श्रीराम जन्मभूमि का न्यायायिक पहलू



 श्रीराम जन्म भूमि प्रस्तावित मंदिर
वैसे तो सम्पूर्ण अयोध्या नगरी मन्दिरों की ही नगरी है, हजारों मन्दिर हैं, लगभग सभी मन्दिर प्रभु राम को समर्पित हैं या भगवान राम की जीवनलीलाओं से जुड़े हुए हैं। अयोध्या में एक रामकोट नामक मोहल्ला है जिसमें चारदीवारी (Boundary wall) से घिरा एक स्थान था, जो उत्तर दक्षिण दिशा में लगभग 130 फीट लम्बा तथा पूरब पश्चिम दिशा में 90 फीट चैड़ा था। इस परिसर में चारदीवारी के अन्दर ही उत्तर दक्षिण दिशा में लगभग बीचोबीच में एक दीवार थी। इस दीवार में एक लोहे का दरवाजा लगा रहता था। दरवाजे पर ताला भी लगा रहता था, जो परिसर को दो भागों में बांट देती थी। दीवार के पश्चिम वाला भाग भीतरी आंगन (Inner courtyard) तथा दीवार के पूरब वाला भाग बाहरी आंगन (Outer courtyard) कहलाता था। भीतरी आंगन में तीन गुम्बदों वाला एक ढांचा था, जो दूर से देखने पर मस्जिद जैसा लगता था। मुस्लिम समाज इसी ढांचे को बाबरी मस्जिद कहता था, इसके विपरीत हिन्दू समाज इस सम्पूर्ण परिसर को भगवान राम की जन्मभूमि मानता था। मस्जिद जैसा दिखने वाले इस ढांचे के साथ अजान देने के लिए कोई मीनार तथा हाथ-पैर साफ करने अर्थात वजू करने के लिए पानी का कोई प्रबन्ध नहीं था। परिसर के बाहरी आंगन में एक छोटा सा चबुतरा था, जो संभवतः 20 फीट लम्बा और 15 फीट चैड़ा था तथा 5 फीट ऊँचा था। इस पर भगवान राम का विग्रह रखा रहता था। हिन्दू समाज इसकी पूजा करता था। यह चबुतरा 'रामचबुतरा' कहलाता था। भगवान के विग्रह की हवा, वर्षा, धूप आदि से रक्षा के लिए इस पर एक छप्पर या टीन की झोपड़ीनुमा छाया रहती थी। इस रामचबुतरे पर किसी को कोई आपत्ति नहीं थी और ऐसा कहते हैं कि यह अकबर के शासनकाल से चला आ रहा है। समस्त विवाद तीन गुम्बदों वाले ढांचे पर था। हिन्दू मानता था कि यह सम्पूर्ण परिसर भगवान राम की जन्मभूमि है, यहाँ कभी एक बड़ा मन्दिर था, जिसे 1528 ई0 में मुस्लिम आक्रमणकारी बाबर के आदेश से उसके सेनापति मीरबाकी ने तोड़ा और उसी के मलबे का प्रयोग करके मस्जिद जैसा दिखने वाला यह ढांचा बनाया। हिन्दू समाज का प्रतिकार बहुत जबरदस्त था, इसी कारण वहाँ मीनार व वजू करने का स्थान नहीं बनाया जा सका। इस भीतरी आंगन वाले परिसर को प्राप्त करने के लिए हिन्दू निरन्तर लड़ता रहा।
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1947 ई0 में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात अयोध्या के वैरागी साधुओं और जनता में इस स्थान को प्राप्त करने की ललक और बढ़ गई। दिनांक 22 दिसम्बर, 1949 की अर्ध रात्रि में 50-60 युवकों और साधुओं की टोली रामचबुतरे और ढांचे के बीच की दीवार को फांद कर भीतरी आंगन में घुस गए और तीन गुम्बदों वाले ढाँचे के बीच वाले गुम्बद में भगवान का विग्रह रखकर कीर्तन करने लगे। अयोध्या में शोर मच गया कि जन्मभूमि में रात को भगवान प्रकट हो गए हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस के एक सिपाही माता प्रसाद की मौखिक सूचना के आधार पर 23 दिसम्बर, 1949 की प्रातःकाल अयोध्या पुलिस स्टेशन में रात्रि को घटी इस घटना की FIR (प्रथम सूचना रपट) लिखाई गई। यह जानना महत्वपूर्ण है कि अयोध्या का कोई भी स्थानीय मुस्लिम थाने में अपनी आपत्ति/शिकायत/एफ. आई. आर. लिखाने नहीं पहुँचा। उस समय फैजाबाद के जिलाधिकारी श्री के. के. नायर (आई.सी.एस., मूल केरल निवासी) थे।
अयोध्या श्री राम जन्मभूमि बाबरी ढांचा


भगवान के प्राकट्य के बाद अयोध्या-फैजाबाद के अतिरिक्त सिटी मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) श्री मार्कण्डेय सिंह ने स्वयं प्रेरणा से (Suo-moto)भीतरी आंगन वाले परिसर को 29 दिसम्बर, 1949 को अपने एक आदेश द्वारा अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 145 के अन्तर्गत कुर्क कर लिया। परन्तु अपने आदेश में किसी हिन्दू या मुसलमान का नामोेल्लेख नहीं किया अपितु लिखा कि अयोध्या के मोहल्ला रामकोट में बाबरी मस्जिद/राम जन्मभूमि में पूजा तथा मालिकाना हक पर विवाद है। यह विषय अत्यन्त नाजुक और गम्भीर है अतः मैं विवाद के निपटारे तक इस भवन के कुर्की के आदेश देता हूँ और आदेश दिया जाता है कि ''सभी सम्बंधित पक्ष भवन के अधिकार के सम्बन्ध में अपने लिखित वक्तव्य दे।'' भीतरी आंगन में स्थित तीन गुम्बदों वाले ढांचे को सिटी मजिस्ट्रेट ने नगरपालिका अध्यक्ष श्री प्रियदत्त राम के अधिकार में सौंपकर प्रियदत्त राम को रिसीवर घोषित कर दिया। यह भी आदेश दिया कि रिसीवर महोदय इस सम्पत्ति के प्रबन्ध की व्यवस्था की स्कीम प्रस्तुत करेंगे। रिसीवर बाबू प्रियदत्त राम ने बीच वाले गुम्बद के नीचे रखे भगवान रामलला की पूजा अर्चना तथा प्रबन्ध व्यवस्था की लिखित योजना प्रस्तुत की, जो स्वीकार की गई। और इस प्रकार भगवान की पूजा-अर्चना निर्बाध प्रारम्भ हो गई। 23 दिसम्बर, 1949 की प्रातःकाल से ही भक्तगण दरवाजे के बाहर कीर्तन करने बैठ गए जो 6 दिसम्बर, 1992 तक रात और दिन अखण्ड रूप से चलता रहा।
मुकदमों का विवरण
पहला मुकदमा
यह मुकदमा (नियमित वाद क्रमांक 2/1950) एक दर्शनार्थी भक्त गोपाल सिंह विशारद (उत्तर प्रदेश के तत्कालीन जिला गोण्डा, वर्तमान जिला बलरामपुर के निवासी तथा हिन्दू महासभा, गोण्डा जिलाध्यक्ष) ने 16 जनवरी, 1950 ई. को सिविल जज, फैजाबाद की अदालत में दायर किया था। गोपाल सिंह विशारद 14 जनवरी, 1950 को जब भगवान के दर्शन करने श्रीराम जन्मभूमि जा रहे थे, तब पुलिस ने उनको रोका, पुलिस अन्य दर्शनार्थियों को भी रोक रही थी। 16 जनवरी, 1950 को ही गोपाल सिंह विशारद ने जिला अदालत में अपना वाद प्रस्तुत करके अदालत से प्रार्थना की कि-''प्रतिवादीगणों के विरुद्ध स्थायी व सतत् निषेधात्मक आदेश जारी किया जाए ताकि प्रतिवादी स्थान जन्मभूमि से भगवान रामचन्द्र आदि की विराजमान मूर्तियों को उस स्थान से जहाँ वे हैं, कभी न हटावें तथा उसके प्रवेश द्वार व अन्य आने-जाने के मार्ग बन्द न करे और पूजा-दर्शन में किसी प्रकार की विघ्न-बाधा न डाले।'' (An injunction restraining the defendants from removing the idols installed in the building and from closing the entrance and passage or from interfering with the Puja and Darshan.)
अदालत ने सभी प्रतिवादियों को नोटिस देने केआदेश दिए, तब तक के लिए 16 जनवरी, 1950 को ही गोपाल सिंह विशारद के पक्ष में अन्तरिम आदेश जारी कर दिया। भक्तों के लिए पूजा-अर्चना चालू हो गई। सिविल जज ने ही 3 मार्च, 1951 को अपने अन्तरिम आदेश की पुष्टि कर दी। मुस्लिम समाज के कुछ लोग इस आदेश के विरुद्ध इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चले गए। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मूथम व न्यायमूर्ति रघुवर दयाल की पीठ ने 26 अप्रैल, 1955 को अपने आदेश के द्वारा सिविल जज के आदेश को पुष्ट कर दिया। ढाँचे के अन्दर निर्बाध पूजा-अर्चना का अधिकार सुरक्षित हो गया। इसी आदेश के आधार पर आज तक रामलला की पूजा-अर्चना हो रही है। 

दूसरा मुकदमा
पहले मुकदमे के ठीक समान प्रार्थना के साथ दूसरा मुकदमा (नियमित वाद क्रमांक 25/1950) अयोध्या निवासी रामानन्द सम्प्रदाय के एक साधु परमहंस रामचन्द्रदास जी महाराज (परमहंस जी के साथ प्रतिवादि भयंकर विशेषण लगाया जाता था, कालान्तर में वे श्रीराम जन्मभूमि न्यास के कार्याध्यक्ष तथा श्री पंच रामानन्दीय दिगम्बर अनी अखाड़ा के श्रीमहंत बने) ने 5 दिसम्बर, 1950 को सिविल जज, फैजाबाद की अदालत में ही दायर किया और गोपाल सिंह विशारद के मुकदमे के प्रतिवादियों को इस मुकदमें में भी परमहंस जी ने प्रतिवादी बनाया। अदालत ने गोपाल सिंह विशारद को दी गई सुविधा परमहंस जी को भी प्रदान की। पहला और दूसरा अर्थात दोनों मुकदमें एक दूसरे के साथ सामूहिक सुनवाई के लिए जोड़ दिए गए। उपर्युक्त दोनों मुकदमों में सिविल जज, फैजाबाद के द्वारा 3 मार्च, 1951 को स्थायी स्थगनादेश हो जाने के पश्चात सिटी मजिस्ट्रेट ने 30 जुलाई, 1953 को अपने एक आदेश के द्वारा अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 145 के अन्तर्गत की गई कार्यवाही को बन्द कर दिया परन्तु मजिस्ट्रेट केद्वारा नियुक्त किए गए रिसीवर को भगवान की दर्शन-पूजा का प्रबन्ध एवं उस ढांचे की देखभाल का अधिकार बना रहा। (विशेष नोट: परमहंस जी ने अपना यह मुकदमा वर्ष 1992 में वापस ले लिया।) 

तीसरा मुकदमा
उपर्युक्त दोनों मुकदमों में अभी कोई विधिक प्रक्रिया प्रारम्भ नहीं हुई थी, वे लम्बित (Pending) ही थे कि तीसरा मुकदमा (नियमित वाद क्रमांक 26/1959) पंच रामानन्दी निर्मोही अखाड़ा ने अपने महंत के माध्यम से 17 दिसम्बर, 1959 को दायर किया और अपने वादपत्र में बिन्दु क्रमांक 14 में उन्होंने अदालत से राहत माँगी कि ''जन्मभूमि मन्दिर के प्रबन्धन तथा सुपुर्दगी से रिसीवर को हटाकर उपर्युक्त कार्य वादी निर्मोही अखाड़े को सौंपने के पक्ष में आदेश जारी किया जाए।''

चौथा मुकदमा
यह मुकदमा (नियमित वाद क्रमांक 12/1961) उत्तर प्रदेश सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड की ओर से 18 दिसम्बर, 1961 को जिला अदालत, फैजाबाद में दायर करके निम्नलिखित राहत की माँग की -
  1. वादपत्र के साथ नत्थी किए गए नक्शे में ए.बी.सी.डी. अक्षरों से दिखाई गई सम्पत्ति को सार्वजनिक मस्जिद घोषित किया जाए, जिसे सामान्यतया बाबरी मस्जिद कहा जाता है तथा उसके सटी हुई भूमि को कब्रिस्तान घोषित किया जाए।
  2. यदि अदालत की राय में इसका कब्जा दिलाना सही समाधान नजर आता है तो ढांचे के भीतर रखी मूर्ति और अन्य पूजा वस्तअुों को हटाकर उसका कब्जा दिलाने का आदेश भी दिया जाए।
  3. रिसीवर को आदेश दिया जाए कि वह अनधिकृत रूप से खड़े किए गए निर्माण को हटाकर वह सम्पत्ति वादी सुन्नी वक्फ बोर्ड को सौंप दे। (विशेष नोट: 23 फरवरी, 1996 को सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड के लिखित आवेदन देकर कब्रिस्तान की माँग को वापस ले लिया, जिसे उच्च न्यायालय ने स्वीकार कर लिया।)
सिविल जज, फैजाबाद के द्वारा दिनांक 6 जनवरी, 1964 को दिए गए आदेश के माध्यम से उपरोक्त चारों मुकदमें सामूहिक सुनवाई के लिए एक साथ जोड़ दिए गए।

श्रीराम जन्मभूमि पर भीतरी और बाहरी आंगन के बीच की उत्तर दक्षिण दिशा वाली दीवार के दरवाजे में लगे ताले को खुलवाने के लिए रामजानकी रथों के माध्यम से जन जागरण का निर्णय सन्तों ने लिया। व्यापक जन जागरण हुआ। फैजाबाद के एक अधिवक्ता श्री उमेश चन्द पाण्डेय ने जनवरी, 1986 में सिविल जज, फैजाबाद की अदालत में ताले को अवैध मानते हुए उसे हटाए जाने की मांग की। अधिवक्ता उमेश चन्द पाण्डेय ने अदालत को कहा कि शान्ति व्यवस्था के नाम पर ताला लगाया गया है जबकि ताले का शान्ति व्यवस्था से कोई सम्बन्ध नहीं है। तत्कालीन जिला न्यायाधीश श्री के. एम. पाण्डेय ने तत्कालीन प्रशासन से पूछा कि ताला हटाने पर शान्ति व्यवस्था बनाई रखी जा सकती है क्या ? प्रशासन का उत्तर सकारात्मक था, परिणामस्वरूप न्यायाधीश महोदय ने उसी दिन आधे घण्टे में ताला हटा देने का आदेश दिया। 1 फरवरी, 1986 को सायंकाल 4.30 बजे ताला खोल दिया गया। ताला खोले जाने के इस आदेश के विरुद्ध भी कुछ मुस्लिम व्यक्ति उच्च न्यायालय में गए। न्यायालय ने यह प्रार्थना पत्र सुरक्षित कर लिया और 31 जुलाई, 2010 तक उसका फैसला नहीं हुआ है। 1992 की घटना के बाद तो अब यह आवेदन ही निरर्थक हो गया है।

पाँचवां मुकदमा
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश श्री देवकीनन्दन अग्रवाल ने रामलला विराजमान को स्वयं वादी बनाते हुए तथा उस स्थान को देवता तुल्य मानकर वादी बनाते हुए, दोनों वादियों की ओर से 1 जुलाई, 1989 को जिला अदालत में अपना मुकदमा (नियमित वाद क्रमांक 236/1989) दायर किया और अपने वादपत्र के पैराग्राफ 39 में अदालत से माँग की कि-
  1. यह घोषणा की जाए कि अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि का सम्पूर्ण परिसर श्रीरामलला विराजमान का है।
  2. प्रतिवादियों के विरुद्ध स्थायी स्थगनादेश जारी करके कोई व्यवधान खड़ा करने से या कोई आपत्ति करने से या अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर नये मन्दिर के निर्माण में कोई बाधा खड़ी करने से रोका जाए।
भारतीय कानून में मान्य हिन्दू व्यवस्था के अन्तर्गत मन्दिर में प्रतिष्ठित विग्रह अबोध बालक , नाबालिग , जीवित जागृत माना जाता है। नाबालिग होने के कारण उसे मुकदमा लड़ने के लिए किसी संरक्षक की आवश्यकता रहती है। यह संरक्षक ही महंत/सरवराहकार आदि नामों से पुकारा जा सकता है। कानून की भाषा में इसे भी कहते हैं। उच्च न्यायालय ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश श्री देवकीनन्दन अग्रवाल को ही वादी रामलला विराजमान का घोषित किया। इस प्रकार वे लखनऊ उच्च न्यायालय में रामसखा के रूप में वादी संख्या 5 की देखभाल करने लगे।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने अपने आदेश दिनांक 10 जुलाई, 1989 के द्वारा प्रथम चार मुकदमें मौलिक व सामूहिक सुनवाई के लिए उच्च न्यायालय में स्थानान्तरित करा लिए।

5 फरवरी, 1992 को परमहंस रामचन्द्रदास जी महाराज ने अपना मुकदमा लिखित रूप में उच्च न्यायालय से वापस ले लिया।

5 फरवरी, 1992 को ही अपने आदेश के द्वारा उच्च न्यायालय ने वादी रामलला विराजमान का मुकदमा क्रमांक 236/1989 भी अन्य मुकदमों के साथ सामूहिक सुनवाई के लिए उच्च न्यायालय में मंगवा लिया और इस प्रकार सामूहिक सुनवाई के लिए केवल चार मुकदमें शेष रहे। चारों मुकदमों को नये क्रमांक दिए गए-
  1. गोपाल सिंह विशारद का वाद क्रमांक 2/1950 ------- O.O.S.-1/198
  2. निर्मोही अखाड़ा का वाद क्रमांक 26/1959 --------- O.O.S.-3/1989
  3. मुस्लिम सुन्नी वक्फ बोर्ड का वाद क्रमांक 12/1961 ---- O.O.S.-4/1989
  4. वादी रामलला विराजमान का वाद क्रमांक 236/1989 --- O.O.S.-5/1989 (O.O.S. means - Other Original Suit)
चारों मुकदमों के सामूहिक सुनवाई की पूर्व में दिए गए आदेश की पुष्टि 7 मई, 1992 को पुनः एक आदेश के द्वारा कर दी। साथ ही साथ यह भी घोषित किया कि सुन्नी वक्फ बोर्ड का मुकदमा Leading case माना जाएगा। उच्च न्यायालय ने 12 सितम्बर, 1996 को आदेश दिया कि किसी भी वादी अथवा प्रतिवादी द्वारा किसी भी वाद में जो भी दस्तावेज अथवा मौखिक साक्ष्य प्रस्तुत किए जाएंगे, वे सभी वादी अथवा प्रतिवादियों पर लागू होंगे तथा उनकी पुनरावृत्ति नहीं होगी।

6 दिसम्बर, 1992 की घटना से हम सब परिचित हैं। घटना के पश्चात अयोध्या नगर में कफ्र्यू लग गया। पुजारी तथा जनता द्वारा भगवान के दर्शन-पूजन बन्द हो गए। इस अवस्था में लखनऊ उच्च न्यायालय के अधिवक्ता श्री हरिशंकर जैन ने भगवान की रूकी हुई पूजा-अर्चना-भोग को पुनः प्रारम्भ किए जाने की मांग के साथ अपना प्रार्थना पत्र उच्च न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया। न्यायमूर्ति हरिनाथ तिलहरी ने 01 जनवरी, 1993 को भगवान के राग-भोग, पूजा-अर्चना का आदेश कर दिया। आदेश में कहा गया कि ''भगवान के दर्शन ठीक से हो सके, ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए। साथ ही साथ आँधी, तूफान, वर्षा, शीत व हवा से भगवान की रक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए।'' इस आदेश के बाद पूजा-अर्चना पनुः प्रारम्भ हो गई, जो आज तक जारी है। प्रतिदिन हजारों लोग दर्शन करते हैं। मेला काल में यह संख्या कई गुना बढ़ जाती है।

भारत सरकार द्वारा अधिग्रहण एवं राष्ट्रपति महोदय का विशेष प्रश्न
27 दिसम्बर, 1992 को भारत सरकार ने एक प्रस्ताव के द्वारा निर्णय लिया कि श्रीराम जन्मभूमि के भीतरी एवं बाहरी आंगन सहित इसके चारों ओर की लगभग 70 एकड़ भूमि को एक अध्यादेश द्वारा अधिग्रहीत किया जाएगा और साथ ही साथ संविधान की धारा 143ए के अन्तर्गत तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति महोदय के माध्यम से एक प्रश्न- ''कि क्या विवादित स्थल पर 1528 ई0 के पहले कोई हिन्दू मन्दिर था, जिसे गिराकर तथाकथित विवादित ढाँचा खड़ा किया गया ?'' पर सर्वोच्च न्यायालय से राय ली जाएगी। 7 जनवरी, 1993 को अध्यादेश जारी हुआ और सरकार ने अपने पर्वू निर्णय केअनुसार समस्त भूमि का अधिग्रहण कर लिया। भूमि अधिग्रहण एवं राष्ट्रपति महोदय डाॅ0 शंकरदयाल शर्मा की ओर से सर्वोच्च न्यायालय को संविधान की धारा 143ए के अन्तर्गत भेजे गए प्रश्न के कारण विवादित परिसर से सम्बंधित चारों वाद स्वतः समाप्त हो गए। इस अधिग्रहण अध्यादेश ने 3 अप्रैल, 1993 को संसदीय कानून (एक्ट नं0 33/1993) का स्वरूप ले लिया।

अधिग्रहण अध्यादेश और राष्ट्रपति महोदय के प्रश्न की वैधानिकता पर आपत्ति उठाते हुए सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएं दायर हुईं। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री वैंकटचलैया जी की अध्यक्षता में 5 न्यायाधीशों- न्यायमूर्ति जे. एस. वर्मा, न्यायमूर्ति जी. एन. रे, न्यायमूर्ति ए. एम. अहमदी तथा न्यायमूर्ति एस. पी. भरूचा की पीठ बनी। इस पीठ में भारत सरकार द्वारा किए गए अधिग्रहण अध्यादेश तथा राष्ट्रपति महोदय के प्रश्न पर विस्तारपूर्वक सुनवाई हुई।

भारत सरकार ने अधिग्रहण का उद्देश्य संसद में गृहमंत्री के माध्यम से 9 मार्च, 1993 को प्रस्तुत किया था। अधिग्रहण का उद्देश्य सर्वोच्च न्यायालय के सामने प्रस्तुत किया गया, वह निम्न प्रकार है -
अधिग्रहण के उद्देश्यों और कारणों का कथन

अयोध्या में भूतपूर्व राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद संरचना के सम्बन्ध में चिरकालीन विवाद रहा है। जिसके कारण समय-समय पर साम्प्रदायिक तनाव और हिंसा हुई और अन्ततः 6 दिसम्बर, 1992 को विवादास्पद संरचना का विनाश हुआ। इसके पश्चात ही व्यापक साम्प्रदायिक हिंसा हुई जिसके परिणामस्वरूप देश के विभिन्न भागों में बड़ी संख्या में मृत्यु, क्षति और सम्पत्ति का विनाश हुआ। इस प्रकार उक्त विवाद ने देश में लोक व्यवस्था बनाए रखने और विभिन्न समुदायों के बीच सामंजस्य को प्रभावित किया। चूंकि भारत के लोगों के बीच साम्प्रदायिक सामंजस्य और सामान्य भ्रातृत्व की भावना आवश्यक है। अतः यह आवश्यक समझा गया कि ऐसा कम्पलेक्स स्थापित करने के लिए, जिसे योजनाबद्ध रीति से स्थापित किया जा सके और जहाँ एक राम मन्दिर, एक मस्जिद, तीर्थ यात्रियों के लिए सुख-सुविधाएं, एक पुस्तकालय, संग्रहालय और अन्य समुचित सुविधाएं स्थापित की जा सकें, विवादास्पद संरचना स्थल और उससे संलग्न समुचित भूमि का अर्जन किया जाए। एस. बी. चैहान नई दिल्ली 9 मार्च, 1993

भारत सरकार ने फरवरी, 1993 में श्वेत पत्र भी जारी किया और इसे सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत किया। श्वेत पत्र के अध्याय 2 पृष्ठ 14 पर लिखित पैराग्राफ 2.3 नीचे लिखे अनुसार है- 2.3 ''इस विवाद का सौहार्दपूर्ण समाधान खोजने के लिए की गई बातचीत के दौरान जो एक मुद्दा उभर कर सामने आया वह यह था: क्या जिस स्थान पर विवादास्पद ढांचा है वहाँ पर एक हिन्दू मन्दिर था और क्या इसे मस्जिद के निर्माण के लिए बाबर के आदेशों पर ढहा दिया गया था। मुस्लिम संगठनों और कुछ प्रमुख इतिहासकारों की ओर से यह कहा गया था कि इन दोनों मन्तव्यों में से किसी के भी पक्ष में कोई साक्ष्य नहीं है। कुछ मुस्लिम नेताओं द्वारा यह भी कहा गया था कि यदि ये मन्तव्य सिद्ध हो जाते हैं तो मुस्लिम स्वेच्छापूर्वक इस विवादास्पद पूजा स्थल को हिन्दुओं को सौंप देंगे। स्वाभाविक है कि विश्व हिन्दू परिषद और आॅल इण्डिया बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के बीच बातचीत में यह एक केन्द्रीय मुद्दा बन गया।''

राष्ट्रपति महोदय के द्वारा संविधान की धारा 143ए के अन्तर्गत पूछे गए प्रश्न के सम्बन्ध में भारत सरकार का विचार एवं उद्देश्य और अधिक स्पष्ट किए जाने की मांग सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने भारत सरकार से की। भारत सरकार के तत्कालीन साॅलिसीटर जनरल श्री दीपांकर पी. गुप्ता ने दिनांक 14 सितम्बर, 1994 को भारत सरकार की नीति को स्पष्ट करते हुए अपना लिखित वक्तव्य सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख प्रस्तुत किया। वक्तव्य का अन्तिम पैराग्राफ क्रमांक 5 निम्न प्रकार है - भारत सरकार के तत्कालीन साॅलिसीटर जनरल दीपांकर पी. गुप्ता के लिखित वक्तव्य (14 सितम्बर, 1994) के अन्तिम पैराग्राफ का हिन्दी सारांश ''यदि वार्तालाप से समाधान के प्रयास सफल नहीं होते हैं तो भारत सरकार सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई राय के आधार पर समाधान लागू करने के लिए वचनबद्ध है। इस सम्बन्ध में सरकार की कार्यवाही दोनों समुदायों के प्रति एक जैसी होगी। यदि न्यायालय को प्रस्तुत किए गए प्रश्न का उत्तर सकारात्मक होता है अर्थात ढहा दिए गए ढांचे के निर्माण के पूर्व उस स्थान पर एक हिन्दू मन्दिर/भवन था तो सरकार हिन्दू समुदाय की भावनाओं के अनुरुप कार्य करेगी। इसके विपरीत यदि प्रश्न का उत्तर नकारात्मक है अर्थात वहाँ पहले कोई हिन्दू मन्दिर/भवन नहीं था तो भारत सरकार मुस्लिम समुदाय की भावनाओं के अनुरुप व्यवहार करेगी।''

लगभग बीस महीने तक सर्वोच्च न्यायालय में राष्ट्रपति महोदय के प्रश्न तथा भारत सरकार द्वारा किए गए अधिग्रहण की वैधानिकता पर सुनवाई हुई। 24 अक्टूबर, 1994 को न्यायालय ने अपना निर्णय सुनाया। निर्णय बहुमत और अल्पमत में बंट गया। बहुमत का निर्णय न्यायमूर्ति जे. एस. वर्मा द्वारा सुनाया गया। जिसके पक्ष में मुख्य न्यायाधीश वैंकटचलैया तथा न्यायमूर्ति जी. एन. रे रहे। इसके विपरीत अल्पमत का निर्णय न्यायमूर्ति भरुचा द्वारा सुनाया गया। जिसके पक्ष में न्यायमूर्ति ए. एम. अहमदी रहे।

यह निर्णय सर्वोच्च न्यायालय में ''इस्माइल फारूखी बनाम भारत सरकार व अन्य'' (1994) 6 SCC के नाम से जाना जाता है तथा प्रकाशित हो चुका है। बहुमत का निर्णय 98 पृष्ठों में था तथा अल्पमत का निर्णय 42 पृष्ठों में था। दोनों ही निर्णयों में न्यायाधीशों ने, भारत सरकार द्वारा किए गए अधिग्रहण का उद्देश्य व कारण तथा श्वेत पत्र में मुस्लिमों के वचन तथा सोलिसीटर जनरल दीपांकर पी. गुप्ता द्वारा सरकार की ओर से दिए गए लिखित वक्तव्य को, अपनी भूमिका में ज्यों का त्यों लिखा।

अल्पमत निर्णय में भारत सरकार द्वारा किए गए अधिग्रहण को पूर्णतः रद्द कर दिया गया। साथ ही साथ महामहिम राष्ट्रपति महोदय के प्रश्न को अनुत्तरित वापस करते हुए कहा कि ''अधिग्रहण कानून एवं महामहिम राष्ट्रपति महोदय का यह प्रश्न एक समुदाय विशेष के पक्ष में तथा दूसरे के विपक्ष में है और इस प्रकार यह धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध है और असंवैधानिक है तथा यह प्रश्न कोई संवैधानिक उद्देश्य पूरा नहीं करता।''

सर्वोच्च न्यायालय की 5 न्यायाधीशों की पीठ के तीन न्यायाधीशों द्वारा 24 अक्टूबर, 1994 को सामूहिक रूप से सुनाए गए बहुमत के निर्णय 1994(6) एस. सी. सी. का सारांश-
  1. अधिग्रहण कानून की धारा 4(3) को असंवैधानिक व अमान्य घोषित करते हैं। इस धारा के अन्तर्गत यह प्रावधान था कि अधिग्रहीत क्षेत्र के अन्तर्गत आने वाली विवादित सम्पदा से सम्बंधित किसी भी न्यायालय में चलने वाले सभी प्रकार के वाद स्वतः समाप्त हो जाएंगे।
  2. धारा 4(3) को छोड़कर अधिग्रहण कानून की शेष सभी धाराओं को मान्य करते हुए उसे दी गई चुनौतियों को निरस्त किया जाता है।
  3. भारतवर्ष में लागू कानून के अन्तर्गत जो स्थान मन्दिर, गुरूद्वारा या अन्य किसी उपासना स्थल को प्राप्त है, ठीक उसी के बराबर और वसैी ही अधिकार भारत में चलने वाले मुस्लिम कानून के अन्तर्गत मस्जिद को है, उससे अधिक कदापि नहीं। अधिग्रहण किए जाने के सम्बन्ध में अन्य पूजा स्थलों की तुलना में मस्जिद को किसी विशेष रियायत की सुविधा प्राप्त नहीं है। मस्जिद इस्लाम का अनिवार्य अंग नहीं है, नमाज कहीं भी पढ़ी जा सकती है, यहाँ तक कि खुले में भी।
  4. विवादित परिसर (सामान्य रूप से जहाँ राम जन्मभूमि बाबरी ढांचा खड़ा था) से सम्बंधित सभी प्रकार के वाद अपने अन्तरिम आदेशों केसहित न्यायिक निपटारे के लिए पुनर्जीवित किए जाते हैं परन्तु सभी अन्तरिम आदेश अधिग्रहण कानून की धारा 7 के प्रकाश में संशोधित हो जाएंगे।
  5. विवादित परिसर के सम्बन्ध में केन्द्र सरकार की भूमिका संवैधानिक रिसीवर के दायित्व तक ही सीमित है। सरकार का कर्तव्य होगा कि वह अधिग्रहण कानून की धारा 7(2) के अनुसार उस स्थान की व्यवस्था और प्रशासन के साथ-साथ 7 जनवरी, 1993 वाली यथास्थिति भी बनाए रखे। सरकार का यह भी कर्तव्य होगा कि न्यायिक फैसला होने के पश्चात फैसले के अनुसार अधिग्रहण कानून की धारा 6 के अन्तर्गत विवादित परिसर सम्बंधित पक्ष को सौंप दे।
  6. कोई नया अन्तरिम आदेश देने का न्यायालय का अधिकार अधिग्रहण कानून की धारा 7 की परिधि से बाहर के क्षेत्र तक के लिए ही सीमित होगा, विवादित परिसर के लिए नहीं।
  7. विवादित परिसर से सटी हुई आसपास की भूमि का अधिग्रहण अपने में पूर्ण है और इसका प्रबन्ध व प्रशासन भी केन्द्रीय सरकार के पास धारा 7(1) के अनुसार तभी तक रहेगा जब तक की सरकार इस सटे हुए क्षेत्र को किसी अन्य अधिकृत व्यक्ति, व्यक्ति समूह या किसी न्यास के न्यासी को धारा 6 के अनुसार सौंप नहीं देती।
  8. आर्थिक क्षतिपूर्ति केवल उन्हीं भू-स्वामियों के लिए है जिनकी सम्पत्ति पूर्ण रूप से केन्द्रीय सरकार में निहित हो चुकी है और उनके स्वामित्व पर कोई विवाद ही नहीं है। केन्द्रीय सरकार को विवादित परिसर का रिसीवर इस दायित्व के साथ बनाया गया है कि वह न्यायिक फैसला होने तक यह स्थान इसके मालिक को वापिस कर देगा।
  9. विवादित परिसर से सटी हुई भूमि के जिन भू-स्वामियों ने अपनी भूमि अधिग्रहण पर आपत्तियाँ उठाई हैं वह इस समय विचारणीय नहीं हैं। यह निर्णय हो जाने के बाद कि विवाद के निपटारे के लिए ठीक-ठीक कितनी भूमि की आवश्यकता होगी, शेष बची हुई अतिरिक्त भूमि उनके भू-स्वामियों को लौटा दी जाए।
  10. विवाद के निपटारे के लिए आवश्यक भूखण्ड का ठीक-ठीक निर्धारण हो जाने के बाद शेष बची हुई भूमि को लगातार केन्द्रीय सरकार यदि अपने अधिकार में दबाकर रखती है तो उन-उन क्षेत्रों के भू-स्वामियों को अदालत में दी गई चुनौती याचिकाओं के नवीनीकरण की छूट होगी।
  11. महामहिम राष्ट्रपति द्वारा संविधान की धारा 143(1) के अन्तर्गत भेजे गए प्रश्न को हम अनावश्यक मानते हुए सम्मानपूर्वक राय देने से इन्कार करते हैं और वापस करते हैं।

मुकदमों का पुनर्जीवन व वापसी
सर्वोच्च न्यायालय की पीठ के बहुमत के निर्णय के परिणामस्वरूप विवादित श्रीराम जन्मभूमि/बाबरी मस्जिद परिसर से सम्बंधित चारों वाद, जो अधिग्रहण के कारण स्वतः समाप्त हो गए थे, फिर से पुनर्जीवित हो गए और वापस इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ को भेज दिए गए। लखनऊ पीठ में इन मुकदमों की सुनवाई के लिए पहले से ही तीन न्यायाधीशों की पूर्णपीठ बनी हुई थी।

ढांचा न रहने के तथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के प्रकाश में सभी पक्षकारों (वादी एवं प्रतिवादी) को अपने वाद में तथा मांगी गई प्रार्थना में संशोधन की छूट दी गई। संशोधन हुए भी, जैसे- सुन्नी वक्फ बोर्ड ने कब्रिस्तान की अपनी मांग को वापस ले लिया आदि। सभी वादों में पूर्व में निर्धारित हो चुके वाद बिन्दुओं में भी संशोधन हुए। गवाहों के मौखिक बयान एवं दूसरे पक्ष के वकीलों द्वारा प्रश्नोत्तर प्रारम्भ हुआ। सभी पक्षों ने अपने-अपने पक्ष में तथ्य प्रस्तुत किए। लगभग सभी पक्षों की ओर से अनुमानित 80 गवाह प्रस्तुत हुए। गवाहों में पुरातत्ववेत्ता, लिपिशास्त्री, प्राचीन भारतीय इतिहास, मुस्लिम शासनकाल के जानकार इतिहासकार, ब्रिटिश शासनकाल के जानकार इतिहासकार, भारतीय प्राचीन ग्रन्थों के विशेषज्ञ तथा तथ्यों के जानकार आदि सभी प्रकार के गवाह थे। गवाहियाँ लगभग 2006 ई0 के प्रारम्भ तक चलती रहीं।

इसी बीच मई, 2002 में उच्च न्यायालय की विशेष पीठ के तीनों न्यायाधीशों ने अयोध्या में विवादित परिसर और उसके आसपास का स्वयं जाकर निरीक्षण किया। तीनों न्यायाधीश भीषण गर्मी में लगभग दो घण्टे तक परिसर में घूमते रहे। अनेक प्रश्न उन्होंने जिला प्रशासन को लिखकर भेजे थे। विवादित परिसर में घूमते समय अपने सभी प्रश्नों का उत्तर उन्होंने जिला प्रशासन से मौखिक रूप में प्राप्त किया। अपने इस निरीक्षण पर उन्होंने कोई रिपोर्ट लिखी अथवा नहीं लिखी, यह ज्ञात नहीं हुआ। यदि न्यायमूर्तिगण अपने निरीक्षण पर कोई रिपोर्ट लिखते तो उसकी प्रतिलिपि सभी पक्षों को अवश्य मिलती। किसी पक्ष को कोई प्रति नहीं मिली, इसका यही अर्थ है कि उन्होंने निरीक्षण तो किया परन्तु अपने निरीक्षण पर कोई लिखित टिप्पणी अपने रिकार्ड में नहीं रखी।

1 अगस्त, 2002 को उच्च न्यायालय की पीठ ने एक अन्तरिम आदेश जारी कर सभी पक्षकारों से उनके सुझाव/विचार लिखित रूप में 15 दिन में मांगे। आदेश के प्रमुख अंश- 
  1. सभी वादों में मौलिक वाद बिन्दु यह है कि क्या प्रश्नगत स्थान पर पहले कभी कोई हिन्दू मन्दिर अथवा हिन्दू धार्मिक भवन खड़ा था, जिसे तोड़कर उस स्थान पर तथाकथित बाबरी मस्जिद बनाई गई ?
  2. अदालत ने अपने अन्तरिम आदेश में लिखा कि इसी प्रकार का वाद बिन्दु सुन्नी वक्फ बोर्ड के वाद ओ.ओ.एस.-4/1989 तथा रामलला विराजमान के वाद ओ.ओ.एस.- 5/1989 में भी बना है तथा महामहिम राष्ट्रपति महोदय ने भी संविधान की धारा 143 के अन्तर्गत सर्वोच्च न्यायालय की राय जानने के लिए न्यायालय के पास ऐसा ही प्रश्न भेजा था।
  3. पुरातत्व विज्ञान इस प्रश्न का उत्तर देने में सहायक हो सकता है। वर्तमानकाल में पुरातत्व विज्ञान उत्खनन के माध्यम से भूतकाल का इतिहास बारीकी से बता सकता है।
  4. यदि विवादित स्थल पर कभी कोई मन्दिर या धार्मिक भवन रहा होगा तब उत्खनन के माध्यम से उसकी नींव खोजी जा सकती है।
  5. उन्होंने यह भी लिखा कि उत्खनन के पूर्व हम पुरातत्व विभाग के माध्यम से राडार तरंगों द्वारा भूमि के नीचे की फोटोग्राफी  कराएंगे।
उपर्युक्त अन्तरिम आदेश पर सभी पक्षों ने अपने विचार/सझुाव लिखित रूप मंे दिए। अन्ततः न्यायपीठ ने राडार सर्वे का आदेश दिया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने राडार सर्वे का यह कार्य ''तोजो विकास इण्टरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड'' को सौंपा। यह सर्वे 30 दिसम्बर, 2002 से 17 जनवरी, 2003 तक विवादित परिसर में सम्पन्न हुआ। लगभग 4000 वर्गमीटर क्षेत्र का तथा गहराई में 5.5 मीटर नीचे तक का राडार सर्वे किया गया, फोटो लिए गए। सर्वे रिपोर्ट देने वाले मुख्य भू-भौतिकी विशेषज्ञ कनाडा के थे। अपनी रिपोर्ट के निष्कर्ष भाग में उन्होंने लिखा कि ''राडार सर्वे के चित्रों मे अनेक विसंगतियाँ दिख रही हैं, जो प्राचीन भवन की रचना हो सकती है। इन विसंगतियों में स्तम्भ, नींव की दीवारें तथा फर्श और ये दूर-दूर तक फैली हुई हैं। तथापि इन विसंगतियों के सही स्वरूप की पुष्टि पुरातात्विक वैज्ञानिक उत्खनन के माध्यम से की जानी चाहिए।'' राडार सर्वे की यह रिपोर्ट 17 फरवरी, 2003 को उच्च न्यायालय की पीठ को सौंपी गई।

राडार सर्वे रिपोर्ट के निष्कर्ष के आधार पर उच्च न्यायालय ने 5 मार्च, 2003 को परुातात्विक उत्खनन का आदेश जारी किया। मार्च, 2003 से अगस्त, 2003 तक विवादित परिसर के चारों ओर उत्खनन हुआ। यह ध्यान रखा गया कि उत्खनन के दौरान रामलला विराजमान को कोई क्षति न पहुँचे और दर्शनार्थियों का मार्ग भी बन्द न हो। उत्खनन हुआ। सभी पक्षों के प्रतिनिधि स्वरूप उनके अधिवक्ता, पक्षकार स्वयं तथा पक्षकारों की ओर से नियुक्त अन्य कोई पुरातात्विक विशेषज्ञ यदि उत्खनन स्थान पर उपस्थित रहना चाहें तो उन्हें उच्च न्यायालय ने फोटो सहित अनुमति पत्र जारी किए। उत्खनन कार्य की पल-पल की वीडियोग्राफी हुई। आॅवजर्वर के रूप में दो अतिरिक्त जिला जज नियुक्त किए गए। दो भागों में रिपोर्ट बनी। भाग एक में लिखित वर्णन है तथा भाग दो में उत्खनन से प्राप्त वस्तुओं के चित्र हैं।

उत्खनन रिपोर्ट ने अपने निष्कर्ष भाग में स्पष्ट लिखा है कि उत्खनन से प्राप्त दीवारों, स्तम्भाधार, दीवारों में लगे नक्काशीदार पत्थर, शिव मन्दिर जैसी रचना को व अन्य प्राप्त वस्तुओं को देखकर निष्कर्ष निकलता है कि यहाँ कभी कोई हिन्दू मन्दिर रहा होगा। उत्खनन रिपोर्ट पर सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से आपत्तियाँ लिखित रूप में की गईं। अनेक प्रकार के मौखिक आरोप लगाए गएं उत्खनन रिपोर्ट को रिकार्ड में लेना चाहिए अथवा नहीं इस पर बहस हुई। सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से जाने-माने वरिष्ठ अधिवक्ता एवं राजनेता श्री सिद्धार्थ शंकर रे उपस्थित हुए। इसके विपरीत वादी गोपाल सिंह विशारद की ओर से सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री कृष्णमणि ने रिपोर्ट को रिकार्ड में लिए जाने के लिए कानून प्रस्तुत किया। अन्ततः रिपोर्ट रिकार्ड का हिस्सा बनी। दोनों पक्षों की ओर से पुरातत्ववेत्ता मौखिक गवाह के रूप में प्रस्तुत हुए। पुरातत्ववेत्ताओं से दूसरे पक्ष के वकीलों ने जिरह की।

2006 ई0 से सिविल मुकदमें का अन्तिम चरण प्रारम्भ हो गया। अन्तिम चरण अर्थात् वकीलों के तर्क सुन्नी वक्फ बोर्ड के मुकदमे को प्रमुख वाद मान लिए जाने के कारण उनकी ओर से तर्क प्रारम्भ हुए।

1996 ई0 से उच्च न्यायालय में प्रारम्भ हुए मुकदमे में महत्वपूर्ण पहलू है, न्यायपीठ का बार-बार पुनर्गठन। किसी न किसी न्यायाधीश के सेवानिवृत्त होने के कारण न्यायपीठ का पुनर्गठन हुआ। तब तक सुनवाई रूक जाती थी। तर्क के दौरान ही न्यायपीठ का तीन बार पुनर्गठन हुआ। इसके कारण तर्क फिर से सुने जाते थे। सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से अधिवक्ता श्री जफरयाब जिलानी को तीन बार अपने बात दोहरानी पड़ी। अन्तिम पुनर्गठन की परिस्थिति अगस्त, 2009 के अन्तिम सप्ताह में पैदा हुई जब पता लगा कि न्यायपीठ में 1996 से मुकदमे को सुन रहे न्यायाधीश सैयद रफात आलम साहब को मध्यप्रदेश में मुख्य न्यायाधीश का स्थान प्राप्त हो गया है। अगले दिन से ही न्यायपीठ ने अपना कार्य बन्द कर दिया। चार महीने बाद 20 दिसम्बर, 2009 को न्यायपीठ में न्यायमूर्ति एस. यू. खान की नियुक्ति हुई। उन्होंने 10 जनवरी, 2010 से कार्य पा्ररम्भ किया। जनवरी, 2010 के बाद प्रतिदिन अदालत बैठी। प्रतिदिन अर्थात एक महीने में लगभग 20 दिन और एक दिन में कम से कम साढ़े चार घण्टे की सुनवाई।

सुन्नी वक्फ बोर्ड के वाद में एक हिन्दू प्रतिवादी की ओर से कलकत्ता उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री पी. एन. मिश्रा ने अप्रैल, 2010 में सुन्नी वक्फ बोर्ड के वाद के विरुद्ध अपने तर्क प्रभावी रूप से रखे। इनका सहयोग स्थानीय अधिवक्ता सुश्री रंजना अग्निहोत्री ने किया। हिन्दू पक्ष अदालत के सामने आना प्रारम्भ हो गया। सुन्नी वक्फ बोर्ड के मुकदमे के ही एक अन्य प्रतिवादी परमहंस रामचन्द्रदास की ओर से सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री रविशंकर प्रसाद ने तर्क प्रस्तुत किए तथा एक और प्रतिवादी महंत धर्मदास की ओर से चेन्नई उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री जी. राजगोपालन ने वक्फ बोर्ड के मुकदमे के विरुद्ध अपने तर्क रखे। इनका सहयोग लखनऊ के अधिवक्ता श्री राकेश पाण्डेय ने किया। (श्री राकेश पाण्डेय के पूज्य पिता जी ने ही जिला जज के रूप में श्रीरामजन्मभूमि के ताले को खोलने का आदेश फरवरी, 1986 में दिया था)। श्री रविशंकर प्रसाद का सहयोग अधिवक्तागण सर्वश्री भूपेन्द्र यादव, विक्रम बनर्जी, सौरभ समशेरी ने किया। वादी रामलला विराजमान के वाद क्रमांक 5/1989 की ओर से रामलला का पक्ष सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री के. एन. भट्ट तथा फैजाबाद के अधिवक्ता श्री मदनमोहन पाण्डेय ने प्रस्तुत किया। कुछ अन्य वकील भी बोले। उनमें प्रमुख हैं- उच्च न्यायालय, लखनऊ के अधिवक्ता श्री हरिशंकर जैन तथा श्री अजय पाण्डेय एडवोकेट। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश लखनऊ निवासी श्रद्धेय श्री कमलेश्वर नाथ जी का मुकदमें को तैयार कराने में किया गया योगदान विलक्षण है।

जब अदालत द्वारा सुन्नी वक्फ बोर्ड के अधिवक्ता को कहा गया कि वे अपने मुकदमे के विरुद्ध प्रस्तुत किए गए कानूनी तर्कों का जबाव दें तो उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। अदालत ने लगभग सभी अधिवक्ताओं को अपनी बात कहने का अवसर दिया। 27 जुलाई, 2010 को सुनवाई समाप्त घोषित कर दी गई। न्यायाधीशों ने सभी पक्ष के वकीलों को क्रमिक रूप से अपने चैम्बर में बुलाकर मुकदमे के सम्बन्ध में विचारविमर्श किया। अन्ततः यह प्रक्रिया भी जुलाई के अन्त में पूरी हो गई। न्यायपीठ ने सभी पक्षों के सम्मुख यह स्पष्ट कर दिया था कि वे सितम्बर के तीसरे सप्ताह के आसपास अपना निर्णय सुनाएंगे और इसकी जानकारी पर्याप्त समय पहले सभी अधिवक्ताओं को दी जाएगी। अदालत ने अपने वचन का पालन किया। निर्णय सुनाने की तारीख 24 सितम्बर, 2010 सारे देश को 8 सितम्बर, 2010 को ही पता लग गया। निर्णय तो भविष्य के गर्भ में निहित है। यह भी सब मान रहे हैं कि असंतुष्ट पक्ष सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाएगा। मुकदमा गम्भीर है। सर्वोच्च न्यायालय को तो सुनना ही पड़ेगा। वहाँ क्या होगा? कितने वर्ष लगेंगे ? क्या आने वाले 25 वर्षों में भी फैसला हो पाएगा ? कुछ भी कहना कठिन है। हमें तो लगता है कि गेंद अन्ततः भारत सरकार के पाले में जाएगी।


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मधुमेह नाशिनी जामुन के अन्य लाभ



जामुन बरसात में होने वाला फल है। इसमें थोड़ा खारापन व रुखापन रहता है, जिससे जीभ में ऐंठन हो जाती है। इसलिए यह कम मात्रा में खाया जाता है। बड़े जामुन स्वादिष्ट, भारी, रूचिकर व संकुचित करने वाले होते हैं। और छोटे जामुन ग्राही, रुखी और पित्त, कफ रक्तविकार और जलन का शमन करने वाले होते हैं।। इसकी गुठली मल बांधने वाली और मधुमेह रोगनाशक होती है। इसमें प्रोटिन, विटामिन ए, बी, सी, वसा खनिज द्रव्य व पौष्टिक तत्व होते हैं। इसमें पोषक तत्वों की प्रचुरता तो है ही, साथ ही यह सेहत से जुड़े कई फायदों का भी सबब है। जामुन में 251 kJ ऊर्जा, 14 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 0.6 फाइबर, 0.23 ग्राम फैट्स व 0.995 ग्राम कई प्रकार के विटामिन, कैल्शियम, आयरन, पोटैशियम आदि मौजूद हैं।जामुन का सेवन डायबिटीज के रोगियों के लिए बेहद फायदेमंद है।
सेहत से जुड़े जामुन के फायदे
  • इसमें ग्लाइकेमिक इंडेक्स कम होता है जिससे रक्त में शुगर का स्तर नियंत्रित होता है। साथ ही, डायबिटीज के मरीजों को बार-बार प्यास लगने वा अधिक बार युरीन पास होने की समस्या में भी मददगार है। 
  • इस फल में विभिन्न प्रकार के मिनिरल जैसे कैल्शियम, आयरन, पोटैशियम और विटामिन सी अच्छी मात्रा में है। इसकी वजह से यह हड्डियों के लिए फायदेमंद तो है ही, साथ ही शरीर की प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ाता है।
  • एन‌िमिक लोगों के लिए जामुन का सेवन संजीवनी बूटी की तरह ही है। अन्नामलाई विश्वविद्यालय के शोध की मानें तो इसके नियमित सेवन से रक्त में हिमोग्लोबिन का स्तर बढ़ जाता है। 
  • जामुन में पोटैशियम की मात्रा अधिक है। 100 ग्राम जामुन के सेवन से शरीर को 55 मिलीग्राम पोटैशियम मिलता है। इससे दिल का दौरा, हाई ब्लड प्रेशर और स्ट्रोक आदि का रिस्क कम होता है। 
  • जामुन का फल ही नहीं बल्कि इसकी पत्तियों के भी काफी फायदे हैं। आयुर्वेद में इसकी पत्तियों का पाचन ठीक रखने और मुंह से जुड़ी समस्याओं में काफी इस्तेमाल किया जाता है।
जामुन का सिरका
  • कब्ज और उदर रोग में जामुन का सिरका उपयोग करें। जामुन का सिरका गुणकारी और स्वादिष्ट होता है, इसे घर पर ही आसानी से बनाया जा सकता है और कई दिनों तक उपयोग में लाया जा सकता है।
  • सिरका बनाने की विधि- काले पके हुए जामुन साफ धोकर पोंछ लें। इन्हें मिट्टी के बर्तन में नमक मिलाकर मुँह साफ कपड़े से बाँधकर धूप में रख दें। एक सप्ताह धूप में रखने के पश्चात इसको साफ कपड़े से छानकर रस को काँच की बोतलों में भरकर रख लें। यह सिरका तैयार है।
  • मूली, प्याज, गाजर, शलजम, मिर्च आदि के टुकड़े भी इस सिरके में डालकर इसका उपयोग सलाद पर आसानी से किया जा सकता है। जामुन साफ धोकर उपयोग में लें।
  • यथासंभव भोजन के बाद ही जामुन का उपयोग करें। जामुन खाने के एक घंटे बाद तक दूध न पिएँ। जामुन पत्तों की भस्म को मंजन के रूप में उपयोग करने से दाँत और मसूड़े मजबूत होते हैं।
जामुन की गुठली
  • जामुन का गूदा पानी में घोलकर या शरबत बनाकर पीने से उल्टी, दस्त, जी-मिचलाना, खूनी दस्त और खूनी बावासीर में लाभ देता है।
  • जामुन की गुठली के चूर्ण 1-2 ग्राम पानी के साथ सुबह फांकने से मधुमेह रोग ठीक हो जाता है।
  • नए जूते पहनने पर पांव में छाला या घाव हो जाए तो इस पर जामुन की गुठली घिसकर लगाने से घाव ठीक हो जाता है।
  • इसके ताजे, नरम पत्तों को गाय के पाव-भर दूध में घोट-पीसकर प्रतिदिन सुबह पीने से खून बवासीर में लाभ होता है।
  • जामुन का रस, शहद, आँवले या गुलाब के फूल के रस को बराबर मात्रा में मिलाकर एक-दो माह तक प्रतिदिन सुबह के वक्त सेवन करने से रक्त की कमी एवं शारीरिक दुर्बलता दूर होती है। यौन तथा स्मरण शक्ति भी बढ़ जाती है।
  • जामुन के एक किलोग्राम ताजे फलों का रस निकालकर उसमें ढाई किलोग्राम चीनी मिलाकर शरबत जैसी चाशनी बना लें। इसे एक ढक्कनदार साफ बोतल में भरकर रख लें। जब कभी उल्टी-दस्त या हैजा जैसी बीमारी की शिकायत हो, तब दो चम्मच शरबत और एक चम्मच अमृतधारा मिलाकर पिलाने से तुरंत राहत मिल जाती है।
  • जामुन और आम का रस बराबर मात्रा में मिलाकर पीने से मधुमेह के रोगियों को लाभ होता है।
  • जामुन की गुठली के चूर्ण को एक चम्मच मात्रा में दिन में दो-तीन बार लेने पर पेचिश में आराम मिलता है।
  • पथरी हो जाने पर इसके चूर्ण का उपयोग चिकित्सकीय निर्देशन में दही के साथ करें।
  • रक्तप्रदर की समस्या होने पर जामुन की गुठली के चूर्ण में पच्चीस प्रतिशत पीपल की छाल का चूर्ण मिलाएं और दिन में दो से तीन बार एक चम्मच की मात्रा में ठंडे पानी से लें।
  • गठिया के उपचार में भी जामुन बहुत उपयोगी है। इसकी छाल को खूब उबालकर बचे हुए घोल का लेप घुटनों पर लगाने से गठिया में आराम मिलता है।
जामुन के पत्ते
  • जामुन का फल ही नहीं इसके वृक्ष की जड से लेकर पत्ती तक उपयोगी है। इसका फल साल में कुछ दिन उपलब्ध रहता है। मधुमेह के रोगियों के लिए तो जामुन उपयोगी है इसकी गुठली का चूर्ण बनाकर खाने से भी मधुमेह में लाभ होता है।
  • नेशनशल इंट्रीगेडिग मेडिकल एसोशियेशन के पूर्व पदाधिकारी डा.सुरेन्द्र रघुवंशी ने बताया कि जामुन के पत्ते खाने से भी मधुमेह रोगियों को लाभ मिलता है। प्राचीनकाल में अधिकतर जामुन के वृक्ष तालाब और बावडियों के पास इसलिए लगाये जाते थे की इसकी जडें काफी गहराई तक चली जाती हैं और वह तालाब के पानी को शुद्ध रखती हैं।
  • श्री रघुवंशी ने कहा कि गांव में कुआं बनाते समय नींव में जामुन की लकडी डाली जाती थी। जामुन की लकडी जल को शुद्ध करने का काम करती है और जल को खराब नहीं होने देती। जामुन का वृक्ष आंधी में भी नहीं गिरता इसलिए बाग के चारों ओर इसके वृक्ष लगाये जाते हैं। आमतौर पर जामुन के पेड में बीमारी कम से कम लगती हैं। जामुन के वृक्ष की उम्र सैकडों साल बतायी गयी है।
जामुन की छाल
  • वैसे तो जामुन के पंचांग का प्रयोग औषध रूप में होता है किन्तु फल फूलादि तो जब ऋतु में इसके वृक्ष फलते हैं, तभी प्राप्‍त होते हैं किन्तु छाल (वल्कल), पत्ते और जड़ तो सदैव प्राप्‍त होते हैं । उनमें जामुन की छाल कहां कहां औषध रूप में कार्य में आती है, वह जानना अतिआवश्यक है।
  • सामान्यतया जामुन की छाल का क्वाथ बच्चों के आम व रक्तातिसार में देते हैं। जामुन की छाल के क्वाथ से मसूड़ों के रक्तस्राव (पायोरिया) क्षत व जिह्वा विदारण में कुल्ले गरारे कराते हैं, इससे अच्छा लाभ होता है। सभी कण्ठ के रोगों में इसकी छाल के क्वाथ के गरारों से लाभ होता है।
  • जामुन की छाल में स्तम्भन का विशेष गुण है । इसी कारण इसका क्वाथ निर्बल बच्चों और निस्तेज स्त्रियों के अतिसार को दूर करता है।
  • छाल का क्वाथ जामुन की नरम-नरम अन्तर-छाल दो तोले जौकुट करके ३२ तोले जल में उबालें। जब वह आठ तोले रह जाये तो मलकर छान लें। उसको तीन भागों में बांट लें। इसे तीन बार दिन में पिलायें और प्रत्येक बार धनिया जीरा का चूर्ण दो-दो माशे क्वाथ के साथ देते रहें। इस प्रकार तीन-चार दिन करने से अतिसार बन्द हो जाता है।
  • सगर्भा अतिसार यदि गर्भवती स्त्री को अतिसार हो तो जामुन और आम की ताजी छाल दो तोले ले लें और १६ गुणा जल में क्वाथ करें। चतुर्थांश रहने पर उसे मल छानकर तीन भाग कर लें और तीन-चार घण्टे के अन्तर से प्रतिबार दो-दो माशे धनिया और जीरे का चूर्ण साथ देने से सगर्भा स्त्री के अतिसार (दस्त) तीन चार दिन में सर्वथा बन्द हो जाते हैं।
  • मसूड़ों की सूजन जामुन की छाल का क्वाथ वा फाण्ट बनायें और उससे दिन में दो बार कुल्ले करते रहने से मसूड़ों का शोथ और पीड़ा दूर हो जाती है और हिलते हुए दान्त भी दृढ़ होकर जम जाते हैं । क्वाथ की मात्रा दो तोले से चार तोले तक शक्ति के अनुसार देनी चाहिये।
  • रक्तप्रदर श्वेतप्रदर नया हो, गरम-गरम और जल के समान स्राव होता हो तो जामुन की छाल का क्वाथ दिन में दो बार पांच-सात दिन देने से प्रदर रोग शान्त हो जाता है । क्वाथ में थोड़ा-थोड़ा मधु मिलाकर देने से अधिक लाभ होता है, किन्तु स्त्री-पुरुष दोनों को कई मास तक ब्रह्मचर्य पालन करना चाहिये । यह इस रोग का सबसे बड़ा पथ्य है।
  • अशुद्ध पारा वा रसकपूर के खाने से किसी का मुख आ जाए तो जामुन की छाल के क्वाथ से कुल्ले करने से ठीक हो जाता है । मुख के अन्दर की सूजन, लार बहना, जखम और पीड़ा 
महत्वपूर्ण लेख 


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स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है बरगद, पीपल और गूलर



बरगद, पीपल और गूलर मोरासी परिवार का सबसे उपयोगी स्वास्थ्यवर्धक और धामिक महत्व कावृक्ष है। यह अक्सर हर स्थान पर उपलब्ध है। इनवृक्षों के बारें में जानकारी निम्नवत है:-

बरगद (फ़ाइकस वेनगैलेंसिस)
 
बरगद या वटवृक्ष एक विशाल आकार का दीर्घायु वृक्ष है। मोरासी परिवार के इस सदस्य का वानस्पतिक नाम 'फ़ाइकस वेनगैलेंसिस'है। यह वृक्ष हमारे पौराणिक ग्रंथों से भी जुड़ा हैं। पुराणों में इसका उल्लेख न्यग्रोध नाम से मिलता है। बरगद के पत्ते चैड़े, गोलाकार, दुग्धस्रावीः एवं मोटे होते हैं। इसके फल फरवरी और मई के बीच लगते हैं जिनका आकार छोटा होता है। पकने पर ये चमकीले लाल हो जाते हैं। लोगों का ऐसा विश्वास होता है कि वट में फूल नहीं लगते परन्तु यह ठीक नहीं है इसके फूल बहुत सूक्ष्म होते हैं। नर तथा मादा दोनों ही फूल एक ही ग्राह के अंदर रहते हैं। इसकी जटाएं एवं शाखाएं मिलकर नया वृक्ष बना लेती हैं। बरगद का वृक्ष भारत के लगभग सभी भागों से पाया जाता है। पर्वतीय जंगलों में यह बहुतायत में मिलता है। पाकिस्तान में भी यह सर्वत्र मिलता है तथा बोया जाता है। इस वृक्ष के लगभग सभी भाग जैसे जटा, पत्ते, छाल, कोंपल आदि सभी औषधीय रूप से बहुत उपयोगी होते हैं।
  • आयुर्वेद के अनुसार बरगद शीतल, रूक्ष, भारी, मीठा, कसैला, स्तंभक, ग्राही एवं कफ तथा पित्त दोषों को दूर करने वाला होता है। विभिन्न योनि रोगों, बुखार, दाद, उल्टी, बेहोशी, खून बहने, तीव्र प्यास, विसर्प जख्म और शोथ आदि को दूर करने में भी इसका प्रयोग किया जाता है।
  • वट की पत्तियों का दूध बहुत उपयोगी और बहुत सारी बीमारियों की दवा है। यह दूध वेदना शामक होता है। आमवात, कमर, जोड़ों का दर्द तथा अन्य दर्दों में बरगद के दूध का लेप किया जाता है। पैरों में बिवाइयां फटने पर कटे-फटे स्थानों पर इसके दूध को भरने से आराम मिलता है। किसी जख्म में यदि कीड़े पड़ जाएं तो भी उस पर दूध लगाने से काफी आराम मिलता है।
  • त्वचीय रोगों जैसे कुष्ठ में भी वट का दूध बहुत लाभ पहुंचाता है। इसके लिए सात रातों तक वट के दूध का लेप प्रभावित स्थान पर करने तथा उस पर छाल का कल्क बांधने से आश्चर्यजनक लाभ होता है।
  • वट के दूध की चार-पांच बूंदें बताशे में रखकर या टपका कर स्वप्नदोष, शीघ्र पतन जैसे विकारों के इलाज के लिए दी जाती हैं। वट का दूध हमारे दांतों को भी मजबूत बनाता है। दांत हिल रहे हों, दर्द करते हों या खोखले हो गए हों तो उसमें वट का दूध लगाने या भरने से दर्द दूर होता है। मसूढ़ों पर भी इसके दूध का लेप किया जाता है। कान में होने वाली छोटी-मोटी फोड़े-फुंसी के इलाज के लिए भी कान में वट का दूध टपकाते हैं।
  • बरगद की जटा के भी अनेक चिकित्सकीय उपयोग होते हैं। वात रक्त या गठिया में इसकी जटाओं का काढ़ा बहुत उपयोगी है। रक्त प्रदर के निदान के लिए बरगद की जटा को पीसकर चटनी-सी बना लें, एक दूसरे बर्तन में जटा का काढ़ा भी बनाएं फिर इस चटनी तथा काढ़े में घी मिलाकर आग पर पका लें।
  • इस मिश्रण को धीमी आग पर तब तक पकाना चाहिए जब तक कि पानी का अंश पूरी तरह न जल जाए। जब केवल घी शेष रह जाए तो इसे छान कर, ठंडा कर रोगी को पिलाना चाहिए इससे रक्त प्रदर दूर होता है। श्वेत प्रदर के उपचार के लिए छाल के काढ़े के साथ लोध का कल्क पीना चाहिए।
  • जिन स्त्रियों को गर्भपात का डर हो वे यदि वट की छाल, कोंपल अथवा जटा को पानी में घोंटकर पी लें तो निश्चित लाभ होगा। बहुमूत्र में भी छाल के काढ़े का सेवन बहुत लाभकारी होता है। जख्मों को इसकी कोंपल के काढ़े से धोकर, उन्हीं को पीसकर लेप कर देने से सूजन उतर जाती है।
  • दस्तों में इसकी कोपलों या दाढ़ी को चावल के मांड में पीसकर छाछ के साथ पीने से शीघ्र लाभ होता है। कोंपलों का फांट भी अतिसार तथा पेचिश में बहुत उपयोगी है। बरगद के पीले पत्तों को भुने हुए चावलों के साथ पकाकर काढ़ा बनाकर पिलाने से बुखार दूर होता है। इस काढ़े का प्रयोग नियमित रूप से किया जाना चाहिए।
पीपल (फीकुस रेलिजिओसा लिनिअस)
पीपल का पेड़ मोरासी परिवार का सदस्य है और हमारे देश का एक पवित्र धार्मिक वृक्ष है। इसका वनस्पतिक नाम फीकुस रेलिजिओसा लिनिअस है। मंदिरों, धर्मशालाओं, बावडियों तथा रास्ते के किनारों पर यह आमतौर पर लगाया जाता है। पीपल एक विशाल आकार का मानूसनी वृक्ष है। पीपल के पत्ते हृदयाकार होते हैं। इसका तना ललाई लिए हुए सफेद व चिकना होता है। इसके फल छोटे गोल तथा छोटी शाखाओं पर लगते हैं। इसकी छाल भूरे रंग की होती है तने तथा शाखाओं को गोदने पर इससे सफेद गाढ़ा दूध निकलता है।
  • पीपल धार्मिक रूप से ही नहीं औषधीय रूप से भी बहुत उपयोगी वृक्ष है। अनेक छोटी बड़ी बीमारियों के इलाज में पीपल बहुत उपयोगी होता है। पीपल के पांच पत्तों को दूध में उबालकर चीनी या खांड डालकर दिन में दो बार, सुबह-शाम पीने से जुकाम, खांसी और दमा में बहुत आराम होता है। इसके सूखे पत्ते का चूर्ण भी खासा उपयोगी होता है। इस चूर्ण को जख्मों पर छिड़कने से फायदा होता है।
  • पीपल के अकुंरों को मिलाकर पतली खिचड़ी बनाकर खाने से दस्तों में आराम मिलता है। यदि रोगी को पीले रंग के दस्त जलन के साथ हो रहे हों तो इसके कोमल पत्तों का साग रोगी को दिया जाना चाहिए।
  • पेचिश, रक्तस्राव, गुदा का बाहर निकलना तथा बुखार में पीपल के अकुंरों को दूध में पकाकर इसका एनीमा देना बहुत लाभकारी होता है। पीपल के फल भी बहुत उपयोगी होते हैं। इसके सूखे फलों का चूर्ण पानी के साथ चाटने से दमा में बहुत आराम मिलता है। खांसी होने पर इसी चूर्ण को शहद के साथ चाटना चाहिए। दो माह तक लगातार नियमित रूप से इस चूर्ण का सेवन करने से गर्भ ठहरने की संभावना बहुत बढ़ जाती है।
  • पीपल की छाल से काढ़े या फाॅट से कुल्ला करने से दांत दर्द में आराम मिलता है और मसूढ़े मजबूत होते हैं। जख्मों को छाल के काढ़े से धोने से वे जल्दी भरते हैं। जख्मों पर यदि खाल न आ रही हो तो बारीक चूर्ण नियमित रूप से छिड़कने पर त्वचा आने लगती है। जलने से बने फफोलों या घाव पर भी छाल का चूर्ण बुरकना चाहिए।
  • छाल को घिसकर फोड़े पर लेप करने से यह तो बैठ जाता है या फिर पककर फूट जाता है। विसर्प की जलन शांत करने के लिए छाल का लेप घी मिलाकर किया जाना चाहिए। हड्डी टूटने पर छाल को बारीक पीसकर बांधने से लाभ मिलता है। छाल को पीसकर लेप करने से रक्त-पित्त विकार शांत होता है। साथ ही रोगी को इसके काढ़े से स्नान कराना चाहिए।
  • कान में दर्द के उपचार के लिए पीपल के कोमल पत्ते पीसकर उसे तिल के तेल में हल्की आंच पर पका लें फिर इसे ठंडा कर लें और हल्का सा गुनगुना रहने पर कान में डालने से तुरंत आराम मिलता है। पैरों की एडि़यां फटने या त्वचा के फटने पर उसमें पीपल का दूध लगाया जाना चाहिए।
  • पीपल के फल, जड़ की छाल और कोंपलों को दूध में पकाकर छान लें। इसमें शहद या चीनी मिलाकर पीने से पुंसत्व शक्ति बढ़ती है। पीपल की जड़ के काढ़े में नमक और गुड़ मिलाकर पीने से तीव्र कुक्षि शूल में शीघ्र लाभ होता है। पीपल की सूखी छाल को जलाकर जल में बुझा लें। इस जल के सेवन से उल्टी तथा प्यास शांत हो जाती है।
  • शुक्र क्षीण होने तथा छाती में जख्मों की स्थिति में पीपल की छाल के काढ़े में दूध पकाकर जमा दें। उससे निकाले गए घी में चावल पकाकर रोगी को खिलाने से आराम मिलता है। यदि मूत्र नीले रंग का आता हो तो रोगी को पीपल की जड़ की छाल का काढ़ा दें।
  • प्रमेह विकारों में पीपल के 6 ग्राम बीज हिरण के सींग का दंड बनाकर घोंट लें और इसमें शहद मिलाकर छाछ के साथ इसका सेवन करें। गनोरिया में भी पीपल की छाल बहुत उपयोगी है। विभिन्न यौन विकारों में पीपल के काढ़े से योनि प्रक्षालन को श्रेष्ठ माना गया है। मूत्र तथा प्रजनन संहति के पैत्तिक विकारों में पीपल की छाल के काढ़े में शहद मिलाकर सेवन करने से तुरन्त लाभ मिलता है।

गूलर (फीकुस ग्लोमेराता रौक्सबुर्ग)
मोरासी परिवारी का सदस्य गूलर लंबी आयु वाला वृक्ष है। इसका वनस्पतिक नाम फीकुस ग्लोमेराता रौक्सबुर्ग है। यह सम्पूर्ण भारत में पाया जाता है। यह नदी-नालों के किनारे एवं दलदली स्थानों पर उगता है। उत्तर प्रदेश के मैदानों में यह अपने आप ही उग आता है। इसके भालाकार पत्ते 10 से सत्रह सेमी लंबे होते हैं जो जनवरी से अप्रैल तक निकलते हैं। इसकी छाल का रंग लाल-घूसर होता है। फल गोल, गुच्छों में लगते हैं। फल मार्च से जून तक आते हैं। कच्चा फल छोटा हरा होता है पकने पर फल मीठे, मुलायम तथा छोटे-छोटे दानों से युक्त होता है। इसका फल देखने में अंजीर के फल जैसा लगता है। इसके तने से क्षीर निकलता है।
  • आयुर्वेदिक चिकित्सकों के अनुसार गूलर का कच्चा फल कसैला एवं दाहनाशक है। पका हुआ गूलर रुचिकारक, मीठा, शीतल, पित्तशामक, तृषाशामक, श्रमहर, कब्ज मिटाने वाला तथा पौष्टिक है। इसकी जड़ में रक्तस्राव रोकने तथा जलन शांत करने का गुण है। गूलर के कच्चे फलों की सब्जी बनाई जाती है तथा पके फल खाए जाते हैं। इसकी छाल का चूर्ण बनाकर या अन्य प्रकार से उपयोग किया जाता है।
  • गूलर के नियमित सेवन से शरीर में पित्त एवं कफ का संतुलन बना रहता है। इसलिए पित्त एवं कफ विकार नहीं होते। साथ ही इससे उदरस्थ अग्नि एवं दाह भी शांत होते हैं। पित्त रोगों में इसके पत्तों के चूर्ण का शहद के साथ सेवन भी फायदेमंद होता है।
  • गूलर की छाल ग्राही है, रक्तस्राव को बंद करती है। साथ ही यह मधुमेह में भी लाभप्रद है। गूलर के कोमल-ताजा पत्तों का रस शहद में मिलाकर पीने से भी मधुमेह में राहत मिलती है। इससे पेशाब में शर्करा की मात्रा भी कम हो जाती है।
  • गूलर के तने को दूध बवासीर एवं दस्तों के लिए श्रेष्ठ दवा है। खूनी बवासीर के रोगी को गूलर के ताजा पत्तों का रस पिलाना चाहिए। इसके नियमित सेवन से त्वचा का रंग भी निखरने लगता है।
  • हाथ-पैरों की त्वचा फटने या बिवाई फटने पर गूलर के तने के दूध का लेप करने से आराम मिलता है, पीड़ा से छुटकारा मिलता है। गूलर से स्त्रियों की मासिक धर्म संबंधी अनियमितताएं भी दूर होती हैं। स्त्रियों में मासिक धर्म के दौरान अधिक रक्तस्राव होने पर इसकी छाल के काढ़े का सेवन करना चाहिए। इससे अत्याधिक बहाव रुक जाता है। ऐसा होने पर गूलर के पके हुए फलों के रस में खांड या शहद मिलाकर पीना भी लाभदायक होता है। विभिन्न योनि विकारों में भी गूलर काफी फायदेमंद होता है। योनि विकारों में योनि प्रक्षालन के लिए गूलर की छाल के काढ़े का प्रयोग करना बहुत फायदेमंद होता है।
  • मुंह के छाले हांे तो गूलर के पत्तों या छाल का काढ़ा मुंह में भरकर कुछ देर रखना चाहिए। इससे फायदा होता है। इससे दांत हिलने तथा मसूढ़ों से खून आने जैसी व्याधियों का निदान भी हो जाता है। यह क्रिया लगभग दो सप्ताह तक प्रतिदिन नियमित रूप से करें।
  • आग से या अन्य किसी प्रकार से जल जाने पर प्रभावित स्थान पर गूलर की छाल को लेप करने से जलन शांत हो जाती है। इससे खून का बहना भी बंद हो जाता है। पके हुए गूलर के शरबत में शक्कर, खांड या शहद मिलाकर सेवन करने से गर्मियों में पैदा होने वाली जलन तथा तृषा शांत होती है।
  • नेत्र विकारों जैसे आंखें लाल होना, आंखों में पानी आना, जलन होना आदि के उपचार में भी गूलर उपयोगी है। इसके लिए गूलर के पत्तों का काढ़ा बनाकर उसे साफ और महीन कपड़े से छान लें। ठंडा होने पर इसकी दो-दो बूंद दिन में तीन बार आंखों में डालें। इससे नेत्र ज्योति भी बढ़ती है।
  • नकसीर फूटती हो तो ताजा एवं पके हुए गूलर के लगभग 25 मिली लीटर रस में गुड़ या शहद मिलाकर सेवन करने या नकसीर फूटना बंद हो जाती है।


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ऐतिहासिक साक्ष्यों पर आधारित - क्षत्रियों की वंशावली



ऐतिहासिक साक्ष्यों पर आधारित - क्षत्रियों की वंशावली
Based on Historical Evidence - Genealogy of Kshatriyas
ऐतिहासिक साक्ष्यों पर आधारित -क्षत्रियों की वंशावली

भारत के क्षत्रिय वंशों को उनकी उत्पत्ति के आधार पर चार प्रमुख वंशों में विभाजित किया गया है। ये निम्नलिखित हैं—

  1. सूर्यवंश

  2. चंद्रवंश

  3. नागवंश

  4. अग्निवंश


ऐतिहासिक साक्ष्यों पर आधारित -क्षत्रियों की वंशावली

सूर्यवंशी क्षत्रिय

प्राचीन पुस्तकों के अवलोकन से ऐसा ज्ञात होता है कि भारत में आर्य दो समूहों में आए। प्रथम लम्बे सिर वाले और द्वितीय चौड़े सिर वाले। प्रथम समूह उत्तर-पश्चिम (ऋग्वेद के अनुसार) खैबर दर्रे से आया, जो पंजाब, राजस्थान और अयोध्या में सरयू नदी तक फैल गया। इन्हें सूर्यवंशी क्षत्रिय कहा गया है।

प्रथम समूह के प्रसिद्ध राजा भरत हुए। भरत की संतानों और उनके परिवार को सूर्यवंशी क्षत्रिय का नाम दिया गया। यह 11वें स्कन्ध पुराण, अध्याय 1 के श्लोक 15, 16 और 17 में वर्णित है।

रोमिला थापर ने पौराणिक साक्ष्यों के आधार पर लिखा है कि महाप्रलय के समय केवल मनु जीवित बचे थे। भगवान विष्णु ने इस बाढ़ के संबंध में पहले ही चेतावनी दे दी थी, इसलिए मनु ने अपने परिवार और सप्तऋषियों को बचाकर ले जाने के लिए एक नाव बना ली थी। भगवान विष्णु ने एक बड़ी मछली का रूप धारण किया, जिससे वह नौका बाँध दी गई। मछली जल-प्रवाह में तैरती हुई नौका को एक पर्वत-शिखर तक ले गई। यहाँ मनु, उनका परिवार और सप्तऋषि प्रलय की समाप्ति तक रहे तथा पानी कम होने पर सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर उतर आए।

ऋग्वेद में मनु का उल्लेख है। पुराणों में 14 मनुओं का वर्णन है, जिनमें स्वयंभुव मनु संसार के सर्वप्रथम मनु माने गए हैं। विवस्वान सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु सातवें मनु थे। इनके पहले के छह मनु स्वयंभुव वंश के थे।


Kshatriya Vanshavali


वैवस्वत मनु से त्रेता युग प्रारम्भ हुआ। श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णित है कि महाप्रलय के समय केवल परम पुरुष ही बचे, उनसे ब्रह्माजी उत्पन्न हुए। ब्रह्मा से मरीचि, मरीचि की पत्नी अदिति से विवस्वान (सूर्य) का जन्म हुआ तथा विवस्वान की पत्नी संज्ञा से मनु पैदा हुए।

वास्तव में वैवस्वत मनु भारत के प्रथम राजा थे, जो सूर्य से उत्पन्न हुए और जिन्होंने अयोध्या नगरी बसाई। सबसे पहले मनु, जिन्हें स्वयंभू कहते हैं, हुए। इनके पुत्र प्रियव्रत और उनके पुत्र का नाम अग्नीध्र था। अग्नीध्र के पौत्र का नाम नाभि था और नाभि के पुत्र का नाम ऋषभ था। ऋषभ के 100 पुत्र हुए, जिसका वर्णन वेदों में मिलता है। इनमें से सबसे बड़ा पुत्र भरत था, जिसके नाम पर भारतवर्ष का नाम पड़ा और यह सूर्यवंशी क्षत्रिय थे। इसका वर्णन स्कन्ध पुराण, स्कन्ध 5, अध्याय 7 में मिलता है।

भरत का परिवार तेजी से बढ़ा और उन्हें भारत-जन कहा जाने लगा, जिसका वर्णन ऋग्वेद में मिलता है। इस परिवार में भगवान मैत्रावरुण और अप्सरा उर्वशी के गर्भ से वशिष्ठ का जन्म हुआ, जो आगे चलकर भरत के पुरोहित हुए। वशिष्ठ ने इन्हें बलशाली और वीरत्व प्रदान किया।

इसी बीच विश्वामित्र, जो जन्म से क्षत्रिय थे, अपनी कठिन तपस्या से ऋषि का स्थान प्राप्त कर क्षत्रियों के गुरु बन गए। इससे वशिष्ठ व विश्वामित्र दोनों एक-दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी बन गए। इस प्रकार वशिष्ठ एवं विश्वामित्र दोनों ने पुरोहित का पद प्राप्त किया और इस वंश को सूर्यवंशी कहा जाने लगा।

आर्यों की वर्ण-व्यवस्था के पश्चात् ऋषियों ने मिलकर सूर्य नामक आर्य क्षत्रिय की पत्नी सरण्यू से उत्पन्न मनु को पहला राजा बनाया। वायु नामक ऋषि ने मनु का राज्याभिषेक किया। मनु ने अयोध्या नगरी का निर्माण किया और उसे अपनी राजधानी बनाया। मनु से उत्पन्न पुत्र सूर्यवंशी कहलाए। उस युग में सूर्यवंशियों के अयोध्या, विदेह, वैशाली आदि राज्य थे।

मनु के 9 पुत्र तथा एक पुत्री इला थी। मनु ने अपने राज्य को 10 भागों में बाँटकर सबको दे दिया। अयोध्या का राज्य उनके बाद उनके बड़े पुत्र इक्ष्वाकु को मिला। उनके वंशज इक्ष्वाकु वंशीय क्षत्रिय कहलाए।

राजा मनु का दूसरा पुत्र नाभानेदिष्ट था, जिसे बिहार का राज्य मिला और आजकल इस इलाके को तिरहुत कहते हैं।

उनके तीसरे पुत्र विशाल हुए, जिन्होंने वैशाली नगरी बसाकर अपनी राजधानी बनाई।

मनु के चौथे पुत्र करूष थे, जिनके वंशज करूष कहलाए। उनका राज्य बघेलखंड था। उस युग में यह प्रदेश करूष कहलाने लगा।

मनु के पाँचवें पुत्र शर्याति को गुजरात का राज्य मिला और उनका छठा पुत्र आनर्त था, जिससे वह प्रदेश आनर्त कहलाया। आनर्त देश की राजधानी कुशस्थली, वर्तमान द्वारका, थी। आनर्त के रोचवान, रेव और रैवत तीन पुत्र थे। रैवत के नाम पर वर्तमान गिरनार का रैवत पर्वत प्रसिद्ध हुआ।

मनु के सातवें पुत्र का राज्य यमुना के पश्चिमी तट पर था तथा आठवें पुत्र धृष्ट का राज्य पंजाब में था, जिसके वंशज धृष्ट क्षत्रिय कहलाए।

इक्ष्वाकु के कई पुत्र थे, परन्तु मुख्य दो थे। राजा की ज्येष्ठ संतान विकुक्षि था, जिसे शशाद भी कहा जाता था। वह पिता के बाद अयोध्या का राजा बना। शशाद के पुत्र का नाम काकुत्स्थ था, जिसके वंशज काकुत्स्थी कहलाए।

इक्ष्वाकु का दूसरा पुत्र निमि था। उसका राज्य अयोध्या और विदेह के बीच स्थापित हुआ। इस वंश के एक राजा मिथि हुए, जिन्होंने मिथिला नगरी बसाई। इसी वंश में राजा जनक हुए। इस राज्य और अयोध्या राज्य के बीच की सीमा सदानीरा (राप्ती) नदी थी।

Kshatriya Vanshavali

इस वंश की आगे चलकर अनेक शाखाएँ और उपशाखाएँ हुईं तथा वे सभी सूर्यवंशी कहलाए। इस वंश के महत्वपूर्ण नरेशों के नाम पर अनेक वंशों के नाम पड़े, जैसे— इक्ष्वाकु के वंशज इक्ष्वाकु वंशीय तथा काकुत्स्थ के वंशज काकुत्स्थ वंशीय कहलाए। रघु के वंशज रघुवंशी कहलाए। अयोध्या के महाराजा काकुत्स्थ का पौत्र पृथु हुआ। इसने सबसे पहले भूमि को नपवाकर उसकी हदबन्दी करवाई। उसके समय में कृषि की बड़ी उन्नति हुई थी। उसी वंश में चक्रवर्ती सम्राट मान्धाता, सगर, भगीरथ, दिलीप, रघु, दशरथ और राम हुए।


सूर्यवंशी राजाओं की नामावली

क्षत्रियों की गणना करते हुए सर्वप्रथम सूर्यवंश का नाम लिया जाता है। इसकी उत्पत्ति महापुरुष विवस्वान् (सूर्य) से मानी जाती है। ब्रह्मा के पुत्र मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। कश्यप की रानी अदिति से "सूर्य" की उत्पत्ति हुई, जिन्हें विवस्वान् भी कहा जाता है। विवस्वान् के पुत्र "मनु" हुए। मनु के नौ पुत्र एवं एक पुत्री इला थी, जिनमें सबसे बड़े इक्ष्वाकु थे। इसलिए सूर्यवंश को इक्ष्वाकु वंश भी कहा जाता है। मनु ने ही अयोध्या को बसाया था। भिन्न-भिन्न पुराणों में दी गई सूर्यवंशी राजाओं की वंशावली इस प्रकार है:-

1. मनु 2. इक्ष्वाकु 3. विकुक्षि 4. परंजय 5. अनेना 6. पृथु 7. वृषदश्व 8. अन्ध्र 9. युवनाश्व 10. श्रावस्त 11. वृहदश्व 12. कुवलायाश्व 13. दृढ़ाश्व 14. प्रमोद 15. हर्यश्व 16. निकुम्भ 17. संहताश्व 18. कुशाश्व 19. प्रसेनजित 20. युवनाश्व (द्वितीय) 21. मान्धाता 22. पुरुकुत्स 23. त्रसदस्यु 24. सम्भूत 25. अनरण्य 26. त्रसदश्व 27. हर्यश्व 28. वसुमान् 29. त्रिधन्वा 30. त्रय्यारुणि 31. सत्यव्रत 32. हरिश्चन्द्र 33. रोहिताश्व 34. हरित 35. चंचु 36. विजय 37. रूरुक 38. वृक 39. बाहु 40. सगर 41. असमंजस 42. अंशुमान 43. दिलीप 44. भागीरथ 45. श्रुत 46. नाभाग 47. अम्बरीष 48. सिन्धुद्वीप 49. अयुतायु 50. ऋतुपर्ण 51. सर्वकाम 52. सुदास 53. सौदास 54. अश्मक 55. मूलक 56. दशरथ 57. ऐडविड 58. विश्वसह 59. दिलीप (खटवांग) 60. रघु 61. अज 62. दशरथ 63. रामचन्द्र 64. कुश 65. अतिथि 66. निषध 67. नल 68. नभ 69. पुण्डरीक 70. क्षेमधन्वा 71. देवानीक 72. पारियात्र 73. दल 74. बल 75. उक्त 76. वज्रनाभ 77. शंखण 78. व्युषिताश्व 79. विश्वसह 80. हिरण्यनाभ 81. पुष्य 82. ध्रुवसन्धि 83. सुदर्शन 84. अग्निवर्ण 85. शीघ्र 86. मरु 87. प्रसुश्रुत 88. सुसन्धि 89. अमर्ष 90. सहस्वान् 91. विश्वभानु 92. वृहद्बल 93. वृहद्रथ 94. उरुक्षय 95. वत्सव्यूह 96. प्रतिव्योम 97. दिवाकर 98. सहदेव 99. वृहदश्व 100. भानुरथ 101. प्रतीताश्व 102. सुप्रतीक 103. मरुदेव 104. सुनक्षत्र 105. किन्नर 106. अन्तरिक्ष 107. सुपर्ण 108. अमित्रजित् 109. बृहद्राज 110. धर्मी 111. कृतंजय 112. रणंजय 113. संजय 114. शाक्य 115. शुद्धोधन 116. सिद्धार्थ 117. राहुल 118. प्रसेनजित 119. क्षुद्रक 120. कुण्डक 121. सुरथ 122. सुमित्र।

उपरोक्त नाम सूर्यवंशी मुख्य-मुख्य राजाओं के हैं, क्योंकि मनु से राम के पुत्र कुश तक केवल चौंसठ राजाओं के नाम मिलते हैं, जबकि यह अवधि लगभग कई करोड़ वर्षों की मानी जाती है। अतः पुराणों में सभी राजाओं के नाम आना असंभव भी है।

सूर्यवंश से निकली शाखाएँ

  1. सूर्यवंशी

  2. निमि वंश

  3. निकुम्भ वंश

  4. नाग वंश

  5. गोहिल वंश

  6. गहलोत वंश

  7. राठौड़ वंश

  8. गौतम वंश

  9. मौर्य वंश

  10. परमार वंश

  11. चावड़ा वंश

  12. डोड वंश

  13. कुशवाहा वंश

  14. परिहार वंश

  15. बड़गूजर वंश

  16. सिकरवार वंश

  17. गौड़ वंश

  18. चौहान वंश

  19. बैस वंश

  20. दाहिमा वंश

  21. दाहिया वंश

  22. दीक्षित वंश


चन्द्रवंशी क्षत्रिय

द्वितीय आर्यों का समूह चन्द्रवंशी क्षत्रियों के नाम से जाना जाता है। ऋग्वेद के अनुसार यह समूह चन्द्रवंशी क्षत्रियों के नाम से जाना जाता था और हिमालय को गिलगिट के रास्ते से पार कर मानसरोवर झील के पास से होते हुए भारत आया। इनका सिर सूर्यवंशियों के मुकाबले चौड़ा होता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार चन्द्रवंश के प्रथम राजा का नाम ययाति था। यह आयु के पुत्र और पुरूरवा के पौत्र थे। इन्हें चन्द्रवंशी कहा जाता है तथा इनके पाँच पुत्र थे। यह गिलगिट होते हुए सरस्वती नदी के क्षेत्र में आए और सरहिन्द होते हुए दक्षिण-पूर्व में बस गए। यह क्षेत्र सूर्यवंशियों के अधिकार में नहीं था।

प्रारंभिक युग में चन्द्र क्षत्रिय का पुत्र बुध था, जो सोम भी कहलाता था। बुध का विवाह मनु की पुत्री इला से हुआ। उनसे उत्पन्न पुत्र का नाम पुरूरवा था। इसकी राजधानी प्रयाग के पास प्रतिष्ठानपुर थी। पुरूरवा के वंशज चन्द्रवंशी क्षत्रिय कहलाए।

पुरूरवा के दो पुत्र आयु और अमावसु थे। आयु ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते राज्य का स्वामी बना तथा अमावसु को कान्यकुब्ज (कन्नौज) का राज्य मिला।

आयु के नहुष नामक पुत्र हुआ। नहुष के दो पुत्र हुए— ययाति और क्षत्रबुद्ध। ययाति इस वंश में सर्वप्रथम चक्रवर्ती सम्राट बना और उसके भाई क्षत्रबुद्ध को काशी प्रदेश का राज्य मिला। उसकी छठी पीढ़ी में काश नामक राजा हुआ, जिसने काशी नगरी बसाई थी तथा काशी को अपनी राजधानी बनाया।

सम्राट ययाति के यदु, द्रुह्य, तुर्वसु, अनु और पुरु पाँच पुत्र हुए। सम्राट ययाति ने अपने सबसे छोटे पुत्र पुरु को प्रतिष्ठानपुर का राज्य दिया, जिसके वंशज पौरव कहलाए। यदु को पश्चिमी क्षेत्र केन, बेतवा और चम्बल नदियों के कछारों का राज्य मिला। तुर्वसु को प्रतिष्ठानपुर का दक्षिण-पूर्वी प्रदेश मिला, जहाँ पर तुर्वसु ने विजय प्राप्त कर अधिकार जमा लिया। वहाँ पहले सूर्यवंशियों का राज्य था।

द्रुह्य को चम्बल के उत्तर और यमुना के पश्चिम का प्रदेश मिला तथा अनु को गंगा-यमुना के पूर्व के दोआब का उत्तरी भाग, अर्थात अयोध्या राज्य के पश्चिम का प्रदेश मिला। ये यादव आगे चलकर बड़े प्रसिद्ध हुए। इनसे निकली हैहयवंशी शाखा काफी बलशाली सिद्ध हुई। हैहयवंशजों ने आगे बढ़कर दक्षिण में अपना राज्य कायम कर लिया था। यादव वंश में अंधक और वृष्णि बड़े प्रसिद्ध राजा हुए हैं।

जिनसे यादवों की दो शाखाएँ निकलीं। प्रथम शाखा अंधक वंश में आगे चलकर उग्रसेन और कंस हुए, जिनका मथुरा पर शासन था। दूसरी शाखा वृष्णि वंश में कृष्ण हुए, जिन्होंने कंस को मारकर उसके पिता उग्रसेन को मथुरा का राजा बनाया। आगे चलकर वृष्णि वंश सौराष्ट्र प्रदेश स्थित द्वारका में चला गया।

द्रुह्य वंश में गांधार नामक राजा हुआ। उसने वर्तमान रावलपिंडी के उत्तर-पश्चिम में जो राज्य कायम किया, वही गांधार देश कहलाया। अनु के वंशज आनव कहलाते हैं।

इस वंश में उशीनर नामक राजा बड़ा प्रसिद्ध हुआ है। उसके वंशज समूचे पंजाब में फैले हुए थे। उशीनर का पुत्र शिवि अपने पिता से अधिक प्रतापी शासक हुआ और चक्रवर्ती सम्राट कहलाया। दक्षिण-पश्चिमी पंजाब में शिवि के नाम पर एक शिविपुर नगर था, जिसे आजकल शोरकोट कहा जाता है। चन्द्रवंशियों में यौधेय नाम के बड़े प्रसिद्ध क्षत्रिय हुए थे।

कन्नौज के चन्द्रवंशी राजा गाधी का पुत्र विश्वरथ था, जिसने राजपाट छोड़कर तपस्या की थी। वही प्रसिद्ध ऋषि विश्वामित्र हुए। इन्हीं ऋषि विश्वामित्र ने गायत्री मंत्र की रचना की थी।

यादवों की हैहय शाखा में कार्तवीर्य अर्जुन बड़ा शक्तिशाली शासक था, जो बाद में चक्रवर्ती सम्राट बन गया था, परन्तु अन्त में परशुराम और अयोध्या के शासक से युद्ध में परास्त होकर मारा गया।

पौरव वंश का एक बार पतन हो गया था। इस वंश में पैदा हुए दुष्यन्त ने बड़ी भारी शक्ति अर्जित कर अपने वंश को गौरवान्वित किया। दुष्यन्त और शकुन्तला का पुत्र भरत चक्रवर्ती सम्राट बना। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि उसके नाम पर यह देश भारत कहलाया। उसके वंशज हस्ती ने ही हस्तिनापुर बसाया और उसे अपनी राजधानी बनाया।

इसी वंश के शासकों ने पांचाल राज्य की स्थापना की, जो बाद में दो भागों में बँट गया— एक उत्तरी पांचाल और दूसरा दक्षिणी पांचाल। उत्तरी पांचाल की राजधानी का नाम अहिच्छत्रपुर था, जो वर्तमान में बरेली जिले में रामनगर नामक स्थान माना जाता है। दक्षिणी पांचाल में कान्यकुब्ज का राज्य विलीन हो गया था, जिसकी राजधानी काम्पिल्य थी।

पौरव वंश में ही आगे चलकर भीष्म पितामह, धृतराष्ट्र, पाण्डु, युधिष्ठिर, परीक्षित और अन्य राजा हुए।

चन्द्रवंश से निकली शाखाएँ

  1. सोमवंशी

  2. यादव

  3. भाटी

  4. जाडेजा

  5. तोमर

  6. हैहय

  7. करचुलिसया

  8. कौशिक

  9. सेंगर

  10. चंदेल

  11. गहरवार

  12. बेरूआर

  13. सिरमौर

  14. सिरमौरिया

  15. जनवार

  16. झाला

  17. पलवार

  18. गंगावंशी

  19. बिलादरिया

  20. पौरववंशी

  21. खाती क्षत्रिय

  22. इन्दौरिया

  23. बुन्देला

  24. कान्हवंशी

  25. रकसेल

  26. कुरुवंशी

  27. कटोच

  28. तिलोता

  29. बनाफर

  30. भारद्वाज

  31. सरनिहा

  32. द्रुह्यवंशी

  33. हरद्वार

  34. चौपटखम्भ

  35. क्रमवार

  36. मौखरी

  37. भृगुवंशी

  38. टाक


नागवंश क्षत्रिय

आर्यों में एक क्षत्रिय राजा शेषनाग था। उसका जो वंश चला, वह नागवंश कहलाया। प्रारम्भ में इनका राज्य कश्मीर में था। वाल्मीकि रामायण में शेषनाग और वासुकी नामक नाग राजाओं का वर्णन मिलता है। महाभारत काल में ये दिल्ली के पास खाण्डववन में रहते थे, जिन्हें अर्जुन ने परास्त किया था। इनके इतिहास का वर्णन राजतरंगिणी में मिलता है।

विदिशा से लेकर मथुरा के अंचल तक का मध्य प्रदेश नागवंशियों की शक्ति का केंद्र था। उन्होंने विदेशियों से जमकर लोहा लिया। ये लोग शिवोपासक थे, जो शिवलिंगों को कंधों और पगड़ियों में धारण किया करते थे। कुषाण साम्राज्य के अंतिम शासक वासुदेव के काल में भारशिवों (नागों) ने काशी में गंगा तट पर दस अश्वमेध यज्ञ किए, जो दशाश्वमेध घाट के रूप में स्मृति-स्वरूप आज भी विद्यमान हैं।

पुराणों में भारशिवों का नवनागों के नाम से वर्णन है। धर्म विषयक आचार-विचार को समाज में स्थापित करने का श्रेय गुप्तों को न जाकर भारशिवों को जाता है, क्योंकि इसकी शुरुआत उनके शासनकाल में ही हो चुकी थी।

इतिहास के विद्वानों का मत है कि पंजाब पर राज्य करने वाले नाग 'तक' अथवा 'तक्षक' शाखा के नाग थे। डॉ. जायसवाल मानते हैं कि पद्मावती वाले नाग भी तक्षक अथवा टाक शाखा के थे। इन नागों की एक शाखा कच्छप, मध्य प्रदेश में थी। ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तर-पश्चिमी भारत के गणतांत्रिक राज्यों का इन नागों को सहयोग रहा होगा। इस पारस्परिक सार्वभौमिकता को इन्होंने स्वीकार किया।

राजस्थान स्थित नागों के राज्यों को परमारों ने समाप्त कर दिया था।

इनका गोत्र काश्यप, प्रवर तीन—काश्यप, वत्सास और नैधुव; वेद सामवेद, शाखा कौथुमी, निशान हरे झण्डे पर नाग-चिह्न तथा शस्त्र तलवार है।


अग्निवंश क्षत्रिय

भारत के राजकुलों में चार कुल—चौहान, सोलंकी, परमार तथा प्रतिहार—थे, जो अपने को अग्निवंशी मानते हैं। आधुनिक भारतीय व विदेशी विद्वान इस धारणा को मिथ्या मानते हैं। किन्तु इनमें से दो-तीन विद्वानों को छोड़कर लगभग सभी अग्निकुल की धारणा को अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार भी करते हैं। इसलिए यहाँ अग्निकुल की उत्पत्ति के प्रश्न पर विचार करना आवश्यक है।

इन कुलों की मान्यता है कि अग्निकुण्ड से इन कुलों के आदि पुरुष मुनि वशिष्ठ द्वारा आबू पर्वत पर उत्पन्न किए गए थे। डॉ. दशरथ शर्मा लिखते हैं कि असुरों का संहार करने के लिए वशिष्ठ ने चालुक्य, चौहान, परमार और प्रतिहार चार क्षत्रिय कुल उत्पन्न किए।

सोलंकियों के बारे में पूर्व सोलंकी राजा राजराज प्रथम के समय में वि. 1079 (ई. 1022) के एक ताम्रपत्र के अनुसार भगवान पुरुषोत्तम की नाभि-कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जिनसे क्रमशः सोम, बुध व अन्य वंशजों में विचित्रवीर्य, पाण्डु, अर्जुन, अभिमन्यु, परीक्षित, जन्मेजय आदि हुए। इसी वंश के राजाओं ने अयोध्या पर राज किया था। विजयादित्य ने दक्षिण में जाकर राज्य स्थापित किया। इसी वंश में राजराज हुआ था।

सोलंकियों के शिलालेखों तथा कश्मीरी पंडित विल्हण द्वारा वि. 1142 में रचित 'विक्रमांकदेव चरित्र' में चालुक्यों की उत्पत्ति ब्रह्मा के चुल्लू से उत्पन्न वीर क्षत्रिय से होना लिखा गया है, जो चालुक्य कहलाया। पश्चिमी सोलंकी राजा विक्रमादित्य षष्ठ के समय के शिलालेख वि. 1133 (ई. 1076) में लिखा गया है कि चालुक्य वंश भगवान ब्रह्मा के पुत्र अत्रि के नेत्र से उत्पन्न होने वाले चन्द्रवंश के अंतर्गत आते हैं।

अग्निकुल के दूसरे कुल चौहानों के विषय में वि. 1225 (ई. 1168) के पृथ्वीराज द्वितीय के समय के शिलालेख में चौहानों को चन्द्रवंशी लिखा है। 'पृथ्वीराज विजय' काव्य में चौहानों को सूर्यवंशी लिखा है तथा बीसलदेव चतुर्थ के समय के अजमेर के लेख में भी चौहानों को सूर्यवंशी लिखा गया है।

आबू पर्वत पर स्थित अचलेश्वर महादेव के मन्दिर में वि. 1377 (ई. 1320) के देवड़ा लुंभा के समय के लेख में चौहानों के बारे में लिखा है कि सूर्य और चन्द्रवंश के अस्त हो जाने पर जब संसार में दानवों का उत्पात शुरू हुआ, तब वत्स ऋषि के ध्यान और चन्द्रमा के योग से एक पुरुष उत्पन्न हुआ।

ग्वालियर के तंवर शासक वीरम के कृपापात्र नयनचन्द्र सूरी ने 'हम्मीर महाकाव्य' की रचना वि. 1460 (ई. 1403) के लगभग की, जिसमें उसने लिखा है कि पुष्कर क्षेत्र में यज्ञ प्रारम्भ करते समय राक्षसों द्वारा होने वाले विघ्नों की आशंका से ब्रह्मा ने सूर्य का ध्यान किया। इस पर यज्ञ की रक्षा के लिए सूर्य मण्डल से उतरकर एक वीर आ पहुँचा। जब उपरोक्त यज्ञ निर्विघ्न समाप्त हो गया, तब ब्रह्मा की कृपा से वह वीर चाहुमान कहलाया।

अग्निकुल के तीसरे वंश प्रतिहारों के लेखों में मण्डोर के शासक बाउक प्रतिहार के वि. 894 (ई. 837) के लेख में लक्ष्मण को राम का प्रतिहार लिखा है तथा प्रतिहार वंश का उससे संबंध दिखाया गया है। इसी प्रकार प्रतिहार कक्कूक के वि. 918 (ई. 861) के घटियाला लेख में भी लक्ष्मण से ही संबंध दिखाया गया है। कन्नौज के प्रतिहार सम्राट भोज की ग्वालियर प्रशस्ति में प्रतिहार वंश को लक्ष्मण के वंश में लिखा गया है। चौहान विग्रहराज के हर्ष के वि. 1030 (ई. 973) के शिलालेख में भी कन्नौज के प्रतिहार सम्राट को रघुवंश मुकुटमणि कहा गया है। इस प्रकार इन तमाम शिलालेखों तथा बालभारत से प्रतिहारों का सूर्यवंशी होना माना जाता है।

परमारों के वशिष्ठ द्वारा अग्निकुण्ड से उत्पन्न होने की कथा परमारों के प्राचीनतम शिलालेखों और काव्यों में विद्यमान है। डॉ. दशरथ शर्मा लिखते हैं कि हम किसी अन्य राजपूत जाति को अग्निवंशी मानें या न मानें, परमारों को अग्निवंशी मानने में हमें विशेष दुविधा नहीं हो सकती। इनका सबसे प्राचीन वर्णन मालवा के परमार शासक सिन्धुराज (वि. 1052-1067) के दरबारी कवि पद्मगुप्त ने किया है, जिसमें परमारों को अग्निवंशी तथा आबू पर्वत पर वशिष्ठ के कुण्ड से उत्पन्न बताया गया है। इसी प्रकार परमारों के आसनतगढ़, उदयपुर, नागपुर, अथूणा, हाथल, देलवाड़ा, पाटनारायण, अचलेश्वर आदि के अनेक लेखों में उनकी उत्पत्ति के बारे में इसी प्रकार का वर्णन है। परमार अपने को चन्द्रवंशी मानते हैं।

इस प्रकार इन तमाम साक्ष्यों द्वारा किसी-न-किसी रूप में इन वंशों को विशेष शक्तियों द्वारा उत्पन्न करने की मान्यता की पुष्टि 10वीं सदी तक के लिखित प्रमाणों से होती है। विद्वानों के अनुसार अग्निवंशी होने की मान्यता 16वीं सदी से प्रारम्भ होती है तथा इसे प्रारम्भ करने वाला ग्रन्थ 'पृथ्वीराज रासो' है।

दूसरी ओर भण्डारकर, वाट्सन, फारबस, कैम्पबेल, जैक्सन, स्मिथ आदि विद्वानों ने अग्निवंशियों को गुर्जरों और हूणों के साथ बाहर से आया हुआ माना है। दूसरा विचार इनकी उत्पत्ति से जुड़ा हुआ है, जिसमें यह माना गया है कि किसी कारणवश इन वंशों का शुद्धिकरण किया गया था और अग्निवंशियों द्वारा अग्नि से शुद्ध होने की मान्यता को स्वीकार किया गया।

भारत में बौद्ध धर्म के प्रचार से बहुत से लोगों ने बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया। शनैः-शनैः सारा ही क्षत्रिय वर्ग वैदिक धर्म को छोड़कर बौद्ध धर्म को अंगीकार करता चला गया। भारत में चारों तरफ बौद्ध धर्म का प्रचार हो गया। क्षत्रियों के बौद्ध धर्म में चले जाने के कारण उनकी वैदिक क्रियाएँ और परम्पराएँ समाप्त हो गईं। जिससे इनके साम्राज्य छोटे और कमजोर हो गए तथा इनका वीरत्व जाता रहा।

तब क्षत्रियों को पुनः वैदिक धर्म में लाने की प्रक्रिया शुरू हुई। क्षत्रिय कुलों को बौद्ध धर्म से वापस वैदिक धर्म में दीक्षित किया गया और आबू पर्वत पर यज्ञ करके बौद्ध धर्म से वैदिक धर्म में उनका समावेश किया गया तथा उन्हें अग्निकुल का स्वरूप दिया गया।

अबुल फ़ज़ल के समय तक प्राचीन ग्रन्थों और मान्यताओं से यह विदित था कि ये चारों वंश बौद्ध धर्म से वापस वैदिक धर्म में आए थे, जिसका वर्णन अबुल फ़ज़ल ने 'आइने अकबरी' में किया है। कुमारिल भट्ट ने विक्रमी संवत् 756 (ई. 700) में बड़ी संख्या में लोगों को बौद्ध धर्म से वापस वैदिक धर्म में लाने का कार्य प्रारम्भ किया, जिसे आदि शंकराचार्य ने आगे चलकर पूर्ण किया।

आबू पर्वत पर यज्ञ करके चार क्षत्रिय कुलों को वापस वैदिक धर्म में दीक्षा देने का यह एक ऐतिहासिक कार्यक्रम था, जो लगभग छठी या सातवीं सदी में हुआ। यह कोई कपोल-कल्पना या मिथ्या बात नहीं थी, अपितु वैदिक धर्म को पुनः सशक्त करने का प्रथम कदम था, जिसकी स्मृति के रूप में बाद में ये वंश अपने को अग्निवंशी कहने लगे।

क्षत्रिय और वैश्यों के बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद वैदिक संस्कार लुप्त हो गए थे। यहाँ तक कि वे शनैः-शनैः अपने गोत्र तक भी भूल चुके थे। जब वे वापस वैदिक धर्म में आए, तब क्षत्रियों तथा वैश्यों द्वारा नए सिरे से पुरोहित बनाए गए। उन्हीं पुरोहितों के गोत्र उनके यजमानों के भी गोत्र मान लिए गए। इसलिए समय-समय पर नए स्थानों पर जाने तथा पुरोहित बदलने के साथ अनेक बार गोत्र भी बदलते चले गए। वैद्य और ओझा की भी यही मान्यता है।

अग्निवंश से निकली शाखाएँ

  1. परमार

  2. सोलंकी

  3. परिहार

  4. चौहान

  5. हाड़ा

  6. सोनगिरा

  7. भदौरिया

  8. बछगोती

  9. खीची

  10. उज्जैनीय

  11. बघेल

  12. गन्धवरिया

  13. डोड

  14. वरगया

  15. गाई

  16. दोगाई

  17. मड़वार

  18. चावड़ा

  19. गजकेसर

  20. बड़केसर

  21. मालवा

  22. रायजादा

  23. स्वर्णमान

  24. बागड़ी

  25. अहबन

  26. तालिया

  27. ढेकहा

  28. कलहंस

  29. भरसुरिया

  30. भुवाल

  31. भुतहा

  32. राजपूत माती

क्षत्रियों के 36 राजवंश (Royal Martial Clan of Kshatriyas)

सभी लेखकों की यह मान्यता है कि क्षत्रियों के शाही कुलों (राजवंशों) की संख्या 36 है। परन्तु कुछ इतिहासकारों ने इनकी संख्या कम और कुछ ने अधिक लिखी है। कुछ इतिहासकारों ने शाही कुलों की शाखाओं को भी शाही कुल मान लिया, जिससे इनकी संख्या बढ़ गई। प्रथम सूची चंदबरदाई ने 'पृथ्वीराज रासो' में 12वीं शताब्दी में वर्णित की है।


क्षत्रियों की 36 रॉयल मार्शल क्लैन ऑफ क्षत्रिय (क्षत्रियों के 36 शाही कुल)

इन 36 शाही कुलों (Royal Martial Clan) में 10 सूर्यवंशी, 10 चंद्रवंशी, 4 अग्निवंशी तथा 12 अन्य वंश माने गए हैं। सभी लेखकों, जैसे—कर्नल जेम्स टॉड, श्री गौरीशंकर ओझा, श्री जगदीश सिंह परिहार, रोमिला थापर, स्वामी दयानन्द सरस्वती, सत्यार्थ प्रकाश, राजवी अमर सिंह, बीकानेर, शैलेन्द्र प्रताप सिंह (बैसवाड़े का वैभव), प्रो. लाल अमरेन्द्र (बैसवाड़ा : एक ऐतिहासिक अनुशीलन, भाग-1), राव दंगल सिंह (बैस क्षत्रियों का उद्भव एवं विकास), ठाकुर ईश्वर सिंह मढ़ाड़ (राजपूत वंशावली), ठाकुर देवी सिंह मंडावा आदि ने यह माना है कि क्षत्रियों के शाही कुल 36 हैं, लेकिन किसी ने सूची में इनकी संख्या बढ़ा दी है और किसी ने कम कर दी है।

पहली सूची चंदबरदाई द्वारा पृथ्वीराज रासो में दी गई है। इसके बाद उन्होंने पृथ्वीराज रासो के छन्द 32 में कुछ क्षत्रिय कुलों का वर्णन छन्द के रूप में किया है।

पृथ्वीराज रासो में चंदबरदाई ने कुछ कुलों को एक छन्द (दोहा) के रूप में लिखा है, जो द्वितीय सूची के रूप में प्रकाशित हुई।

तृतीय सूची में 36 क्षत्रिय कुलों को कर्नल टॉड ने नाडोल (मारवाड़) के जैन मंदिर के पुजारी से प्राप्त कर प्रकाशित किया।

चतुर्थ सूची में हेमचन्द्र जैन ने कुमारपाल चरित्र में 36 क्षत्रियों की सूची प्रकाशित की।

पंचम सूची मोगंजी खींचियों के भाट द्वारा प्रकाशित की गई।

षष्ठ सूची में नैणसी ने 36 शाही कुलों तथा उनकी राजधानियों का वर्णन किया है।

सप्तम सूची पद्मनाभ द्वारा प्रकाशित की गई।

अष्टम सूची हम्मीरयाण में प्रकाशित हुई।

इसमें 30 कुलों का वर्णन है। इस प्रकार कुल क्षत्रियों की 8 सूचियाँ प्रकाशित हुईं और लगभग सभी ने गणना में 36 शाही कुल माने हैं। प्रारम्भिक 36 कुलों की सूची में मौर्यवंशी तथा नागवंश का स्थान न मिलना यही सिद्ध करता है कि ये प्रारम्भ में वैदिक धर्म में नहीं आए तथा बौद्ध बने रहे।

इतिहासकारों जैसे राजवी अमर सिंह (बीकानेर), प्रो. अमरेन्द्र सिंह, जगदीश सिंह परिहार, राव दंगल सिंह, शैलेन्द्र प्रताप सिंह, ठाकुर ईश्वर सिंह, ठाकुर देवी सिंह मंडावा आदि ने भी 36 कुलों का वर्णन किया है।

प्रसिद्ध इतिहासकार श्री चिंतामणि विनायक वैद्य ने पृथ्वीराज रासो में वर्णित पद्य को अपनी पुस्तक Medieval Hindu India में 36 शाखाओं का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि रवि, राशि और यादव वंश पुराणों में वर्णित वंश हैं तथा उनकी 36 शाखाएँ हैं। एक ही शाखा वाले का उसी शाखा में विवाह नहीं हो सकता।

इसे नीचे से ऊपर की ओर पढ़ने पर निम्न शाखाएँ प्राप्त होती हैं—

  1. कालछरक्के (कलचुरी) — यह हैहय वंश की शाखा है।

  2. कविनीश

  3. राजपाल

  4. निकुम्भवर

  5. धान्यपाल

  6. मट्ट

  7. कैमाश (कैलाश)

  8. गोड़

  9. हरीतट्ट

  10. हुल — कर्नल टॉड ने इसी शाखा को हूण लिख दिया है, जिससे इसे हूणों की भाँति माना जाने लगा। जबकि हुल, गहलोत वंश की खांप है।

  11. कोटपाल

  12. कारट्टपाल

  13. दधिपट — कर्नल टॉड ने इसे डिडियोट लिखा है।

  14. प्रतिहार

  15. योतिका — टॉड साहब ने इसे पाटका लिखा है।

  16. अनिग — टॉड साहब ने इसे अनंग लिखा है।

  17. सैन्धव

  18. टांक

  19. देवड़ा

  20. रोसजुत

  21. राठौड़

  22. परिहार

  23. चापोत्कट (चावड़ा)

  24. गुहिलौत

  25. गोहिल

  26. गरूआ

  27. मकवाना

  28. दोयमत

  29. अमीयर

  30. सिलार

  31. छदंक

  32. चालुक्य

  33. चहुवान

  34. सदावर

  35. परमार

  36. ककुत्स्थ

श्री मोहनलाल पांड्या ने इस सूची का विश्लेषण करते हुए ककुत्स्थ को कछवाहा, सदावर को तंवर, छदंक को चंद या चंदेल तथा दोयमत को दाहिमा लिखा है। इसी सूची में वर्णित रोसजुत, अनंग, योतिका, दधिपट, कारट्टपाल, कोटपाल, हरीतट्ट, कैमाश, धान्यपाल, राजपाल आदि वंश आजकल नहीं मिलते। जबकि आज के प्रसिद्ध वंश—बैस, भाटी, झाला, सेंगर आदि—का इस सूची में उल्लेख नहीं हुआ है।

मतिराम के अनुसार छत्तीस कुलों की सूची इस प्रकार है—

  1. सूर्यवंश

  2. पेलवार

  3. राठौड़

  4. लोहथम्भ

  5. रघुवंशी

  6. कछवाहा

  7. सिरमौर

  8. गहलोत

  9. बघेल

  10. काबा

  11. श्रीनेत

  12. निकुम्भ

  13. कौशिक

  14. चन्देल

  15. यदुवंश

  16. भाटी

  17. तोमर

  18. बनाफर

  19. काकन

  20. रहिहो वंश

  21. गहरवार

  22. करमवार

  23. रैकवार

  24. चंद्रवंशी

  25. शकरवार

  26. गौर

  27. दीक्षित

  28. बड़वालिया

  29. विश्वेन

  30. गौतम

  31. सेंगर

  32. उदयवालिया

  33. चौहान

  34. पड़िहार

  35. सोलंकी

  36. परमार

इन्होंने भी कुछ प्रसिद्ध वंशों को छोड़कर कुछ नए वंश लिख दिए हैं। इन्होंने भी प्रसिद्ध बैस वंश का उल्लेख नहीं किया है।

कर्नल टॉड के पास छत्तीस कुलों की पाँच सूचियाँ थीं, जो उन्होंने इस प्रकार प्राप्त की थीं—

  1. मारवाड़ के नाडोल नगर के एक जैन मंदिर के यति से।

  2. चंदबरदाई कृत पृथ्वीराज रासो से।

  3. कुमारपाल चरित्र से, जो जिन मण्डनोपाध्याय कृत माना जाता है।

  4. खींचियों के भाट से।

  5. भाटियों के भाट से।

इन सभी सूचियों की सामग्री को मिलाकर उन्होंने यह सूची प्रकाशित की—

  1. गहलोत

  2. यादु (यादव)

  3. तुआर

  4. राठौर

  5. कुशवाहा

  6. परमार

  7. चाहुवान (चौहान)

  8. चालुक (सोलंकी)

  9. प्रतिहार (परिहार)

  10. चावड़ा

  11. टाक (तक्षक)

  12. जाट

  13. हूण

  14. कट्टी

  15. बल्ला

  16. झाला

  17. जैटवा

  18. गोहिल

  19. सर्वया

  20. सिलार

  21. डाबी

  22. गौर

  23. डोर (डोडा)

  24. गहरवाल

  25. चन्देला

  26. वीरगूजर

  27. सेंगर

  28. सिकरवाल

  29. बैस

  30. दहिया

  31. जोहिया

  32. मोहिल

  33. निकुम्भ

  34. राजपाली

  35. दाहरिया

  36. दाहिमा

किसी कवि ने राजपूतों के वंशों का विवरण निम्न दोहे में किया है—

दस रवि स दस चंद्र से, द्वादस ऋषि प्रमाण।
चारी हुताशन यज्ञ से, यह छत्तीस कुल जान।।

इस प्रकार इस दोहे में छह वंशों और छत्तीस कुलों की चर्चा की गई है।


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क्षत्रियों/राजपूतों का ऐतिहासिक महत्व



भारत में वर्ण-व्यवस्था की शुरुआत से पहले ही क्षत्रियों के अस्तित्व की जानकारी उपलब्ध है। ऋग्वेद में अनेक स्थानों पर "क्षत्र" एवं "क्षत्रिय" शब्द का प्रयोग किया गया है। ऋग्वेद में "क्षत्रिय" शब्द का प्रयोग शासक वर्ग के व्यक्तित्व का सूचक है। यहाँ "क्षत्र" का प्रयोग प्रायः शूरता एवं वीरता के अर्थ में हुआ है, जिसका अभिप्राय लोगों की रक्षा करना तथा गरीबों को संरक्षण देना था। यहाँ क्षत्रिय शब्द का प्रयोग राजा के लिए किया गया है। अतः समाज में क्षत्रियों का एक समूह बन गया, जिसने शौर्य, वीरता और भूस्वामी के रूप में अपना आधिपत्य स्थापित किया और शासक के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

उत्तर वैदिक काल तक क्षत्रियों को राजकुल से संबंधित मान लिया गया। इस वर्ग के व्यक्ति युद्ध-कौशल और प्रशासनिक योग्यता में अग्रणी माने जाने लगे। यह समय क्षत्रियों के उत्कर्ष का समय था। इस काल में क्षत्रियों को वंशानुगत अधिकार मिल गया था तथा वे शस्त्र और शास्त्र के ज्ञाता भी बन गए थे। इस प्रकार राजा, जो क्षत्रिय होता था, वह राज्य और धर्म दोनों पर प्रभावी हुआ। पुरोहितों पर राजा का इतना प्रभाव पड़ा कि वे राजा का गुणगान करने लगे तथा उन्हें महिमामंडित करने के लिए दैवी गुणों से अलंकृत किया और उन्हें देवत्व प्रदान किया। अपनी शक्ति के प्रभाव से राजा को अदण्डनीय घोषित किया गया।

राजपद एवं राजा की प्रतिष्ठा के साथ क्षत्रियों की प्रतिष्ठा में भी वृद्धि हुई। वृहदारण्यक उपनिषद् में कहा गया है कि क्षत्रिय से श्रेष्ठ कोई नहीं है। ब्राह्मण का स्थान उसके बाद आता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य-शक्ति से सम्पन्न क्षत्रिय, जो ब्राह्मणों के रक्षक और पालक थे, सामाजिक क्षेत्र में श्रेष्ठ स्वीकार किए गए। ब्राह्मणों की श्रेष्ठता का आधार उनका बौद्धिक एवं दार्शनिक होना था। इसका ह्रास हुआ और क्षत्रिय इन क्षेत्रों में भी अग्रणी हुए। राजा जनक, प्रवाहण जाबालि, अश्वपति, कैकेय और काशी नरेश अजातशत्रु ऐसे शासक थे, जिनसे शिक्षा-दीक्षा ग्रहण करने ब्राह्मण आते थे। पौरोहित्य, याज्ञिक क्रियाओं तथा दार्शनिक गवेषणाओं में भी क्षत्रियों ने ब्राह्मणों के एकाधिकार को चुनौती दी। इन परिस्थितियों में क्षत्रियों ने ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को अस्वीकार किया। महाभारत में तो यहाँ तक कहा गया कि ब्राह्मणों को क्षति से बचाने के कारण ये "क्षत्रिय" कहे गए। इस प्रकार क्षत्रियों ने शस्त्र और शास्त्र दोनों के ज्ञाता होकर अपनी श्रेष्ठता स्थापित की।


 


इस पूर्ण भू-भारत के चप्पे-चप्पे को अपने रक्त से सींचने वाले क्षत्रिय वंश के पूर्वज ही तो थे। इनकी कितनी सुन्दर समाज-व्यवस्था, कितनी आदर्श परिवार-व्यवस्था, कितनी निष्कपट राज-व्यवस्था, कितनी कल्याणकारी अर्थव्यवस्था और कितनी ऊँची धर्म-व्यवस्था थी। आज भी क्षत्रिय वंश और भारत को उन व्यवस्थाओं पर गर्व है। ये व्यवस्थाएँ क्षत्रिय वंश द्वारा निर्मित, रक्षित और संचालित थीं। इसके उपरान्त विश्व-साहित्य के अनुपम ग्रन्थ महाभारत और रामायण इसी काल में निर्मित हुए। गीता जैसा अमूल्य रत्न भी इसी वंश की कहानी कहता है, जिसका मूल्यांकन आज का विद्वान न कर सका है और न कर सकता है। इन दोनों ग्रन्थों में क्षत्रिय वंश के पूर्वजों की गौरवगाथाएँ और महिमा का वर्णन है, जिन्होंने विश्व-विजय की थी और इस भू-खण्ड के चक्रवर्ती सम्राट रहे थे। महाभारत का युद्ध दो भाइयों के परिवार का साधारण गृह-युद्ध नहीं था। वह धर्म और अधर्म का युद्ध था, जो क्षत्रिय धर्म के औचित्य और स्वरूप को स्थिर रखने का उदाहरण था।

परम ब्रह्म परमात्मा के रूप में जिस भगवान कृष्ण की भक्ति का भागवत में वर्णन किया गया है, वे 16 कलाओं से परिपूर्ण भगवान कृष्ण भी तो हमारे पूर्वज थे। यह जाति अति आदर्शवान, उच्च, निर्भीक और अद्वितीय है। वह अधर्म, अन्याय, अत्याचार, असत्य और उत्पीड़न के सामने झुकना या नतमस्तक होना नहीं जानती तथा वह पराजय व पतन को भी विजय और उल्लास में बदलना जानती है। रघुवंशियों की गौरवगाथा और उज्ज्वल महिमा का वर्णन रघुवंश में दिया गया है। इसे पढ़ने पर मन आनन्दित और आत्मा पुलकित हो उठती है।

परम श्रद्धेय अयोध्यापति श्रीराम रघुवंशी भी तो हमारे पूर्वज थे। उनके गौरव व बड़प्पन की तुलना संसार में किसी से नहीं की जा सकती। यही नहीं, बौद्ध धर्म और जैन धर्म के प्रवर्तक तथा अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले क्षत्रिय पुत्र भगवान बुद्ध और क्षत्रिय पुत्र महावीर ही तो थे, जिन्होंने उस समय देश को अहिंसा का पाठ पढ़ाया। अतः इस वसुन्धरा में क्षत्रिय जाति को छोड़कर कोई अन्य जाति विद्यमान नहीं है, जिसके पीछे इतना साहित्यिक बल, प्रेरणा के स्रोत तथा जिसकी गौरवमयी गरिमा एवं शौर्य का वर्णन इतने व्यापक और प्रभावपूर्ण ढंग से हुआ हो। अपने सम्मान और कुल-गौरव की रक्षा के लिए वीरांगनाओं ने अग्नि-स्नान (जौहर) और धारा (तलवार) स्नान किया है। मैं यह मानने के लिए कभी तैयार नहीं हूँ कि जिस जाति और वंश के पास इतनी अमूल्य तथा अटूट साहित्यिक निधि हो, वह स्वयं अपने ऊपर गर्व नहीं कर सकती।

सतयुग का इतिहास हमें वैदिक वाङ्मय के रूप में देखने को मिलता है। वैदिक और उत्तरवैदिक साहित्य में तत्कालीन जीवन-दर्शन, समाज-व्यवस्था आदि का सांगोपांग चित्रण मिलता है। त्रेता और द्वापर युगों के इतिहास पर समस्त पौराणिक साहित्य भरा पड़ा है। वाल्मीकि रामायण और महाभारत उसी इतिहास के दो अमूल्य ग्रन्थ हैं। महाभारत काल के पूर्व का हजारों वर्षों का इतिहास क्षत्रिय इतिहास मात्र है। महाभारत काल के पश्चात् लगभग डेढ़ हजार वर्ष का इतिहास भारतीय इतिहास की दृष्टि से अंधकार का युग कहा जा सकता है, पर यह बताने में हमें तनिक भी संकोच नहीं है कि उस समय का समस्त भारत और आस-पास के प्रदेशों पर क्षत्रियों का सर्वभौम प्रभुत्व था।

मौर्यकाल का इतिहास तिथिवार और क्रमवार उपलब्ध है। मौर्यकाल से लेकर मुसलमानों के आक्रमण तक भारत की क्षत्रिय जाति सर्वभौम प्रभुत्व सम्पन्न जाति रही है। इस्लामी प्रभुत्व के समय में भी जौहर और शाका करके जीवित रहने वाली, मर-मरकर पुनः जीवित होने वाली क्षत्रिय जाति का इतिहास हिन्दू भारत का इतिहास है। अतः मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि संसार के प्राचीनतम सभ्य देश भारत के इतिहास में से क्षत्रिय इतिहास निकाल देने के उपरान्त कुछ भी नहीं बचता। अतः दूसरे शब्दों में यह कहा जाए कि मूलतः क्षत्रियों का इतिहास ही भारत का इतिहास है।


इस प्रकार महान और व्यापक हिन्दू संस्कृति के अन्तर्गत क्षत्रियों (राजपूतों) की अपनी एक विशिष्ट संस्कृति रही है। यह विशिष्ट संस्कृति कालान्तर में विशिष्ट आचार-विचार, विशिष्ट भाषा, विशिष्ट साहित्य, विशिष्ट इतिहास, विशिष्ट कला-कौशल, विशिष्ट राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक व्यवस्थाओं के कारण और भी सबल बनी है।

अतः राजपूत एक ऐसा वंश है, जिसके स्वयं के राजनियम, राजविधान तथा शासन-प्रणाली सभ्य संसार के इतिहास में सबसे अधिक समय तक प्रचलित रहे हैं तथा सबसे अधिक कल्याणकारी और सफल सिद्ध हुए हैं। बीच-बीच में कुछ राजाओं द्वारा अपने अलग नियम तथा प्रजा के अमंगलकारी कार्यों के कारण पूरे क्षत्रिय वंश को बुरा नहीं कहा जा सकता। जहाँ राजपूतों ने एक ओर भारतीय संस्कृति की रक्षा की, वहीं दूसरी ओर उन्होंने अपनी स्वयं की विशिष्ट संस्कृति का निर्माण किया। यह विशिष्ट राजपूत संस्कृति आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परिलक्षित होती है।

यहाँ मैं कहना चाहूँगा कि सभी क्षत्रिय शासक निरंकुश नहीं थे, बल्कि इनके समय में शिक्षा, कला, संगीत और संस्कृति की अद्भुत उन्नति हुई थी। कई तो स्वयं इसके पारखी भी थे और अनेक गरीबों के मित्र एवं संरक्षक थे। वे उन्हें सहायता एवं भोजन देते थे। इनमें महाराज हर्ष सबसे अग्रणी थे। वे बैस क्षत्रिय ही तो थे और अपनी बहन से माँगकर कपड़े पहनते थे।

बैसवाड़े में गंगा तट पर बहुत से महत्वपूर्ण स्थान हैं, जिनकी खुदाई कर हम अपने प्राचीन इतिहास को उजागर कर सकते हैं। यहाँ समय-समय पर प्राचीन तथा पुरातात्त्विक महत्व की वस्तुएँ, सिक्के, बर्तन और हथियार मिलते रहते हैं, जिससे हमारी प्राचीन सभ्यता का ज्ञान होता है। बैसवाड़ा का गंगा तटीय इलाका इन प्राचीन एवं पुरातात्त्विक वस्तुओं की खान है।

निश्चित रूप से यह कहना कठिन है कि कितने लाख वर्ष पहले हमारे पूर्वजों ने इस वर्ण-व्यवस्था को अपनाकर सामाजिक जीवन में एक महत्त्वशाली अनुशासन की व्यवस्था की थी। अतएव अतीत के उस सुदूर प्रभात में भी मानवता के लालन-पोषण और उसके लौकिक तथा पारलौकिक उत्कर्ष के लिए यदि कोई वर्ण उत्तरदायी था, तो वह वर्ण मुख्य रूप से क्षत्रिय ही था और यदि कोई जाति तथा व्यक्ति उत्तरदायी था, तो वह क्षत्रिय ही था।

पौराणिक काल के जम्बूद्वीप पर एकछत्र राज की यदि किसी जाति ने स्थापना की, तो वह एकमात्र क्षत्रिय ही थी। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस पृथ्वी को वर्तमान आकार और स्वरूप देने वाले तथा इसका दोहन कर समस्त जीवनोपयोगी सामग्री उपलब्ध कराने वाले व्यक्ति क्षत्रिय राजा पृथु ही थे। हिमालय से लेकर सुदूर दक्षिण तक तथा प्रशान्त महासागर से लेकर ईरान के अति पश्चिमी भाग तक के भू-खण्ड के अतिरिक्त पूर्वी भाग और असम पर भी क्षत्रियों का ही शासन था। यहाँ तक कि देवासुर संग्राम में देवताओं ने क्षत्रियों का तेज, क्षात्र-शक्ति और अन्तर्दृष्टि देखकर ही उनसे सहायता प्राप्त की।

एक ओर क्षत्रियों द्वारा रक्षित शान्ति के समय वेदों की रचना हुई तथा सर्वभौमिक सिद्धान्तों के प्रणेता उपनिषदों के अधिकांश आचार्य क्षत्रिय ही थे। कोई आज बता सकता है कि संसार में वह कौन-सी जाति है, जिसमें अवतरित मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की भारत के आधे से अधिक नर-नारी परमेश्वर के रूप में उपासना करते हैं? तथा कौन बता सकता है कि वह कौन-सी जाति है, जिसमें पुरुषोत्तम योगीराज भगवान कृष्ण अवतरित हुए? क्या कोई बता सकता है कि वह कौन-सी जाति थी, जिसके काल में वाल्मीकि रामायण, महाभारत एवं गीता की रचना हुई? क्या कोई बता सकता है कि सर्वप्रथम शान्ति और अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले बौद्ध धर्म के प्रवर्तक भगवान बुद्ध और जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान महावीर किस जाति के थे? इन सब प्रश्नों का उत्तर है—"क्षत्रिय"।



जिस समय संसार की अन्य जातियाँ अपने पैरों पर लड़खड़ाते हुए उठने का प्रयास कर रही थीं, उस समय भारतवर्ष में क्षत्रिय महान साम्राज्यों के अधिष्ठाता थे। वे साहित्य, कला, वैभव, ऐश्वर्य, सुख और शान्ति के जन्मदाता थे। स्वर्णयुगीन भारत, ज्ञानगुरु भारत और विश्व-विजयी भारत के शासक क्षत्रिय ही तो थे। विदेशी आक्रमणकारी यवन, शक, हूण और कुषाण जातियों को क्षत्रियों के बाहुबल के सामने नतमस्तक होना पड़ा था। यह क्षत्रिय ही तो थे, जिन्होंने इन आक्रमणकारी जातियों के अस्तित्व तक को भारत में आज ऐतिहासिक खोज बना दिया है। हम उन पूर्वजों को कैसे भुला सकते हैं, जिन्होंने देश भर में शौर्य और तेज के बल से प्रबल राज्यों का निर्माण कर इतिहास में राजपूत काल को अमर कर दिया।

इसके बाद इस्लाम धर्म का प्रबल तूफान उठा और भारत की प्राचीन संस्कृतियों, सुव्यवस्थित साम्राज्यों तथा दीर्घकालीन व्यवस्थाओं को एक के बाद एक करके धराशायी कर दिया। भारत में इन आक्रमणकारियों का सामना मुख्य रूप से क्षत्रियों को ही करना पड़ा। साम्राज्य नष्ट हुए, जातियाँ समाप्त हुईं, स्वतंत्रता विलुप्त हुई, पर संघर्ष बन्द नहीं हुआ।

क्या कोई इतिहासकार बता सकता है कि राजपूतों के अतिरिक्त संसार में कोई अन्य जाति हुई है, जिसने धर्म और सम्मान की रक्षा के लिए सैकड़ों शाके किए हों? क्या राजपूत नारियों के अतिरिक्त अन्य कोई ऐसी नारियाँ संसार में हुई हैं, जिन्होंने हँसते-हँसते जौहर कर प्राणों की आहुति दी हो तथा धारा (तलवार) स्नान किया हो? इसका उदाहरण इतिहास में अन्यत्र नहीं मिलेगा।

इस्लाम धर्म का प्रभाव सैकड़ों वर्षों तक क्षत्रियों से टकराकर निस्तेज होकर स्वतः शान्त हो गया। कितने आश्चर्य की बात है कि क्षत्रिय राज्यों के पश्चात् स्थापित होने वाला मुस्लिम राज्य, क्षत्रिय राज्यों से पहले ही समाप्त हो गया।

महात्मा बुद्ध के प्रभाव से अधिकांश क्षत्रियों ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और अहिंसा पर विश्वास करने लगे। अशोक महान एक शक्तिशाली राजा के रूप में उदित हुए। उसके बाद महाराजा हर्षवर्धन, जो कि एक बैस क्षत्रिय राजा थे, शीलादित्य के नाम से प्रसिद्ध हुए और एक चक्रवर्ती राजा का रूप लिया। जिनका शासन नर्मदा के उत्तर से नेपाल तक तथा अफगानिस्तान और ईरान से लेकर पूर्व में असम तक था और जिसके सम्मुख कोई भी राजा सिर नहीं उठा सकता था। उन्होंने भी अन्त में बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। साथ ही अधिकतर क्षत्रिय जाति ने भी बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और इनके बाद कोई प्रभावशाली उत्तराधिकारी न होने के कारण उनका राज्य छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त हो गया।

बौद्ध धर्म समाज की शाश्वत आवश्यकता एवं सुरक्षा के लिए अनुपयोगी सिद्ध हुआ। उसने राष्ट्र की स्वाभाविक क्षात्र-शक्ति को निस्तेज, पंगु और सिद्धान्तहीन बना दिया। वह राष्ट्र पर बाहरी आक्रमणों के समय असफल सिद्ध होने लगा। अतएव क्षत्रियों ने क्षात्रधर्म के प्रतिपादक वैदिक धर्म की पुनः स्थापना की, परन्तु शक्तिशाली केन्द्रीय शासन के अभाव में राजपूत राजा आपस में युद्ध करते-करते छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गए। जिसका लाभ मुस्लिम काल में मुस्लिम आक्रान्ताओं को मिला और क्षत्रिय अपनी शक्ति को क्षीण करते रहे तथा अपने अस्तित्व के लिए लड़ते रहे। वे भगवान कृष्ण के उपदेशों का पालन करते रहे, परन्तु संघर्ष को कभी विराम नहीं दिया।

भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि वास्तव में धर्मयुद्ध से बढ़कर कल्याणकारी कर्तव्य क्षत्रिय के लिए और कुछ नहीं—

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते॥

और यदि धर्मयुद्ध तथा संग्राम को क्षत्रिय नहीं करता, तो वह स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप का भागी होता है—

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥


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क्षमामूर्ति संत एकनाथ जी महाराज



भारत की संत परम्परा में एकनाथ जी महाराज का अपना विशेष स्थान है। भक्त श्रेष्ठ भानु प्रताप के पुत्र चक्रपाणि और चक्रपाणि के पुत्र सूर्यनारायण के घर लगभग 1590 संवत में एक बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम एकनाथ रखा गया। इनकी माता का नाम रुक्मणी था। बालक के जन्म के समय मूल नक्षत्र था जिसके प्रभाव से बालकपन में ही इनके माता पिता का देहांत हो गया। जब बालक एकनाथ अनाथ हो गया, तब इनका लालन-पालन इनके पितामह ने किया। 12 वर्ष की आयु में बालक एकनाथ के जीवन में घटना घटित होती है जब वे एक शिवालय में कीर्तन कर रहे थे तो रात्रि के अन्तिम पहर में आकाशवाणी होती है, ‘‘जाओ! देवगढ़ में जनार्दन पंत के दर्शन करो।’’ आकाशवाणी को सुनकर एकनाथ जी देवगढ़ की ओर चल पड़े और वहाँ उन्हें संवत् 1602 में जनार्दन पंत के दर्शन हुए। गुरुदेव श्री जनार्दन पंत ने एकनाथ जी को आश्रम की भोजन व्यवस्था का कार्य सौंप दिया। एक दिन एक पाई का हिसाब न मिलने के कारण वे पूरी रात हिसाब मिलाने में लगे रहे और जैसे ही उन्हें अपनी भूल ज्ञात हुई, वे अत्यधिक प्रसन्न होकर गुरुजी के पास आये। गुरुजी बोले, पुत्र! जब तुम एक पाई की भूल ज्ञात होने पर इतने प्रसन्न हो, तो जीवन की भूल जान लेने पर कितने प्रसन्न होंगे? कहा जाता है कि गुरुदेव जनार्दन पंत साक्षात् भगवान दत्तात्रेय थे।
 

एकनाथ जी के जीवन में बहुत से चमत्कार देखने एवं सुनने को मिलते हैं। कहा जाता है कि कृष्णा एवं गोदावरी नदियाँ भी मनस्वी रूप धारण कर आपकी कथा सुनने को आती थीं। एकनाथ जी महाराज दृढ़ विश्वास के साथ कथा का वर्णन करते थे। आपके जीवन की एक घटना इस प्रकार है- एक बार वे रामकथा कह रहे थे- प्रसंग था अशोक वाटिका में सीता जी एवं हनुमान का संभाषण। इसमें एकनाथ जी महाराज बोले कि अशोक वाटिका में सफेद रंग के पुष्प थे, इस पर श्री हनुमान जी ने प्रकट हो कर कहा कि वाटिका के पुष्प लाल रंग के थे। इस पर एकनाथ जी ने कहा, नहीं! पुष्प सफेद रंग के थे। श्री हनुमान जी ने कहा कि आप माँ जानकी जी से पूछ लीजिए। श्री जानकी जी ने कहा कि वत्स हनुमान ठीक कह रहे हैं, वाटिका के पुष्प लाल रंग के ही थे। पुनः एकनाथ जी ने अपने पक्ष पर जोर देकर कहा कि अशोक वाटिका में पुष्प सफेद रंग के ही थे, लाल रंग के नहीं। अब ये तीनों वादी भगवान श्री रामचंद्र जी के पास आये और भगवान के सम्मुख अपना पक्ष रखा। तब भगवान ने विवाद को निपटाते हुए कहा कि अशोक वाटिका के पुष्प सफेद रंग के थे परन्तु हनुमान जी एवं जानकी जी को क्रोध के कारण सफेद रंग के पुष्प लाल रंग के दिखाई पड़ रहे थे। यह एकनाथ जी महाराज का दृढ़ विश्वास था। इस संदर्भ में गोस्वामी जी कहते हैं-
बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु।
राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु।। मानस उत्तर. दो.-10

दूसरी घटना
एक बार एकनाथ जी महाराज अपनी संत मण्डली के साथ गोमुख से गंगा जल लेकर सेतुबंध रामेश्वरम की ओर जा रहे थे, रामेश्वरम के निकट समुद्र के रेत में एक गधा प्यास से व्याकुल होकर कातर दृष्टि से देख रहा था। एकनाथ जी ने अपनी काँवर में उपस्थित जल पिलाकर संत मण्डली से कहा कि यदि आप अपनी काँवर का जल भी इस गधे को पिला दें तो इसके प्राण बच सकते हैं। इस पर संत मण्डली ने विरोध तो प्रकट किया परन्तु एकनाथ जी महाराज के निवेदन को टाल न सके जैसे ही गधे ने गंगाजल ग्रहण किया, साक्षात भगवान गौरी शंकर प्रकट हो गये।

तीसरी घटना
एक बार एकनाथ जी महाराज ने अपने पितरों को श्राद्ध करने के लिए बहुत स्वादिष्ट भोजन बनवाया तथा श्राद्ध का भोजन ग्रहण करने के लिए ब्राह्मणों को आमंत्रित किया। ब्राह्मणों के आने से पूर्व ही कुछ महर जाति के लोग वहाँ से गुजर रहे थे, भोजन की सुगंध से प्रभावित होकर उन्होने कहा कि अहा! कितने सुंदर एवं स्वादिष्ट व्यंजनों की सुगंध आ रही है। एकनाथ जी के इतना सुनने पर आपने महर जाति के लोगों को रोक कर भोजन करवाया। इसके पश्चात् ब्राह्मणों ने जब यह सुना तो वे बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने श्राद्ध ग्रहण करने से इनकार कर दिया तत्पश्चात् घटना कहती है कि पितरों ने साक्षात प्रकट होकर श्राद्ध ग्रहण किया।
 
चौथी घटना
एक बार कुछ चोरों ने चोरी करने के उद्देश्य से एकनाथ जी के घर में प्रवेश किया, घर का सम्पूर्ण सामान इकट्ठा कर, जब वे चलने लगे तो अंधे हो कर सामान से टकराकर गिरने लगे। इसी समय एकनाथ जी महाराज की समाधि टूटी तो इन्होंने चोरों को दृष्टि देकर सामान भी साथ दे दिया।

पाँचवी घटना
एक बार पैथड़ में एक वेश्या रहती थी। वेश्या के विषय में तो सभी लोग जानते ही हैं। एक दिन वेश्या एकनाथ जी महाराज से मिलने गयी और महाराज श्री से निवेदन भी किया कि आप मेरा स्थान भी पवित्र कीजिए। इस पर एकनाथ जी ने कहा, ‘‘अवश्य। एकनाथ जी महाराज ने समाज की संकीर्ण रूढि़ को तोड़कर वेश्या के घर जाकर, उसे परम पवित्र कर दिया। घटना कहती है कि उसी दिन से वेश्या भगवद्भजन करने लग गयी।

छटी घटना
एक दिन अत्यधिक वर्षा हो रही थी। अर्द्धरात्रि के समय चार ब्राह्मण एकनाथ जी महाराज के घर पहुंचे। कई दिनों से लगातार वर्षा के कारण घर पर सूखे ईंधन का अभाव था। एकनाथ जी को ब्राह्मणों की सेवा के लिए सूखे ईंधन की आवश्यकता थी, तो इन्होंने अपने पलंग को तोड़कर सूखे ईंधन की व्यवस्था करके, ब्राह्मणों की यथा योग्य सेवा की।

सातवीं घटना
एकनाथ जी महाराज का गोदावरी स्नान करने का नित्य का नियम था। एक दिन प्रातः जब महाराज जी गोदावरी स्नान करके लौट रहे थे, तब सराय के पास रहने वाले एक मुसलमान युवक ने उनके ऊपर कुल्ला कर दिया। महाराज श्री पुनः गोदावरी स्नान के लिए चल पड़े, लौटने पर मुसलमान युवक ने पुनः अपनी करतूत दोहरा दी। यह क्रम 108 वार तक चला। 108 वीं बार युवक का हृदय द्रवीभूत हो गया। उसने एकनाथ जी महाराज के चरण पकड़कर क्षमा याचना की। इस पर महाराज जी ने कहा, ‘‘बेटा! तू धन्य है, तेरी कृपा से आज एकादशी के दिन मेरा 108 बार गोदावरी स्नान हो गया। इसी परिप्रेक्ष्य में संत कवि कहते हैं-
जो सहि दुख परछिद्र दुुरावा। बंदनीय जेंहि जग जस पावा।।
मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू।। मानस बाल. दो. 01-06,07

आठवीं घटना
एक बार कुछ असामाजिक तत्वों ने मिलकर प्रस्ताव बनाया कि एकनाथ जी महाराज को क्रोधित किया जाए। उनमें से एक युवक ने अपने सभी साथियों के समक्ष संकल्प किया कि वह एकनाथ जी को क्रोधित कर सकता है। युवक ने योजनानुसार कार्य करना शुरू किया। वह जूते पहन कर एकनाथ जी महाराज की रसोई में घूमने लगा और घर को दूषित करने का प्रयोजन करने लगा। एकनाथ जी महाराज की धर्मपत्नी घर को बुहार रहीं थीं, तो वह उछल कर उनकी पीठ पर बैठ गया। एकनाथ जी ने उसे ऐसा करते देखकर अपनी पत्नी से कहा, ‘‘बच्चा आपकी पीठ पर बैठा है, उसे चोट नहीं लगनी चाहिए।’’ तब उनकी पत्नी ने कहा, ‘‘यह तो मेरे बच्चे जैसा है। मैं इसे अपने बच्चे की तरह रखूँगी तथा दुलार करूँगीं।’’ इतना सुनते ही युवक की सम्पूर्ण शरारत सिर के बल दौड़ गयी। उसने दोनों से क्षमा माँगी।


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महाराज छत्रसाल



पन्ना नरेश महाराज चम्पतराय जी बडे़ धर्मनिष्ठ एवं स्वाभिमानी शासक थे। ज्येष्ठ शुक्ल तृृतीया विक्रम सम्वत 1706 को  बालक  छत्रसाल  का  उनके  मोर पहाड़ी के जंगल में जन्म हुआ। उस समय मुगल सम्राट शाहजहां की सेना चारों ओर से घेरा डालने के प्रयत्न में थी। इसलिए इनके पिता ने पुत्र जन्म का उत्सव नहीं मनाया था। पिता की मृृत्यु के पश्चात् 13 वर्ष की अवस्था तक छत्रसाल को ननिहाल में रहना पड़ा और उसके बाद वह पन्ना चले आए और चाचा सुजानराव ने बड़ी सावधानी  से  उन्हें  नैतिक  शिक्षा  दी। आरम्भ से ही छत्रसाल के मन में मुगलों के अत्याचारों से भारत को मुक्त कराने की आकांक्षा थी।

महाराज चम्पतराय का शरीरान्त हो  जाने  पर  युवराज  छत्रसाल  अपने पिता के संकल्प को पूरा करने के लिए सिंहासन पर बैठे। उस समय दिल्ली के सिंहासन पर औरंगजेब बैठ चुका था। उन्हें छत्रपति शिवाजी महाराज से बड़ी प्रेरणा मिली और छत्रपति शिवाजी की सलाह  के  अनुसार  ही  उन्होंने  अपनी शक्ति से मुगलों से अपनी जन्मभूमि को मुक्त कराने का बीड़ा उठाया। उन्होंने सबसे पहले झांसी को अपना निशाना बनाया और बलपूर्वक झांसी पर अधिकार कर लिया। 

1671 ई0 में जलायून, (जालौन) में उनका घोर संग्राम हुआ और सन 1680 में हमीरपुर पर भी उन्होंने अपना राज्य स्थापित कर लिया।  मुगलों ने कूटनीतिक चाल से आपको फांसने की कोशिश की लेकिन छत्रसाल जहां महान शक्तिशाली थे वहीं बडे़ नीतिज्ञ भी थे। वे समझ गए कि दिल्लीपति उनसे सीधी टक्कर नहीं लेकर नवाब अहमदखान के द्वारा उन्हें घेरना चाहता है। छत्रसाल ने तुरंत पेशवा बाजीराव प्रभु से सहायता मांगी और फिर महाराष्ट्र और बुंदेलों की संयुक्त सेना ने बुंदेलखण्ड को स्वतंत्र करा के हिन्दू गौरव की पताका लहरा दी।

वीररस के शिरोमणि कवि भूषण को केवल दो ही व्यक्तियों को अपनी शौर्य गाथा का केन्द्र बनाना रास आया। उन्होंने  लिखा-‘शिवा  को  सराहों,  के सराहों  छत्रसाल  कौं’  छत्रसाल  के राजकवि लाल ने ‘छत्र प्रकाश’ में उनके शौर्य का बहुत ही सुंदर वर्णन किया है। बुंदेलखण्ड की प्रजा उन्हें साक्षात् देवता मानती थी। अपनी प्रजा के दुःख में वे सदैव ही दुःखी हो उठते थे। छत्रसाल महाराज के हृदय में अंत तक हिन्दू धर्म के उद्धार की तीव्र ज्वाला प्रज्ज्वलित रही। मुगलों से लोहा लेते हुए इस महान धर्मरक्षक  ने  अपने  आपको  भारत  की पवित्र भूमि में विलीन कर दिया। आपकी जीवनी देशभक्तों को सदा प्रेरित करती रहेगी।


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