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विष्णु सहस्रनाम
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रूप बड़ा या गुण
एक बार महाकवि कालिदास राजा विक्रमादित्य के साथ बैठे हुए थे। गर्मियों के दिन थे। राजा और महाकवि कालिदास गर्मी से बेहद परेशान थे। दोनों के षरीर पसीने से लथपथ थे। प्यास के मारे बार-बार कंठ सूखा जा रहा था। दोनों के पास मिट्टी की एक-एक सुराही रखी हुई थी। प्यास बुझाने के लिये थोड़ी-थोड़ी देर में उन्हें पानी पीना पड़ रहा था।
राजा विक्रमादित्य बहुत ही सुन्दर व्यक्ति थे, जबकि कालिदास उतने सुन्दर नहीं थे। विक्रमादित्य का ध्यान महाकवि के चेहरे की ओर गया। वे चुटकी लेने के लिये बोल पड़े- ‘‘महाकवि, इसमें संदेह नहीं कि आप अत्यंत विद्वान, चतुर और गुणी हैं, लेकिन ईश्वर ने यदि आपको सुन्दर रूप भी दिया होता तो कितना अच्छा होता’’?
‘‘महाराज, इसका उत्तर मैं आपको आज नहीं, कल दूँगा।’’ कालिदास ने कहा।
संध्या होते ही कालिदास सीधे सुनार के पास गए। उन्होंने उसे रातों-रात सोने की एक सुन्दर सुराही तैयार करने का आदेश दिया और घर लौट गए।
अगले दिन कालिदास ने पहले ही पहुँच कर राजा की मिट्टी की सुराही हटा दी और उसके स्थान पर सोने की सुराही कपड़े से ढक कर रख दी।
ठीक समय पर राजा विक्रमादित्य कक्ष में पधारे। राजा विक्रमादित्य और महाकवि कालिदास वार्तालाप करने लगे।
कल की तरह आज भी बहुत गर्मी थी। राजा को प्यास लगी। उन्होंने पानी के लिए संकेत किया। एक सेवक ने उनकी सुराही से पानी निकाल कर दिया। पानी होंठों से लगाते ही वे सेवक पर बरस पड़े- ‘‘क्या सुराही में उबला पानी भर के रखा है?’’ सेवक की तो घिग्घी बँध गई।
महाकवि कालिदास ने सुराही का कपड़ा हटाया। सोने की सुराही देखकर राजा विक्रमादित्य दंग रह गये।
राजा विक्रमादित्य ने कहा- ‘‘हद हो गई। पानी भी कहीं सोने की सुराही में रखा जाता है? कहाँ गई मिट्टी की सुराही? सोने की सुराही यहाँ किस मूर्ख ने रखी है?
कालिदास ने शान्त स्वर में कहा -‘‘वह मूर्ख मैं ही हूँ श्रीमान!’’
‘‘महाकवि आप?’’
‘‘जी हाँ, महाराज! आप सुन्दरता के पुजारी हैं न? आपकी यह सुराही साधारण मिट्टी की थी सो उसे हटा कर मैंने सोने की यह सुन्दर सुराही रख दी। क्या यह अच्छी नहीं है?’’ सोने की सुराही में तो पानी और भी अधिक ठंडा और स्वादिष्ट होना चाहिए?
महाराज, महाकवि का आशय समझ गए। उन्होंने महाकवि से क्षमा माँगी और कहा कि ‘‘आपने मेरी आँखें खोल दीं। अब मुझे समझ में आ गया कि महत्व बाहरी सुंदरता का नहीं, बल्कि आंतरिक गुणों का होता है।’’
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नास्तिक की भक्ति
इसी बीच लाइट भी चली गयी और सब दोस्त जाने लगे। बारिश भी थोड़ा थम चुकी थी, उस लड़के की पुकार सुनकर ताश खेलते-खेलते ही हरिराम ने दवाई के उस पर्चे को हाथ में लिया और दवाई लेने को उठा। ताश के खेल को पूरा न कर पाने के कारण अनमने मन से अपने अनुभव के आधार पर अँधेरे में ही दवाई की
उस शीशी को झट से निकाल कर उसने लड़के को दे दिया। उस लड़के ने दवाई का दाम पूछा और उचित दाम देकर बाकी के पैसे भी अपनी जेब में रख लिये। लड़का खुशी-खुशी दवाई की शीशी लेकर चला गया। वह आज दूकान को जल्दी बन्द करने की सोच रहा था। थोड़ी देर बाद लाइट आ गयी और वह यह देखकर दंग रह गया कि उसने दवाई की शीशी समझकर उस लड़के को जो दिया था, वह चूहे मारने वाली जहरीली दवा है, जिसे उसके किसी ग्राहक ने थोड़ी ही देर पहले लौटाया था और ताश खेलने की धुन में उसने अन्य दवाइयों के बीच यह सोचकर रख दिया था कि ताश की बाजी के बाद फिर उसे अपनी जगह पर वापस रख देगा।
अब उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसकी दस साल की नेकी पर मानो जैसे ग्रहण लग गया। उस लड़के के बारे में सोचकर वह तड़पने लगा। सोचा यदि यह दवाई वह अपनी बीमार माँ को देगा, तो वह अवश्य मर जाएगी। लड़का भी बहुत छोटा होने के कारण उस दवाई को तो पढ़ना भी नहीं जानता होगा। उस पल वह अपनी इस भूल को कोसने लगा और उसने ताश खेलने की अपनी आदत को छोड़ने का निश्चय कर लिया। पर यह बात तो बाद में देखी जाएगी। अब क्या किया जाय? उस लड़के का पता-ठिकाना भी तो वह नहीं जानता। कैसे उस बीमार माँ को बचाया जाय? सच, कितना विश्वास था उस लड़के की आँखों में। हरिराम को कुछ सूझ नहीं रहा था। घर जाने की उसकी इच्छा अब ठंडी पड़ गयी। दुविधा और बेचैनी उसे घेरे हुए थी। घबराहट में वह इधर-उधर देखने लगा।
पहली बार उसकी दृष्टि दीवार के उस कोने में पड़ी, जहाँ उसके पिता ने जिद करके भगवान श्रीकृष्ण की तस्वीर दूकान के उद्घाटन के वक्त लगायी थी। हरिराम से हुई बहस में एक दिन उसके पिता ने हरिराम से भगवान को कम से कम एक शक्ति के रूप मानने और पूजा की मिन्नत की थी। उन्होंने कहा था कि भगवान की भक्ति में बड़ी शक्ति होती है, वह हर जगह व्याप्त है और हमें सदैव अच्छे कार्य करने की प्रेरणा देता है। हरिराम को यह सारी बात याद आने लगी। आज उसने इस अद्भुत शक्ति को आज़माना चाहा। उसने कई बार अपने पिता को भगवान की तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर, आँखें बन्द करके ध्यान करते हुए देखा था। उसने भी आज पहली बार कमरे के कोने में रखी उस धूल भरी कृष्ण की तस्वीर को देखा और आँखें बन्द कर दोनों हाथों को जोड़कर वहीं खड़ा हो गया। इसके थोड़ी ही देर बाद वह छोटा लड़का फिर दूकान में आया। हरिराम को पसीना छूटने लगा। वह बहुत अधीर हो उठा। पसीना पोंछते हुए उसने कहा क्या बात है बेटा! तुम्हें क्या चाहिये?
लड़के की आँखों से पानी छलकने लगा। उसने रुकते-रुकते कहा-बाबूजी" बाबूजी! माँ को बचाने के लिये मैं दवाई की शीशी लिये भागा जा रहा था, घर के करीब पहुंच भी गया था, बारिश की वजह से आँगन में पानी भरा था और मैं फिसल गया। दवाई की शीशी गिरकर टूट गया। क्या आप मुझे वही दवाई की दूसरी शीशी दे सकते हैं बाबूजी? लड़के ने उदास होकर पूछा।
हाँ! हाँ! क्यों नहीं? हरिरामने राहत की साँस लेते हुए कहा। लो, यह दवाई! पर उस लड़के ने दवाई की शीशी लेते-लेते हिचकिचाते हुए बड़े ही भोलेपन से कहा 'बाबूजी! मेरे पास दवा के लिये पूरे पैसे अभी नहीं हैं।' हरिराम को उस बेचारे पर दया आयी। वह बोला 'कोई बात नहीं- तुम यह दवाई ले जाओ और अपनी माँ को बचाओ। जाओ, जल्दी करो और हाँ, अबकी बार जरा सँभल के जाना।'
लड़का 'अच्छा बाबूजी!' कहता हुआ खुशी से चल पड़ा। अब हरिराम की जान में जान आयी। वह भगवान को धन्यवाद देता हुआ अपने हाथों से उस धूल भरी तस्वीर को लेकर अपनी धोती से पोंछने लगा और उसे अपने सीने से लगा लिया। अपने भीतर हुए इस परिवर्तन को वह सबसे पहले अपने घरवालों को सुनाना चाहता था, इसलिये जल्दी से दुकान बन्द करके वह घर को रवाना हुआ। उसकी नास्तिकता की घोर अँधेरी रात भी अब बीत गयी थी और अगले दिन की नयी सुबह एक नये हरिराम की प्रतीक्षा कर रही थी।
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प्रेम ही ईश्वर है
* मेढ़ा - सींग वाला एक चौपाया जो लगभग डेढ़ हाथ ऊँचा और घने रोयों से ढका होता है ।
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प्रेरक कहानी - कर्म की जड़ें
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प्रेरक प्रसंग - माया का मुखौटा
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एक तत्त्वबोधक प्रेरक कथा
प्रसंग का भावार्थ - इस दृष्टान्त का अर्थ यह है कि वह 'प्रतिष्ठानपुर' कोई नगर विशेष नहीं है, अपितु जिसमें सब चीजें प्रतिष्ठित हैं, उसका ही नाम प्रतिष्ठानपुर है और उसमें 'पृथ्वीरूप' राजा यह जीव है-यह पार्थिव देहवाला है। पृथ्वी के विकार का यह शरीर धारण किये हुए है, इसलिये यह पृथ्वीरूप राजा है। उससे वेदरूप भिक्षु जब मिलता है तो वह कहता है कि 'हे जीव! तेरे प्राप्त करने लायक पराविद्या अर्थात् ब्रह्मविद्या ही है, वही तुम्हारी पत्नी (जीवनसंगिनी) बनने योग्य है। इस पृथ्वीलोक के अन्दर जितने भी पदार्थ हैं, पार्थिव पदार्थ हैं, वे तेरे योग्य नहीं हैं, क्योंकि तेरी सुन्दरता चेतन की सुन्दरता है, मुक्तिपुर में रहनेवाली रूपलता ही तुम्हारी पत्नी बनने के योग्य है। पराविद्या ही रूपलता है। तत्त्वज्ञ भिक्षु (सद्गुरु) दोनों को मिलाने का काम करता है, सो यह साधन स्वरूप बुद्धि ही तत्व वेत्ता भिक्षु है, जिससे वेद के अर्थ का ज्ञान होता है। बुद्धि के द्वारा जिसको समझा जाय अर्थात् शुद्ध बुद्धि के द्वारा प्राप्त किया जाय, वही शास्त्र ज्ञान है। ब्रह्मविद्या तो पहले से ही जानती है कि मैं किसका विषय हूँ अर्थात् चेतन का ही विषय हूँ, इसलिये यह कभी नहीं समझना चाहिये कि मैं तो ब्रह्मविद्या को चाहता हूँ, क्या पता वह मुझे वरण करे या न करे परंतु जब तक तुम उसके समक्ष नहीं जाओगे, तब तक विवाह तो होगा नहीं। रास्ते में अनेक विघ्न आयेंगे, जैसे प्रतिष्ठानपुर की कोई स्त्री नहीं चाहती कि राजा दूसरे देश में जाएँ और वहां की लड़की से विवाह करें। उसी प्रकार तुम्हारे अन्तःकरण में रहने वाले जितने काम, क्रोध, मोह, मद, मात्सर्य आदि विकार हैं, वे भी कोई नहीं चाहते कि तुम उनसे विमुख होकर शुद्ध ब्रह्मविद्या (पराविद्या) प्राप्त करो। परंतु एक बार पराविद्या आ गयी, तो ये काम, क्रोध, मोह, मद, मात्सर्य आदि जो विकृतियाँ हैं, उनका गर्व समाप्त हो जायगा अर्थात् ये विकृतियाँ म्लान हो जाएगी। आत्मज्ञान के उदय होने पर तो ये सारे विकार सर्वथा म्लान हो जाते हैं। इनमें फिर कोई सामर्थ्य नहीं रहती। एक बार जहाँ पराविद्या की प्राप्ति हो गयी, वहाँ हमेशा के लिये सारे दुःखों से निवृत्ति हो जाती है अर्थात् अन्त:करण निर्मल हो जाता है।
#बोध_कथा #प्रेरक_प्रसंग
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मोह में दुःख
एक दिन की बात है कि बिल्ली को शिकार करने के लिये एक भी चूहा न मिला। बिल्ली भूखी थी, उसे अपने-बिराने का ज्ञान तो था ही नहीं। उसने झट शाहजी का पाला हुआ सफेद चूहा मारकर खा लिया। शाहजी अब करते क्या, देखते रह गये। जब बिल्ली को मारने दौड़े, तब वह भाग गयी। शाहजी दुःख में निमग्न बैठे कुछ सोच रहे थे कि इतने में उधर से उनके गुरु महाराज आ निकले। शाहजी को चिन्तित देखकर बोले-'क्यों, क्या हुआ? कुशल तो है?' शाहजी बोले महाराज! वैसे तो आपकी कृपा से सब कुशल-मंगल है, परंतु मेरे एक पाले हुए सफेद चूहे को बिल्ली खा गया।' गुरुजी ने कहा कि 'जब तुमने चूहा पाला था तो फिर बिल्ली क्यों पाल ली?' शाहजी ने कहा कि 'मैंने तो बिल्ली को दुकान से चूहों को मारने के वास्ते पाला था।' महात्मा जी ने कहा कि 'क्या और चूहों में जान नहीं थी?' तब शाहजी बोले 'हुआ करे जान, मुझे क्या, मुझे तो इसी चूहे से प्रेम था। मैंने इसे बड़ी मोहब्बत से पाला था। तब महात्माजी ने कहा कि 'भाई! तुम्हारे दुख का कारण चूहा नहीं है, बल्कि ममता है (यह मेरा है ऐसा भाव)।' शाहजी ने कहा-'हाँ महाराज!'
महात्माजी ने कहा कि संसार की समस्त वस्तुएँ नाशवान् हैं और प्रत्येक प्राणी को मृत्यु रूपी बिल्ली अवश्य खायेगी। यदि तुम सांसारिक पदार्थों में ममता करोगे तो दुःख से सताये जाओगे इन पदार्थों और स्त्री, पुत्र, धन आदि की ममता (मोह) छोड़कर अपने कर्तव्य का धैर्य के साथ पालन करो और सब में आत्मवत् भाव करो तभी दुख से छुटकारा पा सकोंगे।
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रस्सी में सर्प का भ्रम
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12 राशि नाम और अक्षर - 12 Rashi Naam

इसे साफ़ एवं व्यवस्थित सारणी के रूप में इस प्रकार लिखा जा सकता है—
| क्रमांक | राशि | अंग्रेज़ी नाम | नाम का प्रथम अक्षर |
|---|---|---|---|
| 1 | मेष | Aries | अ, ल, ई |
| 2 | वृषभ | Taurus | ब, व, उ |
| 3 | मिथुन | Gemini | क, छ, घ |
| 4 | कर्क | Cancer | ड, ह |
| 5 | सिंह | Leo | म, ट |
| 6 | कन्या | Virgo | प, ठ, ण |
| 7 | तुला | Libra | र, त |
| 8 | वृश्चिक | Scorpio | न, य |
| 9 | धनु | Sagittarius | फ, ध, भ, ढ |
| 10 | मकर | Capricorn | ख, ज |
| 11 | कुंभ | Aquarius | ग, स, श, ष |
| 12 | मीन | Pisces | द, च, झ, थ |
राशि अनुसार नाम का प्रथम अक्षर
मेष राशि – अ, ल, ई
वृषभ राशि – ब, व, उ
मिथुन राशि – क, छ, घ
कर्क राशि – ड, ह
सिंह राशि – म, ट
कन्या राशि – प, ठ, ण
तुला राशि – र, त
वृश्चिक राशि – न, य
धनु राशि – फ, ध, भ, ढ
मकर राशि – ख, ज
कुंभ राशि – ग, स, श, ष
मीन राशि – द, च, झ, थ

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वेदों और श्रुतियों की जननी देवी गायत्री की जयंती और अवतरण
गायत्री माता : स्वरूप, अवतरण और महिमा
कौन हैं गायत्री माता? कैसे हुआ उनका अवतरण?
मान्यता है कि चारों वेद, शास्त्र और श्रुतियाँ सभी गायत्री से उत्पन्न हुई हैं। वेदों की उत्पत्ति का कारण होने से इन्हें वेदमाता कहा जाता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश—तीनों देवताओं की आराध्या भी इन्हें ही माना जाता है, इसलिए इन्हें देवमाता भी कहा जाता है। समस्त ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण गायत्री को ज्ञान-गंगा भी कहा जाता है। इन्हें भगवान ब्रह्मा की दूसरी पत्नी के रूप में भी स्वीकार किया गया है।
मान्यता है कि सृष्टि के आदि काल में ब्रह्माजी पर गायत्री मंत्र प्रकट हुआ। मां गायत्री की कृपा से ब्रह्माजी ने गायत्री मंत्र की व्याख्या अपने चारों मुखों से चार वेदों के रूप में की। प्रारंभ में गायत्री का ज्ञान केवल देवताओं तक सीमित था, किन्तु जिस प्रकार राजा भगीरथ कठोर तपस्या द्वारा गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाए, उसी प्रकार महर्षि विश्वामित्र ने भी कठिन साधना करके गायत्री मंत्र की महिमा को जन-जन तक पहुँचाया।
मां गायत्री को पंचमुखी माना गया है
हिंदू धर्म में मां गायत्री को पंचमुखी माना गया है। इसका तात्पर्य यह है कि समस्त ब्रह्मांड जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि (तेज) और आकाश—इन पाँच तत्वों से निर्मित है। संसार के सभी प्राणियों का शरीर भी इन्हीं पाँच तत्वों से बना है।
इस पृथ्वी पर प्रत्येक जीव के भीतर गायत्री प्राणशक्ति के रूप में विद्यमान हैं। यही कारण है कि गायत्री को समस्त शक्तियों का आधार माना गया है। भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रतिदिन गायत्री उपासना को अत्यंत कल्याणकारी माना गया है।
गायत्री जयंती
पुराणों के अनुसार गायत्री जयंती ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। कहा जाता है कि महर्षि विश्वामित्र ने पहली बार गायत्री मंत्र का उच्चारण इसी दिन किया था। इसलिए यह तिथि गायत्री जयंती के रूप में प्रसिद्ध हुई।
अधिकांश वर्षों में गायत्री जयंती गंगा दशहरा के अगले दिन पड़ती है। कुछ परंपराओं में इसे श्रावण पूर्णिमा के अवसर पर भी मनाया जाता है। मान्यता है कि गायत्री जयंती के दिन श्रद्धापूर्वक गायत्री मंत्र का जप करने से यश, कीर्ति, धन, ऐश्वर्य तथा आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है। यदि गायत्री मंत्र का जप विधिपूर्वक, पूर्ण श्रद्धा एवं पवित्रता के साथ किया जाए, तो इसका विशेष फल प्राप्त होता है।
गायत्री माता की महिमा
हिंदू धर्म में मां गायत्री को वेदमाता कहा गया है, क्योंकि सभी वेदों की उत्पत्ति इन्हीं से मानी जाती है। पुराणों में गायत्री देवी को ब्रह्मा, विष्णु और महेश—त्रिमूर्ति के समतुल्य सम्मान दिया गया है। उन्हें समस्त देवताओं की माता तथा देवी सरस्वती, महालक्ष्मी और पार्वती का संयुक्त स्वरूप माना गया है।
गायत्री माता के पाँच मुख और दस भुजाएँ मानी जाती हैं। उनके चार मुख चारों वेदों के प्रतीक हैं, जबकि पाँचवाँ मुख परम दिव्य शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। वे कमलासन पर विराजमान रहती हैं। उनकी दस भुजाएँ दिव्य शक्तियों और भगवान विष्णु के संरक्षणकारी स्वरूप का प्रतीक मानी जाती हैं।
भारतीय संस्कृति में गायत्री माता को संस्कृति की जननी भी कहा गया है। धर्मशास्त्रों के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मां गायत्री का अवतरण हुआ था और इसी स्मृति में गायत्री जयंती मनाई जाती है।
मान्यता है कि मां गायत्री की उपासना से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं तथा जीवन में किसी प्रकार की कमी नहीं रहती। अथर्ववेद में गायत्री उपासना से प्राप्त होने वाले सात प्रमुख प्रतिफलों का उल्लेख मिलता है—आयु, प्राण, प्रजा, पशुधन, कीर्ति, धन और ब्रह्मवर्चस्।
ऋषि-मुनियों और महापुरुषों की दृष्टि में गायत्री
गायत्री की महिमा का वर्णन प्राचीन ऋषि-मुनियों से लेकर आधुनिक विचारकों तक ने किया है। वेद, शास्त्र और पुराण तो गायत्री माता की महिमा से परिपूर्ण हैं ही, अथर्ववेद में उन्हें आयु, प्राण, शक्ति, कीर्ति, धन और ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली देवी कहा गया है।
महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास कहते हैं कि जिस प्रकार पुष्पों में मधु और दूध में घी साररूप होता है, उसी प्रकार समस्त वेदों का सार गायत्री है। यदि गायत्री सिद्ध हो जाए, तो वह समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाली दिव्य कामधेनु के समान है।
जिस प्रकार गंगा शरीर और मन को पवित्र करती है, उसी प्रकार गायत्री रूपी ब्रह्मगंगा आत्मा को निर्मल और प्रकाशित करती है।
महर्षि विश्वामित्र का कथन है कि ब्रह्माजी ने तीनों वेदों का सार निकालकर गायत्री मंत्र के रूप में मानवता को प्रदान किया है। गायत्री से बढ़कर पवित्र करने वाला कोई मंत्र नहीं है। जो व्यक्ति नियमित रूप से गायत्री मंत्र का जप करता है, वह पापों से उसी प्रकार मुक्त हो जाता है, जैसे केंचुल छोड़ने पर सर्प।
गायत्री माता के भक्त उन्हें आदिशक्ति के रूप में पूजते हैं। प्रतीकात्मक रूप से गायत्री ज्ञान, विवेक और चेतना की अधिष्ठात्री देवी हैं। उनकी कृपा से अज्ञान का अंधकार दूर होता है और जीवन में प्रकाश, ज्ञान तथा आध्यात्मिक जागृति का उदय होता है। महर्षि विश्वामित्र ने इसी दिव्य ज्ञान को सम्पूर्ण मानवता तक पहुँचाने का महान कार्य किया।
क्यों कहा जाता है वेदमाता?
गायत्री संहिता के अनुसार— “भासते सततं लोके गायत्री त्रिगुणात्मिका” अर्थात् गायत्री माता सरस्वती, लक्ष्मी और काली—इन तीनों दिव्य शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। ज्ञान, समृद्धि और शक्ति के इन त्रिविध स्वरूपों से ही वेदों के दिव्य ज्ञान का प्रादुर्भाव माना गया है। इसी कारण गायत्री को वेदमाता कहा जाता है।
गायत्री मंत्र के विषय में शास्त्रों में कहा गया है— “सर्वदेवानां गायत्री सारमुच्यते” अर्थात् गायत्री मंत्र समस्त वेदों का सार है। इसलिए गायत्री माता को वेदों की जननी और वेदमाता के रूप में सम्मानित किया गया है।
मां गायत्री का उल्लेख ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, तैत्तिरीय संहिता तथा अन्य वैदिक ग्रंथों में प्राप्त होता है। अनेक उपनिषदों में सावित्री और गायत्री को एक ही शक्ति का स्वरूप बताया गया है। मान्यता है कि वे किसी समय सविता देव (सूर्य) की पुत्री के रूप में प्रकट हुई थीं, इसलिए उनका नाम सावित्री पड़ा। कहा जाता है कि उनका प्रादुर्भाव सविता के मुख से हुआ था। भगवान सूर्य ने उन्हें ब्रह्माजी को समर्पित किया, जिसके कारण वे ब्रह्माणी नाम से भी प्रसिद्ध हुईं।
गायत्री ज्ञान और विज्ञान की मूर्तिमान शक्ति हैं। वे ब्राह्मणों की आराध्य देवी मानी जाती हैं तथा उन्हें परब्रह्मस्वरूपिणी कहा गया है। वेदों, उपनिषदों, पुराणों तथा अन्य धर्मग्रंथों में उनकी महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है।
देवी गायत्री के विवाह की कथा
एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान ब्रह्मा एक महायज्ञ का आयोजन कर रहे थे। शास्त्रों के अनुसार किसी भी यज्ञ, पूजा अथवा धार्मिक अनुष्ठान में विवाहित व्यक्ति को अपनी पत्नी के साथ बैठकर ही कर्म करना चाहिए। पति-पत्नी के संयुक्त रूप से यज्ञ में सहभागी होने पर उसका फल पूर्ण एवं शीघ्र प्राप्त होता है।
यज्ञ के समय किसी कारणवश ब्रह्माजी की पत्नी सावित्री के आने में विलंब हो गया। यज्ञ का शुभ मुहूर्त निकला जा रहा था। ऐसी स्थिति में यज्ञ की पूर्णता के लिए ब्रह्माजी ने गायत्री देवी के साथ विवाह किया और उन्हें अपने साथ यज्ञ में आसन ग्रहण कराया। इसके पश्चात यज्ञ का शुभारंभ हुआ।
इस कथा के कारण गायत्री देवी को भगवान ब्रह्मा की पत्नी तथा ब्रह्माणी के रूप में भी पूजा जाता है। विभिन्न पुराणों में इस प्रसंग के अनेक रूप और विवरण मिलते हैं, किन्तु सभी में गायत्री की दिव्य शक्ति और उनके आध्यात्मिक महत्व का ही प्रतिपादन किया गया है।
गायत्री मंत्र और उसका अर्थ
गायत्री मंत्र
ॐ भूर्भुवः स्वः।
तत्सवितुर्वरेण्यं।
भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥
मंत्र का अर्थ
हम उस परम दिव्य, पवित्र और तेजस्वी परमात्मा (सविता देव) के श्रेष्ठ प्रकाश का ध्यान करते हैं, जो समस्त संसार का सृजनकर्ता, पालनकर्ता और प्रेरणास्रोत है। वह परम दिव्य शक्ति हमारी बुद्धि को प्रकाशित करे, हमें सत्य मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे तथा हमारे जीवन को ज्ञान, विवेक और सद्गुणों से आलोकित करे।
गायत्री मंत्र को वेदों का सार माना गया है। यह केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि ज्ञान, चेतना, आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उत्थान का महान साधन है। नियमित श्रद्धापूर्वक इसके जप से मन, बुद्धि और आत्मा का परिष्कार होता है तथा व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।
गायत्री मंत्र
अर्थ – हम उस सृष्टिकर्ता, प्रकाशमान, परम तेजस्वी परमात्मा का ध्यान करते हैं। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे।
इस मंत्र के जप से ज्ञान की प्राप्ति होती है तथा मन शांत और एकाग्र रहता है। ललाट पर तेज और आभा का विकास होता है। गायत्री माता के विभिन्न स्वरूपों का उनके मंत्रों सहित जप करने से दरिद्रता, दुःख और कष्टों का नाश होता है तथा निःसंतानों को संतान-प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है।
गायत्री मंत्र के चौबीस अक्षर
गायत्री मंत्र में चौबीस (24) अक्षर हैं। ऋषियों ने इन अक्षरों में बीजरूप से विद्यमान उन शक्तियों को पहचाना है जिन्हें चौबीस अवतार, चौबीस ऋषि, चौबीस शक्तियाँ तथा चौबीस सिद्धियाँ कहा जाता है। गायत्री मंत्र के ये चौबीस अक्षर चौबीस शक्ति-बीज माने गए हैं। गायत्री मंत्र की उपासना से इन शक्तियों और सिद्धियों का लाभ प्राप्त होता है।
1. तत्
देवता – गणेश
शक्ति – सफलता शक्ति
फल – कठिन कार्यों में सफलता, विघ्नों का नाश, बुद्धि की वृद्धि।
2. स
देवता – नरसिंह
शक्ति – पराक्रम शक्ति
फल – पुरुषार्थ, वीरता, शत्रुनाश तथा आक्रमणों से रक्षा।
3. वि
देवता – विष्णु
शक्ति – पालन शक्ति
फल – संरक्षण, आश्रितों की रक्षा तथा योग्यताओं की वृद्धि।
4. तु
देवता – शिव
शक्ति – कल्याण शक्ति
फल – अनिष्ट का विनाश, कल्याण, आत्मपरायणता एवं निश्चय शक्ति।
5. व
देवता – श्रीकृष्ण
शक्ति – योग शक्ति
फल – कर्मयोग, सौन्दर्य, सरसता, अनासक्ति एवं आत्मनिष्ठा।
6. रे
देवी – राधा
शक्ति – प्रेम शक्ति
फल – प्रेमभाव, द्वेष का नाश।
7. णि
देवी – लक्ष्मी
शक्ति – धन शक्ति
फल – धन, पद, यश एवं भौतिक समृद्धि।
8. यं
देवता – अग्नि
शक्ति – तेज शक्ति
फल – तेज, प्रतिभा, सामर्थ्य और शक्ति की वृद्धि।
9. भ
देवता – इन्द्र
शक्ति – रक्षा शक्ति
फल – रोग, शत्रु, चोर एवं अन्य भय से रक्षा।
10. र्गो
देवी – सरस्वती
शक्ति – बुद्धि शक्ति
फल – मेधा, विवेक, दूरदर्शिता एवं ज्ञान-वृद्धि।
11. दे
देवी – दुर्गा
शक्ति – दमन शक्ति
फल – विघ्नों पर विजय, दुष्टों का दमन।
12. व
देवता – हनुमान
शक्ति – निष्ठा शक्ति
फल – निर्भयता, कर्तव्यपरायणता एवं ब्रह्मचर्य।
13. स्य
देवी – पृथ्वी
शक्ति – धारण शक्ति
फल – धैर्य, सहनशीलता, गंभीरता और स्थिरता।
14. धी
देवता – सूर्य
शक्ति – प्राण शक्ति
फल – आरोग्य, दीर्घायु, विकास एवं विचारों का शोधन।
15. म
देवता – श्रीराम
शक्ति – मर्यादा शक्ति
फल – संयम, सौम्यता, मैत्री एवं मर्यादा-पालन।
16. हि
देवी – श्रीसीता
शक्ति – तप शक्ति
फल – पवित्रता, नम्रता, शील एवं सात्त्विकता।
17. धि
देवता – चन्द्र
शक्ति – शान्ति शक्ति
फल – चिंता, क्रोध, लोभ और मोह का नाश।
18. यो
देवता – यम
शक्ति – काल शक्ति
फल – समय का सदुपयोग, जागरूकता एवं निर्भयता।
19. यो
देवता – ब्रह्मा
शक्ति – उत्पादक शक्ति
फल – सृजन क्षमता एवं संतान-वृद्धि।
20. नः
देवता – वरुण
शक्ति – रस शक्ति
फल – सरलता, करुणा, माधुर्य एवं कलाप्रेम।
21. प्र
देवता – नारायण
शक्ति – आदर्श शक्ति
फल – उच्च चरित्र, आदर्श जीवन एवं नेतृत्व क्षमता।
22. चो
देवता – हयग्रीव
शक्ति – साहस शक्ति
फल – उत्साह, वीरता एवं विपत्तियों से संघर्ष की क्षमता।
23. द
देवता – हंस
शक्ति – विवेक शक्ति
फल – सत्-असत् का निर्णय, आत्मसंतोष एवं सत्संगति।
24. यात्
देवता – तुलसी
शक्ति – सेवा शक्ति
फल – लोकसेवा, सत्यनिष्ठा, आत्मशान्ति एवं परोपकार।
गायत्री उपासना से हर कार्य संभव
गायत्री, गीता, गंगा और गौ—ये भारतीय संस्कृति की चार आधारशिलाएँ मानी गई हैं। श्रीकृष्ण ने गीता में भी मनुष्य के कल्याण के लिए गायत्री और ॐ के महत्व का संकेत दिया है। वेदों में गायत्री को आयु, प्राण, शक्ति, कीर्ति, धन और ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली देवी कहा गया है। उनकी उपासना से साधक को इन दिव्य गुणों की प्राप्ति होती है।
गायत्री मंत्र का लाभ
महर्षि वेदव्यास कहते हैं कि जैसे पुष्पों में मधु और दूध में घृत साररूप होता है, वैसे ही समस्त वेदों का सार गायत्री है। यदि गायत्री साधना सिद्ध हो जाए तो वह कामधेनु के समान सभी उचित इच्छाओं को पूर्ण करने वाली बन जाती है।
गायत्री मंत्र का श्रद्धापूर्वक एवं नियमित जप करने से—
आध्यात्मिक चेतना का विकास होता है।
बुद्धि एवं स्मरण शक्ति बढ़ती है।
मन की शुद्धि होती है।
दुःख एवं कष्टों का निवारण होता है।
आत्मबल और तेज में वृद्धि होती है।
साधक के चारों ओर आध्यात्मिक संरक्षण का कवच निर्मित होता है।
देवी-देवताओं के गायत्री मंत्र
काली गायत्री
ॐ कालिकायै च विद्महे, श्मशानवासिन्यै धीमहि, तन्नो घोरा प्रचोदयात्॥
कृष्ण गायत्री
ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे, वासुदेवाय धीमहि, तन्नः कृष्णः प्रचोदयात्॥
गणेश गायत्री
ॐ एकदन्ताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥
दुर्गा गायत्री
ॐ कात्यायन्यै विद्महे, कन्याकुमार्यै धीमहि, तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्॥
राम गायत्री
ॐ दशरथाय विद्महे, सीतावल्लभाय धीमहि, तन्नो रामः प्रचोदयात्॥
रुद्र गायत्री
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे, महादेवाय धीमहि, तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥
लक्ष्मी गायत्री
ॐ महादेव्यै विद्महे, विष्णुपत्न्यै धीमहि, तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्॥
विष्णु गायत्री
ॐ नारायणाय विद्महे, वासुदेवाय धीमहि, तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥
सरस्वती गायत्री
ॐ वाग्देव्यै विद्महे, ब्रह्मपत्न्यै धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात्॥
हनुमान गायत्री
ॐ आञ्जनेयाय विद्महे, वायुपुत्राय धीमहि, तन्नो हनुमान् प्रचोदयात्॥
इस प्रकार करें गायत्री मंत्र का जप
गायत्री मंत्र का जप सूर्योदय से लगभग दो घंटे पूर्व से लेकर सूर्यास्त के एक घंटे बाद तक किया जा सकता है। मानसिक (मौन) जप किसी भी समय किया जा सकता है। सामान्यतः प्रातः और सायं संध्या का समय सर्वोत्तम माना गया है।
नियमित रूप से 108 बार गायत्री मंत्र का जप करने से—
बुद्धि प्रखर होती है।
स्मरण शक्ति बढ़ती है।
अध्ययन में एकाग्रता आती है।
व्यक्तित्व में तेज और आकर्षण बढ़ता है।
विवेक एवं निर्णय क्षमता का विकास होता है।
स्वामी विवेकानन्द ने गायत्री को “सद्बुद्धि का मंत्र” कहा है और इसे मंत्रों का मुकुटमणि बताया है।
गायत्री जयंती पर क्या करें?
अन्न का दान करें।
भंडारा या अन्नक्षेत्र का आयोजन करें।
लोगों को शीतल जल पिलाएँ।
पक्षियों के लिए जल-पात्र रखें।
गायत्री मंत्र जप एवं हवन करें।
गुड़ और गेहूँ का दान करें।
धार्मिक पुस्तकों का दान करें।
पवित्र नदी में स्नान करें।
फलाहार व्रत रखें।
श्री आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें।
सत्य भाषण का संकल्प लें।
सूर्य देव की उपासना करें।
जय माँ गायत्री। 🙏🌺
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राष्ट्रवादी ओजस्वी वक्ता पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ
पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ : राष्ट्रवादी चिंतन की ओजस्वी आवाज
आज इंटरनेट की वायरल दुनिया में पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। देशभर के अनेक राष्ट्रवादी विचारों से जुड़े लोगों के मोबाइल फोन में व्हाट्सएप, फेसबुक और यूट्यूब के माध्यम से उनकी ओजस्वी वाणी की गूंज सुनाई पड़ती है। वर्तमान समय में वे अनेक युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत के रूप में स्थापित हैं। उनके प्रभावशाली भाषण नई पीढ़ी में भारतीयता, राष्ट्रभाव और सांस्कृतिक चेतना के प्रति आस्था जागृत करने का कार्य कर रहे हैं।
पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ का जन्म 2 दिसंबर, 1960 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा अलीगढ़ स्थित मिंटो सर्किल हाई स्कूल (वर्तमान में सैयदना ताहिर सैफुद्दीन स्कूल) से प्राप्त की। इसके पश्चात उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक की शिक्षा पूर्ण की।
उनका पालन-पोषण अलीगढ़ के उस शैक्षणिक और सामाजिक वातावरण में हुआ, जहाँ विभिन्न वैचारिक धाराओं का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता था। इसी परिवेश ने उनके व्यक्तित्व और चिंतन को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समय के साथ उनके राष्ट्र, संस्कृति और सभ्यता संबंधी विचार और अधिक मुखर एवं प्रखर होते गए। आज वे अपने भाषणों, लेखन और सार्वजनिक वक्तव्यों के माध्यम से राष्ट्रीय मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखते हैं तथा लाखों लोगों को प्रभावित करते हैं।
पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ पेशे से एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने अपने पत्रकारिता जीवन में पाकिस्तान के कराची स्थित एएजे न्यूज़ (AAJ News) सहित अनेक प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों के साथ कार्य किया है। इसके अतिरिक्त उन्होंने सहारा न्यूज़, बीबीसी वर्ल्ड, ज़ी न्यूज़ तथा अन्य प्रमुख मीडिया संस्थानों में भी अपनी सेवाएँ दी हैं। वे तीन बार प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के महासचिव पद पर भी निर्वाचित हुए, जो उनकी पत्रकारिता जगत में स्वीकार्यता और सक्रियता का परिचायक है।
जैसा कि सामान्यतः माना जाता है कि भारतीय मीडिया जगत में विभिन्न वैचारिक धाराओं का प्रभाव रहा है, ऐसे वातावरण में पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ ने राष्ट्रवादी विचारधारा के साथ अपनी पत्रकारिता जारी रखी। उन्होंने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में लगभग चार वर्षों तक अपनी सेवाएँ प्रदान कीं। बाद में उन पर कुछ आरोप लगाए गए और उन्हें प्रेस क्लब ऑफ इंडिया से निष्कासित कर दिया गया।
उनके विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 406 एवं 120-बी के अंतर्गत प्रकरण दर्ज किया गया। इस मामले की जाँच प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की ओर से गठित समिति, पुलिस तथा अन्य संबंधित एजेंसियों द्वारा की गई। उनके समर्थकों का मत है कि जाँच के दौरान उनके विरुद्ध आरोप सिद्ध नहीं हो सके और यह पूरा प्रकरण उनकी सार्वजनिक छवि को धूमिल करने का प्रयास था। वहीं, इस विषय पर विभिन्न पक्षों के अपने-अपने मत और दृष्टिकोण रहे हैं।
आज भी पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ अपने भाषणों, लेखन और सार्वजनिक कार्यक्रमों के माध्यम से राष्ट्र, समाज और समसामयिक विषयों पर अपने विचार प्रकट करते रहते हैं तथा बड़ी संख्या में लोग उन्हें सुनते और अनुसरण करते हैं।
पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ : एक प्रखर वक्ता और राष्ट्रवादी चिंतक
पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ निश्चित रूप से एक प्रखर वक्ता हैं। वक्तृत्व कला का यह गुण उन्होंने अपने जीवन के आरंभिक शैक्षिक काल से ही विकसित करना प्रारम्भ कर दिया था। जब वे महाविद्यालयीन शिक्षा प्राप्त कर रहे थे, तब तक उन्हें अनेक मंचों पर अपने विचार रखने के अवसर मिलने लगे थे। इन अवसरों ने उनके भीतर एक प्रभावशाली और ओजस्वी वक्ता के गुणों को और अधिक निखारा।
पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने कदम जमाने के बाद वे एक गुणशील, निर्भीक और प्रखर वक्ता के रूप में व्यापक रूप से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया तथा अपने कार्यों के माध्यम से विशिष्ट पहचान बनाई। इसी कारण उन्हें देश-विदेश के अनेक मंचों पर अपने विचार रखने के लिए आमंत्रित किया जाने लगा। विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय कार्यक्रमों में वे मुख्य अतिथि तथा वक्ता के रूप में सम्मानित हुए। उनके विचारों और शब्दों को सुनने के लिए पत्रकारिता जगत के लोग तथा युवा वर्ग विशेष रूप से उत्सुक रहता था।
पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ ने पाकिस्तान के कराची स्थित एएजे न्यूज़ में कार्यकारी संपादक एवं भारत प्रमुख (India Head) के रूप में कार्य किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने सहारा न्यूज़, बीबीसी वर्ल्ड तथा ज़ी न्यूज़ जैसे प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों में भी विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर अपनी सेवाएँ प्रदान कीं। वर्ष 2017 में उन्होंने सक्रिय पत्रकारिता से अलग होकर स्वतंत्र रूप से समाज के साथ प्रत्यक्ष संवाद का मार्ग अपनाया।
वर्तमान में वे ‘पब्लिक 24×7’ नामक यूट्यूब चैनल का संचालन कर रहे हैं, जिसके माध्यम से वे राष्ट्रीय, सामाजिक और समसामयिक विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत करते हैं। विशेष रूप से कश्मीरी हिंदुओं के विस्थापन, कश्मीर संघर्ष, कश्मीर घाटी में उनके पुनर्वास, इस्लामी कट्टरवाद तथा आतंकवाद जैसे विषयों पर वे खुलकर अपनी बात रखते हैं। इन विषयों पर उनके व्याख्यान और विश्लेषण बड़ी संख्या में लोगों द्वारा सुने और साझा किए जाते हैं।
अपने ओजस्वी वक्तृत्व, स्पष्ट विचारों और राष्ट्रहित के प्रति समर्पित दृष्टिकोण के कारण पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ आज देश के चर्चित वक्ताओं और विचारकों में गिने जाते हैं। उनके भाषण अनेक युवाओं को राष्ट्र, संस्कृति और सभ्यता के प्रति जागरूक होने की प्रेरणा प्रदान करते हैं।
अनुच्छेद 35ए और 370 के विषय में जन-जागरण
पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ ने अपने कुछ सहयोगियों के साथ मिलकर “वी द सिटिजन्स” (We The Citizens) नामक एक नागरिक संगठन के गठन में सक्रिय भूमिका निभाई। इस संगठन के माध्यम से उन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय विषयों पर जन-जागरूकता उत्पन्न करने का प्रयास किया। संगठन के अध्यक्ष संदीप कुलकर्णी के साथ मिलकर उन्होंने भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (PIL) भी दायर की, जिसमें जम्मू-कश्मीर से संबंधित भारतीय संविधान के अनुच्छेद 35ए और अनुच्छेद 370 की वैधता को चुनौती दी गई थी।
पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ का मत रहा कि अनुच्छेद 35ए और 370 के कारण जम्मू-कश्मीर का पूर्ण एकीकरण, विकास तथा वहाँ के नागरिकों के समान अधिकारों की स्थापना प्रभावित हुई। उनके अनुसार देश के अधिकांश लोग इन संवैधानिक प्रावधानों और उनके प्रभावों से पर्याप्त रूप से परिचित नहीं थे। इसी कारण उन्होंने अपने व्याख्यानों, लेखों और सार्वजनिक कार्यक्रमों के माध्यम से इन विषयों को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाने का प्रयास किया।
उनके प्रयासों तथा अन्य अनेक सामाजिक, राजनीतिक और वैचारिक संगठनों द्वारा चलाए गए जन-जागरण अभियानों के परिणामस्वरूप देश में अनुच्छेद 35ए और 370 को लेकर व्यापक चर्चा प्रारम्भ हुई। इस विषय पर लोगों की जागरूकता बढ़ी और इसे लेकर सार्वजनिक बहस तेज हुई।
5 अगस्त 2019 को भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को निष्प्रभावी करते हुए तथा अनुच्छेद 35ए को समाप्त करते हुए जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक व्यवस्था में ऐतिहासिक परिवर्तन किया। पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ के समर्थकों का मानना है कि इस विषय पर जनमत निर्माण और जागरूकता बढ़ाने में उनके तथा उनकी टीम के प्रयासों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यद्यपि इस निर्णय का औपचारिक श्रेय भारत सरकार, संसद तथा उस समय के राजनीतिक नेतृत्व को दिया जाता है, फिर भी इस विषय को जनचर्चा का हिस्सा बनाने वाले व्यक्तियों और संगठनों के योगदान को भी अनेक लोग महत्त्वपूर्ण मानते हैं।
इस प्रकार पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ ने केवल पत्रकार के रूप में ही नहीं, बल्कि एक जन-जागरूकता अभियानकर्ता के रूप में भी अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की।
पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ सम्पूर्ण जीवनी
Pushpendra Kulshrestha Biography in Hindi
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