घनानंद का जीवन परिचय, रचनाएँ एवं साहित्यिक विशेषताएं



जीवन परिचय
घनानंद रीतिकाल की रीतिमुक्त स्वच्छन्द काव्यधारा के सुप्रसिद्ध कवि है। आचार्य शुक्ल के मतानुसार इनका जन्म सवंत् 1746 में दिल्ली में हुआ तथा संवत् 1817 में वृंदावन में इनका देहावसन हुआ। ये दिल्ली के रहने वाले एक कायस्थ थे और सम्राट मुहम्मद शाह बादशाह के मीर मुंशी थे। महाकवि घनानन्द के विभिन्न नामों के प्रति विद्वानों में मतैक्य नहीं है। ये नाम निम्नलिखित हैं- घन आनन्द, ’आनन्द घन या आनन्दघन अथवा आनन्द के घन,’ आनन्द निधान तथा आनन्द।’ यह तीनों एक ही व्यक्ति के नाम हैं या अलग-अलग व्यक्ति के, यह प्रश्न विवाद का है। आनन्दनिधान नाम के लिये निम्नलिखित उद्धरण प्रस्तुत हैं :-
वहै मुसक्यानि, वहै मृदु बतरानि, वहै,
लड़कीली बानि उर ते अरति है।
वहै गति लैन, औ बजावनि ललित बैन,
वहै छैलताई न छिनक बिसरति है।
आनंदनिधान प्रान प्रीतम सुजान जू की,
सुधि सब-भौतिन सो बेसुधि करती है।।
घनानन्द के समय को लेकर भी विवाद है। शिवसिंह सरोज सेंगर के मत से घनानन्द का समय सम्वत् 1617 है। वे आनन्दघन नाम को मानकर यह समय निर्धारित करते हैं। जनश्रुति एवं विद्वानों के आधार पर यह कहा जाता है कि घनानन्द जी का जन्म सम्वत् 1746 के आस पास हुआ था। कतिपय विद्वान् इनका जन्म सम्वत् 1715, 1630, तथा 1683 मानते हैं। आज इनका जन्म सम्वत् 1746 सप्रमाण स्वीकार गया है, अन्य तीनों ही जन्म सम्वत् संदिग्ध हैं, आपका जन्म स्थान दिल्ली के आस पास हुआ था या दिल्ली में ही स्वीकारा जा सकता है। अधिकांश विद्वान् इस मत के समर्थक हैं। कुछेक विद्वान् इनके जन्म स्थान को वृन्दावन एवं बुलन्दशहर के पास का मानते हैं। आपका जन्म भटनागर कायस्थ परिवार में हुआ, आपकी शिक्षा फारसी भाषा के द्वारा शुरू हुई थी, बचपन से ही आपकी रुचि विद्यााध्ययन की ओर विशेष थी। जनश्रुति के आधार पर आप अबुलफजल के शिष्य माने जाते हैं। इन्होंने अपनी असाधारण प्रतिभा एवं बुद्धि से शीघ्र ही फारसी का अच्छा ज्ञान अर्जित कर लिया था। इसके बाद आप सम्राट मुहम्मदशाह ’रंगीले’के मीर मुंशी पद पर नियुक्त हो गए थे। आपने अपनी आकर्षक बुद्धि एवं प्रतिभा सम्पन्नता के निदान स्वरूप शीघ्र पदोन्नति पा ली थी। और आप धीरे-धीरे सम्राट के ’खास कलम’ अर्थात् प्राइवेट सेक्रेटरी, हो गए। घनानंद की मृत्यु के बारे में विद्वानों के दो प्रकार के मत है। प्रथम मत के अनुसार नादिरशाह के आक्रमण के समय मथुरा में सैनिकों द्वारा प्रथम प्रश्नपत्र घनानंद की मृत्यु हुई। किन्तु इस मत का खण्डन इस आधार पर हो जाता है कि नादिरशाह द्वारा किया गया कत्ले आम दिल्ली में हुआ था न कि मथुरा में। दूसरे इस आक्रमण और घनानंद की मृत्यु के समय में ही अंतर है। द्वितीय मत ही अब मान्य है, वह यह की संवत् 1817 (सन् 1660 ई.) में अब्दुलशाह दुर्रानी ने जब दूसरी बार मथुरा में कत्लेआम किया था इसी में घनानंद की मृत्यु हुई।


घनानन्द की रचनायें
घनानंद द्वारा लिखित कई ग्रन्थ है। सबसे पहले भारतेन्दु हरिशचन्द्र ने ’सुजान शतक’ नामक पुस्तक में घनानंद कविताओं का संकलन किया। इसके अतिरिक्त ’सुजानहित’तथा ’सुजान सागर’ नामक संकलन भी प्रकाश में आया। इस क्षेत्र में आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा घनानंद पर किया गया शोध कार्य बड़ा सार्थक सिद्ध हुआ। उन्होंने घनानंद के कविताओं को संकलित कर तीन पुस्तकें प्रकाशित की। प्रथम ’घनानंद कवित’ जिसमें 502 कवित्त संग्रहित है। द्वितीय संकलन सन् 1945 में प्रकाशित हुआ जिसमें कवित्त सवैयों के अतिरिक्त घनानंद के 500 पद तथा उनकी ’वियोग बेलि’, ’यमुना यश’, ’प्रीति पावस’ तथा ’प्रेम पत्रिका’ रचनाओं का संग्रह है। इसके बाद सन् 1952 में घनानंद की अन्य 36 कृतियों का संकलन करते हुए ’घनानंद ग्रंथावली’ का प्रकाशन हुआ। काशी नागरी प्रचारिणी महासभा ने 2000 सम्वत् तक की खोज के आधार पर निम्नलिखित कृतियों को उनका माना है- 1. घन आनन्द कवित्त 2. आनन्द घन के कवित्त 3. कवित्त 4. स्फुट कवित्त 5. आनन्द घन जू के कवित्त 6. सुजान हित 7. सुजानहित प्रबन्ध 8. कृपाकन्द निबन्ध 9. वियोग बेला 10. इश्क लता 11. जमुना-जस 12. आनन्द घन जी की पदावली 13. प्रीती पावस 14. सुजान विनोद 15. कविता संग्रह 16. रस केलि बल्ली 17. वृन्दावन सत।

घनानंद का संयोग श्रृंगार वर्णन
रीतिकालीन काव्यधारा का प्रधान तत्व भक्ति नहीं प्रेम की अभिव्यंजना है। यह प्रेम कहीं मांसल है तो कहीं मानसिक और आध्यात्मिक भी है। घनानंद हिन्दी के सर्वोत्कृष्ट स्वच्छन्द प्रेमी कवि है और इनका श्रृंगार वर्णन प्रेम की मानसिक अनुभति को गहराई और तीव्रता से अभिव्यक्त करता है। इनकी प्रेम व्यजंना में इतनी आकुलता, इतनी व्यथा एवं इतनी पीडा है कि कठोर से कठोर श्रोता एवं पाठक भी द्रवित हो जाते हैं और उसमें संयोग-सुख की इतनी मादकता एवं उल्लास भावना भी भरी हुई है कि सहृद्यों को आनंद विभोर कर देती है। इनकी प्रेमानुभूति में आत्मानुभूति का सर्वधिक योग है। एक विद्धान के अनुसार - "श्रृंगार का स्थायी भाव रति है। यही स्थायी रति है। यही स्थायी भाव और स्थायी भावों में श्रेष्ठ माना जाता है। मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से श्रृंगार जीवन का आधे से भी अधिक पक्ष है, इसका विकार सर्व जाति सुलभ, तीव्र, हृदय-स्पर्शी व स्वाभाविक है। रुद्रट तो इसकी सर्व व्याप्ति आवाल वृद्ध में पाते हैं। प्रेम ही मानव-हृदय की मूल-भावना है जो कि श्रृंगार रस का मूलाधार है। संस्कृति के विकास का इसी प्रेम का प्रतिफल है।
श्रृंगार रस के नायक व नायिका आलम्बन हैं, इस निश्चित बात को अन्य रसों में ही नहीं पाया जा सकता है। रतिभाव मनुष्य के हृदय में उस परिपक्व अवस्था में है जो किचित आश्रय से उद्दीप्त हो उठता है। नायक व नायिका के परस्पर प्रेम का परिणाम श्रृंगार रस का परिपाक होना है। श्रृंगार-रस ऐसा रस है जो मानव के अंग प्रति अंग में निहित है। निस्सन्देह प्रेम का साम्राज्य असीम है।'' वे आगे लिखते हैं -"घनानन्द ने श्रृंगार के दोनों पक्ष संयोग व वियोग की बाह्म व आंतरिक मनोवृत्त्यों का सूक्ष्म व हृदयग्राही वर्णन किया। कृष्ण को नायक, राधा को नायिका तथा सखियें को आपने अपने काव्य का आलम्बन व प्रमुख पात्र बनाया। इनके राधा-कृष्ण व सखियां युवा हैं। 'सुजान' शब्द जो कहीं कृष्ण तो कहीं राधा के सम्बोधन में आप काम में लाये हैं। यह सकारण है क्योंकि आपका तन-मन शरीरी चर्मअस्थि सुजान वेश्या के प्रति आशक्त था और जब आप 'रंगीले' के दरबार में उससे अपमानित हुए और प्रेम प्रेम न पा सका तो उसी शरीर चमं-अस्थि को जो हृदय में पहले ही समा चुका था काव्य का चोला पहना कर मूर्ति रूप में खड़ा किया-उन सुखद-सुन्दर स्मृतियों को जिनकी रूपलिष्ठा में मन स्वयं की विस्मृति कर बैठा था और जिससे आज हृदय विलकता, रोता व तड़पता, और उस हृदय-वेधक तड़फन को वृन्दावन की कुंज गलियन में धूम फिर कर उसे ऊंचे स्वर से गाया-वही इनका संयोगी व वियोगी काव्य है। और उसी नाम को 'प्रभु' मान आपने, आह्नान किया।'' घनानन्द के प्रेम वर्णन के विस्तार के लिए यह आवश्यक है कि जाता है वे पंक्तियाँ प्रस्तुत की जाएं जो इस बात की पुष्टि करते हों। निम्नलिखित पंक्तियों में इस बात का स्पष्टीकरण हो जाता है, यथा-
आनन्द के घन, लागें अचंभो पपीहा पुकार ते क्यों अर सेंये।
प्रीति पगी अंखियानि दिखाय के हाय अनीत सु दीठ छिपैये।।
क्यों हंसि हर्यो हियरा, अरुक्यौं हित के चित चाह बढ़ाई।
काहे को बोलि सुधासने बँननि, चँननि मँन-निसन चढ़ाई।।
सो सुध मोहिय मैं घन आनन्द सालति क्यों हूं कढ़ै न कढ़ाई।
मीत सुजान अनीति की पाटी, इतै पै न जानियै कौने पढ़ाई।।
घन आनन्द कौन अनोखी दसा कहा मो जिय की गति कौं परसै।।
जिय नेकु बिचारि कै देहु बताय हहा पिय दूर ते याय गहौं।
इन पंक्तियों से यह प्रमाणित होता है कि घनानन्द का लौकिक प्रेम आध्यात्मिक प्रेम से श्रेष्ठ प्रतीत होता है। उनके प्रेम की स्थिति यह है कि व्यक्ति स्वच्छन्द प्रेम के रस में निमग्न रहते हैं जो अभीप्सित होता है वह गा उठते हैं। उनकी प्रेमानुभूति को निम्न प्रकार से विभक्त किया गया है। उनके प्रेम वर्णन की निम्नलिखित विषेषतायें थीं -
इहलौकिक प्रेम - रीतिकालीन प्रेम का आधार लौकिक सुख और आनंद का अनुभव करना था। संपूर्ण रीतिकाली कवि नायिका के दैहिक सौन्दर्य के वर्णन और रसपान में आकंठ डूबे थे। इस भौतिकता के प्रति जब कभी उनके अंदर अपराधबोध पैदा होता था तो उसे कृष्ण और राधा के प्रेम में तब्दील कर देते थे। परन्तु घनानंद के प्रेम का मूलाधार विषुद्ध भौतिक जीवन था और सुजान नामक वेश्या के प्रेम में वे पागल थे। उसके प्रति घनानंद को तीव्रानुराग था। उनका यही लौकिक प्रेम उस वेश्या के कपट, छल एवं निष्ठुर व्यवहार के कारण अलौकिकता में परिणत हो गया था, उनकी इस अलौकिकता का मूलाधार लौकिक प्रेम ही है, लौकिक वासना नहीं हैं, जिसने घनानंद को 'महानेही' बना दिया था, प्रेम के महोदधि में निमग्न कर दिया था, चाह के रंग में भीगो दिया था। इसलिए घनानंद के इस काव्य में वही लौकिक प्रेम हिलोरें ले रहा है-
क्यों हंसि हेरि हियरा अरू क्यों हित कै चित्त चाह बढ़ाई।
वाहे को बोलि सुधासने बैननि चैननि मैन-निसैन चढ़ाई।।
सो सुधि यो हिय मैं घन आनन्द सालति क्यों हूँ, कढै न कढाई।
मीत सुजान अनीत की पाटी इतै पै न जानिये कौने पढाई।।
निश्छल पम्रे की अभिव्यक्ति - लौकिक प्रेम विष्वास और निष्कपटता की मांग करता है। घनानद ऐसे ही सच्चे पे्रमी थे। उनका प्रेम अपनी प्रेमिका के प्रति निष्छल और निष्कपट था। भले ही उनके प्रिय ने उनके साथ विश्वासघात किया, उन्हें दगा दी और उनका साथ नहीं दिया, किन्तु वे एक निश्चल प्रेमी थे और प्रेम के पक्ष में निश्छलता एवं निष्कपटता को ही अत्यधिक महत्व देते थे। प्रेम की इसी निश्छलता को इस बहुत प्रसिद्ध पद में अभिव्यक्त करते हैं, इसमें प्रेम की सघन और मार्मिक परिभाषा प्रस्तुत की है। इस तरह की प्रेम की परिभाषा हिन्दी साहित्य में अन्यत्र उपलब्ध नहीं होती है-
अति सूधो सनेह कौ मारग है जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं।
तहाँ साँचे चलै तजि आपुनपो झिझके कपटी जे निसाॅक नहीं।।
घन आनंद प्यारे सुजान सुनौ इत एक ते दूसरौ आक नहीं।
तुम कौन धौ पाटी पढे़ हो लला मन लेहु पै देहु छटांक नहीं।।
घनानंद के प्रेम वर्णन में इस तरह अडम्बर हीनता एवं अकृत्रिमता इसलिए मिलती है क्योंकि वे स्वयं प्रेम के अनुभव में पके थे, विरह को उन्होंने झेला था। अन्य कवि सिर्फ कविता के लिए प्रेम का वर्णन करते हैं, जबकि घनानंद अपने जिये गए अनुभव को लिखते हैं। उनके प्रेम के बीच छल-कपट का तनिक भी स्थान नहीं था, क्योंकि घनांनांद स्वाभाविक प्रेम के पुजारी थे, स्वच्छंन्दता के भक्त थे और अपनी तरंग में आकर प्रेम का निरूपण करते थे। अपने इसी नैसर्गिक प्रेम की व्यजंना करते हुए तथा चन्द्रमा और चकोर के नैसर्गिक प्रेम को उदाहरण बनाते हुए लिखते हैं-
चहौ अनचाहौ जना प्यारे पै आनन्दघन,
प्रीति-रीति विषम सु रोम-रोम रमी है।
मोहिं तुम एक, तुम्हें मो सम अनेक आहिंकहा
कछू चंदहिं चकोरन की कमी है।।
घनानन्द का प्रेम कितना निष्छल था इसके लिए उनके काव्य में उदाहरणांे की कमी नहीं है। वे प्रेम की गहराई को जितना अंदर महसूस करते थे, उतना ही काव्य में अभिव्यक्त करने में भी सक्षम थे।

पीड़ा की अनुभूति - प्रेम के दीवानों के लिए विरह की पीड़ा सबसे महत्वपूर्ण होती है। घनानंद सच्चे प्रेम के दीवाने थे। उनका प्रिय अपने प्रेमी की चिंता न करके निष्ठुरता, कठोरता एवं निर्दयता का ही व्यापार कर रहा था, तो. घनांनद अपने निष्टुर एवं निर्दय प्रिय के हृदय में प्रेम उत्पन्न करने के लिए अपने को आशा की रस्सी से बांधकर भरोसे की शिला छाती पर रखकर अपने प्रेम रूपी सिन्धु में डूबने को तैयार थे, इसीलिए तो घनानंद लिखते हैं-
आसा-गुन बांधि कै भरोसो-सिल धरि छाती,
पूरे मन-सिन्धु में न बूढत सकाय हौं।
दीह दुख-दव हिय जारि उर अंतर,
निंरतर यों रोम-रोम त्रासनि नचाय हौं।। 
सौन्दर्य प्रियता - प्रेम के मूल में सौन्दर्य चेतना होती है, चाहे वह प्रकृति प्रेम हो या व्यक्ति प्रेम। किसी के प्रति आकर्षण का प्रथम कारण उसके सौन्दर्य से प्रभावित होना होता है। घनानंद के प्रेम का मूल कारण भी सुजान का अनिन्द सौन्दर्य था, जो कवि घनांनद के रोम-रोम में बसा हुआ था, क्योकि वे उसकी सहज सुकुमारता, स्वाभाविकता, मधुरता एवं प्राकृतिक सुन्दरता को देखकर ही उसके सच्चे प्रेमी बने थे। इसीलिए घनांनद के ह्यदय में प्रेयसी सुजान की 'तिरछी चितौनि' 'चंचल विसाल नैन', 'धूमरे कटाछि', 'रसीली हॅसी','बडी-बडी' अंखियाॅ', 'चीकने चिहुर', 'जोबन-गरूर-गरूबाई', 'रस-रासि-निकाई', 'नवजोबन की सुथराई', 'नेह-ओपी-अरूनाई', आदि। इसी कारण उनके हृदय में प्रिय के सौन्दर्य का अथाह सागर हिलौरें लेता रहता था। उन्होंने अपनी प्रिय सुजान के इसी अनिन्द सौन्दर्य का बखान अपने काव्य में किया है -
स्याम घटा लिपही थिर बीज कि - सोहै अमाबस अंक उज्यारी।
धूम के पुंज मैं ज्वाल की माल-सी पै दृग-सीतलता-सुखकारी।।
के छाकि छायौ सिगांर निहारि सुजान-तिया-तन-दीपति प्यारी।
कैसी फबी घन आनन्द चोपनि सों पहिरी चुनि साॅवरी सारी।।
प्रिय के सौन्दर्य की उपासना संयोग पर ही आधारित है। घनानंद ने इसीलिए संयोग-सुख के आनन्द से प्रफुल्लित रोम-रोम का तथा अंग-अंग से फूटते हुए हर्षोल्लास का सजीव चित्रण किया है-
ललित उमंग बेली आलबाल अंतर ते,
आनंद के घन सींचा रोम रोम हवे चढ़ी।
आगम-उमाह-चाह छायी सु उछाइ रंग,
अंग-अंग फूलनि दुकूलिन पैर कढी।।
विरहाकुलता- घनानंद प्रेम की पीर के कवि कहे जाते हैं। उनके जीवन में प्रेमी के संयोग के क्षण बहुत कम हैं, विरह की आग में ही अधिक जले हैं। इसलिए उनके काव्य का मूल स्वर विरहानुभूति है। घनानंद के प्रेम मंे जहां संयोग का हर्ष उल्लास परिलक्षित होता है, वहाँ विरह का अथाह सागर हिलौरें लेता हुआ दिखाई देता है। उन्होंने प्रेम के संयोग पक्ष की अपेक्षा वियोग पक्ष का अधिक आतुरता, तल्लीनता एवं तीव्रता के साथ वर्णन किया है। सुजान का यह विरह घनानंद के लिए वरदान सिद्ध हुआ है और घनानंद ने भी अपनी विरहाकुलता का वर्णन करके सुजान एवं सुजान के प्रेम को अमर बना दिया है। इस प्रकार घनानंद का प्रेम स्थूल नहीं, अपितु सूक्ष्म है। उसमें अश्लीलता एवं काम-वासना नहीं है, अपितु दिव्यता एवं पवित्रता है, क्योंकि घनानंद ने प्रेम के सभी पक्षों में शारीरिक सुख की अपेक्षा भावना द्वारा प्रिय का सान्निध्य पाने की आकांक्षा प्रकट की है। इसी कारण घनानंद की प्रेमानुभूति अनिर्वचनीय है, वह प्रेमी की मूक पुकार है और पूर्णतया अनुभव गम्य है।

घनानंद का वियोग वर्णन
संयोग और वियोग प्रेम के दो छोर हैं। सच्चा प्रेमी इनके बीच अपने को पाता है कभी वह संयोग सुख में अपनी अनुभूति का तरोताजा करता है तो कभी वियोग में अपने प्रेम की परीक्षा के दौर से गुजरता है। इसीलिए वियोग को प्रेम की कसौटी है। जो प्रेमी इस कसौटी पर खरा उतरता है, वहीं सच्चा प्रेमी माना जाता है। प्रेम की सात्विकता और सघनता विरह में ही दिखाई देती है, जबकि संभोग प्रेम का सुखद रूप है। संयोग से प्रेमी वासना का शिकार बना रहता है, जबकि वियोग मे वह वासना से ऊपर उठकर मानसिक स्थिति को प्राप्त कर लेता है। वियोग ही प्रेमी की दृढता का परिचायक होता है। वियोग ही उसकी निष्ठा एवं उत्कंठा का द्योतक होता है, और वियोग ही एक प्रेमी की प्रिय के प्रति उत्कट चाह, तीव्र आकांक्षा, सुदृढ लालसा एवं उद्दाम आकुलता का अनुभावक होता है। घनानंद भी ऐसे ही वियोगी कवि है, जिनके हृदय में अपनी प्रेमिका 'सुजान' की उत्कट विरह भावना भरी हुई है।
रीतिकालीन काव्य में बिना वियोग श्रृंगार के संयोग का न तो पूर्ण-रूपेण आस्वाद ही प्राप्त होता है और न उसके मूल्यों का अंकन किया जा सकता है। प्रेम की आध्यात्मिक परिणति वियोग श्रृंगार द्वारा ही सम्भव है। विरह को काव्य की कसौटी माना जाता है। विरह एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा मन शुद्ध हो जाता है, उसमें से शारीरिक वासनात्मकता समाप्त हो जाती है। प्रेम के मन से स्वार्थ भावना नष्ट हो जाती है। वियोगी कवि की भावना पहाड़ी जलप्रपात की तरह बह निकलती हें, और वही काव्य का रूप धारण कर पाठक के हृदय को स्पर्श कर उसे प्रेम की रसानुभूति कराती हैं। संयोग की मधुर स्मृतियां वियोगी के लिए बेचैन करती रहती हैं। घनानन्द का वियोग उनके हृदय की पीड़ा का प्रतिफल है, उसमें पाठक के हृदय को स्पर्श करने की शक्ति है। वह अपनी सुध-बुध खो देता है। जब पाठक घनानन्द का काव्य पढ़ता है तब उसकी इतनी विशाल हृदय-बोधक रसानुभूति कराने की क्षमता का अनुभव होता है। अपनी प्रेयसी की सुध में घनानन्द स्वयं तो खो गये, परन्तु साथ में पाठक को भी विरह की अनन्तोदधि में डूबो दिया। विरह के रस में डूबने का मजा तो घनानन्द के साथ ही मिलता है। घनानन्द के काव्य में विरह की भी कोई एक दशा नहीं है। वियोगी प्रेमी सोते, उठते-बैठते और हर समय उसका हृदय पुकार उठता है अपनी प्रेयसी को! वही बातें जो हृदय में उमड़ती-घुमड़ती रहती हैं, उनको प्रत्यक्ष रूप से अभिव्यक्त करने का अवसर जागते हुए नहीं मिलता तो उसके सोते समय 'स्वप्न' में चित्र-सा गतिमान होने लगता है। घनानन्द लिखते हैं कि चलो इस बहाने मन ही बहला लें कि-
जगि सोवनि में लगिये रहे,
चाह वहै गरराय उठै रतियां।
भरि अंक निःसक हृै भेटन कौं, 
अभिलाख अनेक भरी छतियाँ।
सलोनी स्याम-मुरति फिरै आगे।
कटाछै बान से उर आन आन लागे।।
मुकुट को लटक हिृय में आय हालै।
चितवानी बंक जियरा बीच सालै।।
घनानन्द के काव्य में विरह असीम हो गया है। इस दषा में विरहिणी कैसे अपने प्रियतम को पत्र लिख सकती है। ऐसी विरहिणी तो है नहीं जो आंसुअन की स्याही में डुबो-डुबो कर पत्र लिख डाले। वह अपनी विशेषता प्रगट करती है कि-
लिखै कैसे पियारे प्रेम पाती,
लगै अंसुअन भरी हृ हूंक छाती।
विरहणी नायिका सोचती है कि इससे तो अच्छा होता कि नायक गुणवान न होता, कम से कम विरहाग्नि में वह उसे इस प्रकार याद आकर उसके हृदय को नोंचता तो नहीं। पर क्या करे उसे याद आ ही जाती है अपने 'रावरे रूप की मोहिनी सूरत' उसके आकर्षण का कारण भी तो यही है।
रावरे रूप की रीति अनूप,
नयो नयो लागत ज्यों-ज्यों निहारिये।
नायिका बेचारी रो रही है अपने प्रेमी के गुणों व रूप स्मृति में। उसकी मुष्किल यह है कि उसके प्रेमी का रूप उसकी आँखो से ओझल नहीं होता है-
छवि को सदन, मोह मण्डित बदन चन्द
तृषनि चखन लाल! कब धौं दिखाए हों।
विरहिणी नायिका की निस्वार्थ प्रीति का उत्कर्ष यह है कि वह एक ओर तड़फ रही है, अपने प्रिय के लिए, परन्तु कोई बात नहीं, उसके मन से प्रिय के लिए दुआ ही निकलती है कि उसका प्रिय सुख व आनन्द से रहे, उसे यही कामना है। प्रेम की इस त्याग की भावना कितनी उत्कृष्ट है, कि-
धन आनन्द जीवन प्रान सुजान,
तिहारि पै बातनि लोजियै जू।
नित नीकै रहो चाटु कहाइ,
असीम हमारियौ लीजिये जू।।
वियोग श्रृंगार में इस तरह की त्याग की भावना को रीतिकाल के अन्य किसी कवि में इतने उत्कट रूप से नहीं देखा जा सकता है। उसे अपने प्रेमी के सम्मान का कितना ध्यान है, वह कृष्ण को ठगिया नहीं कहती और न उन्हें कुछ बुरा भला कहती है। विरह है तो घनानन्द की विरहिणी केवल आत्म-निवेदन करती है कि इतनी निष्ठुरता क्यों अपनाई है।
पहलै अपनाय सुजान सनेह सैं,
क्यों फिर तेह कै तोरिये।।
घनानन्द के यहाँ विरहिणी की विचित्र दशा चित्रित की गई है-
कारी कूर कोकिला कहाँ को बैर काढ़ति री,
कूक कूकि अब ही करेजौ किन कोरिली।
पैंडे परे पापी ये कलापी निस श्रोस ज्यों ही,
चातक घातक त्योंहो तू ही कान फोरिलै।
आनन्द के घन प्रान जीवन सुजान बिन,
जानि कै अकेली सब घेरौ दल जोरि लै।
जौलों कहै आवन विनोद वरसावन वे,
तौलौं रे ठरारे वजमारे घन घोरिलै।
श्री परशुराम चतुर्वेदी लिखते हैं-''घनानन्द ने विरह के महत्व को भली भांति समझा था इसी-लिए प्रेमी के विरहदग्धा हृदय तथा उसके सूक्ष्मातिसूक्ष्म एवं अनिर्वचनीय मानसिक व्यापारों का जैसा सुन्दर वर्णन अपनी कविता द्वारा उन्होंने किया है वैसा बहुत कम कवि कर पाए हैं।'' वियोग वर्णन में कवि जिन तरीको को अपनाता है, उनको जानना भी आवश्यक है और वह किस-किस तरह से अपने वियोग की भावना को अभिव्यक्त करता है। इसे भी देखा जाना चाहिए।

रूपासक्ति की प्रधानता - प्रेम का मूलाधार रूपासक्ति ही होता है। यही बात वियोग में पीड़ा को घना कर देती है। घनानंद के उत्कट विरह का मूल कारण यह है कि उनकी 'अलबेली सुजान' अनिन्द सुन्दरी थी, उसमें उन्हें अलौकिक सौन्दर्य के दर्शन हुए थे और वे उस सौन्दर्य को नित्य देखते रहना चाहते थे। कारण यह था कि वह रूप नित्य नया-नया प्रतीत होता था और उस रूप पर उन्होंने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था, परन्तु दुर्भाग्य से वह रूप उनकी आंखों से ओझल हो गया, उन्हें फिर देखने को नहीं मिला और वे अपनी पागल रीझ (मोह.प्रेम) के हाथों बिककर रात-दिन वियोग की आग में जलते रहे-
रावरे रूप की रीति अनूप नयो-नयो लागत ज्याँ-ज्याँ निहारियै।
त्यौं इन आंखिन बानि अनोखी अद्यानि कहूँ नहि आन तिहारियै।।
एक ही जीव हुतो सु तौ वार्यौ सुजान सॅकोच और सोच सहारियै।
रोकी रहे न, दहै घन आनंद बावरी रीझ के हाथनि हारियै।।
घनानन्द के प्रेम में रूपलिप्सा का योग तो है परन्तु साहचर्य का उतना व्यापक-वर्णन जितना सूर के काव्य का है, उतना इनमें नहीं मिलता। कृष्ण की लीलाओं को उतना स्थान न दिया जितना कि सूर ने दिया है और न यौवन कालीन ऋीड़ाओं को ही महत्व दिया है। घनानन्द ने कृष्ण की रूप माधुरी का वर्णन किया है, उसी मार्मिकता तन्मयता व तल्लीनता के साथ जितना अन्य कृष्ण भक्त कवियों ने किया है, यथा-
मोर चन्द्रिका सिर धरें, गरें, गुंज की माल।
धातु चित्र कटि पीत पट, मोहन मदन गुपाल।।
अति कामनीय किशोर बपु, गोपीनाथ उदार।
कमल नैन ऋीड़ा निपुन, कान्हर गोप कुमार।।
कमल केलि कीड़ा कुसल, कलानाथ रसवन्त।
गोवरधन वासी सदा, गोप-कामिनी-कंत।।
लहलहाति जीवन उदै, ब्रजमोहन अंग अंग।
महारूप सागर उमगि, उठति अमोष तरंग।
इसी प्रकार राधा के रूप सौन्दर्य का वर्णन किया है। घनानन्द की गोपियां कृष्ण की एक रूपलिप्सा पर आकर्षित हैं तथा इनकी गोपियां भी मुरली की पावन-पंचम ध्वनि को सुनते ही फड़क उठती हैं। राधा का चारुतम रूप माधुरी भी कृष्ण अपनी ओर आकृष्ट करता है और राधा कृष्ण के प्रति 'सैन नैन' चलाती हैं। राधा का रूप वर्णन करते हुए कवि कहता है, यथा-
लाजनि लपेटी चितवनि भेदभाव भरी,
लसति ललित लोल चख तिरछीन में।
छवि को सदन गोरो वदन, रूचिर माल,
रस निरचुरत मीठी मृदु मुसक्यान में।
दसन दमिक फैलि हियें मोती लाल होति,
पिय सों लड़कि प्रेम पगी बतरानि में।
आनग्द की निधि जगमगति छबीली बाल।
अंग न श्रनंग-रंग ढुरि मुरजानि में ।
हृदय की मौन पुकार की अधिकताः- घनानंद का विरह बौद्धिक नहीं है, वह उनकेहृदय की सच्ची अनुभूति है और जहां विरह बौद्धिक होता है, वहां प्रदर्शन एवं आडम्बर का आधिक्य देखा जाता है, किन्तु जहाँ हृदय की अनुभूति होती है वहां प्रदर्शन एवं आडम्बर कहाँ वहां तो हृदय की टीस, प्राणों की तडपन एवं आकुलता बाहर नहीं सुनाई पड़ती, क्योंकि हृदय बोल नहीं पाता, वह मौन रहकर हही धडकता रहता है।
अंतर-आच उसास तचै अति, अंत उसीजै उदेग की आवस।
ज्यौं कहलाय मसोसनि ऊमस क्यों हूँ कहूँ सुधरें नहीं थ्यावस।।
प्रिय-जन्य निष्ठुरताः- घनानंद के विरह की तीव्रता एवं उत्कटता का मूल कारण यह है कि उनका प्रिय बड़ा कठोर है, निर्दय है, निष्ठुर है तथा विश्वास घाती है। उनको इसकी तनिक भी परवाह नहीं है, वह इनकी दुर्दशा देखकर तनिक भी नहीं पसीजता और अब उसने जान-पहचान भी मिटा डाली है। वह निष्ठुरता एवं कठोरता का व्यवहार करके अब रात-दिन जलाता रहता है।
भए अति निठुर मिटाय पहिचानि डारी,
याही दुख हमैं जक लागी हाय हाय है।
तुम तो निपट निरदई गई भूमि सुधि,
हमैं सूल-सेलनि सो क्यों हूँ न भुलाय है।।
प्रेमगत विषयताः- घनानंद के विरह में सबसे बडी विशेषता यह है कि एकांकी है, सम नहीं है, अपितु विषम है, क्योंकि जो तडपन है, चीत्कार है, जलन है, धडकन है वह एक ओर ही- केवल प्रेमिका ही हृदय अपने प्रिय (पे्रयसी सुजान) के विरह में रात-दिन तडपता रहता है। लेकिन उनके प्रिय के हृदय में विरह की तनिक भी आग नहीं है, तनिक भी चाह नहीं हैं परन्तु प्रेमी घनानंद को इसकी चिंता नहीं है कि उनका प्रिय उनके प्रति कैसे भाव रखता है, वे तो अपने प्रिय के अनन्य प्रेमी है और उनके रोम-रोम में प्रीति बसी हुई है।
चाहौ अनचाहौ जान प्यारे पै आनन्दघन,
प्रीति रीति विषम सु रोम रोम रमी है।
उपालम्भ की तीव्रता: - घनानंद के विरह हमें उपालम्भ अत्यंत गूढता एवं गम्भीरता के साथ दृष्टिगोचर के साथ होता है। इस उपालम्भ में विरह के प्रेम की एक निष्ठा भरी हुई है, उत्कटता भरी हुई है और प्रिय के प्रेम की उदासीनता भी भरी हुई है। इसीलिए इन उपालम्भों मंे विरही ने स्वयं को अत्यंत दीन, हीन, दुखी, विनम्र एवं अनन्य प्रेमी कहा है तथा अपने प्रिय को कपटी, विश्वासघाती, छली, निर्मोही, सभी प्रकार के सुख सम्पन्न एवं प्रेम रहित कहा है। अपने प्रेम को इसी अन्यनता एवं एक निष्ठा तथा प्रिय की उदासीनता एवं कपट व्यवहारपूर्ण कठोरता पर उपालम्भ देते हुए लिखा है-
अति सूधो सनेह को मारग है जहाँ नेक सयानप बाक नहीं।
तहाॅ साॅचे चलै तजि आतुनपौ झॅझके कपटी जे निसाक नहीं।।
अंग प्रत्यंग की आकुलताः-घनानंद के विरह में आंख,कान, हृदय, प्राण आदि अंग प्रत्यंगों की अत्यधिक आकुलता, बेचैनी एवं दयनीय स्थिति का चित्रण हुआ है। इसका कारण है, कि विरही घनानंद के सारे शरीर में विरह का विष फैला हुआ है, अंग प्रत्यंग में विरह की आग लगी हुई है, जिससे उनके प्राण नित्य दहकते रहते हैं, नेत्र मदमाते होकर आंसू बहाते रहते हैं।
जिनकों नित नीकें निहारति ही आंखिया अब रोवति हैं।
पल-पाॅवडे पायनि सौं अंसुबानि की धारनि धोवति हैं।।
प्रकृति जन्य उद्दीपनः- घनानंद को विरह वेदना की तीव्र से तीव्रतम बनाने में प्रकृति का भी अत्यधिक हाथ रहा है। कारण यह कि प्रकृति के ये उपादान विरही के ऊपर कहर ढाने का काम करते हैं। कभी पुरवैया हवा चलकर, तो कभी बादल घिरकर, कभी बिजली चमकरक, तो कभी पुष्प अपनी सुगंध से, तो कभी कोकिला कूक कर, बिचारे विरही को रात-दिन सताते है-
कारी कूर कोकिल! कहां कौ बैर काढति री,
कूकि कूकि अबही करेजो किन कोरि ले।
संदेश-प्रेषणीयताः-घनानंद के विरह में एक सबसे बड़ी विशेषता यह भी है कि इसमें विरही अपने विरह के संदेश को बडे अनूठे ढंग से अपने प्रिय के पास भेजती है। उसने इस दूत कार्य के लिए ऐसे धीर गंभीर विरही को चुना है, जो उसी की तरह विरह की आग को अपने हृदय में छिपाये हुए हैं, जो उसी की तरह प्रिय के वियोग में मदमत होकर धुमता रहता है, जो दुसरों के लिए ही अपना शरीर धारण किए हुए है और जो दूसरों के के लिए ही उत्पन्न होने के कारण परजन्य (बादल) कहलाता है। एसे धीर गंभीर सज्जन से दूत कार्य कराना सर्वथा उचित ही है, क्योंकि वह समुद्र के खाने पानी को भी अमृत तुल्य बना देता है और सबको जीवनदान देता है।
पर काजहिं देह को धारि फिरों परजन्य जथारथ है दर सौ।
नीधि-नीर सुधा के समान करौ सबही विधि सज्जनता सरसौ।
घनआनन्द जीवन दायक है कुछ मेरीयों पीर हियै परसौ।
कबहू वा विसासी सुजान के आगन मो असुवानि हुलै वरसौ।।
सात्विकता एवं आध्यात्मिकता:-घनानंद के विरह में अन्तिम और सबसे बडी विशेषता यह है कि उसमें तनिक भी वासना की गंध नही है, कहीं भी अश्लीलता नही है, किसी भी स्थल पर कामकता नहीं है और कोई भी उक्ति कामपरक नही है। यहां प्रत्येक पर में सात्विकता है, प्रत्येक पद प्रेम की पवित्रता है, प्रत्येक छंद में प्रेम की दिव्यता है और प्रत्येक उक्ति में काम-जन्य वासना से सर्वथा परे आध्यात्मिक वंदना की शुद्धता है।
लहा छेह कहाधौं मचाय रहे ब्रजमोहन हौ उत नींद भरे हौ।
मिली होति न भैंट दूरे उधरौ ठहरै ठहरानि क लाभ परे हौ।।
घनाआंनद छाय रहौ नित हो हित प्यासनि चातक ज्ञात परे हौ।।
घनानंद की विरहानुभूति में शुद्ध एवं सात्विक विरह की व्यंजना की हुई है, इसमें हृदय की गहराई अधिक है। अपनी यथार्थता, सात्विकता, पवित्रता एवं आध्यात्मिकता के कारण ही घनानंद की विरहानुभूति सर्वोत्कृष्ट है और अपनी इसी सात्विक विरह-भावना के कारणर घनानंद हिन्दी के सर्वोत्कष्ट विरही कवि है।

घनानंद का अनुभूति पक्ष या भावपक्ष
घनानंद की अनुभूति पक्ष या भावपक्ष का समयक् अनुशीलन करने के लिए उनके काव्य में भी यह देखते की चेष्टा की जाएगी कि घनानंद ने विविध वस्तुओं के वर्णन कैसे किये है, विविध भागों के निरूपण में कैसा कौशल दिखाया ही, विविध रखों की अभिव्यंजना में कैसी दक्षता प्रकट की है और विविध सौन्दर्य चित्रों को अंकित करने में अपनी जो कला-चातुरी व्यक्त की है, उसे निम्न भागों विभक्त किया गया है-
वस्तु वर्णन -घनानंद ने ब्रज प्रदेश के प्रति अपनी गहन आस्था एवं असीम श्रद्धा व्यक्त की है और इसी कारण उन्होने ब्रज के गांवों, यमुना, वृन्दावन आदि का अत्यंत सजीवता से निरूपण किया है।
जमुना तीर गांव राजनि। कहा कहौं गोकुल-छवि-छाजनि।।
गोकुल -छवि आखिनि हीं भावै। रही न सकै रस न कछु गावै।।
इसी तरह ब्रज के अन्य स्थानों का वर्णन करते हुए घनानंद ने सर्वाधिक वृन्दावन की मंजुल छवि का निरूपण किया है।
वृन्दावन छवि कहत न आवै। सौ कैसे कहि कोऊ गावै।।
तीर भूमि बनि रह्यौ सदावन। जै जमुना जै जै वृन्दावन।।
इसी प्रकार घनानंद ने ब्रज के घर, गांव, गली, गलियारे, घाट, पनघट, गापे, गौप, ग्वाल - बाल, गाय, वृन्दावन, बरसाना, गोवर्धन आदि का अत्यंत विस्तृत वर्णन किया है।प्रकृति चित्रण:- घनानंद ने प्रकृति के अत्यंत रमणीय चित्र अंकित किये हैं। वे सच्चे प्रकृति पे्रमी थे और प्रकृति के साथ उनका साहचर्य भी अधिक रहा था। इसीलिए उन्होंने प्रकृति के अनेक सुन्दर एवं सजीव चित्र अंकित किये हैं।
घुमड़ि पराग लता-तरु भोए। मधुरितु-सौंज-समोए।।
वन बसंत वरनत मन फूल्यौ। लता-लता झूलनि संग झूल्यो।।
प्रकृति के आलंबन रूप की अपेक्षा घनानंद ने प्रकृति के उद्दीपन रूप का चित्रण अधिक सरसता एवं मार्मिकता के साथ किया है, क्योंकि घनानंद का काव्य विरह प्रधान है और विरह में प्रकृति प्रायः विरही जानों के भावों को उद्दीप्त करती हुई दिखाई जाती है।
लहकि लहकि आवै ज्यौं पुरवाई पौन,
दहकि दहकि त्यौं त्यौं तन तांवरे तवै।
बहकि बहकि जात बदरा बिलोकें हियौ,
गहकि गहकि गहबरनि गरै मचै।
चहकि चहकि डारै चपला चखनि चाहैं,
कैसे घन आनन्द सुजान बिन ज्यौं बचे।
भाव निरूपण - घनानंद की कविता भावों का भण्डार है, क्योंकि घनानंद ने ऐसे मार्मिक भावों का चित्रण किया है कि देखते ही बनता है और एक साधारण कवि जहां तक पहुॅच नहीं सकता। धनानंद की इस भाव निरूपण पद्धति पर सर्वत्र उनके गहन प्रेम की छाप है इसी कारण उनके सभी भाव चित्र इतने मनोंरजक एवं आकर्षक बन पडे हैं कि पाठकों एवं श्रोताओं के हृदय उन्हें पढ़कर एवं सुनकर आनंद के सागर में डुबकियां लगाने लगते हैं।
नैन कहैं सुनि रे मन! कान दै क्यों इतनी गुन मोहि दयौ है।
सुन्दर प्यारे सुजान कौ मन्दिर बाबरे तू हम ही ते भयौ है।।
लोभी तिन्हें तन कों न दिखावत ऐसो महामद छाकि गयौ है।
कीजिए जू घन आनंद आय कै पायै परौ यह न्याय नयौ है।।
इसी तरह घनानंद ने उपालम्भ के द्वारा 'स्मृति' का चित्र अंकित करते हुए आवेग, अमर्ष, उग्रता, ग्लानि आदि भावों का बडा ही मार्मिक निरूपण किया है-
क्यों हंसि हेरि हर्यो हियरा अरू क्यों हित कै चित्त चाह बढाई।
काहे को बोलि सुधासने बैननि चैननि मैन-निसैन चढाई।।
सो सुधि मोहिय मैं घन आनन्द सालति क्यों हूॅ कढै न कढाई।
मीत सुजान अनीत की पाटी इतै पै न जानियै कौने पढाई।।
रस निरूपण -घनानंद ने मुख्यतया संयोग श्रृंगार, वियोग श्रृंगार एवं भक्ति का निरूपण किया है। इसमें से भी घनानंद वियोग श्रृंगार के ही कवि है, वियोग के ही अद्वितीय चितेरे हैं। और इनके काव्य में वियोग श्रृंगार का ही पूर्ण परिपाक अधिक मार्मिकता एवं सजीवता के साथ हुआ है। इसीलिए वे अपनी संजीवन-मूर्ति 'सुजान' के वियोग में रात-दिन व्यथित रहते हैं। सोने पर भी सो नहीं पाते, जागने पर भी जाग नहीं पाते, विचित्र सी पीड़ा नित्य आॅखों में रह रहकर आती है, अमृत विष तुल्य प्रतित होता है। फूल शूल जैसे लगते हैं, चन्द्रमा अंधकार उगलता जान पडता है, पानी सम्पूर्ण अंगों को जलाता है, राग-रागनियां अच्छी नहीं लगती गुण दोष में बदल गये हैं, औषधियां रोग पैदा करने वाली हो गयी हैं और रस विरस जान पड़तें हं। इस तरह 'सुजान' के मान फेर लेने से दिन भी फिर गये है। और न जाने अब कैसे दिन बीतेंगें। घनानंद ने इस व्यथा एवं पीड़ा का मार्मिक निरूपण किया है।
सुधा तें स्त्रवत विष, फूल में जगत सूल,
तम उगिलत चंदा, भई नई रीति है।
जल जारै अंग, और राग कर सुर भंग,
संपति विपति पारै, बडी विपरीत है।।
सहागुन गहै दोषैं, औषधि हूॅ रोग पोषै,
ऐसे जान रस माहि बिरस अनीति है।
दिनन को फेर मोहिं तुम मन फेरि डार्यो,
एहो घनाआनंद! न जानौं कैसे बीति है।। 
सौन्दर्य चित्रण - घनानंद ने रूप सौन्दर्य के कितने ही अत्यंत मनोहारी चित्र अंकित किये है, जिनमें अपनी प्राणप्रिया सुजान' की विविध रूप छवियाॅ अत्यंत माधुर्य एवं गम्भीर्य के साथ विद्यमान है। घनानंद ने इन रूप-चित्रों में आॅख, नाक, कान, मुख, अंग-प्रत्यंग आदि को अलग-अलग दिखाने की उतनी प्रवृत्ति नहीं दिखाई देती, जितनी कि उन्होने सम्पूर्ण अंग की अतिशय रमणीयता एवं प्रभाविष्णुता को दिखाने का प्रयास किया है। घनानंद के इन सौन्दर्य-चित्रों में सुजान का रूप, उसका लावण्य, उसकी छवि, उसकी कान्ति, उसकी अंग-दीप्ति आदि मानों साकार हो उठी है-
स्याम घटा लपटी थिर बीज कि सोहै अमाावस-अंग उज्यारी।
धूम के पुंज मैं ज्वाल की माल सी पै दृग सीतलता-सुखकारी।।
कै छवि छायौं सिंगार निहारि सुजान-तिया-तनं-दिपति प्यारी।
कैसी फवी घन आनन्द चोपानि सौ पहिरी चुनि साॅवरी सारी।।
इसी प्रकार घनानंद ने अंग-अंग में द्युति की तरंग उठने वाले पार्थिव रूप-सौन्दर्य को बडी तन्मयता एवं तत्परता के साथ शब्दों में डालकर अंकित किया है। 

घनानंद का अभिव्यक्ति पक्ष या कला पक्ष
किसी कवि के अभिव्यक्ति पक्ष से तात्पर्य उसकी उस वर्णन पद्धति से है, जिसमें वह अपनी अनुभूति को अभिव्यक्त करता है। इसके लिए वह अनेक उपकरणों का सहारा लेता है और इन उपकरणों द्वारा कलात्मक ढंग से अपनी अनुभूति को वाणी प्रदान करता है। इसलिए अभिव्यक्ति पक्ष को कला पक्ष भी कहते हैं और इसके अन्तर्गत कला के वे सभी उपकरण आते हैं, जिनके माध्यम से अनुभूति को अभिव्यक्ति प्रदान की जाती है, अर्थात भाष, अलंकार, गुण, वृत्ति, शब्द शक्ति, छन्द आदि कला को सम्पूर्ण अवयवों का विवेचन अभिव्यक्ति पक्ष के अन्तर्गत होता है।
भाषा - घनानंद ने ब्रजभाषा में अपनी सरस काव्य-धारा प्रवाहित की है। उनकी ब्रजभाषा में सर्वत्र स्वच्छता, एकरूपता एवं सुघडता के दर्शन होते हैं। घनानंद ब्रजभाषा के अत्यंत प्रवीण कवि थे। इसी कारण उनकी भाषा के अनुकूल चलने की अपूर्व शक्ति दिर्खाइ देती है, वह नई-नई भंगिमाओं के द्वारा भावों को प्रस्तुत करने में बड़ी निपुण जान पडती है और उसका रचना-कौशल कारीगरी तथा रूप-विधान सभी कुछ असाधारण एवं अद्वितीय जान पड़ता है। घनानंद का भाषा पर इतना अधिक अधिकार दिखई पडता है कि वह कवि की वशवर्तिनी होकर उनके इशारे पर नाचती है, उनके कहने पर चलती है, उनके आदेश पर कार्य करती है। ऐसा जान पड़ता है कि घनानंद ब्रजभाषा की नाडी पहचानते थे, उसके निश्चित प्रयोगों को जानते थे और उसकी नस-नस से परिचित थे। इसी प्रकार घनानंद ने बडी स्वच्छता और सुन्दरता के साथ ब्रजभाषा का प्रयोग किया है, उसके एक-एक शब्द की स्थापना की है और उसे अपने अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति के लिए गति प्रदान की है। ब्रजभाषा पर ऐसा साधारण अधिकार अन्य किसी हिन्दी कवि का दिखाई नहीं देता। घनानंद की भाषा साफ-सुथरी और अत्यंत निखरी है तथा उसमें भावों के निरूपण की अनन्त शक्ति भरी हुई है।
शब्द शक्ति - शब्द की तीन शक्तियाॅ होती है- अभिधा, लक्षण और व्यंजना। जिनमें ये शक्तियाॅ होती है, वे शब्द भी तीन प्रकार के होते हैं-वाचक, लक्षक और व्यंजक शब्दों एवं लक्ष्यार्थ एवं व्यंग्यार्थ की प्रधानता है। घनानंद ने सबसे अधिक उक्ति-वैचित्रय का सहारा लिया है। इसलिए इनके काव्य में अभिधा की अपेक्षा एवं व्यंजना लक्षण-प्रधान माना जाता है। कविवर घनानंद ने उक्ति-चमत्कार के लिए, भावों को गहन बनाने के लिए तथा सरसता उत्पन्न करने के लिए ही लाक्षणिक प्रयोगों को अधिक अपनाया है।
अलंकार - काव्य में अलंकारों का प्रयोग भी कथन में चारूता एवं भव्यता लाने के लिए होता है। इसीलिए अलंकारों को कथन की प्रणाली बतलाया गया है, भावों की तीव्रता करने वाली योजना कहा गया है और वस्तुओं के रूप, गुण एवं क्रिया को अधिक तीव्र गति से अनुभव कराने वाली युक्ति बतलाया गया है। निस्संदेह अलंकारों के दो ही कार्य होते हैं- एक तो वे भावों का उत्कर्ष दिखाया करते हैं और दूसरे वे वस्तुओं के रूपानुभव गुणानुभव और क्रियानुभव को तीव्रता प्रदान करते हैं। घनानंद के काव्य में जहाॅ रस और भावों मा अधिक्य है वहाॅ अलंकारों ने उन्हें और भी अधिक सजीवता एवं प्रभविष्णुता (दुसरों पर प्रभाव डालन वाला) प्रदान की है। घनांनद ने दोनों प्रकार के अलंकार अपनायें हैं, यहाॅ शब्दालंकार भी है और अर्थालंकार भी। 
गुण -काव्य के तीन प्रमुख गुण माने गये हैं- माधुर्य, ओज और प्रसाद। माधुर्य गुण अन्तःकरण को आनंद सेदवीभूत करने वाला होता है, ओज गुण चित्त में स्फुर्ति उत्पन्न करने वाला होता है और प्रसाद गुण श्रवण मात्र से काव्य की शीघ्र अर्थ-प्रतीति कराने वाला होता है। साहित्य शास्त्रियों ने अलंकारों के बिना भी काव्य रचना हो सकती है, किन्तु गुणों के बिना काव्य रचना नहीं होती। यदि कोई काव्य बिना किसी गुण के रचा भी जाता है तो वह नीर्जीव नीरस एवं निरर्थक होता हैं। घनानंद के काव्य में सर्वत्र माधुर्य गुण की प्रधानता है क्योंकि माधुर्य गुण की अनुभूति गुण की अनुभूति सर्वाधिक विपलम्भ श्रृंगार अथवा विरह-निरूपण मं होती है और घनानंद ने सबसे अधिक विरह का ही वर्णन किया है।
रैन दिना धुटिबौ करें प्रान झरैं अखियाॅ झरना सो।
प्रीतम की सुधि अन्तर मैं कसकै सखी ज्यौ पॅसरीन में गाॅसी।। 
छंद -काव्य का छंद से नित्य सम्बन्ध तो नहीं हैं क्योंकि बिना छंद-बंध के भी काव्य रचना होती है, किन्तु छन्द से काव्य में एक ऐसी प्रभविष्णुता आ जाती है, जिससे काव्य पाठकों एवं श्रोताओं के हृदय में उतरता चला जाता है और उनका कंठहार बन जाता है। घनानंद का सारा काव्य छंद की रस-माधुरी से ओतप्रोत है, उसमें प्राणों का संगीत भरा हुआ है। और वह कवि की हृदय-वीणा के तारों की मधुर झंकार से झंकृत है। घनानंद की छन्द रचना पर विचार करने से ज्ञात होता है कि घनानंद ने विविध प्रकार के छन्दों का प्रयोग किया है। जैसे-सवैया, कवित्त, त्रिलोकी, ताटंक, निसाती, सुमेरू, शोभन, त्रिभंगी, दोहा, चैपाई तथा घनाक्षरी पद। इनमें से घनानंद ने मुख्यतया सवैया एवं कवित्त छन्दों का प्रयोग अत्यंत प्रभावशाली ढंग से किया है। घनानंद केसर्वथा तो हिन्दी जगत में सर्वाधिक प्रसिद्ध है और उन्हें सर्वथा छंद का सिरताज कहना सवैया समीचीन ज्ञात होता है। इस प्रकार घनानंद की कविता विविध प्रकार के कलात्मक सौन्दर्य से ओतप्रोत है उसमें जितनी अनुभूति है, उतनी ही गहन अभिव्यक्ति भी है।

रीतिमुक्त स्वच्छंद काव्यधारा में घनानंद का स्थान
हिन्दी की सम्पूर्ण स्वच्छंद प्रेम काव्यधारा का अनुशीलन करने पर ज्ञात होता है किइस धारा के प्रमुख कवियो में से रसखान, आलम, घनानंद, ठाकुर और बोधा के नाम उल्लेखनीय है। ये सभी कवि प्रेम काव्य के प्रमुखप्रणेता है और इन्होने स्वच्छंदता के साथ प्रेमानुभूति का बडा ही मर्मस्पर्शी वर्णन किया है, परन्तु इनमें से घनानंद सर्वश्रेष्ठ कवि है, क्योंकि घनानंद के काव्य में रसखान की सी प्रेम की अनिर्वचनीयता भी हैं, परन्तु इन सबसे बढ़कर घनानंद में कुछ ऐसे असाधरण काव्य सौष्ठव के दर्शन होते हैं, जो न रसखान में है, न आलम में हैं, न ठाकुर में है और न बोध मेही है। घनानंद ने 'सुजान' केा आलम्बन बनाकर अपनी इस लौकिक प्रेयसी के रूप-सौन्दर्य का इतना मार्मिक एवं मनोरंजक वर्णन किया है कि देखते ही बनता है। सुजान की तिरछी चितवन, धुमते कटाक्ष, रसिली हॅसी, मृदु-मुस्कान, अरूण होठ कान्तिमंडित दंतावलि, सचिवकण, केशराशि, वक्रिम भौंहें, विशाल नैत्र, गर्वीली मुदा, उन्तम यौवन आदि परमुग्ध घनानंद ने उसकी रूप निकाई के अनेक संश्लिष्टप्त चित्र अंकित करते हुए जहाॅ अपनी प्रेम-विभोरता का परिचय दिया है, वहाॅ मुहम्मद शाह रंगीले दरबार की इस नर्तकी के प्रति अपना ऐसा प्रणय-निवेदन किया है, जो हिन्दी काव्यकी स्थायी सम्पत्ति बन गया है। घनानंद की श्रेष्ठता का सबसे बडा करण यह है कि घनानंद के हृदय में सुजान के प्रति उत्कृष्ट प्रेम एवं असीम व्यामोह भरा हुआ था, उनके मन में सुजान की अक्षय रूप राशि समाई हुई थी। इसीलिए घनानंद का काव्य प्रेम की गूढता से भरा हुआ था, उनके मन मं सुजान की अक्षय रूप राशि समाई थी। इसीलिए घनानंद का काव्य प्रेम की गूढता से भरा हुआ है, अतृप्ति की अनंतता से भरा हुआ है, अन्तद्र्वद्व की अलौकिकता से भरा हुआ है, वेदना की अक्षयता से भरा हुआ हैं और तीव्रानुभूति की अखंडता से भरा हुआ है, क्योंकि घनानंद का सा उक्ति वैचित्रय और कोई कवि दिखा नहीं सका है, उनकी सी लाक्षाणिक मूर्तिमत्ता किसी की भी रचना में दृष्टिगोचर नहीं होती और उनका सा प्रयोग वैचित्रय कहीं ढँढने पर भी नहीं मिलता है। निःसंदेह वे पे्रमके जितने धनी थे, उतने ही भाषा के भी धनी थे और उतने ही अभिव्यंजना के भी धनी थे। इसी कारण हिन्दी काव्य की रीतिमुक्त स्वछंद प्रेमधारा में घनानंद का शीर्षस्थ स्थान है।


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उल्टी के कारण



उल्टी आने के कई कारण हो सकते हैं। जब कभी हमारा शरीर किसी ऐसी चीज को ग्रहण कर लेता है जो संक्रमित हो, तो ऐसे में शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र उसे उल्टी के माध्यम से शरीर के बाहर भेज देता है। इसके अलावा भी ज्यादा खा लेने की वजह से, ज्यादा शरीब पी लेने की वजह से, एसीडिटी या फिर माइग्रेन की वजह से उल्टी की समस्या होती है। गर्भवती महिलाओं को भी उल्टी की समस्या से काफी परेशान होना पड़ता है।
इसके विभिन्न कारणों में स्टोमक के भीतर ब्लीडिंग होना, इन्फेक्शन, इरिटेशन, इन्टेस्टाइन में ब्लोकेज, बॉडी केमिकल्स और मिनरल्स कम-ज्यादा होना, बॉडी में टोक्सिसिटी होना भी शामिल हैं।


  1. उल्टी के कारण कई तरह के हो सकते हैं जिनमे फूड-पोइजनिंग, इन्फेक्शन, ब्रेन और सेंट्रल नर्वस सिस्टम में समस्या होना या कोई सिस्टमिक डिजीज होना शामिल हैं।
  2. कई बार उल्टी होने का कारण कोई दवाई का साइड इफ़ेक्ट,कैंसर कीमोथेरेपी में उपयोग में ली गई ड्रग्स या फिर रेडिएशन थेरेपी भी हो सकती हैं।
  3. कई बार एल्कोहल, बियर, वाइन और लिक्वर केमिकल-एसिटेलडीहाइड में बदल जाते हैं,जिसके कारण अगली सुबह जी मिचलाना जैसी फीलिंग आती हैं जिसे हैंग-ओवर कहते हैं।
  4. कुछ बिमारियों में जी घबराना और उल्टी आना आम होता है। जबकि उस समय रोगी में गेस्ट्रो इंटेस्टाईनल ट्रैक्ट या स्टमक का उल्टी के लिए कोई कारण नहीं होता जैसे निमोनिया,हार्ट अटेक और सेप्सिस।
  5. कुछ वाइरल इन्फेक्शन, सर में लगी चोट, गालब्लेडर डिजीज, एपेंडीसाईटीस, माइग्रेन, ब्रेन ट्यूमर, ब्रेन इन्फेक्शन, हाइड्रोसिफेलस (ब्रेन में बहुत सा फ्लूइड जमा होना,सर्जरी में उपयोग आने वाले एनेस्थिशिया के साइड इफ़ेक्ट,स्टोमक प्रोब्लम जैसे ब्लॉकेज (पाइलोरिक ओबस्ट्रेकशन,वो स्थिति जिसके कारण बच्चों में फोर्सफुल थूक बाहर आता हैं) भी उल्टी के कारण हो सकते हैं।
  6. प्रेग्नेंसी के दौरान जी मिचलाना और उल्टियाँ लगातार होती रहती हैं। सामान्यतया शुरूआती कुछ महीनों में मोर्निंग सिकनेस होती हैं लेकिन कई बार ये पूरे 9 महीने भी चल जाती हैं।
आयुर्वेद के अनुसार उल्टी के प्रकार और कारण
 उल्टी आना कोई गंभीर समस्या नहीं है, बल्कि दिनचर्या, खानपान में बदलाव के कारण भी ऐसी समस्याएं हो सकती हैं। लेकिन आयुर्वेद में उल्टी के इन 5 प्रकारों का वर्णन मिलता है।
  1. आगंतुज : इस तरह की उल्टी बदबू, गर्भावस्था, अरूचिकर भोजन, पेट में कीड़े या किसी स्थान विशेष पर जाने से हो सकती है। इस तरह की उल्टी को आगंतुज छर्दि भी कहते हैं।
  2. कफज : कफ के कारण होने वाली उल्टी इस श्रेणी में आती है। इसमें उल्टी का रंग सफेद और प्रकार गाढ़ा होगा। इसका स्वाद मीठा होता है। मुंह में पानी भरना, शरीर का भारी होना, बार-बार नींद आना, जैसे लक्षण इस प्रकार की उल्टी में होना स्वाभाविक हैं।
  3. त्रिदोषज : त्रिदोषज उल्टी वह होती है जो वात, पित और कफ, तीनों कारणों के चलते होती है। यह गाढ़ी, नीले रंग की या खून की हो सकती है। स्वाद में नमकीन या खट्टी हो सकती है। इसके अलावा पेट में तेज दर्द, भूख में कमी, जलन, सांस लेने में परेशानी और बेहोशी भी इसके लक्षणों में शामिल है।
  4. पित्तज : पित्त की गर्मी के कारण होने वाली उल्टी पित्तज की श्रेणी में आती है। इस स्थिति में पीले, हरे रंग की उल्टी आती है और मुंह का स्वाद बेहद बुरा होती है। इसमें भोन नली व गले में जलन हो सकती है। सिर घूमना, बेहोशी भी इसके लक्षणों में शामिल है।
  5. वातज : पेट में गैस से होने वाली उल्टी वातज की श्रेणी में आती है। इस तरह की उल्टी कम मात्रा में कडुवी, झागवाली और पानी जैसी होती है। लेकिन कई बार इसके साथ सिर का दर्द, सीने में जलन, नाभि में जलन, खांसी और आवाज का खराब होना आदि समस्याएं भी होती हैं।
उल्टी रोकने के कुछ अन्य घरेलू इलाज
  1. खाने के तुरंत बाद ना सोयें।
  2. खाने के तुरंत बाद ब्रश ना करें, इससे वोमिट होने के सबसे ज्यादा चांस होते है।
  3. गुलुकोस, एलेक्ट्रोल जैसी चीज पीते रहें।
  4. जितना हो सके आराम करें।
  5. तेज सुगन्धित वाली जगह में ना बैठे, इससे जी और ज्यादा मचलाता है।
  6. बहुत हल्का एवं कम तेल मसाले वाला भोजन लें, एवं धीरे धीरे खाएं।
  7. वोमिट जैसा महसूस होने पर, एक एक घूँट पानी पीते रहें।
उल्टी रोकने के आयुर्वेदिक घरेलू इलाज
  1. अदरक पाचन-तन्त्र के लिए बहुत अच्छा होता हैं और उल्टियाँ रोकने के लिए प्राकृतिक रूप से एंटी-एमेटिक के जैसे काम करता हैं। एक चम्मच अदरक के रस और नीम्बू के रस को मिलाकर दिन में 2-4 बार लेने से उल्टियाँ होना और जी घबराना बंद हो जाता हैं। इसके अलावा अदरक के छोटे टुकड़े मुंह में रखने पर भी थोड़ी देर के लिए आराम मिलता हैं । शहद के साथ अदरक की चाय बनाकर भी ली जा सकती हैं।
  2. अदरक में पेट की हर समस्या से निपटने का इलाज होता है। इसके एक टुकड़े को कूचकर पानी में मिला लीजिए। इसमें एक चम्मच शहद मिलाकर इसका सेवन कीजिए। उल्टी से तुरंत लाभ मिलेगा।
  3. उल्टी आने की स्थिति में दो चार लौंग लेकर दांतो के नीचे दबा लें और इसका रस चूसते रहें। इसका स्वाद उल्टी को तुरंत रोकने में कारगर होता है। यह मुंह की तमाम समस्याओं का भी बेहतरीन निदान है। दांतों की सेंसिटिविटी के लिए लौंग अचूक औषधि है।
  4. उल्टी जैसा जी होने पर नींबू का एक टुकड़ा मुंह में रख लें। इससे उल्टी में काफी राहत मिलती है।
  5. एक चम्मच पुदीने की पत्ती का जूस,नीम्बू का रस और शहद मिलाकर दिन में 3 बार पीने से भी उल्टियाँ कम होने लगती हैं।
  6. एप्पल साइडर विनेगर भी बेचैनी को कम करता हैं,यह डीटोक्सीफिकेशन भी करता हैं,इसमें एंटी-माइक्रोबियल गुण होने के कारण यह फूड-पोइजनिंग भी सही करता हैं। एक चम्मच एप्पल साइडर विनेगर और एक चम्मच शहद को पानी में मिलाकर पीने से जी घबराना और उल्टी होना कम हो सकता हैं। उल्टी होने के कारण मुंह का खराब स्वाद और गंध भी इससे कम की जा सकती हैं। आधे कप पानी में 1 चम्मच विनेगर मिलाकर पीने से मुंह खराब स्वाद और गंध के कारण बार-बार उल्टियाँ नहीं होती।
  7. ऐसे में इस समस्या से निपटने के लिए आपको कुछ घरेलू उपाय जरूर आजमाने चाहिए। इनसे आपको उल्टी की समस्या से तुरंत आराम मिलता है।
  8. कभी भी उल्टी आने पर पुदीने की चाय बनाकर पी लीजिए या फिर केवल उसकी पत्ती को चबाइए। उल्टी से तुरंत राहत मिल जाएगी।
  9. जामुन के पेड़ की छाल का पाउडर बना ले इसे 10 मिनट के लिए पानी में भिगोकर रखें,और अब इसमें 1 चम्मच शहद मिलाकर रोज 2-3 चम्मच इसे पीये। यह ब्लड शुगर को भी कम करता हैं इसलिए लोग इसे डाईबिटिज में भी पीते हैं।
  10. ताजा संतरे का जूस उल्टी में काफी लाभदायक ट्रीटमेंट है। इसके कई अन्य फायदे भी हैं। जैसे, यह शरीर में ब्लड प्रेशर के नियंत्रण के लिए भी बेहद लाभदायक है।
  11. दालचीनी भी जठर सम्बन्धित समस्याओं को शांत करती हैं। इसे लेने से भी जी मिचलाना और उल्टी होने जैसे समस्याओं में कमी आती हैं। एक कप पानी में आधा चम्मच दालचीनी पाउडर डालकर उबालें और इस पानी को पीए,इसमें शहद भी मिला सकते हैं। हालांकि ये उपाय गर्भवती महिलाओं के लिए उपयुक्त नहीं हैं।
  12. दिन में कई बार सैंफ चबाना उल्टी में बेहद फायदेमंद है। यह मुंह के स्वाद को बदलने के लिए भी प्रयोग किया जाता है। इसे खाने के बाद उल्टी से काफी राहत मिलती है।
  13. नीम्बू और प्याज का रस भी मिलाकर पीने से उल्टियाँ कम हो सकती हैं।
  14. पुदीने की चाय भी पाचन तन्त्र को संतुलित रखती हैं। यदि ताज़ी पत्तियां उपलब्ध हो तो उन्हें चबाए लेकिन यदि ना हो तो एक चम्मच सुखी पुदीने की पत्तियों को गर्म पानी में डालकर इसके चाय बनाए।
  15. पेट की एसिडिटी शांत रखने के लिए तथा खाना हजम करने के लिए इलायची भी काफी कारगर उपाय है।
  16. मीठी तुलसी की पत्तियों की खुशबू भी उल्टी को कम करती हैं। इसका जूस बनाकर एक ग्लास गर्म पानी में 2 चम्मच शहद मिलाकर पीने से उल्टी होना और जी मिचलाना कम हो जाते हैं।
  17. यदि डॉक्टर की सलाह ले चुके हो या फिर उल्टी होने का कारण समझ आ चूका हो, तो कुछ घरेलू उपायों से भी लगातार होने वाली उल्टियों को रोका जा सकता हैं।
  18. लौंग भी गैस्ट्रिक इरिटेबिलीटी को कम करती हैं, लौंग की चाय बनाई जा सकती हैं या फिर तले हुए लौंग को शहद के साथ मिलाकर भी लिया जा सकता हैं।


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गुर्दे के पथरी के रामबाण घरेलू उपाय एवं उपचार



किडनी में पथरी होना एक आम समस्या हो गई है। हमारी जिन्दगी में किडनी स्‍टोन गलत खानपान का नतीजा है और लगातार इसके मरीजों की संख्‍या लगातार बढ़ रही है। यूरिक एसिड, फॉस्फोरस, कैल्शियम और ऑक्जेलिक एसिड। यही सारे तत्व स्टोन बनाने के लिए उत्तरदायी होते हैं। कुछ पथरी रेत के दानों की तरह बहुत छोटे आकार के होते हैं तो कुछ मटर के दाने की तरह। इसके साथ ही बहुत अधिक मात्रा में विटामिन डी के सेवन से, डीहाइड्रेशन और अनियमित डाइट की वजह से भी किडनी में स्टोन हो जाता है। आमतौर पर पथरी मूत्र के जरिये शरीर के बाहर निकल जाती है, लेकिन जो पथरी बड़ी होती है वह बहुत ही परेशान करती है। किडनी में स्टोन हो जाने पर पेट में हर वक्त दर्द बना रहता है।
घर के बुजुर्गों के पास अक्सर हर दर्द का इलाज होता है और हम लोगो ने अपने घर में बड़े बुजुर्गों जैसे कि दादा-दादी या नाना-नानी को कहते सुना होगा कि सुबह खाली पेट 3-4 ग्लास पानी पीने से पेट की सारी बीमारियां दूर हो जाती हैं। ऐसे ही कितने घरेलू नुस्खे हमें दादी और अन्य लोगों से सुनने को मिले हैं। आज हम पेट और किडनी में पथरी के इलाज के लिए दादी मां के कुछ नुस्खे यानी ऐसे नुस्खे जानेंगे जिन्हें आप घर पर आजमा सकते हैं -
  1. 2-15 दाने बड़ी इलायची, एक चम्मच खरबूजे के बीज की गिरी और दो चम्मच मिश्री एक कप पानी में पीस-मिलाकर सुबह-शाम दो बार पीने से पथरी निकल जाती है।
  2. अजवाइन किडनी के लिए टॉनिक के रूप में कामकरता है। किडनी में स्टोन के गठन को रोकने के लिए अजवाइन का इस्तेमाल मसाले के रूप में या चाय में नियमित रूप से किया जा सकता है।
  3. अनार का रास किडनी स्टोन के खिलाफ बहुत ही असरदार और सरल घरेलू उपाय है। अनार के कई स्वास्थ्य लाभ के अलावा इसके बीज और रस में खट्टेपन और कसैले गुण के कारण इसे किडनी स्टोन के लिए प्रातिक उपाय के रूप में माना जाता है।
  4. आंवला भी पथरी में बहुत फायदाकरता है। आंवला का चूर्ण मूली के साथ खाने से मूत्राशय की पथरी निकल जाती है।
  5. करेला बुहत कड़वा होता है और आमतौर पर लोग इसे कम पसंदकरते हैं, लेकिन किडनी स्टोन के मरीजों के लिए यह रामबाण की तरह है।करेले में मैग्नीशियम और फॉस्फोरस नामक तत्त्व होते हैं,जो पथरी को बनने से रोकते हैं। इसलिए किडनी स्टोन की समस्या पर होनेकरेले का सेवनकरना चाहिए।
  6. किडनी स्टोन को बाहर निकालने के लिए बथुए का साग बहुत ही कारगर माना जाता है। इसके लिए आधा किलो बथुए के साग को उबालकर छान लें। अब इसे पानी में जरा सी काली मिर्च, जीरा और हल्का सा सेंधा नमक मिलाकर दिन में चार बार पिए, किडनी स्टोन में फायदा होगा।
  7. किडनी स्टोन से छुटकारा दिलाने में अंगूर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अंगूर प्रातिक मूत्रवर्धक के रूप में कार्यकरता है, क्योंकि इनमें पोटेशियम और पानी भरपूर मात्रा में होता है। अंगूर में अलबूमीन और सोडियम क्लोराइड बहुत ही कम मात्रा में होते हैं, जिनकी वजह से इन्हें किडनी स्टोन के उपचार के लिए अच्छा माना जाता है।
  8. जीरे और चीनी को समान मात्रा में पीसकर एक-एक चम्मच ठंडे पानी से रोज तीन बार लेने से लाभ होता है और पथरी निकल जाती है।
  9. जैतून के तेल के साथ नीबू का रस मिलाकर सेवन करने से किडनी स्टोन में फायदा होता है। दर्द होने पर 60 मिली लीटर नीबू के रस में उतनी ही मात्रा में आर्गेनिक जैतून का तेल मिलाकर सेवन करने से इसके दर्द से भी आराम मिलता है। नीबू का रस और जैतून का तेल पूरे स्वास्थ्य के लिए अच्छा रहता है और यह आसानी से उपलब्ध भी हो जाता हैं।
  10. तीन हल्की कच्ची भिंड़ी को पतली-पतली लंबी-लंबी काट लें। कांच के बर्तन में दो लीटर पानी में कटी हुई भिंड़ी ड़ालकर रात भर के लिए रख दें। सुबह भिंड़ी को उसी पानी में निचोड़कर भिंड़ी को निकाल लें। ये सारा पानी दो घंटों के अंदर-अंदर पी लें। इससे किड़नी की पथरी से छुटकारा मिलता है।
  11. तुलसी की चाय पीने से किडनी स्टोन से निजात मिलता है। तुलसी का रस लेने से पथरी को बाथरुम के रास्ते निकलने में मदद मिलती है। कम से कम एक महीना तुलसी के पत्तों के रस के साथ शहद लेने से किडनी स्टोन की समस्या से छुटकारा मिल सकता है। तुलसी के कुछ ताजे पत्ते रोजाना चबा भी सकते हैं, यह बहुत ही फायदेमंद है।
  12. नारियल का पानी पीने से पथरी में फायदा होता है। पथरी होने पर नारियल का पानी पीना चाहिए।
  13. पका हुआ जामुन पथरी से निजात दिलाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पथरी होने पर पका हुआ जामुन खाना चाहिए।
  14. प्याज में स्टोन नाशक तत्त्व होते है इसका प्रयोगकर किडनी स्टोन से निजात पा सकते है। लगभग 70 ग्राम प्याज को पीसकर और उसका रस निकालकर पिए। सुबह खाली पेट प्याज के रस का नियमित सेवन करने से पथरी के छोटे-छोटे टुकड़ों में होकर निकल जाती है।
  15. मिश्री, सौंफ, सूखा धनिया लेकर 50-50 ग्राम मात्रा में लेकर डेढ लीटर पानी में रात को भिगोकर रख दीजिए। अगली शाम को इनको पानी से छानकर पीस लीजिए और पानी में मिलाकर एक घोल बना लीजिए, इस घोल को पीजिए। पथरी निकल जाएंगी।
  16. सहजन की सब्जी खाने से गुर्दे की पथरी टूटकर बाहर निकल जाती है। आम के पत्ते छांव में सुखाकर बहुत बारीक पीस लें और आठ ग्राम रोज पानी के साथ लीजिए, फायदा होगा।
  17. स्टोन की समस्या से निपटने के लिए केले का सेवनकरना चाहिए। इसमें विटामिन बी-6 होता है। विटामिन बी-6 ऑक्जेलेट क्रिस्टल को बनने से रोकता और तोड़ता है। इसके अलावा विटामिन बी-6,विटामिन बी के अन्य विटामिन के साथ सेवनकरना किडनी स्टोन के इलाज में काफी मददगार होता है। एक शोध के मुताबिक विटामिन बी की 100 से 150 मिलीग्राम दैनिक खुराक किडनी स्टोन के उपचार में बहुत फायदेमंद है।
डिस्क्लेमर: घरेलू इलाज के अलावा डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें और जरूरी इलाज शुरू करें।


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सांस की बदबू



साँस की दुर्गंध या मुह की दुर्गन्ध के रोगी के मुख से एक विशेष दुर्गन्ध (बदबू) आती है जो, सांस के साथ मिली होती है। सांसों की दुर्गन्ध ग्रसित व्यक्ति में चिन्ता का कारण बन सकती है। यह एक गंभीर समस्या बन सकती है किंतु कुछ साधारण उपायों से साँस की दुर्गंध को रोका जा सकता है। साँस की दुर्गंध उन बैक्टीरिया से पैदा होती है, जो मुँह में पैदा होते हैं और दुर्गंध पैदा करते हैं। नियमित रूप से ब्रश नहीं करने से मुँह और दांतों के बीच फंसा भोजन बैक्टीरिया पैदा करता है। लहसुन और प्याज जैसे कुछ खाद्य पदार्थां में तीखे तेल होते हैं। इनसे साँसों की दुर्गंध पैदा होती है, क्योंकि ये तेल आपके फेफड़ों में जाते हैं और मुँह से बाहर आते हैं। साँस की दुर्गंध का एक अन्य प्रमुख कारण धूम्रपान है। साँस की दुर्गंध पर काबू पाने के बारे में अनेक धारणाएं प्रचलित हैं।

कारण
साँसों की अधिकांश दुर्गंध आपके मुँह से शुरू होती है। साँसों की दुर्गंध के कई कारण होते हैं। इनमें से कुछ कारण निम्नलिखित हैं-
  1. दांतों की खराब सफाई और दांत की बीमारियां साँसों की दुर्गंध का कारण हो सकती हैं।
  2. यदि हर दिन ब्रश और कुल्ला नहीं करते हैं, तो भोजन के टुकड़े आपके मुँह में रह जाते हैं।वे बैक्टीरिया पैदा करते हैं और हाइड्रोजन सल्फाइड भाप बनाते हैं। आपके दांतों पर बैक्टीरिया (सड़न) का एक रंगहीन और चिपचिपा फिल्म जमा हो जाता है।
  3. दांतों में और इसके आसपास भोजन के टुकड़ों के टूटने से दुर्गंध पैदा हो सकती है।
  4. पतले तैलीय पदार्थ युक्त भोजन भी साँसों की दुर्गंध के कारण हो सकते हैं।
  5. प्याज और लहसुन इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं, लेकिन अन्य सब्जियां और मसाले भी साँसों में दुर्गंध पैदा कर सकते हैं।
  6. जब ये भोजन पचते हैं और तीखे गंध वाले तेल आपके खून में शामिल होते हैं, तो वे आपके फेफड़ों तक पहुंचते हैं और तब तक आपकी साँसों से बाहर निकलते रहते हैं, जब तक कि वह भोजन आपके शरीर से पूरी तरह खत्म न हो जाये।
  7. प्याज और लहसुन खाने के 72 घंटे बाद तक साँसों में दुर्गंध पैदा कर सकते हैं।
  8. धूम्रपान से आपका मुँह सूखता है और उससे एक खराब दुर्गंध पैदा होती है।
  9. तंबाकू का सेवन करनेवालों को दांतों की बीमारी भी होती है, जो साँसों की दुर्गंध का अतिरिक्त स्रोत बनती है।
  10. फेफड़े का गंभीर संक्रमण और फेफड़े में गांठ से साँसों में बेहद खराब दुर्गंध पैदा हो सकती है। अन्य बीमारियां, जैसे कुछ कैंसर और चयापचय की गड़बड़ी से भी साँसों में दुर्गंध पैदा हो सकती है।
  11. साँसों की दुर्गंध का संबंध साइनस संक्रमण से भी है, क्योंकि आपके साइनस से नाक होकर बहनेवाला द्रव आपके गले में जाकर साँसों में दुर्गंध पैदा करता है।
  12. लार से आपके मुँह में नमी रहने और मुँह को साफ रखने में मदद मिलती है। सूखे मुँह में मृत कोशिकाओं का आपकी जीभ, मसूड़े और गालों के नीचे जमाव होता रहता है। ये कोशिकाएं क्षरित होकर दुर्गंध पैदा कर सकती हैं। सूखा मुँह आमतौर पर सोने के समय होता है।
उपाय
  1. अत्यधिक कॉफी पीने से बचना चाहिए।
  2. दांतों के डॉक्टर या फार्मासिस्ट द्वारा अनुशंसित माउथवाश का उपयोग करें।
  3. इलाइची और लौंग चूसने से भी सांस की बदबू से निजात मिलता है।
  4. गाजर का जूस रोज पिएं। तन की दुर्गध दूर भगाने में यह कारगर है।
  5. जीभ साफ करने के लिए जीभी का उपयोग करें और जीभ के अंतिम छोर तक सफाई करें।
  6. ताजी और रेशेदार सब्जियां खायें।
  7. दुग्ध उत्पाद, मछली और मांस खाने के बाद अपने मुँह को साफ करें।
  8. नहाने से पहले शरीर पर बेसन और दही का पेस्ट लगाएं। इससे त्वचा साफ हो जाती है और बंद रोम छिद्र भी खुल जाते हैं।
  9. नियमित रूप से अपने दांतों के डॉक्टर के पास जायें और अपने दांतों की अच्छी तरीके से सफाई करायें।
  10. नियमित रूप से दातुन करें।
  11. ब्रश करने के अलावा दांतों के बीच की सफाई के लिए कुल्ला भी करते रहें।
  12. मुँह और दांतों की साफ-सफाई का उच्च स्तर बनाये रखें।
  13. मुँह सूखने लगे, चीनी-मुक्त मुँह गम का इस्तेमाल करें,
  14. सांस की बदबू दूर करने के लिए रोज तुलसी के पत्ते चबाएं।
घरेलू उपाय
इलायची खाएं, खाना खाने के बाद ज्यादा पानी न पिएं, तुलसी के पत्ते और जामुन के पत्ते को बराबर मात्रा में लेकर चबाए, नीबू और गरम पानी का घोल पियें, पान में पुदीना के पत्ते का इस्तेमा करें, मुलेठी चूसें, लौंग चूसें और सौंफ खाएं।


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मोच आने पर करे यह उपचार



अक्सर चलते-दौड़ते वक्त अक्सर मोच आ जाती है। दर्द होता है और हम मजबूर हो जाते हैं अपना पैर पकड़ कर बैठने के लिए। घुटना और टखना शरीर के दो ऐसे जोड़ हैं, जो चोटिल होते रहते हैं। पैर और पंजे को जोड़ने का काम करता है टखना। टखने के भीतरी लिगामेंट्स बहुत मजबूत होते हैं, जो कम ही परिस्थितियों में चोटिल होते हैं। बाहरी लिगामेंट्स तीन भाग में बंटे होते हैं- सामने, मध्य और पीछे। आमतौर पर मोच आने पर सामने और बीच वाले लिगामेंट्स ही चोटिल होते हैं। टखने के लिगामेंट्स के घायल होने की घटनाएं तब होती हैं, जब पंजा अंदर की ओर मुड़ जाता है। ऐसा असमान भूमि पर चलने से होता है और शरीर का पूरा वजन इन लिगामेंट्स पर पड़ने से वे चोटिल हो जाते हैं।
सामान्य परिस्थितियों में छह से आठ सप्ताह का समय पूरी तरह मोच ठीक होने मे लग जाता है। कई लोगों में लंबे समय तक मोच बनी रहती है। मोच आने पर इंसान एक जगह अपना पैर पकड़कर बैठ जाता है और उसे काफी दर्द झेलना पड़ता है। पैरों में मोच या फिर खिंचाव आने पर काफी सूजन और दर्द पैदा हो जाता है। यह कभी भी हो सकता है, चाहे कुछ ऐसे घरेलू नुस्खे लेकर आए हैं जिन्हें अपनाकर पैर में आई हुई मोच से जल्दी आराम पाया जा सकता है। खेल-कूद में लीन हो या फिर चलते चलते पैर मुड़ जाए और ऐसा होने पर टखनों की मोच आ जाती है जो काफी दर्द भरी होती है।
मोच आने पर अगर हम तुरंत डॉक्‍टर के पास ना जा सकें तो उसका भी समाधान है। कुछ खास घरेलू नुस्‍खों को अपनाकर पैर में आई हुई मोच से जल्दी आराम पाया जा सकता है। यह नुस्‍खे काफी पुराने हैं जिसमें किचन में रखी हुई सामग्रियां काम आ सकती हैं। मोच आने पर इन नुस्‍खों को आजमाएं और ढेर सारा आराम करें, जिससे कुछ ऐसे घरेलू नुस्खे लेकर आए हैं जिन्हें अपनाकर पैर में आई हुई मोच से जल्दी आराम पाया जा सकता है। जल्‍दी ही ठीक हो सकें। इसके बाद अगर ठीक ठाक चल लसकने की स्थिति न हो तो तो डॉक्‍टर के पास जाना बिल्‍कुल नही भूलना चाहिए।

 उपचार
  1. 48 घंटो तक मोच वाली जगह पर किसी भी तरह का दबाव न डालें।
  2. आधा चम्मच हल्दी को दूध के साथ तुरंत सेवन करने से हड्डियों के अंदर की चोट को आराम मिलता है।
  3. एक गिलास गर्म दूध में आधा चम्मच फिटकरी मिलाकर इसका सेवन करने से मोच काफी जल्दी ठीक हो जाएगी।
  4. तुलसी की कुछ पत्तियों को पीसकर पेस्ट बना लें और उसको मोच वाले स्थान पर लगाएं। ऐसा करने से काफी आराम महसूस होगा।
  5. तुलसी के पत्‍तों के रस तथा सरसों के तेल को एक साथ मिला कर गर्म कर के मोंच वाले भाग पर रखें। ऐसा दिन में 4-5 बार करें।
  6. थोड़े से बर्फ के टुकड़ों को किसी एक कपड़े में रखकर सूजन वाले जगह पर लगाएं। इससे सूजन कम हो जाती है और दर्द धीरे-धीरे कम होने लगता है।
  7. दो चम्‍मच हल्‍दी में थोड़ा सा पानी मिला कर पेस्‍ट बना लें। अब इस पेस्ट को हल्का गर्म करके मोच वाली जगह पर लगाएं। फिर 2 घंटे के बाद पैरों को गुनगुने पानी से धो लें।
  8. नमक और सरसों के तेल को गरम करें और मोंच पर रखें। फिर इसे किसी कपडे़ से बांध कर रात में सो जाएं, आराम मिलेगा।
  9. पान के पत्‍ते पर सरसों का तेल लगा कर, उस पत्‍ते को हल्‍का गरर्म कर के मोाच वाले अंग पर बांध लें।
  10. पीड़ा और सूजन में कमी लाने के लिए मोच खाए अंग पर हर घंटे बाद बर्फ या ठंडे पानी की भीगी हुई पट्टियाँ रखें। इससे पीड़ा और सूजन में कमी आती है।
  11. पैर पर अगर मोच आई तो हमेशा पैर को सोते वक्त थोड़ा ऊंचाई पर रखें। इससे मोच की वजह से आई पैर की सूजन में कमी आती है।
  12. पैरों के नीचे तकिया रखें जिससे आपका पैर थोड़ा ऊपर उठ सके। इससे खून एक जगह पर नहीं जम पाएगा और वह पूरे शरीर में सर्कुलेट होगा। इससे पैरों की सूजन कम हो जाएगी।
  13. फिटकरी का आधा चम्‍मच ले कर उसे एक गिलास गर्म दूध में मिक्‍स कर के पी जाएं, इससे चोट जल्‍दी ठीक हो जाएगी ।
  14. मोच को बैंडडेज या पट्टी से बांधने से राहत मिलती है। पैरों में प्‍लास्‍टिक बैंडडेज बांधिये जिससे पैरों में ब्‍लड सर्कुलेशन भी ठीक रहे। मोच को कस के नहीं बांधना चाहिये नहीं तो उससे खून का दौरा धीमा पड़ जाता है। अगर बैंड‍डेज को कस के बांध लिया तो दर्द बढ जाएगा।
  15. मोच खाए जोड़ को ठीक करने के लिए इलास्टिक की पट्टियों से बांधे।
  16. मोच खाए टखने पर एड़ी से शुरू कर पट्टी को ऊपर की ओर बांधें, ध्यान रहे कि पट्टी बहुत सख्त न हो और हर दो घंटे में खोलते रहें। यदि दर्द और सूजन 48 घंटे में कम न हो तो चिकित्सा सहायता लें।
  17. मोच खाए या टूटे अंग की मालिश कभी भी न करें। इससे कोई लाभ नहीं होता, बल्कि हानि पहुँच सकती है।
  18. मोच वाले स्‍थान पर एलो वेरा जैल लगाएं, इससे आराम मिलेगा।
  19. यदि मोच लगने के तुरंत बाद ही उस जगह पर बर्फ लगा कर सेकाई की जाए तो उस जगह पर सूजन नहीं आती। दर्द को दूर करने के लिये हर 1-2 घंटे में 20 मिनट की बर्फ से सिकाई करनी चाहिये। बर्फ को हमेशा किसी कपड़े में लपेट कर लगाना चाहिये।
  20. शहद और चूने दोनों को बराबर मात्रा में मिला कर मोच वाली जगह पर हल्‍की मालिश करें।
  21. सूजन को कम करने के लिए बर्फ या आइस पैक को दिन में 4-8 बार जरूर लगाएं।
  22. हल्‍दी लगाने से पैरों की सूजन कम हो जाती है। हल्‍दी एक एंटी सेप्‍टिक गुणों वाला मसाला है जो लंबे समय से प्रयोग में लाई जा रही है। इसे लगाने से आपको मोच में काफी आराम मिल सकता है। 2 चम्‍मच हल्‍दी में थोड़ा सा पानी मिला कर पेस्‍ट बना कर हल्‍का गरम करें और मोच पर लगाएं। फिर 2 घंटे के बाद पैरों को गरम पानी से धो लें।
मोच आने पर घर में करें ये व्यायाम
  1.  अपना पंजा दरवाजे के पास इस तरह रखें, जिससे एड़ी जमीन पर रहे और पंजा 45 डिग्री के कोण के साथ दरवाजे से थोड़ा ऊंचाई पर रहे। सपोर्ट के लिए दरवाजे को पकड़ लें। अब घुटने को मोड़ते हुए दरवाजे के करीब लाएं। इस खिंचाव को दो मिनट तक बनाए रखें। यदि सुविधाजनक नहीं लग रहा है तो एक बे्रक लेकर दोबारा ऐसा करें। अगर आप लगातार दो मिनट तक स्ट्रेच कर रहे हैं तो ऐसा एक बार ही करें।
  2. टखने का लचीलापन और उसको गति देने के बाद अब बैठने का व्यायाम करें। एक चटाई बिछा लें। पैरों को पीछे की ओर मोड़ लें। ध्यान रखें कि पैरों की उंगलियां पीछे की ओर से सीधी रहें, अंदर की ओर मुड़ी न हों। अब कूल्हे के हिस्से को एडि़यों पर टिका कर बैठ जाएं। इससे जमीन पर पंजे के सामने के हिस्से पर स्ट्रेच उत्पन्न होगा। स्ट्रेच अधिक बढ़ाने के लिए शरीर के वजन को कूल्हों पर रखें और दो मिनट तक इसी स्थिति में रहें। शुरुआत में इसे कम समय के लिए कर सकते हैं।
  3. पंजे से दीवार पर इसी तरह दबाव बनाए रखें। अब घुटने को अंदर और बाहर की ओर गोल घुमाएं। ऐसा करते हुए दबाव टखने के पीछे के हिस्से की ओर पड़ना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हो रहा है तो अपनी स्थिति को ठीक करें और इसे दोबारा दोहराएं।


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दस्त/डायरिया के लक्षण और उपचार



अतिसार या डायरिया में या तो बार-बार मल त्याग करना पड़ता है या मल बहुत पतले होते हैं या दोनों ही स्थितियां हो सकती हैं। पतले दस्त, जिनमें जल का भाग अधिक होता है, थोड़े-थोड़े समय के अंतर से आते रहते हैं। अतिसार का मुख्य लक्षण और कभी-कभी अकेला लक्षण, विकृत दस्तों का बार-बार आना होता है। तीव्र दशाओं में उदर के समस्त निचले भाग में पीड़ा तथा बेचैनी प्रतीत होती है अथवा मलत्याग के कुछ समय पूर्व मालूम होती है। धीमे अतिसार के बहुत समय तक बने रहने से, या उग्र दशा में थोड़े ही समय में, रोगी का शरीर कृश हो जाता है और जल ह्रास (डिहाइड्रेशन) की भयंकर दशा उत्पन्न हो सकती है। खनिज लवणों के तीव्र ह्रास से रक्तपूरिता तथा मूर्छा (कॉमा) उत्पन्न होकर मृत्यु तक हो सकती है।
डायरिया के लक्षण - डायरिया से जूझ रहे व्यक्ति द्वारा इनमे से एक या इससे अधिक लक्षण हो सकते हैं: पानी का मल, पेट में ऐंठन या ऐंठन होना, मतली और उल्टी, बुखार, निर्जलीकरण और भूख में कमी

उपचार 
  1.  अदरक का रस नाभि के आस-पास लगाने से दस्त में आराम मिलता है।
  2. अनार के बीजों को चबाएं। दिन भर में कम से कम दो बार अनाज का जूस पिएं। अनार की पत्तियों को पानी में उबाल लें। इस पानी को छानकर पीने से भी दस्त में आराम मिलता है।
  3. आधा चम्मच सौंठ को छाछ के साथ लें। इस मिश्रण को दिन में दो-तीन बार लेने से डायरिया से राहत मिलती है।
  4. इससे पेट की गर्मी छंट जाएगी और दस्त की समस्या से मुक्ति मिल जाएगी। यह पाउडर खाली पेट दो से तीन दिनों तक लेना चाहिए। बहुत जल्दी आराम मिलता है।
  5. एक गिलास छाछ में थोड़ा नमक, एक चुटकी काली मिर्च, जीरा और थोड़ी हल्दी डालकर पीने से दस्त में आराम मिलता है। दिन में दो से तीन बार ऐसी एक गिलास छाछ बनाकर पीना चाहिए।
  6. एक नीबू के रस में एक चम्मच नमक और थोड़ी चीनी मिलाकर अच्छे से मिक्स करने के बाद पिएं। हर एक घंटे में ये घोल बनाकर पीने से डायरिया में बहुत जल्दी आराम मिलता है। इस नुस्खे को अपनाने के साथ ही हल्का खाना लें। इससे इस समस्या से जल्दी छुटकारा मिल जाता है।
  7. एक-चौथाई चम्मच मेथी दाना पाउडर ठंडे पानी से लें।
  8. कच्चा पपीता उबालकर खाने से दस्त में आराम मिलता है।
  9. कच्चे पपीते को छीलकर छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर उबाल लें। इस पानी को छानकर पिएं। दस्त बंद हो जाएंगे। यह पानी दिन भर में दो से तीन बार पीना चाहिए।
  10. कुकर में बने चावल को ताजे दही के साथ खाएं। दिन भर में दो से तीन बार दही-चावल खाने से दस्त की समस्या से मुक्ति मिल जाती है।
  11. खाना खाने के बाद एक कप लस्सी में एक चुटकी भुना जीरा और काला नमक ड़ालकर पीएं। दस्त में आराम आयेगा।
  12. जब भी दस्त की समस्या हो, दिन भर में कम से कम दो से तीन चम्मच शुद्ध शहद खाएं। एक चम्मच शहद में आधा चम्मच दालचीनी पाउडर मिलाकर लेने पर भी दस्त से राहत मिलती है।
  13. ताजा लौकी के रस को छानकर दिन में दो-तीन बार पिएं। दस्त की समस्या खत्म हो जाएगी।
  14. बेल की पत्तियों या बेल के फलों का पाउडर दस्त में दवा का कामकरता है। 25 ग्राम बेल के पाउडर को शहद में मिलाकर लेने से दस्त से राहत मिलती है। दिन में कम से कम चार बार बेल पाउडर का सेवन करें।
  15. मिश्री और अमरूद खाने से भी आराम मिलता है।
  16. सरसों के एक-चौथाई चम्मच बीजों को एक कप पानी में भिगो दें। एक घंटे बाद इस पानी को छानकर पी लें। यह नुस्खा एक दिन में दो से तीन बार दोहराएं। डायरिया की समस्या से बहुत जल्दी आराम मिल जाएगा।


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पेट में गैस बनने के कारण, लक्षण और उपाचार



पेट में गैस बनना आम बात है लेकिन कई बार इसकी वजह से सीने में भी दर्द होने लगता है। गैस भयंकर तरीके से सिर में चढ़ जाती है और उल्टियां तक आने लगती है। दरअसल, गैस बनने से पेट फूलने लगता है और पाचन संबंधी दिक्कत पैदा हो जाती है। अगर आपको ज्यादा गैस बनती है तो इसे बिल्कुल भी हल्के में न लें क्योंकि इसकी वजह से आपको घातक पेट के रोग हो सकते हैं। पेट फूलने और गैस बनने पर आप घर में ही मौजूद चीजों से इसका इलाज कर सकते हैं और इस बीमारी से जड़ से छुटकारा पा सकते हैं।


पेट में गैस की समस्या होने पर आमतौर पर यह लक्षण दिखते हैं- उलटी, बदहज़मी, दस्त होना, पेट फूलना
  1. बदबूदार सांसें आना और पेट में सूजन रहना तथा भूख न लगना और पेट में गैस होने पर जब ऊपर बताए गए लक्षण दिखते तो आपको शर्मिंदा होना पड़ता है। ऐसे में आप जरूर चाहेंगे कि जल्द से जल्द आप इस समस्या से निजात पा लें। तो आइए, जानते हैं पेट में गैस की समस्या से छूटकारा पाने के आसान से घरेलू उपाय-अजवायन और काला नमक को समान मात्रा में मिलाकर गर्म पानी से पीने से पेट का अफारा ठीक होता है।
  2. आप दूध में काली मिर्च मिलाकर भी पी सकते हैं।
  3. इस सभी उपचार के अलावा सप्ताह में एक दिन उपवास रखने से भी पेट साफ रहता है और गैस की समस्या पैदा नहीं होती।
  4. इसके अलावा सेब का सिरका भी गर्म पानी में मिलाकर पीने से लाभ होगा।
  5. ऐसी समस्या से छुटकारा पाने के लिए भोजन के बाद 3-4 मोटी इलायची के दाने चबाकर ऊपर से नीबू पानी पीने से पेट हल्का होता है।
  6. काली मिर्च का सेवन करने पर पेट में हाजमे की समस्या दूर हो जाती है।
  7. छाछ में काला नमक और अजवाइन मिलाकर पीने से भी गैस की समस्या में काफी लाभ मिलता है।
  8. दालचीनी को पानी मे उबालकर, ठंडा कर लें और सुबह खाली पेट पिएं। इसमें शहद मिलाकर पिया जा सकता है।
  9. दिनभर में दो से तीन बार इलायची का सेवन पाचन क्रिया में सहायक होता है और गैस की समस्या नहीं होने देता।
  10. नीबू के रस में 1 चम्मच बेकिंग सोडा मिलाकर सुबह के वक्त खाली पेट पिएं।
  11. पुदीने की पत्तियों को उबाल कर पीने से गैस से निजात मिलती है।
  12. रोज अदरक का टुकड़ा चबाने से भी पेट की गैस में लाभ होता है।
  13. रोजाना नारियल पानी सेवन करना गैस का फायदेमंद उपचार है।
  14. लहसुन भी गैस की समस्या से निजात दिलाता है। लहसुन को जीरा, खड़ा धनिया के साथ उबालकर इसका काढ़ा पीने से काफी फादा मिलता है। इसे दिन में 2 बार पी सकते हैं।
  15. सुबह-शाम सवा चम्मच त्रिफला का चूर्ण गर्म पानी के साथ लेने से पेट नर्म होता है।


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रक्ताल्पता (एनीमिया) लक्षण, कारण, उपचार और रोकथाम



रक्ताल्पता (एनीमिया) का साधारण मतलब रक्त (खून) की कमी है। यह लाल रक्त कोशिका में पाए जाने वाले एक पदार्थ (कण) रूधिर वर्णिका यानि हीमोग्लोबिन की संख्या में कमी आने से होती है। हीमोग्लोबिन के अणु में अनचाहे परिवर्तन आने से भी रक्ताल्पता के लक्षण प्रकट होते हैं। हीमोग्लोबिन पूरे शरीर मे ऑक्सीजन को प्रवाहित करता है और इसकी संख्या मे कमी आने से शरीर मे ऑक्सीजन की आपूर्ति मे भी कमी आती है जिसके कारण व्यक्ति थकान और कमजोरी महसूस कर सकता है। एनीमिया एक गंभीर बीमारी है। इसके कारण महिलाओं को अन्य बीमारियां होने की संभावना और बढ़ जाती है।
  1. एनीमिया से पीड़ित महिलाओं की प्रसव के दौरान मरने की संभावना सबसे अधिक होती है।
  2. किशोरावस्था और रजोनिवृत्ति के बीच की आयु में एनीमिया सबसे अधिक होता है।
  3. गर्भवती महिलाओं को बढ़ते शिशु के लिए भी रक्त निर्माण करना पड़ता है। इसलिए गर्भवती महिलाओं को एनीमिया होने की संभावना होती है।
  4. भारत में 80 प्रतिशत से अधिक गर्भवती महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं।
  5. यह तब होता है, जब शरीर के रक्त में लाल कणों या कोशिकाओं के नष्ट होने की दर, उनके निर्माण की दर से अधिक होती है।

लक्षण
  1. कमजोरी एवं बहुत अधिक थकावट।
  2. चक्कर आना- विशेषकर लेटकर एवं बैठकर उठने में।
  3. चेहरे एवं पैरों पर सूजन दिखाई देना।
  4. जीभ, नाखूनों एवं पलकों के अंदर सफेदी।
  5. त्वचा का सफेद दिखना।
  6. बेहोश होना।
  7. सांस फूलना।
  8. हृदयगति का तेज होना।
कारण - किसी भी कारण रक्त में कमी, जैसे-
  1. पेट के अल्सर से खून जाना।
  2. पेट के कीड़ों व परजीवियों के कारण खूनी दस्त लगना।
  3. बार-बार गर्भ धारण करना।
  4. मलेरिया के बाद जिससे लाल रक्त करण नष्ट हो जाते हैं।
  5. माहवारी में अधिक मात्रा में खून जाना।
  6. शरीर से खून निकलना (दुर्घटना, चोट, घाव आदि में अधिक खून बहना)
  7. शौच, उल्टी, खांसी के साथ खून का बहना।
  8. सबसे प्रमुख कारण लौह तत्व वाली चीजों का उचित मात्रा में सेवन न करना।
उपचार तथा रोकथाम
  1.  अगर एनीमिया मलेरिया या परजीवी कीड़ों के कारण है, तो पहले उनका इलाज करें।
  2. एनीमिया के रोगियों के लिए शहद बहुत लादायक होता है। इसके नियमित सेवन से खून की कमी दूर हो जाती है।
  3. एनीमिया में मेवे खाने से शरीर में आयरन का स्तर तेजी से बढ़ता है।
  4. काली चाय एवं कॉफी पीने से बचें।
  5. गर्भवती महिलाओं एवं किशोरी लड़कियों को नियमित रूप से 100 दिन तक लौह तत्व व फॉलिक एसिड की 1 गोली रोज रात को खाने खाने के बाद लेनी चाहिए।
  6. गुड़ भी आयरन का अच्छा स्रोत है। एनीमिया से ग्रस्त लोगों को रोज गुड़ जरूर खाना चाहिए। खाने के बाद थोड़ा सा गुड़ खाने से भी एनीमिया दूर होता है।
  7. चुकंदर लौह तत्त्व से भरपूर होता है इसीलिए एनीमिया के मरीजों को अपनी रोज की खुराक में थोड़ा चुकंदर जरूर शामिलकरना चाहिए। चुकंदर को सब्जी के अलावा सलाद के रूप में या जूस बनाकर भी लिया जा सकता है।
  8. जल्दी-जल्दी गर्भधारण से बचना चाहिए।
  9. टमाटर को सलाद के रूप में खाया जा सकता है। इसके अलावा जूस या सूप बनाकर पीना भी अच्छा होता है।
  10. पालक की सब्जी एनीमिया में दवा की तरह काम करती है। हरी सब्जियों में पालक डालें। साथ ही, सलाद के रूप में भी इसका सेवन किया जा सकता है। पालक को उबालकर उसका सूप भी बनाया जा सकता है। इसका सूप पीने से बहुत जल्दी खून बढ़ता है।
  11. भोजन के बाद चाय के सेवन से बचें, क्योंकि चाय भोजन से मिलने वाले जरूरी पोषक तत्वों को नष्‍ट करती है।
  12. लौह तत्वयुक्त चीजों का सेवन करें।
  13. विटामिन 'ए' एवं 'सी' युक्त खाद्य पदार्थ खाएं।
  14. संक्रमण से बचने के लिए स्वच्छ पेयजल ही इस्तेमाल करें।
  15. र खजूर दोनों में ही पर्याप्त मात्रा में आयरन पाया जाता है। रोज सेब और खजूर खाने से कुछ दिनों में एनीमिया दूर हो जाता है।
  16. सोयाबीन से भरपूर मात्रा में आयरन मिलता है इसीलिए एनीमिया में यह बहुत लाभदायक है।
  17. स्वच्छ शौचालय का प्रयोग करें।


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दिल को स्वस्थ बनाएं



व्यस्त जीवन शैली में संतुलित खानपान के साथ व्यायाम भी जरूरी है। इससे दिल तंदुरुस्त रहता है और स्वस्थ व लंबी उम्र हो सकती है। जीवन की जिम्मेदारियों व करियर में तरक्की की होड़ में हंसना-मुस्कुराना न भूलें। जानिए कैसे रख सकते हैं हृदय को स्वस्थ।
    हृदय के स्वास्थ्य के लिए आहार (Diet for healthy heart)
    1.  अंडे का सफेद भाग खाया जा सकता है उसको पीला भाग का सेवन एक दिल के रोगी के लिए अच्छा नहीं होता।
    2. अनाज और दालों का सेवन सीमित मात्रा में ही करें।
    3. एक ह्रदय रोगी को अपने आहार में कम प्रोटीन और कम कोलेस्ट्राल का सेवन करना चाहिए। उन्हें क्या, कब और कितनी मात्रा में खाना चाहिए आज हम इसी के बारे में आपको बताएंगे। क्योंकि उनकी जरा सी बदपरहेजी उनकी जान तक ले सकती है।
    4. गाजर (carrot), मटर (peas) और चुकंदर (beetroot) जैसी सब्जियां।
    5. चपाती बनाते समय चने के आटे / जौ के आटे को मिलाकर रोटी बनाए।
    6. चिकन या मछली लगभग 50-60 ग्राम, सप्ताह में 2-3 बार ग्रील्ड, उबला हुआ, भुना हुआ रूप में लिया जा सकता है ये आपको बहुत ज्यादा फायदा करेगा।
    7. दिन भर में एक चम्मच घी से ज्यादा न खाएं।
    8. दूध (Milk) और दूध से बने उत्पादों का सेवन भी एक सीमित मात्रा में करें।
    9. नारियल पानी और टमाटर के रस का सेवन करें लेकिन सीमित मात्रा में।
    10. पकी हुई दालें और साबुत दालों को खाएं। दिन में एक बार स्प्राउट्स को जरूर खाना चाहिए। सीमित मात्रा में लीं जाने वाली चीजें
    11. पपीता (papaya,), संतरा (orange), अमरूद (guava), सेब (apple), अनानास (pineapple), तरबूज (watermelon), नाशपाती (pear) आदि फल प्रतिदिन 100 ग्राम तक इनमें से किसी भी फल को खा सकते हैं।
    12. सलाद और उबली हुई सब्जियाँ जैसे टमाटर, खीरा, मूली, हरी पत्तेदार सब्जियाँ, गोभी, शिमला मिर्च, लौकी आदि।
    13. सूखे मेवों में बादाम और मूंगफली ली जा सकती है।
    14. सूप, रसम, नींबू पानी, छाछ, सब्जियों का रस, सोडा आदि।
    15. अनार के रस को मिश्री में मिलाकर हर रोज सुबह-शाम पीने से दिल मजबूत होता है।
    16. अलसी के पत्ते और सूखे धनिए का क्वाथ बनाकर पीने से ह्रदय की दुर्बलता मिट जाती है।
    17. उच्च रक्तचाप की समस्या से निजात पाने के लिए सिर्फ गाजर का रस पीना चाहिए। इससे रक्तचाप संतुलित हो जाता है।
    18. खाने में अलसी का प्रयोग करने से दिल मजबूत होता है।
    19. गाजर के रस को शहद में मिलाकर पीने से निम्न रक्तचाप की समस्या नहीं होती है और दिल मजबूत होता है।
    20. छोटी इलायची और पीपरामूल का चूर्ण घी के साथ सेवन करने से दिल मजबूत और स्वस्थ रहता है।
    21. दिल को मजबूत बनाने के लिए गुड को देसी घी में मिलाकर खाने से भी फायदा होता है।
    22. प्रतिदिन लहसुन की कच्ची कली छीलकर खाने से कुछ दिनों में ही रक्तचाप सामान्य हो जाता है और दिल मजबूत होता है।
    23. बादाम खाने से दिल स्वस्थ रहता है।
    24. लौकी उबालकर उसमें धनिया, जीरा व हल्दी का चूर्ण तथा हरा धनिया डालकर कुछ देर पकाकर खाइए। इससे दिल को शक्ति मिलती है।
    25. शहद दिल को मजबूत बनाता है। कमजोर दिलवाले एक चम्मच शहद का सेवन रोज करें तो उन्हें फायदा होगा। लोग भी शहद का एक चम्मच रोज ले सकते हैं, इससे वे दिल की बीमारियों से बचे रहेंगे।
    26. सर्पगंधा को कूटकर रख लीजिए। इस पाउडर को सुबह-शाम 2-2 ग्राम खाने से बढ़ा हुआ रक्तचाप सामान्य हो जाता है।
    27. सेब का जूस और आंवले का मुरब्बा खाने से दिल मजबूत होता है और दिल अच्छे से कामकरता है।
    इन खाद्य पदार्थ का सेवन ना करें
    1.  उच्च कैलोरी वाले फल जैसे केला (banana), आम (mango), सपोटा (sapota) , अंगूर (grapes), कस्टर्ड सेब (custard apple) आदि इनका सेवन कम मात्रा में ही करें।
    2. कार्बोनेटेड वाले पेय पदार्थ, दूध के शेक, फलों के ज्यूस आदि इनका सेवन बहुत कम करें।
    3. चीनी, गुड़, जैम, जेली, मिठाई जैसे लड्डू, बर्फी, खीर, रस गुल्ला, जलेबी, आइसक्रीम इन सभी का सेवन कभी-कभी ही करें।
    4. डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ जैसे सॉस, पिज्जा टॉपिंग आदि का सेवन कम करें।
    5. तली हुई चीजें जैसे समोसा, पोड़ी, परांठे, पकोड़ा आदि।
    6. तेल में बने किसी भी तरह के अचार का सेवन ना करें।
    7. दूध से बने उत्पाद जैसे खोआ, क्रीम, प्रोसेस्ड चीज़ इत्यादि भी बहुत कम ही खाएं।
    8. मक्खन और देसी घी से बनी चीजें,  बेकरी आइटम जैसे केक, पेस्ट्री आदि का सेवन बिल्कुल भी ना करें।
    9. मक्खन, देसी घी, वनस्पती, नारियल तेल।
    10. रेड मीट, हैम, बेकन, मछली आदि का सेवन भी एक कम मात्रा में करें, क्योंकि इससे आपकी किडनी पर भी बुरा असर पड़ता है।
    11. सूखे मेवे जैसे काजू, किशमिश, अखरोट आदि इनका सेवन बहुत ज्यादा बिल्कुल ना करें ।
    12. स्टार्च वाले खाद्य पदार्थ जैसे मकई का आटा, अरारोट, रिफाइंड आटा, कस्टर्ड पाउडर इनके सेवन से बचें।


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    मुंहासे के लक्षण, कारण और घरेलू उपचार



    मुंहासे या पिटिका (Pimples or Acne) त्वचा की एक स्थिति है जो सफेद, काले और जलने वाले लाल दाग के रूप में दिखते हैं। यह लगभग 14 वर्ष से शुरू होकर 30 वर्ष तक कभी भी निकल सकते हैं। ये निकलते समय तकलीफ दायक होते हैं व बाद में भी इसके दाग-घब्बे चेहरे पर रह जाते हैं। मुंहासों के कई रूप होते है जैसे-पसदार मुंहासे, बिना पस कील के रूप में, काले खूटें के रूप में आदि। मुंहासों की शुरूआत भी अजीब होती है। पहले ये छोटे-छोटे दानों के रूप में चेहरे पर उभरते हैं। चेहरे में भी ललाट, गालों और नाक पर इनकी मात्रा ज्यादा होती है। यदि रोग की तीव्रता ज्यादा हो तो कंधे, पीठ और हाथ-पैरों पर हो सकते हैं। कुछ रोगियों में मुंहासे दाने के आकार से बड़े होकर पीवयुक्त गांठों के रूप में भी हो जाते हैं। इन मवादयुक्त गांठों में दर्द, जलन, सूजन और लालिमा पाई जाती है। कुछ मुंहासे काले सिर वाले होते हैं जिन्हें "कील" कहा जाता है। यदि इनको दबाया जाए, तो काले सिर के साथ-साथ भीतर से सफेद रोम जैसा पदार्थ बाहर निकलता है और इससे पैदा होने वाला छेद स्थाई हो जाता है।

    पिंपल/मुंहासे के लक्षण
    1.  व्हाइटहेड्स (बंद छिद्रित छिद्र)
    2. ब्लैकहेड (खुली छिद्रित छिद्र)
    3. छोटे लाल, टेंडर बम्प
    पिंपल/मुंहासे होने के कारण
    ऐलोपैथिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार मुंहासों का कारण होता है - वसा ग्रन्थियों (सिबेसियस ग्लैंड्स) से निकलने वाले स्राव का रुक जाना। यह स्राव त्वचा को स्निग्ध रखने के लिए रोम छिद्रों से निकलता रहता है। यदि यह रुक जाए तो फुंसी के रूप में त्वचा के नीचे इकट्ठा हो जाता है और कठोर हो जाने पर मुंहासा बन जाता है। इसे 'एक्ने वल्गेरिस' कहते हैं। इसमें पस पड़ जाए तो इसे कील यानी पिम्पल कहते हैं। पस निकल जाने पर ही यह ठीक होते हैं। क्रीम, लोशन, एक्सपायरी क्रीम का अधिक उपयोग करने से मुंहासे आ जाते है। व्यक्ति का नींद पूरा ना होने के कारण मुंहासे निकल जाते है। पाचन तंत्र में परेशानी होने के कारण भी चेहरे पर मुंहासे आ जाते है। हार्मोन में बदलाव होने के कारण लड़को और लड़कियों को मुंहासे आ जाते है। व्यक्ति के त्वचा पर पहले से मुंहासे है, तो तनाव होने के कारण मुंहासे और बढ़ जाते है

    मुहांसों के प्रभाव को कैसे कम करें?
    1.  अगर कोई पिंपल निकले तो उसे दबाए नहीं। ऐसा करने से पिंपल अन्य जगहों पर फैल सकता है।
    2. अपने मेकअप ब्रश को अच्छी तरह से धोने की आदत डालें। इससे ब्रश में बैक्टीरिया नहीं पनपते हैं।
    3. कच्ची सब्जियां व कम से कम 10-12 गिलास पानी दिन में पीएं।
    4. गर्म चीजों का सेवन न करें।
    5. चिकनाई वाले कॉस्मेटिक उत्पाद न लगाएं।
    6. चेहरे को किसी अच्छे मैडीकेटेड साबुन से धोएं।
    7. चेहरे को धोकर गर्म पानी से भाप लें, ब्लैक हैड रिमूवर से कील दबाकर निकाल दें, अब रूई से कील वाले स्थान पर स्किन टोनर लगाएं। बाद में ठंडे पानी से मुँह धो लें व फेस पैक लगा लें।
    8. ज़्यादा नमक खाने से पिंपल हो सकता है इसलिए सीमित मात्रा में नमक का सेवन करें।
    9. ज्यादा मीठा, चाय-कॉफी, मिर्च मसाले भी कब्ज पैदा करते हैं। जिससे मुंहासे होते हैं। अत: इनका सेवन न करें।
    10. तनाव मुक्तरहें क्योंकि तनाव व नींद पूरी न होने से भी मुंहासे बढ़ते हैं।
    11. प्रात: काल ताजी स्वच्छ हवा में घूमें व व्यायाम करें।
    12. बालों में रूसी न होने पाए, इस बात का ध्यान रखें।
    13. भोजन में ज्यादा घी, तेल, मसालों का प्रयोग न करें।
    14. मुंहासे ज्यादा हों, तो कुछ दिन के लिए बालों में तेल न लगाएं।
    15. मुंहासों को दबाने, फोड़ने या रगड़ने से बचने का प्रयास करें।
    16. मुहाँसे की शुरुआत होते ही सर्वप्रथम किसी चर्म रोग विशेषज्ञ से परामर्श ले।
    17. हाथ या अंगुलियों से चेहरो को छूने से परहेज करें।
    18. होमियोपैथिक चिकित्सा भी इस समस्या में लाभकारी होती है।
    घरेलू उपचार
    1.  एक चम्मच हल्दी पाउडर में थोड़ा सा पानी मिलाकर गाढ़ा पेस्ट बना लें। इस पेस्ट को पिंपल्स पर लगाएं। कुछ मिनट के लिए लगा रहने दें। फिर ठंडे पानी से चेहरा धो लें। ऐसा एक हफ्ते तक करें। पिंपल्स खत्म हो जाएंगे।
    2. एक पपीते को छिलकर मिक्सर में पीस लें और चेहरे पर लगाएं। पपीते का जूस भी चेहरे पर लगाया जा सकता है। पंद्रह से बीस मिनट चेहरे पर लगा रहने दें। फिर ठंडे पानी से चेहरा धो लें।
    3. कॉटन बॉल को शहद में डुबोकर चेहरे पर लगाएं। सूखने पर चेहरा धो लें। पिंपल्स खत्म हो जाएंगे।
    4. जब भी पिंपल्स की समस्या हो, चार-पांच दिनों तक दिन में दो बार चेहरे पर भाप लें। पिंपल्स खत्म हो जाएंगे और चेहरा चमकने लगेगा।
    5. टमाटर को पीसकर उसका जूस बना लें। इस जूस को छानकर चेहरे पर लगाएं। सूखने पर चेहरा धो लें। दिन में कम से कम दो बार ऐसा करें। पिंपल्स पर असर दिखाई देने लगेगा।
    6. दालचीनी का पाउडर बना लें। इस पाउडर को पानी में पेस्ट बनाकर चेहरे पर लगाएं। ऐसा दिन में कम से कम दो बार करें। पिंपल्स दूर हो जाएंगी।
    7. दो मध्यम आकार के नीबू लेकर उनका जूस निकाल लें। नीबू के रस को कॉटन में भिगोकर चेहरे पर लगा लें। सूख जाए तो ठंडे पानी से धो लें। दिन में दो बार इसे तीन-चार दिनों तक लगाएं। पिंपल्स दूर हो जाएंगे।
    8. नीम की पत्तियों को धोकर उसका पेस्ट बना लें। इस पेस्ट को चेहरे पर लगाएं। आधे घंटे बाद चेहरा धो लें।
    9. पुदीने की कुछ पत्तियों को मिक्सर में पीस लें। इसका पेस्ट बनाकर उसे चेहरे पर रात को सोने से पहले लगा लें या इसे छानकर जूस निकालकर भी चेहरे पर लगा सकते हैं। इसे रात भर चेहरे पर लगा रहने दें। सुबह चेहरा धो लें। ऐसा हफ्ते में एक बार जरूर करें। धीरे-धीरे पिंपल्स खत्म हो जाएंगी।
    10. बर्फ के टुकड़े को कॉटन में लपेटकर चेहरे पर हल्के से मालिश करें। तीन-चार दिन तक दिन में दो बार बर्फ से मालिश करने से पिंपल्स की ठीक हो जाएंगे।
    11. रात को सोने से पहले पिंपल्स पर टूथपेस्ट लगाएं। सुबह ठंडे पानी से चेहरा धो लें। पिंपल्स पर इसका असर साफ दिखाई देगा। पिंपल्स पर सिर्फ सफेद टूथपेस्ट लगाना चाहिए।
    12. लहसुन की दो कलियां और एक लौंग पीस लें। इस पेस्ट को सिर्फ पिंपल्स पर लगाएं। कुछ देर लगा रहने दें। फिर चेहरा धो लें। ऐसा करने से पिंपल्स खत्म हो जाएंगे।
    13. संतरे के छिलकों को छांव में सुखाकर पाउडर बना लें। इस पाउडर को एक से दो चम्मच पानी में मिलाकर चेहरे पर लगाएं। आधे घंटे के बाद चेहरा धो लें। ऐसा दिन में दो से तीन बार करें।


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    बवासीर के कारण, लक्षण और उपचार



    बवासीर या पाइल्स एक ख़तरनाक बीमारी है। बवासीर 2 प्रकार की होती है। आम भाषा में इसको खूनी और बादी बवासीर के नाम से जाना जाता है। कहीं पर इसे महेशी के नाम से जाना जाता है।
    1. खूनी बवासीर :- खूनी बवासीर में किसी प्रकार की तकलीफ नहीं होती है केवल खून आता है। पहले पखाने में लगके, फिर टपक के, फिर पिचकारी की तरह से सिर्फ खून आने लगता है। इसके अन्दर मस्सा होता है। जो कि अन्दर की तरफ होता है फिर बाद में बाहर आने लगता है। टट्टी के बाद अपने से अन्दर चला जाता है। पुराना होने पर बाहर आने पर हाथ से दबाने पर ही अन्दर जाता है। आखिरी स्टेज में हाथ से दबाने पर भी अन्दर नहीं जाता है।
    2. बादी बवासीर :- बादी बवासीर रहने पर पेट खराब रहता है। कब्ज बना रहता है। गैस बनती है। बवासीर की वजह से पेट बराबर खराब रहता है। न कि पेट गड़बड़ की वजह से बवासीर होती है। इसमें जलन, दर्द, खुजली, शरीर में बेचैनी, काम में मन न लगना इत्यादि। टट्टी कड़ी होने पर इसमें खून भी आ सकता है। इसमें मस्सा अन्दर होता है। मस्सा अन्दर होने की वजह से पखाने का रास्ता छोटा पड़ता है और चुनन फट जाती है और वहाँ घाव हो जाता है उसे डाक्टर अपनी भाषा में फिशर भी कहते हें। जिससे असहाय जलन और पीड़ा होती है। बवासीर बहुत पुराना होने पर भगन्दर हो जाता है। जिसे अँग्रेजी में फिस्टुला कहते हें। फिस्टुला प्रकार का होता है। भगन्दर में पखाने के रास्ते के बगल से एक छेद हो जाता है जो पखाने की नली में चला जाता है। और फोड़े की शक्ल में फटता, बहता और सूखता रहता है। कुछ दिन बाद इसी रास्ते से पखाना भी आने लगता है। बवासीर, भगन्दर की आखिरी स्टेज होने पर यह केंसर का रूप ले लेता है। जिसको रिक्टम कैंसर कहते हें। जो कि जानलेवा साबित होता है।

    उपचार
    • 50 ग्राम बड़ी इलायची को तवे पर रखकर भूनते हुए जला लीजिए। ठंडी होने के बाद इस इलायची को पीस लीजिए। प्रतिदिन सुबह इस चूर्ण को पानी के साथ खाली पेट लेने से बवासीर में बहुत आराम मिलता है।
    • एक चम्मच आंवले का चूर्ण सुबह शाम शहद के साथ लेने से भी बवासीर में लाभ प्राप्त होता है।
    • एक छोटी चम्मच धुले काले तिल ताजा मक्खन के साथ लेने से बवासीर में खून आना बंद हो जाता है।
    • एक पके केले को बीच से चीरकर उसके दो टुकड़ेकर लें फिर उस पर कत्था पीसकर छिड़क दें। शाम को इस केले को खुले आसमान के नीचे रख दें। सुबह शौच के बाद उस केले को खा लें। एक हफ्ते तक लगातार करने से भयंकर से भयंकर बवासीर भी समाप्त हो जाती है।
    • करीब दो लीटर मट्ठा लेकर उसमें 50 ग्राम पिसा जीरा और थोड़ा सा सेंधा नमक मिला दें। पूरे दिन पानी की जगह यह मट्ठा पियें। पाँच-सात दिन तक यह प्रयोग करें, मस्से ठीक हो जाएंगे।
    • खूनी बवासीर में एक नीबू को बीच में से काटकर उसमें लगभग 4-5 ग्राम कत्था पीसकर डाल दीजिए। इन दोनों टुकड़ों को रात में छत पर खुला रख दीजिए। सुबह उठकर नित्य क्रिया से निवृत्त होने के बाद इन दोनों टुकड़ों को चूस लीजिए। पांच दिन तक इस प्रयोग को कीजिए, बहुत फायदा होगा।
    • छोटी पिप्पली को पीसकर उसका चूर्ण बना ले, इसे शहद के साथ लेने से भी आराम मिलता है।
    • जमीकंद को देसी घी में बिना मसाले के भुरता बनाकर खाएँ, शीघ्र ही लाभ मिलेगा।
    • जीरे को पीसकर मस्सों पर लगाने से भी फायदा मिलता है। जीरे को भूनकर मिश्री के साथ मिलाकर चूसने से भी फायदा मिलता है।
    • नागकेशर, मिश्री और ताजा मक्खन को रोजाना बराबर मिलाकर 10 दिन तक खाने से बवासीर में बहुत आराम मिलता है।
    • नियमित रूप से गुड़ के साथ हरड़ खाने से बवासीर में जल्दी ही फायदा होता है।
    • नीम का तेल मस्सों पर लगाने और 4-5 बूँद रोज पीने से बवासीर में बहुत लाभ होता है।
    • नीम के छिलके सहित निंबौरी के पावडर का 10 ग्राम रोज सुबह बासी पानी के साथ सेवन करें, लाभ होगा। लेकिन इसके साथ आहार में घी का सेवन आवश्यक है।
    • बवासीर दो प्रकार की होती है, खूनी और बादीवाली। खूनी बवासीर में मस्से खूनी सुर्ख होते है और उनसे खून गिरता है, जबकि बादीवाली बवासीर में मस्से काले रंग के होते है और मस्सों में खाज पीडा और सूजन होती है।
    • सुबह खाली पेट मूली का नियमित सेवन भी बवासीर को खत्मकर देता है।


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