राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 6 प्रमुख उत्सव



राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक देशव्यापी सामाजिक, सांस्कृतिक संगठन है। देशभर में सभी राज्यों के सभी जिलों में 58967 हजार से शाखाओं के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य चल रहा है। प्रत्येक समाज में देशभक्त, अनुशासित, चरित्रवान और निस्वार्थ भाव से काम करने वाले लोगों की आवश्यकता रहती है। ऐसे लोगों को तैयार करने का, उनको संगठित करने का काम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ करता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समाज में एक संगठन न बनकर सम्पूर्ण समाज को ही संगठित करने का प्रयास करता है।

Rashtriya Swayamsevak Sangh

हमारे सामाजिक जीवन में अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं राष्ट्रीय महत्व के प्रसंगों से हमारा समाज अनुप्राणित होता है। प. पू. डाॅक्टर जी ने समाज में जिन गुणों की आवश्यकता अनुभव की उन्ही के अनुरूप उत्सवों की योजना की। प्रत्येक उत्सव किसी विशेष गुण की ओर इंगित करता है। यथा गुरु पूर्णिमा आत्म निवेदन एवं समर्पण भाव, रक्षाबन्धन के द्वारा समरसता एवं समानता का प्रकटीकरण, विजयदशमी, वर्ष प्रतिपदा एवं हिन्दु साम्राज्य दिवस के द्वारा विजीगीषु वृत्ति, पुरूषार्थ, राष्ट्रभाव एवं आत्म गौरव वृत्ति जागरण, पराभूत मानसिकता में परिवर्तन एवं मकर संक्रान्ति द्वारा सही दिशा में सम्यक क्रांति एवं संगठन का भाव निर्माण करना। उत्सवों के माध्यम से आत्म केन्द्रित स्वभाव बदलकर सामाजिक बोध का जागरण करना है।

उत्सवों के माध्यम से कार्यकर्ताओं को पास से देखने व समझने का मौका मिलता है। वह समाज में एक अच्छा संदेश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर जाता है, जिससे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में नये व्यक्तियों को संगठन से जोड़ने का स्वर्णिम अवसर मिल जाता है। उत्सव को मनाने के लिए, सादगी ढंग से तैयारी की जाती है। सभी स्वयंसेवकों की भी उचित व्यवस्था की जाती है। समाज को ही संगठित करने का प्रयास में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में छः उत्सव प्रमुख रूप में वर्ष प्रतिपदा, हिन्दु साम्राज्य दिवस, श्री गुरु पूर्णिमा, रक्षाबन्धन, विजया दशमी और मकर संक्रान्ति पर्व मनाये जाते हैंः-

1. वर्ष प्रतिपदा - चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ‘भारतीय काल गणना’ का प्रथम दिन अर्थात् नववर्ष का प्रथम दिन होता है। इसी दिन से नवरात्रे प्रारम्भ होते हैं, स्वामी दयानन्द द्वारा आर्य समाज की स्थापना हुई। विक्रमादित्य द्वारा शकों पर पूर्ण विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में विक्रमी सम्वत् प्रारम्भ हुआ था। वर्ष प्रतिपदा के ही दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डाॅ. केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म हुआ था। स्वयंसेवकों के लिए यह दिन और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है। इस दिन स्वयंसेवक ध्वज लगाने से पूर्व आद्य सरसंघचालक को प्रमाण करते हैं। इस दिन गणवेश व समय का ध्यान रखना स्वयंसेवक के लिए अपेक्षित है। इसी दिन सभी नागरिकों के द्वारा मिलकर नववर्ष भी मनाया जाता है तथा कार्यक्रम कराये जाते हैं।

2. हिन्दु साम्राज्य दिवस - ज्येष्ट शुक्ल त्रयोदशी विक्रमी संवत् 1731 (1674 ई.) के दिन छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक तथा हिन्दु पद पादशाही की स्थापना हुई, जिसने ‘हिन्दु राज्य’ नहीं बन सकता, इस हीन भाव को दूर किया। छत्रपति शिवाजी महाराज ने सीमित साधनों से ही सिद्ध किया कि हिन्दू सभी दृष्टि से श्रेष्ठ, स्वतंत्र व स्वयं शासक बनने योग्य है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का यह उत्सव मनाने के पीछे उद्देश्य भी यही है कि हमारे अन्दर की शक्ति निकालकर शिवाजी की तरह दिखाना की तुम भी योग्य शासक बन सकते हो।

3. श्री गुरु पूर्णिमा - यह उत्सव आषाढ़ पूर्णिमा को मनाया जाता है। व्यास महर्षि ने हमारे राष्ट्र जीवन के श्रेष्ठतम गुणों को निर्धारित करते हुए, उनके महान् आदर्शों को हमे दिखाया है। इस तरह वेद व्यास जगत गुरु हैं। उसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी अपना एक गुरु भगवा ध्वज को बनाया है, जो हमें देश के प्रति समर्पण भाव को जगाता है और इसी दिन स्वयंसेवक गुरु दक्षिण के रूप में भेंट भी देते हैं, जिससे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य सुचारू रूप से चलता है।

4. रक्षाबंधन - श्रावण की पूर्णिमा को यह उत्सव मनाया जाता है। इस दिन को समाज में जाति का भेद मिटाकर समानता, समरसता युक्त समाज का स्वरूप खड़ा करने का प्रयास किया जाता है। रक्षाबंधन का त्योहार जहाँ भाई-बहन की रक्षा करता है, यह कथा है। वही स्कन्द पुराण में यह भी लिखा है कि- ‘‘राजाओं एवं अन्य बन्धु-बन्धवों तथा यजमानों के हाथ में शुद्ध स्वर्णिम सूत्र बांधते हुए शुभ कामनाएँ करते थे।’’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी परम वंदनीय भगवा ध्वज को रक्षा-सूत्र बांध कर संकल्प करते हैं कि इस ध्वज की रक्षा का भार हम पर है। जिस समाज, राष्ट्र व संस्कृति का यह पवित्र ध्वज प्रतीक है, हम उसकी रक्षा करेंगे। यह समाज का परस्परावलंबी व अन्योन्याश्रित न्याय का पर्व है। आज के दिन सभी स्वयंसेवक एक-दूसरे को व बस्तियों में जाकर लोगों को राखी बांधते हैं और उनकी रक्षा करने का संकल्प करते हैं।

5. विजयादशमी - आश्विन शुक्ल दशमी को यह दिन मनाया जाता है। यह दिन भी स्वयंसेवक के लिए बहुत महत्व का है। क्योंकि आज के ही दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की गई थी। यह दिन शक्ति की उपासना के लिए भी मनाया जाता है। आज के दिन राम ने सामान्य लोगों को संगठित कर, अत्याचारी व साधन सम्पन्न रावण पर विजय प्राप्त की। विजय की आकांक्षा को जगाना ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य है। स्वयंसेवकों के गणवेश में कार्यक्रम व पथ संचलन भी किया जाता है। इसके माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शक्ति तथा अनुशासन का प्रदर्शन होता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक भी संगठित होकर इस देश की समस्याओं को हल करेंगे।

6. मकर संक्रान्ति - यह उत्सव चन्द्रमास गणना के अनुसार लेकिन यह उत्सव सौर मास गणना के अनुसार माघ 1 सौर मास सामान्यतः 14 जनवरी को होता है। इसी दिन सूर्य मकर राशि में संक्रमण कर दक्षिणायन से उत्तरायण में प्रवेश करता है, जिसके कारण दिन बड़े होने शुरू हो जाते हैं। एक सकारात्मक परिवर्तन होता है। इस दिन खिचड़ी बनाई जाती है, जिसमें सामूहिक दालों का मेल होता है। उसी तरह हमारे समाज में भी भिन्नता होते हुए एकता है उसी का भाव जगाना है। गुड़, तिल का मिश्रण भी बनाया जाता है, जिससे गुड़ में सबको चिपकाने की शक्ति यानि समाहित की उसी तरह हमे भी सभी को एक साथ लेकर चलना है। तिल की तरह स्नेह दिखाना। यह उत्सव हमें समाज में समरसता व समाज में सशक्तिकरण की भावना को बढ़ाता है।

इस प्रकार उत्सव के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में कार्यक्रमों की व्यवस्था बनी रहती है। जिससे लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ते हैं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य को अपना ध्येय मानकर करते हैं। वह हिन्दू संस्कृति की रक्षा करते हैं।



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