गोस्वामी तुलसीदास का जीवन एवं साहित्यिक परिचय



 
भगवान राम के पावन चरित्र वर्णन से जहां तुलसी ने आत्मकल्याण किया वहां उन्होंने भारतीय समाज, संस्कृति एवं धर्म का वह उपकार किया है जो आज तक भी हिन्दी का साहित्यकार नहीं कर सका। निःसंदेह ठीक ही है।
भारी सब सागर में उतारतै कौन पार,
जो पै यह रामायण तुलसी न गावतो।।
 TULSI DAS JI KE DOHE 
 तुलसीदास का जीवन परिचय
 कुछ विद्धानों के मध्‍य विवाद का विषय है कि तुलसीदास का जन्म कब हुआ था किन्‍तु
पन्द्रह सौ चौउन बिसे, कालिंदी के तीर,
श्रावन शुक्ला सप्तमी, तुलसी धरयौ शरीर।
इस दोहे अनुसार इस महाकवि का जन्म बाँदा जिले के राजापुर नामक स्थान में सन् 1490 ई. में हुआ था। पिता का नाम पं. आत्माराम तथा माता का नाम हुलसी था। ये सरयू पारीण बाह्मण थे। जल श्रुति के अनुसार अभुक्त मूल वदात्र पैदा होने के कारण माता-पिता ने इन्हें त्याद दिया था। इधर से उधर भटकते हुए आथ बालक तुलसी का बाबा नरहरिदास ने पालन-पोषण किया, गुरु मंत्र दिया तथा इन्हें संस्कृत का अध्ययन कराया। इसके पश्चात् ये काशी चल गए, वहां विधिवत् शास्त्रों का अध्ययन किया और वहां से फिर राजापुर लौट आये।

भगवान शंकरजी की प्रेरणा से रामशैल पर रहनेवाले श्री अनन्तानन्द जी के प्रिय शिष्य श्रीनरहर्यानन्द जी (नरहरि बाबा) ने इस रामबोला के नाम से बहुचर्चित हो चुके इस बालक को ढूँढ निकाला और विधिवत उसका नाम तुलसीराम रखा। तदुपरान्त वे उसे अयोध्या (उत्तर प्रदेश) ले गये और वहाँ संवत्‌ 1561 माघ शुक्ला पञ्चमी (शुक्रवार) को उसका यज्ञोपवीत-संस्कार सम्पन्न कराया। संस्कार के समय भी बिना सिखाये ही बालक रामबोला ने गायत्री-मन्त्र का स्पष्ठ उच्चारण किया, जिसे देखकर सब लोग चकित हो गये। इसके बाद नरहरि बाबा ने वैष्णवों के पाँच संस्कार करके बालक को राम-मन्त्र की दीक्षा दी और अयोध्या में ही रहकर उसे विद्याध्ययन कराया। बालक रामबोला की बुद्धि बड़ी प्रखर थी। वह एक ही बार में गुरु-मुख से जो सुन लेता, उसे वह कंठस्थ हो जाता। वहाँ से कुछ काल के बाद गुरु-शिष्य दोनों शूकरक्षेत्र (सोरों) पहुँचे। वहाँ नरहरि बाबा ने बालक को राम-कथा सुनायी किन्तु वह उसे भली-भाँति समझ न आयी।

ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी, गुरुवार, संवत् 1583 को 29 वर्ष की आयु में राजापुर से थोडी ही दूर यमुना के उस पार स्थित एक गाँव की अति सुन्दरी भारद्वाज गोत्र की कन्या रत्नावली के साथ उनका विवाह हुआ। चूँकि गौना नहीं हुआ था अत: कुछ समय के लिये वे काशी चले गये और वहाँ शेषसनातन जी के पास रहकर वेद-वेदांग के अध्ययन में जुट गये। वहाँ रहते हुए अचानक एक दिन उन्हें अपनी पत्नी की याद आयी और वे व्याकुल होने लगे। जब नहीं रहा गया तो गुरूजी से आज्ञा लेकर वे अपनी जन्मभूमि राजापुर लौट आये। पत्नी रत्नावली चूँकि मायके में ही थी क्योंकि तब तक उनका गौना नहीं हुआ था अत: तुलसीराम ने भयंकर अँधेरी रात में उफनती यमुना नदी तैरकर पार की और सीधे अपनी पत्नी के शयन-कक्ष में जा पहुँचे। रत्नावली इतनी रात गये अपने पति को अकेले आया देख कर आश्चर्यचकित हो गयी। उसने लोक-लज्जा के भय से जब उन्हें चुपचाप वापस जाने को कहा तो वे उससे उसी समय घर चलने का आग्रह करने लगे। उनकी इस अप्रत्याशित जिद से खीझकर रत्नावली ने स्वरचित एक दोहे के माध्यम से जो शिक्षा उन्हें दी उसने ही तुलसीराम को तुलसीदास बना दिया। रत्नावली ने जो दोहा कहा था वह इस प्रकार है:
अस्थि चर्म मय देहमय, ता में जैसी प्रीति,
तैसी जो श्री श्राम में, होति न तब भय भीति।।
यह दोहा सुनते ही उन्होंने उसी समय पत्नी को वहीं उसके पिता के घर छोड़ दिया और वापस अपने गाँव राजापुर लौट गये। राजापुर में अपने घर जाकर जब उन्हें यह पता चला कि उनकी अनुपस्थिति में उनके पिता भी नहीं रहे और पूरा घर नष्ट हो चुका है तो उन्हें और भी अधिक कष्ट हुआ। उन्होंने विधि-विधान पूर्वक अपने पिता जी का श्राद्ध किया और गाँव में ही रहकर लोगों को भगवान राम की कथा सुनाने लगे।

कुछ काल राजापुर रहने के बाद वे पुन: काशी चले गये और वहाँ की जनता को राम-कथा सुनाने लगे। कथा के दौरान उन्हें एक दिन मनुष्य के वेष में एक प्रेत मिला, जिसने उन्हें हनुमान ‌जी का पता बतलाया। हनुमान ‌जी से मिलकर तुलसीदास ने उनसे श्रीरघुनाथजी का दर्शन कराने की प्रार्थना की। हनुमान्‌जी ने कहा- "तुम्हें चित्रकूट में रघुनाथजी दर्शन होंगें।" इस पर तुलसीदास जी चित्रकूट की ओर चल पड़े।

चित्रकूट पहुँच कर उन्होंने रामघाट पर अपना आसन जमाया। एक दिन वे प्रदक्षिणा करने निकले ही थे कि यकायक मार्ग में उन्हें श्रीराम के दर्शन हुए। उन्होंने देखा कि दो बड़े ही सुन्दर राजकुमार घोड़ों पर सवार होकर धनुष-बाण लिये जा रहे हैं। तुलसीदास उन्हें देखकर आकर्षित तो हुए, परन्तु उन्हें पहचान न सके। तभी पीछे से हनुमान्‌जी ने आकर जब उन्हें सारा भेद बताया तो वे पश्चाताप करने लगे। इस पर हनुमान्‌जी ने उन्हें सात्वना दी और कहा प्रातःकाल फिर दर्शन होंगे।

संवत्‌ 1607 की मौनी अमावस्या को बुधवार के दिन उनके सामने भगवान श्रीराम पुनः प्रकट हुए। उन्होंने बालक रूप में आकर तुलसीदास से कहा-"बाबा! हमें चन्दन चाहिये क्या आप हमें चन्दन दे सकते हैं?" हनुमान ‌जी ने सोचा, कहीं वे इस बार भी धोखा न खा जायें, इसलिये उन्होंने तोते का रूप धारण करके यह दोहा कहा:
चित्रकूट के घाट पर, भइ सन्तन की भीर।
तुलसिदास चन्दन घिसें, तिलक देत रघुबीर॥
तुलसीदास श्रीराम जी की उस अद्भुत छवि को निहार कर अपने शरीर की सुध-बुध ही भूल गये। अन्ततोगत्वा भगवान ने स्वयं अपने हाथ से चन्दन लेकर अपने तथा तुलसीदास जी के मस्तक पर लगाया और अन्तर्ध्यान हो गये। इसके पश्‍चात शास्त्रों का मंथन किया और साथ-साथ पर्यटन भी। रामेश्वर, जगन्नाथ, अयोध्या, चित्रकूट, मथुरा आदि सभी तीर्थों का परिभ्रमण किया। फिर अयोध्या, आकर इन्होनें अपने विश्व-विश्रत महाकाव्य ‘रामायण’ की रचना प्रारम्भ की। कुछ समय पश्चात् ये काशी चले गये और प्रहलाद घाट पर रहने लगे। यहीं इनके इस महाकाव्य की परिसमाप्ति हुइर्। यहीं रहकर दोहावली, विनय पत्रिका आदि ग्रन्थों की भी रचना की। यहीं रहते हुए सन् 1623 ई. में इस महापुरुष का स्वर्गवास हुआ। मृत्यु के संबंध में यह दोहा प्रसिद्ध हैः-
सम्वत् सोलह सो असी, असी गग के तीर।
श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यौ शरीर।।
 

तुलसीदास द्वारा रचित ग्रंथों का संक्षिप्त विवरण
तुलसीदास जी ने सवा सौ वर्ष का दीर्घ जीवन प्राप्त किया था। यही कारण है कि इतने अधिक समृद्धिशाली साहित्य से हिन्दी की रिक्त प्राय गोद को भरने में समर्थ हो सके। तुलसी का समस्त जीवन साहित्य-साधना एवं कष्टों का जीवन था। रचनायें इस प्रकार हैः-
  • रामचरितमानस
    संवत्‌ 1631 का प्रारम्भ हुआ। दैवयोग से उस वर्ष रामनवमी के दिन वैसा ही योग आया जैसा त्रेतायुग में राम-जन्म के दिन था। उस दिन प्रातःकाल तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस की रचना प्रारम्भ की। दो वर्ष, सात महीने और छ्ब्बीस दिन में यह अद्भुत ग्रन्थ सम्पन्न हुआ। संवत्‌ 1633 के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में राम-विवाह के दिन सातों काण्ड पूर्ण हो गये।
  • गीतावली
    गीतावली में गीतों का आधार विविध कांड का रामचरित ही रहा है। यह ग्रंथ रामचरितमानस की तरह व्यापक जनसम्पर्क में कम गया प्रतीत होता है। इसलिए इन गीतों में परिवर्तन-परिवर्द्धन दृष्टिगत नहीं होता है। गीतावली में गीतों के कथा - संदर्भ तुलसी की मति के अनुरूप हैं। इस दृष्टि से गीतावली का एक गीत लिया जा सकता है -
    कैकेयी जौ लौं जियत रही।
    तौ लौं बात मातु सों मुह भरि भरत न भूलि कही।।
    मानी राम अधिक जननी ते जननिहु गँसन गही।
    सीय लखन रिपुदवन राम-रुख लखि सबकी निबही।।
    लोक-बेद-मरजाद दोष गुन गति चित चखन चही।
    तुलसी भरत समुझि सुनि राखी राम सनेह सही।।
    इसमें भरत और राम के शील का उत्कर्ष तुलसीदास ने व्यक्त किया है। गीतावली के उत्तरकांड में मानस की कथा से अधिक विस्तार है। इसमें सीता का वाल्मीकि आश्रम में भेजा जाना वर्णित है। इस परित्याग का औचित्य निर्देश इन पंक्तियों में मिलता है -
    भोग पुनि पितु-आयु को, सोउ किए बनै बनाउ।
    परिहरे बिनु जानकी नहीं और अनघ उपाउ।।
    पालिबे असिधार-ब्रत प्रिय प्रेम-पाल सुभाउ।
    होइ हित केहि भांति, नित सुविचारु नहिं चित चाउ।।
  • पार्वती-मंगल
    यह तुलसी की प्रामाणिक रचना प्रतीत होती है। इसकी काव्यात्मक प्रौढ़ता तुलसी सिद्धांत के अनुकूल है। कविता सरल, सुबोध रोचक और सरस है। ""जगत मातु पितु संभु भवानी"" की श्रृंगारिक चेष्टाओं का तनिक भी पुट नहीं है। लोक रीति इतनी यथास्थिति से चित्रित हुई है कि यह संस्कृत के शिव काव्य से कम प्रभावित है और तुलसी की मति की भक्त्यात्मक भूमिका पर विरचित कथा काव्य है। व्यवहारों की सुष्ठुता, प्रेम की अनन्यता और वैवाहिक कार्यक्रम की सरसता को बड़ी सावधानी से कवि ने अंकित किया है। तुलसीदास अपनी इस रचना से अत्यन्त संतुष्ट थे, इसीलिए इस अनासक्त भक्त ने केवल एक बार अपनी मति की सराहना की है -
    प्रेम पाट पटडोरि गौरि-हर-गुन मनि।
    मंगल हार रचेउ कवि मति मृगलोचनि।।
  • श्रीकृष्ण गीतावली
    श्रीकृष्ण गीतावली भी गोस्वामीजी की रचना है। श्रीकृष्ण-कथा के कतिपय प्रकरण गीतों के विषय हैं।
  • रामलता नहछू
    यह संस्कार गीत है। इस गीत में कतिपय उल्लेख राम-विवाह की कथा से भिन्न हैं।
    गोद लिहैं कौशल्या बैठि रामहिं वर हो।
    सोभित दूलह राम सीस, पर आंचर हो।।
  • वैराग्य संदीपनी
    वैराग्य संदीपनी को माताप्रसाद गुप्त ने अप्रामाणिक माना है, पर आचार्य चंद्रवली पांडे इसे प्रामाणिक और तुलसी की आरंभिक रचना मानते हैं। कुछ और प्राचीन प्रतियों के उपलब्ध होने से ठोस प्रमाण मिल सकते हैं। संत महिमा वर्णन का पहला सोरठा पेश है -
    को बरनै मुख एक, तुलसी महिमा संत।
    जिन्हके विमल विवेक, सेष महेस न कहि सकत।।
  • दोहावली
    दोहावली में अधिकांश दोहे मानस के हैं। कवि ने चातक के व्याज से दोहों की एक लंबी श्रृंखला लिखकर भक्ति और प्रेम की व्याख्या की है। दोहावली दोहा संकलन है। मानस के भी कुछ कथा निरपेक्ष दोहों को इसमें स्थान है। संभव है कुछ दोहे इसमें भी प्रक्षिप्त हों, पर रचना की अप्रामाणिकता असंदिग्ध है।
  • जानकी-मंगल
    विद्वानों ने इसे तुलसीदास की प्रामाणिक रचनाओं में स्थान दिया है। पर इसमें भी क्षेपक है।
    पंथ मिले भृगुनाथ हाथ फरसा लिए।
    डाँटहि आँखि देखाइ कोप दारुन किए।।
    राम कीन्ह परितोष रोस रिस परिहरि।
    चले सौंपि सारंग सुफल लोचन करि।।
    रघुबर भुजबल देख उछाह बरातिन्ह।
    मुदित राउ लखि सन्मुख विधि सब भाँतिन्ह।।
    तुलसी के मानस के पूर्व वाल्मीकीय रामायण की कथा ही लोक प्रचलित थी। काशी के पंडितों से मानस को लेकर तुलसीदास का मतभेद और मानस की प्रति पर विश्वनाथ का हस्ताक्षर संबंधी जनश्रुति प्रसिद्ध है।
  • रामाज्ञा प्रश्न
    यह ज्योतिष शास्त्रीय पद्धति का ग्रंथ है। दोहों, सप्तकों और सर्गों में विभक्त यह ग्रंथ रामकथा के विविध मंगल एवं अमंगलमय प्रसंगों की मिश्रित रचना है। काव्य की दृष्टि से इस ग्रंथ का महत्त्व नगण्य है। सभी इसे तुलसीकृत मानते हैं। इसमें कथा-श्रृंखला का अभाव है और वाल्मीकीय रामायण के प्रसंगों का अनुवाद अनेक दोहों में है।
  • बरवै रामायण
    विद्वानों ने इसे तुलसी की रचना घोषित किया है। शैली की दृष्टि से यह तुलसीदास की प्रामाणिक रचना है। इसकी खंडित प्रति ही ग्रंथावली में संपादित है।
  • हनुमान बाहुक
    यह गोस्वामी जी की हनुमत-भक्ति संबंधी रचना है। पर यह एक स्वतंत्र रचना है। इसके सभी अंश प्रामाणिक प्रतीत होते हैं।
    तुलसीदास को राम प्यारे थे, राम की कथा प्यारी थी, राम का रूप प्यारा था और राम का स्वरूप प्यारा था। उनकी बुद्धि, राग, कल्पना और भावुकता पर राम की मर्यादा और लीला का आधिपत्य था। उनक आंखों में राम की छवि बसती थी। सब कुछ राम की पावन लीला में व्यक्त हुआ है जो रामकाव्य की परम्परा की उच्चतम उपलब्धि है। निर्दिष्ट ग्रंथों में इसका एक रस प्रतिबिंब है।
  • कवितावली
    कवितावली तुलसीदास की रचना है, पर सभा संस्करण अथवा अन्य संस्करणों में प्रकाशित यह रचना पूरी नहीं प्रतीत होती है। कवितावली एक प्रबंध रचना है। कथानक में अप्रासंगिकता एवं शिथिलता तुलसी की कला का कलंक कहा जायेगा।
  • विनय पत्रिकविनयपत्रिका तुलसीदास रचित एक ग्रंथ है। यह ब्रज भाषा में रचित है। विनय पत्रिका में विनय के पद है। विनयपत्रिका का एक नाम राम विनयावली भी है विनय पत्रिका की भाषा ब्रज है तथा इसमें 21 रागों का प्रयोग हुआ है विनय पत्रिका का प्रमुख रस शांतरस है इस रस का स्‍थाई भाव निर्वेद होता है। विनय प्रत्रिका अध्‍यात्मिक जीवन को परिलक्षित करती है। इस में सम्‍मलित पदों की संख्‍या 280 है।

काव्यगत विशेषताएँ
भाव-तुलसी का काव्य लोक-कल्याण की चार पवित्र भावनाओं से प्रेरित है। सर्वप्रथम-भक्ति भावना, द्वितीय-समाजिक आदर्शो की स्थापना, तृतीय-धार्मिक समन्वय, चतुर्थ-दासता से मुक्ति का संदेश।

 
भक्ति-भावना
तुलसी की भक्ति अनन्य भाव को भक्ति थी। ये स्मार्त वैष्णव और विशिष्टाद्वैतवादी थे। राम उनके जीवन सर्वस्व है। अपने ईष्टदेव भगवान राम के पावन चरित्र, उन्ही महानता और विशालता तथा अपनी दीनता और दास्य भाव का विशद एवं विस्तृत, कल्याणकारी एवं मनोहारी वर्णन किया है। तुलसी की अनन्यता इससे अधिक क्या हो सकती है। कि जिस देवता से यदि कुछ माँगा भी तो यही माँगा कि राम मेरे मन में निवास करे:-
‘माँगत तुलसीदास कर जोरे, बसहिं राम सिय मानस मोरे’ तुलसीदास की दीनता और अनन्यता अपने स्थान पर अद्वितीय है, कितना भी कठोर स्वामी क्यों न हो सेवक की इन बातों से जरुर पिघल जाएगा।
रावरे को दूसरो न द्वार राम दया धाम।
रावरी ही गति बले, विभव विहीन की।। 

सामाजिक आदर्शों की स्थापना
तत्कालीन समाज की स्थिति अस्त-व्यस्त एवं अव्यवस्थित हो चुकी थी। तुलसी ने मर्यादा पुरूषोत्तम राम का अनुकरणीय आदर्श चरित्र समाज के आगे रखा। समाज को स्वस्थ एवं सुनियंत्रित बनाने के लिए राम के आदर्श चरित्र के माध्यम से समाज का नीति निर्देश एवं पथ-प्रदर्शन किया। लोक मंगल की भावना सं े ओतःप्रोत तुलसी का काव्य मानव-जीवन के अनन्त कर्तव्यों से भरा पड़ा है जिससे समाज आज भी नियन्त्रित और अनुप्रणित हो रहा है।

धार्मिक समन्वय
तुलसी महान समन्वयवादी थे। विश्रृंखलित समाज में उस समय धर्म का स्वरूप विकृत होता जा रहा था। अनेकों वाद, सम्प्रदाय और मत मतान्तर पारस्परिक विद्वेष और धृणा फैला रहे थे। इस विद्वेष को दूर करने के लिए तुलसी ने अपने काव्य में बड़ा बुद्धिमतापूर्वक सभी को एक दूसरे से मिलाने का और पास लाने का सफल प्रयत्न किया।
दासता से मुक्ति का संदेश 
विदेशी विजेताओं ने भारत में जमकर अपना राज्य स्थापित कर लिया था। जन नायक के अभाव में जनता राह भूले राहगीर की भाँति भटक रही थी, मुक्ति का मार्ग दूर-दूर तक दिखाई न देता था। तुलसी ने इस अभाव की पूर्ति की। जनता को संगठन और सुसंगठित शक्ति का महान संदेश दिया। 

भाषा
तुलसी की भाषा अवधी एवं ब्रज है। राम चरित मानस अवधी भाषा में तथा विनय पत्रिका, कवितावली, दोहावली, गीतावली आदि ब्रज भाषा में लिखित काव्य है। इनकी दोनो भाषाएं भावों को प्रकट करने में पूर्णतया समर्थ है। संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग किया गया है। कहीं अरबी और फारसी के सरल शब्द भी पाए जाते है। शब्द चयन व्यवस्थित है। भाषा में अपूर्व प्रवाह है। भाषा ओज, प्रमाद और माधुर्य गुणों से युक्त है।
शैली
तुलसी ने अपने समय तक हिन्दी काव्य जगत् में प्रचलित समस्त शैलियों में विद्वता पूर्वक रचना करके सभी शैलियों का प्रतिनिधित्व किया है। भिन्न-भिन्न शैलियाँ तथा रचनाएँ इस प्रकार है।
  1. चन्द की छप्पय शैली-कवितावली में।
  2. कबीर की दोहा शैली-कवितावली में।
  3. सूर की पद शैली-गीतावली तथा विनयपत्रिका में।
  4. जायसी की चैपाई शैली-कवितावली में।
  5. रहीम की बरवैशैली-बरवै रामायण में।
  6. मोहर शैली-ग्राम्य एवं लोकगीतों में।
रस, छन्द व अलंकार
महाकवि तुलसी के काव्य में सभी रसों का सफल एवं सुन्दर परिपाक हुआ है। परन्तु प्राधान्य करूण और शान्त रस का है। तुलसी का शृंगार अत्यन्त मर्यादित एवं शिष्ट है। संयोग शृंगार की एक झलक पात्र देखिए-
"राम को रूप निहारति जानकी कंकन के नग की परछाही,
याते सवैं सुध भूलि गई कर टेक रही पल टरति नाहीं।।" 
छन्द योजना तुलसी की अत्यन्त विस्तृत एवं व्यापक है। इन्होने युग की प्रचलित सभी शैलियों एवं छन्दों का प्रयोग अपने काव्य में किया था। परन्तु दोहा, चैपाई कविता सवैया तथा पद तुलसी को अधिक प्रिय थे।
तुलसी को अंलकारों की चिंता नहीं थी। इन्हें सच्वे भाव की आवश्यकता थी। इस पर भी जहाँ आप की दृष्टि जाएगी वहाँ आपको कोई न कोई अलंकार अवश्य मिल जाएगा। तुलसी के काव्य में अलंकार भावों के पीछे-पीछे सहायक बनकर चले है। फिर भी उपमा, रूपक, सांगरूपक, उत्प्रेक्षा आदि का स्वाभाविक एवं सफल प्रयोग दर्शनीय है।

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