भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में भगवान शिव को केवल संहार के देवता के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के रक्षक, रोगों के नाशक और मृत्यु पर विजय दिलाने वाले देव के रूप में भी पूजा जाता है। इसी शिव-तत्त्व की महिमा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्तोत्र है— मृतसञ्जीवन स्तोत्रम्। नाम से ही स्पष्ट है कि यह ऐसा स्तवन है जो जीवन में नवचेतना, आशा और संरक्षण का संदेश देता है। हिन्दू धार्मिक परम्पराओं में इसे विशेष रूप से आरोग्य, दीर्घायु, संकट-निवारण तथा अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति के लिए श्रद्धापूर्वक पढ़ा जाता है।
“मृतसञ्जीवन” शब्द दो पदों से मिलकर बना है— मृत अर्थात् मृत, निष्प्राण अथवा जीवन-संकट से ग्रस्त, और सञ्जीवन अर्थात् पुनः जीवन प्रदान करने वाला। इस प्रकार मृतसञ्जीवन स्तोत्र का शाब्दिक अर्थ है— “ऐसा स्तोत्र जो जीवन का पुनर्संचार करने वाला हो।” यद्यपि इसका अर्थ प्रत्यक्ष रूप से मृत व्यक्ति को पुनर्जीवित करने से नहीं लिया जाता, बल्कि यह जीवन में आई निराशा, रोग, भय, दुःख और संकट से मुक्ति दिलाने वाली ईश्वरीय कृपा का प्रतीक माना जाता है।
मृतसञ्जीवन की अवधारणा का उल्लेख प्राचीन पौराणिक साहित्य में भी मिलता है। पुराणों के अनुसार असुरों के गुरु शुक्राचार्य ने भगवान शिव की कठोर तपस्या करके “मृत-संजीवनी विद्या” प्राप्त की थी। इस विद्या के प्रभाव से वे युद्ध में मारे गए असुरों को पुनः जीवित कर देते थे। इस कथा ने भारतीय जनमानस में “मृत-संजीवनी” को जीवनदायिनी शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया। मृतसञ्जीवन स्तोत्र इसी दिव्य शक्ति और भगवान शिव की कृपा का स्मरण कराने वाला स्तवन माना जाता है।
भगवान शिव के अनेक स्वरूपों में मृत्युञ्जय, त्र्यम्बक, रुद्र और कालान्तक विशेष रूप से जीवन एवं मृत्यु के अधिपति माने जाते हैं। शास्त्रों में शिव को “मृत्युंजय” अर्थात् मृत्यु पर विजय प्राप्त करने वाला कहा गया है। इसी कारण जब कोई व्यक्ति गंभीर रोग, दुर्घटना, मानसिक संकट या जीवन की कठिन परिस्थितियों से गुजरता है, तब शिवोपासना तथा मृतसञ्जीवन स्तोत्र के पाठ का विशेष महत्व माना जाता है।
इस स्तोत्र का महत्व केवल धार्मिक या आध्यात्मिक स्तर तक सीमित नहीं है। इसका नियमित पाठ साधक के मन में आशा, धैर्य, आत्मविश्वास और सकारात्मक दृष्टिकोण का विकास करता है। जब मनुष्य स्वयं को असहाय अनुभव करता है, तब ईश्वर की शरण उसे मानसिक शक्ति प्रदान करती है। मृतसञ्जीवन स्तोत्र का यही आध्यात्मिक पक्ष इसे विशिष्ट बनाता है। यह व्यक्ति को यह विश्वास दिलाता है कि चाहे परिस्थिति कितनी भी कठिन क्यों न हो, शिव की कृपा और आत्मबल के सहारे उसका सामना किया जा सकता है।
परम्परानुसार इस स्तोत्र का पाठ सोमवार, प्रदोष व्रत, श्रावण मास, महाशिवरात्रि तथा विशेष रूप से रोग या संकट की स्थिति में किया जाता है। अनेक श्रद्धालु इसे महामृत्युंजय मंत्र के जप के साथ भी पढ़ते हैं। शिवलिंग के समक्ष दीप, धूप और जल अर्पित कर श्रद्धा एवं एकाग्रता के साथ इसका पाठ करना शुभ माना जाता है। शास्त्रीय मान्यता है कि ऐसे पाठ से मानसिक शान्ति, आरोग्य, भय से मुक्ति तथा शिव-कृपा की प्राप्ति होती है।
वास्तव में मृतसञ्जीवन स्तोत्र का संदेश केवल शारीरिक जीवन की रक्षा तक सीमित नहीं है। इसका व्यापक अर्थ यह है कि मनुष्य अपने भीतर की मृतप्राय आशाओं, कमजोर पड़ चुके आत्मविश्वास और निराशा से भरे जीवन को पुनः जागृत करे। भगवान शिव की उपासना के माध्यम से वह अपने भीतर स्थित दिव्य शक्ति को पहचान सके और जीवन के संघर्षों का साहसपूर्वक सामना कर सके।
अन्ततः कहा जा सकता है कि मृतसञ्जीवन स्तोत्र भारतीय आध्यात्मिक परम्परा की उस महान भावना का प्रतीक है, जो जीवन को निराशा से आशा की ओर, भय से निर्भयता की ओर और दुर्बलता से शक्ति की ओर ले जाने का संदेश देती है। भगवान शिव के प्रति अटूट श्रद्धा, आत्मबल और सकारात्मक दृष्टिकोण का यह अद्भुत संगम ही मृतसञ्जीवन स्तोत्र को युगों से श्रद्धा और विश्वास का केन्द्र बनाता आया है।
evamaradhy gaurishan devan mrityungjayameshvaran ।
mritasangjivanan namna kavachan prajapet sada ॥
महादेवस्य कवचं मृतसञ्जीवनामकं ॥ २॥
sarat sarataran punyan guhyadguhyataran shubhan ।
mahadevasy kavachan mritasangjivanamakan ॥
शृत्वैतद्दिव्य कवचं रहस्यं कुरु सर्वदा ॥३॥
samahitamana bhootva shrinushv kavachan shubhan ।
shritvaitaddivy kavachan rahasyan kuru sarvada ॥
मृत्युञ्जयो महादेवः प्राच्यां मां पातु सर्वदा ॥४॥
varabhayakaro yajva sarvadevanishevitah ।
mrityungjayo mahadevah prachyan man patu sarvada ॥
सदाशिवोऽग्निरूपी मामाग्नेय्यां पातु सर्वदा ॥५॥
dadhaanah shaktimabhayan trimukhan shadbhujah prabhuh ।
sadashivo-a-gniroopi mamagneyyan patu sarvada ॥
यमरूपि महादेवो दक्षिणस्यां सदावतु ॥६॥
ashtadasabhujopeto dandabhayakaro vibhuh ।
yamaroopi mahadevo dakshinnasyan sadavatu ॥
रक्षोरूपी महेशो मां नैरृत्यां सर्वदावतु ॥७॥
khadgabhayakaro dhiro rakshogannanishevitah ।
rakshoroopi mahesho man nairrityan sarvadavatu ॥
वरुणात्मा महादेवः पश्चिमे मां सदावतु ॥८॥
pashabhayabhujah sarvaratnakaranishevitah ।
varunatma mahadevah pashchime man sadavatu ॥
गदाभयकरः प्राणनायकः सर्वदागतिः ।
वायव्यां मारुतात्मा मां शङ्करः पातु सर्वदा ॥९॥
gadabhayakarah prannanayakah sarvadagatih ।
vayavyan marutatma man shangkarah patu sarvada ॥
सर्वात्मान्तरदिग्भागे पातु मां शङ्करः प्रभुः ॥१०॥
shangkhabhayakarastho man nayakah parameshvarah ।
sarvatmantaradigbhage patu man shangkarah prabhuh ॥
ईशानात्मा तथैशान्यां पातु मां परमेश्वरः ॥११॥
shoolabhayakarah sarvavidyanamadhinayakah ।
eeshanatma tathaishanyan patu man parameshvarah ॥
शिरो मे शङ्करः पातु ललाटं चन्द्रशेखरः॥१२॥
oordhvabhage brahmaroopi vishvatma-a-dhah sadavatu ।
shiro me shangkarah patu lalatan chandrashekharah ॥
भ्रूयुग्मं गिरिशः पातु कर्णौ पातु महेश्वरः ॥१३॥
bhoomadhyan sarvalokeshastrinetro lochane-a-vatu ।
bhrooyugman girishah patu karnau patu maheshvarah ॥
जिह्वां मे दक्षिणामूर्तिर्दन्तान्मे गिरिशोऽवतु ॥१४॥
nasikan me mahadev oshthau patu vrishadhvajah ।
jihvan me dakshinamoortirdantanme girisho-a-vatu ॥
पिनाकि मत्करौ पातु त्रिशूलि हृदयं मम ॥१५॥
mrituyngjayo mukhan patu kanthan me nagabhooshannah ।
pinaki matkarau patu trishooli hridayan mam ॥
नाभिं पातु विरूपाक्षः पार्श्वौ मे पार्वतीपतिः ॥१६॥
pangchavaktrah stanau patu udaran jagadishvarah ।
nabhin patu viroopakshah parshvau me parvatipatih ॥
गुह्यं महेश्वरः पातु ममोरू पातु भैरवः ॥१७॥
katadvayan girishau me prishthan me pramathadhipah ।
guhyan maheshvarah patu mamoroo patu bhairavah ॥
पादौ मे सततं पातु लोकवन्द्यः सदाशिवः ॥१८॥
januni me jagaddarta jangghe me jagadambika ।
padau me satatan patu lokavandyah sadashivah ॥
मृत्युञ्जयो ममायुष्यं चित्तं मे गणनायकः ॥१९॥
एतत्ते कवचं पुण्यं देवतानां च दुर्लभम् ॥२०॥
sarvanggan me sada patu kalakalah sadashivah ।
etatte kavachan punyan devatanan ch durlabham ॥
सह्स्रावर्तनं चास्य पुरश्चरणमीरितम् ॥२१॥
mritasangjivanan namna mahadeven keertitam।
sahsravartanan chasy purashcharannamiritam ॥
सकालमृत्युं निर्जित्य सदायुष्यं समश्नुते ॥२२॥
yah pathechchhrinuyannityan shravayetsu samahitah ।
sakalamrityun nirjity sadayushyan samashnute ॥
आधयोव्याध्यस्तस्य न भवन्ति कदाचन ॥२३॥
hasten va yada sprishtva mritan sangjivayatyasau ।
aadhayovyadhyastasy n bhavanti kadachan ॥
अणिमादिगुणैश्वर्यं लभते मानवोत्तमः ॥२४॥
kalamriyumapi praptamasau jayati sarvada ।
animadigunaishvaryan labhate manavottamah ॥
युद्दमध्ये स्थितः शत्रुः सद्यः सर्वैर्न दृश्यते ॥२५॥
yuddarambhe pathitvedamashtavishativarakan ।
yuddamadhye sthitah shatruh sadyah sarvairn drishyate ॥
विजयं लभते देवयुद्दमध्येऽपि सर्वदा ॥२६॥
n brahmadini chastrani kshayan kurvanti tasy vai ।
vijayan labhate devayuddamadhye-a-pi sarvada ॥
अक्षय्यं लभते सौख्यमिह लोके परत्र च ॥२७॥
pratarootthay satatan yah pathetkavachan shubhan ।
akshayyan labhate saukhyamih loke paratr ch ॥
अजरामरणो भूत्वा सदा षोडशवार्षिकः ॥२८॥
sarvavyadhivinirmriktah sarvarogavivarjitah ।
॥ iti vasishth krit mritasangjivan stotram ॥
॥ इस प्रकार मृतसञ्जीवन कवच सम्पूर्ण हुआ ॥
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16 टिप्पणियां:
Thanks for the valuable mantra.
Thanks for the valuable mantra.
ये मृत संजीवनी स्त्रोत कहाँ से लिया गया है।
किस ग्रंथ में इसका वर्णन है।
बहुत सुंदर और प्रेरक शक्ति प्रदायक है।
Hello sir eska garnth kha milega
Mujhe chye kha uplbad hoga
हर हर महादेव
बहुत बहुत साधुवाद
धन्य हो आप
मृत संजीवनी कवच (इस कवच का) विनियोग क्या है?
शिवस्तोत्ररत्नाकर नाम की छोटी पुस्तक मिलेगी उसमे ह ये
शिवस्तोत्ररत्नाकर पुस्तक ले आना।
शिवस्तोत्ररत्नाकर पुस्तक ले आना।
शिवस्तोत्ररत्नाकर पुस्तक ले आना।
शिवस्तोत्ररत्नाकर पुस्तक ले आना।
विनियोग मन्त्र प्राप्त करने के लिए भगवान श्री लक्ष्मीनारायण धाम।
ब्रह्मऋषि श्री कुमार स्वामी जी को फॉलो करें। गूगल पर सर्च करें।और आने वाला समागम (सत्संग)अटेंड करे
भगवान राम के गुरु श्री वसिष्ठ जी ने किसी सम्वाद में बताया ह।।शिवस्तोत्ररत्नाकर पुस्तक ले आना।उसमे प्रिंटेड ह
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