भारत के क्षत्रिय वंशों को उनकी उत्पत्ति के आधार पर चार प्रमुख वंशों में विभाजित किया गया है। ये निम्नलिखित हैं—
सूर्यवंश
चंद्रवंश
नागवंश
अग्निवंश
सूर्यवंशी क्षत्रिय
प्राचीन पुस्तकों के अवलोकन से ऐसा ज्ञात होता है कि भारत में आर्य दो समूहों में आए। प्रथम लम्बे सिर वाले और द्वितीय चौड़े सिर वाले। प्रथम समूह उत्तर-पश्चिम (ऋग्वेद के अनुसार) खैबर दर्रे से आया, जो पंजाब, राजस्थान और अयोध्या में सरयू नदी तक फैल गया। इन्हें सूर्यवंशी क्षत्रिय कहा गया है।
प्रथम समूह के प्रसिद्ध राजा भरत हुए। भरत की संतानों और उनके परिवार को सूर्यवंशी क्षत्रिय का नाम दिया गया। यह 11वें स्कन्ध पुराण, अध्याय 1 के श्लोक 15, 16 और 17 में वर्णित है।
रोमिला थापर ने पौराणिक साक्ष्यों के आधार पर लिखा है कि महाप्रलय के समय केवल मनु जीवित बचे थे। भगवान विष्णु ने इस बाढ़ के संबंध में पहले ही चेतावनी दे दी थी, इसलिए मनु ने अपने परिवार और सप्तऋषियों को बचाकर ले जाने के लिए एक नाव बना ली थी। भगवान विष्णु ने एक बड़ी मछली का रूप धारण किया, जिससे वह नौका बाँध दी गई। मछली जल-प्रवाह में तैरती हुई नौका को एक पर्वत-शिखर तक ले गई। यहाँ मनु, उनका परिवार और सप्तऋषि प्रलय की समाप्ति तक रहे तथा पानी कम होने पर सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर उतर आए।
ऋग्वेद में मनु का उल्लेख है। पुराणों में 14 मनुओं का वर्णन है, जिनमें स्वयंभुव मनु संसार के सर्वप्रथम मनु माने गए हैं। विवस्वान सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु सातवें मनु थे। इनके पहले के छह मनु स्वयंभुव वंश के थे।
वैवस्वत मनु से त्रेता युग प्रारम्भ हुआ। श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णित है कि महाप्रलय के समय केवल परम पुरुष ही बचे, उनसे ब्रह्माजी उत्पन्न हुए। ब्रह्मा से मरीचि, मरीचि की पत्नी अदिति से विवस्वान (सूर्य) का जन्म हुआ तथा विवस्वान की पत्नी संज्ञा से मनु पैदा हुए।
वास्तव में वैवस्वत मनु भारत के प्रथम राजा थे, जो सूर्य से उत्पन्न हुए और जिन्होंने अयोध्या नगरी बसाई। सबसे पहले मनु, जिन्हें स्वयंभू कहते हैं, हुए। इनके पुत्र प्रियव्रत और उनके पुत्र का नाम अग्नीध्र था। अग्नीध्र के पौत्र का नाम नाभि था और नाभि के पुत्र का नाम ऋषभ था। ऋषभ के 100 पुत्र हुए, जिसका वर्णन वेदों में मिलता है। इनमें से सबसे बड़ा पुत्र भरत था, जिसके नाम पर भारतवर्ष का नाम पड़ा और यह सूर्यवंशी क्षत्रिय थे। इसका वर्णन स्कन्ध पुराण, स्कन्ध 5, अध्याय 7 में मिलता है।
भरत का परिवार तेजी से बढ़ा और उन्हें भारत-जन कहा जाने लगा, जिसका वर्णन ऋग्वेद में मिलता है। इस परिवार में भगवान मैत्रावरुण और अप्सरा उर्वशी के गर्भ से वशिष्ठ का जन्म हुआ, जो आगे चलकर भरत के पुरोहित हुए। वशिष्ठ ने इन्हें बलशाली और वीरत्व प्रदान किया।
इसी बीच विश्वामित्र, जो जन्म से क्षत्रिय थे, अपनी कठिन तपस्या से ऋषि का स्थान प्राप्त कर क्षत्रियों के गुरु बन गए। इससे वशिष्ठ व विश्वामित्र दोनों एक-दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी बन गए। इस प्रकार वशिष्ठ एवं विश्वामित्र दोनों ने पुरोहित का पद प्राप्त किया और इस वंश को सूर्यवंशी कहा जाने लगा।
आर्यों की वर्ण-व्यवस्था के पश्चात् ऋषियों ने मिलकर सूर्य नामक आर्य क्षत्रिय की पत्नी सरण्यू से उत्पन्न मनु को पहला राजा बनाया। वायु नामक ऋषि ने मनु का राज्याभिषेक किया। मनु ने अयोध्या नगरी का निर्माण किया और उसे अपनी राजधानी बनाया। मनु से उत्पन्न पुत्र सूर्यवंशी कहलाए। उस युग में सूर्यवंशियों के अयोध्या, विदेह, वैशाली आदि राज्य थे।
मनु के 9 पुत्र तथा एक पुत्री इला थी। मनु ने अपने राज्य को 10 भागों में बाँटकर सबको दे दिया। अयोध्या का राज्य उनके बाद उनके बड़े पुत्र इक्ष्वाकु को मिला। उनके वंशज इक्ष्वाकु वंशीय क्षत्रिय कहलाए।
राजा मनु का दूसरा पुत्र नाभानेदिष्ट था, जिसे बिहार का राज्य मिला और आजकल इस इलाके को तिरहुत कहते हैं।
उनके तीसरे पुत्र विशाल हुए, जिन्होंने वैशाली नगरी बसाकर अपनी राजधानी बनाई।
मनु के चौथे पुत्र करूष थे, जिनके वंशज करूष कहलाए। उनका राज्य बघेलखंड था। उस युग में यह प्रदेश करूष कहलाने लगा।
मनु के पाँचवें पुत्र शर्याति को गुजरात का राज्य मिला और उनका छठा पुत्र आनर्त था, जिससे वह प्रदेश आनर्त कहलाया। आनर्त देश की राजधानी कुशस्थली, वर्तमान द्वारका, थी। आनर्त के रोचवान, रेव और रैवत तीन पुत्र थे। रैवत के नाम पर वर्तमान गिरनार का रैवत पर्वत प्रसिद्ध हुआ।
मनु के सातवें पुत्र का राज्य यमुना के पश्चिमी तट पर था तथा आठवें पुत्र धृष्ट का राज्य पंजाब में था, जिसके वंशज धृष्ट क्षत्रिय कहलाए।
इक्ष्वाकु के कई पुत्र थे, परन्तु मुख्य दो थे। राजा की ज्येष्ठ संतान विकुक्षि था, जिसे शशाद भी कहा जाता था। वह पिता के बाद अयोध्या का राजा बना। शशाद के पुत्र का नाम काकुत्स्थ था, जिसके वंशज काकुत्स्थी कहलाए।
इक्ष्वाकु का दूसरा पुत्र निमि था। उसका राज्य अयोध्या और विदेह के बीच स्थापित हुआ। इस वंश के एक राजा मिथि हुए, जिन्होंने मिथिला नगरी बसाई। इसी वंश में राजा जनक हुए। इस राज्य और अयोध्या राज्य के बीच की सीमा सदानीरा (राप्ती) नदी थी।
इस वंश की आगे चलकर अनेक शाखाएँ और उपशाखाएँ हुईं तथा वे सभी सूर्यवंशी कहलाए। इस वंश के महत्वपूर्ण नरेशों के नाम पर अनेक वंशों के नाम पड़े, जैसे— इक्ष्वाकु के वंशज इक्ष्वाकु वंशीय तथा काकुत्स्थ के वंशज काकुत्स्थ वंशीय कहलाए। रघु के वंशज रघुवंशी कहलाए। अयोध्या के महाराजा काकुत्स्थ का पौत्र पृथु हुआ। इसने सबसे पहले भूमि को नपवाकर उसकी हदबन्दी करवाई। उसके समय में कृषि की बड़ी उन्नति हुई थी। उसी वंश में चक्रवर्ती सम्राट मान्धाता, सगर, भगीरथ, दिलीप, रघु, दशरथ और राम हुए।
सूर्यवंशी राजाओं की नामावली
क्षत्रियों की गणना करते हुए सर्वप्रथम सूर्यवंश का नाम लिया जाता है। इसकी उत्पत्ति महापुरुष विवस्वान् (सूर्य) से मानी जाती है। ब्रह्मा के पुत्र मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। कश्यप की रानी अदिति से "सूर्य" की उत्पत्ति हुई, जिन्हें विवस्वान् भी कहा जाता है। विवस्वान् के पुत्र "मनु" हुए। मनु के नौ पुत्र एवं एक पुत्री इला थी, जिनमें सबसे बड़े इक्ष्वाकु थे। इसलिए सूर्यवंश को इक्ष्वाकु वंश भी कहा जाता है। मनु ने ही अयोध्या को बसाया था। भिन्न-भिन्न पुराणों में दी गई सूर्यवंशी राजाओं की वंशावली इस प्रकार है:-
1. मनु 2. इक्ष्वाकु 3. विकुक्षि 4. परंजय 5. अनेना 6. पृथु 7. वृषदश्व 8. अन्ध्र 9. युवनाश्व 10. श्रावस्त 11. वृहदश्व 12. कुवलायाश्व 13. दृढ़ाश्व 14. प्रमोद 15. हर्यश्व 16. निकुम्भ 17. संहताश्व 18. कुशाश्व 19. प्रसेनजित 20. युवनाश्व (द्वितीय) 21. मान्धाता 22. पुरुकुत्स 23. त्रसदस्यु 24. सम्भूत 25. अनरण्य 26. त्रसदश्व 27. हर्यश्व 28. वसुमान् 29. त्रिधन्वा 30. त्रय्यारुणि 31. सत्यव्रत 32. हरिश्चन्द्र 33. रोहिताश्व 34. हरित 35. चंचु 36. विजय 37. रूरुक 38. वृक 39. बाहु 40. सगर 41. असमंजस 42. अंशुमान 43. दिलीप 44. भागीरथ 45. श्रुत 46. नाभाग 47. अम्बरीष 48. सिन्धुद्वीप 49. अयुतायु 50. ऋतुपर्ण 51. सर्वकाम 52. सुदास 53. सौदास 54. अश्मक 55. मूलक 56. दशरथ 57. ऐडविड 58. विश्वसह 59. दिलीप (खटवांग) 60. रघु 61. अज 62. दशरथ 63. रामचन्द्र 64. कुश 65. अतिथि 66. निषध 67. नल 68. नभ 69. पुण्डरीक 70. क्षेमधन्वा 71. देवानीक 72. पारियात्र 73. दल 74. बल 75. उक्त 76. वज्रनाभ 77. शंखण 78. व्युषिताश्व 79. विश्वसह 80. हिरण्यनाभ 81. पुष्य 82. ध्रुवसन्धि 83. सुदर्शन 84. अग्निवर्ण 85. शीघ्र 86. मरु 87. प्रसुश्रुत 88. सुसन्धि 89. अमर्ष 90. सहस्वान् 91. विश्वभानु 92. वृहद्बल 93. वृहद्रथ 94. उरुक्षय 95. वत्सव्यूह 96. प्रतिव्योम 97. दिवाकर 98. सहदेव 99. वृहदश्व 100. भानुरथ 101. प्रतीताश्व 102. सुप्रतीक 103. मरुदेव 104. सुनक्षत्र 105. किन्नर 106. अन्तरिक्ष 107. सुपर्ण 108. अमित्रजित् 109. बृहद्राज 110. धर्मी 111. कृतंजय 112. रणंजय 113. संजय 114. शाक्य 115. शुद्धोधन 116. सिद्धार्थ 117. राहुल 118. प्रसेनजित 119. क्षुद्रक 120. कुण्डक 121. सुरथ 122. सुमित्र।
उपरोक्त नाम सूर्यवंशी मुख्य-मुख्य राजाओं के हैं, क्योंकि मनु से राम के पुत्र कुश तक केवल चौंसठ राजाओं के नाम मिलते हैं, जबकि यह अवधि लगभग कई करोड़ वर्षों की मानी जाती है। अतः पुराणों में सभी राजाओं के नाम आना असंभव भी है।
सूर्यवंश से निकली शाखाएँ
सूर्यवंशी
निमि वंश
निकुम्भ वंश
नाग वंश
गोहिल वंश
गहलोत वंश
राठौड़ वंश
गौतम वंश
मौर्य वंश
परमार वंश
चावड़ा वंश
डोड वंश
कुशवाहा वंश
परिहार वंश
बड़गूजर वंश
सिकरवार वंश
गौड़ वंश
चौहान वंश
बैस वंश
दाहिमा वंश
दाहिया वंश
दीक्षित वंश
चन्द्रवंशी क्षत्रिय
द्वितीय आर्यों का समूह चन्द्रवंशी क्षत्रियों के नाम से जाना जाता है। ऋग्वेद के अनुसार यह समूह चन्द्रवंशी क्षत्रियों के नाम से जाना जाता था और हिमालय को गिलगिट के रास्ते से पार कर मानसरोवर झील के पास से होते हुए भारत आया। इनका सिर सूर्यवंशियों के मुकाबले चौड़ा होता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार चन्द्रवंश के प्रथम राजा का नाम ययाति था। यह आयु के पुत्र और पुरूरवा के पौत्र थे। इन्हें चन्द्रवंशी कहा जाता है तथा इनके पाँच पुत्र थे। यह गिलगिट होते हुए सरस्वती नदी के क्षेत्र में आए और सरहिन्द होते हुए दक्षिण-पूर्व में बस गए। यह क्षेत्र सूर्यवंशियों के अधिकार में नहीं था।
प्रारंभिक युग में चन्द्र क्षत्रिय का पुत्र बुध था, जो सोम भी कहलाता था। बुध का विवाह मनु की पुत्री इला से हुआ। उनसे उत्पन्न पुत्र का नाम पुरूरवा था। इसकी राजधानी प्रयाग के पास प्रतिष्ठानपुर थी। पुरूरवा के वंशज चन्द्रवंशी क्षत्रिय कहलाए।
पुरूरवा के दो पुत्र आयु और अमावसु थे। आयु ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते राज्य का स्वामी बना तथा अमावसु को कान्यकुब्ज (कन्नौज) का राज्य मिला।
आयु के नहुष नामक पुत्र हुआ। नहुष के दो पुत्र हुए— ययाति और क्षत्रबुद्ध। ययाति इस वंश में सर्वप्रथम चक्रवर्ती सम्राट बना और उसके भाई क्षत्रबुद्ध को काशी प्रदेश का राज्य मिला। उसकी छठी पीढ़ी में काश नामक राजा हुआ, जिसने काशी नगरी बसाई थी तथा काशी को अपनी राजधानी बनाया।
सम्राट ययाति के यदु, द्रुह्य, तुर्वसु, अनु और पुरु पाँच पुत्र हुए। सम्राट ययाति ने अपने सबसे छोटे पुत्र पुरु को प्रतिष्ठानपुर का राज्य दिया, जिसके वंशज पौरव कहलाए। यदु को पश्चिमी क्षेत्र केन, बेतवा और चम्बल नदियों के कछारों का राज्य मिला। तुर्वसु को प्रतिष्ठानपुर का दक्षिण-पूर्वी प्रदेश मिला, जहाँ पर तुर्वसु ने विजय प्राप्त कर अधिकार जमा लिया। वहाँ पहले सूर्यवंशियों का राज्य था।
द्रुह्य को चम्बल के उत्तर और यमुना के पश्चिम का प्रदेश मिला तथा अनु को गंगा-यमुना के पूर्व के दोआब का उत्तरी भाग, अर्थात अयोध्या राज्य के पश्चिम का प्रदेश मिला। ये यादव आगे चलकर बड़े प्रसिद्ध हुए। इनसे निकली हैहयवंशी शाखा काफी बलशाली सिद्ध हुई। हैहयवंशजों ने आगे बढ़कर दक्षिण में अपना राज्य कायम कर लिया था। यादव वंश में अंधक और वृष्णि बड़े प्रसिद्ध राजा हुए हैं।
जिनसे यादवों की दो शाखाएँ निकलीं। प्रथम शाखा अंधक वंश में आगे चलकर उग्रसेन और कंस हुए, जिनका मथुरा पर शासन था। दूसरी शाखा वृष्णि वंश में कृष्ण हुए, जिन्होंने कंस को मारकर उसके पिता उग्रसेन को मथुरा का राजा बनाया। आगे चलकर वृष्णि वंश सौराष्ट्र प्रदेश स्थित द्वारका में चला गया।
द्रुह्य वंश में गांधार नामक राजा हुआ। उसने वर्तमान रावलपिंडी के उत्तर-पश्चिम में जो राज्य कायम किया, वही गांधार देश कहलाया। अनु के वंशज आनव कहलाते हैं।
इस वंश में उशीनर नामक राजा बड़ा प्रसिद्ध हुआ है। उसके वंशज समूचे पंजाब में फैले हुए थे। उशीनर का पुत्र शिवि अपने पिता से अधिक प्रतापी शासक हुआ और चक्रवर्ती सम्राट कहलाया। दक्षिण-पश्चिमी पंजाब में शिवि के नाम पर एक शिविपुर नगर था, जिसे आजकल शोरकोट कहा जाता है। चन्द्रवंशियों में यौधेय नाम के बड़े प्रसिद्ध क्षत्रिय हुए थे।
कन्नौज के चन्द्रवंशी राजा गाधी का पुत्र विश्वरथ था, जिसने राजपाट छोड़कर तपस्या की थी। वही प्रसिद्ध ऋषि विश्वामित्र हुए। इन्हीं ऋषि विश्वामित्र ने गायत्री मंत्र की रचना की थी।
यादवों की हैहय शाखा में कार्तवीर्य अर्जुन बड़ा शक्तिशाली शासक था, जो बाद में चक्रवर्ती सम्राट बन गया था, परन्तु अन्त में परशुराम और अयोध्या के शासक से युद्ध में परास्त होकर मारा गया।
पौरव वंश का एक बार पतन हो गया था। इस वंश में पैदा हुए दुष्यन्त ने बड़ी भारी शक्ति अर्जित कर अपने वंश को गौरवान्वित किया। दुष्यन्त और शकुन्तला का पुत्र भरत चक्रवर्ती सम्राट बना। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि उसके नाम पर यह देश भारत कहलाया। उसके वंशज हस्ती ने ही हस्तिनापुर बसाया और उसे अपनी राजधानी बनाया।
इसी वंश के शासकों ने पांचाल राज्य की स्थापना की, जो बाद में दो भागों में बँट गया— एक उत्तरी पांचाल और दूसरा दक्षिणी पांचाल। उत्तरी पांचाल की राजधानी का नाम अहिच्छत्रपुर था, जो वर्तमान में बरेली जिले में रामनगर नामक स्थान माना जाता है। दक्षिणी पांचाल में कान्यकुब्ज का राज्य विलीन हो गया था, जिसकी राजधानी काम्पिल्य थी।
पौरव वंश में ही आगे चलकर भीष्म पितामह, धृतराष्ट्र, पाण्डु, युधिष्ठिर, परीक्षित और अन्य राजा हुए।
चन्द्रवंश से निकली शाखाएँ
सोमवंशी
यादव
भाटी
जाडेजा
तोमर
हैहय
करचुलिसया
कौशिक
सेंगर
चंदेल
गहरवार
बेरूआर
सिरमौर
सिरमौरिया
जनवार
झाला
पलवार
गंगावंशी
बिलादरिया
पौरववंशी
खाती क्षत्रिय
इन्दौरिया
बुन्देला
कान्हवंशी
रकसेल
कुरुवंशी
कटोच
तिलोता
बनाफर
भारद्वाज
सरनिहा
द्रुह्यवंशी
हरद्वार
चौपटखम्भ
क्रमवार
मौखरी
भृगुवंशी
टाक
आर्यों में एक क्षत्रिय राजा शेषनाग था। उसका जो वंश चला, वह नागवंश कहलाया। प्रारम्भ में इनका राज्य कश्मीर में था। वाल्मीकि रामायण में शेषनाग और वासुकी नामक नाग राजाओं का वर्णन मिलता है। महाभारत काल में ये दिल्ली के पास खाण्डववन में रहते थे, जिन्हें अर्जुन ने परास्त किया था। इनके इतिहास का वर्णन राजतरंगिणी में मिलता है।
विदिशा से लेकर मथुरा के अंचल तक का मध्य प्रदेश नागवंशियों की शक्ति का केंद्र था। उन्होंने विदेशियों से जमकर लोहा लिया। ये लोग शिवोपासक थे, जो शिवलिंगों को कंधों और पगड़ियों में धारण किया करते थे। कुषाण साम्राज्य के अंतिम शासक वासुदेव के काल में भारशिवों (नागों) ने काशी में गंगा तट पर दस अश्वमेध यज्ञ किए, जो दशाश्वमेध घाट के रूप में स्मृति-स्वरूप आज भी विद्यमान हैं।
पुराणों में भारशिवों का नवनागों के नाम से वर्णन है। धर्म विषयक आचार-विचार को समाज में स्थापित करने का श्रेय गुप्तों को न जाकर भारशिवों को जाता है, क्योंकि इसकी शुरुआत उनके शासनकाल में ही हो चुकी थी।
इतिहास के विद्वानों का मत है कि पंजाब पर राज्य करने वाले नाग 'तक' अथवा 'तक्षक' शाखा के नाग थे। डॉ. जायसवाल मानते हैं कि पद्मावती वाले नाग भी तक्षक अथवा टाक शाखा के थे। इन नागों की एक शाखा कच्छप, मध्य प्रदेश में थी। ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तर-पश्चिमी भारत के गणतांत्रिक राज्यों का इन नागों को सहयोग रहा होगा। इस पारस्परिक सार्वभौमिकता को इन्होंने स्वीकार किया।
राजस्थान स्थित नागों के राज्यों को परमारों ने समाप्त कर दिया था।
इनका गोत्र काश्यप, प्रवर तीन—काश्यप, वत्सास और नैधुव; वेद सामवेद, शाखा कौथुमी, निशान हरे झण्डे पर नाग-चिह्न तथा शस्त्र तलवार है।
भारत के राजकुलों में चार कुल—चौहान, सोलंकी, परमार तथा प्रतिहार—थे, जो अपने को अग्निवंशी मानते हैं। आधुनिक भारतीय व विदेशी विद्वान इस धारणा को मिथ्या मानते हैं। किन्तु इनमें से दो-तीन विद्वानों को छोड़कर लगभग सभी अग्निकुल की धारणा को अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार भी करते हैं। इसलिए यहाँ अग्निकुल की उत्पत्ति के प्रश्न पर विचार करना आवश्यक है।
इन कुलों की मान्यता है कि अग्निकुण्ड से इन कुलों के आदि पुरुष मुनि वशिष्ठ द्वारा आबू पर्वत पर उत्पन्न किए गए थे। डॉ. दशरथ शर्मा लिखते हैं कि असुरों का संहार करने के लिए वशिष्ठ ने चालुक्य, चौहान, परमार और प्रतिहार चार क्षत्रिय कुल उत्पन्न किए।
सोलंकियों के बारे में पूर्व सोलंकी राजा राजराज प्रथम के समय में वि. 1079 (ई. 1022) के एक ताम्रपत्र के अनुसार भगवान पुरुषोत्तम की नाभि-कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जिनसे क्रमशः सोम, बुध व अन्य वंशजों में विचित्रवीर्य, पाण्डु, अर्जुन, अभिमन्यु, परीक्षित, जन्मेजय आदि हुए। इसी वंश के राजाओं ने अयोध्या पर राज किया था। विजयादित्य ने दक्षिण में जाकर राज्य स्थापित किया। इसी वंश में राजराज हुआ था।
सोलंकियों के शिलालेखों तथा कश्मीरी पंडित विल्हण द्वारा वि. 1142 में रचित 'विक्रमांकदेव चरित्र' में चालुक्यों की उत्पत्ति ब्रह्मा के चुल्लू से उत्पन्न वीर क्षत्रिय से होना लिखा गया है, जो चालुक्य कहलाया। पश्चिमी सोलंकी राजा विक्रमादित्य षष्ठ के समय के शिलालेख वि. 1133 (ई. 1076) में लिखा गया है कि चालुक्य वंश भगवान ब्रह्मा के पुत्र अत्रि के नेत्र से उत्पन्न होने वाले चन्द्रवंश के अंतर्गत आते हैं।
अग्निकुल के दूसरे कुल चौहानों के विषय में वि. 1225 (ई. 1168) के पृथ्वीराज द्वितीय के समय के शिलालेख में चौहानों को चन्द्रवंशी लिखा है। 'पृथ्वीराज विजय' काव्य में चौहानों को सूर्यवंशी लिखा है तथा बीसलदेव चतुर्थ के समय के अजमेर के लेख में भी चौहानों को सूर्यवंशी लिखा गया है।
आबू पर्वत पर स्थित अचलेश्वर महादेव के मन्दिर में वि. 1377 (ई. 1320) के देवड़ा लुंभा के समय के लेख में चौहानों के बारे में लिखा है कि सूर्य और चन्द्रवंश के अस्त हो जाने पर जब संसार में दानवों का उत्पात शुरू हुआ, तब वत्स ऋषि के ध्यान और चन्द्रमा के योग से एक पुरुष उत्पन्न हुआ।
ग्वालियर के तंवर शासक वीरम के कृपापात्र नयनचन्द्र सूरी ने 'हम्मीर महाकाव्य' की रचना वि. 1460 (ई. 1403) के लगभग की, जिसमें उसने लिखा है कि पुष्कर क्षेत्र में यज्ञ प्रारम्भ करते समय राक्षसों द्वारा होने वाले विघ्नों की आशंका से ब्रह्मा ने सूर्य का ध्यान किया। इस पर यज्ञ की रक्षा के लिए सूर्य मण्डल से उतरकर एक वीर आ पहुँचा। जब उपरोक्त यज्ञ निर्विघ्न समाप्त हो गया, तब ब्रह्मा की कृपा से वह वीर चाहुमान कहलाया।
अग्निकुल के तीसरे वंश प्रतिहारों के लेखों में मण्डोर के शासक बाउक प्रतिहार के वि. 894 (ई. 837) के लेख में लक्ष्मण को राम का प्रतिहार लिखा है तथा प्रतिहार वंश का उससे संबंध दिखाया गया है। इसी प्रकार प्रतिहार कक्कूक के वि. 918 (ई. 861) के घटियाला लेख में भी लक्ष्मण से ही संबंध दिखाया गया है। कन्नौज के प्रतिहार सम्राट भोज की ग्वालियर प्रशस्ति में प्रतिहार वंश को लक्ष्मण के वंश में लिखा गया है। चौहान विग्रहराज के हर्ष के वि. 1030 (ई. 973) के शिलालेख में भी कन्नौज के प्रतिहार सम्राट को रघुवंश मुकुटमणि कहा गया है। इस प्रकार इन तमाम शिलालेखों तथा बालभारत से प्रतिहारों का सूर्यवंशी होना माना जाता है।
परमारों के वशिष्ठ द्वारा अग्निकुण्ड से उत्पन्न होने की कथा परमारों के प्राचीनतम शिलालेखों और काव्यों में विद्यमान है। डॉ. दशरथ शर्मा लिखते हैं कि हम किसी अन्य राजपूत जाति को अग्निवंशी मानें या न मानें, परमारों को अग्निवंशी मानने में हमें विशेष दुविधा नहीं हो सकती। इनका सबसे प्राचीन वर्णन मालवा के परमार शासक सिन्धुराज (वि. 1052-1067) के दरबारी कवि पद्मगुप्त ने किया है, जिसमें परमारों को अग्निवंशी तथा आबू पर्वत पर वशिष्ठ के कुण्ड से उत्पन्न बताया गया है। इसी प्रकार परमारों के आसनतगढ़, उदयपुर, नागपुर, अथूणा, हाथल, देलवाड़ा, पाटनारायण, अचलेश्वर आदि के अनेक लेखों में उनकी उत्पत्ति के बारे में इसी प्रकार का वर्णन है। परमार अपने को चन्द्रवंशी मानते हैं।
इस प्रकार इन तमाम साक्ष्यों द्वारा किसी-न-किसी रूप में इन वंशों को विशेष शक्तियों द्वारा उत्पन्न करने की मान्यता की पुष्टि 10वीं सदी तक के लिखित प्रमाणों से होती है। विद्वानों के अनुसार अग्निवंशी होने की मान्यता 16वीं सदी से प्रारम्भ होती है तथा इसे प्रारम्भ करने वाला ग्रन्थ 'पृथ्वीराज रासो' है।
दूसरी ओर भण्डारकर, वाट्सन, फारबस, कैम्पबेल, जैक्सन, स्मिथ आदि विद्वानों ने अग्निवंशियों को गुर्जरों और हूणों के साथ बाहर से आया हुआ माना है। दूसरा विचार इनकी उत्पत्ति से जुड़ा हुआ है, जिसमें यह माना गया है कि किसी कारणवश इन वंशों का शुद्धिकरण किया गया था और अग्निवंशियों द्वारा अग्नि से शुद्ध होने की मान्यता को स्वीकार किया गया।
भारत में बौद्ध धर्म के प्रचार से बहुत से लोगों ने बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया। शनैः-शनैः सारा ही क्षत्रिय वर्ग वैदिक धर्म को छोड़कर बौद्ध धर्म को अंगीकार करता चला गया। भारत में चारों तरफ बौद्ध धर्म का प्रचार हो गया। क्षत्रियों के बौद्ध धर्म में चले जाने के कारण उनकी वैदिक क्रियाएँ और परम्पराएँ समाप्त हो गईं। जिससे इनके साम्राज्य छोटे और कमजोर हो गए तथा इनका वीरत्व जाता रहा।
तब क्षत्रियों को पुनः वैदिक धर्म में लाने की प्रक्रिया शुरू हुई। क्षत्रिय कुलों को बौद्ध धर्म से वापस वैदिक धर्म में दीक्षित किया गया और आबू पर्वत पर यज्ञ करके बौद्ध धर्म से वैदिक धर्म में उनका समावेश किया गया तथा उन्हें अग्निकुल का स्वरूप दिया गया।
अबुल फ़ज़ल के समय तक प्राचीन ग्रन्थों और मान्यताओं से यह विदित था कि ये चारों वंश बौद्ध धर्म से वापस वैदिक धर्म में आए थे, जिसका वर्णन अबुल फ़ज़ल ने 'आइने अकबरी' में किया है। कुमारिल भट्ट ने विक्रमी संवत् 756 (ई. 700) में बड़ी संख्या में लोगों को बौद्ध धर्म से वापस वैदिक धर्म में लाने का कार्य प्रारम्भ किया, जिसे आदि शंकराचार्य ने आगे चलकर पूर्ण किया।
आबू पर्वत पर यज्ञ करके चार क्षत्रिय कुलों को वापस वैदिक धर्म में दीक्षा देने का यह एक ऐतिहासिक कार्यक्रम था, जो लगभग छठी या सातवीं सदी में हुआ। यह कोई कपोल-कल्पना या मिथ्या बात नहीं थी, अपितु वैदिक धर्म को पुनः सशक्त करने का प्रथम कदम था, जिसकी स्मृति के रूप में बाद में ये वंश अपने को अग्निवंशी कहने लगे।
क्षत्रिय और वैश्यों के बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद वैदिक संस्कार लुप्त हो गए थे। यहाँ तक कि वे शनैः-शनैः अपने गोत्र तक भी भूल चुके थे। जब वे वापस वैदिक धर्म में आए, तब क्षत्रियों तथा वैश्यों द्वारा नए सिरे से पुरोहित बनाए गए। उन्हीं पुरोहितों के गोत्र उनके यजमानों के भी गोत्र मान लिए गए। इसलिए समय-समय पर नए स्थानों पर जाने तथा पुरोहित बदलने के साथ अनेक बार गोत्र भी बदलते चले गए। वैद्य और ओझा की भी यही मान्यता है।
अग्निवंश से निकली शाखाएँ
परमार
सोलंकी
परिहार
चौहान
हाड़ा
सोनगिरा
भदौरिया
बछगोती
खीची
उज्जैनीय
बघेल
गन्धवरिया
डोड
वरगया
गाई
दोगाई
मड़वार
चावड़ा
गजकेसर
बड़केसर
मालवा
रायजादा
स्वर्णमान
बागड़ी
अहबन
तालिया
ढेकहा
कलहंस
भरसुरिया
भुवाल
भुतहा
राजपूत माती
क्षत्रियों के 36 राजवंश (Royal Martial Clan of Kshatriyas)
सभी लेखकों की यह मान्यता है कि क्षत्रियों के शाही कुलों (राजवंशों) की संख्या 36 है। परन्तु कुछ इतिहासकारों ने इनकी संख्या कम और कुछ ने अधिक लिखी है। कुछ इतिहासकारों ने शाही कुलों की शाखाओं को भी शाही कुल मान लिया, जिससे इनकी संख्या बढ़ गई। प्रथम सूची चंदबरदाई ने 'पृथ्वीराज रासो' में 12वीं शताब्दी में वर्णित की है।
क्षत्रियों की 36 रॉयल मार्शल क्लैन ऑफ क्षत्रिय (क्षत्रियों के 36 शाही कुल)
इन 36 शाही कुलों (Royal Martial Clan) में 10 सूर्यवंशी, 10 चंद्रवंशी, 4 अग्निवंशी तथा 12 अन्य वंश माने गए हैं। सभी लेखकों, जैसे—कर्नल जेम्स टॉड, श्री गौरीशंकर ओझा, श्री जगदीश सिंह परिहार, रोमिला थापर, स्वामी दयानन्द सरस्वती, सत्यार्थ प्रकाश, राजवी अमर सिंह, बीकानेर, शैलेन्द्र प्रताप सिंह (बैसवाड़े का वैभव), प्रो. लाल अमरेन्द्र (बैसवाड़ा : एक ऐतिहासिक अनुशीलन, भाग-1), राव दंगल सिंह (बैस क्षत्रियों का उद्भव एवं विकास), ठाकुर ईश्वर सिंह मढ़ाड़ (राजपूत वंशावली), ठाकुर देवी सिंह मंडावा आदि ने यह माना है कि क्षत्रियों के शाही कुल 36 हैं, लेकिन किसी ने सूची में इनकी संख्या बढ़ा दी है और किसी ने कम कर दी है।
पहली सूची चंदबरदाई द्वारा पृथ्वीराज रासो में दी गई है। इसके बाद उन्होंने पृथ्वीराज रासो के छन्द 32 में कुछ क्षत्रिय कुलों का वर्णन छन्द के रूप में किया है।
पृथ्वीराज रासो में चंदबरदाई ने कुछ कुलों को एक छन्द (दोहा) के रूप में लिखा है, जो द्वितीय सूची के रूप में प्रकाशित हुई।
तृतीय सूची में 36 क्षत्रिय कुलों को कर्नल टॉड ने नाडोल (मारवाड़) के जैन मंदिर के पुजारी से प्राप्त कर प्रकाशित किया।
चतुर्थ सूची में हेमचन्द्र जैन ने कुमारपाल चरित्र में 36 क्षत्रियों की सूची प्रकाशित की।
पंचम सूची मोगंजी खींचियों के भाट द्वारा प्रकाशित की गई।
षष्ठ सूची में नैणसी ने 36 शाही कुलों तथा उनकी राजधानियों का वर्णन किया है।
सप्तम सूची पद्मनाभ द्वारा प्रकाशित की गई।
अष्टम सूची हम्मीरयाण में प्रकाशित हुई।
इसमें 30 कुलों का वर्णन है। इस प्रकार कुल क्षत्रियों की 8 सूचियाँ प्रकाशित हुईं और लगभग सभी ने गणना में 36 शाही कुल माने हैं। प्रारम्भिक 36 कुलों की सूची में मौर्यवंशी तथा नागवंश का स्थान न मिलना यही सिद्ध करता है कि ये प्रारम्भ में वैदिक धर्म में नहीं आए तथा बौद्ध बने रहे।
इतिहासकारों जैसे राजवी अमर सिंह (बीकानेर), प्रो. अमरेन्द्र सिंह, जगदीश सिंह परिहार, राव दंगल सिंह, शैलेन्द्र प्रताप सिंह, ठाकुर ईश्वर सिंह, ठाकुर देवी सिंह मंडावा आदि ने भी 36 कुलों का वर्णन किया है।
प्रसिद्ध इतिहासकार श्री चिंतामणि विनायक वैद्य ने पृथ्वीराज रासो में वर्णित पद्य को अपनी पुस्तक Medieval Hindu India में 36 शाखाओं का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि रवि, राशि और यादव वंश पुराणों में वर्णित वंश हैं तथा उनकी 36 शाखाएँ हैं। एक ही शाखा वाले का उसी शाखा में विवाह नहीं हो सकता।
इसे नीचे से ऊपर की ओर पढ़ने पर निम्न शाखाएँ प्राप्त होती हैं—
कालछरक्के (कलचुरी) — यह हैहय वंश की शाखा है।
कविनीश
राजपाल
निकुम्भवर
धान्यपाल
मट्ट
कैमाश (कैलाश)
गोड़
हरीतट्ट
हुल — कर्नल टॉड ने इसी शाखा को हूण लिख दिया है, जिससे इसे हूणों की भाँति माना जाने लगा। जबकि हुल, गहलोत वंश की खांप है।
कोटपाल
कारट्टपाल
दधिपट — कर्नल टॉड ने इसे डिडियोट लिखा है।
प्रतिहार
योतिका — टॉड साहब ने इसे पाटका लिखा है।
अनिग — टॉड साहब ने इसे अनंग लिखा है।
सैन्धव
टांक
देवड़ा
रोसजुत
राठौड़
परिहार
चापोत्कट (चावड़ा)
गुहिलौत
गोहिल
गरूआ
मकवाना
दोयमत
अमीयर
सिलार
छदंक
चालुक्य
चहुवान
सदावर
परमार
ककुत्स्थ
श्री मोहनलाल पांड्या ने इस सूची का विश्लेषण करते हुए ककुत्स्थ को कछवाहा, सदावर को तंवर, छदंक को चंद या चंदेल तथा दोयमत को दाहिमा लिखा है। इसी सूची में वर्णित रोसजुत, अनंग, योतिका, दधिपट, कारट्टपाल, कोटपाल, हरीतट्ट, कैमाश, धान्यपाल, राजपाल आदि वंश आजकल नहीं मिलते। जबकि आज के प्रसिद्ध वंश—बैस, भाटी, झाला, सेंगर आदि—का इस सूची में उल्लेख नहीं हुआ है।
मतिराम के अनुसार छत्तीस कुलों की सूची इस प्रकार है—
सूर्यवंश
पेलवार
राठौड़
लोहथम्भ
रघुवंशी
कछवाहा
सिरमौर
गहलोत
बघेल
काबा
श्रीनेत
निकुम्भ
कौशिक
चन्देल
यदुवंश
भाटी
तोमर
बनाफर
काकन
रहिहो वंश
गहरवार
करमवार
रैकवार
चंद्रवंशी
शकरवार
गौर
दीक्षित
बड़वालिया
विश्वेन
गौतम
सेंगर
उदयवालिया
चौहान
पड़िहार
सोलंकी
परमार
इन्होंने भी कुछ प्रसिद्ध वंशों को छोड़कर कुछ नए वंश लिख दिए हैं। इन्होंने भी प्रसिद्ध बैस वंश का उल्लेख नहीं किया है।
कर्नल टॉड के पास छत्तीस कुलों की पाँच सूचियाँ थीं, जो उन्होंने इस प्रकार प्राप्त की थीं—
मारवाड़ के नाडोल नगर के एक जैन मंदिर के यति से।
चंदबरदाई कृत पृथ्वीराज रासो से।
कुमारपाल चरित्र से, जो जिन मण्डनोपाध्याय कृत माना जाता है।
खींचियों के भाट से।
भाटियों के भाट से।
इन सभी सूचियों की सामग्री को मिलाकर उन्होंने यह सूची प्रकाशित की—
गहलोत
यादु (यादव)
तुआर
राठौर
कुशवाहा
परमार
चाहुवान (चौहान)
चालुक (सोलंकी)
प्रतिहार (परिहार)
चावड़ा
टाक (तक्षक)
जाट
हूण
कट्टी
बल्ला
झाला
जैटवा
गोहिल
सर्वया
सिलार
डाबी
गौर
डोर (डोडा)
गहरवाल
चन्देला
वीरगूजर
सेंगर
सिकरवाल
बैस
दहिया
जोहिया
मोहिल
निकुम्भ
राजपाली
दाहरिया
दाहिमा
किसी कवि ने राजपूतों के वंशों का विवरण निम्न दोहे में किया है—
दस रवि स दस चंद्र से, द्वादस ऋषि प्रमाण।
चारी हुताशन यज्ञ से, यह छत्तीस कुल जान।।
इस प्रकार इस दोहे में छह वंशों और छत्तीस कुलों की चर्चा की गई है।
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