द्विवेदी जी के कानून के दोहरे मापदण्‍ड



हिन्‍दी चिट्ठाकारी का कोई विशेष पैमाना नही रहा है, हर पैमानेका समय के हिसाब से अपने स्‍वयं के पैमाने तय कर लेता है। श्री दिनेश राय द्विवेदी जी की दो अगल अलग टिप्‍पणी मुझे पढ़ने को मिली थी, दोनो टिप्‍पणी को एक साथ पढ़ने पर आश्‍चर्य होना स्‍वाभविक ही है।मै पहली टिप्‍पणी के रूप में कुछ माह पहले की गई एक टिप्‍पणी का जिक्र करना चाहूँगा, जिस पर श्री द्विवेदी जी ब्‍लागवाणी अरोप लगाते हुये कहते है कि - ब्लागवाणी पक्षपात भी करे तो क्या? निजि है। निश्चित रूप से यह प्रश्‍न वाजिब है क्‍या किसी को पक्षपात करने का पूरा अधिकार है ?

श्री द्विवेदी ब्‍लागवाणी पर पक्षपात का अरोप लगाना समझ से परे है क्‍योकि ब्‍लागवाणी किसके साथ पक्षपात कर रही है ? ब्‍लागवाणी एक ऐसा मंच है जो अपने नीतियो के हिसाब से किसी ब्लाग को अपने एग्रीगेटर पर शामिल करता है, यदि वह किसी को शामिल नही करता है तो उस पर पक्षपात का अरोप लगाना गलत ही है। क्‍योकि ब्‍लावाणी ने स्‍पष्‍ट रूप से कहा है कि हम अपनी मर्जी के मालिक है।

आज श्री द्विवेदी जी यह कहा रहे है किन्‍तु आज से करीब 18-20 महीने पहले श्री द्विवेदी जी की एक टिप्‍पणी मुझे चिट्ठकार के सम्‍बन्‍ध में पढ़ने को मिली थी - देबू भाई के बारे में जानने का अवसर मिला। धन्यवाद्।मैं उन के इस विचार से सहमत हूँ, यह कानून भी यही कहता है कि दूसरे कि संपत्ति पर आप यदि कुछ कर रहे हैं तो उस की सहमति से कर रहे हैं। आप एक लायसेंसी हैं। अब आप वहाँ कोई भी ऐसा काम करते हैं जो संपत्ति के स्वामी द्वारा स्वीकृत नहीं है तो संपत्ति के स्वामी को आप को वहाँ से बेदखल करने का पूरा अधिकार है। आप उसे कोसते रहें तो कोसते रहें। आखिर संपत्ति के स्वामी ने अपने वैध अधिकार का उपयोग किया है कोई बेजा हरकत नहीं की है।

श्री द्विवेदी जी विद्वान अधिवक्‍ता है उनकी बात को कटाना हमारे बस में नही है किन्‍तु उपरोक्‍त उनकी यह दूसरी टिप्‍पणी ब्‍लागवाणी का स्‍वयं सर्मथन कर रही है, वह अपने निर्णय लेने को स्‍वतंत्र है। किन्‍तु यह मै एक बात कहना चाहूँगा कि ब्‍लागवाणी मंच अपनी कोई बात रखने के लिये सदस्‍यता नही देता है, किन्‍तु जिस चिट्ठकार के सम्‍बन्‍ध में उन्‍होने कहा था वह अपनी बात को रखने के लिये सदस्‍यता देता है और किसी सदस्‍य को मंच से हटाये जाने के पर सदस्‍य को पूरा अधिकार है कि वह इस बात की जानकारी प्राप्‍त करे कि उसे किस बात के लिये हटाया गया ? जब मैने उक्‍त बात जाननी चा‍ही थी तो श्री द्विवेदी जी बिना पूरी बात जाने अथवा जानकर भी बड़े ब्‍लागर के महिमा मंडन के मोह से छूट न सके और मुझे कानून की घुट्टी पिला गये।

श्री द्विवेदी जी के न्‍याय के पैमाने के मै समझ पाने की कोशिश कर रहा हूँ तो पाता हूँ कानून अंधा ही नही बहरा भी होता है। आज ब्‍लागवाणी का पक्षपात उन्‍हे समझ में आ रहा है किन्‍तु तब का पक्षपात उन्‍हे क्‍यो नही दिखा जब मैने उस बात को जानने का प्रयास किया कि मुझे चिट्ठाकार से निकालाने की बात पूछी थी ? तब तो श्री द्विवेदी जी ने किसी कि सम्पत्ति कहते हुये उसे चिट्ठकार के मालिक के अनैतिक कृत्‍य को मनमानी का पूरा मालिकाना अधिकार दे गये थे। न्‍याय का मतालब यही है कि बतालकारी के अरोपी को पता नही है कि आखिर बलात्‍कार हुआ किसका है ? न्‍याय की यह प्रक्रिया सिर्फ चिट्ठकारो की चौपट नगरी में ही सम्‍भव है, जहॉं समय के अनुसार कानून बदल जाता है। ब्‍लागवाणी पर ऊँगली उठाने से पहले यह सोचना चाहिये कि सर्वप्रथम यह कि ब्‍लागवाणी कोई सार्वजनिक चर्चा मंच नही है और न ही वह किसी को सदस्‍यता देता है, उसके सदस्‍यता देना सिर्फ पाठक के लिये है न कि किसी ब्‍लागर के लिये। हो सकता है कि तब और आज के टिप्‍पणी में अंतर इसलिये हो क्‍योकि तब वे चिट्ठाकारी के खेला के नये खिलाड़ी थे और आज वे इस खेला के माहिर खिलाडियो में शामिल हो चुके है और इसलिये नियम, कानून और पक्षपत की परिभाषा बदल चुकी है।

श्री द्विवेदी जी की दोनो टिप्‍पणी प्रस्‍तुत है - चिट्ठकार के सम्‍बन्‍ध में


ब्‍लागवाणी के सम्‍बन्‍ध में

यहाँ ब्‍लागों के लिंक देना उचित नही समझता क्‍योकि इससे अन्‍य सम्‍बन्धित लिंको को भी देना पड़ेगा।

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11 comments:

Ratan Singh Shekhawat said...

ब्लागवाणी पक्षपात भी करे तो क्या? निजि है।

इस बात तो में तो कतई नहीं लगता कि दिनेश जी ने ब्लॉग वाणी पर कोई पक्षपात का आरोप लगाया हो |
अभी हाल ही में ब्लॉग वाणी पर लगे आरोपों वाली पोस्ट पर भी टिप्पणियाँ पढ़ लीजिए , किसी में भी दिनेश जी ने ब्लॉग वाणी पर आरोप का समर्थन नहीं किया |
आप पता नहीं क्यों दिनेश जी के बारे में एसा लिख रहे है | अच्छा है लिखिए कुछ टिप्पणियाँ और कुछ हिट्स मिल जायेंगे |

Udan Tashtari said...

अनुभव को मान्यता नहीं दोगे क्या?

अजय कुमार झा said...

ये मुद्दों की कंगाली का दौर है,
अब यूं पत्थर न उछालें तो क्या करें..

प्रमेन्द्र जी टिप्पणियों पर कोई बहस उठाने के लिये जरूरी होता है कि आप पूरी टिप्पणी सामने रखें....सिर्फ़ कुछ शब्द या कुछ पंक्तियां सामने रखने से भ्रम हो जाता है..

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

चौपट नगरी का संविधान बताने के लिये धन्यवाद।

Chandan said...

Mr. Pramendar Ji

I 100% agree With U.

arun arora said...

dvivedi ji kabhi galat nahio hote mujhe bhi unhone keval apane dost vakilo dvara mere ghr aur office ke pate par kota se samman bhej diye jane ke khataaro se agah kiya tha . ye alag bat hai ki mere ghra aur ofice ke pate unhe mere yaha pravas ke samy mil gaye the. samjhe janab aap . vakeelo ke hath dusaro ke bematal tang karane ke liye vakai lambe hote hai ji . :)

बवाल said...

नहीं नहीं भाई, ऐसा नहीं है। अब तो सब सामान्य है किसी को किसी से शिकायत भी नहीं है। सब एक हो चुके हैं फिर .....क्या अब इस बात का पटाक्षेप नहीं हो जाना चाहिए जी ?

राज भाटिय़ा said...

ब्लागवाणी पक्षपात भी करे तो क्या? निजि है।
मुझे तो इस टिपण्णी मे कोई अलग बात या पक्षपात की बात नही दिखी, अब चोडीये इन सब बातो को दिनेश जी अच्छा लिखते है, ओर हम से बडे भी है, हम सब को उन की इज्जत करनी चाहिये.

अर्शिया said...

पता नहीं ये चर्चा कहां तक जाएगी।
Think Scientific Act Scientific

Roma said...

Bade bhaiya, mujhe post pasand Aaee maine Pasand ko klik kiya to javab ayaa ki aap pahale hee vote de chuke hain. Maine to pahale vote nahin diya.

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said...

भैया व् कील साब को ही तो अनुभव है