Benefits of Deep Breathing




1. Breathing Detoxifies and Releases Toxins
Your body is designed to release 70% of its toxins through breathing. If you are not breathing effectively, you are not properly ridding your body of its toxins i.e. other systems in your body must work overtime which could eventually lead to illness. When you exhale air from your body you release carbon dioxide that has been passed through from your bloodstream into your lungs. Carbon dioxide is a natural waste of your body's metabolism.

2. Breaw your body feels when you are tense, angry, scared or stressed. 
It constricts. Your muscles get tight and your breathing becomes shallow. When your breathing Releases Tension Think hothing is shallow you are not getting the amount of oxygen that your body needs.

3. Breathing Relaxes the Mind/Body and Brings Clarity
Oxygenation of the brain reducing excessive anxiety levels. Paying attention to your breathing. Breathe slowly, deeply and purposefully into your body. Notice any places that are tight and breathe into them. As you relax your body, you may find that the breathing brings clarity and insights to you as well.

4. Breathing Relieves Emotional Problems
Breathing will help clear uneasy feelings out of your body.

5. Breathing Relieves Pain.
You may not realize its connection to how you think, feel and experience life. For example, what happens to your breathing when you anticipate pain? You probably hold your breath. Yet studies show that breathing into your pain helps to ease it.

6. Breathing Massages Your Organs
The movements of the diaphragm during the deep breathing exercise massages the stomach, small intestine, liver and pancreas. The upper movement of the diaphragm also massages the heart. When you inhale air your diaphragm descends and your abdomen will expand. By this action you massage vital organs and improves circulation in them. Controlled breathing also strengthens and tones your abdominal muscles.

7. Breathing Increases Muscle
Breathing is the oxygenation process to all of the cells in your body. With the supply of oxygen to the brain this increases the muscles in your body.

8. Breathing Strengthens the Immune System
Oxygen travels through your bloodstream by attaching to haemoglobin in your red blood cells. This in turn then enriches your body to metabolise nutrients and vitamins.

9. Breathing Improves Posture
Good breathing techniques over a sustained period of time will encourage good posture. Bad body posture will result of incorrect breathing so this is such an important process by getting your posture right from early on you will see great benefits.

10. Breathing Improves Quality of the Blood
Deep breathing removes all the carbon-dioxide and increases oxygen in the blood and thus increases blood quality.

11. Breathing Increases Digestion and
Assimilation of food
The digestive organs such as the stomach receive more oxygen, and hence oper;ates more efficiently. The digestion is further enhanced by the fact that the food is oxygenated more.

12. Breathing Improves the Nervous System
The brain, spinal cord and nerves receive increased oxygenation and are more nourished. This improves the health of the whole body, since the nervous system communicates to all parts of the body.

13. Breathing Strengthen the Lungs
As you breathe deeply the lung become healthy and powerful, a good insurance against respiratory problems.

14. Proper Breathing makes the Heart Stronger.
Breathing exercises reduce the workload on the heart in two ways. Firstly, deep breathing leads to more efficient lungs, which means more oxygen, is brought into contact with blood sent to the lungs by the heart. So, the heart doesn't have to work as hard to deliver oxygen to the tissues. Secondly, deep breathing leads to a greater pressure differential in the lungs, which leads to an increase in the circulation, thus resting the heart a little.

15. Proper Breathing assists in Weight Control.
If you are overweight, the extra oxygen burns up the excess fat more efficiently. If you are underweight, the extra oxygen feeds the starving tissues and glands.


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शिव महिम्न: स्तोत्रम



~ शिव महिम्न: स्तोत्रम ~
===============
शिव भक्तों का एक प्रिय मंत्र है | ४३
छन्दों के इस स्तोत्र में शिव के दिव्य स्वरूप एवं उनकी सादगी का वर्णन है । स्तोत्र का सृजन एक अनोखे असाधारण परिपेक्ष में किया गया था तथा शिव को प्रसन्न कर के उनसे क्षमा प्राप्ति की गई थी | कथा कुछ इस प्रकार के है …
एक समय में चित्ररथ नाम का राजा था| वो परं शिव भक्त था| उसने एक अद्भुत सुंदर बागा का निर्माण करवाया| जिसमे विभिन्न प्रकार के पुष्प लगे थे | प्रत्येक दिन राजा उन पुष्पों से शिव जी की पूजा करते थे | फिर एक दिन …
पुष्पदंत नामक के गन्धर्व उस राजा के उद्यान की तरफ से जा रहा था| उद्यान की सुंदरता ने उसे आकृष्ट कर लिया| मोहित पुष्पदंत ने बाग के पुष्पों को चुरा लिया| अगले दिन चित्ररथ को पूजा हेतु पुष्प प्राप्त नहीं हुए | पर ये तो आरम्भ मात्र था … बाग के सौंदर्य से मुग्ध पुष्पदंत प्रत्यक दिन पुष्प की चोरी करने लगा| इस रहश्य को सुलझाने के राजा के प्रत्येक प्रयास  विफल रहे| पुष्पदंत अपने दिव्या शक्तियों के कारण अदृश्य बना रहा | और फिर … राजा चित्ररथ ने एक अनोखा समाधाननिकाला| उन्होंने शिव को अर्पित पुष्पएवं विल्व पत्र बाग में बिछा दिया|


रजा के उपाय से अनजान पुष्पदंत ने उन
पुष्पों को अपने पेरो से कुचल दिया| फिर
क्या था| इससे पुष्पा दंत
की दिव्या शक्तिओं का क्षय हो गया|
तब…
पुष्पदंत स्वयं भी शिव भक्त था |
अपनी गलती का बोध होने परा उसने इस
परम स्तोत्र के रचना की जिससे प्रसन्न
हो महादेव ने उसकी भूल
को क्षमा करा पुष्पदंत के दिव्या स्वरूप
को पुनः प्रदान किया |
महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी
स्तुतिर्ब्रह्मा
दीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः .
अथाऽवाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावध
ि गृणन्ममाप्येष स्तोत्रे हरनिरपवादः परिकरः .. १..
हे हर !!! आप प्राणी मात्र के
कष्टों को हराने वाले हैं| मैं इस स्तोत्र
द्वारा आपकी वंदना करा रहा हूँ
जो कदाचित आपके वंदना के योग्य न
भी हो| पर हे महादेव स्वयं ब्रह्मा और
अन्य देवगण भी आपके चरित्र की पूर्ण
गुणगान करने में सक्षम नहीं हैं| जिस प्रकार
एक पक्षी अपनी क्षमता के अनुसार
ही आसमान में उड़ान भर सकता है
उसी प्रकार मैं भे अपने
यथा शक्ति आपकी आराधना करता हूँ |
अतीतः पंथानं तव च महिमा वाङ्मनसयोः
अतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते
श्रुतिरपि .
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य
विषयः
पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न
वचः .. २..
हे शिव !!! आपकी व्याख्या न तो मन
ना ही वचन द्वारा ही संभव है| आपके
सन्दर्भ में वेदा भी अचंभित हैं
तथा नेति नेति का प्रयोग करते हैं अर्थात
ये भी नहीं और वो भी नहीं| आपका संपूर्ण
गुणगान भला कौन करा सकता है? ये जानते
हुए भी की आप आदि अंत रहित
परमात्मा का गुणगान कठिन है मैं
आपका वंदन करता हूँ |
मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवतः
तव ब्रह्मन् किं वागपि सुरगुरोर्विस्मय
पदम् .
मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः
पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथन
बुद्धिर्व्यवसिता .. ३..
हे वेद और भाषा के सृजक जब स्वयं देवगुरु
बृहस्पति भी आपके स्वरूप की व्याख्या करने
में असमर्थ हैं तो फिर मेरा कहना ही क्या?
हे त्रिपुरारी, अपने सिमित
क्षमता का बोध होते हुए भे मैं इस विशवास
से इस स्तोत्र की रचना करा रहा हूँ के
इससे मेरे वाने शुद्ध होगी तथा मेरे
बुद्धी का विकास होगा |
तवैश्वर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत्
त्रयीवस्तु व्यस्तं तिस्रुषु गुणभिन्नासु
तनुषु .
अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं
विहन्तुं व्याक्रोशीं विदधत इहैके
जडधियः .. ४..
हे देव, आप ही इस संसार के सृजक,
पालनकर्ता एवं विलयकर्ता हैं| तीनों वेद
आपके ही सहिंता गाते हैं, तीनों गुण (सतो-
रजो-तमो) आपसे हे प्रकाशित हैं|
आपकी ही शक्ति त्रिदेवों में निहित है|
इसके बाद भी कुछ मूढ़
प्राणी आपका उपहास करते हैं तथा आपके
बारे भ्रम फ़ैलाने का प्रयास करते हैं
जो की सर्वथा अनुचित है |
किमीहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभु
वनं
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान
इति च .
अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसर
दुःस्थो हतधियः
कुतर्कोऽयं कांश्चित् मुखरयति मोहाय
जगतः .. ५..
हे महादेव !!! वो मूढ़ प्राणी जो स्वयं
ही भ्रमित हैं इस प्रकार से तर्क-वितर्क
द्वारा आपके अस्तित्व को चुनौती देने
की कोशिश करते हैं| वो कहते हैं कि अगर
कोई परं पुरुष है तो उसके क्या गुण हैं ?
वो कैसा दिखता है ? उसके क्या साधन हैं ?
वो इस सृष्टि को किस प्रकार धारण
करता है ? ये प्रश्न वास्तव में भ्रामक
मात्र हैं | वेद ने भी स्पष्ट किया है
की तर्क
द्वारा आपको नहीं जाना जा सकता |
अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगतां
अधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य
भवति .
अनीशो वा कुर्याद् भुवनजनने कः परिकरो
यतो मन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे ..
६..
हे परमपिता !!! इस सृष्टि में सात लोक हैं
(भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्गलोक,
सत्यलोक,महर्लोक, जनलोक, एवं तपलोक)|
इनका सृजन भला सृजक (आपके) के बिना कैसे
संभव हो सका ? ये किस प्रकार से और किस
साधन से निर्मित हुए ? तात्पर्य हे की आप
पर संसय का कोइ तर्क भी नहीं हो सकता |
त्रयी साङ्ख्यं योगः पशुपतिमतं
वैष्णवमिति
प्रभिन्ने प्रस्थाने
परमिदमदः पथ्यमिति च .
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिल नानापथजुषां
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ..
७..
विवध प्राणी सत्य तक पहुचने के लिय
विभिन्न वेद पद्धतियों का अनुसरण करते हैं
| पर जिस प्रकार सभी नदी अंतत: सागर में
समाहित हो जाती है ठीक उसी प्रकार
हरा मार्ग आप तक ही पहुंचता है |
महोक्षः खट्वाङ्गं परशुरजिनं भस्म फणिनः
कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम् .
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु
भवद्भूप्रणिहितां
न हि स्वात्मारामं
विषयमृगतृष्णा भ्रमयति .. ८..
हे शिव !!! आपके भृकुटी के इशारे मात्र से
सभी देवगण एश्वर्य एवं संपदाओं का भोग
करते हैं| पर आपके स्वयं के लिए सिर्फ बैल
(नंदी), कपाल, बाघम्बर, त्रिशुल, कपाल एवं
नाग्माला एवं भष्म मात्र है| अगर कोई
संशय करे कि अगर आप देवों के असीम एश्वर्य
के श्रोत हैं तो आप स्वयं उन
ऐश्वर्यों का भोग क्यों नहीं करते तो इस
प्रश्न का उत्तर सहज ही है| आप
इच्छा रहित हीं तथा स्वयं में ही स्थित
रहते हैं |
ध्रुवं कश्चित् सर्वं सकलमपरस्त्वध्रुवमिदं
परो ध्रौव्याऽध्रौव्ये
जगति गदति व्यस्तविषये .
समस्तेऽप्येतस्मिन् पुरमथन तैर्विस्मित इव
स्तुवन् जिह्रेमि त्वां न खलु ननु
धृष्टा मुखरता .. ९..
हे त्रिपुरहंता !!! इस संसारा के बारे में
विभिन्न विचारकों के भिन्न-भिन्न
माता हैं. कोई इसे नित्य जानता है
तो कोई इसे अनित्य समझता है| अन्य इसे
नित्यानित्य बताते हीं. इन विभिन्न
मतों के कारण मेरी बुध्दि भ्रमित होती है
पर मेरी भक्ति आप में और दृढ
होती जा रही है |
तवैश्वर्यं यत्नाद्
यदुपरि विरिञ्चिर्हरिरधः
परिच्छेतुं यातावनिलमनलस्कन्धवपुषः
ततो भक्तिश्रद्धा-भरगुरु-गृणद्भ्यां गिरिश
यत्
स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न
फलति .. १०..
एक समय आपके पूर्ण स्वरूप का भेद जानने हेतु
ब्रह्मा एवं विष्णु क्रमश: उपर एवं नीचे
की दिशा में गए| पर उनके सारे प्रयास
विफल हुए| जब उन्होंने भक्ति मार्ग
अपनाया तभी आपको जान पाए|
क्या आपकी भक्ति कभी विफल
हो सकती है?
अयत्नादासाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकरं
दशास्यो यद्बाहूनभृत-रणकण्डू-परवशान् .
शिरःपद्मश्रेणी-रचितचरणाम्भोरुह-बलेः
स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर
विस्फूर्जितमिदम् .. ११..
हे त्रिपुरान्तक !!! दशानन रावण किस
प्रकार विश्व को शत्रु विहीन कर सका ?
उसके महाबाहू हर पल युद्ध के लिए व्यग्र
रहे | हे प्रभु ! रावण ने भक्तिवश अपने
ही शीश को काट-काट कर आपके चरण
कमलों में अर्पित कर दिया, ये
उसी भक्ति का प्रभाव था |
अमुष्य त्वत्सेवा-समधिगतसारं भुजवनं
बलात्
कैलासेऽपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः .
अलभ्यापातालेऽप्यलसचलितांगुष्ठशिरसि
प्रतिष्ठा त्वय्यासीद्
ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः .. १२..
हे शिव !!! एक समय उसी रावण ने मद् में चूर
आपके कैलाश को उठाने की धृष्टता करने
की भूल की| हे महादेव आपने अपने सहज पाँव
के अंगूठे मात्र से उसे दबा दिया| फिर
क्या था रावण कष्ट में रूदन करा उठा|
वेदना ने पटल लोक में
भी उसका पीछा नहीं छोड़ा|
अंततः आपकी शरणागति के बाद ही वह
मुक्त हो सका |
यदृद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सतीं
अधश्चक्रे बाणः परिजनविधेयत्रिभुवनः .
न तच्चित्रं तस्मिन्
वरिवसितरि त्वच्चरणयोः
न कस्याप्युन्नत्यै भवति शिरसस्त्वय्यवनत
िः .. १३..
हे शम्भो !!! आपकी कृपा मात्र से
ही बाणासुर दानव इन्द्रादि देवों से
भी अधिक अश्वर्यशाली बन
सका ताता तीनो लोकों पर राज्य किया|
हे ईश्वर आपकी भक्ति से क्या कुछ संभव
नहीं है?
अकाण्ड-ब्रह्माण्ड-क्षयचकित-देवासुरकृपा
विधेयस्याऽऽसीद् यस्त्रिनयन विषं
संहृतवतः .
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो
विकारोऽपि श्लाघ्यो भुवन-भय-भङ्ग-व्
यसनिनः .. १४..
देवताओं एव असुरों ने अमृत प्राप्ति हेतु
समुन्द्र मंथन किया| समुद्र से आने मूल्यवान
वस्तुएँ परात्प हुईं जो देव तथा दानवों ने
आपस में बाट लिया| परा जब समुन्द्र से
अत्यधिक भयावह कालकूट विष प्रगट हुआ
तो असमय ही सृष्टी समाप्त होने का भय
उत्पन्न हो गया और सभी भयभीत हो गए|
हे हर तब आपने संसार रक्षार्थ विषपान
कर लिया| वह विष आपके कंठ में निस्किर्य
हो कर पड़ा है| विष के प्रभाव से आपका कंठ
नीला पड़ गया| हे नीलकंठ आश्चर्य ही है
की ये
विकृति भी आपकी शोभा ही बदती है|
कल्याण कार्य सुन्दर ही होता है|
असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे
निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य
विशिखाः .
स पश्यन्नीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत्
स्मरः स्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु
पथ्यः परिभवः .. १५..
हे प्रभु !!! कामदेव के वार से कभी कोई
भी नहीं बच सका चाहे वो मनुष्य हों, देव
या दानव ही | पर जब कामदेव ने
आपकी शक्ति समझे बिना आप की ओर अपने
पुष्प बाण को साधा तो आपने उसे तक्षण
ही भष्म करा दिया| श्रेष्ठ जानो के
अपमान का परिणाम हितकर नहीं होता |
मही पादाघाताद् व्रजति सहसा संशयपदं
पदं विष्णोर्भ्राम्यद् भुज-परिघ-रुग्ण-
ग्रह-गणम् .
मुहुर्द्यौर्दौस्थ्यं यात्यनिभृत-जटा-
ताडित-तटा
जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता ..
१६..
हे नटराज !!! जब संसार कल्याण के हितु आप
तांडव करने लगते हैं तो आपके पाँव के नीचे
धारा कंप उठती है, आपके हाथो के
परिधि से टकरा कार ग्रह नक्षत्र भयभीत
हो उठते हैं| विष्णु लोक भी हिल जाता है|
आपके जाता के स्पर्श मात्र से स्वर्गलोग
व्याकुल हो उठता है| आशार्य ही है हे
महादेव कि अनेको बार
कल्याणकारी कार्य भे भय उत्पन्न करते हैं |
वियद्व्यापी तारा-गण-गुणित-फेनोद्गम-
रुचिः
प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते .
जगद्द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमिति
अनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः ..
१७..
आकाश गंगा से निकलती तारागणों के बिच
से गुजरती गंगा जल अपनी धारा से
धरती पर टापू तथा अपने वेग से चक्रवात
उत्पन्न करती है| पर ये उफान से परिपूर्ण
गंगा आपके मस्तक पर एक बूंद के सामन
ही दृष्टीगोचर होती है| ये आपके दिव्य
स्वरूप का ही परिचायक है|
रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिरगेन्द्रो
धनुरथो
रथाङ्गे चन्द्रार्कौ रथ-चरण-पाणिः शर
इति .
दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडम्बर
विधिः
विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु
परतन्त्राः प्रभुधियः .. १८..
हे शिव !!! आपने त्रिपुरासुर का वध करने
हेतु पृथ्वी को रथ, ब्रह्मा को सारथी, सूर्य
चन्द्र को पहिया एवं स्वयं इन्द्र को बाण
बनाया| हे शम्भू इसा वृहत प्रयोजन
की क्या आवश्यकता थी ? आपके लिए
तो संसार मात्र का विलय करना अत्यंत
ही छोटी बात है|
आपको किसी सहायता की क्या आवश्यकता ?
हरिस्ते साहस्रं कमल बलिमाधाय पदयोः
यदेकोने तस्मिन् निजमुदहरन्नेत्रकमलम् .
गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषः
त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर
जागर्ति जगताम् .. १९..
जब भगवान विष्णु ने आपकी सहश्र
कमलों (एवं सहस्र नामों)
द्वारा पूजा प्रारम्भ की तो उन्होंने एक
कमाल कम पाया| तब भक्ति भाव से हरी ने
अपने एक आँख को कमाल के स्थान पर अर्पित
कर दिया| उनकी यही अदाम्ह्य भक्ति ने
सुदर्शन चक्र का स्वरूप धारण कर
लिया जिसे भगवान विष्णु संसार रक्षार्थ
उपयोग करते हैं ।
क्रतौ सुप्ते जाग्रत् त्वमसि फलयोगे
क्रतुमतां
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते .
अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदान-
प्रतिभुवं
श्रुतौ श्रद्धां बध्वा दृढपरिकरः कर्मसु
जनः .. २०..
हे देवाधिदेव !!! आपने ही कर्म -फल
का विधान बनाया| आपके ही विधान से
अच्छे कर्मो तथा यज्ञ कर्म का फल प्राप्त
होता है | आपके वचनों में श्रद्धा रख कर
सभी वेद कर्मो में आस्था बनाया रखते हैं
तथा यज्ञ कर्म में संलग्न रहते हैं |
क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्त
नुभृतां
ऋषीणामार्त्विज्यं शरणद सदस्याः सुर-
गणाः .
क्रतुभ्रंशस्त्वत्तः क्रतुफल-विधान-व
्यसनिनः
ध्रुवं कर्तुं श्रद्धा विधुरमभिचाराय
हि मखाः .. २१..
हे प्रभु !!! यदपि आपने यज्ञ कर्म और फल
का विधान बनाया है तदपि जो यज्ञ शुद्ध
विचारों और कर्मो से प्रेप्रित न हो और
आपकी अवहेलना करने
वाला हो उसा परिणाम कदाचित
विपरीत और अहितकर ही होता है|
दक्षप्रजापति के महायज्ञ से उपयुक्त
उदाहरण भला और क्या हो सकता है?
दक्षप्रजापति के यज्ञ में स्वयं
ब्रह्मा पुरोहित तथा अनेकानेक देवगण
तथा ऋषि-मुनि समलित हुए| फिर भी शिव
की अवहेलना के कारण यज्ञ का नाश हुआ|
आप अनीति को सहन नहीं करते भले
ही शुभकर्म के क्ष्द्म्बेश में क्यों न हो |
प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं
गतं रोहिद् भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा .
धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममुं
त्रसन्तं तेऽद्यापि त्यजति न
मृगव्याधरभसः .. २२..
एक समय में ब्रह्मा अपनी पुत्री पे
ही मोहित हो गया| जब उनकी पुत्री ने
हिरनी का स्वरु धारण करा भागने
की कोशिस की तो कामातुर ब्रह्मा ने
भी हिरन भेष में उसका पीछा करने लगे| हे
शंकर तब आप व्याघ्र स्वरूप में धनुष-बाण ले
ब्रह्मा की और कूच किया| आपके रौद्र रूप
से भयभीत ब्रह्मा आकाश दिशा की ओर
भगा निकले तथा आजे भी आपसे भयभीत हैं |
स्वलावण्याशंसा धृतधनुषमह्नाय तृणवत्
पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि .
यदि स्त्रैणं देवी यमनिरत-देहार्ध-घटनात्
अवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतयः ..
२३..
हे योगेश्वर! जब आपने
माता पार्वती को अपनी सहभागी बनाया तो उन्हें
आपने योगी होने पे शंका उत्पन्न हुई| ये
शंका निर्मुर्ल ही थी क्योंकि जब स्वयं
कामदेव ने आप पर अपना प्रभाव दिखलाने
की कोशिस की तो आपने काम
को जला करा नाश्ता करा दिया |
श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर
पिशाचाः सहचराः
चिता-भस्मालेपः स्रगपि नृकरोटी-
परिकरः .
अमङ्गल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं
तथापि स्मर्तॄणां वरद परमं मङ्गलमसि ..
२४..
हे भोलेनाथ!!! आप स्मशान में रमण करते हैं,
भुत-प्रेत आपके संगी होते हैं, आप चिता भष्म
का लेप करते हैं तथा मुंडमाल धारण करते हैं|
ये सारे गुण ही अशुभ एवं भयावह जान पड़ते
हैं| तबभी हे स्मशान निवासी आपके भक्त
आपके इस स्वरूप में भी शुभकारी एव आनंदाई
हे प्रतीत होता है क्योकि हे शंकर आप
मनोवान्चिता फल प्रदान करने में तनिक
भी विलम्ब नहीं करते |
मनः प्रत्यक् चित्ते सविधमविधायात्त-
मरुतः
प्रहृष्यद्रोमाणः प्रमद-सलिलोत्सङ्गति-
दृशः .
यदालोक्याह्लादं ह्रद इव निमज्यामृतमये
दधत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत् किल
भवान् .. २५..
हे योगिराज!!! मनुष्य नाना प्रकार के
योग्य पदाति को अपनाते हैं जैसे की स्वास
पर नियंत्रण, उपवास, ध्यान इत्यादि| इन
योग क्रियाओं द्वारा वो जिस आनदं, जिस
सुख को प्राप्त करते हैं वो वास्तव में
आपही हैं हे महादेव!!!
त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं
हुतवहः
त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु
धरणिरात्मा त्वमिति च .
परिच्छिन्नामेवं
त्वयि परिणता बिभ्रति गिरं
न विद्मस्तत्तत्त्वं वयमिह तु यत् त्वं न
भवसि .. २६..
हे शिव !!! आप ही सूर्य, चन्द्र, धरती,
आकाश, अग्नी, जल एवं वायु हैं | आप
ही आत्मा भी हैं| हे देव मुझे ऐसा कुछ
भी ज्ञात नहीं जो आप न हों |
त्रयीं तिस्रो वृत्तीस्त्रिभुव
नमथो त्रीनपि सुरान्
अकाराद्यैर्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत्
तीर्णविकृति .
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः
समस्त-व्यस्तं त्वां शरणद
गृणात्योमिति पदम् .. २७..
हे सर्वेश्वर!!! ॐ तीन तत्वों से बना है अ,
ऊ, माँ जो तीन वेदों (ऋग, साम, यजुर), तीन
अवस्था (जाग्रत, स्वप्ना, शुसुप्ता), तीन
लोकों, तीन कालों, तीन गुणों,
तथा त्रिदेवों को इंगित करता है| हे
ॐकार आपही इस त्रिगुण, त्रिकाल,
त्रिदेव, त्रिअवस्था, औरो त्रिवेद के
समागम हैं |
भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सहमहान्
तथा भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिद
म् .
अमुष्मिन् प्रत्येकं प्रविचरति देव
श्रुतिरपि
प्रियायास्मैधाम्ने प्रणिहित-नमस्यो
ऽस्मि भवते .. २८..
हे शिव विद एवं देवगन आपकी इन आठ
नामों से वंदना करते हैं – भव, सर्व, रूद्र ,
पशुपति, उग्र, महादेव, भीम, एवं इशान| हे
शम्भू मैं भी आपकी इन नामो से
स्तुति करता हूँ |
नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च
नमः
नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च
नमः .
नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च
नमः
नमः सर्वस्मै ते तदिदमतिसर्वाय च नमः ..
२९..
हे त्रिलोचन आप अत्यधिक दूर हैं और अत्यंत
पास भी, आप महा विशाल भी हैं तथा परम
सूक्ष्म भी, आप श्रेठ भी हैं तथा कनिष्ठ भी|
आप ही सभी कुछ हैं साथ ही आप सभे कुछ से
परे भी |
बहुल-रजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः
प्रबल-तमसे तत् संहारे हराय नमो नमः .
जन-सुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ मृडाय
नमो नमः
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय
नमो नमः .. ३०..
हे भव, मैं आपको रजोगुण से युक्त
सृजनकर्ता जान कर आपका नमन करता हूँ |
हे हर, मैं आपको तामस गुण से युक्त,
विलयकर्ता मान आपका नमन करता हूँ| हे
मृड, आप सतोगुण से व्याप्त सबो का पालन
करने वाले हैं| आपको नमस्कार है| आप
ही ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश हैं| हे
परमात्मा, मैं आपको इन तीन गुणों से परे
जान कर शिव रूप में नमस्कार करता हूँ |
कृश-परिणति-चेतः क्लेशवश्यं क्व चेदं
क्व च तव गुण-सीमोल्लङ्घि
नी शश्वदृद्धिः .
इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधाद्
वरद चरणयोस्ते वाक्य-पुष्पोपहारम् ..
३१..
हे शिव आप गुनातीत हैं और आपका विस्तार
नित बढता ही जाता है| अपनी सिमित
क्षमता से मैं कैसे आपकी वंदना कर सकता हूँ?
पर भक्ति से ये दूरी मिट जाती है तथा मैं
आपने कर कमलों में अपनी स्तुति प्रस्तुत
करता हूँ |
असित-गिरि-समं स्यात् कज्जलं सिन्धु-
पात्रे
सुर-तरुवर-शाखा लेखनी पत्रमुर्वी .
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ..
३२..
यदि कोई गिरी (पर्वत) को स्याही, सिंधु
तो दवात, देव उद्यान के किसी विशाल
वृक्ष को लेखनी एवं उसे छाल को पत्र
की तरह उपयोग में लाए तथा स्वयं ज्ञान
स्वरूपा माँ सरस्वती अनंतकाल आपके
गुणों की व्याख्या में संलग्न रहें तो भी आप
के गुणों की व्याख्या संभव नहीं है |
असुर-सुर-मुनीन्द्रैरर्चितस्येन्दु-मौलेः
ग्रथित-गुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य .
सकल-गण-वरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानः
रुचिरमलघुवृत्तैः स्तोत्रमेतच्चकार .. ३३..
इस स्तोत्र की रचना पुश्प्दंता गंधर्व ने
उन चन्द्रमोलेश्वर शिव जी के गुणगान के
लिए की है तो गुणातीत हैं |
अहरहरनवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्
पठति परमभक्त्या शुद्ध-चित्तः पुमान्
यः .
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाऽत्र
प्रचुरतर-धनायुः पुत्रवान् कीर्तिमांश्च ..
३४..
जो भी इसा स्तोत्र का शुद्ध मन से नित्य
पाठ करता है वो जीवन काल में विभिन्न
ऐश्वर्यों का भोग करता है
तथा अंततः शिवधाम को प्राप्त करता है
तथा शिवतुल्य हो जाता है|
महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः .
अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं
गुरोः परम् .. ३५..
महेश से श्रेष्ठ कोइ देवा नहीं, महिम्न
स्तोत्र से श्रेष्ठ कोइ स्तोत्र नहीं, ॐ से
बढकर कोई मंत्र नहीं तथा गुरू से ऊपर कोई
सत्य नहीं.
दीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं
यागादिकाः क्रियाः .
महिम्नस्तव पाठस्य
कलां नार्हन्ति षोडशीम् .. ३६..
दान, यज्ञ, ज्ञान एवं त्याग
इत्यादि सत्कर्म इसा स्तोत्र के पाठ के
सोलहवे अंश के बराबर भी फल नहीं प्रदान
कर सकते |
कुसुमदशन-नामा सर्व-गन्धर्व-राजः
शशिधरवर-मौलेर्देवदेवस्य दासः .
स खलु निज-महिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्
स्तवनमिदमकार्षीद् दिव्य-दिव्यं
महिम्नः .. ३७..
कुसुमदंत नामक
गंधर्वों का राजा चन्द्रमोलेश्वर शिव
जी का परं भक्त था| अपने अपराध (पुष्प
की चोरी) के कारण वो अपने दिव्या स्वरूप
से वंचित हो गया| तब उसने इस स्तोत्र
की रचना करा शिव को प्रसन्न
किया तथा अपने दिव्या स्वरूप
को पुनः प्राप्त किया |
सुरगुरुमभिपूज्य स्वर्ग-मोक्षैक-हेतुं
पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिर्नान्य-
चेताः .
व्रजति शिव-समीपं किन्नरैः स्तूयमानः
स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम् .. ३८..
जो इस स्तोत्र का पठन करता है
वो शिवलोक पाटा है तथा ऋषि मुनियों द्वारा भी पूजित
हो जाता है |
आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुण्यं गन्धर्व-भाषितम् .अनौपम्यं मनोहारि सर्वमीश्वरवर्णनम् ..
३९..
पुष्पदंत रचित ये स्तोत्र दोषरहित है तथा इसका नित्य पाठ करने से परं सुख की प्राप्ति होती है |


इत्येषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छङ्कर-पादयोः अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः .. ४०..
ये स्तोत्र शंकर भगवान को समर्पति है | प्रभु हमसे प्रसन्न हों|

तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः ..४१..
हे शिव !!! मैं आपके वास्तविक स्वरुप् को नहीं जानता| हे शिव आपके उस वास्तविक स्वरूप जिसे मैं नहीं जान
सकता उसको नमस्कार है |

एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः . सर्वपाप-विनिर्मुक्तः शिव लोके महीयते .. ४२..
जो इस स्तोत्र का दिन में एक, दो या तीन बार पाठ करता है वो पाप मुक्त हो जाता है तथा शिव लोक को प्राप्त
करता है |

श्री पुष्पदन्त-मुख-पङ्कज-निर्गतेन स्तोत्रेण किल्बिष-हरेण हर-प्रियेण कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः .. ४३..
पुष्पदंत द्वारा रचित ये स्तोत्र शिव जी अत्यंत ही प्रिय है | इसका पाठ करने वाला अपने संचित पापों से मुक्ति पाता है
|
.. इति श्री पुष्पदन्त विरचितं शिवमहिम्नः स्तोत्रं समाप्तम् .


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राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन: हिंदी के ‘सेनानी’



‘‘स्वाधीनता और स्वभाषा का घना संबंध है। बिना अपनी भाषा की नींव दृढ़ किए स्वतंत्रता की नींव दृढ़ नहीं हो सकती। जो लोग इस तत्त्व को समझते हैं, वे मर-मिटने तक अपनी भाषा नहीं छोड़ते। जिंदा देशों में यही होता है। मुर्दा और पराधीन देशों की बात मैं नहीं कहता, उन अभागे देशों में तो ठीक इसके विपरीत ही दृश्य देखा जा सकता है।’’

हिंदी के अनन्य प्रेमी पुरुषोत्तम दास टंडन (संक्षेप में पी.डी. टंडन) के हिंदी के संबंध में स्पष्ट धारणा थी कि ‘ऐसी भाषा हिंदी ही है, जो समूचे देश में सहज ही फैलाई जा सकती है।’ दरअसल, किसी राजनेता ने हिंदी के लिए उतना कार्य नहीं किया जितना टंडन जी ने। उन्होंने ही ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ की नींव रखी थी। इलाहाबाद के जिस मुहल्ले में उनका जन्म हुआ था पं. मदनमोहन मालवीय तथा पं. बालकृष्ण भट्ट का निवास स्थान भी वही मुहल्ला था। उन्हें अपने छात्रा जीवन में भट्ट जी के शिष्य होने का सुयोग मिला था। भट्ट जी ‘हिंदी-प्रदीप’ नामक पत्रा निकालते थे। उनकी ही प्रेरणा से वे हिंदी-लेखन की ओर झुके। उन दिनों सरकारी तंत्रा
में हिंदी को उचित प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं थी। मालवीय जी के नेतृत्व में छिड़े हिंदी आंदोलन में टंडन जी उनके विशेष सहयोगी बने। 

उन दिनों काशी में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हो चुकी थी। यहीं हिंदी साहित्य सम्मेलन की भी स्थापना
10 अक्तूबर, 1910 को हुई। सम्मेलन के गठन का उद्देश्य था हिंदी को राष्ट्रभाषा का स्थान दिलाना। महात्मा गाँधी भी बाद में सम्मेलन के विशिष्ट अंग बने। ‘दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा’ भी इसी सम्मेलन की देन थी। ‘हिंदी विद्यापीठ’ और ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ (वर्धा) भी टंडन जी की ही देन हैं। पं. राहुल सांकृत्यायन ने टंडन जी को हिंदी का ‘प्रतीक’ कहा था। टंडन जी ने केन्द्रीय  सचिवालय में संसदीय हिंदी परिषद् का गठन करके हिंदी के अध्यापन की व्यवस्था करवाई थी। 14 सितंबर को ‘हिंदी दिवस’ इसी संसदीय हिंदी परिषद् की ओर से मनाया जाता है।


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महा मृत्‍युंजय मंत्र का अर्थ



ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्‍बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उ
र्वारुकमिव बन्‍धनान् मृत्‍योर्मुक्षीय मामृतात्ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ !!

||महा मृत्‍युंजय मंत्र का अर्थ ||

समस्‍त संसार के पालनहार, तीन नेत्र वाले शिव की हम अराधना करते हैं। विश्‍व में सुरभि फैलाने वाले भगवान शिव मृत्‍यु न कि मोक्ष से हमें मुक्ति दिलाएं।

महामृत्युंजय मंत्र के वर्णो (अक्षरों) का अर्थ 

महामृत्युंघजय मंत्र के वर्ण पद वाक्यक चरण आधी ऋचा और सम्पुतर्ण ऋचा-इन छ: अंगों के अलग-अलग अभिप्राय हैं।

ओम त्र्यंबकम् मंत्र के 33 अक्षर हैं जो महर्षि वशिष्ठर के अनुसार 33 देवताआं के घोतक हैं। उन तैंतीस देवताओं में 8 वसु 11 रुद्र और 12 आदित्यठ 1 प्रजापति तथा 1 षटकार हैं। इन तैंतीस देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियाँ महामृत्युंजय मंत्र से निहीत होती है जिससे महा महामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी दीर्घायु तो प्राप्त करता ही हैं । साथ ही वह नीरोग, ऐश्व‍र्य युक्ता धनवान भी होता है । महामृत्युंरजय का पाठ करने वाला प्राणी हर दृष्टि से सुखी एवम समृध्दिशाली होता है । भगवान शिव की अमृतमययी कृपा उस निरन्तंर बरसती रहती है।

त्रि - ध्रववसु प्राण का घोतक है जो सिर में स्थित है।
यम - अध्ववरसु प्राण का घोतक है, जो मुख में स्थित है।
ब - सोम वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण कर्ण में स्थित है।
कम - जल वसु देवता का घोतक है, जो वाम कर्ण में स्थित है।
य - वायु वसु का घोतक है, जो दक्षिण बाहु में स्थित है।
जा- अग्नि वसु का घोतक है, जो बाम बाहु में स्थित है।
म - प्रत्युवष वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण बाहु के मध्य में स्थित है।
हे - प्रयास वसु मणिबन्धत में स्थित है।
सु -वीरभद्र रुद्र प्राण का बोधक है। दक्षिण हस्त के अंगुलि के मुल में स्थित है।
ग -शुम्भ् रुद्र का घोतक है दक्षिणहस्त् अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
न्धिम् -गिरीश रुद्र शक्ति का मुल घोतक है। बायें हाथ के मूल में स्थित है।
पु- अजैक पात रुद्र शक्ति का घोतक है। बाम हस्तह के मध्य भाग में स्थित है।
ष्टि - अहर्बुध्य्त् रुद्र का घोतक है, बाम हस्त के मणिबन्धा में स्थित है।
व - पिनाकी रुद्र प्राण का घोतक है। बायें हाथ की अंगुलि के मुल में स्थित है।
र्ध - भवानीश्वपर रुद्र का घोतक है, बाम हस्त अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
नम् - कपाली रुद्र का घोतक है । उरु मूल में स्थित है।
उ- दिक्पति रुद्र का घोतक है । यक्ष जानु में स्थित है।
र्वा - स्था णु रुद्र का घोतक है जो यक्ष गुल्फ् में स्थित है।
रु - भर्ग रुद्र का घोतक है, जो चक्ष पादांगुलि मूल में स्थित है।
क - धाता आदित्यद का घोतक है जो यक्ष पादांगुलियों के अग्र भाग में स्थित है।
मि - अर्यमा आदित्यद का घोतक है जो वाम उरु मूल में स्थित है।
व - मित्र आदित्यद का घोतक है जो वाम जानु में स्थित है।
ब - वरुणादित्या का बोधक है जो वाम गुल्फा में स्थित है।
न्धा - अंशु आदित्यद का घोतक है । वाम पादंगुलि के मुल में स्थित है।
नात् - भगादित्यअ का बोधक है । वाम पैर की अंगुलियों के अग्रभाग में स्थित है।
मृ - विवस्व्न (सुर्य) का घोतक है जो दक्ष पार्श्वि में स्थित है।
र्त्यो् - दन्दाददित्य् का बोधक है । वाम पार्श्वि भाग में स्थित है।
मु - पूषादित्यं का बोधक है । पृष्ठै भगा में स्थित है ।
क्षी - पर्जन्य् आदित्यय का घोतक है । नाभि स्थिल में स्थित है।
य - त्वणष्टान आदित्यध का बोधक है । गुहय भाग में स्थित है।
मां - विष्णुय आदित्यय का घोतक है यह शक्ति स्व्रुप दोनों भुजाओं में स्थित है।
मृ - प्रजापति का घोतक है जो कंठ भाग में स्थित है।
तात् - अमित वषट्कार का घोतक है जो हदय प्रदेश में स्थित है।उपर वर्णन किये स्थानों पर उपरोक्तध देवता, वसु आदित्य आदि अपनी सम्पुर्ण शक्तियों सहित विराजत हैं । जो प्राणी श्रध्दा सहित महामृत्युजय मंत्र का पाठ करता है उसके शरीर के अंग - अंग ( जहां के जो देवता या वसु अथवा आदित्यप हैं ) उनकी रक्षा होती है ।

मंत्रगत पदों की शक्तियॉं 

जिस प्रकार मंत्रा में अलग अलग वर्णो (अक्षरों ) की शक्तियाँ हैं । उसी प्रकार अलग - अल पदों की भी शक्तियॉं है।

त्र्यम्‍‍बकम् - त्रैलोक्यक शक्ति का बोध कराता है जो सिर में स्थित है।
यजा- सुगन्धात शक्ति का घोतक है जो ललाट में स्थित है ।
महे- माया शक्ति का द्योतक है जो कानों में स्थित है।
सुगन्धिम् - सुगन्धि शक्ति का द्योतक है जो नासिका (नाक) में स्थित है।
पुष्टि - पुरन्दिरी शकित का द्योतक है जो मुख में स्थित है।
वर्धनम - वंशकरी शक्ति का द्योतक है जो कंठ में स्थित है ।
उर्वा - ऊर्ध्देक शक्ति का द्योतक है जो ह्रदय में स्थित है ।
रुक - रुक्तदवती शक्ति का द्योतक है जो नाभि में स्थित है।
मिव - रुक्मावती शक्ति का बोध कराता है जो कटि भाग में स्थित है ।
बन्धानात् - बर्बरी शक्ति का द्योतक है जो गुह्य भाग में स्थित है ।
मृत्यो: - मन्त्र्वती शक्ति का द्योतक है जो उरुव्दंय में स्थित है।
मुक्षीय - मुक्तिकरी शक्तिक का द्योतक है जो जानुव्दओय में स्थित है ।
मा - माशकिक्तत सहित महाकालेश का बोधक है जो दोंनों जंघाओ में स्थित है ।
अमृतात - अमृतवती शक्तिका द्योतक है जो पैरो के तलुओं में स्थित है।


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॥ श्री रुद्राष्टकम ॥ - Rudrashtak - महाकवि तुलसीदास कृत



श्री रुद्राष्टकम महाकवि तुलसीदास जी ने लिखा था | रुद्राष्टक भगवान शिव की उपासना हैं जिसमे उनके रूप, सौन्दर्य, बल का भाव विभोर चित्रण किया गया हैं |रुद्राष्टक काव्य संस्कृत भाषा में लिखा गया हैं |
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् |
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेङहम् ||१||
हे मोक्षस्वरूप, विभु, व्यापक, ब्रह्म और वेदस्वरूप, ईशान दिशा के ईश्वर तथा सबके स्वामी श्रीशिवजी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निजस्वरूप में स्थित (अर्थात मायादिरहित), [मायिक] गुणों से रहित, भेदरहित, इच्छारहित, चेतन आकाशरूप एवं आकाश को ही वस्त्ररूप में धारण करने वाले दिगम्बर [अथवा आकाश को भी आच्छादित करने वाले] आपको मैं भजता हूँ॥१॥ 

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् |
करालं महाकालकालं कृपालं गुणागारसंसारपारं नतोङहम् ||२||
निराकार, ओङ्कार के मूल, तुरीय (तीनों गणों से अतीत), वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे, कैलासपति, विकराल, महाकाल के भी काल,कृपालु, गुणों के धाम, संसार से परे आप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ॥२॥ 

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभीरं मनोभूतकोटि प्रभाश्रीशरीरम् |
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगंगा लसदभालबालेन्दुकण्ठे भुजंगा ||३||
जो हिमाचल के समान गौरवर्ण तथा गम्भीर हैं, जिनके शरीर में करोडों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है, जिनके सिर पर सुन्दर नदी गङ्गाजी विराजमान हैं, जिनके ललाटपर बाल चन्द्रमा (द्वितीया का चन्द्रमा) और गले में सर्प सुशोभित हैं॥३॥ 

चलत्कुण्डलं भ्रुसुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् |
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ||४||
 जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं, सुन्दर भ्रुकुटी और विशाल नेत्र हैं; जो प्रसन्नमुख, नीलकण्ठ और दयालु हैं;सिंहचर्म का वस्त्र धारण किये और मुण्डमाला पहने हैं; उन सबके प्यारे और सबके नाथ [कल्याण करने वाले] श्रीशङ्करजी को मैं भजता हूँ॥४॥

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम् |
त्रयः शूलनिर्मूलनं शूलपाणिं भजेङहं भावानीपतिं भावगम्यम् ||५||
प्रचण्ड (रुद्ररूप), श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोडों सूर्यो के समान प्रकाश वाले, तीनों प्रकार के शूलों (दु:खों) को निर्मूल करने वाले, हाथ में त्रिशूल धारण किये, भाव (प्रेम) के द्वारा प्राप्त होने वाले भवानी के पति श्रीशङ्करजी को मैं भजता हूँ॥५॥ 

कलातिकल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनान्ददाता पुरारी |
चिदानंदसंदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ||६||
कलाओं से परे, कल्याणस्वरूप, कल्पका अन्त (प्रलय) करने वाले, सज्जनों को सदा आनन्द देने वाले, त्रिपुर के शत्रु सच्चिदानन्दघन, मोह को हरने वाले, मन को मथ डालने वाले कामदेव के शत्रु, हे प्रभो! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये॥६॥ 

न यावद उमानाथपादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् |
न तावत्सुखं शान्ति संतापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ||७||
 जबतक, पार्वती के पति आपके चरणकमलों को मनुष्य नहीं भजते, तबतक उन्हें न तो इहलोक और परलोक में सुख-शान्ति मिलती है और न उनके तापों का नाश होता है। अत: हे समस्त जीवों के अंदर (हृदय में) निवास करने वाले प्रभो! प्रसन्न होइये॥७॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोङहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम् |
जरजन्मदुःखौ घतातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ||८||
मैं न तो योग जानता हूँ, न जप और न पूजा ही। हे शम्भो! मैं तो सदा-सर्वदा आपको ही नमस्कार करता हूँ। हे प्रभो! बुढापा तथा जन्म (मृत्यु) के दु:खसमूहों से जलते हुए मुझ दुखी की दु:ख से रक्षा कीजिये। हे ईश्वर! हे शम्भो! मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥८॥ 

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।ये पठन्ति नरा भक्तया तेषां शम्भु: प्रसीदति॥
 भगवान रुद्र की स्तुति का यह अष्टक उन शङ्करजी की तुष्टि (प्रसन्नता) के लिए ब्राह्मण द्वारा कहा गया। जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक पढते हैं, उन पर भगवान् शम्भु प्रसन्न होते हैं॥९॥

महाकवि तुलसीदास द्वारा रचित श्री रुद्राष्टकम(Shiva Rudrastakam) श्री रामचरितमानस महाकाव्य ग्रन्थ से

श्री रुद्राष्टकम हिंदी अर्थ सहित - Devnagari (sanskrit) Rudrashtak Rudrashtakam with hindi meaning
महाकवि तुलसीदास द्वारा रचित श्री रुद्राष्टकम(Shiva Rudrastakam) श्री रामचरितमानस महाकाव्य ग्रन्थ से
महाकवि तुलसी दास द्वारा रचित श्री रुद्राष्टकम(Shiva Rudrastakam) श्री राम चरित मानस महा काव्य ग्रन्थ से


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महान्यायवादी मुकुल रोहतगी की नैतिकता



स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर परसों मैंने समाचार पढ़ा कि भारत के महान्यायवादी मुकुल रोहतगी कहते है कि शराब कंपनियों की वकालत इसलिए कर रहे है कि शराब कंपनियां उनकी पुरानी क्लाइंट है और सरकार से अनुमति लेकर वह केरल सरकार के विरूद्ध सुप्रीम कोर्ट में पैरवी है। 
निश्चित रूप से अगर सरकार से अनुमति लेकर भी अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी शराब कम्पनियों की पैरवी कर रहे है तो भी उनका कृत्य सर्वथा अनुचित एवं निंदनीय है। अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी भारत सरकार के वकील होकर शराब कंपनियों की ओर से भारत सरकार के आधीन के  केरल राज्य की सरकार के विरुद्ध वकालत कर रहे हैं। अगर उनके यही क्लाइंट भारत सरकार के विरुद्ध भी उन्हें वकील चुनते तो क्या वो भारत सरकार के विरूद्ध भी प्राइवेट शराब कम्पनियों की करते? उन्हें अपनी निष्ठां जाहिर करनी चाहिए कि वे 16 हजार की फीस के साथ भोकाल देने वाली भारत सरकार के वकील है या करोडो की फीस देने वाले अपने पुराने क्लाइंट के वकील है।
सरकारी वकालत में रूतबा तो होता है किन्तु प्राइवेट प्रेक्टिस जैसी इनकम नहीं होती है। मुकुल रोहतगी जैसे वकील प्राइवेट क्लाइंट से प्रतिदिन की बहस पर 1 करोड़ रूपये लेते है किन्तु सरकार उन्हें मात्र 16000 रूपये देती है किन्तु करोडो रूपये की फीस में "महान्यायवादी" का जलवा नहीं होता है। महान्यायवादी रोहतगी साहब न पद का मोह छोड़ पा रहे है और न ही प्राइवेट प्रेक्टिस का, जिस कारण करोड़ो  की फीस के चक्कर में सरकार के विरूद्ध ही सुप्रीम कोर्ट में जिरह कर रहे है। 
स्वतंत्रता दिवस पर जैसी स्वतंत्रता अटार्नी जनरल रोहतगी साहब को मिली है ऐसी ही स्वतंत्रता भारत सरकार के तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी को भी मिलेगी कि  सरकारी जॉब  साथ एक दो साइड बिजीनेस  इस मंहगाई  के दौर में वो भी कर ले।  :)

शराब लॉबी की पैरवी करने पर घिरे अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी By एबीपी न्यूज़



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॥ श्री भवानी अष्टकं ॥ (Shri Bhavani Ashtakam)



न तातो न माता न बन्धुर्न दाता 
न पुत्रो न पुत्री न भूत्यो न भर्ता।
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥१॥
 
Na tato, na mata, na bandhur na data,
Na putro, na putri , na bhrutyo , na bharta,
Na jayaa na Vidhya, na Vrutir mamaiva,
Gatistwam, Gatisthwam Twam ekaa Bhavani.


Neither the mother nor the father,
Neither the relation nor the friend,
Neither the son nor the daughter,
Neither the servant nor the husband,
Neither the wife nor the knowledge,
And neither my sole occupation,
Are my refuges that I can depend, Oh, Bhavani,
So you are my refuge and my only refuge, Bhavani.

******


भवाब्धावपारे महादु:खभीरु:
पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्त:।
कुसंसारपाशप्रबद्ध: सदाहं 

गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥२॥
Bhavabdhava pare, Maha dhukhah Bheeruh,
Papaata prakami , pralobhi pramatah,
Kusamsara pasha prabadhah sadaham,
gatisthwam, gatisthwam thwam ekaa bhavani..


I am in this ocean of birth and death,
I am a coward, who dare not face sorrow,
I am filled with lust and sin,
I am filled with greed and desire,
And tied I am, by the this useless life that I lead,
So you are my refuge and my only refuge, Bhavani.


******

न जानामि दानं न च ध्यानयोगं
न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम् ।
न जानामि पूजां न च न्यासयोगम् 
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥३॥
Na Janaami Dhanam, Na cha dhyana yogam,
Na janami tantram, na cha stotra mantram,
Na janami poojam, na cha nyasa yogam,
gatistwam, gatistwam twam ekaa bhavani..


Neither do I know how to give,
Nor do I know how to meditate,
Neither do I know Thanthra*,
Nor do I know stanzas of prayer,
Neither do I know how to worship,
Nor do I know the art of yoga,
So you are my refuge and my only refuge, Bhavani
* A form of worship by the yogis


******

न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थ
न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित् ।
न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातर्गतिस्तवं 

गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥४॥
Na janami Punyam, Na janami theertam,
Na janami muktim, layam vaa kadachit,
Na janami bhaktim, vrutham vaapi maatha,
gatistwam, gatistwam twam ekaa bhavani.

Know I not how to be righteous,
Know I not the way to the places sacred,
Know I not methods of salvation,
Know I not how to merge my mind with God,
Know I not the art of devotion,
Know I not how to practice austerities, Oh, mother,
So you are my refuge and my only refuge, Bhavani


******

कुकर्मी कुसङ्गी कुबुद्धि: कुदास:
कुलाचारहीन: कदाचारलीन:।
कुदृष्टि: कुवाक्यप्रबन्ध: सदाहम् 

गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥५॥
Kukarmi, kusangi, kubudhih, kudhasah,
Kulachara heenah, kadhachara leenah,
Kudrushtih, kuvakya prabandhah, sadaham,
gatisthwam, gatisthwam thwam ekaa bhavani.

Perform I bad actions,
Keep I company of bad ones,
Think I bad and sinful thoughts,
Serve I Bad masters,
Belong I to a bad family,
Immersed I am in sinful acts,
See I with bad intentions,
Write I collection of bad words,
Always and always,
So you are my refuge and my only refuge, Bhavani.



******
 
प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं
दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित् ।
न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये 

गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥६॥
 Prajesam, Ramesam, Mahesam, Suresam,
Dhinesam, Nisitheswaram vaa kadachit,
Na janami chanyath sadaham saranye,
gatisthwam, gatisthwam thwam ekaa bhavani.


Neither Do I know the creator,
Nor the Lord of Lakshmi,
Neither do I know the lord of all,
Nor do I know the lord of devas,
Neither do I know the God who makes the day,
Nor the God who rules at night,
Neither do I know any other Gods,
Oh, Goddess to whom I bow always,
So you are my refuge and my only refuge, Bhavani


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विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे
जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये।
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि

गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥७॥
Vivadhe, Vishadhe, pramadhe, pravase,
Jale cha anale parvathe shatru madhye,
Aranye, saranye sada maam prapahi,
gatistwam, gatistwam twam ekaa bhavani.

 
While I am in a heated argument,
While I am immersed in sorrow,
While I am suffering an accident,
While I am travelling far off,
While I am in water or fire,
While I am on the top of a mountain,
While I am surrounded by enemies,
And while I am in a deep forest,
Oh Goddess, I always bow before thee,
So you are my refuge and my only refuge, Bhavani


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अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तो
महाक्षीणदीन: सदा जाडयवक्त्र:।
विषत्तौ प्रविष्ट: प्रणष्ट: सदाहं 

गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥८॥
Anadho, dharidro, jara roga yukto,
Maha Ksheenah dheena, sada jaadya vaktrah,
Vipatou pravishtah, pranshatah sadhaham,
gatisthwam, gatisthwam thwam ekaa bhavani.

While being an orphan,
While being extremely poor,
While affected by disease of old age,
While I am terribly tired,
While I am in a pitiable state,
While I am being swallowed by problems,
And While I suffer serious dangers,
I always bow before thee,
So you are my refuge and only refuge, Bhavanid


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श्रीमदाध्यशङ्कराचार्य विरचित श्री  भवानी अष्टकं

Shri Bhavani Ashtakam by Sri Adi Shankaracharya


Shri Bhavani Durga Maa Devi Adi Shankaracharya

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॥ श्री भवानी अष्टकं ॥


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॥ शिव मानसपूजा ॥ - भावार्थ सहित (Shiv Manas Puja)




आदि गुरु शंकराचार्यद्वारा रचित शिव मानस पूजा शिवकी एक अनूठी स्तुति है । यह स्तुति शिव भक्ति मार्गको अत्यधिक सरलताके साथ ही एक अत्यंत गूढ रहस्यको समझाता है । शिव मात्र भक्तिद्वारा प्राप्त हो सकते हैं, उनकी भक्ति हेतु बाह्य आडम्बरकी कोई आवश्यकता नहीं है । इस स्तुतिमें हम प्रभूको भक्तिद्वारा मानसिक रूपसे कल्पनाकी हुई वस्तुएं समर्पित करते हैं । हम उन्हें रत्न जडित सिहांसनपर आसीन करते हैं, वस्त्र, नैवेद्य तथा भक्ति अर्पण करते हैं; परन्तु ये सभी हम स्थूल रूपमें नहीं अपितु मानसिक रूपमें अर्पण करते हैं । इस प्रकार हम स्वयंको शिवको समर्पित कर शिव स्वरूपमें विलीन हो जाते हैं ।

रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं।
नाना रत्न विभूषितम्‌ मृग मदामोदांकितम्‌ चंदनम॥


जाती चम्पक बिल्वपत्र रचितं पुष्पं च धूपं तथा।
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितम्‌ गृह्यताम्‌॥1॥


मैं अपने मन में ऐसी भावना करता हूँ कि हे पशुपति देव! संपूर्ण रत्नों से निर्मित इस सिंहासन पर आप विराजमान हों। हिमालय के शीतल जल से मैं आपको स्नान करवा रहा हूँ। स्नान के उपरांत रत्नजड़ित दिव्य वस्त्र आपको अर्पित है। केसर-कस्तूरी में बनाया गया चंदन का तिलक आपके अंगों पर लगा रहा हूँ।
जूही, चंपा, बिल्वपत्र आदि की पुष्पांजलि आपको समर्पित है। सभी प्रकार की सुगंधित धूप और दीपक मानसिक प्रकार से आपको दर्शित करवा रहा हूँ, आप ग्रहण कीजिए।

सौवर्णे नवरत्न खंडरचिते पात्र धृतं पायसं।
भक्ष्मं पंचविधं पयोदधि युतं रम्भाफलं पानकम्‌॥


शाका नाम युतं जलं रुचिकरं कर्पूर खंडौज्ज्वलं।
ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु॥2॥


मैंने नवीन स्वर्णपात्र, जिसमें विविध प्रकार के रत्न जड़ित हैं, में खीर, दूध और दही सहित पाँच प्रकार के स्वाद वाले व्यंजनों के संग कदलीफल, शर्बत, शाक, कपूर से सुवासित और स्वच्छ किया हुआ मृदु जल एवं ताम्बूल आपको मानसिक भावों द्वारा बनाकर प्रस्तुत किया है। हे कल्याण करने वाले! मेरी इस भावना को स्वीकार करें।

छत्रं चामर योर्युगं व्यजनकं चादर्शकं निमलं।
वीणा भेरि मृदंग काहलकला गीतं च नृत्यं तथा॥


साष्टांग प्रणतिः स्तुति-र्बहुविधा ह्येतत्समस्तं ममा।
संकल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो॥3॥


हे भगवन, आपके ऊपर छत्र लगाकर चँवर और पंखा झल रहा हूँ। निर्मल दर्पण, जिसमें आपका स्वरूप सुंदरतम व भव्य दिखाई दे रहा है, भी प्रस्तुत है। वीणा, भेरी, मृदंग, दुन्दुभि आदि की मधुर ध्वनियाँ आपको प्रसन्नता के लिए की जा रही हैं। स्तुति का गायन, आपके प्रिय नृत्य को करके मैं आपको साष्टांग प्रणाम करते हुए संकल्प रूप से आपको समर्पित कर रहा हूँ। प्रभो! मेरी यह नाना विधि स्तुति की पूजा को कृपया ग्रहण करें।



आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं।
पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः॥


संचारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो।
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्‌॥4॥


हे शंकर जी, मेरी आत्मा आप हैं। मेरी बुद्धि आपकी शक्ति पार्वती जी हैं। मेरे प्राण आपके गण हैं। मेरा यह पंच भौतिक शरीर आपका मंदिर है। संपूर्ण विषय भोग की रचना आपकी पूजा ही है। मैं जो सोता हूँ, वह आपकी ध्यान समाधि है। मेरा चलना-फिरना आपकी परिक्रमा है। मेरी वाणी से निकला प्रत्येक उच्चारण आपके स्तोत्र व मंत्र हैं। इस प्रकार मैं आपका भक्त जिन-जिन कर्मों को करता हूँ, वह आपकी आराधना ही है।

कर चरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम्‌।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व जय जय करणाब्धे श्री महादेव शम्भो॥5॥

हे परमेश्वर! मैंने हाथ, पैर, वाणी, शरीर, कर्म, कर्ण, नेत्र अथवा मन से अभी तक जो भी अपराध किए हैं। वे विहित हों अथवा अविहित, उन सब पर आपकी क्षमापूर्ण दृष्टि प्रदान कीजिए। हे करुणा के सागर भोले भंडारी श्री महादेवजी, आपकी जय हो। जय हो।

इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचिता शिवमानसपूजा सम्पूर्णं

शिवमानसपूजा - भावार्थ सहित (Shiv Manas Puja)


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॥ मृतसञ्जीवन स्तोत्रम् ॥ Mritasanjeevani Stotram



मृतसञ्जीवन स्तोत्रम्
Mritasanjeevani Stotram
एवमारध्य गौरीशं देवं मृत्युञ्जयमेश्वरं।
मृतसञ्जीवनं नाम्ना कवचं प्रजपेत् सदा ॥१॥
evamaradhy gaurishan devan mrityungjayameshvaran ।
mritasangjivanan namna kavachan prajapet sada ॥

गौरीपति मृत्युञ्जयेश्र्वर भगवान् शंकर की विधिपूर्वक आराधना करने के पश्र्चात भक्तको सदा मृतसञ्जीवन नामक कवचका सुस्पष्ट पाठ करना चाहिये ॥१॥ 

सारात् सारतरं पुण्यं गुह्याद्गुह्यतरं शुभं ।  
महादेवस्य कवचं मृतसञ्जीवनामकं ॥ २॥
sarat sarataran punyan guhyadguhyataran shubhan । 
mahadevasy kavachan mritasangjivanamakan ॥
महादेव भगवान् शङ्कर का यह मृतसञ्जीवन नामक कवच का तत्त्वका भी तत्त्व है, पुण्यप्रद है गुह्य और मङ्गल प्रदान करनेवाला है ॥२॥
समाहितमना भूत्वा शृणुष्व कवचं शुभं । 
शृत्वैतद्दिव्य कवचं रहस्यं कुरु सर्वदा ॥३॥
samahitamana bhootva shrinushv kavachan shubhan । 
 shritvaitaddivy kavachan rahasyan kuru sarvada ॥
[आचार्य शिष्य को उपदेश करते हैं कि – हे वत्स! ] अपने मनको एकाग्र करके इस मृतसञ्जीवन कवच को सुनो । यह परम कल्याणकारी दिव्य कवच है । इसकी गोपनीयता सदा बनाये रखना ॥३॥
वराभयकरो यज्वा सर्वदेवनिषेवितः ।  
मृत्युञ्जयो महादेवः प्राच्यां मां पातु सर्वदा ॥४॥
varabhayakaro yajva sarvadevanishevitah । 
mrityungjayo mahadevah prachyan man patu sarvada ॥
जरा से अभय करने वाले, निरन्तर यज्ञ करनेवाले, सभी देवतओं से आराधित हे मृत्युञ्जय महादेव ! आप पर्व-दिशामें मेरी सदा रक्षा करें ॥४॥

दधाअनः शक्तिमभयां त्रिमुखं षड्भुजः प्रभुः। 
सदाशिवोऽग्निरूपी मामाग्नेय्यां पातु सर्वदा ॥५॥
dadhaanah shaktimabhayan trimukhan shadbhujah prabhuh । 
sadashivo-a-gniroopi mamagneyyan patu sarvada ॥
अभय प्रदान करने वाली शक्ति को धारण करने वाले, तीन मुखोंवाले तथा छ: भुजओं वाले, अग्रिरूपी प्रभु सदाशिव अग्रिकोण में मेरी सदा रक्षा करें ॥५॥
अष्टदसभुजोपेतो दण्डाभयकरो विभुः । 
यमरूपि महादेवो दक्षिणस्यां सदावतु ॥६॥
ashtadasabhujopeto dandabhayakaro vibhuh । 
yamaroopi mahadevo dakshinnasyan sadavatu ॥
अट्ठारह भुजाओं से युक्त, हाथ में दण्ड और अभयमुद्रा धारण करनेवाले, सर्वत्र व्याप्त यमरुपी महादेव शिव दक्षिण-दिशामें मेरी सदा रक्षा करें ॥६॥
खड्गाभयकरो धीरो रक्षोगणनिषेवितः । 
रक्षोरूपी महेशो मां नैरृत्यां सर्वदावतु ॥७॥
khadgabhayakaro dhiro rakshogannanishevitah । 
rakshoroopi mahesho man nairrityan sarvadavatu ॥
हाथमें खड्ग और अभयमुद्रा धारण करने वाले, धैर्यशाली, दैत्यगणों से आराधित रक्षोरुपी महेश नैर्ऋत्यकोण में मेरी सदा रक्षा करें ॥७॥
पाशाभयभुजः सर्वरत्नाकरनिषेवितः ।
वरुणात्मा महादेवः पश्चिमे मां सदावतु ॥८॥
pashabhayabhujah sarvaratnakaranishevitah । 
varunatma mahadevah pashchime man sadavatu ॥
हाथमें अभयमुद्रा और पाश धाराण करनेवाले, शभी रत्नाकरों से सेवित, वरुणस्वरूप महादेव भगवान् शंकर पश्चिम- दिशा में मेरी सदा रक्षा करें ॥८॥

गदाभयकरः प्राणनायकः सर्वदागतिः ।
वायव्यां मारुतात्मा मां शङ्करः पातु सर्वदा ॥९॥
gadabhayakarah prannanayakah sarvadagatih । 
vayavyan marutatma man shangkarah patu sarvada ॥
हाथों में गदा और अभयमुद्रा धारण करनेवाले, प्राणो के रक्षक, सर्वदा गतिशील वायुस्वरूप शंकरजी वायव्यकोण में मेरी सदा रक्षा करें ॥९॥

शङ्खाभयकरस्थो मां नायकः परमेश्वरः ।
सर्वात्मान्तरदिग्भागे पातु मां शङ्करः प्रभुः ॥१०॥
shangkhabhayakarastho man nayakah parameshvarah । 
sarvatmantaradigbhage patu man shangkarah prabhuh ॥
हाथों में शंख और अभयमुद्रा धारण करने वाले नायक (सर्वमार्गद्रष्टा) सर्वात्मा सर्वव्यापक परमेश्वर भगवान् शिव समस्त दिशाओं के मध्यमें मेरी रक्षा करें ॥१०॥

शूलाभयकरः सर्वविद्यानमधिनायकः ।
ईशानात्मा तथैशान्यां पातु मां परमेश्वरः ॥११॥
shoolabhayakarah sarvavidyanamadhinayakah । 
eeshanatma tathaishanyan patu man parameshvarah ॥
हाथों में शंख और अभयमुद्रा धारण करनेवाले, सभी विद्याओं के स्वामी, ईशानस्वरूप भगवान् परमेश्व शिव ईशानकोण में मेरी रक्षा करें ॥११॥
ऊर्ध्वभागे ब्रःमरूपी विश्वात्माऽधः सदावतु ।
शिरो मे शङ्करः पातु ललाटं चन्द्रशेखरः॥१२॥
oordhvabhage brahmaroopi vishvatma-a-dhah sadavatu । 
shiro me shangkarah patu lalatan chandrashekharah ॥
ब्रह्मरूपी शिव मेरी ऊर्ध्वभाग में तथा विश्वात्मस्वरूप शिव अधोभागमें मेरी सदा रक्षा करें । शंकर मेरे सिर की और चन्द्रशेखर मेरे ललाट की रक्षा करें ॥१२॥

भूमध्यं सर्वलोकेशस्त्रिणेत्रो लोचनेऽवतु ।
भ्रूयुग्मं गिरिशः पातु कर्णौ पातु महेश्वरः ॥१३॥
bhoomadhyan sarvalokeshastrinetro lochane-a-vatu । 
bhrooyugman girishah patu karnau patu maheshvarah ॥
मेरे भौंहों के मध्य में सर्वलोकेश और दोनों नेत्रों की त्रिनेत्र भगवान् शंकर रक्षा करें, दोनों भौंहों की रक्षा गिरिश एवं दोनों कानों को रक्षा भगवान् महेश्वर करें ॥१३॥

नासिकां मे महादेव ओष्ठौ पातु वृषध्वजः ।
जिह्वां मे दक्षिणामूर्तिर्दन्तान्मे गिरिशोऽवतु ॥१४॥
nasikan me mahadev oshthau patu vrishadhvajah । 
 jihvan me dakshinamoortirdantanme girisho-a-vatu ॥
महादेव मेरी नासीकाकी तथा वृषभध्वज मेरे दोनों ओठों की सदा रक्षा करें । दक्षिणामूर्ति मेरी जिह्वा की तथा गिरिश मेरे दाँतों की रक्षा करें ॥१४॥


मृतुय्ञ्जयो मुखं पातु कण्ठं मे नागभूषणः।
पिनाकि मत्करौ पातु त्रिशूलि हृदयं मम ॥१५॥
mrituyngjayo mukhan patu kanthan me nagabhooshannah । 
pinaki matkarau patu trishooli hridayan mam ॥
मृत्युञ्जय मेरे मुखकी एवं नागभूषण भगवान् शिव मेरे कण्ठकी रक्षा करें । पिनाकी मेरे दोनों हाथोंकी तथा त्रिशूली मेरे हृदय की रक्षा करें ॥१५॥
पञ्चवक्त्रः स्तनौ पातु उदरं जगदीश्वरः ।  
नाभिं पातु विरूपाक्षः पार्श्वौ मे पार्वतीपतिः ॥१६॥
pangchavaktrah stanau patu udaran jagadishvarah । 
 nabhin patu viroopakshah parshvau me parvatipatih ॥
पञ्चवक्त्र मेरे दोनों स्तनो की और जगदीश्वर मेरे उदरकी रक्षा करें । विरूपाक्ष नाभिकी और पार्वतीपति पार्श्वभागकी रक्षा करें ॥१६॥
कटद्वयं गिरीशौ मे पृष्ठं मे प्रमथाधिपः।
गुह्यं महेश्वरः पातु ममोरू पातु भैरवः ॥१७॥
katadvayan girishau me prishthan me pramathadhipah । 
guhyan maheshvarah patu mamoroo patu bhairavah ॥
गिरीश मेरे दोनों कटिभाग की तथा प्रमथाधिप पृष्टभाग की रक्षा करें । महेश्वर मेरे गुह्यभाग की और भैरव मेरे दोनों ऊरुओं की रक्षा करें ॥१७॥
जानुनी मे जगद्दर्ता जङ्घे मे जगदम्बिका ।  
पादौ मे सततं पातु लोकवन्द्यः सदाशिवः ॥१८॥
januni me jagaddarta jangghe me jagadambika । 
padau me satatan patu lokavandyah sadashivah ॥
जगद्धर्ता मेरे दोनों घुटनों की, जगदम्बिका मेरे दोनों जंघोकी तथा लोकवन्दनीय सदाशिव निरन्तर मेरे दोनों पैरोंकी रक्षा करें ॥१८॥
गिरिशः पातु मे भार्यां भवः पातु सुतान्मम ।
मृत्युञ्जयो ममायुष्यं चित्तं मे गणनायकः ॥१९॥
girishah patu me bharyan bhavah patu sutanmam । 
mrityungjayo mamayushyan chittan me gannanayakah ॥
गिरीश मेरी भार्याकी रक्षा करें तथा भव मेरे पुत्रोंकी रक्षा करें । मृत्युञ्जय मेरे आयुकी गणनायक मेरे चित्तकी रक्षा करें ॥१९॥
सर्वाङ्गं मे सदा पातु कालकालः सदाशिवः ।
एतत्ते कवचं पुण्यं देवतानां च दुर्लभम् ॥२०॥
sarvanggan me sada patu kalakalah sadashivah । 
etatte kavachan punyan devatanan ch durlabham ॥
कालोंके काल सदाशिव मेरे सभी अंगोकी रक्षा करें । [ हे वत्स ! ] देवताओंके लिये भी दुर्लभ इस पवित्र कवचका वर्णन मैंने तुमसे किया है ॥२०॥

मृतसञ्जीवनं नाम्ना महादेवेन कीर्तितम् ।  
सह्स्रावर्तनं चास्य पुरश्चरणमीरितम् ॥२१॥
mritasangjivanan namna mahadeven keertitam। 
sahsravartanan chasy purashcharannamiritam ॥
महादेवजीने मृतसञ्जीवन नामक इस कवचको कहा है । इस कवचकी सहस्त्र आवृत्ति को पुरश्चरण कहा गया है ॥२१॥

यः पठेच्छृणुयान्नित्यं श्रावयेत्सु समाहितः ।  
सकालमृत्युं निर्जित्य सदायुष्यं समश्नुते ॥२२॥
yah pathechchhrinuyannityan shravayetsu samahitah । 
sakalamrityun nirjity sadayushyan samashnute ॥
जो अपने मन को एकाग्र करके नित्य इसका पाठ करता है, सुनता अथावा दूसरों को सुनाता है, वह अकाल मृत्युको जीतकर पूर्ण आयुका उपयोग करता है ॥ २२॥
हस्तेन वा यदा स्पृष्ट्वा मृतं सञ्जीवयत्यसौ ।  
आधयोव्याध्यस्तस्य न भवन्ति कदाचन ॥२३॥
hasten va yada sprishtva mritan sangjivayatyasau । 
 aadhayovyadhyastasy n bhavanti kadachan ॥
जो व्यक्ति अपने हाथ से मरणासन्न व्यक्ति के शरीर का स्पर्श करते हुए इस मृतसञ्जीवन कवचका पाठ करता है, उस आसन्नमृत्यु प्राणी के भीतर चेतनता आ जाती है । फिर उसे कभी आधि-व्याधि नहीं होतीं ॥२३॥

कालमृयुमपि प्राप्तमसौ जयति सर्वदा ।  
अणिमादिगुणैश्वर्यं लभते मानवोत्तमः ॥२४॥
kalamriyumapi praptamasau jayati sarvada । 
animadigunaishvaryan labhate manavottamah ॥
यह मृतसञ्जीवन कवच कालके गाल में गये हुए व्यक्तिको भी जीवन प्रदान कर ‍देता है और वह मानवोत्तम अणिमा आदि गुणोंसे युक्त ऐश्वर्यको प्राप्त करता है ॥२४॥

युद्दारम्भे पठित्वेदमष्टाविशतिवारकं ।  
युद्दमध्ये स्थितः शत्रुः सद्यः सर्वैर्न दृश्यते ॥२५॥
yuddarambhe pathitvedamashtavishativarakan । 
yuddamadhye sthitah shatruh sadyah sarvairn drishyate ॥
युद्ध आरम्भ होनेके पूर्व जो इस मृतसञ्जीवन कवचका २८ बार पाठ करके रणभूमिमें उपस्थित होता है, वह उस समय सभी शत्रुऔंसे अदृश्य रहता है ॥२५॥
न ब्रह्मादीनि चास्त्राणि क्षयं कुर्वन्ति तस्य वै । 
विजयं लभते देवयुद्दमध्येऽपि सर्वदा ॥२६॥
n brahmadini chastrani kshayan kurvanti tasy vai । 
vijayan labhate devayuddamadhye-a-pi sarvada ॥
यदि देवतऔंके भी साथ युद्ध छिड जाय तो उसमें उसका विनाश ब्रह्मास्त्र भी नही कर सकते, वह विजय प्राप्त करता है ॥२६॥

प्रातरूत्थाय सततं यः पठेत्कवचं शुभं ।  
अक्षय्यं लभते सौख्यमिह लोके परत्र च ॥२७॥
pratarootthay satatan yah pathetkavachan shubhan । 
 akshayyan labhate saukhyamih loke paratr ch ॥
जो प्रात:काल उठकर इस कल्याणकारी कवच सदा पाठ करता है, उसे इस लोक तथा परलोकमें भी अक्षय्य सुख प्राप्त होता है ॥२७॥

सर्वव्याधिविनिर्मृक्तः सर्वरोगविवर्जितः ।  
अजरामरणो भूत्वा सदा षोडशवार्षिकः ॥२८॥
sarvavyadhivinirmriktah sarvarogavivarjitah ।  
ajaramarano bhootva sada shodashavarshikah ॥
वह सम्पूर्ण व्याधियोंसे मुक्त हो जाता है, सब प्रकारके रोग उसके शरीरसे भाग जाते हैं । वह अजर-अमर होकर सदाके लिये सोलह वर्षवाला व्यक्ति बन जाता है ॥२८॥

विचरव्यखिलान् लोकान् प्राप्य भोगांश्च दुर्लभान् । 
तस्मादिदं महागोप्यं कवचम् समुदाहृतम् ॥२९॥
vicharavyakhilan lokan prapy bhoganshch durlabhan । 
tasmadidan mahagopyan kavacham samudahritam ॥
इस लोकमें दुर्लभ भोगों को प्राप्त कर सम्पूर्ण लोकोंमें विचरण करता रहता है । इसलिये इस महागोपनीय कवच को मृतसञ्जीवन नाम से कहा है ॥२९॥

मृतसञ्जीवनं नाम्ना देवतैरपि दुर्लभम् ॥३०॥
mritasangjivanan namna devatairapi durlabham ॥
यह देवतओं के लिय भी दुर्लभ है ॥३०॥



  ॥ इति वसिष्ठ कृत मृतसञ्जीवन स्तोत्रम् ॥
  ॥ iti vasishth krit mritasangjivan stotram ॥
॥ इस प्रकार मृतसञ्जीवन कवच सम्पूर्ण हुआ ॥

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