घनानंद का जीवन परिचय, रचनाएँ एवं साहित्यिक विशेषताएं




घनानंद का जीवन परिचय, रचनाएँ एवं साहित्यिक विशेषताएं
जीवन परिचय
घनानंद रीतिकाल की रीतिमुक्त स्वच्छन्द काव्यधारा के सुप्रसिद्ध कवि है। आचार्य शुक्ल के मतानुसार इनका जन्म सवंत् 1746 में दिल्ली में हुआ तथा संवत् 1817 में वृंदावन में इनका देहावसन हुआ। ये दिल्ली के रहने वाले एक कायस्थ थे और सम्राट मुहम्मद शाह बादशाह के मीर मुंशी थे। महाकवि घनानन्द के विभिन्न नामों के प्रति विद्वानों में मतैक्य नहीं है। ये नाम निम्नलिखित हैं- घन आनन्द, ’आनन्द घन या आनन्दघन अथवा आनन्द के घन,’ आनन्द निधान तथा आनन्द।’ यह तीनों एक ही व्यक्ति के नाम हैं या अलग-अलग व्यक्ति के, यह प्रश्न विवाद का है। आनन्दनिधान नाम के लिये निम्नलिखित उद्धरण प्रस्तुत हैं :-
वहै मुसक्यानि, वहै मृदु बतरानि, वहै,
लड़कीली बानि उर ते अरति है।
वहै गति लैन, औ बजावनि ललित बैन,
वहै छैलताई न छिनक बिसरति है।
आनंदनिधान प्रान प्रीतम सुजान जू की,
सुधि सब-भौतिन सो बेसुधि करती है।।
घनानन्द के समय को लेकर भी विवाद है। शिवसिंह सरोज सेंगर के मत से घनानन्द का समय सम्वत् 1617 है। वे आनन्दघन नाम को मानकर यह समय निर्धारित करते हैं। जनश्रुति एवं विद्वानों के आधार पर यह कहा जाता है कि घनानन्द जी का जन्म सम्वत् 1746 के आस पास हुआ था। कतिपय विद्वान् इनका जन्म सम्वत् 1715, 1630, तथा 1683 मानते हैं। आज इनका जन्म सम्वत् 1746 सप्रमाण स्वीकार गया है, अन्य तीनों ही जन्म सम्वत् संदिग्ध हैं, आपका जन्म स्थान दिल्ली के आस पास हुआ था या दिल्ली में ही स्वीकारा जा सकता है। अधिकांश विद्वान् इस मत के समर्थक हैं। कुछेक विद्वान् इनके जन्म स्थान को वृन्दावन एवं बुलन्दशहर के पास का मानते हैं। आपका जन्म भटनागर कायस्थ परिवार में हुआ, आपकी शिक्षा फारसी भाषा के द्वारा शुरू हुई थी, बचपन से ही आपकी रुचि विद्यााध्ययन की ओर विशेष थी। जनश्रुति के आधार पर आप अबुलफजल के शिष्य माने जाते हैं। इन्होंने अपनी असाधारण प्रतिभा एवं बुद्धि से शीघ्र ही फारसी का अच्छा ज्ञान अर्जित कर लिया था। इसके बाद आप सम्राट मुहम्मदशाह ’रंगीले’के मीर मुंशी पद पर नियुक्त हो गए थे। आपने अपनी आकर्षक बुद्धि एवं प्रतिभा सम्पन्नता के निदान स्वरूप शीघ्र पदोन्नति पा ली थी। और आप धीरे-धीरे सम्राट के ’खास कलम’ अर्थात् प्राइवेट सेक्रेटरी, हो गए। घनानंद की मृत्यु के बारे में विद्वानों के दो प्रकार के मत है। प्रथम मत के अनुसार नादिरशाह के आक्रमण के समय मथुरा में सैनिकों द्वारा प्रथम प्रश्नपत्र घनानंद की मृत्यु हुई। किन्तु इस मत का खण्डन इस आधार पर हो जाता है कि नादिरशाह द्वारा किया गया कत्ले आम दिल्ली में हुआ था न कि मथुरा में। दूसरे इस आक्रमण और घनानंद की मृत्यु के समय में ही अंतर है। द्वितीय मत ही अब मान्य है, वह यह की संवत् 1817 (सन् 1660 ई.) में अब्दुलशाह दुर्रानी ने जब दूसरी बार मथुरा में कत्लेआम किया था इसी में घनानंद की मृत्यु हुई।

घनानन्द की रचनायें
घनानंद द्वारा लिखित कई ग्रन्थ है। सबसे पहले भारतेन्दु हरिशचन्द्र ने ’सुजान शतक’ नामक पुस्तक में घनानंद कविताओं का संकलन किया। इसके अतिरिक्त ’सुजानहित’तथा ’सुजान सागर’ नामक संकलन भी प्रकाश में आया। इस क्षेत्र में आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा घनानंद पर किया गया शोध कार्य बड़ा सार्थक सिद्ध हुआ। उन्होंने घनानंद के कविताओं को संकलित कर तीन पुस्तकें प्रकाशित की। प्रथम ’घनानंद कवित’ जिसमें 502 कवित्त संग्रहित है। द्वितीय संकलन सन् 1945 में प्रकाशित हुआ जिसमें कवित्त सवैयों के अतिरिक्त घनानंद के 500 पद तथा उनकी ’वियोग बेलि’, ’यमुना यश’, ’प्रीति पावस’ तथा ’प्रेम पत्रिका’ रचनाओं का संग्रह है। इसके बाद सन् 1952 में घनानंद की अन्य 36 कृतियों का संकलन करते हुए ’घनानंद ग्रंथावली’ का प्रकाशन हुआ। काशी नागरी प्रचारिणी महासभा ने 2000 सम्वत् तक की खोज के आधार पर निम्नलिखित कृतियों को उनका माना है- 1. घन आनन्द कवित्त 2. आनन्द घन के कवित्त 3. कवित्त 4. स्फुट कवित्त 5. आनन्द घन जू के कवित्त 6. सुजान हित 7. सुजानहित प्रबन्ध 8. कृपाकन्द निबन्ध 9. वियोग बेला 10. इश्क लता 11. जमुना-जस 12. आनन्द घन जी की पदावली 13. प्रीती पावस 14. सुजान विनोद 15. कविता संग्रह 16. रस केलि बल्ली 17. वृन्दावन सत।

घनानंद का संयोग श्रृंगार वर्णन
रीतिकालीन काव्यधारा का प्रधान तत्व भक्ति नहीं प्रेम की अभिव्यंजना है। यह प्रेम कहीं मांसल है तो कहीं मानसिक और आध्यात्मिक भी है। घनानंद हिन्दी के सर्वोत्कृष्ट स्वच्छन्द प्रेमी कवि है और इनका श्रृंगार वर्णन प्रेम की मानसिक अनुभति को गहराई और तीव्रता से अभिव्यक्त करता है। इनकी प्रेम व्यजंना में इतनी आकुलता, इतनी व्यथा एवं इतनी पीडा है कि कठोर से कठोर श्रोता एवं पाठक भी द्रवित हो जाते हैं और उसमें संयोग-सुख की इतनी मादकता एवं उल्लास भावना भी भरी हुई है कि सहृद्यों को आनंद विभोर कर देती है। इनकी प्रेमानुभूति में आत्मानुभूति का सर्वधिक योग है। एक विद्धान के अनुसार - "श्रृंगार का स्थायी भाव रति है। यही स्थायी रति है। यही स्थायी भाव और स्थायी भावों में श्रेष्ठ माना जाता है। मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से श्रृंगार जीवन का आधे से भी अधिक पक्ष है, इसका विकार सर्व जाति सुलभ, तीव्र, हृदय-स्पर्शी व स्वाभाविक है। रुद्रट तो इसकी सर्व व्याप्ति आवाल वृद्ध में पाते हैं। प्रेम ही मानव-हृदय की मूल-भावना है जो कि श्रृंगार रस का मूलाधार है। संस्कृति के विकास का इसी प्रेम का प्रतिफल है।
श्रृंगार रस के नायक व नायिका आलम्बन हैं, इस निश्चित बात को अन्य रसों में ही नहीं पाया जा सकता है। रतिभाव मनुष्य के हृदय में उस परिपक्व अवस्था में है जो किचित आश्रय से उद्दीप्त हो उठता है। नायक व नायिका के परस्पर प्रेम का परिणाम श्रृंगार रस का परिपाक होना है। श्रृंगार-रस ऐसा रस है जो मानव के अंग प्रति अंग में निहित है। निस्सन्देह प्रेम का साम्राज्य असीम है।'' वे आगे लिखते हैं -"घनानन्द ने श्रृंगार के दोनों पक्ष संयोग व वियोग की बाह्म व आंतरिक मनोवृत्त्यों का सूक्ष्म व हृदयग्राही वर्णन किया। कृष्ण को नायक, राधा को नायिका तथा सखियें को आपने अपने काव्य का आलम्बन व प्रमुख पात्र बनाया। इनके राधा-कृष्ण व सखियां युवा हैं। 'सुजान' शब्द जो कहीं कृष्ण तो कहीं राधा के सम्बोधन में आप काम में लाये हैं। यह सकारण है क्योंकि आपका तन-मन शरीरी चर्मअस्थि सुजान वेश्या के प्रति आशक्त था और जब आप 'रंगीले' के दरबार में उससे अपमानित हुए और प्रेम प्रेम न पा सका तो उसी शरीर चमं-अस्थि को जो हृदय में पहले ही समा चुका था काव्य का चोला पहना कर मूर्ति रूप में खड़ा किया-उन सुखद-सुन्दर स्मृतियों को जिनकी रूपलिष्ठा में मन स्वयं की विस्मृति कर बैठा था और जिससे आज हृदय विलकता, रोता व तड़पता, और उस हृदय-वेधक तड़फन को वृन्दावन की कुंज गलियन में धूम फिर कर उसे ऊंचे स्वर से गाया-वही इनका संयोगी व वियोगी काव्य है। और उसी नाम को 'प्रभु' मान आपने, आह्नान किया।'' घनानन्द के प्रेम वर्णन के विस्तार के लिए यह आवश्यक है कि जाता है वे पंक्तियाँ प्रस्तुत की जाएं जो इस बात की पुष्टि करते हों। निम्नलिखित पंक्तियों में इस बात का स्पष्टीकरण हो जाता है, यथा-
आनन्द के घन, लागें अचंभो पपीहा पुकार ते क्यों अर सेंये।
प्रीति पगी अंखियानि दिखाय के हाय अनीत सु दीठ छिपैये।।
क्यों हंसि हर्यो हियरा, अरुक्यौं हित के चित चाह बढ़ाई।
काहे को बोलि सुधासने बँननि, चँननि मँन-निसन चढ़ाई।।
सो सुध मोहिय मैं घन आनन्द सालति क्यों हूं कढ़ै न कढ़ाई।
मीत सुजान अनीति की पाटी, इतै पै न जानियै कौने पढ़ाई।।
घन आनन्द कौन अनोखी दसा कहा मो जिय की गति कौं परसै।।
जिय नेकु बिचारि कै देहु बताय हहा पिय दूर ते याय गहौं।
इन पंक्तियों से यह प्रमाणित होता है कि घनानन्द का लौकिक प्रेम आध्यात्मिक प्रेम से श्रेष्ठ प्रतीत होता है। उनके प्रेम की स्थिति यह है कि व्यक्ति स्वच्छन्द प्रेम के रस में निमग्न रहते हैं जो अभीप्सित होता है वह गा उठते हैं। उनकी प्रेमानुभूति को निम्न प्रकार से विभक्त किया गया है। उनके प्रेम वर्णन की निम्नलिखित विषेषतायें थीं -
इहलौकिक प्रेम - रीतिकालीन प्रेम का आधार लौकिक सुख और आनंद का अनुभव करना था। संपूर्ण रीतिकाली कवि नायिका के दैहिक सौन्दर्य के वर्णन और रसपान में आकंठ डूबे थे। इस भौतिकता के प्रति जब कभी उनके अंदर अपराधबोध पैदा होता था तो उसे कृष्ण और राधा के प्रेम में तब्दील कर देते थे। परन्तु घनानंद के प्रेम का मूलाधार विषुद्ध भौतिक जीवन था और सुजान नामक वेश्या के प्रेम में वे पागल थे। उसके प्रति घनानंद को तीव्रानुराग था। उनका यही लौकिक प्रेम उस वेश्या के कपट, छल एवं निष्ठुर व्यवहार के कारण अलौकिकता में परिणत हो गया था, उनकी इस अलौकिकता का मूलाधार लौकिक प्रेम ही है, लौकिक वासना नहीं हैं, जिसने घनानंद को 'महानेही' बना दिया था, प्रेम के महोदधि में निमग्न कर दिया था, चाह के रंग में भीगो दिया था। इसलिए घनानंद के इस काव्य में वही लौकिक प्रेम हिलोरें ले रहा है-
क्यों हंसि हेरि हियरा अरू क्यों हित कै चित्त चाह बढ़ाई।
वाहे को बोलि सुधासने बैननि चैननि मैन-निसैन चढ़ाई।।
सो सुधि यो हिय मैं घन आनन्द सालति क्यों हूँ, कढै न कढाई।
मीत सुजान अनीत की पाटी इतै पै न जानिये कौने पढाई।।
निश्छल पम्रे की अभिव्यक्ति - लौकिक प्रेम विष्वास और निष्कपटता की मांग करता है। घनानद ऐसे ही सच्चे पे्रमी थे। उनका प्रेम अपनी प्रेमिका के प्रति निष्छल और निष्कपट था। भले ही उनके प्रिय ने उनके साथ विश्वासघात किया, उन्हें दगा दी और उनका साथ नहीं दिया, किन्तु वे एक निश्चल प्रेमी थे और प्रेम के पक्ष में निश्छलता एवं निष्कपटता को ही अत्यधिक महत्व देते थे। प्रेम की इसी निश्छलता को इस बहुत प्रसिद्ध पद में अभिव्यक्त करते हैं, इसमें प्रेम की सघन और मार्मिक परिभाषा प्रस्तुत की है। इस तरह की प्रेम की परिभाषा हिन्दी साहित्य में अन्यत्र उपलब्ध नहीं होती है-
अति सूधो सनेह कौ मारग है जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं।
तहाँ साँचे चलै तजि आपुनपो झिझके कपटी जे निसाॅक नहीं।।
घन आनंद प्यारे सुजान सुनौ इत एक ते दूसरौ आक नहीं।
तुम कौन धौ पाटी पढे़ हो लला मन लेहु पै देहु छटांक नहीं।।
घनानंद के प्रेम वर्णन में इस तरह अडम्बर हीनता एवं अकृत्रिमता इसलिए मिलती है क्योंकि वे स्वयं प्रेम के अनुभव में पके थे, विरह को उन्होंने झेला था। अन्य कवि सिर्फ कविता के लिए प्रेम का वर्णन करते हैं, जबकि घनानंद अपने जिये गए अनुभव को लिखते हैं। उनके प्रेम के बीच छल-कपट का तनिक भी स्थान नहीं था, क्योंकि घनांनांद स्वाभाविक प्रेम के पुजारी थे, स्वच्छंन्दता के भक्त थे और अपनी तरंग में आकर प्रेम का निरूपण करते थे। अपने इसी नैसर्गिक प्रेम की व्यजंना करते हुए तथा चन्द्रमा और चकोर के नैसर्गिक प्रेम को उदाहरण बनाते हुए लिखते हैं-
चहौ अनचाहौ जना प्यारे पै आनन्दघन,
प्रीति-रीति विषम सु रोम-रोम रमी है।
मोहिं तुम एक, तुम्हें मो सम अनेक आहिंकहा
कछू चंदहिं चकोरन की कमी है।।
घनानन्द का प्रेम कितना निष्छल था इसके लिए उनके काव्य में उदाहरणांे की कमी नहीं है। वे प्रेम की गहराई को जितना अंदर महसूस करते थे, उतना ही काव्य में अभिव्यक्त करने में भी सक्षम थे।

पीड़ा की अनुभूति - प्रेम के दीवानों के लिए विरह की पीड़ा सबसे महत्वपूर्ण होती है। घनानंद सच्चे प्रेम के दीवाने थे। उनका प्रिय अपने प्रेमी की चिंता न करके निष्ठुरता, कठोरता एवं निर्दयता का ही व्यापार कर रहा था, तो. घनांनद अपने निष्टुर एवं निर्दय प्रिय के हृदय में प्रेम उत्पन्न करने के लिए अपने को आशा की रस्सी से बांधकर भरोसे की शिला छाती पर रखकर अपने प्रेम रूपी सिन्धु में डूबने को तैयार थे, इसीलिए तो घनानंद लिखते हैं-
आसा-गुन बांधि कै भरोसो-सिल धरि छाती,
पूरे मन-सिन्धु में न बूढत सकाय हौं।
दीह दुख-दव हिय जारि उर अंतर,
निंरतर यों रोम-रोम त्रासनि नचाय हौं।। 
सौन्दर्य प्रियता - प्रेम के मूल में सौन्दर्य चेतना होती है, चाहे वह प्रकृति प्रेम हो या व्यक्ति प्रेम। किसी के प्रति आकर्षण का प्रथम कारण उसके सौन्दर्य से प्रभावित होना होता है। घनानंद के प्रेम का मूल कारण भी सुजान का अनिन्द सौन्दर्य था, जो कवि घनांनद के रोम-रोम में बसा हुआ था, क्योकि वे उसकी सहज सुकुमारता, स्वाभाविकता, मधुरता एवं प्राकृतिक सुन्दरता को देखकर ही उसके सच्चे प्रेमी बने थे। इसीलिए घनांनद के ह्यदय में प्रेयसी सुजान की 'तिरछी चितौनि' 'चंचल विसाल नैन', 'धूमरे कटाछि', 'रसीली हॅसी','बडी-बडी' अंखियाॅ', 'चीकने चिहुर', 'जोबन-गरूर-गरूबाई', 'रस-रासि-निकाई', 'नवजोबन की सुथराई', 'नेह-ओपी-अरूनाई', आदि। इसी कारण उनके हृदय में प्रिय के सौन्दर्य का अथाह सागर हिलौरें लेता रहता था। उन्होंने अपनी प्रिय सुजान के इसी अनिन्द सौन्दर्य का बखान अपने काव्य में किया है -
स्याम घटा लिपही थिर बीज कि - सोहै अमाबस अंक उज्यारी।
धूम के पुंज मैं ज्वाल की माल-सी पै दृग-सीतलता-सुखकारी।।
के छाकि छायौ सिगांर निहारि सुजान-तिया-तन-दीपति प्यारी।
कैसी फबी घन आनन्द चोपनि सों पहिरी चुनि साॅवरी सारी।।
प्रिय के सौन्दर्य की उपासना संयोग पर ही आधारित है। घनानंद ने इसीलिए संयोग-सुख के आनन्द से प्रफुल्लित रोम-रोम का तथा अंग-अंग से फूटते हुए हर्षोल्लास का सजीव चित्रण किया है-
ललित उमंग बेली आलबाल अंतर ते,
आनंद के घन सींचा रोम रोम हवे चढ़ी।
आगम-उमाह-चाह छायी सु उछाइ रंग,
अंग-अंग फूलनि दुकूलिन पैर कढी।।
विरहाकुलता- घनानंद प्रेम की पीर के कवि कहे जाते हैं। उनके जीवन में प्रेमी के संयोग के क्षण बहुत कम हैं, विरह की आग में ही अधिक जले हैं। इसलिए उनके काव्य का मूल स्वर विरहानुभूति है। घनानंद के प्रेम मंे जहां संयोग का हर्ष उल्लास परिलक्षित होता है, वहाँ विरह का अथाह सागर हिलौरें लेता हुआ दिखाई देता है। उन्होंने प्रेम के संयोग पक्ष की अपेक्षा वियोग पक्ष का अधिक आतुरता, तल्लीनता एवं तीव्रता के साथ वर्णन किया है। सुजान का यह विरह घनानंद के लिए वरदान सिद्ध हुआ है और घनानंद ने भी अपनी विरहाकुलता का वर्णन करके सुजान एवं सुजान के प्रेम को अमर बना दिया है। इस प्रकार घनानंद का प्रेम स्थूल नहीं, अपितु सूक्ष्म है। उसमें अश्लीलता एवं काम-वासना नहीं है, अपितु दिव्यता एवं पवित्रता है, क्योंकि घनानंद ने प्रेम के सभी पक्षों में शारीरिक सुख की अपेक्षा भावना द्वारा प्रिय का सान्निध्य पाने की आकांक्षा प्रकट की है। इसी कारण घनानंद की प्रेमानुभूति अनिर्वचनीय है, वह प्रेमी की मूक पुकार है और पूर्णतया अनुभव गम्य है।

घनानंद का वियोग वर्णन
संयोग और वियोग प्रेम के दो छोर हैं। सच्चा प्रेमी इनके बीच अपने को पाता है कभी वह संयोग सुख में अपनी अनुभूति का तरोताजा करता है तो कभी वियोग में अपने प्रेम की परीक्षा के दौर से गुजरता है। इसीलिए वियोग को प्रेम की कसौटी है। जो प्रेमी इस कसौटी पर खरा उतरता है, वहीं सच्चा प्रेमी माना जाता है। प्रेम की सात्विकता और सघनता विरह में ही दिखाई देती है, जबकि संभोग प्रेम का सुखद रूप है। संयोग से प्रेमी वासना का शिकार बना रहता है, जबकि वियोग मे वह वासना से ऊपर उठकर मानसिक स्थिति को प्राप्त कर लेता है। वियोग ही प्रेमी की दृढता का परिचायक होता है। वियोग ही उसकी निष्ठा एवं उत्कंठा का द्योतक होता है, और वियोग ही एक प्रेमी की प्रिय के प्रति उत्कट चाह, तीव्र आकांक्षा, सुदृढ लालसा एवं उद्दाम आकुलता का अनुभावक होता है। घनानंद भी ऐसे ही वियोगी कवि है, जिनके हृदय में अपनी प्रेमिका 'सुजान' की उत्कट विरह भावना भरी हुई है।
रीतिकालीन काव्य में बिना वियोग श्रृंगार के संयोग का न तो पूर्ण-रूपेण आस्वाद ही प्राप्त होता है और न उसके मूल्यों का अंकन किया जा सकता है। प्रेम की आध्यात्मिक परिणति वियोग श्रृंगार द्वारा ही सम्भव है। विरह को काव्य की कसौटी माना जाता है। विरह एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा मन शुद्ध हो जाता है, उसमें से शारीरिक वासनात्मकता समाप्त हो जाती है। प्रेम के मन से स्वार्थ भावना नष्ट हो जाती है। वियोगी कवि की भावना पहाड़ी जलप्रपात की तरह बह निकलती हें, और वही काव्य का रूप धारण कर पाठक के हृदय को स्पर्श कर उसे प्रेम की रसानुभूति कराती हैं। संयोग की मधुर स्मृतियां वियोगी के लिए बेचैन करती रहती हैं। घनानन्द का वियोग उनके हृदय की पीड़ा का प्रतिफल है, उसमें पाठक के हृदय को स्पर्श करने की शक्ति है। वह अपनी सुध-बुध खो देता है। जब पाठक घनानन्द का काव्य पढ़ता है तब उसकी इतनी विशाल हृदय-बोधक रसानुभूति कराने की क्षमता का अनुभव होता है। अपनी प्रेयसी की सुध में घनानन्द स्वयं तो खो गये, परन्तु साथ में पाठक को भी विरह की अनन्तोदधि में डूबो दिया। विरह के रस में डूबने का मजा तो घनानन्द के साथ ही मिलता है। घनानन्द के काव्य में विरह की भी कोई एक दशा नहीं है। वियोगी प्रेमी सोते, उठते-बैठते और हर समय उसका हृदय पुकार उठता है अपनी प्रेयसी को! वही बातें जो हृदय में उमड़ती-घुमड़ती रहती हैं, उनको प्रत्यक्ष रूप से अभिव्यक्त करने का अवसर जागते हुए नहीं मिलता तो उसके सोते समय 'स्वप्न' में चित्र-सा गतिमान होने लगता है। घनानन्द लिखते हैं कि चलो इस बहाने मन ही बहला लें कि-
जगि सोवनि में लगिये रहे,
चाह वहै गरराय उठै रतियां।
भरि अंक निःसक हृै भेटन कौं, 
अभिलाख अनेक भरी छतियाँ।
सलोनी स्याम-मुरति फिरै आगे।
कटाछै बान से उर आन आन लागे।।
मुकुट को लटक हिृय में आय हालै।
चितवानी बंक जियरा बीच सालै।।
घनानन्द के काव्य में विरह असीम हो गया है। इस दषा में विरहिणी कैसे अपने प्रियतम को पत्र लिख सकती है। ऐसी विरहिणी तो है नहीं जो आंसुअन की स्याही में डुबो-डुबो कर पत्र लिख डाले। वह अपनी विशेषता प्रगट करती है कि-
लिखै कैसे पियारे प्रेम पाती,
लगै अंसुअन भरी हृ हूंक छाती।
विरहणी नायिका सोचती है कि इससे तो अच्छा होता कि नायक गुणवान न होता, कम से कम विरहाग्नि में वह उसे इस प्रकार याद आकर उसके हृदय को नोंचता तो नहीं। पर क्या करे उसे याद आ ही जाती है अपने 'रावरे रूप की मोहिनी सूरत' उसके आकर्षण का कारण भी तो यही है।
रावरे रूप की रीति अनूप,
नयो नयो लागत ज्यों-ज्यों निहारिये।
नायिका बेचारी रो रही है अपने प्रेमी के गुणों व रूप स्मृति में। उसकी मुष्किल यह है कि उसके प्रेमी का रूप उसकी आँखो से ओझल नहीं होता है-
छवि को सदन, मोह मण्डित बदन चन्द
तृषनि चखन लाल! कब धौं दिखाए हों।
विरहिणी नायिका की निस्वार्थ प्रीति का उत्कर्ष यह है कि वह एक ओर तड़फ रही है, अपने प्रिय के लिए, परन्तु कोई बात नहीं, उसके मन से प्रिय के लिए दुआ ही निकलती है कि उसका प्रिय सुख व आनन्द से रहे, उसे यही कामना है। प्रेम की इस त्याग की भावना कितनी उत्कृष्ट है, कि-
धन आनन्द जीवन प्रान सुजान,
तिहारि पै बातनि लोजियै जू।
नित नीकै रहो चाटु कहाइ,
असीम हमारियौ लीजिये जू।।
वियोग श्रृंगार में इस तरह की त्याग की भावना को रीतिकाल के अन्य किसी कवि में इतने उत्कट रूप से नहीं देखा जा सकता है। उसे अपने प्रेमी के सम्मान का कितना ध्यान है, वह कृष्ण को ठगिया नहीं कहती और न उन्हें कुछ बुरा भला कहती है। विरह है तो घनानन्द की विरहिणी केवल आत्म-निवेदन करती है कि इतनी निष्ठुरता क्यों अपनाई है।
पहलै अपनाय सुजान सनेह सैं,
क्यों फिर तेह कै तोरिये।।
घनानन्द के यहाँ विरहिणी की विचित्र दशा चित्रित की गई है-
कारी कूर कोकिला कहाँ को बैर काढ़ति री,
कूक कूकि अब ही करेजौ किन कोरिली।
पैंडे परे पापी ये कलापी निस श्रोस ज्यों ही,
चातक घातक त्योंहो तू ही कान फोरिलै।
आनन्द के घन प्रान जीवन सुजान बिन,
जानि कै अकेली सब घेरौ दल जोरि लै।
जौलों कहै आवन विनोद वरसावन वे,
तौलौं रे ठरारे वजमारे घन घोरिलै।
श्री परशुराम चतुर्वेदी लिखते हैं-''घनानन्द ने विरह के महत्व को भली भांति समझा था इसी-लिए प्रेमी के विरहदग्धा हृदय तथा उसके सूक्ष्मातिसूक्ष्म एवं अनिर्वचनीय मानसिक व्यापारों का जैसा सुन्दर वर्णन अपनी कविता द्वारा उन्होंने किया है वैसा बहुत कम कवि कर पाए हैं।'' वियोग वर्णन में कवि जिन तरीको को अपनाता है, उनको जानना भी आवश्यक है और वह किस-किस तरह से अपने वियोग की भावना को अभिव्यक्त करता है। इसे भी देखा जाना चाहिए।

रूपासक्ति की प्रधानता - प्रेम का मूलाधार रूपासक्ति ही होता है। यही बात वियोग में पीड़ा को घना कर देती है। घनानंद के उत्कट विरह का मूल कारण यह है कि उनकी 'अलबेली सुजान' अनिन्द सुन्दरी थी, उसमें उन्हें अलौकिक सौन्दर्य के दर्शन हुए थे और वे उस सौन्दर्य को नित्य देखते रहना चाहते थे। कारण यह था कि वह रूप नित्य नया-नया प्रतीत होता था और उस रूप पर उन्होंने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था, परन्तु दुर्भाग्य से वह रूप उनकी आंखों से ओझल हो गया, उन्हें फिर देखने को नहीं मिला और वे अपनी पागल रीझ (मोह.प्रेम) के हाथों बिककर रात-दिन वियोग की आग में जलते रहे-
रावरे रूप की रीति अनूप नयो-नयो लागत ज्याँ-ज्याँ निहारियै।
त्यौं इन आंखिन बानि अनोखी अद्यानि कहूँ नहि आन तिहारियै।।
एक ही जीव हुतो सु तौ वार्यौ सुजान सॅकोच और सोच सहारियै।
रोकी रहे न, दहै घन आनंद बावरी रीझ के हाथनि हारियै।।
घनानन्द के प्रेम में रूपलिप्सा का योग तो है परन्तु साहचर्य का उतना व्यापक-वर्णन जितना सूर के काव्य का है, उतना इनमें नहीं मिलता। कृष्ण की लीलाओं को उतना स्थान न दिया जितना कि सूर ने दिया है और न यौवन कालीन ऋीड़ाओं को ही महत्व दिया है। घनानन्द ने कृष्ण की रूप माधुरी का वर्णन किया है, उसी मार्मिकता तन्मयता व तल्लीनता के साथ जितना अन्य कृष्ण भक्त कवियों ने किया है, यथा-
मोर चन्द्रिका सिर धरें, गरें, गुंज की माल।
धातु चित्र कटि पीत पट, मोहन मदन गुपाल।।
अति कामनीय किशोर बपु, गोपीनाथ उदार।
कमल नैन ऋीड़ा निपुन, कान्हर गोप कुमार।।
कमल केलि कीड़ा कुसल, कलानाथ रसवन्त।
गोवरधन वासी सदा, गोप-कामिनी-कंत।।
लहलहाति जीवन उदै, ब्रजमोहन अंग अंग।
महारूप सागर उमगि, उठति अमोष तरंग।
इसी प्रकार राधा के रूप सौन्दर्य का वर्णन किया है। घनानन्द की गोपियां कृष्ण की एक रूपलिप्सा पर आकर्षित हैं तथा इनकी गोपियां भी मुरली की पावन-पंचम ध्वनि को सुनते ही फड़क उठती हैं। राधा का चारुतम रूप माधुरी भी कृष्ण अपनी ओर आकृष्ट करता है और राधा कृष्ण के प्रति 'सैन नैन' चलाती हैं। राधा का रूप वर्णन करते हुए कवि कहता है, यथा-
लाजनि लपेटी चितवनि भेदभाव भरी,
लसति ललित लोल चख तिरछीन में।
छवि को सदन गोरो वदन, रूचिर माल,
रस निरचुरत मीठी मृदु मुसक्यान में।
दसन दमिक फैलि हियें मोती लाल होति,
पिय सों लड़कि प्रेम पगी बतरानि में।
आनग्द की निधि जगमगति छबीली बाल।
अंग न श्रनंग-रंग ढुरि मुरजानि में ।
हृदय की मौन पुकार की अधिकताः- घनानंद का विरह बौद्धिक नहीं है, वह उनकेहृदय की सच्ची अनुभूति है और जहां विरह बौद्धिक होता है, वहां प्रदर्शन एवं आडम्बर का आधिक्य देखा जाता है, किन्तु जहाँ हृदय की अनुभूति होती है वहां प्रदर्शन एवं आडम्बर कहाँ वहां तो हृदय की टीस, प्राणों की तडपन एवं आकुलता बाहर नहीं सुनाई पड़ती, क्योंकि हृदय बोल नहीं पाता, वह मौन रहकर हही धडकता रहता है।
अंतर-आच उसास तचै अति, अंत उसीजै उदेग की आवस।
ज्यौं कहलाय मसोसनि ऊमस क्यों हूँ कहूँ सुधरें नहीं थ्यावस।।
प्रिय-जन्य निष्ठुरताः- घनानंद के विरह की तीव्रता एवं उत्कटता का मूल कारण यह है कि उनका प्रिय बड़ा कठोर है, निर्दय है, निष्ठुर है तथा विश्वास घाती है। उनको इसकी तनिक भी परवाह नहीं है, वह इनकी दुर्दशा देखकर तनिक भी नहीं पसीजता और अब उसने जान-पहचान भी मिटा डाली है। वह निष्ठुरता एवं कठोरता का व्यवहार करके अब रात-दिन जलाता रहता है।
भए अति निठुर मिटाय पहिचानि डारी,
याही दुख हमैं जक लागी हाय हाय है।
तुम तो निपट निरदई गई भूमि सुधि,
हमैं सूल-सेलनि सो क्यों हूँ न भुलाय है।।
प्रेमगत विषयताः- घनानंद के विरह में सबसे बडी विशेषता यह है कि एकांकी है, सम नहीं है, अपितु विषम है, क्योंकि जो तडपन है, चीत्कार है, जलन है, धडकन है वह एक ओर ही- केवल प्रेमिका ही हृदय अपने प्रिय (पे्रयसी सुजान) के विरह में रात-दिन तडपता रहता है। लेकिन उनके प्रिय के हृदय में विरह की तनिक भी आग नहीं है, तनिक भी चाह नहीं हैं परन्तु प्रेमी घनानंद को इसकी चिंता नहीं है कि उनका प्रिय उनके प्रति कैसे भाव रखता है, वे तो अपने प्रिय के अनन्य प्रेमी है और उनके रोम-रोम में प्रीति बसी हुई है।
चाहौ अनचाहौ जान प्यारे पै आनन्दघन,
प्रीति रीति विषम सु रोम रोम रमी है।
उपालम्भ की तीव्रता: - घनानंद के विरह हमें उपालम्भ अत्यंत गूढता एवं गम्भीरता के साथ दृष्टिगोचर के साथ होता है। इस उपालम्भ में विरह के प्रेम की एक निष्ठा भरी हुई है, उत्कटता भरी हुई है और प्रिय के प्रेम की उदासीनता भी भरी हुई है। इसीलिए इन उपालम्भों मंे विरही ने स्वयं को अत्यंत दीन, हीन, दुखी, विनम्र एवं अनन्य प्रेमी कहा है तथा अपने प्रिय को कपटी, विश्वासघाती, छली, निर्मोही, सभी प्रकार के सुख सम्पन्न एवं प्रेम रहित कहा है। अपने प्रेम को इसी अन्यनता एवं एक निष्ठा तथा प्रिय की उदासीनता एवं कपट व्यवहारपूर्ण कठोरता पर उपालम्भ देते हुए लिखा है-
अति सूधो सनेह को मारग है जहाँ नेक सयानप बाक नहीं।
तहाॅ साॅचे चलै तजि आतुनपौ झॅझके कपटी जे निसाक नहीं।।
अंग प्रत्यंग की आकुलताः-घनानंद के विरह में आंख,कान, हृदय, प्राण आदि अंग प्रत्यंगों की अत्यधिक आकुलता, बेचैनी एवं दयनीय स्थिति का चित्रण हुआ है। इसका कारण है, कि विरही घनानंद के सारे शरीर में विरह का विष फैला हुआ है, अंग प्रत्यंग में विरह की आग लगी हुई है, जिससे उनके प्राण नित्य दहकते रहते हैं, नेत्र मदमाते होकर आंसू बहाते रहते हैं।
जिनकों नित नीकें निहारति ही आंखिया अब रोवति हैं।
पल-पाॅवडे पायनि सौं अंसुबानि की धारनि धोवति हैं।।
प्रकृति जन्य उद्दीपनः- घनानंद को विरह वेदना की तीव्र से तीव्रतम बनाने में प्रकृति का भी अत्यधिक हाथ रहा है। कारण यह कि प्रकृति के ये उपादान विरही के ऊपर कहर ढाने का काम करते हैं। कभी पुरवैया हवा चलकर, तो कभी बादल घिरकर, कभी बिजली चमकरक, तो कभी पुष्प अपनी सुगंध से, तो कभी कोकिला कूक कर, बिचारे विरही को रात-दिन सताते है-
कारी कूर कोकिल! कहां कौ बैर काढति री,
कूकि कूकि अबही करेजो किन कोरि ले।
संदेश-प्रेषणीयताः-घनानंद के विरह में एक सबसे बड़ी विशेषता यह भी है कि इसमें विरही अपने विरह के संदेश को बडे अनूठे ढंग से अपने प्रिय के पास भेजती है। उसने इस दूत कार्य के लिए ऐसे धीर गंभीर विरही को चुना है, जो उसी की तरह विरह की आग को अपने हृदय में छिपाये हुए हैं, जो उसी की तरह प्रिय के वियोग में मदमत होकर धुमता रहता है, जो दुसरों के लिए ही अपना शरीर धारण किए हुए है और जो दूसरों के के लिए ही उत्पन्न होने के कारण परजन्य (बादल) कहलाता है। एसे धीर गंभीर सज्जन से दूत कार्य कराना सर्वथा उचित ही है, क्योंकि वह समुद्र के खाने पानी को भी अमृत तुल्य बना देता है और सबको जीवनदान देता है।
पर काजहिं देह को धारि फिरों परजन्य जथारथ है दर सौ।
नीधि-नीर सुधा के समान करौ सबही विधि सज्जनता सरसौ।
घनआनन्द जीवन दायक है कुछ मेरीयों पीर हियै परसौ।
कबहू वा विसासी सुजान के आगन मो असुवानि हुलै वरसौ।।
सात्विकता एवं आध्यात्मिकता:-घनानंद के विरह में अन्तिम और सबसे बडी विशेषता यह है कि उसमें तनिक भी वासना की गंध नही है, कहीं भी अश्लीलता नही है, किसी भी स्थल पर कामकता नहीं है और कोई भी उक्ति कामपरक नही है। यहां प्रत्येक पर में सात्विकता है, प्रत्येक पद प्रेम की पवित्रता है, प्रत्येक छंद में प्रेम की दिव्यता है और प्रत्येक उक्ति में काम-जन्य वासना से सर्वथा परे आध्यात्मिक वंदना की शुद्धता है।
लहा छेह कहाधौं मचाय रहे ब्रजमोहन हौ उत नींद भरे हौ।
मिली होति न भैंट दूरे उधरौ ठहरै ठहरानि क लाभ परे हौ।।
घनाआंनद छाय रहौ नित हो हित प्यासनि चातक ज्ञात परे हौ।।
घनानंद की विरहानुभूति में शुद्ध एवं सात्विक विरह की व्यंजना की हुई है, इसमें हृदय की गहराई अधिक है। अपनी यथार्थता, सात्विकता, पवित्रता एवं आध्यात्मिकता के कारण ही घनानंद की विरहानुभूति सर्वोत्कृष्ट है और अपनी इसी सात्विक विरह-भावना के कारणर घनानंद हिन्दी के सर्वोत्कष्ट विरही कवि है।

घनानंद का अनुभूति पक्ष या भावपक्ष
घनानंद की अनुभूति पक्ष या भावपक्ष का समयक् अनुशीलन करने के लिए उनके काव्य में भी यह देखते की चेष्टा की जाएगी कि घनानंद ने विविध वस्तुओं के वर्णन कैसे किये है, विविध भागों के निरूपण में कैसा कौशल दिखाया ही, विविध रखों की अभिव्यंजना में कैसी दक्षता प्रकट की है और विविध सौन्दर्य चित्रों को अंकित करने में अपनी जो कला-चातुरी व्यक्त की है, उसे निम्न भागों विभक्त किया गया है-
वस्तु वर्णन -घनानंद ने ब्रज प्रदेश के प्रति अपनी गहन आस्था एवं असीम श्रद्धा व्यक्त की है और इसी कारण उन्होने ब्रज के गांवों, यमुना, वृन्दावन आदि का अत्यंत सजीवता से निरूपण किया है।
जमुना तीर गांव राजनि। कहा कहौं गोकुल-छवि-छाजनि।।
गोकुल -छवि आखिनि हीं भावै। रही न सकै रस न कछु गावै।।
इसी तरह ब्रज के अन्य स्थानों का वर्णन करते हुए घनानंद ने सर्वाधिक वृन्दावन की मंजुल छवि का निरूपण किया है।
वृन्दावन छवि कहत न आवै। सौ कैसे कहि कोऊ गावै।।
तीर भूमि बनि रह्यौ सदावन। जै जमुना जै जै वृन्दावन।।
इसी प्रकार घनानंद ने ब्रज के घर, गांव, गली, गलियारे, घाट, पनघट, गापे, गौप, ग्वाल - बाल, गाय, वृन्दावन, बरसाना, गोवर्धन आदि का अत्यंत विस्तृत वर्णन किया है।प्रकृति चित्रण:- घनानंद ने प्रकृति के अत्यंत रमणीय चित्र अंकित किये हैं। वे सच्चे प्रकृति पे्रमी थे और प्रकृति के साथ उनका साहचर्य भी अधिक रहा था। इसीलिए उन्होंने प्रकृति के अनेक सुन्दर एवं सजीव चित्र अंकित किये हैं।
घुमड़ि पराग लता-तरु भोए। मधुरितु-सौंज-समोए।।
वन बसंत वरनत मन फूल्यौ। लता-लता झूलनि संग झूल्यो।।
प्रकृति के आलंबन रूप की अपेक्षा घनानंद ने प्रकृति के उद्दीपन रूप का चित्रण अधिक सरसता एवं मार्मिकता के साथ किया है, क्योंकि घनानंद का काव्य विरह प्रधान है और विरह में प्रकृति प्रायः विरही जानों के भावों को उद्दीप्त करती हुई दिखाई जाती है।
लहकि लहकि आवै ज्यौं पुरवाई पौन,
दहकि दहकि त्यौं त्यौं तन तांवरे तवै।
बहकि बहकि जात बदरा बिलोकें हियौ,
गहकि गहकि गहबरनि गरै मचै।
चहकि चहकि डारै चपला चखनि चाहैं,
कैसे घन आनन्द सुजान बिन ज्यौं बचे।
भाव निरूपण - घनानंद की कविता भावों का भण्डार है, क्योंकि घनानंद ने ऐसे मार्मिक भावों का चित्रण किया है कि देखते ही बनता है और एक साधारण कवि जहां तक पहुॅच नहीं सकता। धनानंद की इस भाव निरूपण पद्धति पर सर्वत्र उनके गहन प्रेम की छाप है इसी कारण उनके सभी भाव चित्र इतने मनोंरजक एवं आकर्षक बन पडे हैं कि पाठकों एवं श्रोताओं के हृदय उन्हें पढ़कर एवं सुनकर आनंद के सागर में डुबकियां लगाने लगते हैं।
नैन कहैं सुनि रे मन! कान दै क्यों इतनी गुन मोहि दयौ है।
सुन्दर प्यारे सुजान कौ मन्दिर बाबरे तू हम ही ते भयौ है।।
लोभी तिन्हें तन कों न दिखावत ऐसो महामद छाकि गयौ है।
कीजिए जू घन आनंद आय कै पायै परौ यह न्याय नयौ है।।
इसी तरह घनानंद ने उपालम्भ के द्वारा 'स्मृति' का चित्र अंकित करते हुए आवेग, अमर्ष, उग्रता, ग्लानि आदि भावों का बडा ही मार्मिक निरूपण किया है-
क्यों हंसि हेरि हर्यो हियरा अरू क्यों हित कै चित्त चाह बढाई।
काहे को बोलि सुधासने बैननि चैननि मैन-निसैन चढाई।।
सो सुधि मोहिय मैं घन आनन्द सालति क्यों हूॅ कढै न कढाई।
मीत सुजान अनीत की पाटी इतै पै न जानियै कौने पढाई।।
रस निरूपण -घनानंद ने मुख्यतया संयोग श्रृंगार, वियोग श्रृंगार एवं भक्ति का निरूपण किया है। इसमें से भी घनानंद वियोग श्रृंगार के ही कवि है, वियोग के ही अद्वितीय चितेरे हैं। और इनके काव्य में वियोग श्रृंगार का ही पूर्ण परिपाक अधिक मार्मिकता एवं सजीवता के साथ हुआ है। इसीलिए वे अपनी संजीवन-मूर्ति 'सुजान' के वियोग में रात-दिन व्यथित रहते हैं। सोने पर भी सो नहीं पाते, जागने पर भी जाग नहीं पाते, विचित्र सी पीड़ा नित्य आॅखों में रह रहकर आती है, अमृत विष तुल्य प्रतित होता है। फूल शूल जैसे लगते हैं, चन्द्रमा अंधकार उगलता जान पडता है, पानी सम्पूर्ण अंगों को जलाता है, राग-रागनियां अच्छी नहीं लगती गुण दोष में बदल गये हैं, औषधियां रोग पैदा करने वाली हो गयी हैं और रस विरस जान पड़तें हं। इस तरह 'सुजान' के मान फेर लेने से दिन भी फिर गये है। और न जाने अब कैसे दिन बीतेंगें। घनानंद ने इस व्यथा एवं पीड़ा का मार्मिक निरूपण किया है।
सुधा तें स्त्रवत विष, फूल में जगत सूल,
तम उगिलत चंदा, भई नई रीति है।
जल जारै अंग, और राग कर सुर भंग,
संपति विपति पारै, बडी विपरीत है।।
सहागुन गहै दोषैं, औषधि हूॅ रोग पोषै,
ऐसे जान रस माहि बिरस अनीति है।
दिनन को फेर मोहिं तुम मन फेरि डार्यो,
एहो घनाआनंद! न जानौं कैसे बीति है।। 
सौन्दर्य चित्रण - घनानंद ने रूप सौन्दर्य के कितने ही अत्यंत मनोहारी चित्र अंकित किये है, जिनमें अपनी प्राणप्रिया सुजान' की विविध रूप छवियाॅ अत्यंत माधुर्य एवं गम्भीर्य के साथ विद्यमान है। घनानंद ने इन रूप-चित्रों में आॅख, नाक, कान, मुख, अंग-प्रत्यंग आदि को अलग-अलग दिखाने की उतनी प्रवृत्ति नहीं दिखाई देती, जितनी कि उन्होने सम्पूर्ण अंग की अतिशय रमणीयता एवं प्रभाविष्णुता को दिखाने का प्रयास किया है। घनानंद के इन सौन्दर्य-चित्रों में सुजान का रूप, उसका लावण्य, उसकी छवि, उसकी कान्ति, उसकी अंग-दीप्ति आदि मानों साकार हो उठी है-
स्याम घटा लपटी थिर बीज कि सोहै अमाावस-अंग उज्यारी।
धूम के पुंज मैं ज्वाल की माल सी पै दृग सीतलता-सुखकारी।।
कै छवि छायौं सिंगार निहारि सुजान-तिया-तनं-दिपति प्यारी।
कैसी फवी घन आनन्द चोपानि सौ पहिरी चुनि साॅवरी सारी।।
इसी प्रकार घनानंद ने अंग-अंग में द्युति की तरंग उठने वाले पार्थिव रूप-सौन्दर्य को बडी तन्मयता एवं तत्परता के साथ शब्दों में डालकर अंकित किया है। 

घनानंद का अभिव्यक्ति पक्ष या कला पक्ष
किसी कवि के अभिव्यक्ति पक्ष से तात्पर्य उसकी उस वर्णन पद्धति से है, जिसमें वह अपनी अनुभूति को अभिव्यक्त करता है। इसके लिए वह अनेक उपकरणों का सहारा लेता है और इन उपकरणों द्वारा कलात्मक ढंग से अपनी अनुभूति को वाणी प्रदान करता है। इसलिए अभिव्यक्ति पक्ष को कला पक्ष भी कहते हैं और इसके अन्तर्गत कला के वे सभी उपकरण आते हैं, जिनके माध्यम से अनुभूति को अभिव्यक्ति प्रदान की जाती है, अर्थात भाष, अलंकार, गुण, वृत्ति, शब्द शक्ति, छन्द आदि कला को सम्पूर्ण अवयवों का विवेचन अभिव्यक्ति पक्ष के अन्तर्गत होता है।
भाषा - घनानंद ने ब्रजभाषा में अपनी सरस काव्य-धारा प्रवाहित की है। उनकी ब्रजभाषा में सर्वत्र स्वच्छता, एकरूपता एवं सुघडता के दर्शन होते हैं। घनानंद ब्रजभाषा के अत्यंत प्रवीण कवि थे। इसी कारण उनकी भाषा के अनुकूल चलने की अपूर्व शक्ति दिर्खाइ देती है, वह नई-नई भंगिमाओं के द्वारा भावों को प्रस्तुत करने में बड़ी निपुण जान पडती है और उसका रचना-कौशल कारीगरी तथा रूप-विधान सभी कुछ असाधारण एवं अद्वितीय जान पड़ता है। घनानंद का भाषा पर इतना अधिक अधिकार दिखई पडता है कि वह कवि की वशवर्तिनी होकर उनके इशारे पर नाचती है, उनके कहने पर चलती है, उनके आदेश पर कार्य करती है। ऐसा जान पड़ता है कि घनानंद ब्रजभाषा की नाडी पहचानते थे, उसके निश्चित प्रयोगों को जानते थे और उसकी नस-नस से परिचित थे। इसी प्रकार घनानंद ने बडी स्वच्छता और सुन्दरता के साथ ब्रजभाषा का प्रयोग किया है, उसके एक-एक शब्द की स्थापना की है और उसे अपने अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति के लिए गति प्रदान की है। ब्रजभाषा पर ऐसा साधारण अधिकार अन्य किसी हिन्दी कवि का दिखाई नहीं देता। घनानंद की भाषा साफ-सुथरी और अत्यंत निखरी है तथा उसमें भावों के निरूपण की अनन्त शक्ति भरी हुई है।
शब्द शक्ति - शब्द की तीन शक्तियाॅ होती है- अभिधा, लक्षण और व्यंजना। जिनमें ये शक्तियाॅ होती है, वे शब्द भी तीन प्रकार के होते हैं-वाचक, लक्षक और व्यंजक शब्दों एवं लक्ष्यार्थ एवं व्यंग्यार्थ की प्रधानता है। घनानंद ने सबसे अधिक उक्ति-वैचित्रय का सहारा लिया है। इसलिए इनके काव्य में अभिधा की अपेक्षा एवं व्यंजना लक्षण-प्रधान माना जाता है। कविवर घनानंद ने उक्ति-चमत्कार के लिए, भावों को गहन बनाने के लिए तथा सरसता उत्पन्न करने के लिए ही लाक्षणिक प्रयोगों को अधिक अपनाया है।
अलंकार - काव्य में अलंकारों का प्रयोग भी कथन में चारूता एवं भव्यता लाने के लिए होता है। इसीलिए अलंकारों को कथन की प्रणाली बतलाया गया है, भावों की तीव्रता करने वाली योजना कहा गया है और वस्तुओं के रूप, गुण एवं क्रिया को अधिक तीव्र गति से अनुभव कराने वाली युक्ति बतलाया गया है। निस्संदेह अलंकारों के दो ही कार्य होते हैं- एक तो वे भावों का उत्कर्ष दिखाया करते हैं और दूसरे वे वस्तुओं के रूपानुभव गुणानुभव और क्रियानुभव को तीव्रता प्रदान करते हैं। घनानंद के काव्य में जहाॅ रस और भावों मा अधिक्य है वहाॅ अलंकारों ने उन्हें और भी अधिक सजीवता एवं प्रभविष्णुता (दुसरों पर प्रभाव डालन वाला) प्रदान की है। घनांनद ने दोनों प्रकार के अलंकार अपनायें हैं, यहाॅ शब्दालंकार भी है और अर्थालंकार भी। 
गुण -काव्य के तीन प्रमुख गुण माने गये हैं- माधुर्य, ओज और प्रसाद। माधुर्य गुण अन्तःकरण को आनंद सेदवीभूत करने वाला होता है, ओज गुण चित्त में स्फुर्ति उत्पन्न करने वाला होता है और प्रसाद गुण श्रवण मात्र से काव्य की शीघ्र अर्थ-प्रतीति कराने वाला होता है। साहित्य शास्त्रियों ने अलंकारों के बिना भी काव्य रचना हो सकती है, किन्तु गुणों के बिना काव्य रचना नहीं होती। यदि कोई काव्य बिना किसी गुण के रचा भी जाता है तो वह नीर्जीव नीरस एवं निरर्थक होता हैं। घनानंद के काव्य में सर्वत्र माधुर्य गुण की प्रधानता है क्योंकि माधुर्य गुण की अनुभूति गुण की अनुभूति सर्वाधिक विपलम्भ श्रृंगार अथवा विरह-निरूपण मं होती है और घनानंद ने सबसे अधिक विरह का ही वर्णन किया है।
रैन दिना धुटिबौ करें प्रान झरैं अखियाॅ झरना सो।
प्रीतम की सुधि अन्तर मैं कसकै सखी ज्यौ पॅसरीन में गाॅसी।। 
छंद -काव्य का छंद से नित्य सम्बन्ध तो नहीं हैं क्योंकि बिना छंद-बंध के भी काव्य रचना होती है, किन्तु छन्द से काव्य में एक ऐसी प्रभविष्णुता आ जाती है, जिससे काव्य पाठकों एवं श्रोताओं के हृदय में उतरता चला जाता है और उनका कंठहार बन जाता है। घनानंद का सारा काव्य छंद की रस-माधुरी से ओतप्रोत है, उसमें प्राणों का संगीत भरा हुआ है। और वह कवि की हृदय-वीणा के तारों की मधुर झंकार से झंकृत है। घनानंद की छन्द रचना पर विचार करने से ज्ञात होता है कि घनानंद ने विविध प्रकार के छन्दों का प्रयोग किया है। जैसे-सवैया, कवित्त, त्रिलोकी, ताटंक, निसाती, सुमेरू, शोभन, त्रिभंगी, दोहा, चैपाई तथा घनाक्षरी पद। इनमें से घनानंद ने मुख्यतया सवैया एवं कवित्त छन्दों का प्रयोग अत्यंत प्रभावशाली ढंग से किया है। घनानंद केसर्वथा तो हिन्दी जगत में सर्वाधिक प्रसिद्ध है और उन्हें सर्वथा छंद का सिरताज कहना सवैया समीचीन ज्ञात होता है। इस प्रकार घनानंद की कविता विविध प्रकार के कलात्मक सौन्दर्य से ओतप्रोत है उसमें जितनी अनुभूति है, उतनी ही गहन अभिव्यक्ति भी है।

रीतिमुक्त स्वच्छंद काव्यधारा में घनानंद का स्थान
हिन्दी की सम्पूर्ण स्वच्छंद प्रेम काव्यधारा का अनुशीलन करने पर ज्ञात होता है किइस धारा के प्रमुख कवियो में से रसखान, आलम, घनानंद, ठाकुर और बोधा के नाम उल्लेखनीय है। ये सभी कवि प्रेम काव्य के प्रमुखप्रणेता है और इन्होने स्वच्छंदता के साथ प्रेमानुभूति का बडा ही मर्मस्पर्शी वर्णन किया है, परन्तु इनमें से घनानंद सर्वश्रेष्ठ कवि है, क्योंकि घनानंद के काव्य में रसखान की सी प्रेम की अनिर्वचनीयता भी हैं, परन्तु इन सबसे बढ़कर घनानंद में कुछ ऐसे असाधरण काव्य सौष्ठव के दर्शन होते हैं, जो न रसखान में है, न आलम में हैं, न ठाकुर में है और न बोध मेही है। घनानंद ने 'सुजान' केा आलम्बन बनाकर अपनी इस लौकिक प्रेयसी के रूप-सौन्दर्य का इतना मार्मिक एवं मनोरंजक वर्णन किया है कि देखते ही बनता है। सुजान की तिरछी चितवन, धुमते कटाक्ष, रसिली हॅसी, मृदु-मुस्कान, अरूण होठ कान्तिमंडित दंतावलि, सचिवकण, केशराशि, वक्रिम भौंहें, विशाल नैत्र, गर्वीली मुदा, उन्तम यौवन आदि परमुग्ध घनानंद ने उसकी रूप निकाई के अनेक संश्लिष्टप्त चित्र अंकित करते हुए जहाॅ अपनी प्रेम-विभोरता का परिचय दिया है, वहाॅ मुहम्मद शाह रंगीले दरबार की इस नर्तकी के प्रति अपना ऐसा प्रणय-निवेदन किया है, जो हिन्दी काव्यकी स्थायी सम्पत्ति बन गया है। घनानंद की श्रेष्ठता का सबसे बडा करण यह है कि घनानंद के हृदय में सुजान के प्रति उत्कृष्ट प्रेम एवं असीम व्यामोह भरा हुआ था, उनके मन में सुजान की अक्षय रूप राशि समाई हुई थी। इसीलिए घनानंद का काव्य प्रेम की गूढता से भरा हुआ था, उनके मन मं सुजान की अक्षय रूप राशि समाई थी। इसीलिए घनानंद का काव्य प्रेम की गूढता से भरा हुआ है, अतृप्ति की अनंतता से भरा हुआ है, अन्तद्र्वद्व की अलौकिकता से भरा हुआ है, वेदना की अक्षयता से भरा हुआ हैं और तीव्रानुभूति की अखंडता से भरा हुआ है, क्योंकि घनानंद का सा उक्ति वैचित्रय और कोई कवि दिखा नहीं सका है, उनकी सी लाक्षाणिक मूर्तिमत्ता किसी की भी रचना में दृष्टिगोचर नहीं होती और उनका सा प्रयोग वैचित्रय कहीं ढँढने पर भी नहीं मिलता है। निःसंदेह वे पे्रमके जितने धनी थे, उतने ही भाषा के भी धनी थे और उतने ही अभिव्यंजना के भी धनी थे। इसी कारण हिन्दी काव्य की रीतिमुक्त स्वछंद प्रेमधारा में घनानंद का शीर्षस्थ स्थान है।


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1 टिप्पणी:

Unknown ने कहा…

Ghananand ke Kavya soasta v
par Prakash daliy