क्षत्रिय - राजपूत - ठाकुर
राजपूतों के वंश
"दस रवि से दस चन्द्र से, बारह ऋषिज प्रमाण।
चार हुतासन सों भये, कुल छत्तीस वंश प्रमाण।
भौमवंश से धाकरे, टांक नाग अनुमान।
चौहानी चौबीस बँटि, कुल बासठ वंश प्रमाण।।"
अर्थ : दस सूर्यवंशी क्षत्रिय, दस चन्द्रवंशी, बारह ऋषिवंशी एवं चार अग्निवंशी—ये कुल मिलाकर छत्तीस क्षत्रिय वंशों का प्रमाण माने गए हैं। बाद में भौमवंश तथा नागवंश के क्षत्रियों को सम्मिलित करने के पश्चात्, और जब चौहान वंश चौबीस अलग-अलग शाखाओं में विभक्त होने लगा, तब क्षत्रियों के बासठ वंशों का उल्लेख प्राप्त होता है।
राजपूत कितने प्रकार के होते हैं - प्रमुख क्षत्रिय वंश
How many types of Rajput are there - Major Kshatriya Clans
रघुवंश - रघुवंशी का अर्थ है रघु के वंशज। अयोध्या (कोसल देश) के सूर्यवंशी राजा इक्ष्वाकु के वंश में राजा रघु हुए। राजा रघु एक महान राजा थे। इनके नाम पर इस वंश का नाम रघुवंश पड़ा तथा इस वंश के वंशजों को रघुवंशी कहा जाने लगा। बौद्ध काल तक रघुवंशियों को इक्ष्वाकु, रघुवंशी तथा सूर्यवंशी क्षत्रिय कहा जाता था। यह वंश सूर्यवंश, इक्ष्वाकु वंश, ककुत्स्थ वंश व रघुवंश नाम से जाना जाता है।
आदिकाल में ब्रह्माजी ने भगवान सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु को पृथ्वी का प्रथम राजा बनाया था। भगवान सूर्य के पुत्र होने के कारण मनुजी सूर्यवंशी कहलाए तथा उनसे चला यह वंश सूर्यवंश कहलाया। अयोध्या के सूर्यवंश में आगे चलकर प्रतापी राजा रघु हुए। राजा रघु से यह वंश रघुवंश कहलाया। इस वंश में इक्ष्वाकु, ककुत्स्थ, हरिश्चन्द्र, मान्धाता, सगर, भगीरथ, अम्बरीष, दिलीप, रघु, दशरथ और राम जैसे प्रतापी राजा हुए हैं।
नागवंश - नागवंशी क्षत्रियों का भारत और भारत के बाहर एक बड़े भूभाग पर लंबे समय तक शासन रहा है। प्राचीन काल में नागवंशियों का राज्य भारत के कई स्थानों पर तथा सिंहल में भी था। पुराणों में स्पष्ट लिखा है कि सात नागवंशी राजा मथुरा पर राज्य करेंगे, उसके पश्चात् गुप्त राजाओं का राज्य होगा।
नौ नाग राजाओं के जो प्राचीन सिक्के मिले हैं, उन पर 'बृहस्पति नाग', 'देवनाग', 'गणपति नाग' इत्यादि नाम मिलते हैं। ये नागगण विक्रम संवत् 150 और 250 के बीच राज्य करते थे। इन नव नागों की राजधानी कहाँ थी, इसका ठीक पता नहीं है, पर अधिकांश विद्वानों का मत यही है कि उनकी राजधानी 'नरवर' थी।
मथुरा और भरतपुर से लेकर ग्वालियर और उज्जैन तक का भू-भाग नागवंशियों के अधिकार में था। कृष्णकाल में नाग जाति ब्रज में आकर बस गई थी। इस जाति की अपनी एक पृथक संस्कृति थी। कालिय नाग को संघर्ष में पराजित करके श्रीकृष्ण ने उसे ब्रज से निर्वासित कर दिया था, किन्तु नाग जाति यहाँ प्रमुख रूप से बसी रही। मथुरा पर उन्होंने काफी समय तक शासन भी किया।
इतिहास में यह बात प्रसिद्ध है कि महाप्रतापी गुप्तवंशी राजाओं ने शक अथवा नागवंशियों को परास्त किया था। प्रयाग के किले के भीतर जो स्तम्भलेख है, उसमें स्पष्ट लिखा है कि महाराज समुद्रगुप्त ने गणपति नाग को पराजित किया था। इस गणपति नाग के सिक्के बहुत मिलते हैं।
महाभारत में भी कई स्थानों पर नागों का उल्लेख है। पाण्डवों ने नागों के हाथ से मगध राज्य छीना था। खाण्डव वन जलाते समय भी बहुत से नाग नष्ट हुए थे। जिसका अर्थ यह हुआ कि मगध, खाण्डवप्रस्थ, तक्षशिला (तक्षक नाग द्वारा बसाई गई थी। यहाँ का प्रथम राजा तक्षक नाग था, जिसके नाम पर तक्षक नागवंश चला) तथा मथुरा आदि महाभारत काल में इनके प्रमुख राज्य थे।
शिशुनाग के नाम पर शिशुनाग वंश मगध राज्य (दक्षिण बिहार, भारत) पर लंबे समय तक शासन करने के लिए जाना जाता है। महाभारत में ऐरावत नाग के वंश में उत्पन्न कौरव्य नाग की पुत्री का विवाह भी अर्जुन से हुआ बताया गया है, जब एक गलती के कारण अर्जुन युधिष्ठिर के आदेशानुसार 12 वर्ष तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर रहे थे।
सोमवंशी ठाकुर - जो सोमवंशी पश्चिमी प्रयाग की ओर बसे, उनका गोत्र भारद्वाज है क्योंकि भारद्वाज आश्रम भी उसी क्षेत्र में था। सोमवंशी क्षत्रिय मुख्यतः उत्तर प्रदेश के फैजाबाद, बहराइच, अम्बेडकर नगर, जौनपुर, प्रतापगढ़, गोंडा, वाराणसी, बरेली, सीतापुर, कानपुर, हरदोई, फर्रुखाबाद, शाहजहाँपुर और इलाहाबाद में पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त पंजाब, दिल्ली तथा बिहार प्रान्त में भी सोमवंशी क्षत्रिय पाए जाते हैं।
गुरुग्राम, रोहतक, हिसार, पंजाब एवं दिल्ली के सोमवंशी क्षत्रियों का निवास हस्तिनापुर से सम्बन्धित माना जाता है तथा बिहार प्रदेश के सोमवंशी क्षत्रियों का सम्बन्ध कौशाम्बी, प्रतिष्ठानपुर (वर्तमान झूँसी, प्रयागराज) और हरदोई क्षेत्र से माना जाता है।
उज्जैनीय क्षत्रिय - ये क्षत्रिय अग्निवंशी परमार की शाखा हैं। गोत्र शौनक है। ये राजा विक्रमादित्य और भोज की सन्तान माने जाते हैं। ये लोग अवध और आगरा प्रान्त के पूर्वी जिलों में पाए जाते हैं। इस वंश की एक बहुत बड़ी रियासत डुमराँव, बिहार प्रान्त के शाहाबाद जिले में है। वर्तमान में डुमराँव के राजा कलमसिंह जी सांसद हैं। इस वंश के क्षत्रिय बिहार के शाहाबाद जिले के जगदीशपुर, दलीपपुर, डुमराँव, मेठिला, बक्सर, केसठ, चौगाई आदि स्थानों में तथा मुजफ्फरपुर, पटना, गया, मुंगेर और छपरा आदि जिलों में बसे पाए जाते हैं।
कछवाहा (कछवाहे) - ये सूर्यवंशी क्षत्रिय कुश के वंशज हैं। कुशवाहा को कछवाहा राजावत भी कहते हैं। गोत्र गौतम, गुरु वशिष्ठ, कुलदेवी दुर्गा मंगला, वेद सामवेद, निशान पचरंगा, इष्ट रामचन्द्र तथा वृक्ष वट है। इनके प्रमुख ठिकाने जयपुर, अलवर (राजस्थान), रामपुर, गोपालपुरा, लहार, मछंद (उत्तर प्रदेश) तथा अन्य जनपदों में पाए जाते हैं।
गहरवार क्षत्रिय - इनका गोत्र कश्यप है। गहरवार, राठौरों की एक शाखा है। महाराजा जयचन्द के भाई माणिकचन्द्र को विजयपुर-माड़ा की गहरवारी रियासत का आदि संस्थापक कहा गया है। ये क्षत्रिय इलाहाबाद, बनारस, मिर्जापुर, रामगढ़, श्रीनगर आदि में पाए जाते हैं। इनकी एक शाखा बुन्देला है। बिहार में बागही, करवासी और गोड़ीवाँ में भी गहरवार पाए जाते हैं।
गहलौत - ये क्षत्रिय सूर्यवंशी हैं। रामचन्द्र के छोटे पुत्र लव के वंशज माने जाते हैं। गोत्र वैशम्पायन, वेद यजुर्वेद, गुरु वशिष्ठ, नदी सरयू, इष्ट एकलिंग शिव तथा ध्वज लाल-सुनहरा है, जिस पर सूर्यदेव का चिह्न अंकित रहता है। इनकी प्रधान गद्दी चित्तौड़ (वर्तमान उदयपुर) है। इस वंश के क्षत्रिय मेवाड़, राजपूताना, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा बिहार प्रान्त के मुंगेर, मुजफ्फरनगर और गया जिलों में पाए जाते हैं। इसकी 24 शाखाएँ थीं, जिनमें से अधिकांश शाखाएँ समाप्त हो गईं।
गोहिल क्षत्रिय - इस वंश का पहला राजा गोहिल था, जिसने मारवाड़ के अन्तर्गत बड़गढ़ में राज्य किया। इनका गोत्र कश्यप है।
गौड़ क्षत्रिय - इनका गोत्र भारद्वाज है। यह वंश भरत से चला माना जाता है। ये मारवाड़, अजमेर, राजगढ़, शिवपुर, बड़ौदा, शिवगढ़, कानपुर, सीतापुर, उन्नाव, इटावा, शाहजहाँपुर और फर्रुखाबाद आदि जिलों में पाए जाते हैं। ये क्षत्रिय सूर्यवंशी हैं।
गौतम क्षत्रिय - इनका गोत्र गौतम है। ये उत्तर प्रदेश तथा बिहार के मुजफ्फरनगर, आरा, छपरा, दरभंगा आदि जिलों में पाए जाते हैं। उत्तर प्रदेश में विशेष रूप से फतेहपुर और कानपुर जिलों में इनकी उपस्थिति है।
चन्देल क्षत्रिय - इनका गोत्र चन्द्रायण तथा गुरु गोरखनाथ जी हैं। ये क्षत्रिय बिहार प्रान्त में गिद्धौर नरेश क्षेत्र, कानपुर, मिर्जापुर, जौनपुर तथा दरभंगा जिले की आलमनगर और बंगरहरा रियासतों में पाए जाते थे। बस्तर राज्य (मध्य प्रदेश) तथा बुन्देलखण्ड में भी ये यत्र-तत्र पाए जाते हैं।
चावड़ा क्षत्रिय - ये अग्निवंशी हैं। इनका गोत्र कश्यप है। यह परमार वंश की 16वीं शाखा मानी जाती है। चावड़ा एक प्राचीन राजवंश है। ये दक्षिण भारत तथा काठियावाड़ में पाए जाते हैं। इस वंश के विवाह-संबंध स्थान-भेद के अनुसार समान क्षत्रियों के साथ होते हैं।
चौहान क्षत्रिय - ये क्षत्रिय अग्निवंशी हैं। इनका गोत्र वत्स है। इस वंश की 24 शाखाएँ हैं— 1. हाड़ा, 2. खींची, 3. भदौरिया, 4. सोनगिरा, 5. देवड़ा, 6. पाविया (पावागढ़ के नाम से), 7. संचोरा, 8. गैलवाल, 9. निर्वाण, 10. मालानी, 11. पूर्विया, 12. सूरा, 13. नाडडेचा, 14. चाचेरा, 15. संकेचा, 16. मुरेचा, 17. बालेचा, 18. तस्सेरा, 19. रोसिया, 20. चान्दू, 21. भावर, 22. वंकट, 23. भोपले तथा 24. धनारिया।
इनके वर्तमान ठिकाने छोटा उदयपुर, सोनपुर राज्य (उड़ीसा), सिरोही (राजस्थान), बरिया (मध्य प्रदेश), मैनपुरी, प्रतापनेर, राजौर, एटा, ओयल (लखीमपुर), चक्रनगर, बरिया राज्य, बून्दी, कोटा, नौगाँव (आगरा), बलरामपुर तथा बिहार में पाए जाते हैं।
जोड़जा क्षत्रिय - ये क्षत्रिय श्रीकृष्ण के शाम्ब नामक पुत्र की सन्तान माने जाते हैं। ये मोरबी राज्य, कच्छ राज्य, राजकोट तथा नवानगर (गुजरात) में पाए जाते हैं।
झाला क्षत्रिय - इनका गोत्र कश्यप है। इनके प्रमुख ठिकाने बीकानेर, काठियावाड़ तथा राजपूताना आदि में हैं।
डोडा क्षत्रिय - यह अग्निवंशी परमार की शाखा है। इनका गोत्र आदि परमारों के समान है। प्राचीनकाल में बड़ौदा डोडा की राजधानी थी। मेरठ और हापुड़ के आसपास इनका राज्य था। वर्तमान समय में पिपलोदा (मालवा) तथा सरदारगढ़ (मेवाड़) इनके प्रमुख स्थान हैं। ये मुरादपुर, बाँदा, बुलन्दशहर, मेरठ, सागर (मध्य प्रदेश) आदि में पाए जाते हैं।
तोमर क्षत्रिय - इनका गोत्र गर्ग है। ये जोधपुर, बीकानेर, पटियाला, नाभा और धौलपुर आदि में पाए जाते हैं। इनका मुख्य घराना तुमरगढ़ है। इनकी एक प्रशाखा जैरावत अथवा जैवार नाम से झाँसी जिले में यत्र-तत्र आबाद है।
दीक्षित क्षत्रिय - यह वंश सूर्यवंशी है। इनका गोत्र कश्यप है। इस वंश के लोग उत्तर प्रदेश और बघेलखण्ड में यत्र-तत्र पाए जाते हैं। इस वंश के क्षत्रियों ने नेवतनगढ़ में राज्य किया, इसलिए ये नेवतनी कहलाए। ये लोग छपरा जिले में भी पाए जाते हैं। दीक्षित लोग विवाह-संबंध स्थान-भेद के अनुसार समान क्षत्रियों में करते हैं।
निकुम्भ क्षत्रिय - इनका गोत्र वशिष्ठ है। ये शीतलपुर, दरभंगा, आरा, भागलपुर आदि जिलों में पाए जाते हैं। उत्तर प्रदेश में भी ये यत्र-तत्र पाए जाते हैं। ये सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं। राजा इक्ष्वाकु के 13वें वंशधर निकुम्भ माने जाते हैं।
परमार क्षत्रिय - ये अग्निवंशी हैं। इनका गोत्र गर्ग है। इस वंश की प्राचीन राजधानी चन्द्रावती थी। मालवा में इनकी प्रथम राजधानी धारा नगरी थी, जिसके पश्चात् उज्जैन को राजधानी बनाया गया। विक्रमादित्य इस वंश के सबसे प्रतापी राजा हुए, जिनके नाम पर विक्रम संवत् प्रारम्भ हुआ। इसी वंश में सुप्रसिद्ध राजा मुंज और भोज हुए। इनकी 35 शाखाएँ हैं। इन क्षत्रियों के प्रमुख ठिकाने तथा राज्य नरसिंहगढ़, दाँता राज्य, सूंथ, धार, देवास, पंचकोट, नीलगाँव (उत्तर प्रदेश) तथा अन्य स्थानों पर पाए जाते हैं।
परिहार क्षत्रिय - ये क्षत्रिय अग्निवंशी हैं। इनका गोत्र कश्यप तथा गुरु वशिष्ठ हैं। इनके प्रमुख ठिकाने हमीरपुर, गोरखपुर, नागौद, सोहरतगढ़, उरई (जालौन) आदि में हैं। इस वंश की 19 शाखाएँ हैं, जो भारत के विभिन्न भागों में अलग-अलग नामों से जानी जाती हैं।
बघेल क्षत्रिय - इनका गोत्र भारद्वाज है। यह सोलंकियों की एक शाखा है। बघेलों को सोलंकी वंश के राजा व्याघ्रदेव की सन्तान माना गया है। इन्हीं व्याघ्रदेव के नाम से सन् 615 ई. में बघेलखण्ड प्रसिद्ध हुआ। रीवा राज्य, सोहाबल, मदरवा, पाण्डू, पेथापुर, नयागढ़, रणपुर, देवधर (मध्य प्रदेश) तथा तिर्वा (फर्रुखाबाद) बघेलों के प्रमुख ठिकाने हैं।
बल्ल क्षत्रिय - यह वंश रामचन्द्र के पुत्र लव से चला माना जाता है। ये बल्लगढ़ तथा सौराष्ट्र में पाए जाते हैं।
बिसेन क्षत्रिय - इनका गोत्र पराशर (तथा अन्य परम्पराओं में भारद्वाज, शाण्डिल्य, अत्रि, वत्स) माना जाता है। ये मझौली (गोरखपुर), भिनगा (बहराइच), मनकापुर (गोंडा), भरौरिया (बस्ती) तथा कालाकांकर (प्रतापगढ़) में अधिक संख्या में पाए जाते हैं।
बुन्देला क्षत्रिय - ये गहरवार क्षत्रियों की शाखा हैं। गहरवार हेमकरण ने अपना नाम बुन्देला रखा था। राजा रुद्रप्रताप ने बुन्देलखण्ड की राजधानी गढ़कुण्डार से ओरछा स्थानान्तरित की। बैशाख शुक्ल त्रयोदशी, संवत् 1588 विक्रम को ओरछा को राजधानी के रूप में स्थापित किया गया। इस वंश के प्रमुख राज्य चरखारी, अजयगढ़, बिजावर, पन्ना, ओरछा, दतिया, टीकमगढ़, सरीला तथा जिगनी आदि रहे हैं।
बैस क्षत्रिय - इनका गोत्र भारद्वाज है। इस वंश की रियासतें सिगरामऊ, मुरारमऊ, खजुरगाँव, कुर्री-सिदौली, कोड़िहार, सतांव, पाहू, पिलखा, नरेन्द्र, चरहुर, कसो, देवगाँव, हसनपुर तथा अवध और आजमगढ़ जिले में स्थित रही हैं।
भाटी क्षत्रिय - यह श्रीकृष्ण के बड़े पुत्र प्रद्युम्न की सन्तान माने जाते हैं। ये राजस्थान के जैसलमेर तथा बिहार के भागलपुर और मुंगेर जिलों में पाए जाते हैं।
भोंसला क्षत्रिय - ये सूर्यवंशी हैं। इनका गोत्र कौशिक है। दक्षिण भारत में सतारा, कोल्हापुर, तंजावूर, नागपुर तथा सावंतवाड़ी इनके प्रमुख राजवंश रहे हैं। इसी वंश में छत्रपति शिवाजी जैसे प्रतापी राजा हुए।
महरौड़ या मड़वर क्षत्रिय - यह चौहानों की एक प्रशाखा है। इनका गोत्र वत्स है। चौहान वंश में गोगा नामक एक प्रसिद्ध वीर का जन्म हुआ था। उनकी राजधानी मैरीवा (मिहिरनगर) थी। यवन आक्रमण के समय अपनी राजधानी की रक्षा हेतु वे अपने 45 पुत्रों एवं 60 भ्रातृ-पुत्रों सहित युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। उनके वंशजों ने अपने को महरौड़ अथवा मड़वर कहना प्रारम्भ किया। इस वंश के क्षत्रिय उत्तर प्रदेश के बनारस, गाजीपुर और उन्नाव में तथा बिहार के शाहाबाद, पटना, मुजफ्फरपुर और वैशाली जिलों में पाए जाते हैं।
मालव क्षत्रिय - ये अग्निवंशी हैं। इनका गोत्र भारद्वाज है। मालवा प्रान्त से भारत के विभिन्न स्थानों में जाकर बसने के कारण ये मालविया अथवा मालव नाम से प्रसिद्ध हुए। ये उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों तथा बिहार के गया जिले में पाए जाते हैं।
यदुवंशी क्षत्रिय - इनका गोत्र कौण्डिन्य तथा गुरु दुर्वासा हैं। मथुरा के यदुवंशी तथा करौली के राजा इसी वंश से सम्बन्धित माने जाते हैं। मैसूर राज्य भी यदुवंशियों का माना जाता है। इस वंश की 8 शाखाएँ हैं।
राजपाली (राजकुमार) क्षत्रिय - ये अग्निवंशी हैं। इनका गोत्र वत्स है। यह राजवंश वत्स गोत्रीय चौहानों की शाखा माना जाता है। राजौर से निकलकर ये लोग खीरी, शाहाबाद, पटना, दियरा, सुल्तानपुर, छपरा तथा मुजफ्फरपुर आदि स्थानों में बसे।
राठौर क्षत्रिय - इनका गोत्र राजपूताना में गौतम, पूर्वी क्षेत्रों में कश्यप तथा दक्षिण भारत में अत्रि माना जाता है। बिहार के राठौरों का गोत्र शाण्डिल्य है। इनके गुरु वशिष्ठ माने जाते हैं।
रायजादा क्षत्रिय - ये अग्निवंशी चौहानों की प्रशाखा में हैं। इनका गोत्र चौहानों के समान है। ये लोग अपनी कन्याएँ भदौरिया, कछवाहा और तोमर वंशों में देते हैं तथा श्रीनेत, बैस, विश्वेन, सोमवंशी आदि वंशों से वैवाहिक संबंध स्थापित करते हैं। ये उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में पाए जाते हैं।
रैकवार क्षत्रिय - इनका गोत्र भारद्वाज है। ये बौंडी (बहराइच), रहबा (रायबरेली), भल्लापुर (सीतापुर), रामनगर, धनेड़ी (रामपुर), मथुरा (बाराबंकी), गोरिया कला (उन्नाव) आदि स्थानों में पाए जाते हैं। बिहार प्रान्त के मुजफ्फरपुर जिले में चेंचर, हरपुर आदि गाँवों में तथा छपरा और दरभंगा में भी यत्र-तत्र पाए जाते हैं।
लोहतमिया क्षत्रिय - यह सूर्यवंश की एक शाखा है। इन्हें लव की सन्तान माना जाता है। ये बलिया, गाजीपुर तथा शाहाबाद जिलों में पाए जाते हैं।
श्रीनेत क्षत्रिय - ये सूर्यवंशी हैं। इनका गोत्र भारद्वाज है। इनकी गद्दी श्रीनगर (टिहरी गढ़वाल) में मानी जाती है। यह निकुम्भ वंश की एक प्रसिद्ध शाखा है। ये लोग उत्तर प्रदेश के गाजीपुर, बलिया, गोरखपुर तथा बस्ती जिले की बाँसी रियासत में पाए जाते हैं। बिहार प्रान्त के मुजफ्फरपुर, भागलपुर, दरभंगा और छपरा जिले के कुछ ग्रामों में भी इनकी उपस्थिति है।
सविया सौर (सिरमौर) क्षत्रिय - इनका गोत्र कश्यप है। ये लोग बिहार के गया जिले में अधिक संख्या में पाए जाते हैं।
सिकरवार क्षत्रिय - इनका गोत्र भारद्वाज है। ये ग्वालियर, आगरा, हरदोई, गोरखपुर, गाजीपुर और आजमगढ़ आदि स्थानों में पाए जाते हैं।
सिसोदिया क्षत्रिय - राहत जी के वंशजों के "सिसोदाग्राम" में निवास करने के कारण यह नाम प्रसिद्ध हुआ। यह ग्राम उदयपुर से लगभग 24 किलोमीटर उत्तर दिशा में स्थित है। सिसोदिया, गहलौत राजपूतों की एक शाखा हैं। इस वंश का राज्य उदयपुर की प्रसिद्ध रियासतों में रहा है। इस वंश की 24 शाखाएँ मानी जाती हैं।
सिसोदिया शब्द की व्याख्या "शीश + दिया" अर्थात् "शीश (सिर या मस्तक) का दान देना, त्याग करना अथवा न्योछावर कर देना" के रूप में भी की जाती है। इसी कारण ऐसे स्वाभिमानी क्षत्रिय वंशजों को सिसोदिया कहा गया। इनकी अधिकता के कारण इनके प्रारम्भिक राज्य को "शिशोदा" कहा गया तथा राजधानी कुम्भलगढ़ (केलवाड़ा) मानी गई।
सेंगर क्षत्रिय - इनका गोत्र गौतम तथा गुरु श्रृंगी ऋषि एवं विश्वामित्र माने जाते हैं। ये क्षत्रिय जालौन, हरदोई, अतरौली और इटावा में अधिक पाए जाते हैं। इन्हें ऋषिवंशी माना जाता है। सेंगरों के प्रमुख ठिकाने जालौन और इटावा में भरेह, जगम्मनपुर, सरु, फखावतू, कुर्सी तथा मल्हसौ हैं। मध्य प्रदेश के रीवा राज्य में भी इनकी बसावट रही है।
सोलंकी क्षत्रिय - ये क्षत्रिय अग्निवंशी हैं। इनका गोत्र भारद्वाज है। दक्षिण भारत में इन्हें चालुक्य कहा जाता है। इनके प्रमुख ठिकाने अन्हिलवाड़ा, बासंदा, लिमड़ी राज्य, रेवाकांठा, रीवा, सोहाबल तथा उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में हैं।
हेहय वंश क्षत्रिय - इनका गोत्र कृष्णात्रेय तथा गुरु दत्तात्रेय माने जाते हैं। ये बिहार, मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश में यत्र-तत्र पाए जाते हैं। ये क्षत्रिय चन्द्रवंशी माने जाते हैं।
विभिन्न लेखकों एवं विद्वानों के अनुसार क्षत्रिय राजवंश
कर्नल जेम्स टॉड के मतानुसार -
1- इक्ष्वाकु, 2- कछवाहा, 3- राठौर, 4- गहलौत, 5- काठी, 6- गोहिल, 7- गौड़, 8- चालुक्य, 9- चावड़ा, 10- चौहान, 11- जाट, 12- जेतवा, 13- जोहिया, 14- झाला, 15- तंवर, 16- डाबी, 17- दाहिमा, 18- दाहिया, 19- डोडा, 20- गहरवाल, 21- नागवंशी, 22- निकुम्भ, 23- परमार, 24- परिहार, 25- बड़गुजर, 26- बल्ल, 27- बैस, 28- मोहिल, 29- यदु, 30- राजपाली, 31- सरविया, 32- सिकरवार, 33- सिलार, 34- सेंगर, 35- सोमवंशी, 36- हूण।
डॉ. इन्द्रदेव नारायण सिंह रचित 'क्षत्रिय वंश भास्कर' के अनुसार -
1- सूर्यवंश, 2- चन्द्रवंश, 3- यदुवंश, 4- गहलौत, 5- तोमर, 6- परमार, 7- चौहान, 8- राठौर, 9- कछवाहा, 10- सोलंकी, 11- परिहार, 12- निकुम्भ, 13- हैहय, 14- चन्देल, 15- तक्षक, 16- निमिवंशी, 17- मौर्यवंशी, 18- गोरखा, 19- श्रीनेत, 20- द्रह्युवंशी, 21- भाटी, 22- जाड़ेजा, 23- बघेल, 24- चावड़ा, 25- गहरवार, 26- डोडा, 27- गौड़, 28- बैस, 29- बिसेन, 30- गौतम, 31- सेंगर, 32- दीक्षित, 33- झाला, 34- गोहिल, 35- काबा, 36- लोहथम्भ।
चन्द्रबरदाई के अनुसार राजवंश -
1- सूर्यवंश, 2- सोमवंशी, 3- राठौर, 4- अनंग, 5- अर्भाट, 6- ककुत्स्थ, 7- कवि, 8- कमाय, 9- कलिचूरक, 10- कोटपाल, 11- गोहिल, 12- गोहिलपुत्र, 13- गौड़, 14- चावोत्कर, 15- चालुक्य, 16- चौहान, 17- छिन्दक, 18- टांक, 19- दधिकर, 20- देवला, 21- दोयमत, 22- धन्यपालक, 23- निकुम्भ, 24- पड़िहार, 25- परमार, 26- पोतक, 27- मकवाना, 28- यदु, 29- राज्यपालक, 30- सदावर, 31- सिकरवार, 32- सिन्धु, 33- सिलारु, 34- हरितट, 35- हूण, 36- कारद्वपाल।
मतिराम कृत वंशावली -
1- सूर्यवंश, 2- पैलवार, 3- राठौर, 4- लोहथम्भ, 5- रघुवंशी, 6- कछवाहा, 7- सिरमौर, 8- गहलौत, 9- बघेल, 10- काबा, 11- श्रीनेत, 12- निकुम्भ, 13- कौशिक, 14- चन्देल, 15- यदुवंश, 16- भाटी, 17- तोमर, 18- बनाफर, 19- काकन, 20- वंशं, 21- गहरवार, 22- करमवार, 23- रैकवार, 24- चन्द्रवंश, 25- सिकरवार, 26- गौड़, 27- दीक्षित, 28- बड़बलिया, 29- बिसेन, 30- गौतम, 31- सेंगर, 32- हैहय, 33- चौहान, 34- परिहार, 35- परमार, 36- सोलंकी।
| क्रमांक | नाम | गोत्र | वंश | स्थान और जिला |
|---|---|---|---|---|
| 1. | सूर्यवंशी | भारद्वाज | सूर्य | बुलंदशहर आगरा मेरठ अलीगढ |
| 2. | गहलोत | बैजवापेण | सूर्य | मथुरा कानपुर और पूर्वी जिले |
| 3. | सिसोदिया | बैजवापेड | सूर्य | महाराणा उदयपुर स्टेट |
| 4. | कछवाहा | मानव | सूर्य | महाराजा जयपुर और ग्वालियर राज्य |
| 5. | राठोड | कश्यप | सूर्य | जोधपुर बीकानेर और पूर्व और मालवा |
| 6. | सोमवंशी | अत्रय | चन्द | प्रतापगढ़ और जिला हरदोई |
| 7. | यदुवंशी | अत्रय | चन्द | राजकरौली राजपूताने में |
| 8. | भाटी | अत्रय | जादौन | महारजा जैसलमेर राजपूताना |
| 9. | जाडेचा | अत्रय | यदुवंशी | महाराजा कच्छ भुज |
| 10. | जादवा | अत्रय | जादौन | शाखा अवा. कोटला उमरगढ आगरा |
| 11. | तोमर | व्याघ्र | चन्द | पाटन के राव तंवरघार जिला ग्वालियर |
| 12. | कटियार | व्याघ्र | तोंवर | धरमपुर का राज और हरदोई |
| 13. | पालीवार | व्याघ्र | तोंवर | गोरखपुर |
| 14. | परिहार | कौशल्य | अग्नि | इतिहास में जानना चाहिये |
| 15. | तखी | कौशल्य | परिहार | पंजाब कांगड़ा जालंधर जम्मू में |
| 16. | पंवार | वशिष्ठ | अग्नि | मालवा मेवाड धौलपुर पूर्व मे बलिया |
| 17. | सोलंकी | भारद्वाज | अग्नि | राजपूताना मालवा सोरों जिला एटा |
| 18. | चौहान | वत्स | अग्नि | राजपूताना पूर्व और सर्वत्र |
| 19. | हाडा | वत्स | चौहान | कोटा बूंदी और हाडौती देश |
| 20. | खींची | वत्स | चौहान | खींचीवाडा मालवा ग्वालियर |
| 21. | भदौरिया | वत्स | चौहान | नौगावां पारना आगरा इटावा ग्वालियर |
| 22. | देवडा | वत्स | चौहान | राजपूताना सिरोही राज |
| 23. | शम्भरी | वत्स | चौहान | नीमराणा रानी का रायपुर पंजाब |
| 24. | बच्छगोत्री | वत्स | चौहान | प्रतापगढ़ सुल्तानपुर |
| 25. | राजकुमार | वत्स | चौहान | दियरा कुडवार फ़तेहपुर जिला |
| 26. | पवैया | वत्स | चौहान | ग्वालियर |
| 27. | गौर,गौड | भारद्वाज | सूर्य | शिवगढ रायबरेली कानपुर लखनऊ |
| 28. | बैस | भारद्वाज | सूर्य | उन्नाव रायबरेली मैनपुरी पूर्व में |
| 29. | गहरवार | कश्यप | सूर्य | माडा हरदोई उन्नाव बांदा पूर्व |
| 30. | सेंगर | गौतम | ब्रह्मक्षत्रिय | जगम्बनपुर भरेह इटावा जालौन |
| 31. | कनपुरिया (कन्हपुरिया) | भारद्वाज | ब्रह्मक्षत्रिय | पूर्व में राजा अवध के जिलों में हैं |
| 32. | बिसैन | वत्स | ब्रह्मक्षत्रिय | गोरखपुर गोंडा प्रतापगढ में हैं |
| 33. | निकुम्भ | वशिष्ठ | सूर्य | गोरखपुर आजमगढ हरदोई जौनपुर |
| 34. | सिरसेत | भारद्वाज | सूर्य | गाजीपुर बस्ती गोरखपुर |
| 35. | कटहरिया | वशिष्ठ भारद्वाज, | सूर्य | बरेली बदायूं मुरादाबाद शाहजहांपुर |
| 36. | वाच्छिल | अत्रयवच्छिल | चन्द्र | मथुरा बुलन्दशहर शाहजहांपुर |
| 37. | बढगूजर | वशिष्ठ | सूर्य | अनूपशहर एटा अलीगढ मैनपुरी मुरादाबाद हिसार गुडगांव जयपुर |
| 38. | झाला | मरीच कश्यप | चन्द्र | धागधरा मेवाड झालावाड कोटा |
| 39. | गौतम | गौतम | ब्रह्मक्षत्रिय | राजा अर्गल फ़तेहपुर |
| 40. | रैकवार | भारद्वाज | सूर्य | बहरायच सीतापुर बाराबंकी |
| 41. | करचुल हैहय | कृष्णात्रेय | चन्द्र | बलिया फ़ैजाबाद अवध |
| 42. | चन्देल | चान्द्रायन | चन्द्रवंशी | गिद्धौर कानपुर फ़र्रुखाबाद बुन्देलखंड पंजाब गुजरात |
| 43. | जनवार | कौशल्य | सोलंकी शाखा | बलरामपुर अवध के जिलों में |
| 44. | बहरेलिया | भारद्वाज | वैस की गोद सिसोदिया | रायबरेली बाराबंकी |
| 45. | दीत्तत | कश्यप | सूर्यवंश की शाखा | उन्नाव बस्ती प्रतापगढ़ जौनपुर रायबरेली बांदा |
| 46. | सिलार | शौनिक | चन्द्र | सूरत राजपूतानी |
| 47. | सिकरवार | भारद्वाज | बढगूजर | ग्वालियर आगरा और उत्तरप्रदेश में |
| 48. | सुरवार | गर्ग | सूर्य | कठियावाड में |
| 49. | सुर्वैया | वशिष्ठ | यदुवंश | काठियावाड |
| 50. | मोरी | ब्रह्मगौतम | सूर्य | मथुरा आगरा धौलपुर |
| 51. | टांक (तत्तक) | शौनिक | नागवंश | मैनपुरी और पंजाब |
| 52. | गुप्त | गार्ग्य | चन्द्र | अब इस वंश का पता नही है |
| 53. | कौशिक | कौशिक | चन्द्र | बलिया आजमगढ गोरखपुर |
| 54. | भृगुवंशी | भार्गव | चन्द्र | बनारस बलिया आजमगढ़ गोरखपुर |
| 55. | गर्गवंशी | गर्ग | ब्रह्मक्षत्रिय | नृसिंहपुर सुल्तानपुर |
| 56. | पडियारिया, | देवल,सांकृतसाम | ब्रह्मक्षत्रिय | राजपूताना |
| 57. | ननवग | कौशल्य | चन्द्र | जौनपुर जिला |
| 58. | वनाफ़र | पाराशर,कश्यप | चन्द्र | बुन्देलखन्ड बांदा वनारस |
| 59. | जैसवार | कश्यप | यदुवंशी | मिर्जापुर एटा मैनपुरी |
| 60. | चौलवंश | भारद्वाज | सूर्य | दक्षिण मद्रास तमिलनाडु कर्नाटक में |
| 61. | निमवंशी | कश्यप | सूर्य | संयुक्त प्रांत |
| 62. | वैनवंशी | वैन्य | सोमवंशी | मिर्जापुर |
| 63. | दाहिमा | गार्गेय | ब्रह्मक्षत्रिय | काठियावाड राजपूताना |
| 64. | पुंडीर | कपिल | ब्रह्मक्षत्रिय | पंजाब गुजरात रींवा यू.पी. |
| 65. | तुलवा | आत्रेय | चन्द्र | राजाविजयनगर |
| 66. | कटोच | कश्यप | भूमिवंश | राजानादौन कोटकांगडा |
| 67. | चावडा,पंवार,चोहान,वर्तमान कुमावत | वशिष्ठ | पंवार की शाखा | मलवा रतलाम उज्जैन गुजरात मेवाड |
| 68. | अहवन | वशिष्ठ | चावडा,कुमावत | खीरी हरदोई सीतापुर बाराबंकी |
| 69. | डौडिया | वशिष्ठ | पंवार शाखा | बुलंद शहर मुरादाबाद बांदा मेवाड गल्वा पंजाब |
| 70. | गोहिल | बैजबापेण | गहलोत शाखा | काठियावाड |
| 71. | बुन्देला | कश्यप | गहरवार शाखा | बुन्देलखंड के रजवाडे |
| 72. | काठी | कश्यप | गहरवार शाखा | काठियावाड झांसी बांदा |
| 73. | जोहिया | पाराशर | चन्द्र | पंजाब देश मे |
| 74. | गढावंशी | कांवायन | चन्द्र | गढावाडी के लिंग पट्टम में |
| 75. | मौखरी | अत्रय | चन्द्र | प्राचीन राजवंश था |
| 76. | लिच्छिवी | कश्यप | सूर्य | प्राचीन राजवंश था |
| 77. | बाकाटक | विष्णुवर्धन | सूर्य | अब पता नहीं चलता है |
| 78. | पाल | कश्यप | सूर्य | यह वंश सम्पूर्ण भारत में बिखर गया है |
| 79. | सैन | अत्रय | ब्रह्मक्षत्रिय | यह वंश भी भारत में बिखर गया है |
| 80. | कदम्ब | मान्डग्य | ब्रह्मक्षत्रिय | दक्षिण महाराष्ट्र मे हैं |
| 81. | पोलच | भारद्वाज | ब्रह्मक्षत्रिय | दक्षिण में मराठा के पास में है |
| 82. | बाणवंश | कश्यप | असुर वंश | श्रीलंका और दक्षिण भारत में,कैन्या जावा में |
| 83. | काकुतीय | भारद्वाज | चन्द्र, प्राचीन सूर्य था | अब पता नहीं मिलता है |
| 84. | सुणग वंश | भारद्वाज | चन्द्र,प्राचीन सूर्य था, | अब पता नहीं मिलता है |
| 85. | दहिया | कश्यप | राठौड शाखा | मारवाड में जोधपुर |
| 86. | जेठवा | कश्यप | हनुमानवंशी | राजधूमली काठियावाड |
| 87. | मोहिल | वत्स | चौहान शाखा | महाराष्ट्र मे है |
| 88. | बल्ला | भारद्वाज | सूर्य | काठियावाड़ में मिलते हैं |
| 89. | डाबी | वशिष्ठ | यदुवंश | राजस्थान |
| 90. | खरवड | वशिष्ठ | यदुवंश | मेवाड उदयपुर |
| 91. | सुकेत | भारद्वाज | गौड की शाखा | पंजाब में पहाडी राजा |
| 92. | पांड्य | अत्रय | चन्द | अब इस वंश का पता नहीं |
| 93. | पठानिया | पाराशर | वनाफ़रशाखा | पठानकोट राजा पंजाब |
| 94. | बमटेला | शांडल्य | विसेन शाखा | हरदोई फ़र्रुखाबाद |
| 95. | बारहगैया | वत्स | चौहान | गाजीपुर |
| 96. | भैंसोलिया | वत्स | चौहान | भैंसोल गाग सुल्तानपुर |
| 97. | चन्दोसिया | भारद्वाज | वैस | सुल्तानपुर |
| 98. | चौपटखम्ब | कश्यप | ब्रह्मक्षत्रिय | जौनपुर |
| 99. | धाकरे | भारद्वाज(भृगु) | ब्रह्मक्षत्रिय | आगरा मथुरा मैनपुरी इटावा हरदोई बुलन्दशहर |
| 100. | धन्वस्त | यमदागिनी | ब्रह्मक्षत्रिय | जौनपुर आजमगढ़ बनारस |
| 101. | धेकाहा | कश्यप | पंवार की शाखा | भोजपुर शाहाबाद |
| 102. | दोबर(दोनवर) | वत्स या कश्यप | ब्रह्मक्षत्रिय | गाजीपुर बलिया आजमगढ़ गोरखपुर |
| 103. | हरद्वार | भार्गव | चन्द्र शाखा | आजमगढ |
| 104. | जायस | कश्यप | राठौड की शाखा | रायबरेली मथुरा |
| 105. | जरोलिया | व्याघ्रपद | चन्द्र | बुलन्दशहर |
| 106. | जसावत | मानव्य | कछवाह शाखा | मथुरा आगरा |
| 107. | जोतियाना(भुटियाना) | मानव्य | कश्यप,कछवाह शाखा | मुजफ़्फ़रनगर मेरठ |
| 108. | घोडेवाहा | मानव्य | कछवाह शाखा | लुधियाना होशियारपुर जालंधर |
| 109. | कछनिया | शांडिल्य | ब्रह्मक्षत्रिय | अवध के जिलों में |
| 110. | काकन | भृगु | ब्रह्मक्षत्रिय | गाजीपुर आजमगढ |
| 111. | कासिब | कश्यप | कछवाह शाखा | शाहजहांपुर |
| 112. | किनवार | कश्यप | सेंगर की शाखा | पूर्व बंगाल और बिहार में |
| 113. | बरहिया | गौतम | सेंगर की शाखा | पूर्व बंगाल और बिहार |
| 114. | लौतमिया | भारद्वाज | बढगूजर शाखा | बलिया गाजीपुर शाहाबाद |
| 115. | मौनस | मानव्य | कछवाह शाखा | मिर्जापुर प्रयाग जौनपुर |
| 116. | नगबक | मानव्य | कछवाह शाखा | जौनपुर आजमगढ़ मिर्जापुर |
| 117. | पलवार | व्याघ्र | सोमवंशी शाखा | आजमगढ़ फैजाबाद गोरखपुर |
| 118. | रायजादे | पाराशर | चन्द्र की शाखा | पूर्व अवध में |
| 119. | सिंहेल | कश्यप | सूर्य | आजमगढ़ परगना मोहम्दाबाद |
| 120. | तरकड | कश्यप | दीक्षित शाखा | आगरा मथुरा |
| 121. | तिसहिया | कौशल्य | परिहार | इलाहाबाद परगना हंडिया |
| 122. | तिरोता | कश्यप | तंवर की शाखा | आरा शाहाबाद भोजपुर |
| 123. | उदमतिया | वत्स | ब्रह्मक्षत्रिय | आजमगढ गोरखपुर |
| 124. | भाले | वशिष्ठ | पंवार | अलीगढ |
| 125. | भालेसुल्तान | भारद्वाज | वैस की शाखा | रायबरेली लखनऊ उन्नाव |
| 126. | जैवार | व्याघ्र | तंवर की शाखा | दतिया झांसी बुंदेलखंड |
| 127. | सरगैयां | व्याघ्र | सोम वंश | हमीरपुर बुन्देलखण्ड |
| 128. | किसनातिल | अत्रय | तोमर शाखा | दतिया बुन्देलखंड |
| 129. | टडैया | भारद्वाज | सोलंकी शाखा | झांसी ललितपुर बुंदेलखंड |
| 130. | खागर | अत्रय | यदुवंश शाखा | जालौन हमीरपुर झांसी |
| 131. | पिपरिया | भारद्वाज | गौडों की शाखा | बुंदेलखंड |
| 132. | सिरसवार | अत्रय | चन्द्र शाखा | बुन्देलखंड |
| 133. | खींचर | वत्स | चौहान शाखा | फतेहपुर में असौंथड राज्य |
| 134. | खाती | कश्यप | दीक्षित शाखा | बुंदेलखंड, राजस्थान में कम संख्या होने के कारण इन्हें बढई गिना जाने लगा |
| 135. | आहडिया | बैजवापेण | गहलोत | आजमगढ |
| 136. | उदावत | बैजवापेण | गहलोत | आजमगढ |
| 137. | उजैने | वशिष्ठ | पंवार | आरा डुमरिया |
| 138. | अमेठिया | भारद्वाज | गौड | अमेठी लखनऊ सीतापुर |
| 139. | दुर्गवंशी | कश्यप | दीक्षित | राजा जौनपुर राजाबाजार |
| 140. | बिलखरिया | कश्यप | दीक्षित | प्रतापगढ उमरी राजा |
| 141. | डोमरा | कश्यप | सूर्य | कश्मीर राज्य और बलिया |
| 142. | निर्वाण | वत्स | चौहान | राजपूताना (राजस्थान) |
| 143. | जाटू | व्याघ्र | तोमर | राजस्थान,हिसार पंजाब |
| 144. | नरौनी | मानव्य | कछवाहा | बलिया आरा |
| 145. | भनवग | भारद्वाज | कनपुरिया | जौनपुर व भदोही |
| 146. | देवरिया | वशिष्ठ | पंवार | बिहार मुंगेर भागलपुर |
| 147. | रक्षेल | कश्यप | सूर्य | रीवा राज्य में बघेलखंड |
| 148. | कटारिया | भारद्वाज | सोलंकी | झांसी मालवा बुंदेलखंड |
| 149. | रजवार | वत्स | चौहान | पूर्व में बुन्देलखंड |
| 150. | द्वार | व्याघ्र | तोमर | जालौन झांसी हमीरपुर |
| 151. | इन्दौरिया | व्याघ्र | तोमर | आगरा मथुरा बुलन्दशहर |
| 152. | छोकर | अत्रय | यदुवंश | अलीगढ़ मथुरा बुलन्दशहर |
| 153. | जांगडा | वत्स | चौहान | बुलंदशहर पूर्व में झांसी |
- क्षत्रियों का इतिहास गौरवशाली है और पूर्व में और भी विस्तृत रहा है। इस लेख का प्राप्त जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। अगर आपके हिसाब से कोई त्रुटि या सुधार संभव हो तो कमेंट के माध्यम से जरूर रखे त्रुटि को दूर किया जायेगा।
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