माँ स्कन्द माता की उपासना से उपासक की समस्त इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं।
Symbolized by a lotus with 16 petals, this Chakra is also known as the throat Chakra that symbolizes creativity and communications.
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देवि त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्यविधायिनि।
कलौ हि कार्यसिद्ध्यर्थमुपायं ब्रूहि यत्नतः॥
भावार्थ :
हे देवी! आप भक्तों के लिए सहज सुलभ तथा समस्त कार्यों को सिद्ध करने वाली हैं। कलियुग में मनुष्यों की कामनाओं एवं कार्यों की सिद्धि के लिए जो श्रेष्ठ उपाय हो, उसे कृपापूर्वक बताइए।
शृणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्टसाधनम्।
मया तवैव स्नेहेनाम्बास्तुतिः प्रकाश्यते॥
भावार्थ :
हे देव! सुनिए, मैं कलियुग में समस्त अभिलषित फलों को प्रदान करने वाले साधन का वर्णन करती हूँ। आपके प्रति स्नेहवश मैं इस अम्बास्तुति को प्रकट कर रही हूँ।
ॐ अस्य श्रीदुर्गासप्तश्लोकीस्तोत्रमन्त्रस्य नारायण ऋषिः,
अनुष्टुप् छन्दः,
श्रीमहाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वत्यो देवताः,
श्रीदुर्गाप्रीत्यर्थं सप्तश्लोकीदुर्गापाठे विनियोगः।
भावार्थ :
इस श्रीदुर्गा सप्तश्लोकी स्तोत्र के ऋषि नारायण हैं, छन्द अनुष्टुप् है तथा महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती इसकी देवता हैं। श्री दुर्गा की प्रसन्नता के लिए इसका पाठ किया जाता है।
ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति॥
भावार्थ :
वह भगवती महामाया देवी ज्ञानियों के चित्त को भी बलपूर्वक आकर्षित करके मोह में डाल देती हैं।
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता॥
भावार्थ :
हे दुर्गे! आपका स्मरण करने पर समस्त प्राणियों का भय दूर हो जाता है और शांतचित्त होकर स्मरण करने पर आप शुभ बुद्धि प्रदान करती हैं। दारिद्र्य, दुःख और भय का नाश करने वाली देवी! आपके अतिरिक्त ऐसा कौन है जिसका हृदय सदैव दूसरों के उपकार के लिए करुणा से भरा रहता हो?
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
भावार्थ :
हे नारायणी! आप समस्त मंगलों में श्रेष्ठ मंगलमयी, कल्याणस्वरूपा, सभी पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरणागतों की रक्षिका, त्रिनेत्रधारिणी तथा गौरी हैं। आपको नमस्कार है।
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
भावार्थ :
हे नारायणी देवी! आप शरणागत, दीन और पीड़ित जनों की रक्षा में सदैव तत्पर रहती हैं तथा सभी की पीड़ाओं का हरण करती हैं। आपको नमस्कार है।
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥
भावार्थ :
हे दुर्गे! आप समस्त रूपों में विराजमान, समस्त जगत की अधीश्वरी और सभी शक्तियों से सम्पन्न हैं। हमें सभी प्रकार के भय से रक्षा प्रदान करें। आपको नमस्कार है।
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा
रुष्टा तु कामान्सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां
त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥
भावार्थ :
हे देवी! प्रसन्न होने पर आप सभी रोगों का नाश कर देती हैं और अप्रसन्न होने पर मनुष्यों की समस्त अभिलाषाओं को नष्ट कर देती हैं। जो आपकी शरण में आते हैं, वे कभी संकटग्रस्त नहीं होते तथा वे स्वयं भी दूसरों को आश्रय देने योग्य बन जाते हैं।
सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥
भावार्थ :
हे त्रैलोक्य की अधीश्वरी! जिस प्रकार आप तीनों लोकों की समस्त बाधाओं का निवारण करती हैं, उसी प्रकार हमारे शत्रुओं और विघ्नों का भी नाश करें।
फलश्रुति :
दुर्गा सप्तश्लोकी का श्रद्धापूर्वक नित्य पाठ करने से भय, रोग, दुःख, बाधा तथा संकट दूर होते हैं और देवी की कृपा से सुख, शांति, समृद्धि एवं आत्मबल की प्राप्ति होती है।
दुर्गा सप्तश्लोकी मार्कण्डेय पुराण के दुर्गा सप्तशती (चण्डी पाठ) से ग्रहण किए गए सात अत्यंत प्रभावशाली श्लोकों का संग्रह है। मान्यता है कि कलियुग में जब लोगों के पास सम्पूर्ण दुर्गा सप्तशती का पाठ करने का समय या सामर्थ्य न हो, तब केवल इन सात श्लोकों का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से भी देवी दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
शाक्त परंपरा में एक प्रसिद्ध मान्यता है कि यदि किसी व्यक्ति के पास सम्पूर्ण दुर्गा सप्तशती पढ़ने का समय न हो, तो वह श्रद्धापूर्वक दुर्गा सप्तश्लोकी का नित्य पाठ करे। इसे देवी की कृपा प्राप्त करने का अत्यंत सरल और प्रभावी साधन माना गया है।
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| ऐसे थे अपने पंडित दीन दयाल उपाध्याय |
