राजस्थान का इतिहास एक परिचय
राजस्थान का इतिहास
राजस्थान का इतिहास हमारी गौरवमयी धरोहर है, जिसमें विविधता के साथ निरन्तरता भी है। परम्पराओं और बहुरंगी सांस्कृतिक विशेषताओं से ओत-प्रोत राजस्थान एक ऐसा प्रदेश है, जहाँ की मिट्टी का कण-कण यहाँ के रणबांकुरों की विजयगाथा बयान करता है। यहाँ के शासकों ने मातृभूमि की रक्षा हेतु सहर्ष अपने प्राणों की आहुति दी। कहते हैं, राजस्थान के पत्थर भी अपना इतिहास बोलते हैं।
यहाँ पुरा-सम्पदा का अकूत खजाना है। कहीं प्रागैतिहासिक शैलचित्रों की छटा है तो कहीं प्राचीन संस्कृतियों के प्रमाण हैं। कहीं प्रस्तर प्रतिमाओं का शिल्पगत प्रतिमान है तो कहीं शिलालेखों के रूप में पाषाणों पर उत्कीर्ण गौरवशाली इतिहास। कहीं समय का ऐतिहासिक बखान करते प्राचीन सिक्के हैं तो कहीं वास्तुकला के उत्कृष्ट प्रतीक। उपासना-स्थल, भव्य प्रासाद, अभेद्य दुर्ग एवं जीवंत स्मारकों का संगम राजस्थान के कस्बों, शहरों एवं उजड़ी बस्तियों में देखने को मिलता है।
राजस्थान के बारे में यह सोचना गलत होगा कि यहाँ की धरती केवल रणक्षेत्र रही है। सच तो यह है कि यहाँ तलवारों की झंकार के साथ भक्ति और आध्यात्मिकता का मधुर संगीत भी सुनने को मिलता है। लोकपरक सांस्कृतिक चेतना यहाँ अत्यन्त गहरी है। मेले एवं त्योहार यहाँ के लोगों के मन में रचे-बसे हैं। लोकनृत्य एवं लोकगीत राजस्थानी संस्कृति के संवाहक हैं। राजस्थानी चित्रशैलियों में श्रृंगार-सौन्दर्य के साथ लौकिक जीवन की भी सशक्त अभिव्यक्ति हुई है।
राजस्थान की यह मरुभूमि प्राचीन सभ्यताओं की जन्मस्थली रही है। यहाँ कालीबंगा, आहड़, बैराठ, बागौर और गणेश्वर जैसी अनेक पाषाणकालीन, सिंधुकालीन तथा ताम्रकालीन सभ्यताओं का विकास हुआ, जो राजस्थान के इतिहास की प्राचीनता सिद्ध करती हैं। इन सभ्यता-स्थलों में विकसित मानव-बस्तियों के प्रमाण मिलते हैं। बागौर जैसे स्थल मध्यपाषाणकालीन एवं नवपाषाणकालीन इतिहास की उपस्थिति प्रस्तुत करते हैं। कालीबंगा जैसे विकसित सिंधुकालीन स्थल का विकास यहीं हुआ, वहीं आहड़ और गणेश्वर जैसी प्राचीनतम ताम्रकालीन सभ्यताएँ भी यहीं पनपीं।
आर्य और राजस्थान
मरुधरा की सरस्वती और दृशद्वती जैसी नदियाँ आर्यों की प्राचीन बस्तियों की शरणस्थली रही हैं। ऐसा माना जाता है कि यहीं से आर्य बस्तियाँ कालान्तर में दोआब आदि स्थानों की ओर बढ़ीं। इन्द्र और सोम की अर्चना में मन्त्रों की रचना, यज्ञ की महत्ता की स्वीकृति तथा जीवन-मुक्ति का ज्ञान आर्यों को सम्भवतः इन्हीं नदी-घाटियों में निवास करते हुए हुआ था।
महाभारत तथा पौराणिक गाथाओं से प्रतीत होता है कि जांगल (बीकानेर), मरुकान्तार (मारवाड़) आदि भागों से बलराम और कृष्ण गुजरे थे, जो आर्यों की यादव शाखा से सम्बन्धित थे।
राजस्थान और प्रस्तर युग
राजस्थान में आदि मानव का प्रादुर्भाव कब और कहाँ हुआ अथवा उसके क्या क्रियाकलाप थे, इससे संबंधित समसामयिक लिखित इतिहास उपलब्ध नहीं है, परन्तु प्राचीन प्रस्तर-युग के अवशेष अजमेर, अलवर, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, जयपुर, जालौर, पाली, टोंक आदि क्षेत्रों की नदियों अथवा उनकी सहायक नदियों के किनारों से प्राप्त हुए हैं। चित्तौड़ और इसके पूर्व की ओर तो औजारों की उपलब्धि इतनी अधिक है कि ऐसा अनुमान किया जाता है कि यह क्षेत्र इस काल के उपकरणों के निर्माण का प्रमुख केन्द्र रहा होगा। लूनी नदी के तटों पर भी प्रारम्भिक कालीन उपकरण प्राप्त हुए हैं।
राजस्थान में मानव विकास की दूसरी सीढ़ी मध्य पाषाण एवं नवपाषाण युग है। आज से हजारों वर्षों पूर्व लगातार इस युग की संस्कृति विकसित होती रही। इस काल के उपकरणों की उपलब्धि पश्चिमी राजस्थान में लूनी तथा उसकी सहायक नदियों की घाटियों और दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान में चित्तौड़ जिले की बेड़च तथा उसकी सहायक नदियों की घाटियों में प्रचुर मात्रा में हुई है। बागौर और तिलवाड़ा के उत्खनन से नवपाषाणकालीन तकनीकी उन्नति पर अच्छा प्रकाश पड़ा है। इनके अतिरिक्त अजमेर, नागौर, सीकर, झुंझुनूं, कोटा, टोंक आदि स्थानों से भी नवपाषाणकालीन उपकरण प्राप्त हुए हैं।
नवपाषाण युग में कई हजार वर्ष गुजरने के पश्चात् मनुष्य को धीरे-धीरे धातुओं का ज्ञान हुआ। आज से लगभग 6000 वर्ष पूर्व धातु युग की स्थापना मानी जाती है, परन्तु समयान्तर में जब ताँबा, पीतल, लोहा आदि धातुओं का ज्ञान हुआ, तो उनका उपयोग औजार बनाने के लिए किया जाने लगा। इस प्रकार धातु युग की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि कृषि और शिल्प आदि कार्यों का सम्पादन मानव के लिए अधिक सुगम हो गया तथा धातु से बने उपकरणों की सहायता से वह अपना कार्य अधिक दक्षता से करने लगा।
कालीबंगा
यह सभ्यता-स्थल वर्तमान हनुमानगढ़ जिले में सरस्वती-दृशद्वती नदियों के तट पर बसा हुआ था, जो 2400-2250 ई.पू. की संस्कृति की उपस्थिति का प्रमाण है। कालीबंगा में मुख्य रूप से नगर-योजना के दो टीले प्राप्त हुए हैं। इनमें पूर्वी टीला नगर-टीला है, जहाँ से सामान्य बस्ती के साक्ष्य मिले हैं। पश्चिमी टीला दुर्ग-टीले के रूप में है, जिसके चारों ओर सुरक्षा-प्राचीर है। दोनों टीलों के चारों ओर भी सुरक्षा-प्राचीर बनी हुई थी।
कालीबंगा से पूर्व-हड़प्पाकालीन, हड़प्पाकालीन और उत्तर-हड़प्पाकालीन साक्ष्य मिले हैं। इस पूर्व-हड़प्पाकालीन स्थल से जुते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं, जो संसार में प्राचीनतम माने जाते हैं। पत्थर के अभाव में दीवारें कच्ची ईंटों से बनाई जाती थीं और उन्हें मिट्टी से जोड़ा जाता था। व्यक्तिगत तथा सार्वजनिक नालियाँ और कूड़ा डालने के लिए मिट्टी के पात्र नगर की सफाई की असाधारण व्यवस्था के अंग थे।
वर्तमान में यहाँ घग्गर नदी बहती है, जो प्राचीन काल में सरस्वती के नाम से जानी जाती थी। यहाँ से धार्मिक प्रमाण के रूप में अग्निवेदियों के साक्ष्य मिले हैं। यहाँ सम्भवतः धूप में सुखाई गई ईंटों का प्रयोग किया जाता था। यहाँ से प्राप्त मिट्टी के बर्तनों और मुहरों पर जो लिपि अंकित पाई गई है, वह सैन्धव लिपि से मिलती-जुलती है, जिसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है।
कालीबंगा से पानी के निकास के लिए लकड़ी और ईंटों की नालियाँ बनी हुई मिली हैं। ताँबे से बने कृषि के अनेक औजार भी यहाँ की आर्थिक उन्नति के परिचायक हैं। कालीबंगा की नगर-योजना सिंधु घाटी की नगर-योजना के अनुरूप दिखाई देती है। कालीबंगा के निवासियों की मृतकों के प्रति श्रद्धा तथा धार्मिक भावनाओं को व्यक्त करने वाली तीन समाधियाँ मिली हैं।
दुर्भाग्यवश ऐसी समृद्ध सभ्यता का ह्रास हो गया, जिसका कारण सम्भवतः सूखा, नदी-मार्ग में परिवर्तन आदि माने जाते हैं।
आहड़
वर्तमान उदयपुर जिले में स्थित आहड़ दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान की सभ्यता का प्रमुख केन्द्र था। यह सभ्यता बनास नदी सभ्यता का मुख्य भाग थी। ताम्र सभ्यता के रूप में प्रसिद्ध यह सभ्यता आयड़ नदी के किनारे स्थित थी। यह ताम्रवती नगरी अथवा धूलकोट के नाम से भी प्रसिद्ध है। यह सभ्यता आज से लगभग 4000 वर्ष पूर्व विकसित हुई थी।
विभिन्न उत्खनन-स्तरों से पता चलता है कि बसने से लेकर 18वीं शताब्दी तक यहाँ कई बार बस्तियाँ बसीं और उजड़ीं। ऐसा प्रतीत होता है कि आहड़ के आसपास ताँबे की अनेक खानों के होने से यहाँ के निवासी निरन्तर इस धातु के उपकरण बनाते रहे और इस स्थान को एक ताम्रयुगीन कौशल-केंद्र बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
500 मीटर लम्बे धूलकोट के टीले से ताँबे की कुल्हाड़ियाँ, लोहे के औजार, बाँस के टुकड़े, हड्डियाँ आदि सामग्री प्राप्त हुई हैं। अनुमान है कि मकानों की योजना में आँगन, गली अथवा खुले स्थान रखने की व्यवस्था थी। एक मकान में 4 से 6 बड़े चूल्हों का होना आहड़ में वृहत् परिवार अथवा सामूहिक भोजन-व्यवस्था पर प्रकाश डालता है।
आहड़ की खुदाई से प्राप्त बर्तनों तथा उनके खण्डित टुकड़ों से उस युग में मिट्टी के बर्तन बनाने की कला का अच्छा परिचय मिलता है। यहाँ तृतीय ईसा-पूर्व से प्रथम ईसा-पूर्व काल की यूनानी मुद्राएँ भी मिली हैं। इनसे यह स्पष्ट होता है कि उस समय राजस्थान का व्यापार विदेशी बाजारों से भी था।
इस बनास सभ्यता की व्यापकता एवं विस्तार गिलूंड, बागौर तथा अन्य आसपास के स्थलों से प्रमाणित होते हैं। इसका संपर्क नवदाटोली, हड़प्पा, नागदा, एरण, कायथा आदि क्षेत्रों की प्राचीन सभ्यताओं से भी था, जो यहाँ से प्राप्त काले और लाल मृद्भाण्डों के आकार, निर्माण तथा कौशल की समानता से स्पष्ट होता है।
जनपदों का युग
आर्य संक्रमण के बाद राजस्थान में जनपदों का उदय होता है, जहाँ से हमारे इतिहास की घटनाएँ अधिक प्रमाणों पर आधारित की जा सकती हैं। सिकन्दर के अभियानों से आहत तथा अपनी स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने के इच्छुक दक्षिण पंजाब की मालव, शिवि तथा अर्जुनायन जातियाँ, जो अपने साहस और शौर्य के लिए प्रसिद्ध थीं, अन्य जातियों के साथ राजस्थान में आईं और सुविधा के अनुसार यहाँ बस गईं।
इनमें भरतपुर का राजन्य जनपद, मत्स्य जनपद, नगरी का शिवि जनपद तथा अलवर का शाल्व जनपद प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त 300 ई.पू. से 300 ई. के मध्य तक मालव, अर्जुनायन तथा यौधेयों की प्रभुता का काल राजस्थान में मिलता है। मालवों की शक्ति का केन्द्र जयपुर के निकट था। कालान्तर में यह अजमेर, टोंक तथा मेवाड़ के क्षेत्र तक फैल गया। भरतपुर-अलवर प्रदेश के अर्जुनायन अपनी विजयों के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। इसी प्रकार राजस्थान के उत्तरी भाग के यौधेय भी एक शक्तिशाली गणतान्त्रिक कबीला थे। यौधेय सम्भवतः उत्तरी राजस्थान की कुषाण शक्ति को नष्ट करने में सफल हुए थे, जो रुद्रदामन के लेख से स्पष्ट होता है।
लगभग दूसरी सदी ईसा-पूर्व से तीसरी सदी ईस्वी के काल में राजस्थान के केन्द्रीय भागों में बौद्ध धर्म का काफी प्रचार था, परन्तु यौधेयों तथा मालवों के यहाँ आने से ब्राह्मण धर्म को प्रोत्साहन मिलने लगा और बौद्ध धर्म के ह्रास के चिह्न दिखाई देने लगे। गुप्त राजाओं ने इन जनपदीय गणतन्त्रों को समाप्त नहीं किया, परन्तु इन्हें अर्द्ध-आश्रित रूप में बनाए रखा। ये गणतन्त्र हूण आक्रमणों के धक्के को सहन नहीं कर पाए और अंततः छठी शताब्दी आते-आते यहाँ सदियों से पनपी गणतान्त्रिक व्यवस्था सर्वदा के लिए समाप्त हो गई।
नामकरण
वर्तमान राजस्थान के लिए पहले किसी एक नाम का प्रयोग नहीं मिलता है। इसके भिन्न-भिन्न क्षेत्र अलग-अलग नामों से जाने जाते थे। वर्तमान बीकानेर और जोधपुर का क्षेत्र महाभारत काल में ‘जांगल देश’ कहलाता था। इसी कारण बीकानेर के राजा स्वयं को ‘जांगलधर बादशाह’ कहते थे।
जांगल देश का निकटवर्ती भाग सपादलक्ष (वर्तमान अजमेर और नागौर का मध्य भाग) कहलाता था, जिस पर चौहानों का अधिकार था। अलवर राज्य का उत्तरी भाग कुरु देश, दक्षिणी और पश्चिमी भाग मत्स्य देश तथा पूर्वी भाग शूरसेन देश के अन्तर्गत था। भरतपुर, धौलपुर तथा करौली राज्य का अधिकांश भाग शूरसेन देश के अन्तर्गत था। शूरसेन राज्य की राजधानी मथुरा, मत्स्य राज्य की विराटनगर तथा कुरु राज्य की राजधानी इन्द्रप्रस्थ थी।
उदयपुर राज्य का प्राचीन नाम ‘शिवि’ था, जिसकी राजधानी ‘मध्यमिका’ थी। आजकल मध्यमिका (मज्जिमिका) को नगरी कहा जाता है। यहाँ पर मेद जाति का अधिकार रहा, जिस कारण इसे मेदपाट अथवा प्राग्वाट भी कहा जाने लगा।
डूंगरपुर और बाँसवाड़ा के प्रदेश को बागड़ कहा जाता था। जोधपुर राज्य को मरु अथवा मारवाड़ कहा जाता था। जोधपुर के दक्षिणी भाग को गुर्जरत्रा तथा सिरोही के क्षेत्र को अर्बुद देश (आबू देश) कहा जाता था। जैसलमेर को माड़ तथा कोटा और बूंदी के क्षेत्र को हाड़ौती कहा जाता था। झालावाड़ का दक्षिणी भाग मालव देश के अंतर्गत गिना जाता था।
इस प्रकार स्पष्ट है कि जिस भू-भाग को आज हम राजस्थान कहते हैं, वह किसी एक विशेष नाम से कभी प्रसिद्ध नहीं रहा। ऐसी मान्यता है कि 1800 ई. में सर्वप्रथम जॉर्ज थॉमस ने इस प्रदेश के लिए ‘राजपूताना’ नाम का प्रयोग किया था। प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने 1829 ई. में अपनी पुस्तक ‘एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान’ में इस प्रदेश का नाम ‘रायथान’ अथवा ‘राजस्थान’ बताया। भारत के स्वतंत्र होने के पश्चात् इस राज्य का नाम आधिकारिक रूप से ‘राजस्थान’ स्वीकार कर लिया गया।
प्राचीन राजस्थान के प्रमुख क्षेत्र
जांगल प्रदेश – जोधपुर और बीकानेर का क्षेत्र। इसकी राजधानी अहिच्छत्रपुर (वर्तमान नागौर) थी। बीकानेर राज्य के चिह्न पर ‘जय जंगलधर बादशाह’ अंकित था।
मत्स्य देश – अलवर, जयपुर तथा भरतपुर का कुछ भाग। राजधानी विराटनगर (वर्तमान बैराठ)।
शूरसेन – भरतपुर, करौली और धौलपुर का क्षेत्र। राजधानी मथुरा।
अर्जुनायन – अलवर, भरतपुर, आगरा और मथुरा का क्षेत्र।
शिवि – चित्तौड़ का क्षेत्र। राजधानी मध्यमिका (वर्तमान नगरी)।
मेदपाट (मेवाड़) – उदयपुर, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, बाँसवाड़ा, राजसमंद तथा डूंगरपुर का क्षेत्र।
मारवाड़ (मरु, मरुवास) – जोधपुर, बीकानेर और बाड़मेर का क्षेत्र।
गुर्जरत्रा – जोधपुर का दक्षिणी भाग।
अर्बुददेश – सिरोही के आसपास का क्षेत्र।
माड़ – जैसलमेर राज्य।
सपादलक्ष – जांगल देश का पूर्वी भाग। राजधानी शाकम्भरी (सांभर)।
हाड़ौती – कोटा और बूंदी का क्षेत्र।
ढूँढाड़ – जयपुर के आसपास का क्षेत्र।
राजस्थान को राजपूताना अथवा रजवाड़ा भी कहा जाता है। 12वीं शताब्दी तक यहाँ गुर्जरों का प्रभुत्व था, जिसके कारण इसे गुर्जरत्रा (गुर्जरों द्वारा संरक्षित देश) कहा जाता था। गुर्जरों के पश्चात् राजस्थान में राजपूतों की सत्ता स्थापित हुई तथा ब्रिटिश काल में यह प्रदेश राजपूताना के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
पूर्व मध्यकालीन राजस्थान
इस काल की सबसे महत्वपूर्ण घटना युद्धप्रिय राजपूत जाति का उदय एवं राजस्थान में राजपूत राज्यों की स्थापना है। गुप्तों के पतन के बाद केन्द्रीय शक्ति का अभाव उत्तरी भारत में एक प्रकार से अव्यवस्था का कारण बना। राजस्थान की गणतंत्रीय जातियों ने उत्तर गुप्तों की कमजोरियों का लाभ उठाकर स्वयं को स्वतंत्र कर लिया। यह वह समय था जब भारत पर हूण आक्रमण हो रहे थे। हूण नेता मिहिरकुल ने अपने भयंकर आक्रमणों से राजस्थान को बड़ी क्षति पहुँचाई और बिखरी हुई गणतंत्रीय व्यवस्था को जर्जर कर दिया। परन्तु मालवा के यशोवर्मन ने लगभग 532 ई. में हूणों को परास्त करने में सफलता प्राप्त की।
इधर राजस्थान में यशोवर्मन के अधिकारी, जो राजस्थानी कहलाते थे, अपने-अपने क्षेत्रों में स्वतंत्र होने की चेष्टा कर रहे थे। किसी भी केन्द्रीय शक्ति का न होना उनकी इस प्रवृत्ति के लिए सहायक बन गया। लगभग इसी समय उत्तरी भारत में हर्षवर्धन का उदय हुआ। उसके तत्त्वावधान में राजस्थान में व्यवस्था एवं शांति की लहर आई, परन्तु जो बिखरी हुई अवस्था यहाँ उत्पन्न हो गई थी, वह सुधर नहीं सकी।
इन राजनीतिक उथल-पुथल के संदर्भ में यहाँ के समाज में भी एक परिवर्तन दिखाई देता है। राजस्थान में दूसरी सदी ईसा-पूर्व से छठी सदी तक विदेशी जातियाँ आती रहीं और यहाँ के स्थानीय समूह उनका मुकाबला करते रहे। परन्तु कालान्तर में इन विदेशी आक्रमणकारियों की पराजय हुई। इनमें से कई मारे गए और कई यहीं बस गए। जो शक या हूण यहाँ बचे रहे, उनका यहाँ की शस्त्रजीवी जातियों के साथ निकट सम्पर्क स्थापित होता गया और अन्ततः छठी शताब्दी तक स्थानीय एवं विदेशी योद्धाओं का भेद समाप्त हो गया।
सांभर के चौहान
चौहानों के मूल स्थान के संबंध में मान्यता है कि वे सपादलक्ष एवं जांगल प्रदेश के आसपास रहते थे। उनकी राजधानी अहिच्छत्रपुर (नागौर) थी। सपादलक्ष के चौहानों का आदि पुरुष वासुदेव था, जिसका समय लगभग 551 ई. माना जाता है। बिजौलिया प्रशस्ति में वासुदेव को सांभर झील का निर्माता माना गया है। इस प्रशस्ति में चौहानों को वत्सगोत्रीय ब्राह्मण बताया गया है।
प्रारम्भ में चौहान प्रतिहारों के सामन्त थे, परन्तु गुवक प्रथम, जिसने हर्षनाथ मन्दिर का निर्माण कराया, स्वतंत्र शासक के रूप में उभरा। इसी वंश के चन्दराज की पत्नी रुद्राणी योगिक क्रियाओं में निपुण थी। ऐसा माना जाता है कि वह पुष्कर झील में प्रतिदिन एक हजार दीपक जलाकर महादेव की उपासना करती थी।
मारवाड़ के गुर्जर-प्रतिहार
प्रतिहारों द्वारा अपने राज्य की स्थापना सर्वप्रथम राजस्थान में की गई थी, ऐसा अनुमान लगाया जाता है। जोधपुर के शिलालेखों से प्रमाणित होता है कि प्रतिहारों का अधिवेशन मारवाड़ में लगभग छठी शताब्दी के द्वितीय चरण में हो चुका था। चूँकि उस समय राजस्थान का यह भाग गुर्जरत्रा कहलाता था, इसलिए चीनी यात्री युवानच्वांग ने गुर्जर राज्य की राजधानी का नाम पी-लो-मो-लो (भीनमाल) बताया है।
मुहणोत नैणसी ने प्रतिहारों की 26 शाखाओं का उल्लेख किया है, जिनमें मण्डौर के प्रतिहार प्रमुख थे। इस शाखा का हरिश्चन्द्र बड़ा प्रतापी शासक था, जिसका समय छठी शताब्दी के आसपास माना जाता है। लगभग 600 वर्षों के अपने काल में मण्डौर के प्रतिहारों ने सांस्कृतिक परम्पराओं को निभाकर अपने उदात्त स्वातन्त्र्य-प्रेम और शौर्य से उज्ज्वल कीर्ति अर्जित की।
जालौर-उज्जैन-कन्नौज के गुर्जर-प्रतिहारों की नामावली नागभट्ट से आरम्भ होती है, जो इस वंश का प्रवर्तक था। उसे ग्वालियर प्रशस्ति में ‘म्लेच्छों का नाशक’ कहा गया है। इस वंश में भोज और महेन्द्रपाल को प्रतापी शासकों में गिना जाता है।
राजपूतों की उत्पत्ति
राजपूताना के इतिहास के संदर्भ में राजपूतों की उत्पत्ति के विभिन्न सिद्धान्तों का अध्ययन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। राजपूतों को विशुद्ध जाति से उत्पन्न सिद्ध करने के लिए उन्हें अग्निवंशी बताया गया है। इस मत का प्रथम सूत्रपात चन्दबरदाई के प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘पृथ्वीराज रासो’ से होता है। उसके अनुसार राजपूतों के चार वंश—प्रतिहार, परमार, चालुक्य और चौहान—ऋषि वशिष्ठ के यज्ञकुण्ड से राक्षसों के संहार के लिए उत्पन्न किए गए थे।
इस कथानक का प्रचार 16वीं से 18वीं शताब्दी तक भाटों द्वारा खूब किया गया। मुहणोत नैणसी और सूर्यमल्ल मिश्रण ने भी इसी आधार को लेकर इसका विस्तार किया। परन्तु वास्तव में ‘अग्निवंशी सिद्धान्त’ पर विश्वास करना उचित नहीं प्रतीत होता, क्योंकि सम्पूर्ण कथानक बनावटी एवं अव्यावहारिक लगता है।
ऐसा प्रतीत होता है कि चन्दबरदाई ऋषि वशिष्ठ द्वारा अग्नि से इन वंशों की उत्पत्ति का उल्लेख कर यह अभिव्यक्त करना चाहते थे कि जब विदेशी सत्ता से संघर्ष करने की आवश्यकता हुई, तब इन चार वंशों के राजपूतों ने शत्रुओं का मुकाबला करने हेतु स्वयं को संगठित कर लिया।
गौरीशंकर हीराचन्द ओझा, सी. वी. वैद्य, दशरथ शर्मा, ईश्वरी प्रसाद आदि इतिहासकारों ने इस मत को निराधार बताया है। गौरीशंकर हीराचन्द ओझा राजपूतों को सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी बताते हैं। अपने मत की पुष्टि के लिए उन्होंने अनेक शिलालेखों और साहित्यिक ग्रन्थों के प्रमाण दिए हैं, जिनके आधार पर उनकी मान्यता है कि राजपूत प्राचीन क्षत्रियों के वंशज हैं।
राजपूतों की उत्पत्ति से सम्बन्धित यही मत सर्वाधिक लोकप्रिय है। राजपूताना के प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने राजपूतों को शक और सीथियन बताया है। इसके प्रमाण में उन्होंने अनेक प्रचलित रीति-रिवाजों का उल्लेख किया है, जो शक जाति के रीति-रिवाजों से समानता रखते थे। इनमें सूर्य पूजा, सती-प्रथा, अश्वमेध यज्ञ, मद्यपान तथा शस्त्रों और घोड़ों की पूजा आदि सम्मिलित हैं।
टॉड की पुस्तक के सम्पादक विलियम क्रूक ने भी इसी मत का समर्थन किया है, परन्तु इस विदेशी वंशीय मत का गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने खण्डन किया है। ओझा का कहना है कि राजपूतों तथा विदेशियों के रीति-रिवाजों में जो समानता कर्नल टॉड ने बताई है, वह विदेशियों से प्राप्त नहीं हुई, बल्कि उनकी समानता वैदिक एवं पौराणिक समाज तथा संस्कृति से स्थापित की जा सकती है।
अतः उनका मत है कि शक, कुषाण अथवा हूणों के जिन-जिन रीति-रिवाजों और परम्पराओं का उल्लेख जेम्स टॉड ने समानता के आधार पर किया है, वे भारतवर्ष में प्राचीन काल से ही प्रचलित थे। उनका सम्बन्ध इन विदेशी जातियों से जोड़ना उचित नहीं है।
डॉ. डी. आर. भण्डारकर ने राजपूतों को गुर्जर मानते हुए उनका सम्बन्ध श्वेत हूणों से स्थापित किया और विदेशी वंशीय उत्पत्ति के सिद्धान्त को बल दिया। इसकी पुष्टि में उन्होंने बताया कि पुराणों में गुर्जर और हूणों का वर्णन विदेशियों के सन्दर्भ में मिलता है। इसी प्रकार उनका मत था कि अग्निवंशी प्रतिहार, परमार, चालुक्य और चौहान भी गुर्जर थे, क्योंकि राजौर अभिलेख में प्रतिहारों को गुर्जर कहा गया है।
इसके अतिरिक्त भण्डारकर ने बिजोलिया शिलालेख के आधार पर कुछ राजपूत वंशों को ब्राह्मणों से उत्पन्न माना है। वे चौहानों को वत्सगोत्रीय ब्राह्मण बताते हैं तथा गुहिल राजपूतों की उत्पत्ति नागर ब्राह्मणों से मानते हैं।
डॉ. ओझा एवं वैद्य ने भण्डारकर की मान्यता को अस्वीकार करते हुए लिखा है कि प्रतिहारों को गुर्जर कहा जाना जाति-सूचक नहीं, बल्कि प्रदेश-सूचक है, क्योंकि उनका अधिकार गुजरात अथवा गुर्जरत्रा क्षेत्र पर था। जहाँ तक राजपूतों की ब्राह्मणों से उत्पत्ति का प्रश्न है, वह भी निराधार है, क्योंकि इसके समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं।
इस प्रकार राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में उपर्युक्त मतों में पूर्ण मतैक्य नहीं है। फिर भी डॉ. ओझा के मत को सामान्यतः अधिक मान्यता प्राप्त हुई है। निःसन्देह राजपूतों को भारतीय मूल का मानना अधिक उचित प्रतीत होता है।
पूर्व मध्यकाल में विभिन्न राजपूत राजवंशों का उदय
प्रारम्भिक राजपूत कुलों में, जिन्होंने राजस्थान में अपने-अपने राज्य स्थापित किए, मेवाड़ के गुहिल, मारवाड़ के गुर्जर-प्रतिहार एवं राठौड़, सांभर के चौहान, आबू के परमार, आम्बेर के कछवाहा तथा जैसलमेर के भाटी आदि प्रमुख थे।
मौर्य और राजस्थान
राजस्थान के कुछ भाग मौर्यों के अधीन अथवा उनके प्रभाव क्षेत्र में थे। अशोक का बैराठ शिलालेख तथा उसके उत्तराधिकारी कुणाल के पुत्र सम्प्रति द्वारा बनवाए गए मंदिर मौर्यों के प्रभाव की पुष्टि करते हैं। कुमारपाल प्रबन्ध तथा अन्य जैन ग्रंथों से अनुमान होता है कि चित्तौड़ का दुर्ग और चित्रांग तालाब मौर्य राजा चित्रांग द्वारा निर्मित कराए गए थे।
चित्तौड़ से कुछ दूरी पर स्थित मानसरोवर नामक तालाब के समीप राजा मान का, जो मौर्यवंशी माना जाता है, विक्रम संवत् 770 का एक शिलालेख कर्नल टॉड को प्राप्त हुआ था। उसमें माहेश्वर, भीम, भोज और मान—ये चार नाम क्रमशः दिए गए हैं। कोटा के निकट कणसवा (कंसुआ) के शिवालय से विक्रम संवत् 795 का एक शिलालेख प्राप्त हुआ है, जिसमें मौर्यवंशी राजा धवल का नाम अंकित है। इन प्रमाणों से राजस्थान में मौर्यों के अधिकार और प्रभाव का स्पष्ट संकेत मिलता है।
हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात् भारत की राजनीतिक एकता पुनः विघटित होने लगी। इस युग में भारत में अनेक नए राजवंशों का उदय हुआ। राजस्थान में भी अनेक राजपूत वंशों ने अपने-अपने राज्य स्थापित कर लिए। इनमें मारवाड़ के प्रतिहार और राठौड़, मेवाड़ के गुहिल, सांभर के चौहान, आमेर के कछवाहा तथा जैसलमेर के भाटी प्रमुख थे।
शिलालेखों के आधार पर कहा जा सकता है कि छठी शताब्दी में मण्डोर के आसपास प्रतिहारों का राज्य था और आगे चलकर वही क्षेत्र राठौड़ों के अधिकार में आया। लगभग इसी समय सांभर में चौहान राज्य की स्थापना हुई और धीरे-धीरे वह अत्यन्त शक्तिशाली बन गया। पाँचवीं अथवा छठी शताब्दी में मेवाड़ और उसके आसपास के क्षेत्रों में गुहिलों का शासन स्थापित हो गया। दसवीं शताब्दी में अर्थूणा और आबू में परमार शक्तिशाली बने। बारहवीं और तेरहवीं शताब्दी तक जालौर, रणथम्भौर और हाड़ौती में चौहानों ने पुनः अपनी शक्ति का संगठन किया, यद्यपि समय-समय पर उसका विघटन भी होता रहा।
मेवाड़ के गुहिल
इस वंश का आदिपुरुष गुहिल था। इसी कारण इस वंश के राजपूत जहाँ-जहाँ जाकर बसे, उन्होंने स्वयं को गुहिलवंशी कहा। गौरीशंकर हीराचन्द ओझा गुहिलों को विशुद्ध सूर्यवंशी मानते हैं, जबकि डी. आर. भण्डारकर के अनुसार मेवाड़ के राजा ब्राह्मण थे।
गुहिल के बाद मान्य शासकों में बापा का नाम विशेष उल्लेखनीय है, जो मेवाड़ के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। डॉ. ओझा के अनुसार ‘बापा’ उसका नाम न होकर कालभोज की उपाधि थी। बापा का एक स्वर्ण सिक्का भी प्राप्त हुआ है, जिसका भार 115 ग्रेन था।
अल्लट, जिसे ख्यातों में आलूरावल कहा गया है, लगभग दसवीं शताब्दी में मेवाड़ का शासक बना। उसने हूण राजकुमारी हरियादेवी से विवाह किया था तथा उसके शासनकाल में आहड़ में वराह मंदिर का निर्माण कराया गया था। आहड़ से पूर्व गुहिल वंश की गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र नागदा था। गुहिलों ने तेरहवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक अनेक राजनीतिक उतार-चढ़ावों के बावजूद अपने पारम्परिक राज्य को बनाए रखा।
आबू के परमार
‘परमार’ शब्द का अर्थ है—शत्रु का संहार करने वाला। प्रारम्भ में परमार आबू के आसपास के प्रदेशों में रहते थे, परन्तु प्रतिहारों की शक्ति के ह्रास के साथ ही उनका राजनीतिक प्रभाव बढ़ता गया। धीरे-धीरे उन्होंने मारवाड़, सिंध, गुजरात, वागड़ और मालवा आदि क्षेत्रों में अपने राज्य स्थापित कर लिए।
आबू के परमारों का कुलपुरुष धूमराज माना जाता है, किन्तु उनकी वंशावली उत्पलराज से आरम्भ होती है। परमार शासक धन्धुक के समय गुजरात के भीमदेव ने आबू पर अधिकार कर वहाँ विमलशाह को दण्डपति नियुक्त किया। विमलशाह ने 1031 ई. में आबू पर आदिनाथ का भव्य जैन मंदिर बनवाया।
धारावर्ष आबू के परमारों का सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक था। उसका काल विद्या, साहित्य और जनोपयोगी कार्यों के लिए प्रसिद्ध है। उसका छोटा भाई प्रह्लादनदेव वीर एवं विद्वान था। उसने ‘पार्थ-पराक्रम-व्यायोग’ नामक नाटक की रचना की तथा अपने नाम पर प्रह्लादनपुर (वर्तमान पालनपुर) नगर बसाया। इससे परमारों के साहित्यिक और सांस्कृतिक स्तर का परिचय मिलता है।
धारावर्ष के पुत्र सामसिंह के समय, जो गुजरात के सोलंकी राजा भीमदेव द्वितीय का सामन्त था, वस्तुपाल के छोटे भाई तेजपाल ने आबू के देलवाड़ा गाँव में लूणवसही नामक नेमिनाथ मंदिर का निर्माण कराया। मालवा के भोज परमार ने चित्तौड़ में त्रिभुवन नारायण मंदिर बनवाकर अपनी कला-रुचि का परिचय दिया। वागड़ के परमारों ने बाँसवाड़ा के समीप अर्थूणा नगर बसाया तथा अनेक मंदिरों का निर्माण कर अपनी स्थापत्य-कला के प्रति निष्ठा प्रदर्शित की।
मध्यकालीन राजस्थान
मध्यकाल में राजपूत शासकों और सामन्तों ने मुस्लिम शक्ति को रोकने के लिए समय-समय पर भरपूर प्रयास किए। राजपूतों द्वारा तीव्र प्रतिरोध का सिलसिला निरन्तर चलता रहा। यद्यपि वे निर्णायक विजय प्राप्त नहीं कर सके, जिसका मुख्य कारण आपसी सहयोग का अभाव, युद्धनीति की कमजोरियाँ तथा सामन्तवादी व्यवस्था थी।
फिर भी यह सोचना उचित नहीं है कि राजपूतों के प्रतिरोध का कोई महत्व नहीं था। राणा कुम्भा और राणा सांगा के नेतृत्व में सर्वोच्च राजनीतिक शक्ति की स्थापना राजस्थान में ही सम्भव हो सकी। आगे चलकर राणा प्रताप, राव चन्द्रसेन और राजसिंह ने मुगलों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा। यद्यपि अकबर की राजपूत नीति के कारण राजपूताना के अधिकांश शासक उसके सहयोगी बन गए थे।
मध्यकालीन राजस्थान को बौद्धिक दृष्टि से पिछड़ा मानना इतिहास के तथ्यों के विपरीत होगा। जिस वीरभूमि पर माघ, हरिभद्र सूरी, चन्दबरदाई, सूर्यमल्ल मिश्रण, कवि करणीदान, दुरसा आढ़ा और मुहणोत नैणसी जैसे विद्वान उत्पन्न हुए हों तथा जहाँ महाराणा कुम्भा, राजा रायसिंह और सवाई जयसिंह जैसे प्रबुद्ध शासक हुए हों, उसे ज्ञान से वंचित नहीं कहा जा सकता।
जिस प्रदेश के रणबांकुरों में महाराणा प्रताप, राव चन्द्रसेन और दुर्गादास राठौड़ जैसे महान व्यक्तित्व हुए हों, वह भूमि यश से वंचित नहीं हो सकती। ‘धरती धोरां री’ का इतिहास केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारतीय इतिहास का गौरवपूर्ण अध्याय है।
मध्यकालीन राजस्थान के इतिहास में गुहिल-सिसोदिया (मेवाड़), कछवाहा (आमेर-जयपुर), चौहान (अजमेर, दिल्ली, जालौर, सिरोही और हाड़ौती), तथा राठौड़ (जोधपुर और बीकानेर) जैसे राजवंश नक्षत्रों की भाँति चमकते दिखाई देते हैं।
पृथ्वीराज चौहान
अजयराज चौहान द्वारा स्थापित अजमेर राज्य आगे चलकर पृथ्वीराज चौहान के समय अपनी शक्ति के चरम पर पहुँचा। 1191 ई. में लड़ा गया तराइन का प्रथम युद्ध हिन्दू विजय का एक गौरवपूर्ण अध्याय माना जाता है। परन्तु पृथ्वीराज द्वारा पराजित तुर्की सेना का पीछा न किया जाना भारतीय इतिहास की एक बड़ी रणनीतिक भूल सिद्ध हुई।
इसके परिणामस्वरूप 1192 ई. में मुहम्मद गौरी ने तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान तृतीय को पराजित कर दिया। इस पराजय का एक प्रमुख कारण राजपूतों की परम्परागत सैन्य व्यवस्था और सामूहिक रणनीति का अभाव माना जाता है।
पृथ्वीराज चौहान अपने राज्यकाल के आरम्भ से अन्त तक निरन्तर युद्ध करता रहा, जो उसे एक कुशल सैनिक और सेनानायक सिद्ध करता है। तराइन के द्वितीय युद्ध को छोड़कर वह अपने अधिकांश युद्धों में विजयी रहा। वह स्वयं गुणी था तथा विद्वानों का सम्मान करता था।
जयानक, विद्यापति गौड़, वागीश्वर, जनार्दन तथा विश्वरूप उसके दरबारी कवि और लेखक थे। जयानक ने ‘पृथ्वीराज विजय’ की रचना की। ‘पृथ्वीराज रासो’ के रचयिता चन्दबरदाई भी पृथ्वीराज चौहान के आश्रित कवि थे। उनकी रचनाएँ पृथ्वीराज के युग को आज भी अमर बनाए हुए हैं।
राजस्थान में जन-जागरण एवं स्वतंत्रता संग्राम
1857 की क्रांति की पृष्ठभूमि
राजस्थान के देशी राज्यों ने अंग्रेजी कम्पनी के साथ संधियाँ (1818 ई.) करके मराठों द्वारा उत्पन्न अराजकता से मुक्ति प्राप्त कर ली तथा राज्य की बाह्य सुरक्षा के विषय में भी निश्चिंत हो गए, क्योंकि अब कम्पनी ने उनके राज्यों को बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा प्रदान करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी।
प्रत्यक्ष रूप से देशी रियासतों पर कोई विशेष आर्थिक भार भी नहीं पड़ा, क्योंकि जो खिराज वे मराठों को चुकाते थे, वही अब अंग्रेजों को देना था। अतः राजा प्रसन्न हो गए कि अब उनका निरंकुश शासन चलता रहेगा। राजाओं को संधियों की शर्तें इतनी आकर्षक लगीं कि उन्होंने अंग्रेजी कम्पनी की ईमानदारी पर बिना किसी शंका के संधियों पर हस्ताक्षर कर दिए।
किन्तु जैसे ही कम्पनी अधिकारियों ने संधियों की शर्तों को व्यवहार में लागू करना प्रारम्भ किया, राजाओं के वंशानुगत अधिकारों पर कुठाराघात होने लगा। कम्पनी ने राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर देशी नरेशों की प्रभुसत्ता को चुनौती दी और उनकी स्थिति कम्पनी के सामन्तों एवं जागीरदारों जैसी हो गई। कम्पनी की नीतियों से सामन्तों के पद, मर्यादा तथा अधिकारों को भी आघात पहुँचा।
कम्पनी द्वारा अपनाई गई आर्थिक नीतियों के परिणामस्वरूप राजा, सामन्त, किसान, व्यापारी, शिल्पी एवं मजदूर—सभी वर्ग प्रभावित हुए। कम्पनी के साथ की गई संधियों के अनेक दुष्परिणाम सामने आए, जिन्होंने 1857 की क्रांति की पृष्ठभूमि तैयार की।
राज्यों के आंतरिक शासन में हस्तक्षेप
राजपूत राजाओं के साथ संधियाँ करते समय अंग्रेजों ने स्पष्ट आश्वासन दिया था कि वे राज्यों के आंतरिक प्रशासन में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेंगे। परन्तु उन्होंने शीघ्र ही इस आश्वासन का उल्लंघन करना प्रारम्भ कर दिया।
1839 ई. में जोधपुर के शासक पर दबाव डालकर जोधपुर दुर्ग पर अधिकार कर लिया गया। 1842-43 ई. में पुनः जोधपुर के मामलों में हस्तक्षेप करते हुए नाथों की जागीरें जब्त कर उन्हें कैद में डाल दिया गया।
1819 ई. में जयपुर के मामलों में हस्तक्षेप किया गया। 1821 ई. के मांगरोल युद्ध में अंग्रेजों ने कोटा के महाराव के विरुद्ध दीवान जालिम सिंह की सहायता की, जो अंग्रेज समर्थक था।
मेवाड़ के प्रशासन में भी राजनीतिक एजेंटों के बार-बार हस्तक्षेप ने राज्य की आर्थिक स्थिति को अत्यन्त दयनीय बना दिया। 1823 ई. में कैप्टन कौब ने समस्त शासन-प्रबन्ध अपने हाथ में ले लिया और महाराणा के व्यक्तिगत व्यय हेतु प्रतिदिन एक हजार रुपये निश्चित कर दिए।
इस प्रकार संधियों की शर्तों के विपरीत अंग्रेजों ने राज्यों के आंतरिक प्रशासन में हस्तक्षेप कर उनकी बाह्य प्रभुसत्ता के साथ-साथ आंतरिक स्वायत्तता भी समाप्त कर दी। अब राजा अपने राज्य के संप्रभु स्वामी न रहकर अंग्रेजों की कृपा-दृष्टि पर निर्भर हो गए।
राज्यों के उत्तराधिकार मामलों में हस्तक्षेप
अंग्रेजों ने राज्यों को आश्वासन दिया था कि वे उनके परम्परागत शासन में हस्तक्षेप नहीं करेंगे, किन्तु शांति एवं व्यवस्था बनाए रखने के बहाने उन्होंने उत्तराधिकार के मामलों में खुलकर हस्तक्षेप किया।
1826 ई. में अलवर राज्य के मामलों में हस्तक्षेप कर बलवन्त सिंह और बनेसिंह के मध्य राज्य का विभाजन करवा दिया गया।
भरतपुर के उत्तराधिकार विवाद में अंग्रेजों ने 1826 ई. में लोहागढ़ दुर्ग को घेरकर उस पर अधिकार कर लिया तथा बालक बलवन्त सिंह को गद्दी पर बैठाकर राजनीतिक एजेंट के अधीन एक परिषद् (काउंसिल) नियुक्त कर दी।
अंग्रेज अपने समर्थक उम्मीदवारों को उत्तराधिकारी बनाकर राज्यों में अप्रत्यक्ष रूप से अपनी राजनीतिक प्रभुता स्थापित करते थे। जिस राज्य का उत्तराधिकारी अल्पवयस्क होता, वहाँ ए.जी.जी. अथवा रेजीडेंट की अध्यक्षता में परिषद् गठित कर प्रशासन पर नियंत्रण स्थापित कर लिया जाता था।
1835 ई. में जयपुर में शासन संचालन हेतु राजनीतिक एजेंट के निर्देशन में सरदारों की समिति गठित की गई। 1844 ई. में बाँसवाड़ा में महारावल लक्ष्मणसिंह की अल्पायु के दौरान प्रशासन अंग्रेजी नियंत्रण में रहा। गोद लेने के प्रश्न पर भी अंग्रेज अपना निर्णय थोपने का प्रयास करते थे।
राज्यों की कमजोर वित्तीय स्थिति
संधियों के द्वारा राजपूत राज्यों को मराठों एवं पिण्डारियों की लूटमार से राहत तो मिली, किन्तु अंग्रेजों ने भी प्रारम्भ से ही खिराज की प्रथा लागू कर आर्थिक शोषण आरम्भ कर दिया।
यदि खिराज का भुगतान समय पर नहीं होता, तो कम्पनी उस पर चक्रवृद्धि ब्याज लगाकर वसूली करती थी। इसके अतिरिक्त शांति व्यवस्था बनाए रखने तथा युद्धकालीन आवश्यकताओं के नाम पर भी राज्यों से धन लिया जाता था।
राजाओं को अपने व्यय पर कम्पनी के लिए सैन्य टुकड़ियाँ भी रखनी पड़ती थीं। यदि कोई राज्य यह व्यय वहन करने में असमर्थ होता, तो उसके राज्य का कुछ भाग कम्पनी अपने अधीन कर लेती थी।
1835 ई. में जयपुर नरेश को शेखावाटी के विद्रोही सामन्तों को दबाने हेतु सैन्य सहायता प्रदान की गई और उसके बदले सांभर झील कम्पनी के अधीन कर ली गई।
जोधपुर में 1835 ई. में ‘जोधपुर लीजियन’ का गठन कर उसका वार्षिक व्यय एक लाख पन्द्रह हजार रुपये राज्य पर डाल दिया गया। 1841 ई. में ‘मेवाड़ भील कोर’, 1822 ई. में ‘मेरवाड़ा बटालियन’ तथा 1834 ई. में ‘शेखावाटी ब्रिगेड’ की स्थापना की गई, जिनका व्यय संबंधित राज्यों से वसूला जाता था, जबकि उनका नियंत्रण अंग्रेजों के हाथ में था।
राज्यों का शिथिल प्रशासन
संधियों के बाद राजपूत राज्यों को बाहरी आक्रमणों का भय नहीं रहा तथा आंतरिक विद्रोहों के समय अंग्रेजी सहायता उपलब्ध होने लगी। परिणामस्वरूप प्रशासनिक मामलों में रेजीडेंटों का हस्तक्षेप निरन्तर बढ़ता गया।
धीरे-धीरे राजाओं ने प्रशासन पर अपना नियंत्रण खो दिया और वे केवल औपचारिक शासक बनकर रह गए। रेजीडेंटों ने प्रशासन में अपने समर्थकों को नियुक्त करना प्रारम्भ कर दिया।
बाँसवाड़ा का प्रशासन मुंशी शहामत अली खाँ (1844-56 ई.) के हाथों में था, अलवर का प्रशासन अहमदबख्श खाँ (1815-26 ई.) नियंत्रित करता था तथा जयपुर में 1835 ई. के बाद अंग्रेज समर्थक जेठाराम प्रभावशाली व्यक्ति बन गया।
नरेशों का प्रशासन में महत्व घटने के कारण वे शासन के प्रति उदासीन हो गए और अपना अधिकांश समय विलासिता, मनोरंजन एवं विदेश यात्राओं में व्यतीत करने लगे। प्रशासनिक शिथिलता का दुष्परिणाम जनता को भुगतना पड़ा। सामन्त और कर्मचारी जनता का शोषण करने लगे, जिसकी परिणति आगे चलकर किसान आंदोलनों के रूप में हुई।
किसानों एवं जनसाधारण के हितों पर कुठाराघात
अंग्रेजों के साथ संधियाँ करने के पश्चात् राजपूत राज्यों के व्यय में अप्रत्याशित वृद्धि हुई। खिराज, अंग्रेजी अधिकारियों तथा सैनिक टुकड़ियों के व्यय के अतिरिक्त रेलवे, सड़क, सिंचाई, शिक्षा और चिकित्सा जैसे कार्यों पर भी खर्च बढ़ा।
दूसरी ओर व्यापार पर अंग्रेजी नियंत्रण स्थापित होने से राज्यों की आय में कमी आने लगी। परिणामस्वरूप राजस्व वृद्धि के लिए भूमि-कर बढ़ाया गया।
अकाल अथवा उपज में कमी होने पर भी किसानों को निर्धारित भूमि-कर नकद देना पड़ता था। इससे वे साहूकारों के कर्ज़ के बोझ तले दबते गए। अब किसानों को भूमि से बेदखल भी किया जाने लगा, जबकि अंग्रेजों के आगमन से पूर्व ऐसा सामान्यतः नहीं होता था।
राज्यों ने चराई कर, सिंचाई कर तथा अन्य अनेक कर लगाकर किसानों का बोझ और बढ़ा दिया। शासकों ने प्रशासनिक उत्तरदायित्वों की अपेक्षा विलासिता और यात्राओं को अधिक महत्व देना शुरू कर दिया।
रेलवे के विकास से जहाँ एक ओर आधुनिक सुविधाएँ आईं, वहीं दूसरी ओर ब्रिटेन निर्मित वस्तुओं ने स्थानीय उद्योगों को भारी क्षति पहुँचाई। राज्य का कच्चा माल बाहर भेजा जाने लगा और अकाल के समय भी खाद्यान्नों का निर्यात होता रहा।
व्यापार पर अंग्रेजी नियंत्रण के कारण अनेक व्यापारी राज्य छोड़कर चले गए। दस्तकारों एवं हस्तशिल्पियों की वस्तुएँ विदेशी वस्तुओं की तुलना में महँगी पड़ने लगीं और उन्हें शासकीय संरक्षण भी नहीं मिला। फलतः उनका जीवन संकट में पड़ गया और अनेक शिल्पियों को अपना परम्परागत व्यवसाय छोड़कर मजदूरी करनी पड़ी।
इस प्रकार 1818 ई. की संधियाँ प्रारम्भ में आकर्षक प्रतीत हुईं, किन्तु उनके परिणामस्वरूप शासक शक्तिहीन हो गए, सामन्तों का अस्तित्व संकट में पड़ गया तथा किसानों और जनसाधारण की स्थिति अत्यन्त दयनीय हो गई।
इन्हीं परिस्थितियों ने 1857 की क्रांति की पृष्ठभूमि तैयार की। क्रांति के दौरान जनसाधारण तथा सामन्त वर्ग ने अनेक स्थानों पर विद्रोहियों का स्वागत किया और उनका सहयोग किया। बाद के वर्षों में भी राज्यों को किसान एवं जन-आंदोलनों का सामना करना पड़ा।
राजा और प्रजा के मध्य जो सम्मानजनक संबंध कभी विद्यमान थे, वे धीरे-धीरे समाप्त होकर शोषक और शोषित के संबंधों में परिवर्तित हो गए।
क्रांति का सूत्रपात एवं विस्तार
1857 की क्रांति प्रारम्भ होने के समय राजपूताना में नसीराबाद, नीमच, देवली, ब्यावर, एरिनपुरा एवं खेरवाड़ा में सैनिक छावनियां थी। इन 6 छावनियों में पाँच हजार सैनिक थे किन्तु सभी सैनिक भारतीय थे। मेरठ में हुए विद्रोह (10 मई,1857) की सूचना राजस्थान के ए.जी.जी. (एजेंट टू गवर्नर जनरल) जॉर्ज पैट्रिक लॉरेन्स को 19 मई, 1857 को प्राप्त हुई। सूचना मिलते ही उसने सभी शासकों को निर्देश दिये कि वे अपने-अपने राज्य में शांति बनाए रखें तथा अपने राज्यों में विद्रोहियों को न घुसने दें। यह भी हिदायत दी कि यदि विद्रोहियों ने प्रवेश कर लिया हो तो उन्हें तत्काल बंदी बना लिया जावे। ए.जी.जी. के सामने उस समय अजमेर की सुरक्षा की समस्या सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण थी, क्योंकि अजमेर शहर में भारी मात्रा में गोला बारूद एवं सरकारी खजाना था। यदि यह सब विद्रोहियों के हाथ में पड़ जाता तो उनकी स्थिति अत्यन्त सुदृढ़ हो जाती। अजमेर स्थित भारतीय सैनिकों की दो कंपनियां हाल ही में मेरठ से आयी थी और ए.जी.जी. ने सोचा कि सम्भव है यह इन्फेन्ट्री (15वीं बंगाल नेटिव इन्फेन्ट्री) मेरठ से विद्रोह की भावना लेकर आयी हो, अतः इस इन्फेन्ट्री को नसीराबाद भेज दिया तथा ब्यावर से दो मेर रेजिमेंट बुला ली गई। तत्पश्चात् उसने डीसा (गुजरात) से एक यूरोपीय सेना भेजने को लिखा। राजस्थान में क्रांति की शुरुआत नसीराबाद से हुई, जिसके निम्न कारण थे - ए.जी.जी. ने 15वीं बंगाल इन्फेन्ट्री जो अजमेर में थी, उसे अविश्वास के कारण नसीराबाद में भेज दिया था। इस अविश्वास के चलते उनमें असंतोष पनपा।
मेरठ में हुए विद्रोह की सूचना के पश्चात् अंग्रेज सैन्य अधिकारियों ने नसीराबाद स्थित सैनिक छावनी की रक्षार्थ फर्स्ट बम्बई लांसर्स के उन सैनिकों से, जो वफादार समझे जाते थे, गश्त लगवाना प्रारम्भ किया। तोपों को तैयार रखा गया। अतः नसीराबाद में जो 15वीं नेटिव इन्फेन्ट्री थी, उसके सैनिकों ने सोचा कि अंग्रेजो ने यह कार्यवाही भी भारतीय सैनिकों को कुचलने के लिए की है तथा गोला-बारूद से भरी तोपें उनके विरुद्ध प्रयोग करने के लिए तैयार की गई है। अतः उनमें विद्रोह की भावना जागृत हुई।
बंगाल और दिल्ली से छद्मधारी साधुओं ने चर्बी वाले कारतूसों के विरुद्ध प्रचार कर विद्रोह का संदेश प्रसारित किया, जिससे अफवाहों का बाजार गर्म हो गया। वस्तुतः 1857 के विद्रोह का तात्कालिक कारण चर्बी वाले कारतूसों को लेकर था। एनफील्ड राइफलों में प्रयोग में लिए जाने वाले कारतूस की टोपी (केप) को दांतों से हटाना पड़ता था। इन कारतूसों को चिकना करने के लिए गाय तथा सूअर की चर्बी काम में लाई जाती थी। इसका पता चलते ही हिन्दू-मुसलमान सभी सैनिकों में विद्रोह की भावना बलवती हो गई। सैनिकों ने यह समझा कि अंग्रेज उन्हें धर्म भ्रष्ट करना चाहते हैं। यही कारण था कि क्रांति का प्रारम्भ नियत तिथि से पहले हो गया।
राजस्थान में क्रांति का प्रारम्भ 28 मई, 1857 को नसीराबाद छावनी के 15वीं बंगाल नेटिव इन्फेन्ट्री के सैनिकों द्वारा हुआ। नसीराबाद छावनी के सैनिकों में 28 मई, 1857 को विद्रोह कर छावनी को लूटलिया तथा अंग्रेज अधिकारियों के बंगलों पर आक्रमण किये। मेजर स्पोटिस वुड एवं न्यूबरी की हत्या के बाद शेष अंग्रेजों ने नसीराबाद छोड़ दिया। छावनी को लूटने के बाद विद्रोही सैनिकों ने दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। इन सैनिकों ने 18 जून, 1857 को दिल्ली पहुँचकर अंग्रेज पलटन को पराजित किया, जो दिल्ली का घेरा डाले हुए थी। नसीराबाद की क्रांति की सूचना नीमच पहुँचने पर 3 जून, 1857 को नीमच छावनी के भारतीय सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। उन्होंने शस्त्रागार को आग लगा दी तथा अंग्रेज अधिकारियों के बंगलों पर हमला कर एक अंग्रेज सार्जेन्ट की पत्नी तथा बच्चों का वध कर दिया। नीमच छावनी के सैनिक चित्तौड़, हम्मीरगढ़ तथा बनेड़ा में अंग्रेज बंगलों को लूटते हुए शाहपुरा पहुँचे। यहाँ के सामन्त ने इनको रसद की आपूर्ति की। यहाँ से ये सैनिक निम्बाहेड़ा पहुँचे, जहाँ जनता ने इनका स्वागत किया। इन सैनिकों ने देवली छावनी को घेर लिया, छावनी के सैनिकों ने इनका साथ दिया। छावनी को लूटकर ये क्रांतिकारी टोंक पहुँचे,जहाँ जनता ने नवाब के आदेशों की परवाह न करते हुए इनका स्वागत किया। टोंक से आगरा होते हुये ये सैनिक दिल्ली पहुँच गये। कैप्टन शावर्स ने कोटा, बूँदी तथा मेवाड़ की सेनाओं की सहायता से नीमच पर पुनः अधिकार कर लिया।
1835 ई. में अंग्रेजों ने जोधपुर की सेना के सवारों पर अकुशल होने का आरोप लगाकर जोधपुर लीजियन का गठन किया। इसका केंद्र एरिनपुरा रखा गया। 21 अगस्त, 1857 को जोधपुर लीजियन के सैनिकों ने विद्रोह कर आबू में अंग्रेज सैनिकों पर हमला कर दिया। यहाँ से ये एरिनपुरा आ गये, जहाँ इन्होंने छावनी को लूट लिया तथा जोधपुर लीजियन के शेष सैनिकों को अपनी ओर मिलाकर ”चलो दिल्ली, मारो फिरंगी“ के नारे लगाते हुए दिल्ली की ओर चल पड़े। एरिनपुरा के विद्रोही सैनिकों की भेंट‘खैरवा’ नामक स्थान पर आउवा ठाकुर कुशालसिंह से हुई। कुशालसिंह, जो कि अंग्रेजों एवं जोधपुर महाराजा से नाराज था, इन सैनिकों का नेतृत्व करना स्वीकार कर लिया। ठाकुर कुशालसिंह के आह्वान पर आसोप, गूलर, व खेजड़ली के सामन्त अपनी सेना के साथ आउवा पहुँच गये। वहाँ मेवाड़ के सलूम्बर, रूपनगर तथा लसाणी के सामंतों ने अपनी सेनाएँ भेजकर सहायता प्रदान की। ठाकुर कुशालसिंह की सेना ने जोधपुर की राजकीय सेना को 8 सितम्बर, 1857 को बिथोड़ा नामक स्थान पर पराजित किया। जोधपुर की सेना की पराजय की खबर पाकर ए.जी.जी. जार्ज लारेन्स स्वयं एक सेना लेकर आउवा पहुँचा। मगर 18 सितम्बर, 1857 को वह विद्रोहियों से पराजित हुआ। इस संघर्ष के दौरान जोधपुर का पोलिटिकल एजेंट मोक मेसन क्रांतिकारियों के हाथों मारा गया। उसका सिर आउवा के किले के द्वार पर लटका दिया गया। अक्टूबर, 1857 में जोधपुर लीजियन के क्रांतिकारी सैनिक दिल्ली की ओर कूच कर गये। ब्रिगेडियर होम्स के अधीन एक सेना ने 29 जनवरी, 1858 को आउवा पर आक्रमण कर दिया। विजय की उम्मीद न रहने पर कुशाल सिंह ने किला सलूंबर में शरण ली। उसके बाद ठाकुर पृथ्वी सिंह ने विद्रोहियों का नेतृत्व किया। अंत में, आउवा के किलेदार को रिश्वत देकर अंग्रेजों ने अपनी ओर मिला लिया और किले पर अधिकार कर लिया। अंग्रेजो ने यहाँ अमानुषिक अत्याचार किए एवं आउवा की महाकाली की मूर्ति (सुगाली माता) को अजमेर ले गये।कोटा में राजकीय सेना तथा आम जनता ने अंग्रेजो के विरुद्ध संघर्ष किया। 14 अक्टूबर, 1857 को कोटा के पोलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन ने कोटा महाराव रामसिंह द्वितीय से भेंट कर अंग्रेज विरोधी अधिकारियों को दंडित करने का सुझाव दिया। मगर महाराव ने अधिकारियों के अपने नियंत्रण में न होने की बात कहते हुए बर्टन के सुझाव को मानने से इनकार कर दिया। 15 अक्टूबर, 1857 को कोटा की सेना ने रेजीडेंसी को घेरकर मेजर बर्टन और उसके पुत्रों तथा एक डॉक्टर की हत्या कर दी। मेजर बर्टन का सिर कोटा शहर में घुमाया गया तथा महाराव का महल घेर लिया। विद्रोही सेना का नेतृत्व रिसालदार मेहराबखाँ और लाला जयदयाल कर रहे थे। विद्रोही सेना को कोटा के अधिकांश अधिकारियों व किलेदारों का भी सहयोग व समर्थन प्राप्त हो गया। विद्रोहियों ने राज्य के भण्डारों, राजकीय बंगलों, दुकानों,शस्त्रागारों, कोषागार एवं कोतवाली पर अधिकार कर लिया। कोटा महाराव की स्थिति असहाय हो गयी। वह एक प्रकार से महल का कैदी हो गया। लाला जयदयाल और मेहराबखाँ ने समस्त प्रशासन अपने हाथ में ले लिया और जिला अधिकारियों को राजस्व वसूली के आदेश दिये गये। मेहराबखाँ और जयदयाल ने महाराव को एक परवाने पर हस्ताक्षर करने के लिए विवश किया, जिसमें मेजर बर्टन व उसके पुत्रों की हत्या महाराव के आदेश से करने एवं लाला जयदयाल को मुख्य प्रशासनिक अधिकारी नियुक्त करने की बातों का उल्लेख था। लगभग छः महीने तक विद्रोहियों का प्रशासन पर नियंत्रण रहा। कोटा के जनसामान्य में भी अंग्रेजो के विरुद्ध तीव्र आक्रोश था। उन्होंने विद्रोहियों को अपना समर्थन व सहयोग दिया। जनवरी, 1858 में करौली से सैनिक सहायता मिलने पर महाराव के सैनिकों ने क्रांतिकारियों को गढ़ से खदेड़ दिया। किन्तु कोटा शहर को क्रांतिकारियों से मुक्त कराना अभी शेष था। 22 मार्च, 1858 को जनरल रॉबर्ट के नेतृत्व में एक सेना ने कोटा शहर को विद्रोहियों से मुक्त करवाया।
टोंक का नवाब वजीरुद्दौला अंग्रेज भक्त था। लेकिन टोंक की जनता एवं सेना की सहानुभूति क्रांतिकारियों के साथ थी। सेना का एक बड़ा भाग विद्रोहियों से मिल गया तथा इन सैनिकों ने नीमच के सैनिकों के साथ नवाब के किले को घेर लिया। सैनिकों ने नवाब से अपना वेतन वसूल किया और नीमच की सेना के साथ दिल्ली चले गए। नवाब के मामा मीर आलम खाँ ने विद्रोहियों का साथ दिया। 1858 ई. के प्रारम्भ में तात्या टोपे के टोंक पहुँचने पर जनता ने तात्या को सहयोग दिया एवं टोंक का जागीरदार नासिर मुहम्मद खाँ ने भी तांत्या का साथ दिया, जबकि नवाब ने अपने-आपको किले में बंद कर लिया। धौलपुर महाराजा भगवंत सिंह अंग्रेजो का वफादार था। अक्टूबर, 1857 में ग्वालियर तथा इंदौर के क्रांतिकारी सैनिकों ने धौलपुर में प्रवेश किया। धौलपुर राज्य की सेना तथा अधिकारी क्रांतिकारियों से मिल गये। विद्रोहियों ने दो महीने तक राज्य पर अपना अधिकार बनाए रखा। दिसम्बर, 1857 में पटियाला की सेना ने धौलपुर से क्रांतिकारियों को भगा दिया।
1857 में भरतपुर पर पोलिटिकल एजेन्ट का शासन था। अतः भरतपुर की सेना विद्रोहियों को दबाने के लिए भेजी गयी। परन्तु भरतपुर की मेव व गुर्जर जनता ने क्रांतिकारियों का साथ दिया। फलस्वरूप अंग्रेज अधिकारियों ने भरतपुर छोड़ दिया। मगर भरतपुर से विद्रोहियों के गुजरने के कारण वहाँ तनाव का वातावरण बना रहा। करौली के शासक महाराव मदनपाल ने अंग्रेज अधिकारियों का साथ दिया। महाराव ने अपनी सेना अंग्रेजो को सौंप दी तथा कोटा महाराव की सहायता के लिए भी अपनी सेना भेजी। उसने अपनी जनता से विद्रोह में भाग न लेने व विद्रोहियों का साथ न देने की अपील की। अलवर भी क्रांतिकारी भावनाओं से अछूता नहीं था। अलवर के दीवान फैजुल्ला खाँ की सहानुभूति क्रांतिकारियों के साथ थी। महाराजा बन्नेसिंह ने अंग्रेजो की सहायतार्थ आगरा सेना भेजी। अलवर राज्य की गुर्जर जनता की सहानुभूति भी क्रांतिकारियों के साथ थी। बीकानेर महाराज सरदारसिंह राजस्थान का अकेला ऐसा शासक था जो सेना लेकर विद्रोहियों को दबाने के लिए राज्य से बाहर भी गया। महाराजा ने पंजाब में विद्रोह को दबाने में अंग्रेजो का सहयोग 8किया। महाराजा ने अंग्रेजों को शरण तथा सुरक्षा भी प्रदान की। अंग्रेज विरोधी भावनाओं पर महाराजा ने कड़ा रूख अपनाकर उन पर नियंत्रण रखा।
मेवाड़ महाराणा स्वरूपसिंह ने अपनी सेना विद्रोहियों को दबाने के लिए अंग्रेजो की सहायतार्थ भेजी। उधर महाराणा के सम्बन्ध न तो अपने सरदारों से अच्छे थे और न कम्पनी सरकार से। महाराणा अपने सामंतों को प्रभावहीन करना चाहता था। इस समय महाराणा और कम्पनी सरकार दोनों को ही एक-दूसरे की आवश्यकता थी। मेरठ विद्रोह की सूचना आने पर मेवाड़ में भी विद्रोही गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए आवश्यक कदम उठाये गये। नीमच के क्रांतिकारी नीमच छावनी में आग लगाने के बाद मार्ग के सैनिक खजानों को लूटते हुए शाहपुरा पहुँचे। शाहपुरा मेवाड़ का ही ठिकाना था। शाहपुरा के शासक ने क्रांतिकारियों को सहयोग प्रदान किया। मेवाड़ की सेना क्रांतिकारियों का पीछा करते हुए शाहपुरा पहुँची तथा स्वयं कप्तान भी शाहपुरा आ गया परन्तु शाहपुरा के शासक ने किले के दरवाजे नहीं खोले। महाराणा ने अनेक अंग्रेजों को शरण तथा सुरक्षा भी प्रदान की। यद्यपि राज्य की जनता में अंग्रेजों के विरुद्ध रोष विद्यमान था। जनता ने विद्रोह के दौरान रेजिडेंट को गालियाँ निकालकर अपने गुस्से का इजहार किया। मेवाड़ के सलूम्बर व कोठारिया के सामन्तों ने क्रांतिकारियों का सहयोग दिया। इन सामन्तों ने ठाकुर कुशालसिंह व तांत्या टोपे की सहायता की। बाँसवाड़ा का शासक महारावल लक्ष्मण सिंह भी विद्रोह के दौरान अंग्रेजो का सहयोगी बना रहा। 11 दिसम्बर, 1857 को तांत्या टोपे ने बाँसवाड़ा पर अधिकार कर लिया। महारावल राजधानी छोड़कर भाग गया। राज्य के सरदारों ने विद्रोहियों का साथ दिया। डूँगरपुर, जैसलमेर, सिरोही और बूँदी के शासकों ने भी विद्रोह के दौरान अंग्रेजों की सहायता की।
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि राजपूताने में नसीराबाद, आउवा, कोटा, एरिनपुरा तथा देवली सैनिक विद्रोह एवं क्रांति के प्रमुख केन्द्र थे। इनमें भी कोटा सर्वाधिक प्रभावित स्थान रहा। कोटा की क्रांति की यह भी उल्लेखनीय बात रही कि इसमें राज्याधिकारी भी क्रांतिकारियों के साथ थे तथा उन्हें जनता का प्रबल समर्थन था। वे चाहते थे कोटा का महाराव अंग्रेजो के विरुद्ध हो जाये तो वे महाराव का नेतृत्व स्वीकार कर लेंगे किन्तु महाराव इस बात पर सहमत नहीं हुए। आउवा का ठाकुर कुशालसिंह को मारवाड़ के साथ मेवाड़ के कुछ सामंतों एवं जनसाधारण का समर्थन एवं सहयोग प्राप्त होना असाधारण बात थी। एरिनपुरा छावनी के पूर्बिया सैनिकों ने भी उसके अंग्रेज विरोधी संघर्ष में साथ दिया था। जोधपुर लीजन के क्रांतिकारी सैनिकों ने आउवा के ठाकुर के नेतृत्व में लेफ्टिनेंट हेथकोट को हराया था। आउवा के विद्रोह को ब्रिटिश सर्वोच्चता के विरुद्ध जन संग्राम के रूप में देखने पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होना चाहिये। जयपुर, भरतपुर, टोंक में जनसाधारण ने अपने शासकों की नीति के विरुद्ध विद्रोहियों का साथ दिया। धौलपुर में क्रांतिकारियों ने राज्य प्रशासन अपने हाथों में ले लिया था।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राजस्थान की जनता एवं जागीरदारों ने विद्रोहियों को सहयोग एवं समर्थन दिया। तात्या टोपे को भी राजस्थान की जनता एवं कई सामंतों ने सहायता प्रदान की। कोटा, टोंक, बांसवाड़ा और भरतपुर राज्यों पर कुछ समय तक विद्रोहियों का अधिकार रहा, जिसे जन समर्थन प्राप्त था। राजस्थान की जनता ने अंग्रेजों के विरुद्ध घृणा का खुला प्रदर्शन किया। उदयपुर में कप्तान शावर्स को गालियां दी गई, जबकि जोधपुर में कप्तान सदरलैण्ड के स्मारक पर पत्थर बरसाए। फिर भी विद्रोहियों में किसी सर्वमान्य नेतृत्व का न होना, आपसी समन्वय एवं रणनीति की कमी, शासकों का असहयोग तथा साधनों एवं शस्त्रास्त्रों की कमी के कारण यह क्रांति असफल रही।
क्रांति का समापन
क्रांति का अन्त सर्वप्रथम दिल्ली में हुआ, जहाँ 21 सितम्बर, 1857 को मुगल बादशाह को परिवार सहित बन्दी बना लिया। जून, 1858 तक अंग्रेजो ने अधिकांश स्थानों पर पुनः अपना नियन्त्रण स्थापित कर लिया। किंतु तांत्या टोपे ने संघर्ष जारी रखा। अंग्रेजों ने उसे पकड़ने में सारी शक्ति लगा दी। यह स्मरण रहे कि तांत्या टोपे ने राजस्थान के सामन्तों तथा जन साधारण में उत्तेजना का संचार किया था। परन्तु राजपूताना के सहयोग के अभाव में तांत्या टोपे को स्थान-स्थान पर भटकना पड़ा। अंत में,उसे पकड़ लिया गया और फांसी पर चढ़ा दिया। क्रांति के दमन के पश्चात् कोटा के प्रमुख नेता जयदयाल तथा मेहराब खाँ को एजेन्सी के निकट नीम के पेड़ पर सरे आम फांसी दे दी गई। क्रांति से सम्बन्धित अन्य नेताओं को भी मौत के घाट उतार दिया अथवा जेल में डाल दिया। अंग्रेजों द्वारा गठित जांच आयोग ने मेजर बर्टन तथा उसके पुत्रों की हत्या के सम्बन्ध में महाराव रामसिंह द्वितीय को निरपराध किंतु उत्तरदायी घोषित किया। इसके दण्डस्वरूप उसकी तोपों की सलामी 15 तोपों से घटाकर 11 तोपें कर दी गई। जहाँ तक आउवा ठाकुर का प्रश्न है, उसने नीमच में अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण (8 अगस्त, 1860) कर दिया था। उस पर मुकदमा चलाया गया, किंतु बरी कर दिया गया।
परिणाम
यद्यपि 1857 की क्रांति असफल रही किंतु उसके परिणाम व्यापक सिद्ध हुए। दुर्भाग्य से राजस्थान के नरेशों ने अंग्रेजो का साथ देकर क्रांति के प्रवाह को कमजोर कर दिया। क्रांति के पश्चात् यहाँ के नरेशों को ब्रिटिश सरकार द्वारा पुरस्कृत किया गया। क्योंकि राजपूताना के शासक उनके लिए उपयोगी साबित हुए थे। अब ब्रिटिश नीति में परिवर्तन किया गया। शासकों को संतुष्ट करने हेतु ‘गोद निषेध’ का सिद्धांत समाप्त कर दिया गया। राजकुमारों को अंग्रेजी शिक्षा का प्रबन्धक किया जाने लगा। अब राज्य कम्पनी शासन के स्थान पर ब्रिटिश नियंत्रण में सीधे आ गये। साम्राज्ञी विक्टोरिया की ओर से की गई घोषणा (1858) द्वारा देशी राज्यों को यह आश्वासन दिया गया कि देशी राज्यों का अस्तित्व बना रहेगा। क्रांति के पश्चात् नरेशों एवं उच्चाधिकारियों की जीवन शैली में पाश्चात्य प्रभाव स्पष्ट रूप से देखने को मिलता हैं। अंग्रेजी साम्राज्य की सेवा कर उनकी प्रशंसा तथा आदर प्राप्त करने में ही अब राजस्थानी नरेश गौरव का अनुभव करने लगे। जहाँ तक सामन्तों का प्रश्न है, उसने खुले रूप में ब्रिटिश सत्ता का विरोध किया था। अतः क्रांति के पश्चात् अंग्रेजो की नीति सामन्त वर्ग को अस्तित्वहीन बनाने की रही। जागीर क्षेत्र की जनता की दृष्टि में सामन्तों की प्रतिष्ठा कम करने का प्रयास किया गया। सामन्तों को बाध्य किया गया कि से सैनिकों को नगद वेतन देवें। सामन्तों के न्यायिक अधिकारों की सीमित करने का प्रयास किया। उनके विशेषाधिकारों पर कुठाराघात किया गया। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सामन्तों का सामान्य जनता पर जो प्रभाव था, ब्रिटिश नीतियों के कारण कम करने का प्रयास किया गया।
क्रांति के पश्चात् आवागमन के साधनों का, सेना के त्वरित गति से पहुँचने के लिए, विकास किया गया। रेलवे का विकास इनमें प्रमुख है। छावनियों को जोड़ने वाली सड़कें बनाई गयीं। आधुनिक शिक्षा का प्रसार कर मध्यम वर्ग को अपने लिए उपयोगी बनाने की कवायद शुरू की गई। अपने आर्थिक हितों के संवर्धन के लिए वैश्य समुदाय को संरक्षण देने की नीति अपनाई गयी। फलतः क्रांति के पश्चात् वैश्य समुदाय राजस्थान में अधिक ताकतवर बन सका। 1857 की क्रांति ने अंग्रेजो की इस धारणा को निराधार सिद्ध कर दिया कि मुगलों एवं मराठों की लूट से त्रस्त राजस्थान की जनता ब्रिटिश शासन की समर्थक है। परन्तु यह भी सच है कि भारत विदेशी जुये को उखाड़ फेंकने के प्रथम बड़े प्रयास में असफल रहा। राजस्थान में फैली क्रांति की ज्वाला ने अर्ध शताब्दी के पश्चात् भी स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान लोगों को संघर्ष करने की प्रेरणा दी, यही क्रांति का महत्व समझना चाहिए।
क्रांति का स्वरूप 1857 की अत्यधिक महत्वपूर्ण घटना को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भी लम्बे समय तक सैनिक विद्रोह अथवा विप्लव के नाम से सम्बोधित किया गया। परन्तु जब इस घटना के विभिन्न पहलुओं पर विद्वानों,इतिहासकारों एवं विशेष रूप से घटना के प्रत्यक्षदर्शियों के विचार मंथन सामने आने लगे तो क्रांति के सैनिक विद्रोह के स्वरूप को नहीं नकारने की कोई वजह नहीं बची। फिर भी घटना के स्वरूप के मत-मतान्तरों के कारण कोई सर्वमान्य विचार नहीं बन सका। वैसे भी इतिहास की घटनाओं पर न्यायाधीश की तरह अन्तिम टिप्पणी नहीं की जा सकती है। सामाजिक अध्ययन में ऐसा होना कोई अनुचित भी नहीं है। विभिन्न विचारों के प्रकटीकरण एवं सम्भावनाओं की तलाश से ही ज्ञान की गहराई का अभिज्ञान होता है अन्यथा ज्ञान कुंठित एवं सड़ान्धयुक्त हो जायेगा।
निःसन्देह 1857 का वर्ष राजस्थान सहित भारत के लिए यादगार वर्ष रहा, क्योंकि ऐसी महान घटना भारतीय इतिहास की पहली घटना थी। भावी स्वतन्त्रता संग्राम में देशभक्तों और विशेष रूप से क्रांतिकारियों पर इस घटना का असाधारण प्रभाव पड़ा। यह घटना उनके लिए प्रेरणा का स्त्रोत बनी। सम्पूर्ण राष्ट्र द्वारा 1857 की 150 वीं जयन्ती वर्ष 2007 में उत्साहपूर्वक मनाना ही घटना के महत्व एवं 11प्रभाव को दर्शाती है। वास्तविक अर्थो में विद्रोह के स्वरूप के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि किसी क्रांति का स्वरूप केवल उस क्रांति के प्रारम्भ करने वालों के लक्ष्यों से निर्धारित नहीं हो सकता, बल्कि इससे निर्धारित होता है कि उस क्रांति ने अपनी क्या छाप छोड़ी।
1857 की महान घटना के स्वरूप को लेकर जो मत सामने आये हैं, उनमें इसे सैनिक विद्रोह (सर जॉन सीले, लारेन्स, पी.ई. राबटर्स आदि के मत), शासकों के विरुद्ध सामन्ती प्रतिक्रिया (मेलिसन का मत), अशक्त वर्गों द्वारा अपनी खोई हुई सत्ता को पुनः प्राप्त करने का अन्तिम प्रयास (ताराचन्द का मत), प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम (विनायक दामोदर सावरकर, पट्टाभि सीतारमैया का मत) आदि प्रमुख मत हैं। सुरेन्द्रनाथ सेन ने अपनी पुस्तक ‘1857’ में लिखा है, ”आन्दोलन एक सैनिक विद्रोह की भाँति आरम्भ हुआ, किंतु केवल सेना तक सीमित नहीं रहा।“ आर.सी. मजूमदार ने भी यह स्वीकार किया है कि कुछ क्षेत्रों में जनसाधारण ने इसका समर्थन किया था। अशोक मेहता ने इसे राष्ट्रीय विद्रोह कहा है। कई विद्वानों ने यह मत प्रकट किया है कि इस संग्राम में हिन्दू और मुसलमानों ने कन्धे से कन्धा मिलाकर समान रूप से भाग लिया और इन्हें जनसाधारण की सहानुभूति प्राप्त थी। वी.डी. सावरकर पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने इसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा से अभिहित किया है। वर्तमान में इस मत की ही सर्वाधिक स्वीकार्यता है।यहाँ हमारे लिए यह उचित होगा कि हम राजस्थान के परिप्रेक्ष्य में इस घटना की समीक्षा करें।मारवाड़ के ख्यात लेखक बांकीदास, बूँदी के साहित्यकार सूर्यमल्ल मीसण ने अपनी कृतियों अथवा पत्रों के माध्यम से गुलामी करने वाले राजपूत शासकों को धिक्कारा है। सूर्यमल्ल मीसण ने पीपल्या के ठाकुर फूल सिंह को लिखे एक पत्र में राजपूत शासकों को गुलामी करने की मनोवृत्ति की कटु आलोचना की थी। आउवा व अन्य कुछ ठाकुरों ने जिनमें सलूम्बर भी शामिल है, अपने क्षेत्रों में चारणों द्वारा ऐसे गीत रचवाये, जिनमें उनकी छवि अंग्रेज विरोधी मालूम होती है।
राजस्थान में क्रांति की शुरुआत 1857 से हुई, जब यहाँ के ब्रिटिश अधिकारी भागकर ब्यावर की ओर गये, तब रास्ते में ग्रामीण उन पर आक्रमण करने के लिए खड़े थे। कप्तान प्रिचार्ड ने स्वीकार किया है कि यदि बम्बई लॉन्सर के सैनिक उनके साथ न होते तो उनका बचे रहना आसान नहीं था। उसके अनुसार मार्ग में किसी भी भारतीय ने उनके प्रति सहानुभूति प्रदर्शित नहीं की। उसने आगे लिखा है कि इस घटना के 24 घण्टे पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। इन अंग्रेजो के घरेलू नौकरों में उनके प्रति उपेक्षा का भाव देखा गया। मेवाड़ का पोलीटिकल एजेन्ट कप्तान शावर्स जब उदयपुर शहर के मार्ग से गुजरता हुआ राजमहल की ओर जा रहा था, तब रास्ते में जनता की भीड़ ने उसे धिक्कारा। इसके विपरीत, क्रांतिकारी जिस मार्ग से भी गुजरे, लोगों ने उनका हार्दिक स्वागत किया। मध्य भारत का लोकप्रिय नेता तात्या टोपे जहाँ भी गया, जनता ने उसका अभिनन्दन किया तथा उसे रसद आदि प्रदान की। जोधपुर के सरकारी रिकॉर्ड में यह स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि जब ए.जी.जी. जॉर्ज लॉरेन्स ने आउवा पर चढ़ाई की तब सर्वप्रथम गांव वालों की तरफ से आक्रमण हुआ था। मारवाड़ में ऐसी परम्परा थी कि जब किसी बड़े अधिकारी की मृत्यु होती थी तब राजकीय शोक मनाते हुए किले में नौबत बजाना बन्द हो जाता था। किंतु कप्तान मॉक मेसन की मृत्यु के बाद ऐसा नहीं किया गया, जबकि किलेदार अनाड़सिंह की मृत्यु होने पर किले में नौबत बजाना बन्द रख गया। आउवा ठाकुर कुशाल सिंह द्वारा ब्रिटिश सेनाओं की टक्कर लेने से घटना को समसामयिक साहित्य में सर्वोच्च स्थान प्रदान किया गया है।
राजस्थान के संदर्भ में 1857 की क्रांति का अध्ययन और विश्लेषण करने से यह विदित होता है कि राजस्थान में यह महान् घटना किसी संयोग का परिणाम नहीं थी, अपितु यह तो ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध सर्वव्यापी रोष का परिणाम थी। यही कारण है कि आउवा की जनता सैनिकों के जाने के बाद भी लड़ती रही। नसीराबाद, नीमच और एरिनपुरा की घटनाएं निःसन्देह भारतव्यापी क्रांति का अंग थी, लेकिन कोटा और आउवा की घटनाएँ स्थानीय परिस्थितियों का परिणाम थी और उनमें ब्रिटिश विरोधी भावना निर्विवाद रूप से विद्यमान थी। टोंक और कोटा की जनता ने तो विद्रोहियों से मिलकर संघर्ष में भाग लिया था।
जन आक्रोश के कारण ही भरतपुर के शासक ने मोरीसन को राज्य छोड़ने का परामर्श दिया था। कोटा के महाराव ने भी मेजर बर्टन को कोटा नहीं आने के लिए कहा था। जन आक्रोश के कारण ही मजबूरीवश टोंक के नवाब ने अंग्रेजो को अपने राज्य की सीमा से नहीं गुजरने के लिए कहा था। अंत में यह कहा जा सकता है कि राजस्थान की जनता अंग्रेजों को फिरंगी कहती थे और अपने धर्म को बनाये रखने के लिए उनसे मुक्ति चाहती थी। कुछ स्थानों पर स्थानीय जनता ने भी इस संघर्ष में भाग लिया था, तो अन्य स्थानों पर जनता का नैतिक समर्थन प्राप्त था। यह कहने में हमें संकोच नहीं करना चाहिए कि 1857 का यह संघर्ष विदेशी शासन से मुक्त होने का प्रथम प्रयास था। इस क्रांति को यदि राजस्थान का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम कहा जाये तो सम्भवतः अनुचित नहीं होगा।
राजस्थान में जन जागरण एवं स्वतन्त्रता संग्राम
राजनीतिक जागरण एवं स्वतन्त्रता आन्दोलन में विभिन्न तत्वों का योगदान
1857 की क्रांति की भूमिका यद्यपि राजस्थान में कतिपय स्थानों पर अत्यधिक प्रभावी रही थी किंतु अधिकांश राज्य इससे अछूते रहे। 1857 की क्रांति की असफलता के कारण देश के अनुरूप राजस्थान में भी अंग्रेजों का वर्चस्व स्थापित हो गया (राजस्थान के अधिकांश शासक अंग्रेजो के प्रति श्रद्धा एवं भक्ति प्रदर्शन की दौड़ में शामिल हो गये। ऐसा करके वे स्वयं को गौरवान्वित समझने लगे। ऐसी परिस्थितियों में राज्य की प्रजा में भी अंग्रेजों की अजेयता की भावना का घर करना स्वाभाविक नहीं था। राजकीय कार्यों एवं जन कल्याण की भावना के प्रति शासकों की उदासीनता ने प्रजा के कष्टों को असहनीय बना दिया। सामन्तों की शोषण प्रवृत्ति यथावत बनी। परन्तु सदैव एक स्थिति बनी नहीं रह सकती है। स्थिति में बदलाव के संकेत बाहर से नहीं, अन्दर से ही आने थे। राज्य की जनता ही बदलाव की अपवाहक बनी। देरी से ही सही,राजस्थान में राजनीतिक चेतना का विकास हुआ। राष्ट्र के सोच में परिवर्तन के साथ देशी रियासतों में भी राष्ट्रवादी भावनाओं ने जन्म लिया। जन आन्दोलनों ने भी स्थानीय स्तर पर अपनी जगह बनाकर माहौल को उत्तेजित कर दिया। राज्य की दमनात्मक नीतियों एवं ब्रिटिश सरकार के कठोर दृष्टिकोण के बावजूद जनता ने अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ी। शासन में सुधार एवं भागीदारी के लिए आवाज उठाई। आजादी की अन्तिम लड़ाई के दौरान राष्ट्र के बड़े नेताओं को इस बात का अहसास हो गया था कि अब देशी रियासतों को पराधीन बनाकर अधिक समय तक नहीं रखा जा सकता। आखिर, राष्ट्र की स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् राजस्थान की देशी रियासतों का भी भारतीय संघ में विलीनीकरण हो गया।
यह कहने आवश्यकता नहीं है कि राजस्थान में स्वतन्त्रता से पूर्व जनजागरण लाने का कार्य जिन नेताओं ने किया, उनमें देशभक्ति का जलवा था। वे समकालीन समाज एवं राजनीति को लेकर चिन्तित एवं व्यथित थे। वे क्रांतिकारी विचारों से युक्त थे। उनके नजरिये में स्वतन्त्रता आन्दोलन से तात्पर्य केवल राजनीतिक स्वतन्त्रता प्राप्त करने से नहीं था। वे सामाजिक समस्याओं एवं कुरीतियों के निराकरण, स्त्रियों की दुर्दशा सुधारने तथा कृषकों का शोषण, निरक्षरता, बेगारी आदि के उन्मूलन के लिए भी कृत संकल्प थे। वे चरखा, खादी, ग्राम-स्वावलंबन, सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने के पक्ष में थे। देशी रियासतों में 1934 और विशेष रूप से 1938 के बाद चला संघर्ष भी इसी स्वतंत्रता संघर्ष का हिस्सा था। राजनीतिक जागरण एवं स्वतन्त्रता आन्दोलन में जिन मुख्य तत्वों का योगदान रहा, उनका संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत किया जा रहा है -
जनजातीय एवं किसान आन्दोलन
राजस्थान में राजनीतिक चेतना का श्रीगणेश कर यहाँ की जनजातियों एवं किसानों ने इतिहास रच दिया। राजस्थान के आदिवासी क्षेत्रों में भील, मीणा, गरासिया आदि जनजातियाँ प्राचीन काल से रहती आयी हैं। अपने परंपरागत अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में इन्होंने अपना विरोध प्रकट किया, चाहे वह फिर अंग्रेजों के विरुद्ध हो या फिर शासक के विरुद्ध । यहाँ के किसानों ने भी अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों, शोषण एवं आर्थिक मार के विरोध में अपना विरोध जताकर राजनीतिक व्यवस्था को चुनौती दे डाली। अंग्रेजों का आतंक, रियासतों की अव्यवस्था, जागीरदारों का शोषण, कृषकों के परम्परागत अधिकारों का उल्लंघन आदि कारणों से कृषकों में असंतोष पनपा। जागीरी क्षेत्र में कृषकों का असंतोष जागीरदारों के जुल्मों के विरुद्ध था। जागीरदारों को कृषकों के हितों की कोई चिन्ता नहीं थी। जागीरदार अपने क्षेत्र में स्वतन्त्र रहने के कारण उसे शासकों अथवा अंग्रेज सरकार से संरक्षण प्राप्त था।
राजस्थान में स्वतन्त्रता आन्दोलन एवं आदिवासियों में जनजागृति का शंखनाद फूंकने का योगदान देने वालों में मोतीलाल तेजावत (1888-1963) का विशिष्ट स्थान है। तेजावत का जन्म उदयपुर जिले में 14एक सामान्य ओसवाल परिवार में हुआ था। तेजावत अपने बलबूते पर एक बड़ा आन्दोलन ”एकी आन्दोलन“ (1921-22) खड़ा करने में सफल रहा। उसने जिस प्रकार आदिवासियों का विश्वास प्राप्त किया, वह एकदम अकल्पनीय लगता है। तेजावत से पहले गोविन्द गुरू (1858-1931) ने बागड़ प्रदेश में आदिवासी भीलों के उद्धार के लिए ‘भगत आन्देालन’ (1921-1929) चलाया था। इससे पूर्व गोविन्द गुरु ने 1883 में‘सम्प सभा’ की स्थापना कर इसके माध्यम से भीलों में सामाजिक एवं राजनीतिक जागृति पैदा कर उन्हें संगठित किया।
गोविन्द गुरु ने मेवाड़, डूँगरपुर, ईडर, मालवा आदि क्षेत्रों में बसे भीलों एवं गरासियों को ‘सम्प सभा’ के माध्यम से संगठित किया। उन्होंने एक ओर तो इन आदिवासी जातियों में व्याप्त सामाजिक बुराइयों और कुरीतियों को दूर करने का प्रयत्न किया तो दूसरी ओर, उनको अपने मूलभूत अधिकारों का अहसास कराया। गोविन्द गुरु ने सम्प सभा का प्रथम अधिवेशन 1903 में गुजरात में स्थित मानगढ़ की पहाड़ी पर किया। इस अधिवेशन में गोविंद गुरु के प्रवचनों से प्रभावित होकर हजारों भील-गरासियों ने शराब छोड़ने, बच्चों को पढ़ाने और आपसी झगड़ों को अपनी पंचायत में ही सुलझाने की शपथ ली। गोविन्द गुरु ने उन्हें बैठ-बेगार और गैर वाजिब लागतें नहीं देने के लिए आह्वान किया। इस अधिवेशन के पश्चात् हर वर्ष आश्विन शुक्ला पूर्णिमा को मानगढ़ की पहाड़ी पर सम्प सभा का अधिवेशन होने लगा। भीलों में बढ़ती जागृति से पड़ोसी राज्य सावधान हो गये। अतः उन्होंने ब्रिटिश सरकार से प्रार्थना की कि भीलों के इस संगठन को सख्ती से दबा दिया जावे। हर वर्ष की भाँति जब 1908 में मानगढ़ की पहाड़ी पर सम्प सभा का विराट् अधिवेशन हो रहा था, तब ब्रिटिश सेना ने मानगढ़ की पहाड़ी को चारों ओर से घेर लिया। उसने भीड़ पर गोलियों की बौछार कर दी। फलस्वरूप 1500 आदिवासी घटना स्थल पर ही शहीद हो गये। गोविन्द गुरु को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। परन्तु भीलों में प्रतिक्रिया होने के डर से उनकी यह सजा 20 वर्षों के कारावास में तब्दील कर दी। अंत में वे 10 वर्ष में ही रिहा हो गये। गोविन्द गुरु अहिंसा के पक्षधर थे व उनकी श्वेत ध्वजा शांति की प्रतीक थी। आज भी भील समाज में गोविन्द गुरु का पूजनीय स्थान है।
राजस्थान के आदिवासियों में गोविन्द गुरु के पश्चात् सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान है, मोतीलाल तेजावत का। आदिवासियों पर ढाये जाने वाले जुल्मों से उद्वेलित होकर उन्होंने ठिकाने की नौकरी छोड़ दी। उन्होंने 1921 में भीलों को जागीरदारों द्वारा ली जाने वाली बैठ-बेगार और लाग बागों के प्रश्न को लेकर संगठित करना प्रारम्भ किया। शनैः शनैः यह आन्दोलन सिरोही, ईडर,पालनपुर, विजयनगर आदि राज्यों में भी विस्तार पाने लगा। तेजावत ने अपनी मांगों को लेकर भीलों का एक विराट् सम्मेलन विजयनगर राज्य के नीमड़ा गाँव में आयोजित किया। मेवाड़ एवं अन्य पड़ोसी राज्यों की सरकारें भीलों के संगठित होने से चिंतित होने लगी। अतः इन राज्यों की सेनाएँ भीलों के आंदोलन को दबाने के लिए नीमड़ा पहुँच गयी। सेना द्वारा सम्मेलन स्थल को घेर लेने और गोलियां चलने के कारण 1200 भील मारे गये और कई घायल हो गये। मोतीलाल तेजावत पैर में गोली लगने से घायल हो गये। लोग उन्हें सुरक्षित स्थान ले गये, जहाँ उनका इलाज किया गया। मोतीलाल तेजावत भूमिगत हो गये, इस कारण मेवाड़,सिरोही आदि राज्यों की पुलिस उनको पकड़ने में नाकामयाब रहीं। अंत में, 8 वर्ष पश्चात 1929 में गांधी जी की सलाह पर तेजावत ने अपने आपको ईडर पुलिस के सुपुर्द कर दिया। 1936 में उन्हें रिहा कर दिया गया। इसके पश्चात् भी नजरबन्द एवं जेल का लुका-छिपी खेल चलता रहा किन्तु उन्होंने सामाजिक सरोकारों से कभी मुंह नहीं मोड़ा।
भील-गरासियों के हितों के लिए देश की आजादी में अन्य जिन जन नेताओं का योगदान रहा, उनमें प्रमुख थे - माणिक्यलाल वर्मा, भोगीलाल पण्ड्या, मामा बालेश्वर दयाल, बलवंत सिंह मेहता, हरिदेव जोशी, गौरीशंकर उपाध्याय आदि। इन्होंने भील क्षेत्रों में शिक्षण संस्थाएँ, प्रौढ़ शालाएँ, हॉस्टल आदि स्थापित किये। साथ ही, उन आदिवासियों को कुप्रवृत्तियों को छौड़ने के लिए प्रेरित किया।
राजपूताना में कई राज्यों में मीणा जनजाति शताब्दियों से निवास करती आ रही है। कुछ स्थानों पर मीणा शासकों का प्राचीन काल में आधिपत्य रहा था। मीणाओं का मुख्य क्षेत्र ढूँढाड़ था। समय पाकर मीणाओं के दो मुख्य भेद हो गये। जो मीणा खेती करते थे, वे खेतिहर मीणा तथा जो चौकीदारी करते थे, वे चौकीदार मीणा कहलाने लगे। कई बार चौकीदार मीणाओं को चोरी और डकैती के लिए जिम्मेदार ठहराया जाने लगा और किसी चोरी का माल बरामद न होने की स्थिति में उस माल की कीमत इनसे वसूली जाने लगी। इन परिस्थितियों में जयपुर राज्य ने भारत, सरकार द्वारा पारित ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ (1924) का लाभ उठाते हुए मीणाओं की जीविका को जरायम पेशा मानते हुए हर मीणा परिवार के बालिग स्त्री-पुरुष ही नहीं, 12 वर्ष से बड़े बच्चों का भी निकटस्थ पुलिस थाने में नाम दर्ज करवाना और दैनिक हाजरी देना आवश्यक कर लिया। इस प्रकार शताब्दियों से स्वच्छन्द विचरण करने वाली बहादुर मीणा जाति साधारण मानवाधिकारों से वंचित कर दी गई। सरकार की इस कार्यवाही का विरोध होने लगा। मीणा समाज में असंतोष का स्वर उस समय और तेज हो गया जब जयपुर पुलिस ने जरायम पेशा कानून (1930) के अंतर्गत कठोरता से हाजिरी का पालन करना प्रारम्भ कर दिया। 1933 में मीणा क्षत्रिय महासभा की स्थापना हुई। इस सभा ने जयपुर सरकार से जरायम पेशा कानून रद्द करने की मांग की परन्तु राज्य ने इसके विपरीत कठोरता से मीणाओं को दबाना प्रारम्भ किया। अप्रैल, 1944 में जैन मुनि मगन सागर जी की अध्यक्षता में नीमकाथाना में मीणों का एक वृहद सम्मेलन हुआ, जिसमें जयपुर राज्य मीणा सुधार समिति’ का गठन हुआ। इस समिति के अध्यक्ष बंशीधर शर्मा, मंत्री राजेन्द्र कुमार एवं संयुक्त मंत्री लक्ष्मीनारायण झरवाल बनाये गये। 1945 में जरायम पेशा कानून को रद्द करने के लिए प्रांतीय स्तर पर आंदोलन किया गया। अखिल भारतीय देशी राज्य परिषद ने भी मीणाओं की मांग का समर्थन किया। इसके परिणामस्वरूप थानों में अनिवार्य उपस्थिति की बाध्यताओं को समाप्त किया गया। परन्तु अभी जरायम पेशा अधिनियम यथावत था, जो आजादी के बाद 1952 में ही समाप्त हो सका।
राजस्थान के देशी रियासतों के इतिहास में बिजौलिया किसान आन्दोलन (1897-1941) का विशिष्ट स्थान है। दीर्घ काल तक चलने वाले इस आन्दोलन में किसान वर्ग ठिकाने और मेवाड़ राज्य की 16सम्मिलित शक्ति से जूझता रहा। इस आन्दोलन में केवल पुरुषों ने ही भाग नहीं लिया, बल्कि स्त्रियों व बालकों ने भी सक्रियता दिखायी। यह आन्दोलन पूर्णतया स्वावलम्बी एवं अहिंसात्मक था। यह आन्दोलन प्रारम्भ में विजयसिंह पथिक के नेतृत्व में चला। इस आन्दोलन में कृषक वर्ग ने अभूतपूर्व साहस, धैर्य और बलिदान का परिचय दिया, चाहे यह अपने मंतव्य में सफल नहीं हो सका। यह आन्दोलन सामंती व्यवस्था के विरुद्ध भयंकर प्रहार था। यह आन्दोलन मेवाड़ राज्य की सीमा तक ही सीमित नहीं रहा। इस आन्दोलन ने कालान्तर में माणिक्यलाल वर्मा जैसे तेजस्वी नेता को जन्म दिया, जो बाद में मेवाड़ राज्य में उत्तरदायी सरकार की स्थापना हेतु अनेक आन्दोलनों का प्रणेता बना। हमें यह जान लेना चाहिए कि राजस्थान में कृषक आन्दोलन स्वस्फूर्त था और इसका नेतृत्व पूर्णतः गैर पेशेवर नेताओं एवं अत्यन्त साधारण किसान वर्ग ने किया था, चाहे उनका आधार जातिगत रहा। बिजौलिया आन्दोलन में धाकड़ जाति की महती भूमिका रही। सीकर और शेखावटी आन्दोलनों में जाट जाति का वर्चस्व रहा। मेवाड़ और सिरोही राज्यों के किसान आन्दोलनों के पीछे भील और गरासिया जातियों की शक्ति रही। इसी प्रकार अलवर और भरतपुर राज्यों में मेवों की मुख्य भूमिका रही। इस प्रकार इन आंदोलनों को सुनियोजित रूप से संचालित करने का श्रेय जाति पंचायतों एवं जाति संगठनों को दिया जा सकता है।
राजस्थान के किसान आंदोलन में बरड़ (बूँदी) किसान आन्दोलन (1921-43), नीमराणा (अलवर) किसान आंदोलन (1923-25), बेगू (चित्तौड़गढ़), किसान आंदोलन (1922-25), शेखावाटी किसान आंदोलन (1924-47), मारवाड़ किसान आंदोलन (1924-47) प्रमुख है। यह स्मरणीय है कि इन किसान आन्दोलनों में स्त्रियों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। राजस्थान के ये किसान आन्दोलन सामन्त विरोधी स्वरूप लिए हुए थे और इन्होंने कालान्तर में जागीरदारी उन्मूलन की भूमिका तैयार की। राजस्थान के किसान आंदोलन में जबरदस्त उत्साह देखा जा सकता है। यह आन्दोलन सामान्यतः अहिंसात्मक रहे। इन आन्दोलनों ने प्रजामण्डल के जमीन तैयार कर दी थी।
राजस्थान में जन जागरण एवं स्वतन्त्रता संग्राम
दलित आन्दोलन
स्वतन्त्रतापूर्व राजस्थान में दलितों में भी क्रियाशील जागरण दिखाई देता है। दलितों की स्वतन्त्रता आन्दोलन में भूमिका उनके सामाजिक एवं राजनीतिक जागरण का प्रतीक थी। यह ध्यातव्य है कि दलितों ने राजस्थान में प्रजामण्डल आन्दोलनों में सक्रिय भाग लेकर राजस्थान में आज़ादी के आन्दोलन को विस्तृत सामाजिक आधार प्रदान किया। 1920 और 1934 के समय दलितों ने अजमेर-मेरवाड़ा के राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय भाग लिया। राजपूताना की दलित जातियों में सामाजिक और राजनीतिक जागृति के चिह्न दिखाई देते हैं। इसका विशेष कारण यह था कि कोटा, जयपुर, धौलपुर और भरतपुर की रियासतों में दलितों का बाहुल्य था। अतः इन राज्यों में दलितों ने सामाजिक और राजनीतिक आन्दोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसी कारण इन राज्यों ने उनकी माँगों की ओर ध्यान दिया। 1945-46 में उनियारा में बैरवा जाति ने नागरिक असमानता-विरोधी आन्दोलन चलाकर अपनी सक्रियता का परिचय दिया।
आर्य समाज की भूमिका
राजस्थान में राजनीतिक चेतना जागृत करने एवं शिक्षा-प्रसार में स्वामी दयानन्द सरस्वती एवं आर्य समाज ने महत्त्वपूर्ण कार्य किया। स्वामी दयानन्द राजस्थान में सर्वप्रथम 1865 ई. में करौली के राजकीय अतिथि के रूप में आए। उन्होंने किशनगढ़, जयपुर, पुष्कर एवं अजमेर में अपने उपदेश दिए। स्वामीजी का राजस्थान में दूसरी बार आगमन 1881 ई. में भरतपुर में हुआ। वहाँ से स्वामीजी जयपुर, अजमेर, ब्यावर, मसूदा एवं बनेड़ा होते हुए चित्तौड़ पहुँचे, जहाँ कविराज श्यामलदास ने उनका स्वागत किया। महाराणा सज्जन सिंह (1874-1884 ई.) के अनुरोध पर स्वामीजी उदयपुर पहुँचे। वहाँ महाराणा ने उनका आदर-सत्कार किया। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने उदयपुर में आर्य धर्म का प्रचार किया। उनके उपदेशों को सुनने के लिए मेवाड़ के अनेक सरदार नित्य उनकी सभा में आया करते थे।
अगस्त 1882 में स्वामी दयानन्द पुनः उदयपुर पहुँचे। उदयपुर में स्वामीजी ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के द्वितीय संस्करण की भूमिका लिखी। यहीं फरवरी 1883 ई. में स्वामीजी के सान्निध्य में ‘परोपकारिणी सभा’ की स्थापना हुई। कालान्तर में मेवाड़ में विष्णुलाल पण्ड्या ने आर्य समाज की स्थापना की। 1883 ई. में ही स्वामीजी जोधपुर गए। जोधपुर के महाराजा जसवन्त सिंह, सर प्रताप सिंह तथा रावराजा तेज सिंह पर स्वामीजी के उपदेशों का काफी प्रभाव पड़ा। अपने व्याख्यानों में स्वामीजी क्षत्रिय नरेशों के चरित्र-संशोधन और गौरक्षा पर विशेष बल दिया करते थे। भरी सभा में उन्होंने वेश्यागमन के दोष बतलाए और महाराजा जसवन्त सिंह की ‘नन्हीजान’ के प्रति आसक्ति पर उन्हें भी फटकार लगाई। कहा जाता है कि नन्हीजान ने स्वामीजी को विष दिलवा दिया, जिससे उनकी तबीयत बिगड़ गई। स्वामीजी को अजमेर ले जाया गया। काफी चिकित्सा के उपरान्त भी वे स्वस्थ नहीं हुए और अजमेर में ही 1883 ई. में उनका देहान्त हो गया।
दयानन्द सरस्वती ने स्वधर्म, स्वराज्य, स्वदेशी और स्वभाषा पर ज़ोर दिया। उन्होंने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ हिन्दी भाषा में लिखा। अजमेर में ‘आर्य समाज’ की स्थापना की गई। स्वामी दयानन्द सरस्वती एवं आर्य समाज ने राजस्थान में स्वतंत्र विचारों के लिए पृष्ठभूमि तैयार की। आर्य समाज ने हिन्दी भाषा, वैदिक धर्म, स्वदेशी एवं स्वदेशाभिमान की भावना पैदा की। राजस्थान में राजनीतिक जागृति पैदा करने एवं शिक्षा-प्रसार के लिए भी आर्य समाज ने सराहनीय कार्य किया। आर्य समाज की शिक्षण संस्थाओं में हिन्दी और अंग्रेज़ी भाषा के साथ ही वैदिक धर्म एवं संस्कृत की शिक्षा भी दी जाने लगी। आर्य समाज ने सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया। अजमेर में हरविलास शारदा और चाँदकरण शारदा ने सामाजिक कुरीतियों के विरोध में आवाज़ उठाई। आर्य समाज ने खादी-प्रचार, हरिजन-उद्धार तथा शिक्षा के प्रचार-प्रसार को अपना मिशन बनाया। भरतपुर में जन-जागृति पैदा करने वाले मास्टर आदित्येन्द्र और जुगल किशोर चतुर्वेदी आर्य समाज के ही कार्यकर्ता थे।
समाचार-पत्रों का योगदान
अत्याचार और शोषण की ज्वाला अज्ञानता में ही पनपती है। अज्ञानता को मिटाने और जन-चेतना के प्रसार में प्रेस की भूमिका निर्णायक होती है। राजस्थान में समाचार-पत्रों ने जन-जागरण में जो योगदान दिया, उसका प्रमाण बिजौलिया किसान आन्दोलन में देखने को मिला। जब बिजौलिया के अत्याचारों का वर्णन ‘प्रताप’ नामक समाचार-पत्र में छपा तो पूरे देश में इस पर चर्चा होने लगी। राजस्थान के राज्यों के आन्तरिक मामलों का ज्ञान समाचार-पत्रों के माध्यम से जनता तक पहुँचने लगा। विजय सिंह पथिक, रामनारायण चौधरी, जयनारायण व्यास आदि नेताओं ने राज्य की समस्याओं के विषय में समाचार-पत्रों के माध्यम से चर्चा प्रारम्भ की।
‘राजपूताना गजट’ (1885) और ‘राजस्थान समाचार’ (1889) बहुत थोड़े समय के पश्चात् ही बन्द हो गए। 1920 में पथिक ने ‘राजस्थान केसरी’ का प्रकाशन पहले वर्धा से और फिर अजमेर से प्रारम्भ किया। 1922 में राजस्थान सेवा संघ ने ‘नवीन राजस्थान’ प्रारम्भ किया, जिसमें आदिवासी एवं किसान आन्दोलनों का समर्थन किया गया। 1923 में वह बन्द हो गया, परन्तु ‘तरुण राजस्थान’ के नाम से उसका प्रकाशन पुनः प्रारम्भ किया गया। इसमें भी कृषक आन्दोलनों एवं अत्याचारों पर व्यापक चर्चा हुई। इस पत्र के सम्पादन में शोभालाल गुप्त, रामनारायण चौधरी, जयनारायण व्यास आदि नेताओं ने सराहनीय योगदान दिया। जोधपुर, सिरोही तथा अन्य राज्यों के निरंकुश शासकों के विरुद्ध इस पत्र में आवाज़ उठाई गई।
1923 में ऋषिदत्त मेहता ने ब्यावर से ‘राजस्थान’ नामक साप्ताहिक अखबार निकालना प्रारम्भ किया। 1930 के बाद समाचार-पत्रों की संख्या बढ़ी। आगे के वर्षों में ‘नवज्योति’, ‘नवजीवन’, ‘जयपुर समाचार’, ‘त्यागभूमि’ और ‘लोकवाणी’ आदि पत्रों का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। ‘त्यागभूमि’ (1927) में गांधीवादी विचारधारा का प्रतिपादन होता था और इसका सम्पादन हरिभाऊ उपाध्याय ने किया। इसमें गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रमों पर अधिक बल दिया गया। देशभक्ति, समाज-सुधार तथा स्त्रियों के उत्थान सम्बन्धी लेख इसमें सामान्यतः प्रकाशित होते थे।
शासकों की भूमिका
मेवाड़ के महाराणा फतह सिंह, अलवर के महाराजा जयसिंह और भरतपुर के महाराजा कृष्ण सिंह बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में राजस्थान के ऐसे शासक थे, जो अपनी प्रगतिशील एवं राष्ट्रीय विचारधारा तथा अंग्रेजों को राज्य के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने देने के कारण ब्रिटिश सरकार के कोपभाजन बने। अंग्रेजी शिकंजे से परेशान एवं अपदस्थ मेवाड़ के महाराणा के बारे में ‘तरुण राजस्थान’ ने अपने 10 जनवरी, 1924 के अंक में लिखा, “यदि महाराणा गोरी सरकार के अन्धभक्त होते, तो शायद मेवाड़ के प्राचीन गौरव का नाश करने वाला यह अत्याचारपूर्ण हस्तक्षेप न हुआ होता।”
यह भी उल्लेखनीय है कि अलवर के शासक जयसिंह ने 1903 के आसपास बाल-विवाह, अनमेल विवाह और मृत्यु-भोज पर रोक लगा दी। रियासत की राजभाषा हिन्दी घोषित कर दी। राज्य में पंचायतों का जाल बिछा दिया। महाराजा ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय एवं सनातन धर्म कॉलेज, लाहौर को उदारतापूर्वक वित्तीय सहायता दी। ऐसे प्रगतिशील शासक से ब्रिटिश सरकार का असन्तुष्ट होना स्वाभाविक था। अन्ततः अलवर के महाराजा को निर्वासित होना पड़ा।
इस प्रकार राजस्थान के केवल कतिपय शासकों ने ही यहाँ के जन-आन्दोलनों के प्रति सहानुभूति रखने एवं प्रगतिशील विचारों के प्रकटीकरण का साहस किया, परन्तु अपवाद स्वयं बेमिसाल होते हैं।
व्यापारी वर्ग की भूमिका
सत्ता के निरंकुश प्रयोग के विरुद्ध आवाज़ उठाने में व्यापारी वर्ग भी पीछे नहीं रहा। प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् इस वर्ग की धारणा एवं विचारधारा सत्ता वर्ग के विरुद्ध होने लगी। कलकत्ता में एक प्रभावशाली मारवाड़ी मण्डल विकसित हो रहा था, जिसने राष्ट्रीय विचारधारा को प्रोत्साहित करने का निश्चय किया। रियासतों में व्यापारी वर्ग को ठिकानेदारों की अहमन्यता खटकती थी। वे राजनीतिक जागरूकता लाने के लिए अपने धन का प्रयोग करना चाहते थे, जिससे सामन्ती अनुत्तरदायी व्यवहार नियंत्रित हो सके।
रियासतों में राजनीतिक चेतना जागृत करने वालों में कतिपय व्यापारी वर्ग की भूमिका सराहनीय रही, उदाहरणार्थ— बीकानेर में खूबराम सर्राफ तथा सत्यनारायण सर्राफ, जोधपुर में आनन्दराज सुराणा, चाँदमल सुराणा, भँवरलाल सर्राफ, प्रयागराम भण्डारी तथा जयपुर में टीकाराम पालीवाल और गुलाबचन्द कासलीवाल आदि।
ब्यावर के सेठ दामोदरदास राठी एक कुशल उद्योगपति थे, किन्तु उनका राजनीतिक कार्यक्षेत्र अर्जुनलाल सेठी, केसरी सिंह बारहठ, राव गोपाल सिंह खरवा और विजय सिंह पथिक के साथ ही था। क्रान्ति के मार्ग पर ये पाँचों राष्ट्रवादी नेता एक-दूसरे के पूरक थे। दुर्भिक्ष, बाढ़ या भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं से त्रस्त जनता की उन्होंने सदैव सेवा की।
सेठ राठी हिन्दी भाषा के बड़े प्रशंसक थे। उन्होंने 1914 में अपनी कृष्णा मिल के बही-खातों तथा अपने समस्त कार्य हिन्दी में ही करने का संकल्प लेकर अत्यन्त प्रशंसनीय कार्य किया। हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष अमृतलाल चक्रवर्ती की प्रेरणा से राठी ने ब्यावर में ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ की स्थापना की और अजमेर-मेरवाड़ा की अदालतों में नागरी लिपि एवं हिन्दी भाषा के प्रयोग के लिए आन्दोलन चलाया। इससे प्रभावित होकर अंग्रेज कमिश्नर ने राजकीय कार्य नागरी लिपि और हिन्दी भाषा में करना स्वीकार कर लिया था।
इस प्रकार एक व्यवसायी एवं उद्योगपति होने के बावजूद सेठ राठी ने स्वभाषा के प्रयोग सहित स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग को बढ़ावा देकर राष्ट्रप्रेम की भावना को पोषित किया।
खादी का प्रयोग
राजस्थान के राज्यों में खादी के प्रचार ने स्वतंत्रता की भावना को लोकप्रिय तथा व्यापक बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा लोगों को इस आन्दोलन की ओर आकर्षित किया। गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रम का प्रचार ऐसा आवरण था, जिस पर किसी निरंकुश शासक को भी आपत्ति करने का औचित्य दिखाई नहीं पड़ता था।
खादी का प्रयोग गाँव की निर्धन जनता के लिए रोजगार का एक साधन हो सकता था, इसलिए इस कार्यक्रम को रोकने में किसी को विशेष आपत्ति नहीं हो सकती थी। समय के साथ गाँधी टोपी पहनना और खादी का प्रयोग करना स्वतन्त्रता आन्दोलन का प्रतीक बन गया। जमनालाल बजाज पर इस आन्दोलन की देखरेख का दायित्व था।
गोकुलभाई भट्ट तथा अन्य खादी कार्यकर्ताओं के सम्मानार्थ प्रकाशित ग्रन्थों से इन शांत, जनप्रिय एवं चर्चित व्यक्तित्वों के योगदान पर अच्छा प्रकाश पड़ता है। खादी को प्रोत्साहन देना, छुआछूत समाप्त करना तथा हरिजन-उद्धार जैसे कार्यक्रम इस युग के नये मूल्यों को बढ़ावा देने वाले थे, जिनसे जन-जागरण प्रभावी हो सका।
महिलाओं की भूमिका
राजस्थान में राजनीतिक चेतना और नागरिक अधिकारों के लिए अनवरत चले आन्दोलनों में महिलाओं की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण रही। इसमें अजमेर की प्रकाशवती सिन्हा का नाम विशेष उल्लेखनीय है। 1930 से 1947 तक अनेक महिलाएँ जेल गईं। इनका नेतृत्व करने वाली साधारण गृहिणियाँ ही थीं, जिनकी गणना अपने कार्यों और उपलब्धियों के कारण असाधारण श्रेणी में की जाती है।
इनमें अंजना देवी (पत्नी रामनारायण चौधरी), नारायण देवी (पत्नी माणिक्यलाल वर्मा), रतन शास्त्री (पत्नी हीरालाल शास्त्री) आदि प्रमुख थीं। 1942 की अगस्त क्रान्ति में छात्राओं ने अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन किया। कोटा शहर में तो रामपुरा पुलिस कोतवाली पर अधिकार करने वालों में छात्राएँ भी सम्मिलित थीं।
रमादेवी पाण्डे, सुमित्रा देवी भार्गव, इन्दिरा देवी शास्त्री, विद्यादेवी, गौतमी देवी भार्गव, मनोरमा पण्डित, मनोरमा टण्डन, प्रियवंदा चतुर्वेदी और विजयाबाई का योगदान उल्लेखनीय रहा। डूँगरपुर की एक भील बाला कालीबाई 19 जून, 1947 को रास्तापाल सत्याग्रह में अपने शिक्षक सेंगाभाई को बचाते हुए शहीद हुई।
क्रांतिकारियों की भूमिका
भारतीय परिप्रेक्ष्य के अनुरूप ही राजपूताना में भी क्रांतिकारियों की गतिविधियाँ देखने को मिलती हैं। यहाँ भी शासक वर्ग ने ब्रिटिश सत्ता के समान ही सामान्यतः राष्ट्रवादी गतिविधियों पर अपना शिकंजा कस दिया। ऐसी परिस्थितियों में क्रांतिकारी गतिविधियों को अपनी जगह बनाने का अवसर मिला।
बंगाल में सक्रिय क्रांतिकारियों ने राजपूताना में भी सम्पर्क स्थापित करके अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार किया। राजपूताना में क्रांतिकारी गतिविधियों से सम्बद्ध रहने वालों में विजय सिंह पथिक, अर्जुनलाल सेठी, केसरी सिंह बारहठ, प्रताप सिंह बारहठ तथा राव गोपाल सिंह खरवा के नाम प्रमुख हैं।
यद्यपि क्रांतिकारियों का आन्दोलन जनसाधारण में अपनी व्यापक भूमि तैयार नहीं कर सका, फिर भी सामन्ती समाज की बदहाली, शासकों की उदासीनता तथा अंग्रेजों के दमन के विरुद्ध उनकी भूमिका अविस्मरणीय रही। राजस्थान में भी सम्पूर्ण राष्ट्र की भाँति सामान्यतः गांधीवादी तौर-तरीके ही लोकप्रिय रहे।
अंग्रेज सरकार क्रांतिकारी गतिविधियों को समाप्त करने पर आमादा थी। इसी क्रम में वायसराय लॉर्ड मिण्टो ने अगस्त 1909 में राजस्थान के राजाओं को अपने-अपने राज्यों में क्रांतिकारी साहित्य एवं समाचार-पत्रों पर रोक लगाने तथा क्रांतिकारी गतिविधियों को कुचलने के निर्देश दिए। फलस्वरूप राज्यों ने समाचार-पत्रों पर प्रतिबन्ध लगाने के साथ ही क्रांतिकारियों के आपसी सम्पर्क और व्याख्यानों पर भी रोक लगा दी।
परन्तु राज्यों के ये प्रतिबन्ध कारगर सिद्ध नहीं हुए और दृढ़प्रतिज्ञ एवं निष्ठावान देशभक्त हिंसात्मक गतिविधियों की ओर प्रवृत्त हुए। राजस्थान के क्रांतिकारियों का जनक शाहपुरा का बारहठ परिवार था। इनमें ठाकुर केसरी सिंह बारहठ राष्ट्रीय परिस्थितियों से भली-भाँति अवगत थे और ब्रिटिश सरकार की नीतियों के प्रति उनमें तीव्र आक्रोश था।
1903 में केसरी सिंह ने ‘चेतावनी रा चूंगटिया’ नामक सोरठे मेवाड़ के महाराणा फतह सिंह को लिखकर भेजे, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने दिल्ली दरबार में भाग नहीं लिया। क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन जुटाने हेतु उन्होंने कुछ साथियों के साथ कोटा के महन्त साधु प्यारेलाल की हत्या कर दी। इस प्रकरण में उन्हें बीस वर्ष का कारावास दिया गया और बिहार की हजारीबाग जेल में रखा गया, परन्तु 1919 में वे जेल से मुक्त हो गए। कोटा पहुँचने पर उन्हें अपने पुत्र प्रताप सिंह की शहादत का समाचार मिला, किन्तु उन्होंने धैर्य बनाए रखा। बाद में गांधीजी के सम्पर्क में आने के कारण केसरी सिंह बारहठ अहिंसा के विचारों के पोषक बन गए।
जयपुर में क्रांतिकारियों की पौध तैयार करने वाले अर्जुनलाल सेठी ने राजकीय नौकरी को ठोकर मारकर देश-सेवा का कठिन मार्ग चुना। उनके द्वारा स्थापित वर्धमान पाठशाला क्रांतिकारियों की नर्सरी थी। प्रताप सिंह बारहठ जैसे व्यक्ति इसी पाठशाला के छात्र थे। उन्हें एक महन्त की हत्या के झूठे आरोप में जेल भेज दिया गया। जेल से छह वर्ष बाद मुक्त (1920) होने के पश्चात् उन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लिया।
खरवा के ठाकुर गोपाल सिंह ने रासबिहारी बोस एवं बंगाल के क्रांतिकारियों के सम्पर्क में आकर सशस्त्र बल द्वारा स्वतन्त्रता प्राप्त करने का निश्चय किया। 21 फरवरी, 1915 को सशस्त्र क्रान्ति आरम्भ करने का उत्तरदायित्व राजस्थान में उन्होंने लिया। किन्तु योजना असफल होने पर उन्हें टाडगढ़ में नजरबन्द कर दिया गया, जहाँ से वे फरार हो गए। बाद में पुनः बन्दी बनाकर अजमेर जेल में रखा गया। जेल से मुक्त (1920) होने के पश्चात् वे शांतिपूर्ण राजनीतिक गतिविधियों में संलग्न हो गए।
कुछ समय बाद 1931 में भगत सिंह को फाँसी दिए जाने पर उग्रवादी पुनः सक्रिय हो उठे। अजमेर और पुष्कर की दीवारों पर “भगत सिंह ज़िन्दाबाद” के नारे लिखे गए। चिरंजीलाल ने क्रांतिकारी दल की स्थापना की। ज्वालाप्रसाद शर्मा, रमेशचन्द्र व्यास आदि अनेक लोग क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े।
राजस्थान में जन जागरण एवं स्वतन्त्रता संग्राम
कवियों का योगदान
राजस्थान की स्वातन्त्र्य चेतना में कवियों ने लोकगीतों के माध्यम से जनता को जागृत किया। ये लोकगीत राज्य की सभी क्षेत्रीय भाषाओं में वहाँ के स्थानीय कवियों तथा गीतकारों द्वारा रचे गए थे। इन गीतों एवं कविताओं से परतन्त्रता काल में अशिक्षित और अर्द्धशिक्षित जनसमूह प्रेरणा एवं प्रोत्साहन प्राप्त करता रहा था।
भरतपुर राज्य के निवासी हुलासी का नाम सर्वप्रथम आता है, जिन्होंने वीर रस के गीतों के माध्यम से अंग्रेजों के विरोध का आह्वान उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में ही कर दिया था। इस ब्राह्मण कवि ने अपनी वीर रस की कविताओं में राजस्थान के तत्कालीन राज्यों की तुलना में भरतपुर के वीरों द्वारा अंग्रेजों का अंतिम दम तक विरोध करने का ओजस्वी वर्णन किया है।
भरतपुर राज्य के राजनीतिक आन्दोलनों से सम्बन्धित वर्तमान काल में जितनी भी काव्य-रचनाएँ हुई हैं, उनमें सबसे अधिक योगदान पूर्णसिंह की रचनाओं का रहा है। ग्रामीण कवि होने के साथ-साथ पूर्णसिंह एक कर्मठ कार्यकर्ता भी था। उसने 1939 से 1947 तक राज्य में जितने भी आन्दोलन हुए, उनमें सक्रियता का प्रदर्शन किया। समय-समय पर आयोजित सम्मेलनों में इसके गीतों की धूम रहती थी।
राजस्थान में जन-जागरण का हुंकार फूँकने वालों में बूँदी के सूर्यमल्ल मिश्रण (1815-1868) तथा मारवाड़ के शंकरदान सामौर (1824-1878) का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
प्रजामण्डल आन्दोलन
राजस्थान की रियासतों में प्रजामण्डलों के नेतृत्व में उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिए नेताओं को कठोर संघर्ष करना पड़ा। यातनाएँ झेलनी पड़ीं। कारावास में रहना पड़ा। उनके परिवारों को भारी संकट का सामना करना पड़ा। यहाँ तक कि अपने जीवन को भी दाँव पर लगाना पड़ा। प्रजामण्डलों के मार्गदर्शन में ही राजस्थान की विभिन्न रियासतों में राष्ट्रीय आन्दोलन की हलचल हुई। दुर्भाग्य की बात यह रही कि राजस्थान की जनता को तीन शक्तियों, यथा—राजा, ठिकानेदार और ब्रिटिश सरकार का सामना करना पड़ा। ये तीनों शक्तियाँ मिलकर जनता के संघर्ष का दमन करती रहीं। परन्तु राजस्थान की रियासतों में होने वाले आंदोलनों ने यह प्रमाणित कर दिया कि इन राज्यों की जनता भी ब्रिटिश भारत की जनता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर भारत को स्वतंत्र कराना चाहती थी। जयपुर में प्रजामण्डल का नेतृत्व जमनालाल बजाज और हीरालाल शास्त्री जैसे दिग्गज नेताओं ने किया, जबकि जोधपुर में जयनारायण व्यास के मार्गदर्शन में उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिए संघर्ष चला। वहीं सिरोही में गोकुल भाई भट्ट के शीर्ष नेतृत्व में आन्दोलन संचालित हुआ।
राजस्थान में राजनीतिक कार्यकर्ताओं की पहली पीढ़ी में चार प्रमुख नेताओं के नाम उल्लेखनीय हैं, यथा—अर्जुनलाल सेठी (1880-1941), केसरी सिंह बारहठ (1872-1941), स्वामी गोपालदास (1882-1939) एवं राव गोपालसिंह (1872-1956)। अर्जुनलाल सेठी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी और अपना कार्य चौंमू के ठाकुर देवी सिंह के निजी सचिव के रूप में प्रारम्भ किया, लेकिन शीघ्र ही अपना यह पद त्याग दिया। कुछ समय तक मथुरा के एक जैन स्कूल में अध्यापक रहे और फिर 1906 में जयपुर आ गए। इसके पश्चात् वे युवकों को भावी क्रान्ति के लिए तैयार करने में लग गए। केसरी सिंह बारहठ मेवाड़ के शाहपुरा में पैदा हुए। वे चारण तथा राजपूतों में कुछ सुधार लाना चाहते थे। उन्होंने राजपूतों में शिक्षा-प्रसार पर बल दिया और सामाजिक कुरीतियों से बचने की सलाह दी।
स्वामी गोपालदास का जन्म चूरू के समीप हुआ था। उनका जीवन इस बात का ज्वलन्त उदाहरण है कि निरंकुश शासन में सार्वजनिक हित में कार्य करने वाले को कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। बीकानेर के प्रसिद्ध शासक गंगासिंह ने स्वामी गोपालदास को परेशान करने में कोई कमी नहीं की, जबकि उनका दोष यह था कि वे बीकानेर की वास्तविक स्थिति से लोगों को अवगत करा रहे थे। सच तो यह है कि उन्होंने कई रचनात्मक कार्य किए, जैसे चूरू में लड़कियों के लिए स्कूल खोला, तालाबों की मरम्मत कराई और कुएँ खुदवाए। खरवा के ठाकुर राव गोपाल सिंह ने सामन्त परिवार में जन्म लेकर भी देश के भविष्य के लिए अपनी वंश-परम्परागत जागीर को देश की आजादी के लिए दाँव पर लगा दिया। उनके बारे में ठाकुर केसरी सिंह ने लिखा था—“जिस प्रकार पंजाब को लाला लाजपत राय पर और महाराष्ट्र को बाल गंगाधर तिलक पर गर्व है, उसी प्रकार राजस्थान को राव गोपाल सिंह खरवा पर गर्व है।”
इन नेताओं की कार्य-प्रणाली पर विचार करें तो कहा जा सकता है कि इन नेताओं की योजनाएँ तथा गतिविधियाँ सामाजिक कार्य करने, शिक्षा को प्रोत्साहित करने तथा देशप्रेम की भावना फैलाने की थीं। यह उल्लेखनीय है कि उस समय अप्रगतिशील रूढ़िवादी घटनाओं पर टीका-टिप्पणी आपराधिक श्रेणी में गिनी जाती थी। समाचार-पत्रों का बाहर से मँगवाना, एक टाइप मशीन अथवा चक्र-मुद्रण यंत्र का किसी व्यक्ति के पास होना एक अपराध माना जाता था। प्रचलित व्यवस्था के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखना संदिग्ध माना जाता था। पुरानी मान्यताओं को तर्क की कसौटी पर जाँचना तथा राजनीतिक एवं प्रशासनिक नीतियों के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखना क्रान्तिकारी समझा जाता था। रास बिहारी घोष, महर्षि अरविन्द और शचीन्द्र सान्याल से मिल लेना ही क्रान्तिकारी माने जाने के लिए पर्याप्त समझा जाता था। यह महत्त्वपूर्ण नहीं है कि जो कार्य सेठी, बारहठ, खरवा राव, स्वामी गोपालदास आदि ने किया, उसमें से उन्हें सफलता मिली या असफलता तथा वे संस्थागत रूप धारण कर सके अथवा धराशायी हो गए; अपितु महत्त्वपूर्ण यह है कि वे लोगों को कितना प्रभावित कर पाए। इस मायने में वे सफल रहे। इन नेताओं ने अपने बलिदान से पुराने सामन्ती ढाँचे के अन्यायपूर्ण आचरण का पर्दाफाश किया।
कोटा राज्य में जन-जागृति के जनक पं. नयनूराम शर्मा थे। उन्होंने थानेदार के पद से इस्तीफा देकर सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया था। वे विजय सिंह पथिक द्वारा स्थापित राजस्थान सेवा संघ के सक्रिय सदस्य बन गए। उन्होंने कोटा राज्य में बेगार-विरोधी आन्दोलन चलाया, जिसके फलस्वरूप बेगार प्रथा की प्रताड़ना में कमी आई। 1939 में पं. नयनूराम शर्मा और पं. अभिन्न हरि ने कोटा राज्य में उत्तरदायी शासन स्थापित करने के उद्देश्य से कोटा राज्य प्रजामण्डल की स्थापना की। प्रजामण्डल का पहला अधिवेशन शर्मा की अध्यक्षता में मांगरोल (बारां) में सम्पन्न हुआ।
राजस्थान में जन जागरण एवं स्वतन्त्रता संग्राम
भारत छोड़ो आंदोलन और राजस्थान
भारत छोड़ो आंदोलन (प्रस्ताव 8 अगस्त, शुरुआत 9 अगस्त, 1942) के ‘करो या मरो’ की घोषणा के साथ ही राजस्थान में भी गांधीजी की गिरफ्तारी का विरोध होने लगा। जगह-जगह जुलूस, सभाओं और हड़तालों का आयोजन होने लगा। विद्यार्थी अपनी शिक्षण संस्थाओं से बाहर आ गए और आंदोलन में कूद पड़े। स्थान-स्थान पर रेल की पटरियाँ उखाड़ दी गईं, तार और टेलीफोन के तार काट दिए गए। स्थानीय जनता ने समानांतर सरकारें स्थापित कर लीं। उधर, जवाब में ब्रिटिश सरकार ने भारी दमनचक्र चलाया। जगह-जगह पुलिस ने गोलियाँ चलाईं। कई लोग मारे गए, हजारों गिरफ्तार किए गए। देश की आजादी की इस बड़ी लड़ाई में राजस्थान ने भी कंधे से कंधा मिलाकर योगदान दिया।
जोधपुर राज्य में सत्याग्रह का दौर चल पड़ा। जेल जाने वालों में मथुरादास माथुर, देवनारायण व्यास, गणेशीलाल व्यास, सुमनेश जोशी, अचलेश्वर प्रसाद शर्मा, छगनराज चौपासनीवाला, स्वामी कृष्णानंद, द्वारका प्रसाद पुरोहित आदि थे। जोधपुर में विद्यार्थियों ने बम बनाकर सरकारी सम्पत्ति को नष्ट किया। किन्तु राज्य सरकार के दमन के कारण आन्दोलन कुछ समय के लिए शिथिल पड़ गया। अनेक लोगों ने जयनारायण व्यास पर आंदोलन समाप्त करने का दबाव डाला, परन्तु वे अडिग रहे। राजस्थान में 1942 के आन्दोलन में जोधपुर राज्य का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इस आंदोलन में लगभग 400 व्यक्ति जेल में गए। महिलाओं में श्रीमती गोरजा देवी जोशी, श्रीमती सावित्री देवी भाटी, श्रीमती सिरेकंवर व्यास, श्रीमती राजकौर व्यास आदि ने अपनी गिरफ्तारियाँ दीं।
माणिक्यलाल वर्मा रियासती नेताओं की बैठक में भाग लेकर इंदौर आए तो उनसे पूछा गया कि भारत छोड़ो आन्दोलन के सन्दर्भ में मेवाड़ की क्या भूमिका रहेगी, तो उन्होंने उत्तर दिया, “भाई, हम तो मेवाड़ी हैं, हर बार हर-हर महादेव बोलते आए हैं, इस बार भी बोलेंगे।” स्पष्ट था कि भारत छोड़ो आन्दोलन के प्रति मेवाड़ का क्या रुख था। बम्बई से लौटकर उन्होंने मेवाड़ के महाराणा को ब्रिटिश सरकार से सम्बन्ध विच्छेद करने का 20 अगस्त, 1942 को अल्टीमेटम दिया। परन्तु महाराणा ने इसे महत्व नहीं दिया। दूसरे दिन माणिक्यलाल गिरफ्तार कर लिए गए। उदयपुर में कामकाज ठप हो गया। इसके साथ ही प्रजामण्डल के कार्यकर्ताओं और सहयोगियों की गिरफ्तारियों का सिलसिला शुरू हुआ। उदयपुर के भूरेलाल बया, बलवन्त सिंह मेहता, मोहनलाल सुखाड़िया, मोतीलाल तेजावत, शिवचरण माथुर, हीरालाल कोठारी, प्यारचंद विश्नोई, रोशनलाल बोर्दिया आदि गिरफ्तार हुए। उदयपुर में महिलाएँ भी पीछे नहीं रहीं। माणिक्यलाल वर्मा की पत्नी नारायणदेवी वर्मा अपने छह माह के पुत्र को गोद में लिए जेल गईं। प्यारचंद विश्नोई की धर्मपत्नी भगवती देवी भी जेल गईं। आन्दोलन के दौरान उदयपुर में महाराणा कॉलेज और अन्य शिक्षण संस्थाएँ कई दिनों तक बंद रहीं। लगभग 600 छात्र गिरफ्तार किए गए। मेवाड़ के संघर्ष का दूसरा महत्वपूर्ण केन्द्र नाथद्वारा था। नाथद्वारा में हड़तालों और जुलूसों की धूम मच गई। नाथद्वारा के अतिरिक्त भीलवाड़ा और चित्तौड़ भी संघर्ष के केन्द्र थे। भीलवाड़ा के रमेशचन्द्र व्यास, जो मेवाड़ प्रजामण्डल के प्रथम सत्याग्रही थे, को आन्दोलन प्रारम्भ होते ही गिरफ्तार कर लिया गया। मेवाड़ में आन्दोलन को रोका नहीं जा सका, इसका प्रशासन को खेद रहा।
जयपुर राज्य की 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में भूमिका विवादास्पद रही। जयपुर प्रजामण्डल का एक वर्ग भारत छोड़ो आन्दोलन से अलग नहीं रहना चाहता था। इनमें बाबा हरिश्चन्द्र, रामकरण जोशी, दौलतमल भण्डारी आदि थे। ये लोग पं. हीरालाल शास्त्री से मिले। हीरालाल शास्त्री ने 17 अगस्त, 1942 की शाम को जयपुर में आयोजित सार्वजनिक सभा में आन्दोलन की घोषणा का आश्वासन दिया। यद्यपि पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सभा हुई, परन्तु हीरालाल शास्त्री ने आन्दोलन की घोषणा करने के स्थान पर सरकार के साथ हुई समझौता वार्ता पर प्रकाश डाला। हीरालाल शास्त्री ने ऐसा सम्भवतः इसलिए किया कि उनके जयपुर के तत्कालीन प्रधानमंत्री मिर्जा इस्माइल से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे तथा जयपुर महाराजा के रवैये एवं आश्वासन से जयपुर प्रजामण्डल संतुष्ट था। जयपुर राज्य के भीतर और बाहर हीरालाल शास्त्री की आलोचना की गई। बाबा हरिश्चन्द्र और उनके सहयोगियों ने एक नया संगठन ‘आजाद मोर्चा’ की स्थापना कर आन्दोलन चलाया। इस मोर्चे का कार्यालय गुलाबचंद कासलीवाल के घर स्थित था। जयपुर के छात्रों ने शिक्षण संस्थाओं में हड़ताल करवा दी।
कोटा राज्य प्रजामण्डल के नेता पं. अभिन्न हरि को बम्बई से लौटते ही 13 अगस्त को गिरफ्तार कर लिया गया। प्रजामण्डल के अध्यक्ष मोतीलाल जैन ने महाराज को 17 अगस्त को अल्टीमेटम दिया कि वे शीघ्र ही अंग्रेजों से सम्बन्ध विच्छेद कर दें। फलस्वरूप सरकार ने प्रजामण्डल के कई कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया। इनमें शम्भूदयाल सक्सेना, बेनी माधव शर्मा, मोतीलाल जैन, हीरालाल जैन आदि थे। उक्त कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के बाद नाथूलाल जैन ने आन्दोलन की बागडोर सम्भाली। इस आन्दोलन में कोटा के विद्यार्थियों का उत्साह देखते ही बनता था। विद्यार्थियों ने पुलिस को बैरकों में बंद कर रामपुरा शहर कोतवाली पर अधिकार (14-16 अगस्त, 1942) कर उस पर तिरंगा फहरा दिया। जनता ने नगर का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया। लगभग दो सप्ताह बाद जनता ने महाराव के इस आश्वासन पर कि सरकार दमन का सहारा नहीं लेगी, शासन पुनः महाराव को सौंप दिया। गिरफ्तार कार्यकर्ता रिहा कर दिए गए।
भरतपुर में भी भारत छोड़ो आन्दोलन की चिंगारी फैल गई। भरतपुर राज्य प्रजा परिषद् के कार्यकर्ता मास्टर आदित्येन्द्र, युगलकिशोर चतुर्वेदी, जगपतिसिंह, रेवतीशरण, हुक्मचन्द, गौरीशंकर मित्तल, रमेश शर्मा आदि नेता गिरफ्तार कर लिए गए। इसी समय दो युवकों ने डाकखानों और रेलवे स्टेशनों पर तोड़-फोड़ की योजना बनाई, परन्तु वे पकड़े गए। आन्दोलन की प्रगति के दौरान ही राज्य में बाढ़ आ गई। अतः प्रजा परिषद् ने इस प्राकृतिक विपदा को ध्यान में रखते हुए अपना आन्दोलन स्थगित कर राहत कार्यों में लगने का निर्णय लिया। शीघ्र ही सरकार से आन्दोलनकारियों की समझौता वार्ता प्रारम्भ हुई। वार्ता के आधार पर राजनीतिक कैदियों को रिहा कर दिया गया। सरकार ने निर्वाचित सदस्यों के बहुमत वाली विधानसभा बनाना स्वीकार कर लिया।
शाहपुरा राज्य प्रजामण्डल ने भारत छोड़ो आन्दोलन शुरू होने के साथ ही राज्य को अल्टीमेटम दिया कि वह अंग्रेजों से सम्बन्ध विच्छेद कर ले। फलस्वरूप प्रजामण्डल के कार्यकर्ता रमेशचन्द्र ओझा, लादूराम व्यास, लक्ष्मीनारायण कौटिया गिरफ्तार कर लिए गए। शाहपुरा के गोकुललाल असावा पहले ही अजमेर में गिरफ्तार कर लिए गए थे।
अजमेर में कांग्रेस के आह्वान के फलस्वरूप भारत छोड़ो आन्दोलन का प्रभाव पड़ा। कई व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया गया। इनमें बालकृष्ण कौल, हरिभाऊ उपाध्यक्ष, रामनारायण चौधरी, मुकुट बिहारी भार्गव, अम्बालाल माथुर, मौलाना अब्दुल गफूर, शोभालाल गुप्त आदि थे। प्रकाशचन्द ने इस आन्दोलन के सन्दर्भ में अनेक गीतों की रचना कर प्रजा को नैतिक बल प्रदान किया। जेलों के कुप्रबन्ध के विरोध में बालकृष्ण कौल ने भूख हड़ताल कर दी।
बीकानेर में भारत छोड़ो आन्दोलन का विशेष प्रभाव देखने को नहीं मिलता है। बीकानेर राज्य प्रजा परिषद् के नेता रघुवर दयाल गोयल को पहले से ही राज्य से निर्वासित कर रखा गया था। बाद में गोयल के साथी गंगादास कौशिक और दाऊदयाल आचार्य को गिरफ्तार कर लिया गया। इन्हीं दिनों नेमीचन्द आँचलिया ने अजमेर से प्रकाशित एक साप्ताहिक में लेख लिखा, जिसमें बीकानेर राज्य में चल रहे दमनात्मक कार्यों की निन्दा की गई। राज्य सरकार ने आँचलिया को सात वर्ष के कठोर कारावास का दण्ड दिया। राज्य में तिरंगा झण्डा फहराना अपराध माना जाता था। अतः राज्य में कार्यकर्ताओं ने झण्डा सत्याग्रह शुरू कर भारत छोड़ो आन्दोलन में अपना योगदान दिया। अलवर, डूँगरपुर, प्रतापगढ़, सिरोही, झालावाड़ आदि राज्यों में भी भारत छोड़ो आन्दोलन की आग फैली। सार्वजनिक सभाएँ कर देश में अंग्रेजी शासन का विरोध किया गया। कांग्रेस नेताओं की गिरफ्तारियाँ हुईं, हड़तालें हुईं और जुलूस निकाले गए।
सिंहावलोकन
रियासतों में जन-आन्दोलनों के दौरान लोगों को अनेक प्रकार के जुल्मों एवं यातनाओं का शिकार होना पड़ा। किसान आन्दोलनों, जनजातीय आन्दोलनों आदि ने राष्ट्रीय जागृति के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। ये स्वस्फूर्त आन्दोलन थे। इनसे सामन्ती व्यवस्था की कमजोरियाँ उजागर हुईं। यद्यपि इन आन्दोलनों का लक्ष्य राजनीतिक नहीं था, परन्तु निरंकुश सत्ता के विरुद्ध आवाज़ के स्वर बहुत तेज हो गए, जिससे तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था आलोचना का शिकार हुई। यदि आजादी के पश्चात् राजतन्त्र तथा सामन्त प्रथा का अवसान हुआ, तो इसमें इन आन्दोलनों की भूमिका को ओझल नहीं किया जा सकता। अनेक देशभक्तों को प्राणों की आहुति देनी पड़ी। शहीद बालमुकुन्द बिस्सा, सागरमल गोपा आदि का बलिदान प्रेरणा के स्रोत बने। प्रजामण्डल आन्दोलनों से राष्ट्रीय आन्दोलन को सम्बल मिला। प्रजामण्डलों ने अपने रचनात्मक कार्यों के अन्तर्गत सामाजिक सुधार, शिक्षा का प्रसार, बेगार प्रथा के उन्मूलन एवं अन्य आर्थिक समस्याओं के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए।
यह कहना उचित नहीं है कि राजस्थान में जन-आन्दोलन केवल संवैधानिक अधिकारों तथा उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिए था, स्वतन्त्रता के लिए नहीं। डॉ. एम.एस. जैन ने उचित ही लिखा है, “स्वतंत्रता संघर्ष केवल बाह्य नियंत्रण के विरुद्ध ही नहीं होता, बल्कि निरंकुश सत्ता के विरुद्ध संघर्ष भी इसी श्रेणी में आते हैं।”
चूँकि रियासती जनता दोहरी गुलामी झेल रही थी, अतः उसके लिए संवैधानिक अधिकारों की प्राप्ति तथा उत्तरदायी शासन की स्थापना से बढ़कर कोई बात नहीं हो सकती थी।
रियासतों में शासकों का रवैया इतना दमनकारी था कि खादी प्रचार, स्वदेशी शिक्षण संस्थाओं जैसे रचनात्मक कार्यों को भी अनेक रियासतों में प्रतिबन्धित कर दिया गया। सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबन्ध होने के कारण जनचेतना के व्यापक प्रसार में अड़चनें आईं। ऐसी कठिन परिस्थितियों में लोक संस्थाओं की भागीदारी कठिन थी। जब तक कांग्रेस ने अपने हरिपुरा अधिवेशन (1938) में देशी रियासतों में चल रहे आन्दोलनों को समर्थन नहीं दिया, तब तक राजस्थान की रियासतों में जन-आन्दोलन को व्यापक समर्थन नहीं मिल सका। हरिपुरा अधिवेशन के पश्चात् रियासती आन्दोलन राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ गया।
धीरे-धीरे राजस्थान आजादी के संघर्ष के अंतिम सोपान की ओर बढ़ रहा था। आजादी से पूर्व राजस्थान विभिन्न छोटी-छोटी रियासतों में बँटा हुआ था। यह 19 देशी रियासतों, 2 चीफ़शिपों एवं एक ब्रिटिश शासित प्रदेश में विभक्त था। इसमें सबसे बड़ी रियासत जोधपुर थी और सबसे छोटी लावा चीफ़शिप थी।
राजस्थान के एकीकरण की प्रक्रिया समस्त भारतीय राज्यों के एकीकरण का हिस्सा थी। एकीकरण में वल्लभभाई पटेल, वी. पी. मेनन सहित स्थानीय शासकों, रियासतों के जननेताओं—जयनारायण व्यास, माणिक्यलाल वर्मा, हीरालाल शास्त्री, प्रेम नारायण माथुर, गोकुल भाई भट्ट आदि की अहम भूमिका रही।
जनता रियासतों के प्रभाव से मुक्त होना चाहती थी क्योंकि वह उनके आतंक एवं अलोकतांत्रिक शासन से असंतुष्ट थी। साथ ही, वह स्वयं को राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ना चाहती थी। राजस्थान में संचालित राष्ट्रवादी गतिविधियों एवं विभिन्न कारकों ने मिलकर राजस्थान में एकता का सूत्रपात किया। फलतः 18 मार्च, 1948 से 1 नवम्बर, 1956 तक सात चरणों में राजस्थान का एकीकरण सम्पन्न हुआ। 30 मार्च, 1949 को वृहत् राजस्थान का निर्माण हुआ, जिसकी राजधानी जयपुर बनाई गई और पं. हीरालाल शास्त्री को नवगठित राज्य का प्रथम मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया।
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