महर्षि श्री अरविंद के अनमोल वचन



  • सारा जगत स्वतंत्रता के लिए लालायित रहता है फिर भी प्रत्येक जीव अपने बंधनो को प्यार करता है। यही हमारी प्रकृति की पहली दुरूह ग्रंथि और विरोधाभास है। - श्री अरविंद
  • भातृभाव का अस्तित्व केवल आत्मा में और आत्मा के द्वारा ही होता है, यह और किसी के सहारे टिक ही नहीं सकता। - श्री अरविंद
  • कर्म, ज्ञान और भक्ति- ये तीनों जहाँ मिलते हैं वहीं सर्वश्रेष्ठ पुरुषार्थ जन्म लेता है। - श्री अरविंद
  • अध्यापक राष्ट्र की संस्कृति के चतुर माली होते हैं। वे संस्कारों की जड़ों में खाद देते हैं और अपने श्रम से उन्हें सींच-सींच कर महाप्राण शक्तियाँ बनाते हैं। - महर्षि अरविंद
  • यदि आप चाहते हैं कि लोग आपके साथ सच्‍चा व्‍यवहार करें तो आप खुद सच्‍चे बनें और अन्‍य लोगों से भी सच्‍चा व्‍यवहार करें। - महर्षि अरविन्‍द 
सत्‍य वह चट्टान है जिसके ऊपर विश्‍वनिर्मित है। सत्‍येन तिष्‍ठेन जगत्। मिथ्‍यत्‍व कभी भी शक्ति का वास्‍तविक स्‍तोत नही बन सकता। जब आंदोलन के मूल में मिथ्‍यात्‍वता है, तो उनका असफल होना निश्चित है। कूटनीति तभी किसी की सहायता कर सकती है जब वह आंदोलन पर चले। कूटनीति को मूल सिद्धान्‍त बनाना अस्तित्‍व के नियमों का उल्‍लंघन करना होगा।
(श्री अरविन्‍द के लेख, वार्तालाप और भाषण संकलन भारत पुनर्जन्‍म, पृष्‍ठ 37 से उद्धृत)


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1 comment:

Tara Chandra Gupta said...

acche vachn jivan me dharan karne yagy hi.