प्राणायाम के नियम, लाभ एवं महत्व



श्वास-पश्वास की गति को यथाशक्ति अनुसार नियंत्रित करना प्राणायाम कहलाता है। प्राणायाम के चार प्रकार है :-
  1. बाह्यवृति
  2. आभ्यन्तरवृति
  3. स्तम्भवृत्ति
  4. बाह्याभ्यन्तर विषयाक्षेपि
बाह्यवृति प्राणायाम


विधि : 
  1.  सिद्वासन वा पद्मासन में विधिपूर्वक बैठकर श्वास को एक ही बार में यथाशक्ति बहार निकाल दीजिए।
  2. बाहर निकालकर मूल बंध,उड्डीयान बांध व जालन्धर बांध लगाकर श्वास को यथाशक्ति बहार रोककर रखे।
  3. जब श्वास लेने की जरुरत हो तो बंधो को हटाकर धीरे धीरे स्वास ले।
  4. भीतर ले कर उसे बिना रोके पुनः पूर्ववत् श्वसन क्रिया कीजिये। इसे ३ से लेकर २१ बार कर सकते हैं।
लाभ: यह प्रणायाम हानीकारक नहीं है। जठरागनी प्रदीप्त होती है।उदर रोगो में लाभप्रद है।
 
 आभ्यन्तरवृति प्रणायाम 
विधि:
  1. ध्यानात्मक आसन में बैठकर श्वास को बहार निकालकर पून: जितना भर सकते हैं, अन्दर भर लीजिये। छाती ऊपर उभरी हुई तथा पेट का निचे वाला भाग भीतर सिकुड़ा हुवा होगा। श्वास अंदर भर कर जालंधर बंध व् मूलबन्ध लगाए।
  2. यथाशक्ति श्वास को अंदर रोककर रखिये। जब छोड़ने की इच्छा हो तब जालंधर बन्ध को हटाकर धीरे-धीरे श्वास को बाहर निकाल दीजिये।
लाभ: दमा के रोगियो के एवं फेफड़ा सम्बन्धि के लिये अत्यंत लाभदाई है।शरीर में शक्ति,कान्ति की वृद्धि करता है।
 
स्तम्भवृत्ति प्राणायाम 
विधि: इसमें श्वास को जहा का तह रोकना पड़ता है। अपने शक्ति अनुसार रोक कर बाहर निकाल दीजिये। वापस सामान्य होने पर जहाँ का तहाँ रोकिए।
 
बाह्याभ्यन्तर विषयाक्षेपी 
विधि :जब श्वास भीतर से बाहर आये, तब बाहर ही कुछ-कुछ रोकता रहे और जब बाहर से भीतर जाये तब उसको भीतर ही थोड़ा-थोड़ा रोकता रहे.स्त्रियाँ भी इसी प्रकार योगाभ्यास कर सकते है।
 
प्राणायाम की सम्पूर्ण प्रक्रियाए :  प्रत्येक प्राणायाम का अपना एक विशेष महत्व है,सभी प्राणायामों का वयक्ति प्रतिदिन अभ्यास नहीं कर सकता। इस पूरी प्रक्रिया में लगभद २० मिनिट का समय लगता है। 
 
भस्त्रिका प्राणायाम (Bhastrika Pranayam) 
 
ध्यानत्मक आसन में बैठकर दोनों नासिकाओं से श्वास को पूरा अन्दर डायफ्राम तक भरना एव बाहर पूरी शक्ति के साथ छोड़ना भस्त्रिका प्राणायाम कहते है। प्रणायाम को अपनी शक्ति अनुसार तीन प्रकार से किया जाता है। मंद गति से,मध्यम गति से तथा तीव्र गति से। इस प्राणायम को ३-५ मिनिट तक करना चाहिए। दिव्य संकल्प से साथ किया हुवा प्राणायाम विशेष लाभदाई है।
 
सूचना
  • जिनको हदय रोग हो , उन्हें तीव्र गति से ये प्राणायाम नहीं करना चाहिए। इस प्राणायाम के दौरान श्वास को अन्दर भरे तब पैट को नहीं फुलाना चाहिए। ग्रीष्म ऋतु में अल्प मात्रा में करे। इस प्राणायाम को ३ से लेकर ५ मिनिट तक रोज करे।
  • प्राणायाम की क्रियाओ को करते समय आँखों को बन्द रखे और मन में प्रत्येक श्वास-पश्वास के साथ ओ३म का मानसिक रूप से चिन्तन व् मनन करना चाहिये। 
लाभ :  
  1. सर्दी-जुकाम ,एलर्जी,श्वास रोग,दमा,पुराना नजला,साइनस आदि समस्त कफ रोग दूर होते है।
  2. थाइरोड व् टान्सिल आदि गले के समस्त रोग रोग दूर होता है। 
  3. प्राण व मन स्थिर होता है।
कपालभाति प्राणायाम (Kapalbhati)
 
कपाल अर्थात मश्तिष्क और भाति का अर्थ होता है दीप्ती,आभा,तेज,प्रकाश आदि। कपालभाति में मात्र रेचक अर्थात श्वास को शक्ति पूर्वक बाहर छोड़ने में ही पूरा ध्यान दिया जाता है। श्वास को भरने के लिए प्रयत्न नहीं करते;अपितु सहजरूप से जितना श्वास अन्दर चला जाता है,जाने देते है,पूरी एकाग्रता श्वास को बाहर छोड़ने में ही होती है ऐसा करते हुए स्वाभाविक रूप से पेट में भि अकुंशन व् प्रशारण की क्रिया होती है। इस प्राणायाम को ५ मिनिट तक अवश्य ही करना चाहिए।
कपालभाति प्राणायाम को करते समय मन में ऐसा विचार करना चाहिए की जैसे ही मैं श्वास को बाहर निकल रहा हूँ, इस पश्वास के साथ मेरे शरीर के समस्त रोग बाहर निकल रहे है।
तीन मिनिट से प्रारम्भ करके पांच मिनिट तक इस प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। प्रणायाम करते समय जब-जब थकान अनुभव हो तब-तब बीच में विश्राम कर ले। प्रारम्भ में पेट या कमर में दर्द हो सकता है। वो धीरे धीरे अपने आप मिट जायेगा।
लाभ:
१. मष्तिष्क पर तेज,आभा व् सौन्दर्य बढ़ता है।
२. हदय,फेफड़ो एवं समस्त कफ रोग,दम,श्वास,एलर्जी,साइनस आदि रोग नष्ट होते है।
३. मधुमेह,मोटापा, गैस ,कब्ज,किडनी व् प्रोस्ट्रेट से संबधित सभी रोग दूर होते है।
४. कब्ज जैसे रोग इस प्राणायाम से रोज ५ मिनिट तक प्रतिदिन करने से मिट जाते है। मधुमेह नियमित होता है तथा मोटापा दूर होता है।
५. मन स्थिर ,शांत रहता है। जिससे डिप्रेशन आदि रोगो से लाभ मिलता है।
६. इस प्राणायाम से यकृत,प्लीहा,आन्त्र ,प्रोस्टेट एवं किडनी का आरोग्य विशेष रूप से बढ़ता है। दुर्बल आंतो का सबल बनाने के लिए यह प्राणायाम लाभदाई है। 
बाह्य प्राणायाम (Bahya Pranayam) 
  1. सिद्धासन या पद्मासन में विधिपूर्वक बैठकर श्वास को एक ही बार में यथाशक्ति बहार निकाल दीजिये।
  2. श्वास बाहर निकालकर मूलबंध, उड्डीयान बंध व जालन्धर बन्ध लगाकर श्वास को यथाशक्ति बाहर ही रोककर रखें।
  3. जब श्वास लेने की इच्छा हो तब बन्धो को हटाते हुए धीरे-धीरे श्वास लीजिए।
  4. श्वास भीतर लेकर उसे बिना रोके ही पुनः पूर्ववत् श्वसन क्रिया द्वारा बाहर निकाल दीजिये। इस प्रकार इसे 3 से लेकर 21 बार तक कर सकते हैं।
संकल्प: इस प्राणायाम में भी उक्त कपालभाति के समान श्वास को बाहर फेंकते हुए समस्त विकारों, दोषों को भी बाहर फेंका जा रहा है इस प्रकार की मानसिक चिन्तन धारा बहनी चाहिए। विचार-शक्ति जितनी अधिक प्रबल होगी समस्त कष्ट उतनी ही प्रबलता से दूर होंगे। 
लाभ: यह हानिरहित प्राणायाम है। इससे मन की चञ्चलता दूर होती है। जठराग्नि प्रदीप्त होती है। उधर रोगों में लाभप्रद है। बुद्धि सूक्ष्म व तीव्र होती है। शरीर का शोधक है। वीर्य की उधर्व गति करके स्वप्न-दोष, शीघ्रपतन आदि धातु-विकारों की निवृत्ति करता है। बाह्य प्राणायाम करने से पेट के सभी अवयवों पर विशेष बल पड़ता है तथा प्रारम्भ में पेट के कमजोर या रोगग्रस्त भाग में हल्का दर्द का भी अनुभव होता हैं। अतः पेट को विश्राम तथा आरोग्य देने के लिए त्रिबन्ध पूर्वक यह प्राणायाम करना चाहिए।
 
 अनुलोम-विलोम प्राणायाम (ANULOM-VILOM PRANAYAM) 
दाएँ हाथ को उठकर दाएँ हाथ के अंगुष्ठ के द्वारा दायाँ स्वर तथा अनामिका व् मध्यमा अंगुलियों के द्वारा बायाँ स्वर बन्द करना चाहिए। हाथ की हथेली नासिका के सामने न रखकर थोड़ा ऊपर रखना चाहिए।
विधि: अनुलोम-विलोम प्राणायाम को बाए नासिका से प्रारम्भ करते है। अंगुष्ठ के माध्यम से दाहिनी नासिका को बंध करके बाई नाक से श्वास धीरे-धीरे अंदर भरना चाहिए। श्वास पूरा अंदर भरने पर ,अनामिका व् मध्यमा से वाम श्वर को बन्ध करके दाहिनी नाक से पूरा श्वास बाहर छोड़ देना चाहिए। धीरे-धीरे श्वास-पश्वास की गति मध्यम और तीव्र करनी चाहिए। तीव्र गति से पूरी शक्ति के साथ श्वास अन्दर भरें व् बाहर निकाले व् अपनी शक्ति के अनुसार श्वास-प्रश्वास के साथ गति मन्द,मध्यम और तीव्र करें। तीव्र गति से पूरक, रेचक करने से प्राण की तेज ध्वनि होती है। श्वास पूरा बाहर निकलने पर वाम स्वर को बंद रखते हुए दाए नाक से श्वास पूरा अन्दर भरना चाहिए तथा अंदर पूरा भर जाने पर दाए नाक को बन्द करके बाए नासिका से श्वास बाहर छोड़ने चाहिए। यह एक प्रकियापुरी हुई। इस प्रकार इस विधि को सतत करते रहना। थकान होने पर बीच में थोड़ा विश्राम करे फिर पुनः प्राणायाम करे। इस प्रकार तीन मिनिट से प्रारम्भ करके इस प्राणायाम को १० मिनिट तक किया जा सकता है।
लाभ:  
  1. इस प्राणायम से बहत्तर करोड़,बहत्तर लाख,दस हजार दो सौ दस नाड़ियाँ परिशुद्ध हो जाती है।
  2. संधिवात, कंपवात, गठिया, आमवात, स्नायु-दुर्बलता आदि समस्त वात रोग, धातुरोग, मूत्ररोग शुक्रक्षय, अम्लपित्त, शीतपित्त आदि समस्त पित्त रोग, सर्दी, जुकाम, पुराना नजला, साइनस, अस्थमा, खाँसी, टान्सिल समस्त रोग दूर होते है।
  3. इस प्राणायाम का नियमित अभ्यास करने से तीन-चार माह में 30% लेकर 50% तक ब्लोकेज खुल जाते है। कोलेस्ट्रोल,एच. डी. एल. या एल. डी. एल. आदि की अनियमितताएं दूर हो जाती है। इस प्राणायाम से तन, मन, विचार छ संस्कार सब परिशुद्ध होते है।
 
भ्रामरी प्राणायाम (BHRAMRI PRANAYAM) 
विधि: श्वास पूरा अन्दर भर कर मध्यमा अंगुलियों से नासिका के मूल में आँख के पास दोनों ओर से थोड़ा दबाएँ, अंगूठो के द्वारा दोनों कानो को पूरा बन्ध कर ले। अब भ्रमर की भाँति गुंजन करते हुए नाद रूप में ओ३म का उच्चारण करते हुए श्वास को बाहर छोडदे। इस तरह ये प्राणायाम कम से कम 3 बार अवश्य करे। अधिक से 11  से 12 बार तक कर सकते हो। मन में यह दिव्य संकल्प या विचार होना चाहिए की मुज पर भगवन की करुणा, शांति व आनंद बरस रहा है। इस प्रकार शुद्ध भाव से यह प्राणायाम करने से एक दिव्य ज्योति आगना चक्र में प्रकट होता है और ध्यान स्वत: होने लगता है।
लाभ:  मानसिक तनाव,उत्तेजना,उच्च रक्तचाप,हदयरोग आदि दूर होता है। ध्यान के लिए उपयोगी है।
 
ओङ्गकार जप
'ओङ्गकार' कोई व्यक्ति या आकृति विशेष नहीं है ,अपितु दिव्यशक्ति है , जो इस ब्रह्माण्ड का संचालन कर रही है। सभी प्राणायाम करने के बाद श्वास-पश्वास पर अपने मन को टिकाकर प्राण के साथ उदगीथ 'ओ३म 'ध्यान करे। भगवान भ्रुवों की आकृति ओङ्गकारमयी बनाई है। यह पिण्ड तथा समस्त ब्रह्माण्ड ओङ्गकारमयी है। द्रष्टा बनकर दीर्घ व् सूक्ष्म गति से श्वास को लेते व् छोड़ते समय श्वास की गति इतनी सूक्ष्म होनी चाहिए स्वयं को भी श्वास की ध्वनि की अनुभूति न हो। धीरे धीरे अभ्यास बढाकर प्रयास करके एक मिनिट में एक श्वास तथा एक पश्वाश चले। प्रारम्भ में श्वास के स्पर्श की अनुभूति मात्र नासिकाग्र पर होगी। धीरे -धीरे श्वास के गहरे स्पर्श को भी अनुभव कर सकेंगे। इस प्रकार कुछ समय तक श्वास के साथ साक्षीभावपूर्वक ओङ्गकार जप करने से ध्यान स्वतः होने लगता है। प्रणव के साथ वेदों के महान मन्त्र गायत्री का भी अर्थपूर्वक जाप व् ध्यान किया जा सकता है। सोते समय इस प्रकार ध्यान करते हुए सोना चाहिए ,ऐसा करने से निंद्रा भी योगमयी हो जाती है। दू:स्वप्न से भी छुटकारा मिलेगा तथा निंद्रा शीघ्र आएगी।
 
प्राणायाम के लाभ एवं महत्व
हमारे शरीर में जितनेही चेष्टाएँ होती है उन सभी का प्राण से प्रत्यक्ष सम्बन्ध है। प्रणायाम से इन्द्रियों एवं मन के दोष् दूर होते है। आसन से योगी को रजोगुण,प्राणयाम से पापनिवृति और पत्याहार से मानसिक विकार दूर रहते है। स्थूल रूप से प्राणायाम श्वास-प्रश्वास के व्यायाम की एक पद्धति है,जिस से फेफड़े मजबूत ,दीर्घ आयु का लाभ मिलता है। विभिन रोगो का निवारण प्राण-वायु का प्राणायाम द्वारा नियमन करने से सहजतापूर्वक किया जा सकता है। प्राणायाम द्वारा उद्वेग,चिंता,क्रोध,निराशा ,भय और कामुकता आदि मनोविकार का समाधान सरलतापूर्वक किया जा सकता है। प्राणायाम से मसितष्क की क्षमता बढाकर स्मरण-शक्ति,सुझबूझ,कुशग्रता, दूरदर्शिता, धारणा , मेघा आदि मानसिक विशेषताओ प्राप्त किया जा सकता है।भगवान की और से हमें जो जीवन मिला है, उसमे प्राण श्वास गिनकर मिलते है। जिसके जैसे कर्म होते है उसी के अनुसार उसको अगला जन्म मिलता है। प्राणायाम को प्रतिदिन अभ्यास करने से व्यक्ति को जो मुख़्य लाभ होते है, इस प्रकार से है।
  1. हदय,फेफड़े व् मसितष्क सम्बन्धी रोग दूर होते है।
  2. मोटापा,कोलेस्ट्रोल ,मधुमेह,कब्ज,गैस,श्वास रोग,एलर्जी,माइग्रेन,रक्तचाप,किडनी के रोग,पुरुष व् स्त्रियों के समस्त यौन रोग आदि सामान्य रोगों से लेकर सभी साध्य-असाध्य रोग दूर होते है।
  3. मन अत्यंत स्थिर,शान्त व् प्रशन्न तथा उत्साहित तथा डिप्रेशन आदि रोगो से लाभ मिलता है।
  4. वात,पित्त व् कफ में लाभ दाई है। 
  5. वंशानुगत डायाबिटीज,हदयरोग से बचा सकता है। 
  6. पाचनतंत्र स्वस्थ हो जाता है और उदर रोग दूर हो जाते है। 
  7. समस्त रोग काम,क्रोध,लोभ,मोह व् अहंकार दोष नष्ट हो जाते है। 
  8. बालों का जड़ना,सफ़ेद होना,चहरे पे झुरिया पड़ना आदि से बच सकता है।
  9. बुढ़ापा देर से आएगा तथा आयु बढ़ेगी।
  10. प्राणायाम का अभ्यास करनेवाले व्यक्ति सदा सकारत्मक विचार,चिंतन व् उत्साह से भरा हुवा रहता है।
प्राणायाम के नियम: जब भी आप प्राणायाम करे आपकी रीढ़ की हड्डी सीधी होनी चाहिए। इसके लिए आप किसी भी ध्यानत्मक आसन में बैठ जाये। पद्मासन,सुखासन,वज्रासन, आदि। यदि आप किसी भी आसन में नहीं बैठ सकते तो कुर्सी पर भी प्राणायाम कर सकते है,परन्तु रीढ़ की हड्डी को सीधा रखे।
  1. प्राणायाम शुद्ध निर्मल स्थान पर करे। शहरों में जहाँ प्रदुषण का अधिक प्रभाव हो वह प्राणायाम से पहले धुप से उस स्थान को सुगन्धित करे।
  2. प्राणायाम के लिए सिद्दासन,वज्रासन या पद्मासन में बैठना आवशयक है। बैठने के लिए जिस आसान का प्रयोग करते है वह कम्बल या कुशाशन आदि।
  3. श्वास सदा नासिका से ही लेना चाहिए। इस से श्वास फ़िल्टर होकर अंदर आता है।
  4. प्राणायाम करते समय मन शांत एवं प्रसंन होना चाहिए। प्राणयाम से मन शांत एवं एकाग्र होता है।
  5. प्राणायाम करने के लिए कम से कम चार-पांच घण्टे पूर्व भोजन कर लेना चाहिए। शरु में ५-१० मिनिट ही अभ्यास करे त्यारबाद धीरे-धीरे बढ़ाते हुए आधा से एक घण्टे तक करे। प्रात: पेट साफ करके ही प्राणायाम करे। कुछ दिन प्राणायाम करने कब्ज भी स्वत दूर हो जाता है।
  6. गर्भवती महिला,भूख से पीड़ित यवम अजितेन्द्रिय पुरुष को प्राणायाम नहीं करना चाहिए। प्राणायाम करते हुए थकान का अनुबह्व हो तो दूसरा प्राणायाम करने से पहले ५-६ मिनिट विश्राम कर लेना चाहिए।
  7. प्राणायाम में श्वास को जबरन नहीं रोकना चाहिए। प्राणायाम करने के लिए श्वास अन्दर लेना 'पूरक', श्वास को अन्दर रोककर रखना 'कुम्भक' ,श्वास को बहार फेंकना 'रेचक' और श्वास बाहर ही रोककर रखने को 'बाह्यकुम्भक' कहते है।
  8. प्राणायाम का अर्थ सिर्फ पूरक,कुम्बक व् रेचक ही नहीं वरन,श्वास और प्राणो की गति को नियंत्रित और संतुलित करते हुए मन को भी स्थिर व् एकाग्र करने का अभ्यास करना है।
  9. प्राणायाम करते समय मुख,आँख,नाक आदि अंगो पर किसी प्रकार का तनाव ना रखे। प्राणायाम का अभ्यास धीरे-धीरे बिना किसी उतावले ,धैर्य के साथ ,सावधानी से करे।
  10. प्राणयाम के बाद स्नान करना हो तो ५-२० मिनिट के बाद कर सकते हो।


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