मनुस्मृति वर्णित विवाह



वि’ उपसर्गपूर्वक ‘वह्’ प्रापणे धातु से घ प्रत्यय के योग से विवाह शब्द निष्पन्न होता है। विवाह अर्थात् विशिष्ट ढंग से कन्या को ले जाना। विवाह-सम्बन्धी शब्द परिणय या परिणयन (अग्नि की प्रदक्षिणा करना) एवं पाणिग्रहण कन्या का हाथ पकड़ना) विवाह सम्बन्धी शब्द है यद्यपि ये शब्द विवाह संस्कार का केवल एक-एक तत्व बताते हैं। संस्कार शब्द पहले स्पष्ट किया जा चुका है विवाह संस्कार अर्थात् वर व वधू के शरीर व आत्मा को सुविचारों से अलंकृत कर इस योग्य बनाना कि वो गृहस्थाश्रम का निर्वहण कर सकें। आज विवाह संस्कार एक संस्कार न होकर परम्परा का निर्वहण मात्र रह गया है। इस संस्कार की मर्यादा आज छिन्न-भिन्न हो गयी है परिणामतः गृहस्थ जीवन में स्वर्ग जैसा सुख अब दिखाई नहीं पड़ता।  गृह्यसूत्रों, धर्मसूत्रों एवं स्मृतियों के काल से ही विवाह आठ प्रकार के कहे गये हैं- 
ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथाऽसुरः।
गान्धर्वोराक्षश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः।। मनुस्मृति 3/21
अर्थात् ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गन्धर्व, राक्षस, पैशाच ये विवाह आठ प्रकार के होते हैं। 
महर्षि मनु द्वारा वर्णित विवाह पद्दतियां इस प्रकार हैं-
चतुर्णामपि वर्णानां प्रेत्य चेह हिताहितान |
अश्ताविमान्स मासेन सत्रीविवाहान्निबोधत ||
चारों वर्णों के लिए हित तथा अहित करने वाले इन आठ प्रकार के स्त्रियों से होने वाले विवाहों को संक्षेप से जानो, सुनो


ब्राह्म अथवा स्वयंवर विवाह 
आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुतिशीलवते स्वयं
आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्म: प्रकीर्तित:
कन्या के योग्य सुशील, विद्वान पुरुष का सत्कार करके कन्या को वस्त्रादि से अलंकृत करके उत्तम पुरुष को बुला अर्थात जिसको कन्या ने प्रसन्न भी किया हो उसको कन्या देना - वह 'ब्राह्म' विवाह कहलाता है

दैव विवाह
यज्ञे तु  वितते सम्यगृत्विजे कर्म कुर्वते 
अलं कृत्य सुतादानं दैवं धर्मं प्रचक्षते
विस्तृत यज्ञ में बड़े बड़े विद्वानों का वरण कर उसमे कर्म करने वाले विद्वान् को वस्त्र आभूषण आदि से कन्या को सुशोभित करके देना 'दैव विवाह' कहा जाता है
विशेष टिपण्णी - ऋत्विक  शब्द का अर्थ प्रसंग के अनुकूल किया जाता है और यहाँ प्रसंग के अनुसार विवाह के लिए आए सभी विद्वानों से है न कि  केवल ब्राह्मणों के लिए

आर्ष विवाह
एकं गोमिथुनं द्वे वा वरादादाय धर्मत:
कन्या प्रदानं विधिवदार्षो धर्म: स उच्यते
जो वर से धर्मानुसार एक गाय बैल का जोड़ा अथवा दो जोड़े लेकर विधि अनुसार कन्या का दान करना है वह आर्ष विवाह कहा जाता है

प्राजापत्य विवाह 
सहोभौ चरतां धर्ममिति वाचानुभाष्य च
कन्याप्रदानमभ्यचर्य प्राजापत्यो विधि: स्मृत:
कन्या और वर को, यज्ञशाला में विधि करके सब के सामने 'तुम दोनों मिलके गृहाश्रम के कर्मों को यथावत करो', ऐसा कहकर दोनों की प्रसन्नता पूर्वक पाणिग्रहण होना - वह प्राजापत्य विवाह कहाता है

आसुर विवाह 
ज्ञातिभ्यो द्रविणं दत्त्वा कन्यायै चैव शक्तितः।
कन्याप्रदानं स्वाच्छन्द्यासुरो धर्म उच्यते ।।
वर की जाति वालों और कन्या को यथाशक्ति धन दे कर अपनी इच्छा से अर्थात वर अथवा कन्या की प्रसन्नता और इच्छा की उपेक्षा कर ,के होम आदि विधि कर कन्या देना 'आसुर विवाह' कहलाता है ।

गान्धर्व विवाह 
इच्छयाअन्योन्यसन्योग: कन्यायाश्च यरस्य च। 
गान्धर्व: स तू विज्ञेयी मैथुन्य: कामसंभव: ।।
वर और कन्या की इच्छा से दोनों का संयोग होना और अपने मन में यह मान लेना कि हम दोनों स्त्री पुरुष हैं, ऐसा काम से उत्पन्न विवाह 'गान्धर्व विवाह कहलाता है।

राक्षस विवाह 
हत्वा छित्त्वा च भित्त्वा च क्रोशन्तीं रुदतीं गृहात। 
प्रसह्य कन्याहरणं राक्षसो विधिरुच्यते।।
हनन छेदन अर्थात कन्या के रोकने वालों का विदारण कर के, रोती, कांपती और भयभीत कन्या का घर से बलात अपहरण करके विवाह करना राक्षस विवाह कहा जाता है।

पिशाच विवाह 
सुप्तां मत्तां प्रमत्तां वा रहो यत्रोपगच्छति ।
स पापिष्ठो विवाहानां पैशाचश्चाष्टमोअधम: ।।
जो सोती, पागल हुई अथवा नशे में उन्मत्त हुई कन्या को एकांत पाकर दूषित कर देना है, यह सब विवाहों में नीच से नीच विवाह 'पिशाच विवाह' कहा जाता है।

प्रथम चार विवाह उत्तम हैं
ब्राह्मादिषु विवाहेषु च्तुष् र्वेवानुपूर्वशः।
ब्रह्मवर्चस्विनः पुत्रा जायन्ते शिष्टसंमता ॥
ब्रह्म, दैव, आर्ष तथा प्राजापत्य ; इन चार विवाहों में पाणिग्रहण किए हुए स्त्री पुरुषों से जो सन्तान उत्पन्न होती है वह वेदादि विद्या से तेजस्वी, आप्त पुरुषों के संगति से अत्युत्त्म होती है।

रूपसत्तवोवुणोपेता धनवन्तो यशस्विनः।
पर्याप्तभोगा धर्मिष्ठा जीवन्ति च शतं समाः॥
वे सन्तानें सुन्दर रूप, बल - पराक्रम, शुद्ध बुद्धि आदि उत्तम गुणों से युक्त, बहुधन युक्त, कीर्तिमान और पूर्ण भोग के भोक्ता धर्मात्मा हो कर सौ वर्ष तक जीते हैं।

अन्य चार विवाह अधम अथवा निंदनीय हैं
इतरेषु तु शिष्टेषु नृशंसानृतवादिनः।
जायन्ते दुर्विवाहेषु ब्रह्मधर्मद्विषः सुताः॥
उपरोक्त चार विवाहों से इतर जो अन्य चार - आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच विवाह हैं, इन चार दुष्ट विवाहों से उत्पन्न हुए सन्तान निन्दित कर्मकर्ता, मिथ्यावादी, वेद धर्म के द्वेषी अत्यन्त नीच स्वभाववाले होते हैं ।



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