान कर सकता है।
  18. मोच आए हुए स्थान पर कितने देर तक बर्फ से सिकाई करनी चाहिए?
    अगर मोच लगने के तुरंत बाद आप उस जगह पर बर्फ की सिकाई कर दें तो सूजन नहीं आती। इसके अलावा बर्फ की सिकाई करने से पेन में भी आराम मिलता है। ऐसे में मोच आने पर हर एक से 2 घंटे मे बर्फ से सिकाई करनी चाहिए।
  19. क्या गर्म पानी सूजन को कम करता है?
    गर्म पानी में भीगना कई कारणों से काम करता है। यह जोड़ को दबाने वाले गुरुत्वाकर्षण बल को कम करता है, दर्द वाले अंगों को 360-डिग्री समर्थन प्रदान करता है, सूजन और सूजन को कम कर सकता है और परिसंचरण को बढ़ा सकता है। तो, आपको कितनी देर तक भिगोना चाहिए? लगभग 20 मिनट के बाद अधिकतम लाभ मिलता हुआ प्रतीत होता है।
  20. मोच और खिंचाव के दौरान प्राथमिक उपचार क्या है?
    आराम: घायल हिस्से को तब तक आराम दें जब तक दर्द कम न हो जाए। बर्फ: एक तौलिये में आइसपैक या ठंडा सेक लपेटें और तुरंत चोट वाले हिस्से पर रखें। इसे एक बार में 20 मिनट से अधिक न जारी रखें, दिन में चार से आठ बार। संपीड़न: घायल हिस्से को कम से कम 2 दिनों के लिए इलास्टिक संपीड़न पट्टी से सहारा दें।
  21. मोच या फ्रैक्चर कौन सा बदतर है?
    हालांकि मोच को आमतौर पर फ्रैक्चर की तुलना में कम गंभीर चोट माना जाता है , लेकिन इसे ठीक होने में अधिक समय लग सकता है। क्यों? स्नायुबंधन में रक्त की आपूर्ति बहुत सीमित होती है। मोच की गंभीरता के आधार पर, पूर्ण उपचार में एक वर्ष तक का समय लग सकता है।
  22. मोच या खिंचाव कौन सा बदतर है?
    एक तकनीकी रूप से दूसरे से बदतर नहीं है । खिंचाव टेंडन को प्रभावित करता है (इसे याद रखने का एक आसान तरीका है sTrains = टेंडन या मांसपेशियां), और मोच स्नायुबंधन को प्रभावित करता है। कण्डरा और स्नायुबंधन दोनों संयोजी ऊतक हैं, और दोनों को गंभीरता से मापा जाता है।
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