औद्योगिक श्रमिक और उनकी समस्याएं



Industrial Workers and Their Problems

औद्योगिक श्रमिक का अर्थ
 श्रमिक से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है जो किसी उद्योग में कौशलपूर्ण या कौशल रहित पर्यवेक्षकीय तकनीकी तथा लिपिकीय सम्बन्धी कार्य भाड़े या पुरस्कार भाड़े या पुरस्कार पर कार्य करने के लिए नियोजित है चाहे उसके लिए नियोजन की शर्ते स्पष्ट हो या अस्पष्ट हो। अधिनियम के अन्तर्गत कर्मकार की परिभाषा में ऐसे व्यक्ति आते है जिन्हें किसी विवाद के कारण पद्मुक्त कर दिया गया हो। भारत में अनेक संवैधानिक उपबन्धों के उपरान्त आजादी के 60 वर्षों के पश्चात भी उनका शोषण अपने चरम पर विद्यमान है तथा श्रमिक अपने सामाजिक तथा आर्थिक स्तर को जिविकोपार्जन से उपर नही उठा पा रहा है। भारत जैसे विकासशील देश में यह समस्या विकराल रूप में विद्यमान है तथा सरकारों द्वारा बनाये गये कानून मात्र हाथी के दाँत के समान ही रह गये है। श्रमिकों की खराब स्थिति के कारणों में अशिक्षा प्रमुख है जो विशेष रूप से अनुसूचित जाति एवं जनजाति जैसी सामाजिक आर्थिक दृष्टि से वर्गों में व्याप्त है। ये लोग विकास की मुख्य धारा से कटे रहते है। इनको गुजर रहे पलो के सामने आने वाले कल की चिन्ता नही रहती है तथा आवश्यकता के काल से ही ये लोग उद्योग में आ जाते है। श्रमिक के संदर्भ में कविवर जयशंकर प्रसाद जी ने कहा है श्रमिक गरीब पैदा होता और गरीब मर भी जाता है। आने वाली अगली पीढ़ी को वह मात्र भूख व कर्ज देकर मरता है।

जनसंख्या की बढ़ोत्तरी भी श्रमिकों की निम्न स्थिति का परिणाम है। भारत में जनसंख्या बढ़ोत्तरी का जो अनुपात है शायद वह निकट भविष्य में भी हमारे उद्योगों की विकास दर से कोसो आगे रहेगी जिस कारण से रोजगार के अवसर सृजित हो पाना असम्भव हो जायेगा, जिसके कारण अर्थशास्त्र के नियम, मांग और आपूर्ति का अनुपात हमेशा बना रहेगा जिससे आर्थिक स्तर को उठाना असम्भव हो जायेगा। भारत एक वृहद देश है तथा भाषा और संस्कृति तथा भौगोलिक भिन्नताओं के कारण भारत संघ के कई राज्य जहाँ प्रतिव्यक्ति आय अत्यधिक है तो वही उत्तर प्रदेश, बिहार तथा पूर्वोत्तर राज्यों में प्रतिव्यक्ति आय अत्यन्त न्यून है। इसके कारण भी मजदूरी के दरों में भारी अन्तर है। क्षेत्रीय व सामाजिक असन्तोष भी श्रमिक जीवन की दयनीय स्थिति का एक कारण है। उत्तर प्रदेश तथा बिहार जैसे राज्यों में जनसंख्या घनत्व ज्यादा है तथा प्रतिव्यक्ति आय कुछ क्षेत्रों को अपवादस्वरूप छोड़ दिया जाय तो निम्न स्तर पर है या सरकारी मानकों के अनुसार गरीबी रेखा के नीचे है। जिस कारण काम धन्धों की तलाश में लोग अन्य राज्यों में पलायन कर रहे है, जिन राज्यों में यहाँ के लोग पलायन कर रहे है उन उद्योग धन्धों तथा कल-कारखानों में मजदूरी दर न्यूनतम है जिस कारण उन क्षेत्रों के मूल निवासियों को काम व रोजगार के अवसर समाप्त हो जा रहे है, इस कारण वहाँ के लोगों में द्वेष तथा उग्रता जन्म ले रही है।

सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार व उदासीनता श्रमिक की खराब स्थिति में महत्वपूर्ण योगदान देती है। यद्यपि श्रमिकों के कल्याणार्थ बहुत से श्रम विधायन का परिणयन किया गया है परन्तु उनका अनुपालन न हो पाने के कारण समाज में तथा उद्योगों में भ्रष्टाचार व्याप्त है एवं श्रमिकों का उत्पीड़न निरन्तर होता रहता है। अधिकारियों द्वारा उद्योगों बुनियादी सुविधाओं के प्रति भी उदासीन रवैया अपनाया जाता है तथा मौके पर जाँच इत्यादि कराने पर सुविधाओं को बढ़ा-चढ़ा कर रखा जाता है। श्रमिकों में मजबूत संगठन का अभाव पाया जाता है। फुटमत का व्याप्त होना वैचारिकी तथा अन्य मतभेदों के कारण एक मजबूत संगठन का हमेशा अभाव बना रहता है। इस कारण भी वे लोग उद्योगपतियों तक अपनी बुनियादी आवश्यकताओं को नही रख पाते है।

इन्ही सब कारणों से भारत में आजादी के बाद अनेक विधायनों के निर्माण के बाद भी श्रमिकों की आर्थिक व सामाजिक दशाओं में सुधार नही हो पा रहा है। यद्यपि भारतीय श्रम में भी श्रम की समान विशेषताएं पायी जाती है परन्तु भारतीय परिवेश के प्रभाव से यहाँ के श्रमिकों की कुछ अपनी निजी विशेषताएं जिनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार किया जा सकता है:- प्रवासी प्रवृत्ति, एकता का अभाव, अनियमित उपस्थिति, असानता एवं अशिक्षा, भाग्यवादिता, गरीबी तथा रहन-सहन की निम्न स्तर, भारतीय श्रमिकों की पूर्ति उद्योगों की, वश्यकतानुसार न होना, सामाजिक व धार्मिक दृष्टिकोण, दोषपूर्ण श्रम संघवाद, कार्य क्षमता का निम्न स्तर तथा  न्यून गतिशीलता इत्यादि

औद्योगिक श्रमिकों की समस्या
कोई भी संगठन (व्यापारिक या औद्योगिक) अपने विकास के लिए चार बातों का सहारा लेता है: मनुष्य, मुद्रा, मशीन तथा माल। इन चार तत्वों के सामूहिक स्वरूप में भली-भांति कार्य करने पर ही व्यवसाय की सफलता निर्भर करती है।
कुछ समय पूर्व तक मानव तत्व अर्थात श्रम को अधिक महत्व नही दिया जाता था, जबकि अब यह अनुभव किया जाता है कि मशीन, माल, मुद्रा के व्यवस्थापन के साथ मानव तत्व की व्यवस्था भी अत्यन्त आवश्यक है। यही कारण है कि मानवीय सम्बन्धों का अध्ययन जो कि श्रम के क्रम-विक्रय एवं कार्य निष्पादन पर ध्यान केन्द्रित करता है, प्रत्येक राष्ट्र में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर चुका है। इसके साथ ही श्रमिकों को नियोजित करने के लिए सरकार द्वारा विभिन्न प्रयास किये गये, जिसमें औद्योगिक नीति के साथ-साथ श्रम सन्नीयम स्थापित किये गये। इसके उपरान्त भी श्रमिक जीवन में सुधार एवं कार्य सन्तुष्टि के लक्षण को तठस्थ रूप से प्राकल्पित नही किया जा सकता है। श्रमिकों की समस्याएं आज भी विभिन्न प्रकार से उद्योग नियोजन के प्रति द्वेष के रूप में दिखलाई पड़ती है। इनकी समस्याओं को कुछ बिन्दुओं में इस प्रकार से स्पष्ट की जा सकती है -
उष्ण जलवायु:- भारत में औद्योगिक केन्द्रों में कार्यशील श्रमिक, अधिकांशतः रोजगार की तलाश में अंचलों से आकर अस्थाई रूप से कार्य करते है। वे गाँव से अपना सम्बन्ध नहीं तोड़ पाते। बदले हुए पर्यावरण में स्वयं को पूर्णतः समायोजित करने के लिए उनको किसी प्रकार के साधन एवं सुविधा प्राप्त नहीं हो पाती। परिणामतः उनका ध्यान अधिकांशतः गाँव पर ही लगा रहता है तथा पूरी तन्मयता के साथ वे अपना कार्य नही कर पाते है।
मजदूरी की समस्या:- भारत में औद्योगिक श्रमिकों की मजदूरी का निर्धारण समान रूप से नही किया गया। मजदूरी की अस्पष्ट परिभाषा के परिणामस्वरूप श्रमिकों स्थिति दयनीय होती चली गयी। ‘प्रो0 वेन्ह्म और जीड’ ने मजदूरी शब्द का प्रयोग संकुचित अर्थ में किया है। बाद में मजदूरी की परिभाषा को विस्तृत रूप प्रदान किया गया। मार्शल और सेलिगमैन की परिभाषा इसी प्रकार की है। औद्योगिक संगठनों द्वारा अधिकांशतः मौद्रिक मजदूरी प्रदान की जाती है जबकि कार्य अभिप्रेरणा के साथ-साथ कार्य सन्तुष्टि एवं श्रमिक सुधार जैसे संदर्भों में न्यायिक रूप से उन समस्त सुविधाएं कार्य के अनन्तर अत्यन्त आवश्यक प्रतीत होती है जिससे मजदूरी को वास्तविक स्वरूप प्रदान किया जा सके। इस प्रकार से वास्तविक मजदूरी के अन्तर्गत नगद मजदूरी के साथ अन्य सुविधाएं सम्मिलित है। वास्तविक मजदूरी को एडम ‘स्मिथ’, ‘मार्शल’, प्रो0 टामस, प्रो0 सेलिगमैन आदि ने परिभाषित करने का प्रयास किया है जिसमें सामान्य रूप से वास्तविक मजदूरी में दो तथ्य जुड़ जाते है - नगद मजदूरी जिससे वस्तुएं व सेवाएं खरीदी जा सकती है। दूसरा तथ्य नगद मजदूरी के अतिरिक्त उसे जो अन्य सुविधाएं प्राप्त होती है, वास्तविक मजदूरी के कुछ निर्धारक है जिसमें मुद्रा, क्रय शक्ति, अन्य सुविधाएं, अतिरिक्त आय प्राप्त करने के श्रोत, कार्य का स्वभाव, कार्य की दशाएं, कार्य की अवधि, कार्य की नियमितता, भविष्य में उन्नति की आशा, व्यवसायिक, प्रशिक्षण का समय और लागत, आश्रितों को रोजगार, सामाजिक सम्मान, व्यापार की दशाएं इत्यादि।

श्रमिकों की सन्तुष्टि जैसे अन्वेषणों में मजदूरी आधारभूत तथ्य है। वास्तविक मजदूरी ही उद्योगों और श्रमिकों के बीच सन्तुलित सम्बन्धों का निर्धारण है। कार्य का प्राचीन सिद्धान्त तो ‘सुख और कष्ट’ पर आधारित है जबकि आज इसका मात्र ऐतिहासिक महत्व ही रह गया है। धीरे-धीरे आर्थिक प्रलोभनों ने श्रमिकों को काम करने के लिए अधिक प्रेरित किया। व्यापारवादी युग के अनन्तर कुछ इस प्रकार की धारणा अधिक प्रबल हो गयी थी कि मनुष्य से यदि काम न लिया जाये तो वह आवश्यक रूप से वह आलसी और सुस्त हो जाये। श्रम को भूखे न रहने का प्रलोभन मात्र ही काफी था। ऐडम स्मिथ ने अपने शास्त्रीय सिद्धान्त के अन्तर्गत श्रमिकों को एक आर्थिक व्यक्ति का स्वरूप प्रदान किया अतः आप यह मानकर आगे बढ़े कि धन श्रमिकों को अपनी सुस्ती तथा कार्य के प्रति होने वाले कष्ट के प्रति विजय प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित एवं प्रेरित करता है। इसी धारणा के अन्तर्गत आपने काम करने वाले व्यक्तियों के मनोवैज्ञानिक पसन्दगी अथवा नापसन्दगी को भी महत्व प्रदान किया।

प्रेरणा के सीमान्त उपयोगिता सिद्धान्त ने व्यक्ति को कार्य तथा गैर कार्य के बीच विभेदीकरण के लिए विवश किया। उपयोगिता के सिद्धान्त में सम्पूर्ण श्रमिक प्रेरणा को एक विवेकतापूर्ण का स्तर दिया और यह आवश्यक हो गया कि यह हिसाब लगाया जाय कि किस प्रकार ‘सर्वाधिकता’ का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। इस सिद्धान्त ने श्रम की अनुपयोगिता तथा धन की उपयोगिता के पक्ष पर अधिक बल दिया। यद्यपि धन स्वयं कोई उपयोगिता नही है वस्तुओं तथा सेवाओं के प्रति यह एक सामाजिक शक्ति माना जाता है। ‘मिजेज’ ने यह कहा है कि वे सारी वस्तुएं जिन्हें हम धन के रूप में मूल्यांकित नही कर सकते है विवेकहीन है। सभी व्यक्ति जो काम करते है आजकल अधिकांश रूप से आर्थिक या मौद्रिक उद्देश्य से प्रेरित होते है और इसलिए उŸापादको को यह आवश्यकता पड़ती है कि वे अधिकतम मजदूरी एवं कार्य के प्रति अधिकतम सन्तुष्टि दोनों को ही प्रबन्ध नियन्त्रण के द्वारा भलि प्रकार सन्तुलित कर सके।

सामान्यतः धन ही एक ऐसा कारक है, या दूसरे शब्दों में आर्थिक प्रलोभन ही ऐसा आधार है जिसे लेकर मनुष्य अपनी अधिकांश क्रियाएं करता है। अतएव आर्थिक प्रलोभनों के माध्यम से ही श्रमिकों को प्रेरित कर सकते है। धन ही आधुनिक युग में श्रमिक जीवन के आर्थिक पक्ष या जीवित रहने से सम्बन्धित क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है। श्रमिकों की मजदूरी की समस्या एवं सुधार जैसे प्रयासों का ऐतिहासिक विवरण श्रमिकों स्थिति को परिलक्षित करता है। श्रमिक प्रेरणा में आर्थिकी के महत्व को जेम्स फ्रेजर के मानवशास्त्रीय सिद्धान्त के आधार भी समझा जा सकता है। फ्रेजर ने जटिल प्रतिमानों के निर्माण में भी विनिमय प्रक्रियाओं अर्थात आर्थिक प्रलोभनों को ही महत्वपूर्ण माना है।16 यद्यपि इस प्रकार के सिद्धान्तों में परिवर्तन लाने का प्रयास भी किया गया जिसमें मेलिनोवस्की मांस, स्ट्रास’आदि सम्बनिधत है।

संविदा (ठेका) के आधार पर सेवारत श्रमिक
कई उद्योग धंधों में ठेके के श्रमिक भी अत्यधिक मात्रा में पाये जाते हैं। पिछले युद्ध की आकस्मिक आवश्यकताओं के कारण इस प्रणाली को बहुत प्रोत्साहन मिला। अनेक उद्योग अथवा औद्योगिक संस्थान कुछ विशिष्ट कार्यों को सम्पन्न करने के ठेके, ठेकेदारों को दे देते हैं और उसके बदले में उन्हें एक मुश्त रकम अदा कर देते हैं। ठेकेदार जो कि व्यक्ति या फर्म या कोई वरिष्ठ श्रमिक भी हो सकता है, स्वयं श्रमिकों को काम पर लगाता है। इन श्रमिकों के सम्बन्ध में इस उद्योग की कोई प्रत्यक्ष जिम्मेदारी नहीं होती जो कि ठेकेदार को काम देता है। इस प्रकार ठेके के श्रमिकों व प्रत्यक्ष रूप से भर्ती किये गये श्रमिकों के बीच अन्तर के दो मुख्य आधार होते हैं, एक तो मुख्य औद्योगिक संस्थान से उनके रोजगार सम्बन्ध और दूसरे उनकी मजदूरी के भुगतान की रीति । प्रत्यक्ष रूप से भर्ती किये गये श्रमिकोंके नाम, औद्योगिक संस्थान की वेतन, नामावली या उपस्थिति नामावली में अंकित किये जाते हैं और वे प्रत्यक्ष रूप से मजदूरी प्राप्त करते हैं किन्तु इसके विपरीत ठेके के श्रमिकों के नाम न तो वेतन नामावली में अंकित होते हैं और न उन्हें उद्योग द्वारा प्रत्यक्ष रूप से मजदूरी का ही भुगतान किया जाता है।
अहमदाबाद के सूती कपड़े के उद्योग धंधों में अधिकतर ठेके के ही श्रमिक पाये जाते हैं। ठेके के श्रमिकों की कार्य को जल्दी समाप्त करने के लिये कुछ श्रमिकों की एकाएक आवश्यकता आ पड़ती है। श्रमिक कई बार मिलते भी नहीं हैं। हमारे देश में रोजगार के दफ्तरों की स्थापना हुये भी बहुत दिन नहीं हुये हैं। कारखानों में पर्यवेक्षण कर्मचारियों की भी कमी रही है। इन अनेक कारणों से ठेके के श्रमिकों को ही काम पर लगाना अधिक सुविधाजनक रहता है। यह प्रथा इसलिये बराबर रही क्योंकि ठेके के श्रमिकों को लगाने में मिल मालिकों को अनेक लाभ होते हैं। जब मालिक कुछ विशेष कार्यों को सम्पन्न करने का ठेका दे देते हैं तो ऐसा करने से उन्हें न तो श्रमिक रखने पड़ते हैं, न ही पूंजी निवेश. करना पड़ता है और न संयंत्रों की स्थापना ही करनी पड़ती है। इससे वे बंधी लागत को कम करने में समर्थ हो जाते हैं। उन्हें न तो प्रत्यक्ष रूप से मजदूरों की नियुक्ति करनी पड़ती है और न श्रमिकों को किसी प्रकार के लाभ या कल्याणकारी सुविधायें ही देनी होती हैं। एक प्रकार से वे श्रमिकों को किसी प्रकार से श्रमिकों से सम्बन्धित सभी चिन्ताओं से मुक्त रहते हैं। कुछ किस्म के कार्यों में उदाहरणतः लोक कर्म विभाग तथा निर्माण के कार्यों में ठेके के श्रमिकों की प्रथा अत्यधिक सुविधाजनक रहती है।
इस प्रथा के पक्ष में चाहे जितने भी तर्क क्यों न दिये जायें, यह स्पष्ट है कि इस प्रथा से लाभ के स्थान पर हानियां ही अधिक हैं। अधिकांश श्रम सम्बन्धी कानून ठेके के श्रमिकों पर लागू नहीं होते और जिन श्रम कानूनों का विस्तार ठेके के श्रमिकों तक कर दिया गया है वे भी ठेके के श्रमिकों की प्रकृति के कारण समुचित रूप से लागू नहीं हो पाते। अधिकांश ठेकेदार अपने श्रमिकों के प्रति अपना कोई नैतिक दायित्व नहीं मानते और उनकी असहाय स्थिति का अनुचित लाभ उठाते हैं। ठेकेदार अपना ठेका सबसे कम बोली पर पाता है। इसलिये वह श्रमिकों को कम से कम मजदूरी देने का प्रयत्न करता है। इस प्रथा का एक अन्य दोष यह है कि मालिकों पर ठेके के श्रमिक के कल्याण कार्यों का कोई उत्तरदायित्व नहीं होता। ठेके की भर्ती की प्रणाली तो मध्यस्थ श्रमिकों में से ही होती है परन्तु ठेकेदार तो बिल्कुल बाहरी व्यक्ति होता है।
राष्ट्रीय श्रम आयोग (1969) ने भी ठेके की श्रम प्रणाली के अनेक दोषों का उल्लेख किया था। आयोग के अनुसार-"प्रत्यक्ष रूप से भर्ती किये गये श्रमिकों और ठेके के श्रमिकों की मजदूरियों एवं कार्यों की दशाओं में भारी अन्तर पाया जाता है। विभिन्न उद्योगों के लिये जिन मजदूरी परिषदों का गठन किया गया था, उन्होंने भी प्रत्यक्ष रूप से भर्ती किये गये श्रमिकों, दोनों के ही लिये मजदूरी की समान दरें लागू करने की सिफारिश की है। परन्तु इन सिफारिशों की लागू करने की कारगर मशीनरी उपलब्ध न होने के कारण ठेके के श्रमिकों को साधरणतः उन दरों से नीची दरों पर मजदूरी दी जाती है जो कि उसी उद्योग के नियमित श्रमिकों के लिये निर्धारित की गयी है। प्रायः यह भी होता है कि मूल पारिश्रमिक के अतिरिक्त ठेके के श्रमिकों को अन्य कोई भुगतान प्राप्त होता ही नहीं।" आयोग का कहना है कि ठेके के श्रमिकों को कार्य की दशायें बिल्कुल भी संतोषजनक नहीं हैं। उनके काम करने के घंटे बड़े अनियमित तथा लम्बे होते हैं। जिस अवधि का भुगतान उन्हें किया जाता है वह एक दिन से लेकर छ:-छ: माह तक की होती हैं। उनकी नौकरी की सुरक्षा की भी कोई व्यवस्था नहीं होती और ठेके के समाप्ति के साथ ही उनकी नौकरी भी समाप्त हो जाती है। ठेके के श्रमिकों . को मजदूरी के साथ छुटिट्यां देने के की कोई व्यवस्था नहीं होती। मकान सम्बन्धी सुविधाओं के मामले में भी ठेके के श्रमिकों के साथ सीधी भर्ती वाले श्रमिकों जैसा व्यवहार नहीं किया जाता। ठेके के श्रमिकों को कर्मचारी राज्य बीमा योजना तथा कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम के अन्तर्गत प्राप्त होने वाले लाभ भी इसलिये नहीं मिल पाते क्योंकि वे इनसे सम्बन्धित कुछ प्रारम्भिक शर्तों को पूरा नहीं करते। यदि ठेकेदार अपने श्रमिकों को अग्रिम धन के अलावा श्रमिकों की और कोई भुगतान प्राप्त नहीं होता। अतः आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि "यहाँ तक कि सर्वश्रेष्ठ फर्मों में जो ठेके के श्रमिक लगे होते हैं उनके कार्यों की दशाओं के दृष्टिकोण से भी यदि हम देखे तो हमारे विचार से यह अत्यन्त आवश्यक है कि यदि कहीं ठेके के श्रमिकों को काम पर लगाना जरूरी हो तो उससे सम्बन्धित दृढ़ एवं कठोर कानून बनाया जाना चाहिये। किन्तु सरकार की सामान्य नीति यही होना चाहिये कि ठेके के श्रमिकों की प्रथा को शनैः शनैः समाप्त कर दिया जाय। कुछ अनिवार्य कारणों से यदि कहीं से इसी जारी रखना भी पड़े तो ठेके के श्रमिकों को भी वैसी ही सुविधायें उपलब्ध करायी जानी चाहिये, जैसे कि नियमित श्रमिकों को प्राप्त होती है। विभिन्न समितियों, जांचों तथा सम्मेलनों द्वारा ठेके के श्रम प्रणाली के जिन दोषों का उल्लेख किया गया, उनकों दृष्टिगत रखते हुये राष्ट्रीय श्रम आयोग की रिर्पोट से पहले की इस प्रथा में सुधार करने के लिये और जहाँ भी व्यवहारिक था वहाँ इसको समाप्त करने के लिये कदम उठाये गये थे। फैक्ट्री अधिनियम (1948) खान अधिनियम (1952) के अन्तर्गत श्रमिक की जो परिभाषा दी गयी थी उसके क्षेत्र का विस्तार करके उसमें ठेके के श्रमिक को भी सम्मिलित किया गया था। कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम (1948) के अन्तर्गत जो स्वास्थ्य बीमा सम्बन्धी लाभ प्रदान किये जाते हैं उनका विस्तार ठेके के श्रमिकों तक ही सीमित कर दिया था। न्यूनतम मजदूरी अधिनियम (1948) कुछ अनुसूचित रोजगारों के ठेके के श्रमिकों पर भी लागू होने लगा था। श्रमिक क्षतिपूर्ति अधिनियम ठेके के श्रमिकों पर पहले ही लागू हो चुका था। फिर भी ठेके के श्रम प्रणाली में जो दोष विद्यमान थे वे बराबर जारी रहे। इसका कारण यह था कि ठेके के श्रमिकों के बारे में जो अधिनियम बनाये गये थे। मालिक उनकी धाराओं से अपने को किसी न किसी प्रकार बचा लेते थे। सरकार द्वारा सन् 1970 में ठेका श्रमिक (नियमन व उन्मूलन) बिल पास किया गया।

ठेका श्रमिक (उन्मूलन) अधिनियम 1970
इस अधिनियम को बनाने का यह उद्देश्य है कि कुछ ऐसे वर्गों एवं क्षेत्रों में ठेके की श्रम प्रणाली को समाप्त किया जाय जिन्हें कि निर्धारित कसौटियों के संदर्भ में सम्बन्धित सरकारें निश्चित करें और जहाँ ऐसा उन्मूलन या समाप्ति सम्भव न हो वहाँ ठेके के श्रमिकों सेवा की शर्तों का नियमन किया जाय । इसमें जहाँ ठेके के श्रमिकों को लगाने वाले संस्थानों के रजिस्ट्रेशन तथा ठेकेदारों द्वारा लाइसेंस लेने की व्यवस्था है वहाँ त्रिदलीय प्रगति की ऐसी सलाहकार परिषदों की भी व्यवस्था की गयी है जिसमें कि विभिन्न हितों का प्रतिनिधित्व हो और जो कानून को लागू करने के सम्बन्ध में केन्द्र व राज्य सरकारों को परामर्श दें। फिर जनवरी 1992 में केन्द्रीय सलाहकार परिषद का गठन किया गया। ठेके के श्रमिकों के लिये पाने के पानी तथा प्राथमिक चिकित्सा की सुविधाओं एवं कुछ मामलों में, विश्रामगृहों व जलपान गृहों जैसी मूलभूत कल्याणकारी सुविधाओं की व्यवस्था एवं उनके संचालन को अधिनियम के अन्तर्गत अनिवार्य बनाया गया है। जहाँ ठेकेदारों द्वारा ये सुविधायें नहीं दी जायेंगी, वहाँ ठेकेदारों द्वारा ये सुविधायें नहीं दी जायेंगी, वहाँ इन सुविधाओं को ठेकेदारों के दायित्व पर मुख्य नियोक्ता द्वारा प्रदान किये जाने की व्यवस्था की गयी है। ठेकेदारों को लाइसेंस इसी शर्त पर दिये जायेंगे कि वे श्रमिकों के लिये आवश्यक सेवाओं एवं काम की संतोषजनक दशाओं की व्यवस्था करें तथा उन्हें उचित मजदूरी दें। अधिनियम में इस बात की भी व्यवस्था की गयी है कि मजदूरियों का सही ढंग से भुगतान न होने की दशा में श्रमिकों की सुरक्षा प्रदान की जाये। यदि ठेकेदार निश्चित समय में मजदूरी का भुगतान करने में असमर्थ रहता है अथवा कम भुगतान करता है। यह तो मुख्य नियोक्ता या मालिक का दायित्व होगा कि वह ठेकेदारों द्वारा नियुक्ति किये गये श्रमिकों को यथास्थितिपूर्ण मजदूरी का अथवा अविशिष्ट मजदूरी का भुगतान करें और इस प्रकार दिये गये धन को या तो ठेके के अधीन ठेकेदारों को दी जाने वाली रकम में से काट लें अथवा ठेकेदारों को दिये गये ऋण के रूप में उससे वसूल कर लें।


गोरखपुर श्रम संस्था
गोरखपुर श्रम शब्द का प्रयोग उत्तर प्रदेश के उन पूर्वी जिलों के श्रमिकों के लिये किया गया था जहाँ के श्रमिक व्यापक गरीबी के कारण पीढ़ियों से देश के विभिन्न भागों को प्रवास कर रहे थे। ऐसे फालतू श्रमिकों को शीघ्र काम उपलब्ध कराये जाने की दृष्टि से गोरखपुर में एक भर्ती डिपो 1942 में खोला गया जिसका उद्देश्य यह था कि लड़ाई से .सम्बन्धित सामान बनाने के लिये जो संस्थायें थीं उनमें श्रमिकों की कमी न रहे। इस डिपो ने शीघ्र ही एक बड़ी संस्था का रूप धारण कर लिया और इसके द्वारा लगभग 50 हजार श्रमिक भर्ती होने लगी। इस संस्था का नाम गोरखपुर श्रम संस्था पड़ गया। स्थानीय श्रमिकों की कमी के कारण यह संस्था उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार, बंगाल और मध्य प्रदेश की कोयले की खानों के लिये भी श्रमिकों की पूर्ति करने लगी। लड़ाई समाप्त होने पर भी खान उद्योग की प्रार्थना पर यह कोयले की खानों के लिये श्रमिकों की पूर्ति करती रही, परन्तु भर्ती का व्यय अब खान उद्योग वहन करने लगा। इस प्रकार यह एक खान मालिकों का संगठन बन गया जिसका नाम कोयला क्षेत्र भर्ती संगठन पड़ गया। सन् 1973 में कोयला खानों का राष्ट्रीयकरण हो जाने के फलस्वरूप, आकस्मिक श्रमिक नियमित श्रमिकों में बदल गये और गोरखपुर श्रम संस्था से आकस्मिक श्रमिकों की माँग काफी घट गयी। इन परिवर्तित परिस्थितियों में गोरखपुर श्रम संस्था 1 अप्रैल, 1976 से केन्द्रीय रोजगार दफ्तर (श्रम) गोरखपुर के रूप में परिवर्तित हो गयी।
औद्योगिक संस्थानों में श्रमिकों के स्थायीकरण की समस्या
श्रमिकों की भर्ती नियमित करने के लिये कुछ कारखानों ने बदली के. श्रमिकों के नियंत्रण की रीति अपनायी है। इस योजना को बदली नियंत्रण प्रथा अथवा श्रमिकों का स्थायीकरण करते हैं। इस योजना को दो उद्देश्यों से अपनाया गया है। प्रथम बदली के श्रमिकों को रोजगार को नियमित बनाना और दूसरा श्रमिकों की भर्ती में मध्यस्थों के प्रभाव को मिटाना। इस योजना के अन्तर्गत प्रत्येक माह की पहली तारीख को कुछ चुने हुये लोगों को एक विशेष कार्ड दिया जाता है। जिन्हें प्रतिदिन प्रातःकाल के मिल फाटक पर हाजिरी देनी होती है। अस्थायी रिक्त श्रमिक पर्याप्त होते हैं। किसी अन्य श्रमिकों को भर्ती नहीं किया जा सकता और रिक्त स्थानों की पूर्ति प्रवस्था के अनुसार की जाती है। इस कार्य के लिये एक रजिस्टर रखा जाता है। पंजीकृत श्रमिकों को सेवा प्रमाण-पत्र दिये जाते हैं और नौकरी कर चुकने की अवधि का विचार रखा जाता है। राष्ट्रीय श्रम आयोग ने भी कम कुशल श्रमिकों के मामले में तथा ऐसे मामलों में जहाँ विशिष्ट श्रेणियों के श्रमिकों की माँग अनिश्चित तथा अधिक हो, स्थायीकरण तथा बदली नियंत्रण जैसी प्रथाओं की सिफारिश की और 1983 में केन्द्र सरकार के उद्यमों से कहा गया था कि नैमित्तिक श्रमिकों के बारे में वे आदर्श स्थायी आदेशों के लागू करें।
जनवरी 1950 में छंटनी के श्रमिकों को नियमित करने तथा श्रमिकों के स्थायीकरण के लिये उत्तर प्रदेश की सरकार द्वारा एक योजना बनायी गयी थी। यह योजना पहले छ: माह फिर 1 वर्ष तक चलाने का विचार था, परन्तु इसी सफलता को देखकर इसको जारी रखने का निश्चय किया गया। प्रयोगात्मक रूप से यह योजना कानपुर में आरम्भ की गयी और रोजगार दफ्तर के चार उप कार्यालय खोले गये। किन्तु इस योजना को 1 जुलाई, 1954 से समाप्त करने का निर्णय किया गया। उत्तर प्रदेश बदली श्रमिक रोजगार अधिनियम 1978 के अंतर्गत अब प्रत्येक मालिक के लिये यह अनिवार्य कर दिया गया है कि आरक्षित श्रेणी के श्रमिकों का एक रजिस्टर बनायें और मई 1984 में रेलमंत्री ने संसद में घोषित किया कि रेलवे में नैमित्तिक श्रमिकों की भर्ती पर रोक लगायी जायेगी तथा नैमित्तिक श्रमिकों की समस्याओं को निपटाने के लिये तथा उन्हें नियमित रोज़गार में रख पाने के लिये पृथक कोष्ठ बनाया जायेगा।


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