प्राणायाम के नियम, लाभ एवं महत्व



श्वास-पश्वास की गति को यथाशक्ति अनुसार नियंत्रित करना प्राणायाम कहलाता है। प्राणायाम के चार प्रकार है :-
  1. बाह्यवृति
  2. आभ्यन्तरवृति
  3. स्तम्भवृत्ति
  4. बाह्याभ्यन्तर विषयाक्षेपि
बाह्यवृति प्राणायाम


विधि : 
  1.  सिद्वासन वा पद्मासन में विधिपूर्वक बैठकर श्वास को एक ही बार में यथाशक्ति बहार निकाल दीजिए।
  2. बाहर निकालकर मूल बंध,उड्डीयान बांध व जालन्धर बांध लगाकर श्वास को यथाशक्ति बहार रोककर रखे।
  3. जब श्वास लेने की जरुरत हो तो बंधो को हटाकर धीरे धीरे स्वास ले।
  4. भीतर ले कर उसे बिना रोके पुनः पूर्ववत् श्वसन क्रिया कीजिये। इसे 3 से लेकर 21 बार कर सकते हैं।
लाभ: यह प्रणायाम हानीकारक नहीं है। जठरागनी प्रदीप्त होती है।उदर रोगो में लाभप्रद है।

आभ्यन्तरवृति प्रणायाम 
विधि:
  1. ध्यानात्मक आसन में बैठकर श्वास को बहार निकालकर पून: जितना भर सकते हैं, अन्दर भर लीजिये। छाती ऊपर उभरी हुई तथा पेट का निचे वाला भाग भीतर सिकुड़ा हुवा होगा। श्वास अंदर भर कर जालंधर बंध व् मूलबन्ध लगाए।
  2. यथाशक्ति श्वास को अंदर रोककर रखिये। जब छोड़ने की इच्छा हो तब जालंधर बन्ध को हटाकर धीरे-धीरे श्वास को बाहर निकाल दीजिये।
लाभ: दमा के रोगियो के एवं फेफड़ा सम्बन्धि के लिये अत्यंत लाभदाई है।शरीर में शक्ति,कान्ति की वृद्धि करता है।

स्तम्भवृत्ति प्राणायाम 
विधि: इसमें श्वास को जहा का तह रोकना पड़ता है। अपने शक्ति अनुसार रोक कर बाहर निकाल दीजिये। वापस सामान्य होने पर जहाँ का तहाँ रोकिए।

बाह्याभ्यन्तर विषयाक्षेपी 
विधि :जब श्वास भीतर से बाहर आये, तब बाहर ही कुछ-कुछ रोकता रहे और जब बाहर से भीतर जाये तब उसको भीतर ही थोड़ा-थोड़ा रोकता रहे.स्त्रियाँ भी इसी प्रकार योगाभ्यास कर सकते है।

प्राणायाम की सम्पूर्ण प्रक्रियाए :  प्रत्येक प्राणायाम का अपना एक विशेष महत्व है,सभी प्राणायामों का वयक्ति प्रतिदिन अभ्यास नहीं कर सकता। इस पूरी प्रक्रिया में लगभद २० मिनिट का समय लगता है। 

भस्त्रिका प्राणायाम (Bhastrika Pranayam) 
 
ध्यानत्मक आसन में बैठकर दोनों नासिकाओं से श्वास को पूरा अन्दर डायफ्राम तक भरना एव बाहर पूरी शक्ति के साथ छोड़ना भस्त्रिका प्राणायाम कहते है। प्रणायाम को अपनी शक्ति अनुसार तीन प्रकार से किया जाता है। मंद गति से,मध्यम गति से तथा तीव्र गति से। इस प्राणायम को ३-५ मिनिट तक करना चाहिए। दिव्य संकल्प से साथ किया हुवा प्राणायाम विशेष लाभदाई है।
सूचना
  • जिनको हदय रोग हो , उन्हें तीव्र गति से ये प्राणायाम नहीं करना चाहिए। इस प्राणायाम के दौरान श्वास को अन्दर भरे तब पैट को नहीं फुलाना चाहिए। ग्रीष्म ऋतु में अल्प मात्रा में करे। इस प्राणायाम को ३ से लेकर ५ मिनिट तक रोज करे।
  • प्राणायाम की क्रियाओ को करते समय आँखों को बन्द रखे और मन में प्रत्येक श्वास-पश्वास के साथ ओ३म का मानसिक रूप से चिन्तन व् मनन करना चाहिये। 
लाभ :  
  1. सर्दी-जुकाम ,एलर्जी,श्वास रोग,दमा,पुराना नजला,साइनस आदि समस्त कफ रोग दूर होते है।
  2. थाइरोड व् टान्सिल आदि गले के समस्त रोग रोग दूर होता है। 
  3. प्राण व मन स्थिर होता है।
कपालभाति प्राणायाम (Kapalbhati)

कपालभाति प्राणायाम (Kapalbhati)
 
  • कपाल अर्थात मश्तिष्क और भाति का अर्थ होता है दीप्ती,आभा,तेज,प्रकाश आदि। कपालभाति में मात्र रेचक अर्थात श्वास को शक्ति पूर्वक बाहर छोड़ने में ही पूरा ध्यान दिया जाता है। श्वास को भरने के लिए प्रयत्न नहीं करते, अपितु सहजरूप से जितना श्वास अन्दर चला जाता है,जाने देते है,पूरी एकाग्रता श्वास को बाहर छोड़ने में ही होती है ऐसा करते हुए स्वाभाविक रूप से पेट में भि अकुंशन व् प्रशारण की क्रिया होती है। इस प्राणायाम को 5 मिनिट तक अवश्य ही करना चाहिए।
  • कपालभाति प्राणायाम को करते समय मन में ऐसा विचार करना चाहिए की जैसे ही मैं श्वास को बाहर निकल रहा हूँ, इस पश्वास के साथ मेरे शरीर के समस्त रोग बाहर निकल रहे है।
  • तीन मिनिट से प्रारम्भ करके पांच मिनिट तक इस प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। प्रणायाम करते समय जब-जब थकान अनुभव हो तब-तब बीच में विश्राम कर ले। प्रारम्भ में पेट या कमर में दर्द हो सकता है। वो धीरे धीरे अपने आप मिट जायेगा।
लाभ:
  1. मष्तिष्क पर तेज,आभा व् सौन्दर्य बढ़ता है।
  2. हदय,फेफड़ो एवं समस्त कफ रोग,दम,श्वास,एलर्जी,साइनस आदि रोग नष्ट होते है।
  3. मधुमेह,मोटापा, गैस ,कब्ज,किडनी व् प्रोस्ट्रेट से संबधित सभी रोग दूर होते है।
  4. कब्ज जैसे रोग इस प्राणायाम से रोज ५ मिनिट तक प्रतिदिन करने से मिट जाते है। मधुमेह नियमित होता है तथा मोटापा दूर होता है।
  5. मन स्थिर, शांत रहता है। जिससे डिप्रेशन आदि रोगो से लाभ मिलता है।
  6. इस प्राणायाम से यकृत,प्लीहा,आन्त्र, प्रोस्टेट एवं किडनी का आरोग्य विशेष रूप से बढ़ता है। दुर्बल आंतो का सबल बनाने के लिए यह प्राणायाम लाभदाई है। 
बाह्य प्राणायाम (Bahya Pranayam) 
  1. सिद्धासन या पद्मासन में विधिपूर्वक बैठकर श्वास को एक ही बार में यथाशक्ति बहार निकाल दीजिये।
  2. श्वास बाहर निकालकर मूलबंध, उड्डीयान बंध व जालन्धर बन्ध लगाकर श्वास को यथाशक्ति बाहर ही रोककर रखें।
  3. जब श्वास लेने की इच्छा हो तब बन्धो को हटाते हुए धीरे-धीरे श्वास लीजिए।
  4. श्वास भीतर लेकर उसे बिना रोके ही पुनः पूर्ववत् श्वसन क्रिया द्वारा बाहर निकाल दीजिये। इस प्रकार इसे 3 से लेकर 21 बार तक कर सकते हैं।
संकल्प: इस प्राणायाम में भी उक्त कपालभाति के समान श्वास को बाहर फेंकते हुए समस्त विकारों, दोषों को भी बाहर फेंका जा रहा है इस प्रकार की मानसिक चिन्तन धारा बहनी चाहिए। विचार-शक्ति जितनी अधिक प्रबल होगी समस्त कष्ट उतनी ही प्रबलता से दूर होंगे। 
लाभ: यह हानिरहित प्राणायाम है। इससे मन की चञ्चलता दूर होती है। जठराग्नि प्रदीप्त होती है। उधर रोगों में लाभप्रद है। बुद्धि सूक्ष्म व तीव्र होती है। शरीर का शोधक है। वीर्य की उधर्व गति करके स्वप्न-दोष, शीघ्रपतन आदि धातु-विकारों की निवृत्ति करता है। बाह्य प्राणायाम करने से पेट के सभी अवयवों पर विशेष बल पड़ता है तथा प्रारम्भ में पेट के कमजोर या रोगग्रस्त भाग में हल्का दर्द का भी अनुभव होता हैं। अतः पेट को विश्राम तथा आरोग्य देने के लिए त्रिबन्ध पूर्वक यह प्राणायाम करना चाहिए।
 अनुलोम-विलोम प्राणायाम (ANULOM-VILOM PRANAYAM) 
दाएँ हाथ को उठकर दाएँ हाथ के अंगुष्ठ के द्वारा दायाँ स्वर तथा अनामिका व मध्यमा अंगुलियों के द्वारा बायाँ स्वर बन्द करना चाहिए। हाथ की हथेली नासिका के सामने न रखकर थोड़ा ऊपर रखना चाहिए।
विधि: अनुलोम-विलोम प्राणायाम को बाए नासिका से प्रारम्भ करते है। अंगुष्ठ के माध्यम से दाहिनी नासिका को बंध करके बाई नाक से श्वास धीरे-धीरे अंदर भरना चाहिए। श्वास पूरा अंदर भरने पर, अनामिका व मध्यमा से वाम स्वर को बन्द करके दाहिनी नाक से पूरा श्वास बाहर छोड़ देना चाहिए। धीरे-धीरे श्वास-पश्वास की गति मध्यम और तीव्र करनी चाहिए। तीव्र गति से पूरी शक्ति के साथ श्वास अन्दर भरें व बाहर निकाले व अपनी शक्ति के अनुसार श्वास-प्रश्वास के साथ गति मन्द, मध्यम और तीव्र करें। तीव्र गति से पूरक, रेचक करने से प्राण की तेज ध्वनि होती है। श्वास पूरा बाहर निकलने पर वाम स्वर को बंद रखते हुए दाएँ नाक से श्वास पूरा अन्दर भरना चाहिए तथा अंदर पूरा भर जाने पर दाएँ नाक को बन्द करके बाए नासिका से श्वास बाहर छोड़ने चाहिए। यह एक प्रक्रिया पूरी हुई। इस प्रकार इस विधि को सतत करते रहना। थकान होने पर बीच में थोड़ा विश्राम करें फिर पुनः प्राणायाम करें। इस प्रकार तीन मिनिट से प्रारम्भ करके इस प्राणायाम को 10 मिनिट तक किया जा सकता है।
लाभ:
  1.  इस प्राणायाम से बहत्तर करोड़,बहत्तर लाख,दस हजार दो सौ दस नाड़ियाँ परिशुद्ध हो जाती है।
  2. संधि वात, कंप वात, गठिया, आम वात, स्नायु-दुर्बलता आदि समस्त वात रोग, धातु रोग, मूत्र रोग शुक्र क्षय, अम्ल पित्त, शीत पित्त आदि समस्त पित्त रोग, सर्दी, जुकाम, पुराना नजला, साइनस, अस्थमा, खाँसी, टान्सिल समस्त रोग दूर होते है।
  3. इस प्राणायाम का नियमित अभ्यास करने से तीन-चार माह में 30% लेकर 50% तक ब्लोकेज खुल जाते है। कोलेस्ट्रोल,एच. डी. एल. या एल. डी. एल. आदि की अनियमितताएं दूर हो जाती है। इस प्राणायाम से तन, मन, विचार छ संस्कार सब परिशुद्ध होते है।
भ्रामरी प्राणायाम (BHRAMRI PRANAYAM) 
भ्रामरी प्राणायाम (BHRAMARI PRANAYAMA)
भ्रामरी प्राणायाम (BHRAMARI PRANAYAMA)
विधि: श्वास पूरा अन्दर भर कर मध्यमा अंगुलियों से नासिका के मूल में आँख के पास दोनों ओर से थोड़ा दबाएँ, अंगूठों के द्वारा दोनों कानों को पूरा बन्द कर ले। अब भ्रमर की भाँति गुंजन करते हुए नाद रूप में ओ३म का उच्चारण करते हुए श्वास को बाहर छोडदे। इस तरह ये प्राणायाम कम से कम 3 बार अवश्य करें। अधिक से 11  से 12 बार तक कर सकते हो। मन में यह दिव्य संकल्प या विचार होना चाहिए की मुज पर भगवन की करुणा, शांति व आनंद बरस रहा है। इस प्रकार शुद्ध भाव से यह प्राणायाम करने से एक दिव्य ज्योति आगना चक्र में प्रकट होता है और ध्यान स्वतः होने लगता है।
लाभ: 
मानसिक तनाव, उत्तेजना, उच्च रक्तचाप, हृदयरोग आदि दूर होता है। ध्यान के लिए उपयोगी है।

ओङ्गकार जप
'ओङ्गकार' कोई व्यक्ति या आकृति विशेष नहीं है, अपितु दिव्य शक्ति है, जो इस ब्रह्माण्ड का संचालन कर रही है। सभी प्राणायाम करने के बाद श्वास-पश्वास पर अपने मन को टिकाकर प्राण के साथ उदगीथ 'ओ३म 'ध्यान करें। भगवान भ्रुवों की आकृति ओङ्गकारमयी बनाई है। यह पिण्ड तथा समस्त ब्रह्माण्ड ओङ्गकारमयी है। द्रष्टा बनकर दीर्घ व सूक्ष्म गति से श्वास को लेते व् छोड़ते समय श्वास की गति इतनी सूक्ष्म होनी चाहिए स्वयं को भी श्वास की ध्वनि की अनुभूति न हो। धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ाकर प्रयास करके 1 मिनिट में एक श्वास तथा एक पश्वाश चले। प्रारम्भ में श्वास के स्पर्श की अनुभूति मात्र नासिकाग्र पर होगी। धीरे-धीरे श्वास के गहरे स्पर्श को भी अनुभव कर सकेंगे। इस प्रकार कुछ समय तक श्वास के साथ साक्षी भाव पूर्वक ओङ्गकार जप करने से ध्यान स्वतः होने लगता है। प्रणव के साथ वेदों के महान मन्त्र गायत्री का भी अर्थपूर्वक जाप व ध्यान किया जा सकता है। सोते समय इस प्रकार ध्यान करते हुए सोना चाहिए ,ऐसा करने से निंद्रा भी योगमयी हो जाती है। दु:स्वप्न से भी छुटकारा मिलेगा तथा निंद्रा शीघ्र आएगी।

प्राणायाम के लाभ एवं महत्व

  1. हमारे शरीर में जितने ही चेष्टाएँ होती है उन सभी का प्राण से प्रत्यक्ष सम्बन्ध है। प्राणायाम से इन्द्रियों एवं मन के दोष दूर होते है।
  2. आसन से योगी को रजोगुण, प्राणायाम से पाप निवृति और प्रत्याहार से मानसिक विकार दूर रहते है। स्थूल रूप से प्राणायाम श्वास-प्रश्वास के व्यायाम की एक पद्धति है,जिस से फेफड़े मजबूत ,दीर्घ आयु का लाभ मिलता है।
  3. विभिन रोगो का निवारण प्राण-वायु का प्राणायाम द्वारा नियमन करने से सहजता पूर्वक किया जा सकता है।
  4. प्राणायाम द्वारा उद्वेग, चिंता, क्रोध, निराशा, भय और कामुकता आदि मनोविकार का समाधान सफलतापूर्वक किया जा सकता है।
  5. प्राणायाम से मस्तिष्क की क्षमता बढ़ाकर स्मरण-शक्ति, सुझबूझ, कुशग्रता,  दूरदर्शिता, धारणा, मेधा आदि मानसिक विशेषताओं प्राप्त किया जा सकता है। भगवान की और से हमें जो जीवन मिला है, उसमें प्राण श्वास गिनकर मिलते है। जिसके जैसे कर्म होते है उसी के अनुसार उसको अगला जन्म मिलता है। प्राणायाम को प्रतिदिन अभ्यास करने से व्यक्ति को जो मुख्य लाभ होते है, इस प्रकार से है।
  6. पाचन तंत्र स्वस्थ हो जाता है और उदर रोग दूर हो जाते है।
  7. प्राणायाम का अभ्यास करने वाले व्यक्ति सदा सकारात्मक विचार, चिंतन व उत्साह से भरा हुआ रहता है।
  8. बालों का जड़ना, सफ़ेद होना, चहरे पर झुरिया पड़ना आदि से बच सकता है।
  9. बुढ़ापा देर से आएगा तथा आयु बढ़ेगी।
  10. मन अत्यंत स्थिर,शान्त व प्रसन्न तथा उत्साहित तथा डिप्रेशन आदि रोगों से लाभ मिलता है।
  11. मोटापा, कोलेस्ट्रोल, मधुमेह, कब्ज, गैस, श्वास रोग, एलर्जी, माइग्रेन, रक्तचाप, किडनी के रोग, पुरुष व स्त्रियों के समस्त यौन रोग आदि सामान्य रोगों से लेकर सभी साध्य-असाध्य रोग दूर होते है।
  12. वंशानुगत डायाबिटीज, हृदयरोग से बचा सकता है।
  13. वात, पित्त व कफ में लाभदाई है।
  14. समस्त रोग काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार दोष नष्ट हो जाते है।
  15. हृदय, फेफड़े व मस्तिष्क सम्बन्धी रोग दूर होते है।
प्राणायाम के नियम
  1. गर्भवती महिला,भूख से पीड़ित एवं अजितेन्द्रिय पुरुष को प्राणायाम नहीं करना चाहिए। प्राणायाम करते हुए थकान का अनुभव हो तो दूसरा प्राणायाम करने से पहले 5-6 मिनिट विश्राम कर लेना चाहिए।
  2. जब भी आप प्राणायाम करें आपकी रीढ़ की हड्डी सीधी होनी चाहिए। इसके लिए आप किसी भी ध्यानत्मक आसन में बैठ जाये। पद्मासन, सुखासन, वज्रासन आदि। यदि आप किसी भी आसन में नहीं बैठ सकते तो कुर्सी पर भी प्राणायाम कर सकते है,परन्तु रीढ़ की हड्डी को सीधा रखे।
  3. प्राणायाम करते समय मन शांत एवं प्रसन्न होना चाहिए, प्राणायाम से मन शांत एवं एकाग्र होता है।
  4. प्राणायाम करते समय मुख, आँख, नाक आदि अंगों पर किसी प्रकार का तनाव ना रखे। प्राणायाम का अभ्यास धीरे-धीरे बिना किसी उतावले, धैर्य के साथ, सावधानी से करें।
  5. प्राणायाम करने के लिए कम से कम चार-पांच घण्टे पूर्व भोजन कर लेना चाहिए। शुरु में ५-१० मिनिट ही अभ्यास करें उसके बाद धीरे-धीरे बढ़ाते हुए आधा से एक घण्टे तक करें। प्रातः पेट साफ करके ही प्राणायाम करें। कुछ दिन प्राणायाम करने कब्ज भी स्वतः दूर हो जाता है।
  6. प्राणायाम का अर्थ सिर्फ पूरक, कुम्बक व् रेचक ही नहीं वरन, श्वास और प्राणों की गति को नियंत्रित और संतुलित करते हुए मन को भी स्थिर व एकाग्र करने का अभ्यास करना है।
  7. प्राणायाम के बाद स्नान करना हो तो 5-20 मिनिट के बाद कर सकते हो।
  8. प्राणायाम के लिए सिद्दासन, वज्रासन या पद्मासन में बैठना आवश्यक है। बैठने के लिए जिस आसान का प्रयोग करते है वह कम्बल या कुशासन आदि।
  9. प्राणायाम में श्वास को जबरन नहीं रोकना चाहिए। प्राणायाम करने के लिए श्वास अन्दर लेना 'पूरक', श्वास को अन्दर रोककर रखना 'कुम्भक', श्वास को बहार फेंकना 'रेचक' और श्वास बाहर ही रोककर रखने को 'बाह्यकुम्भक' कहते है।
  10. प्राणायाम शुद्ध निर्मल स्थान पर करें। शहरों में जहाँ प्रदूषण का अधिक प्रभाव हो वह प्राणायाम से पहले धुप से उस स्थान को सुगन्धित करें।
  11. श्वास सदा नासिका से ही लेना चाहिए। इस से श्वास फ़िल्टर होकर अंदर आता है।


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अल्प ब्लाग जीवन के फटे में पैबँद



फुरसतिया जी का लेख परदे के पीछे-कौन है बे? को पडा लगा कि तो लगा कि छद्म नाम के साथ लेख करना गलत नही है पर नाम लिख कर दूसरो पर टिप्‍पडी करना गलत है नाम न लिखने की परम्‍परा आज की नही है कई लोग इसे निभाते चले आ रहे है। प्रत्‍येक व्‍यक्ति को अपनी बात को कहने का हक है चाहे जैसे हो कह सकता है स्‍वामी जी तथा छाया जी भी अपनी बात सफलता पूर्वक कह रहे है तथा कोई इन लोगो को काई नही जानता है। स्‍वामी जी तो प्रत्‍येक व्‍यक्ति पर मुह फाड के टिप्‍पडी तथा पोस्ट कर रहे है तथा हम इनके बेनाम पोष्‍टो को झेल रहे है नाम नही पता है तो इनकी दादा गिरी भी झेलनी पडती है।
अब एक जगह देख लिजिये कि स्‍वामी जी के क्‍या वाक्‍य है :- आप जितना समय यहाँ अपनी समझदारी का प्रदर्शन करने में लगाते रहे हैं उसका एक अंश अपने ब्लाग पर "संस्क्रत" को "संस्कृत" कैसे लिखें वो सीखने पर लगाएं. समय आ गया है की आपके अल्प ब्लाग जीवन के फटे में पैबँद लगानें शुरु करे - शुरुआत खराब की है आपने. यदी अपने पाठकों का सम्मान चाहते हैं तो आपकी छवि और ब्लाग दोनो को सुधारना शुरु करें. यहाँ सब आपके शुभाकाँक्षी ही हैं। स्‍वामी जी को उन्‍हे दूसरो का संस्क्रत गलत लगता है जबकि कि यदि का यदी लिखा है वह गलत नही लगता। तुलसी दास जी ने स्‍वामी जी जैसे लोगो के लिये ठीक ही समरथ को नही दोष गोसाईं!!" स्‍वामी जी आप तो समर्थवान है उनसे कहां गलती होने वाली है गलती तो हम लोग ही करते है और हमे ही अल्प ब्लाग जीवन के फटे में पैबँद लगानें पडेगे स्‍वामी जी लोग तो समर्थवान हे अच्‍छा लिखे या खराब लोग पडेगे भी तथा टिप्‍पडी भी करेगे और वाह वाह भी ।
छिपकर लिखने का मतलब है कि आप दूसरो को भला बुरा कहते है किन्‍तु नाम इस लिये छिपाते है कोई दूसरा आपके नाम को लेकर आक्षेप न करे। छद्म नाम से लेख लिखने का मतलब है कि या तो आप मनत्री है, राजनेता है, अधिकारी है या आंतकी है जो नाम छिपाने की जरूरत है। मै तो यही कहूगा कि छिप कर लेख करने तो ठीक है पर छद्म नाम का सहारा किसी पर व्‍ययक्तिगत टिप्‍पडी नही करनी चाहिये।
हमे तो जुम्‍मा जुम्‍मा आये 4 दिन ही हुआ है और अभी तो पैबन्‍द लगाने का समय है सो तो हम लगायेगे ही और ऐसा ही चलता रहा तो वक्‍त आपका भी आयेगा।


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मच्छर भगाने के घरेलू उपाय How To Get Rid Of Mosquitoes Naturally



Machar Bhagane ke Gharelu Upay in Hindi

मच्छर भगाने के घरेलू उपाय हिंदी में
Machar Bhagane ke Gharelu Upay in Hindi
मौसम में गरमाहट आते ही घरों में मच्छरों की तादाद बढ़ने लगती है। ऐसे में बाजार में मौजूद केमिकल, स्प्रे और रिफिल्स भी काम नहीं आती हैं। अगर आप भी परेशान हैं तो ये उपाय कर मच्छरों से छुटकारा पाया जा सकता है।
 
मच्छर भगाने के 6 अचूक घरेलू उपाय
  1. नारियल तेल में नीम का तेल मिलाकर कमरे में इस मिक्स तेल से दीया जलाने से मच्छर भाग जाते है।
  2. नारियल तेल और लौंग तेल को बराबर मात्रा में मिलाकर स्किन पर लगाये या घर में स्प्रे करने से भी मच्छर नहीं आते।
  3. अपने घर में गेंदे का पौधा जरूर लगाये , गेंदे की खुशबू से भी मच्छर भाग जाते है।
  4. किसी भी कम्‍पनी के के खाली रिफिल मे में नीम का तेल और कपूर मिलाकर जलाने से भी मच्छर भाग जाते है ।
  5. आधे कटे निम्बू में 10-15 लौंग अटकाकर रात को सोने वाले कमरे में रखने से मच्छर बिलकुल नहीं आयेंगे।
  6. शरीर पर सरसों का तेल लगाने से भी मच्छर दूर रहते है।
जानिये मच्छर भगाने के 10 घरेलू उपाय
  1. तुलसी के पत्तों का रस शरीर पर लगाने से मच्छर पास नहीं आते।
  2. लहसुन की 2-3 कलिया खाने से भी मच्छर पास नहीं आते।
  3. पानी में सोयाबीन तेल मिलाकर घर में स्प्रे करने से मच्छर नहीं आते।
  4. लहसुन की तेज गंध मच्छरों को दूर रखती है। लहसुन का रस शरीर पर लगाएं या फिर इसका छिड़काव करें।
  5. यह न सिर्फ खुशबूदार है पर एक शानदार तरीका भी है मच्छरों से बचने का। इस फूल की खुशबू असरदार होती है जिससे मच्छर भाग जाते हैं। इस घरेलू उपाय के उपयोग के लिए लैवेंडर के तेल को एक कमरे में प्राकृतिक फ्रेशनर के रूप में छिड़कें।
  6. सरसों के तेल में अजवाइन पाउडर मिलाकर इससे गत्ते के टुकड़ों को तर कर लें और कमरे में ऊंचाई पर रख दें। मच्छर पास भी नहीं आएंगे।
  7. मच्छर भगाने वाली रिफिल में लिक्विड खत्म हो जाने पर उसमें नींबू का रस और नीलगिरी का तेल भरकर लगाएं। इस हाथ-पैरों पर भी लगा सकते हैं।
  8. नीम के तेल को हाथ-पैरों में लगाएं या फिर नारियल के तेल में नीम का तेल मिलाकर उसका दीया जलाएं।
  9. पुदीने के पत्तों के रस का छिड़ाव करने से मच्छर दूर भागते हैं। इसे शरीर पर भी लगाया जा सकता है।
  10. मिट्टी के तेल में 20 ग्राम नारियल तेल और करीब 30 बूँद नीम का तेल डालकर साथ में कपूर की दो टिक्की का घोल बना कर लालटेन जलाने से आपके कमरे में मच्छर नहीं फटकेंगे।
घर के आसपास नहीं फटकेगा एक भी मच्छर, करें आसान उपाय
  • नीम्बू को काटकर उसके आधे भाग में एक दर्जन लौंग खोसकर अपने बिस्तर के पास रखिये। मच्छर आपको नहीं काटेंगे।
  • सरसों के तेल में पिसी हुई अजवाइन मिलाकर कागज़ के टुकड़े में पांच से 6 जगह कमरे के चारों ओर रख दीजिये। मच्छर कमरे में नहीं आयेंगे।
  • सोते समय मच्छरदानी का प्रयोग जरूर करें। मच्छरदानी के प्रयोग से मच्छरों से छुटकारा मिल सकता है।
  • संतरे के सूखे छिलकों को कोयले के साथ सुलगाने से मच्छर भाग जाते हैं।
  • सोते समय तुलसी के पत्तों का रस, सोयाबीन का तेल लगाने पर आपको मच्छर नहीं काटेंगे।
  • नारियल तेल में लौंग का तेल मिलाकर त्वचा पर लगाने से मच्छर पास नहीं आते।
  • बरसात के मौसम में घर के चारों तरफ गेंदे के फूल लगाने से मच्छर फुर्र हो जाएंगे।
  • सोते समय लहसुन की कच्ची काली चबाने से मच्छर नहीं काटते। इसके साथ ही लहसुन शरीर के रक्त संचार को भी बढ़िया करता है।
  • नीम की पत्तियां सुलगाने और पुदीने का तेल लगाकर सोने से मच्छर पास नहीं फटकते।


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ओशो के विचार एवं लेख - सेक्स एक शक्ति है उसको समझिए



हमने सेक्स को सिवाय गाली के आज तक दूसरा कोई सम्मान नहीं दिया। हम तो बात करने में भयभीत होते हैं। हमने तो सेक्स को इस भांति छिपा कर रख दिया है जैसे वह है ही नहीं, जैसे उसका जीवन में कोई स्थान नहीं है। जब कि सच्चाई यह है कि उससे ज्यादा महत्वपूर्ण मनुष्य के जीवन में और कुछ भी नहीं है। लेकिन उसको छिपाया है, उसको दबाया है। दबाने और छिपाने से मनुष्य सेक्स से मुक्त नहीं हो गया, बल्कि मनुष्य और भी बुरी तरह से सेक्स से ग्रसित हो गया। दमन उलटे परिणाम लाया है। शायद आपमें से किसी ने एक फ्रेंच वैज्ञानिक कुए के एक नियम के संबंध में सुना होगा। वह नियम है: लॉ ऑफ रिवर्स इफेक्ट। कुए ने एक नियम ईजाद किया है, विपरीत परिणाम का नियम। हम जो करना चाहते हैं, हम इस ढंग से कर सकते हैं कि जो हम परिणाम चाहते थे, उससे उलटा परिणाम हो जाए।
ओशो के विचार एवं लेख सेक्स एक शक्ति है, उसको समझिए

कुए कहता है, हमारी चेतना का एक नियम है—लॉ ऑफ रिवर्स इफेक्ट। हम जिस चीज से बचना चाहते हैं, चेतना उसी पर केंद्रित हो जाती है और परिणाम में हम उसी से टकरा जाते हैं। पांच हजार वर्षों से आदमी सेक्स से बचना चाह रहा है और परिणाम इतना हुआ है कि गली-कूचे, हर जगह, जहां भी आदमी जाता है, वहीं सेक्स से टकरा जाता है। वह लॉ ऑफ रिवर्स इफेक्ट मनुष्य की आत्मा को पकड़े हुए है।
जगत में ब्रह्मचर्य का जन्म हो सकता है, मनुष्य सेक्स के ऊपर उठ सकता है, लेकिन सेक्स को समझ कर, सेक्स को पूरी तरह पहचान कर।

क्या कभी आपने यह सोचा कि आप चित्त को जहां से बचाना चाहते हैं, चित्त वहीं आकर्षित हो जाता है, वहीं निमंत्रित हो जाता है! जिन लोगों ने मनुष्य को सेक्स के विरोध में समझाया, उन लोगों ने ही मनुष्य को कामुक बनाने का जिम्मा भी अपने ऊपर ले लिया है। मनुष्य की अति कामुकता गलत शिक्षाओं का परिणाम है। और आज भी हम भयभीत होते हैं कि सेक्स की बात न की जाए! क्यों भयभीत होते हैं? भयभीत इसलिए होते हैं कि हमें डर है कि सेक्स के संबंध में बात करने से लोग और कामुक हो जाएंगे।
 जिन लोगों ने मनुष्य को सेक्स के विरोध में समझाया, उन लोगों ने ही मनुष्य को कामुक बनाने का जिम्मा भी अपने ऊपर ले लिया है। मनुष्य की अति कामुकता गलत शिक्षाओं का परिणाम है।

मैं आपको कहना चाहता हूं, यह बिलकुल ही गलत भ्रम है। यह शत प्रतिशत गलत है। पृथ्वी उसी दिन सेक्स से मुक्त होगी, जब हम सेक्स के संबंध में सामान्य, स्वस्थ बातचीत करने में समर्थ हो जाएंगे। जब हम सेक्स को पूरी तरह से समझ सकेंगे, तो ही हम सेक्स का अतिक्रमण कर सकेंगे।
जगत में ब्रह्मचर्य का जन्म हो सकता है, मनुष्य सेक्स के ऊपर उठ सकता है, लेकिन सेक्स को समझ कर, सेक्स को पूरी तरह पहचान कर।

जगत में ब्रह्मचर्य का जन्म हो सकता है, मनुष्य सेक्स के ऊपर उठ सकता है, लेकिन सेक्स को समझ कर, सेक्स को पूरी तरह पहचान कर। उस ऊर्जा के पूरे अर्थ, मार्ग, व्यवस्था को जान कर उससे मुक्त हो सकता है। आंखें बंद कर लेने से कोई कभी मुक्त नहीं हो सकता। आंखें बंद कर लेने वाले सोचते हों कि आंख बंद कर लेने से शत्रु समाप्त हो गया है, तो वे पागल हैं। सेक्स के संबंध में आदमी ने शुतुरमुर्ग का व्यवहार किया है आज तक। वह सोचता है, आंख बंद कर लो सेक्स के प्रति तो सेक्स मिट गया। अगर आंख बंद कर लेने से चीजें मिटती होतीं, तो बहुत आसान थी जिंदगी, बहुत आसान होती दुनिया। आंखें बंद करने से कुछ मिटता नहीं, बल्कि जिस चीज के संबंध में हम आंखें बंद करते हैं, हम प्रमाण देते हैं कि हम उससे भयभीत हो गए हैं, हम डर गए हैं। वह हमसे ज्यादा मजबूत है, उससे हम जीत नहीं सकते हैं, इसलिए हम आंख बंद करते हैं। आंख बंद करना कमजोरी का लक्षण है। और सेक्स के बाबत सारी मनुष्य-जाति आंख बंद करके बैठ गई है। न केवल आंख बंद करके बैठ गई है, बल्कि उसने सब तरह की लड़ाई भी सेक्स से ली है। और उसके परिणाम, उसके दुष्परिणाम सारे जगत में ज्ञात हैं।
अगर सौ आदमी पागल होते हैं, तो उसमें से अट्ठानबे आदमी सेक्स को दबाने की वजह से पागल होते हैं। अगर हजारों स्त्रियां हिस्टीरिया से परेशान हैं, तो उसमें सौ में से निन्यानबे स्त्रियों के हिस्टीरिया के, मिरगी के, बेहोशी के पीछे सेक्स की मौजूदगी है, सेक्स का दमन मौजूद है।

अगर सौ आदमी पागल होते हैं, तो उसमें से अट्ठानबे आदमी सेक्स को दबाने की वजह से पागल होते हैं। अगर हजारों स्त्रियां हिस्टीरिया से परेशान हैं, तो उसमें सौ में से निन्यानबे स्त्रियों के हिस्टीरिया के, मिरगी के, बेहोशी के पीछे सेक्स की मौजूदगी है, सेक्स का दमन मौजूद है। अगर आदमी इतना बेचैन, अशांत, इतना दुखी और पीड़ित है, तो इस पीड़ित होने के पीछे उसने जीवन की एक बड़ी शक्ति को बिना समझे उसकी तरफ पीठ खड़ी कर ली है, उसका कारण है। और परिणाम उलटे आते हैं।
वह हैरान हो जाएगा यह जान कर कि आदमी का सारा साहित्य सेक्स ही सेक्स पर क्यों केंद्रित है? आदमी की सारी कविताएं सेक्सुअल क्यों हैं?

अगर हम मनुष्य का साहित्य उठा कर देखें, अगर किसी देवलोक से कभी कोई देवता आए या चंद्रलोक से या मंगल ग्रह से कभी कोई यात्री आए और हमारी किताबें पढ़े, हमारा साहित्य देखे, हमारी कविताएं पढ़े, हमारे चित्र देखे, तो बहुत हैरान हो जाएगा। वह हैरान हो जाएगा यह जान कर कि आदमी का सारा साहित्य सेक्स ही सेक्स पर क्यों केंद्रित है? आदमी की सारी कविताएं सेक्सुअल क्यों हैं? आदमी की सारी कहानियां, सारे उपन्यास सेक्स पर क्यों खड़े हैं? आदमी की हर किताब के ऊपर नंगी औरत की तस्वीर क्यों है? आदमी की हर फिल्म नंगे आदमी की फिल्म क्यों है? वह आदमी बहुत हैरान होगा; अगर कोई मंगल से आकर हमें इस हालत में देखेगा तो बहुत हैरान होगा। वह सोचेगा, आदमी सेक्स के सिवाय क्या कुछ भी नहीं सोचता? और आदमी से अगर पूछेगा, बातचीत करेगा, तो बहुत हैरान हो जाएगा। आदमी बातचीत करेगा आत्मा की, परमात्मा की, स्वर्ग की, मोक्ष की। सेक्स की कभी कोई बात नहीं करेगा! और उसका सारा व्यक्तित्व चारों तरफ से सेक्स से भरा हुआ है! वह मंगल ग्रह का वासी तो बहुत हैरान होगा। वह कहेगा, बातचीत कभी नहीं की जाती जिस चीज की, उसको चारों तरफ से तृप्त करने की हजार-हजार पागल कोशिशें क्यों की जा रही हैं?
सेक्स है फैक्ट, सेक्स जो है वह तथ्य है मनुष्य के जीवन का। और परमात्मा? परमात्मा अभी दूर है। सेक्स हमारे जीवन का तथ्य है।

आदमी को हमने परवर्ट किया है, विकृत किया है और अच्छे नामों के आधार पर विकृत किया है। ब्रह्मचर्य की बात हम करते हैं। लेकिन कभी इस बात की चेष्टा नहीं करते कि पहले मनुष्य की काम की ऊर्जा को समझा जाए, फिर उसे रूपांतरित करने के प्रयोग भी किए जा सकते हैं। बिना उस ऊर्जा को समझे दमन की, संयम की सारी शिक्षा, मनुष्य को पागल, विक्षिप्त और रुग्ण करेगी। इस संबंध में हमें कोई भी ध्यान नहीं है! यह मनुष्य इतना रुग्ण, इतना दीन-हीन कभी भी न था; इतना विषाक्त भी न था, इतना पायज़नस भी न था, इतना दुखी भी न था।मनुष्य के भीतर जो शक्ति है, उस शक्ति को रूपांतरित करने की, ऊंचा ले जाने की, आकाशगामी बनाने का हमने कोई प्रयास नहीं किया। उस शक्ति के ऊपर हम जबरदस्ती कब्जा करके बैठ गए हैं। वह शक्ति नीचे से ज्वालामुखी की तरह उबल रही है और धक्के दे रही है। वह आदमी को किसी भी क्षण उलटा देने की चेष्टा कर रही है।

क्या आपने कभी सोचा? आप किसी आदमी का नाम भूल सकते हैं, जाति भूल सकते हैं, चेहरा भूल सकते हैं। अगर मैं आप से मिलूं या मुझे आप मिलें तो मैं सब भूल सकता हूं—कि आपका नाम क्या था, आपका चेहरा क्या था, आपकी जाति क्या थी, उम्र क्या थी, आप किस पद पर थे—सब भूल सकता हूं, लेकिन कभी आपको खयाल आया कि आप यह भी भूल सके हैं कि जिससे आप मिले थे, वह आदमी था या औरत? कभी आप भूल सके इस बात को कि जिससे आप मिले थे, वह पुरुष है या स्त्री? कभी पीछे यह संदेह उठा मन में कि वह स्त्री है या पुरुष? नहीं, यह बात आप कभी भी नहीं भूल सके होंगे। क्यों लेकिन? जब सारी बातें भूल जाती हैं तो यह क्यों नहीं भूलता?

हमारे भीतर मन में कहीं सेक्स बहुत अतिशय होकर बैठा है। वह चौबीस घंटे उबल रहा है। इसलिए सब बात भूल जाती है, लेकिन यह बात नहीं भूलती। हम सतत सचेष्ट हैं। यह पृथ्वी तब तक स्वस्थ नहीं हो सकेगी, जब तक आदमी और स्त्रियों के बीच यह दीवार और यह फासला खड़ा हुआ है। यह पृथ्वी तब तक कभी भी शांत नहीं हो सकेगी, जब तक भीतर उबलती हुई आग है और उसके ऊपर हम जबरदस्ती बैठे हुए हैं। उस आग को रोज दबाना पड़ता है। उस आग को प्रतिक्षण दबाए रखना पड़ता है। वह आग हमको भी जला डालती है, सारा जीवन राख कर देती है। लेकिन फिर भी हम विचार करने को राजी नहीं होते—यह आग क्या थी? और मैं आपसे कहता हूं, अगर हम इस आग को समझ लें तो यह आग दुश्मन नहीं है, दोस्त है। अगर हम इस आग को समझ लें तो यह हमें जलाएगी नहीं, हमारे घर को गरम भी कर सकती है सर्दियों में, और हमारी रोटियां भी पका सकती है, और हमारी जिंदगी के लिए सहयोगी और मित्र भी हो सकती है। लाखों साल तक आकाश में बिजली चमकती थी। कभी किसी के ऊपर गिरती थी और जान ले लेती थी। कभी किसी ने सोचा भी न था कि एक दिन घर में पंखा चलाएगी यह बिजली। कभी यह रोशनी करेगी अंधेरे में, यह किसी ने सोचा नहीं था। आज? आज वही बिजली हमारी साथी हो गई है। क्यों? बिजली की तरफ हम आंख मूंद कर खड़े हो जाते तो हम कभी बिजली के राज को न समझ पाते और न कभी उसका उपयोग कर पाते। वह हमारी दुश्मन ही बनी रहती। लेकिन नहीं, आदमी ने बिजली के प्रति दोस्ताना भाव बरता। उसने बिजली को समझने की कोशिश की, उसने प्रयास किए जानने के। और धीरे-धीरे बिजली उसकी साथी हो गई। आज बिना बिजली के क्षण भर जमीन पर रहना मुश्किल मालूम होगा।
 कौन सिखाता है सेक्स आपको इस सेक्स का इतना प्रबल आकर्षण, इतना नैसर्गिक केंद्र क्या है?
 मनुष्य के भीतर बिजली से भी बड़ी ताकत है सेक्स की। मनुष्य के भीतर अणु की शक्ति से भी बड़ी शक्ति है सेक्स की। कभी आपने सोचा लेकिन, यह शक्ति क्या है और कैसे हम इसे रूपांतरित करें? एक छोटे से अणु में इतनी शक्ति है कि हिरोशिमा का पूरा का पूरा एक लाख का नगर भस्म हो सकता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि मनुष्य के काम की ऊर्जा का एक अणु एक नये व्यक्ति को जन्म देता है? उस व्यक्ति में गांधी पैदा हो सकता है, उस व्यक्ति में महावीर पैदा हो सकता है, उस व्यक्ति में बुद्ध पैदा हो सकते हैं, क्राइस्ट पैदा हो सकता है। उससे आइंस्टीन पैदा हो सकता है और न्यूटन पैदा हो सकता है। एक छोटा सा अणु एक मनुष्य की काम-ऊर्जा का, एक गांधी को छिपाए हुए है। गांधी जैसा विराट व्यक्तित्व जन्म पा सकता है।

सेक्स है फैक्ट, सेक्स जो है वह तथ्य है मनुष्य के जीवन का। और परमात्मा? परमात्मा अभी दूर है। सेक्स हमारे जीवन का तथ्य है। इस तथ्य को समझ कर हम परमात्मा के सत्य तक यात्रा कर भी सकते हैं। लेकिन इसे बिना समझे एक इंच आगे नहीं जा हमने कभी यह भी नहीं पूछा कि मनुष्य का इतना आकर्षण क्यों है? कौन सिखाता है सेक्स आपको?

सारी दुनिया तो सिखाने के विरोध में सारे उपाय करती है। मां-बाप चेष्टा करते हैं कि बच्चे को पता न चल जाए। शिक्षक चेष्टा करते हैं। धर्म-शास्त्र चेष्टा करते हैं। कहीं कोई स्कूल नहीं, कहीं कोई यूनिवर्सिटी नहीं। लेकिन आदमी अचानक एक दिन पाता है कि सारे प्राण काम की आतुरता से भर गए हैं! यह कैसे हो जाता है? बिना सिखाए यह कैसे हो जाता है? सत्य की शिक्षा दी जाती है, प्रेम की शिक्षा दी जाती है, उसका तो कोई पता नहीं चलता। इस सेक्स का इतना प्रबल आकर्षण, इतना नैसर्गिक केंद्र क्या है? जरूर इसमें कोई रहस्य है और इसे समझना जरूरी है। तो शायद हम इससे मुक्त भी हो सकते हैं।


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