चाणक्य नीति की 656 अकाट्य बातें जो आपको कभी फेल नही होने देगी Chankya Niti in Hindi



 
चाणक्य, चन्द्रगुप्त मौर्य के महामंत्री थे। वे 'कौटिल्य' नाम से भी विख्यात हैं। उन्होने नंदवंश का नाश करके चन्द्रगुप्त मौर्य को राजा बनाया। उनके द्वारा रचित अर्थशास्त्र राजनीति, अर्थनीति, कृषि, समाजनीति आदि का महान ग्रंन्थ है। अर्थशास्त्र मौर्यकालीन भारतीय समाज का दर्पण माना जाता है। मुद्राराक्षस के अनुसार इनका असली नाम 'विष्णुगुप्त' था। विष्णुपुराण, भागवत आदि पुराणों तथा कथासरित्सागर आदि संस्कृत ग्रंथों में तो चाणक्य का नाम आया ही है, बौद्ध ग्रंथो में भी इसकी कथा बराबर मिलती है। बुद्धघोष की बनाई हुई विनयपिटक की टीका तथा महानाम स्थविर रचित महावंश की टीका में चाणक्य का वृत्तांत दिया हुआ है। चाणक्य तक्षशिला (जो अब पाकिस्‍तान मे है) के निवासी थे। इनके जीवन की घटनाओं का विशेष संबंध मौर्य चंद्रगुप्त की राज्यप्राप्ति से है। ये उस समय के एक प्रसिद्ध विद्वान थे, इसमें कोई संदेह नहीं। कहते हैं कि चाणक्य राजसी ठाट-बाट से दूर एक छोटी सी कुटिया में रहते थे।
चाणक्य एक महान साहित्यकार, शिक्षक, दर्शनशास्त्री, अर्थशास्त्री व सलाहकार थे। चाणक्य बहुत ज्ञानी और समझदार व्‍यक्तित्‍व के इंसान थे, जिन्हें अर्थशास्त्र की अच्छी समझ थी। चाणक्य ने अपनी सूझबूझ व कूटनीति से मौर्य साम्राज्य की स्थापना की, उन्होंने चन्द्रगुप्त जैसे साधारण से इंसान को भारत देश के सबसे बड़े साम्राज्य का संस्थापक बना दिया। चाणक्य एक शिक्षक थे जो अर्थशास्त्र, कॉमर्स की शिक्षा दिया करते थे, उन्हें लेखन का भी बहुत शौक था, उनकी प्रसिद्ध रचना चाणक्य नीति, अर्थशास्त्र व नीतिशास्त्र रही। चाणक्य की ज़िन्दगी के बारे में उनकी पुस्तक ‘कौटिल्य’ में सब कुछ लिखा हुआ है, जिसे पढ़ कर हम उन्हें और करीब से जान सकते है। चाणक्य एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे, इसके बावजूद उनमें राजा वाली गुणवत्ता थी। चाणक्य बहुत बड़े देशभक्त थे, देश के लिए वो किसी भी हद तक जा सकते थे। वे हमेशा देश हित का सोचते थे, इसके लिए उन्होंने कूटनीति भी बनाई थी, इसलिए उन्हें कूटनीतिज्ञ कहा गया।

आचार्य चाणक्य ने महाराज चंद्र गुप्त को अखंड भारत का सम्राट बनने में सहायता करने बाद विशाल साम्राज्य की प्रजा के मार्गदर्शन के लिए एक नीतिशास्त्र की रचना की थी जिसे आज 'चाणक्य नीति' के नाम से जाना जाता है। भले ही 'चाणक्य नीति' आज से करीब 2000 साल पहले लिखी गई पर आज भी इसमें बताई गई ज्यादातर बातें उतनी ही सही बैठती हैं जितनी कि तब थी। 

चाणक्य ने चाणक्य नीति के अलावा सैकड़ों ऐसे कथन और कहे थे जिन्हें की हर इंसान को पढ़ना, समझना और अपने जीवन में अपनाना चाहिए। आज हम आपको उनके ऐसे ही कुछ कथनों और विचारों के बारे में बताने जा रहे हैं। चाणक्य ने हर उम्र, हर वर्ग के लोगों के लिए अपने अनुभवों से संचित ज्ञान को प्रस्तुत किया है। चाणक्य ने युवाओं के लिए ऐसी बताई है कि युवाओं को किन बातों से परहेज करना चाहिए और किन बातों को जीवन में आत्मसात करना चाहिये। किसी भी देश का युवा उस देश की शक्ति होते हैं। युवा देश की संस्कृति और धरोहरों के रक्षक होते हैं। आइए जानते हैं चाणक्य ने किन बातों के लिए युवाओं को चेताया है।
Chanakya Niti in Hindi
  1. अकारण किसी के घर में प्रवेश न करें।
  2. अकुलीन धनिक भी कुलीन से श्रेष्ठ है।
  3. अगम्भीर विद्वान को संसार में सम्मान नहीं मिलता।
  4. अगर सांप जहरीला ना भी हो तो उसे खुद को जहरीला दिखाना चाहिए।
  5. अग्नि के समान तेजस्वी जानकर ही किसी का सहारा लेना चाहिए।
  6. अग्नि में दुर्बलता नहीं होती।
  7. अच्छी सेहत के लिए अच्छी नींद की आवश्यकता होती है लेकिन युवा वर्ग अगर नींद से ही प्रेम करने लगे तो उनमें आलस्य की मात्रा बढ़ जाती है और समय भी उनके पास कम बचता है, चाणक्य की चेतावनी है सोने में जीवन को खोना नहीं।
  8. अजीर्ण की स्थिति में भोजन दुःख पहुंचाता है।
  9. अज्ञानी लोगों द्वारा प्रचारित बातों पर चलने से जीवन व्यर्थ हो जाता है।
  10. अज्ञानी व्यक्ति के कार्य को बहुत अधिक महत्व नहीं देना चाहिए।
  11. अति आसक्ति दोष उत्पन्न करती है।
  12. अत्यधिक आदर-सत्कार से शंका उत्पन्न हो जाती है।
  13. अत्यधिक भार उठाने वाला व्यक्ति जल्दी थक जाता है।
  14. अधर्म बुद्धि से आत्मविनाश की सूचना मिलती है।
  15. अधिक मैथुन (सेक्स) से पुरुष बूढ़ा हो जाता है।
  16. अनुराग अर्थात प्रेम फल अथवा परिणाम से ज्ञात होता है।
  17. अन्न के सिवाय कोई दूसरा धन नहीं है।
  18. अन्न दान करने से भ्रूण हत्या (गर्भपात) के पाप से मुक्ति मिल जाती है।
  19. अपनी कमजोरी का प्रकाशन न करें
  20. अपनी दासी को ग्रहण करना स्वयं को दास बना लेना है।
  21. अपनी शक्ति को जानकार ही कार्य करें।
  22. अपनी सेवा से स्वामी की कृपा पाना सेवकों का धर्म है।
  23. अपने कार्य की शीघ्र सिद्धि चाहने वाला व्यक्ति नक्षत्रों की परीक्षा नहीं करता।
  24. अपने कुल अर्थात वंश के अनुसार ही व्यवहार करें।
  25. अपने तथा अन्य लोगों के बिगड़े कार्यों का स्वयं निरीक्षण करना चाहिए।
  26. अपने धर्म के लिए ही कोई सत्पुरुष कहलाता है।
  27. अपने व्यवसाय में सफल नीच व्यक्ति को भी साझीदार नहीं बनाना चाहिए।
  28. अपने व्यवहार में बहुत सीधे ना रहे, आप यदि वन जाकर देखते है तो पायेंगे की जो पेड़ सीधे उगे उन्हें काट लिया गया और जो पेड़ आड़े तिरछे है वो खड़े है।
  29. अपने से अधिक शक्तिशाली और समान बल वाले से शत्रुता न करें।
  30. अपने स्थान पर बने रहने से ही मनुष्य पूजा जाता है।
  31. अपने स्वामी के स्वभाव को जानकार ही आश्रित कर्मचारी कार्य करते है।
  32. अपमानित हो के जीने से अच्छा मरना है, मृत्यु तो बस एक क्षण का दुःख देती है, लेकिन अपमान हर दिन जीवन में दुःख लाता है।
  33. अपराध के अनुरूप ही दंड दें अर्थात कथन के अनुसार ही उत्तर दें।
  34. अप्राप्त लाभ आदि राजतंत्र के चार आधार है।
  35. अर्थ का आधार राज्य है।
  36. अर्थ कार्य का आधार है।
  37. अर्थ, धर्म और कर्म का आधार है।
  38. अल्प व्यसन भी दुःख देने वाला होता है।
  39. अविनीत व्यक्ति को स्नेही होने पर भी अपनी मंत्रणा में नहीं रखना चाहिए।
  40. अविनीत स्वामी के होने से तो स्वामी का न होना अच्छा है।
  41. अविश्वसनीय लोगों पर विश्वास नहीं करना चाहिए।
  42. अशुभ कार्य न चाहने वाले स्त्रियों में आसक्त नहीं होते।
  43. अशुभ कार्यों को नहीं करना चाहिए अर्थात गलत कार्यों को नहीं करना चाहिए।
  44. असंशय की स्थिति में विनाश से अच्छा तो संशय की स्थिति में हुआ विनाश होता है।
  45. असहाय पथिक बनकर मार्ग में न जाएं।
  46. अस्थिर मन वाले की सोच स्थिर नहीं रहती।
  47. अहंकार से बड़ा मनुष्य का कोई शत्रु नहीं।
  48. अहिंसा धर्म का लक्षण है। संसार की प्रत्येक वास्तु नाशवान है।
  49. आँखों के बिना शरीर क्या है?
  50. आंखें ही देहधारियों की नेता है।
  51. आंखों के समान कोई ज्योति नहीं।
  52. आग में घी नहीं डालनी चाहिए अर्थात क्रोधी व्यक्ति को अधिक क्रोध नहीं दिलाना चाहिए।
  53. आग सिर में स्थापित करने पर भी जलाती है अर्थात दुष्ट व्यक्ति का कितना भी सम्मान कर लें, वह सदा दुःख ही देता है।
  54. आचार्य चाणक्य कहते हैं कि क्रोध हर इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन होता है, क्रोध में आते ही व्यक्ति की सोचने-समझने की शक्ति नष्ट हो जाती है। क्रोध से युवाओं को हमेशा बचना चाहिए।
  55. आचार्य चाणक्य का मानना है कि छात्रों के लिए जरूरत से ज्यादा मनोरंजन नुकसानदायक हो सकता है, जितना जरूरी हो उतना ही मनोरंजन करें अधिक मनोरंजन से युवा शक्ति का ह्रास होता है।
  56. आत्म रक्षा से ही सबकी रक्षा होती है।
  57. आत्म सम्मान के हनन से विकास का विनाश हो जाता है।
  58. आत्मविजयी सभी प्रकार की संपत्ति एकत्र करने में समर्थ होता है।
  59. आत्मस्तुति अर्थात अपनी प्रशंसा अपने ही मुख से नहीं करनी चाहिए।
  60. आत्मा व्यवहार की साक्षी है, आत्मा तो सभी की साक्षी है, कूट साक्षी नहीं होना चाहिए।
  61. आधी रात तक जागते नहीं रहना चाहिए।
  62. आप जो करना चाहते हैं उसे जाहिर ना होने दे लेकिन जो आप करना चाहते हैं उसे बुद्धिमानी से छिपा कर रखे और अपने काम को करते रहे।
  63. आपको कभी भी अपना कोई राज़ किसी भी दोस्त को नहीं बताना चाहिए, क्योंकि एक पक्का दोस्त भी नाराज़ होने पर आपके सारे राज़ खोल सकता है।
  64. आपातकाल में स्नेह करने वाला व्यक्ति ही मित्र होता है।
  65. आपातकाल में स्नेह करने वाला ही मित्र होता है।
  66. आलसी का न वर्तमान है, और न ही भविष्य।
  67. आलसी राजा अपने विवेक की रक्षा नहीं कर सकता।
  68. आलसी राजा अप्राप्त लाभ को प्राप्त नहीं करता।
  69. आलसी राजा की प्रशंसा उसके सेवक भी नहीं करते।
  70. आलसी राजा प्राप्त वास्तु की रक्षा करने में असमर्थ होता है।
  71. आवश्यकतानुसार कम भोजन करना ही स्वास्थ्य प्रदान करता है।
  72. आशा के साथ धैर्य नहीं होता।
  73. आशा लज्जा को दूर कर देती है अर्थात मनुष्य को निर्लज बना देती है।
  74. इंद्रियों के अत्यधिक प्रयोग से बुढ़ापा आना शुरू हो जाता है।
  75. इन्द्रियों को वश में करना ही तप का सार है।
  76. इन्द्रियों पर विजय का आधार विनम्रता है।
  77. इस बात को व्यक्त मत होने दीजिये कि आपने क्या करने के लिए सोचा है, बुद्धिमानी से इसे रहस्य बनाये रखिये और इस काम को करने के लिए दृढ़ रहिये।
  78. इसे आज की भाषा में हम फैशन कह सकते हैं। युवा विद्यार्थियों को हमेशा सादा जीवनशैली अपनाना चाहिए। साफ सुथरे रहें लेकिन अतिरिक्त साज-सज्जा, श्रृंगार करने वाले युवाओं का मन अध्ययन से भटकता है। अतः चाणक्य कहते हैं इनसे दूरी बनाकर रखें।
  79. ईर्ष्या करने वाले दो समान व्यक्तियों में विरोध पैदा कर देना चाहिए।
  80. उचित समय पर सम्भोग सुख न मिलने से स्त्री बूढ़ी हो जाती है।
  81. उत्साह हीन व्यक्ति का भाग्य भी अंधकारमय हो जाता है।
  82. उदासीन होकर शत्रु की उपेक्षा न करें।
  83. उन्नति और अवनति वाणी के अधीन है।
  84. उपकार का बदला चुकाने के भय से दुष्ट व्यक्ति शत्रु बन जाता है।
  85. उपाय से सभी कई कार्य पूर्ण हो जाते है। कोई भी कार्य कठिन नहीं होता।
  86. उपायों को जानने वाला कठिन कार्यों को भी सरल बना लेता है।
  87. उपार्जित धन का त्याग ही उसकी रक्षा है अर्थात उपार्जित धन को लोक हित के कार्यों में खर्च करके सुरक्षित कर लेना चाहिए।
  88. उम्र के अनुरूप ही वेश धारण करें।
  89. उस व्यक्ति को जीवन में स्वर्ग जैसा सुख प्राप्त होता है, जिसका पुत्र आज्ञाकारी और पत्नी भरोसेमंद हो। व्यक्ति को स्वयं भी संतोषी होना आवश्यक है।
  90. ऋण, शत्रु और रोग को समाप्त कर देना चाहिए।
  91. ऋण, शत्रु और रोग को समाप्त कर देना चाहिए।
  92. एक अंग का दोष भी पुरुष को दुखी करता है।
  93. एक अकेला पहिया नहीं चला करता।
  94. एक अच्छा दोस्त वही है जो जरूरत पड़ने पर आपके काम आए, जा फिर दुर्घटना में आपकी सहायता करे।
  95. एक अनपढ़ व्यक्ति का जीवन उसी तरह से बेकार है जैसे की कुत्ते की पूँछ, जो ना उसके पीछे का भाग ढकती है ना ही उसे कीड़े-मकोड़ों के डंक से बचाती है।
  96. एक आदमी अकेला जन्म लेता हैं अकेला मृत्यु पाता हैं अकेला ही अपने कर्मो का अच्छा बुरा फल भोगता हैं और अकेले ही स्वर्ग अथवा नरक का वासी बनता हैं ।
  97. एक उत्कृष्ट बात जो शेर से सीखी जा सकती है वो ये है कि व्यक्ति जो कुछ भी करना चाहता है उसे पूरे दिल और जोरदार प्रयास के साथ करें।
  98. एक ऐसा बालक जो जन्मते वक़्त मृत था, एक मूर्ख दीर्घायु बालक से बेहतर है। पहला बालक तो एक क्षण के लिए दुःख देता है, दूसरा बालक उसके माँ बाप को जिंदगी भर दुःख की अग्नि में जलाता है
  99. एक ज्ञानी व्यक्ति को सभी जगह सम्मान मिलता हैं।
  100. एक परिवार को बचाने के लिए एक मनुष्य, एक गाँव बचाने के लिए एक परिवार तथा संपूर्ण राज्य को बचाने के लिए यदि एक गाँव का बहिष्कार करना पड़े तो इसमें कोई ग़लत बात नहीं है।
  101. एक बिगड़ैल गाय सौ कुत्तों से ज्यादा श्रेष्ठ है। अर्थात एक विपरीत स्वभाव का परम हितैषी व्यक्ति, उन सौ लोगों से श्रेष्ठ है जो आपकी चापलूसी करते हैं।
  102. एक व्यक्ति को अपने संकट भरे समय के लिए धन इकट्ठे कर के रखने चाहिए। यदि कभी उसकी स्त्री किसी संकट में पड़ जाती है तो इस संचित धन का मोह न करते हुए स्त्री को बचाना चाहिए।
  103. एक शिक्षित व्यक्ति हर जगह सम्मान पाता है।
  104. एक शुष्क पेड़ में जब आग लग जाती है तो समस्त जंगल जल जाता है। इसी तरह से एक नालायक पुत्र समस्त खानदान को तबाह कर देता है।
  105. एक सच्चा पुत्र अपने पिता के प्रति आज्ञाकारी होता है और एक सच्चा पिता अपने पुत्र की सभी तरह से देख भाल करता है। सत्यता किसी भी सम्बन्ध को मधुर बनाता है और सम्बन्धी संबंधों से परे मित्र भी बन जाते हैं।
  106. एक स्त्री को अपने घर में रहना चाहिए।
  107. एक ही गुरुकुल में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं का निकट संपर्क ब्रह्मचर्य को नष्ट कर सकता है।
  108. एक ही देश के दो शत्रु परस्पर मित्र होते है।
  109. एक ही देश के दो शत्रु परस्पर मित्र होते हैं।
  110. एरण वृक्ष का सहारा लेकर हाथी को अप्रसन्न न करें।
  111. ऐश्वर्य पैशाचिकता से अलग नहीं होता। स्त्री में गंभीरता न होकर चंचलता होती है।
  112. ऐसे मनुष्य से दूर रहना ही सही होता है, जो सामने मिथ्या- प्रशंसा करता हो तथा पीठ पीछे हानि पहुंचने की नियत रखता हो। ऐसे मित्र विष से भरे उस प्याले की तरह होते हैं, जिसके ऊपर दुग्ध रख दिया गया हो।
  113. ऐसे लोगों से बचना चाहिए जो आपके मुंह पर तो मीठी बातें करते हैं, पर आपकी पीठ पीछे आपको बर्बाद करने की योजना बनाते है, ऐसा करने वाले ज़हर के उस घड़े के समान है जिसकी उपरी सतह दूध से भरी है, पर अंदर जह़र ही ज़हर है।
  114. ऐसे स्थान पर मनुष्य को क्षण भर भी नहीं ठहरना चाहिए जहाँ व्यापारी, शिक्षित ब्राह्मण, सैनिक, नदी तथा एक सुशिक्षित वैद्य नहीं हो। क्योंकि व्यापारी से भोजन, ब्राह्मण से ज्ञान, नदी से जल, सैनिक से रक्षा तथा वैद्य से स्वास्थवर्धक औषधि मिल पाती है। जीवन के लिए ये पांच तत्व अतिआवश्यक हैं।
  115. कच्चा पात्र कच्चे पात्र से टकराकर टूट जाता है।
  116. कठिन कार्य करवा लेने के उपरान्त भी नीच व्यक्ति कार्य करवाने वाले का अपमान ही करता है।
  117. कठिन परिश्रम से मनुष्य कुछ भी प्राप्त कर सकता है। परिश्रमी व्यक्ति को उच्च गुणवत्ता वाले खाद्य और उसे पचाने की शक्ति प्राप्त होती है। कठिन परिश्रम से मनुष्य अधिक धन अर्जन कर पाता है तथा अपने जीवन निर्वाह के लिए उचित कर्मों में उसका प्रयोग कर पाता है।
  118. कठिन समय के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए।
  119. कठोर दंड से सभी लोग घृणा करते है, राजा योग्य अर्थात उचित दंड देने वाला हो।
  120. कठोर वाणी अग्निदाह से भी अधिक तीव्र दुःख पहुंचाती है।
  121. कभी भी उनसे मित्रता मत कीजिये जो आपसे कम या ज्यादा प्रतिष्ठा के हों। ऐसी मित्रता कभी आपको ख़ुशी नहीं देगी।
  122. कभी भी पुरुषार्थी का अपमान नहीं करना चाहिए।
  123. कमजोर शरीर में बढ़ने वाले रोग की उपेक्षा न करें।
  124. कर्म करने वाले को मृत्यु का भय नहीं सताता।
  125. कर्म करने से ही तत्व ज्ञान को समझा जा सकता है।
  126. कल का कार्य आज ही कर ले।
  127. कल की हज़ार कौड़ियों से आज की एक कौड़ी भली अर्थात संतोष सबसे बड़ा धन है।
  128. कल के मोर से आज का कबूतर भला अर्थात संतोष सब से बड़ा धन है।
  129. कामी पुरुष कोई कार्य नहीं कर सकता।
  130. कायर व्यक्ति को कार्य की चिंता नहीं होती।
  131. कार्य करते समय शत्रु का साथ नहीं करना चाहिए।
  132. कार्य करने वाले के लिए उपाय सहायक होता है।
  133. कार्य का स्वरूप निर्धारित हो जाने के बाद वह कार्य लक्ष्य बन जाता है।
  134. कार्य की सिद्धि के लिए उदारता नहीं बरतनी चाहिए जैसे दूध पीने के लिए गाय का बछड़ा अपनी माँ के थनों पर प्रहार करता है।
  135. कार्य के अनुरूप प्रयत्न करें अर्थात पात्र के अनुरूप दान दें।
  136. कार्य के मध्य में अति विलम्ब और आलस्य उचित नहीं है।
  137. कार्य-अकार्य के तत्वदर्शी ही मंत्री होने चाहिए।
  138. कार्य-सिद्धि के लिए हस्त-कौशल का उपयोग करना चाहिए।
  139. किसी कार्यारंभ के समय को विद्वान और अनुभवी लोगों से पूछना चाहिए।
  140. किसी बड़े परिवार से सम्बन्ध रखने वाला अति सुन्दर नौजवान यदि अशिक्षित रह जाए तो लोग उसे ठीक उसी तरह नजरंदाज करते हैं, जैसे एक सुगंध हीन फूल को नजरंदाज किया जाता है।
  141. किसी मूर्ख व्यक्ति के लिए किताबें उतनी ही उपयोगी हैं जितना कि एक अंधे व्यक्ति के लिए आईना।
  142. किसी राजा के अंतर्गत नौकरी सबसे बेहतर होती है।
  143. किसी लक्ष्य की सिद्धि में कभी भी किसी भी शत्रु का साथ न करें।
  144. किसी विशेष प्रयोजन के लिए ही शत्रु मित्र बनता है।
  145. कीड़ों तथा मलमूत्र का घर यह शरीर पुण्य और पाप को भी जन्म देता है।
  146. कुछ युवा सेवा के अतिरेक में स्वयं पर ध्यान नहीं देते हैं अत: बहुमूल्य समय खो देते हैं।
  147. कुशल लोगों को रोजगार का भय नहीं होता।
  148. कृतघ्न अर्थात उपकार न मानने वाले व्यक्ति को नरक ही प्राप्त होता है।
  149. केवल आशा के सहारे ही लक्ष्मी प्राप्त नहीं होती।
  150. केवल साहस से कार्य-सिद्धि संभव नहीं।
  151. कोई भी काम शुरू करने से पहले अपने आपसे तीन सवाल हमेशा करना चाहिए मैं यह क्यूँ कर रहा हूँ ? इस कार्य के क्या परिणाम हो सकते हैं ? क्या मुझे सफलता प्राप्त होगी ? केवल इन सवालों के चिन्तन के बाद अगर आपको इनके सकारात्मक जवाब मिलते हैं तो आप आगे बढ़ सकते हैं।
  152. कोमल स्वभाव वाला व्यक्ति अपने आश्रितों से भी अपमानित होता है।
  153. कोयल की सौन्दर्यता उसकी आवाज़ में, स्त्री की सौन्दर्यता उसकी ईमानदारी, एक कुरूप की सौन्दर्यता उसकी शिक्षा तथा एक साधू की सौन्दर्यता उसमें निहित दयाभाव में होती है।
  154. क्षमा करने वाला अपने सारे काम आसानी से कर लेता है।
  155. क्षमाशील पुरुष को कभी दुःखी न करें।
  156. क्षमाशील व्यक्ति का तप बढ़ता रहता है।
  157. खाने योग्य भी अपथ्य होने पर नहीं खाना चाहिए।
  158. गलत कार्यों में लगने वाले व्यक्ति को शास्त्र ज्ञान ही रोक पाते है।
  159. गाय के पीछे चलते बछड़े के समान सुख-दुःख भी आदमी के साथ जीवन भर चलते है।
  160. गाय के स्वभाव को जानने वाला ही दूध का उपभोग करता है।
  161. गुणवान क्षुद्रता को त्याग देता है।
  162. गुणी पुत्र माता-पिता की दुर्गति नहीं होने देता।
  163. गुणी व्यक्ति का आश्रय लेने से निर्गुणी भी गुणी हो जाता है।
  164. गुणों से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए।
  165. गुरु और देवता के पास भी खाली नहीं जाना चाहिए।
  166. गुरु, देवता और ब्राह्मण में भक्ति ही भूषण है। विनय सबका आभूषण है।
  167. गुरुओं की आलोचना न करें।
  168. गुरुजनों की माता का स्थान सर्वोच्च होता है।
  169. घर आए अतिथि का विधिपूर्वक पूजन करना चाहिए।
  170. चंचल चित वाले के कार्य कभी समाप्त नहीं होते।
  171. चतुरंगणी सेना (हाथी, घोड़े, रथ और पैदल) होने पर भी इन्द्रियों के वश में रहने वाला राजा नष्ट हो जाता है।
  172. चरित्र का उल्लंघन कदापि नहीं करना चाहिए।
  173. चाणक्य कहते हैं इस संसार में सीधे वृक्ष और सीधे लोग ही सबसे पहले काटे जाते हैं।
  174. चाणक्य की नीति कहती है सबकी सेवा करों पर अपना भी ख्याल रखो।
  175. चाणक्य के अनुसार एक कर्मठ व्यक्ति कभी भी दरिद्र नहीं होता, ठीक इसी तरह सदैव ईश्वर का स्मरण करने वाला कोई पाप नहीं कर सकता है, तथा शांत स्वभाव का एक व्यक्ति कभी भी झगडा नहीं कर सकता है। अतः मनुष्य को किसी भी परिस्थिति में अपनी मनुष्यता नहीं भूलनी चाहिए।
  176. चाणक्य के अनुसार, प्रलय के समय समस्त स्थल समुद्र के नीचे चला जाएगा, किन्तु आदर्श मनुष्य के चरित्र में कई समुद्र एक साथ समा सकते हैं। अतः ऐसे मनुष्य बुरे से बुरे समय में भी अडिग रहता है।
  177. चालाक और लोभी बेकार में घनिष्ठता को बढ़ाते है।
  178. चुगलखोर व्यक्ति के सम्मुख कभी गोपनीय रहस्य न खोलें।
  179. चुगलखोर श्रोता के पुत्र और पत्नी उसे त्याग देते है।
  180. चोर और राज कर्मचारियों से धन की रक्षा करनी चाहिए।
  181. चोर कर्म से बढ़कर कष्टदायक मृत्यु पाश भी नहीं है।
  182. छः कानों में पड़ने से (तीसरे व्यक्ति को पता पड़ने से) मंत्रणा का भेद खुल जाता है।
  183. जनपद के लिए ग्राम का त्याग कर देना चाहिए। ग्राम के लिए कुटुम्ब (परिवार) को त्याग देना चाहिए।
  184. जन्म-मरण में दुःख ही है।
  185. जब आप किसी काम की शुरुआत करें, तो असफलता से मत डरें और उस काम को ना छोड़ें। जो लोग ईमानदारी से काम करते हैं वो सबसे प्रसन्न होते हैं।
  186. जब कार्यों की अधिकता हो, तब उस कार्य को पहले करें, जिससे अधिक फल प्राप्त होता है।
  187. जब खीर गर्म हो तो पतीले में खीर किनारे से थोड़ी-थोड़ी खानी चाहिए।
  188. जब तक आपका शरीर स्वस्थ और नियंत्रण में है और मृत्यु दूर है, अपनी आत्मा को बचाने कि कोशिश कीजिये; जब मृत्यु सर पर आ जायेगी तब आप क्या कोई व्यक्ति अपने कार्यों से महान होता है, अपने जन्म से नहीं।
  189. जब तक पुण्य फलों का अंश शेष रहता है, तभी तक स्वर्ग का सुख भोग जा सकता है।
  190. जल में मूत्र त्याग नहीं करना चाहिए। नग्न होकर जल में प्रवेश न करें।
  191. जहाँ पाप होता है, वहां धर्म का अपमान होता है।
  192. जहां सज्जन रहते हों, वहीं बसें।
  193. जहां सुख से रहा जा सके, वही स्थान श्रेष्ठ है।
  194. जितेन्द्रिय व्यक्ति को विषय-वासनाओं का भय नहीं सताता।
  195. जिन वचनों से राजा के प्रति द्वेष उत्पन्न होता हो, ऐसे बोल नहीं बोलने चाहिए। कोयल की कुक सबको अच्छी है। प्रिय वचन बोलने वाले का कोई शत्रु नहीं होता।
  196. जिन्हें भाग्य पर विश्वास नहीं होता, उनके कार्य पूरे नहीं होते। प्रयत्न न करने से कार्य में विघ्न पड़ता है।
  197. जिस घर में एक चरित्रहीन दुष्ट पत्नी, कपटी मित्र तथा कटु भाषी नौकर हो, वह घर सर्प से भरे स्थान से भी अधिक संकटप्रद होता है। ऐसे घर में न रहना ही बेहतर होता है।
  198. जिस प्रकार केवल एक सुखा हुआ जलता पेड़ पूरे जंगल को जला देता है उसी प्रकार एक ही कुपुत्र सरे कुल के मान, मर्यादा और प्रतिष्ठा को नष्ट कर देता है।
  199. जिस प्रकार बालू अपने रूखे स्वभाव नहीं छोड़ सकता, उसी प्रकार दुष्ट भी अपना स्वभाव नहीं छोड़ पाता।
  200. जिस व्यक्ति के काम करने की कोई व्यवस्था नहीं, उसे कोई सुख नहीं मिल सकता।
  201. जिसकी आत्मा संयमित होती है, वही आत्मविजयी होता है।
  202. जिसके द्वारा जीवनयापन होता है, उसकी निंदा न करें।
  203. जिससे कुल का गौरव बढे वही पुरुष है।
  204. जीवन के लिए सत्तू (जौ का भुना हुआ आटा) भी काफी होता है।
  205. जुंए में लिप्त रहने वाले के कार्य पूरे नहीं होते है।
  206. जुगनू कितना भी चमकीला हो, पर उससे आग का काम नहीं लिया जा सकता।
  207. जैसा बीज होता है, वैसा ही फल होता है। जैसी शिक्षा, वैसी बुद्धि। जैसा कुल, वैसा आचरण।
  208. जैसा शरीर होता है वैसा ही ज्ञान होता है। जैसी बुद्धि होती है, वैसा ही वैभव होता है।
  209. जैसी आज्ञा हो वैसा ही करें।
  210. जैसे ही डर निराशा आप पर हावी होने लगती हैं उस पर आक्रमण करके उसे ख़त्म कर दीजिये।
  211. जो अपने आप को भूलकर सेवा करता है वह अंत में खाली रह जाता है।
  212. जो अपने कर्तव्यों से बचते है, वे अपने आश्रितों परिजनों का भरण-पोषण नहीं कर पाते। जो अपने कर्म को नहीं पहचानता, वह अँधा है।
  213. जो कुलीन न होकर भी विनीत है, वह श्रेष्ठ कुलीनों से भी बढ़कर है। याचकों का अपमान अथवा उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
  214. जो जन्म से अंधें हैं वो देख नहीं सकते। उसी तरह जो वासना के अधीन है वो भी देख नहीं सकते। घमंडी व्यक्ति को कभी ऐसा नहीं लगता की वह कुछ बुरा कर रहा है। और जो पैसे के पीछे पड़े है उनको उनके कामों में कोई बुराई नहीं दिखाई देती।
  215. जो जिस कार्य में कुशल हो उसे उसी कार्य में लगना चाहिए। दोषहीन कार्यों का होना दुर्लभ होता है किसी भी कार्य में पल भर का भी विलम्ब न करें।
  216. जो दूसरों की भलाई के लिए समर्पित है, वही सच्चा पुरुष है।
  217. जो धैर्यवान नहीं है, उसका न वर्तमान है न भविष्य।
  218. जो धैर्यवान नहीं है, उसका न वर्तमान है न भविष्य।
  219. जो भविष्य के लिए तैयार है और जो किसी भी परिस्थिति को चतुराई से निपटता है वो सुखी रहता है।
  220. जो मांगता है, उसका कोई गौरव नहीं होता।
  221. जो लोग परमात्मा तक पहुंचना चाहते हैं उन्हें वाणी, मन, इन्द्रियों की पवित्रता और एक दयालु ह्रदय की आवश्यकता होती है।
  222. जो व्यक्ति आर्थिक व्यवहार करने में, ज्ञान अर्जन करने में, खाने में और काम-धंधा करने में शर्माता नहीं है वो सुखी हो जाता है।
  223. जो व्यक्ति जिस कार्य में कुशल हो, उसे उसी कार्य में लगाना चाहिए।
  224. जो सुख मिला है, उसे न छोड़े। मनुष्य स्वयं ही दुःखों को बुलाता है।
  225. जो सुख-शांति व्यक्ति को आध्यात्मिक शान्ति के अमृत से संतुष्ट होने पे मिलती है वो लालची लोगों को बेचैनी से इधर-उधर घूमने से नहीं मिलती।
  226. ज्ञान अर्थात अपने अनुभव और अनुमान के द्वारा कार्य की परीक्षा करें।
  227. ज्ञान ऐश्वर्य का फल है। मूर्ख व्यक्ति दान देने में दुःख का अनुभव करता है।
  228. ज्ञान से राजा अपनी आत्मा का परिष्कार करता है, सम्पादन करता है।
  229. ज्ञान ही सबसे बड़ा साथी हैं।
  230. ज्ञान ही सौन्दर्य और यौवन को परास्त करता हैं ।
  231. ज्ञानियों के कार्य भी भाग्य तथा मनुष्यों के दोष से दूषित हो जाते है।
  232. ज्ञानियों में भी दोष सुलभ है।
  233. ज्ञानी और छल-कपट से रहित शुद्ध मन वाले व्यक्ति को ही मंत्री बनाए।
  234. ज्ञानी पुरुषों को संसार का भय नहीं होता।
  235. झूठ से बड़ा कोई पाप नहीं।
  236. झूठी गवाही देने वाला नरक में जाता है।
  237. झूठे अथवा दुर्वचन लम्बे समय तक स्मरण रहते है।
  238. ठंडा लोहा लोहे से नहीं जुड़ता।
  239. ढेकुली नीचे सिर झुकाकर ही कुएँ से जल निकालती है अर्थात कपटी या पापी व्यक्ति सदैव मधुर वचन बोलकर अपना काम निकालते है।
  240. तत्वों का ज्ञान ही शास्त्र का प्रयोजन है।
  241. तपस्वियों को सदैव पूजा करने योग्य मानना चाहिए। पराई स्त्री के पास नहीं जाना चाहिए।
  242. तीन वेदों ऋग, यजु व साम को जानने वाला ही यज्ञ के फल को जानता है।
  243. दंड का निर्धारण विवेक सम्मत होना चाहिए। सिद्ध हुए कार्य का प्रकाशन करना ही उचित कर्तव्य होना चाहिए।
  244. दंड का भय न होने से लोग अकार्य करने लगते है। दण्ड नीति से आत्मरक्षा की जा सकती है।
  245. दंड नीति से राजा की प्रवृत्ति अर्थात स्वभाव का पता चलता है। स्वभाव का मूल अर्थ लाभ होता है।
  246. दंड से सम्पदा का आयोजन होता है। दण्ड नीति के प्रभावी न होने से मंत्री गण भी बेलगाम होकर अप्रभावी हो जाते है।
  247. दण्ड नीति के उचित प्रयोग से ही प्रजा की रक्षा संभव है।
  248. दरिद्र मनुष्य का जीवन मृत्यु के समान है।
  249. दान जैसा कोई वशीकरण मन्त्र नहीं है।
  250. दान ही धर्म है। न्याय ही धन है। जो धर्म और अर्थ की वृद्धि नहीं करता वह कामी है।
  251. दानवीर ही सबसे बड़ा वीर है।
  252. दिन में स्वप्न नहीं देखने चाहिए। दिन में सोने से आयु कम होती है।
  253. दिया गया दान कभी नष्ट नहीं होता।
  254. दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति नौजवानी और औरत की सुन्दरता है।
  255. दुर्जन व्यक्ति के साथ अपने भाग्य को नहीं जोड़ना चाहिए।
  256. दुर्जन व्यक्तियों द्वारा संगृहीत सम्पति का उपभोग दुर्जन ही करते है
  257. दुर्बल के आश्रय से दुःख ही होता है।
  258. दुर्बल के साथ संधि न करें।
  259. दुर्वचनों से कुल का नाश हो जाता है।
  260. दुष्ट के साथ नहीं रहना चाहिए।
  261. दुष्ट व्यक्ति का कोई मित्र नहीं होता।
  262. दुष्ट व्यक्ति पर उपकार नहीं करना चाहिए।
  263. दुष्ट स्त्री बुद्धिमान व्यक्ति के शरीर को भी निर्बल बना देती है।
  264. दुष्टता नहीं अपनानी चाहिए।
  265. दूध के लिए हथनी पालने की जरुरत नहीं होती अर्थात आवश्यकतानुसार साधन जुटाने चाहिए।
  266. दूध में मिला जल भी दूध बन जाता है।
  267. दूसरे का धन तिनके भर भी नहीं चुराना चाहिए, दूसरों के धन का अपहरण करने से स्वयं अपने ही धन का नाश हो जाता है।
  268. दूसरे के धन अथवा वैभव का लालच नहीं करना चाहिए।
  269. दूसरे के धन का लोभ नाश का कारण होता है।
  270. दूसरे के धन पर भेदभाव रखना स्वार्थ है।
  271. दूसरों की रहस्यमयी बातों को नहीं सुनना चाहिए।
  272. देवता का कभी अपमान न करें।
  273. देवता के चरित्र का अनुकरण नहीं करना चाहिए।
  274. देश और फल का विचार करके कार्य आरम्भ करें।
  275. देश के युवा को कामवासना से दूर रहना चाहिए, जब युवा इन बातों में उलझता है तो अध्ययन और सेहत पर ध्यान नहीं दे पाता है। कामवासना से वह निष्क्रिय हो जाता है, जबकि यह उम्र सीखने और सक्रिय रहने की होती है।
  276. देहधारी को सुख-दुःख की कोई कमी नहीं रहती।
  277. दैव (भाग्य) के अधीन किसी बात पर विचार न करें।
  278. दोपहर बाद के कार्य को सुबह ही कर लें।
  279. धन का लालची श्रीविहीन हो जाता है।
  280. धन के नशे में अंधा व्यक्ति हितकारी बातें नहीं सुनता और न अपने निकट किसी को देखता है।
  281. धन विहीन महान राजा का संसार सम्मान नहीं करता।
  282. धन होने पर अल्प प्रयत्न करने से कार्य पूर्ण हो जाते है।
  283. धनवान असुंदर व्यक्ति भी सुरुपवान कहलाता है।
  284. धनहीन की बुद्धि दिखाई नहीं देती।
  285. धनिक को शुभ कर्म करने में अधिक श्रम नहीं करना पड़ता।
  286. धर्म का आधार अर्थ अर्थात धन है।
  287. धर्म का आधार ही सत्य और दान है।
  288. धर्म का विरोध कभी न करें।
  289. धर्म के समान कोई मित्र नहीं है।
  290. धर्म को व्यावहारिक होना चाहिए।
  291. धर्म से भी बड़ा व्यवहार है।
  292. धर्म ही लोक को धारण करता है।
  293. धर्मार्थ विरोधी कार्य करने वाला अशांति उत्पन्न करता है।
  294. धार्मिक अनुष्ठानों में स्वामी को ही श्रेय देना चाहिए।
  295. धूर्त व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए दूसरों की सेवा करते हैं।
  296. धैर्यवान व्यक्ति अपने धैर्य से रोगों को भी जीत लेता है।
  297. न जाने योग्य जगहों पर जाने से आयु, यश और पुण्य क्षीण हो जाते है।
  298. नक्षत्रों द्वारा भी किसी कार्य के होने, न होने का पता चल जाता है।
  299. नसीब के सहारे चलने वाले लोग जल्दी बर्बाद हो जाते है।
  300. निकट के राज्य स्वभाव से शत्रु हो जाते है।
शेष चाणक्य नीति की अकाट्य बातें जो कभी फेल नही होने देगी भाग-2 पर


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