प्रकृति का पर्व: नागपंचमी



श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि नागों को समर्पित मानी जाती है। इस दिन नागों की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व है। श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय के 29वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं—

“अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्।”

अर्थात् नागों में मैं शेषनाग हूँ और जलचरों में वरुण हूँ।

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार शेषनाग समस्त नागों के अधिपति एवं नागराज हैं। उनके सहस्र फन बताए गए हैं। वे भगवान श्रीहरि विष्णु की दिव्य शय्या के रूप में सदैव उनकी सेवा में उपस्थित रहते हैं। शेषनाग को धैर्य, स्थिरता, शक्ति तथा अनंतता का प्रतीक माना जाता है। सनातन धर्म में उनका विशेष महत्व है और वे भगवान विष्णु के परम भक्त एवं सेवक के रूप में पूजित हैं।

Naga Panchami

शास्त्रों के अनुसार नागों की उत्पत्ति महर्षि कश्यप की पत्नी कद्रू से हुई थी। नागों का मूल निवास स्थान पाताल लोक माना गया है। पुराणों में नागों की राजधानी भोगवतीपुरी का विशेष उल्लेख मिलता है, जो नागलोक की प्रमुख नगरी मानी जाती है।

पौराणिक वर्णनों के अनुसार नाग कन्याओं का सौन्दर्य किसी भी अप्सरा से कम नहीं माना गया है। योगशास्त्र में भी ‘कुण्डलिनी शक्ति’ को सर्पिणी का ही स्वरूप बताया गया है, जो मानव शरीर में स्थित दिव्य आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक है।

भारतवर्ष में नागों की पूजा देवस्वरूप करने की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। इसके प्रमाण केवल पौराणिक ग्रन्थों में ही नहीं, बल्कि प्राचीन सभ्यताओं के अवशेषों एवं पुरातात्त्विक साक्ष्यों में भी प्राप्त होते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय संस्कृति और समाज में नागों को सदैव आदरणीय एवं पूजनीय स्थान प्राप्त रहा है।

सनातन ग्रन्थों में ऐसी मान्यता है कि भगवान के नाम-स्मरण के साथ नागों की नामावली का पाठ करने से विष का प्रभाव नष्ट होता है तथा साधक को सर्वत्र विजय और मंगल की प्राप्ति होती है। नागों के प्रमुख नौ नाम नवनाग देवता कहलाते हैं—

अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम्।
शंखपालं धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा॥

अर्थात् अनन्त, वासुकि, शेष, पद्मनाभ, कम्बल, शंखपाल, धृतराष्ट्र, तक्षक तथा कालिय— ये नौ प्रमुख नाग देवता माने गए हैं।

Naga Panchami


नागपंचमी का महत्व एवं पौराणिक कथा

नागपंचमी का पर्व मनाने के संबंध में एक प्राचीन कथा प्रचलित है। इसके अनुसार एक बार नागों ने अपनी माता कद्रू की आज्ञा का उल्लंघन कर दिया। इससे क्रोधित होकर नागमाता ने उन्हें श्राप दिया कि, “जब राजा जनमेजय नागयज्ञ करेंगे, तब तुम सब उस यज्ञ की अग्नि में जलकर भस्म हो जाओगे।”

इस श्राप से भयभीत होकर नागों ने ब्रह्माजी से मुक्ति का उपाय पूछा। तब ब्रह्माजी ने कहा, “यायावर वंश में उत्पन्न तपस्वी जरत्कारु तुम्हारे बहनोई होंगे और उनके पुत्र आस्तिक मुनि तुम्हारी रक्षा करेंगे।” ब्रह्माजी ने यह वरदान श्रावण शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ही प्रदान किया था। बाद में इसी तिथि को आस्तिक मुनि ने नागों की रक्षा कर उन्हें यज्ञाग्नि से बचाया। इसी कारण नागपंचमी का पर्व मनाया जाता है।

नागों के संरक्षण की भावना से प्रारम्भ हुआ यह पर्व आज भी पूर्णतः प्रासंगिक है। वर्तमान समय में भी नागों तथा अन्य सर्पों के संरक्षण की आवश्यकता है, क्योंकि वे पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कृषि के लिए भी सर्प अत्यंत उपयोगी हैं, क्योंकि वे चूहों एवं अनेक हानिकारक कीट-पतंगों को नष्ट कर फसलों की रक्षा करते हैं।

नागपंचमी का धार्मिक महत्व

नागपंचमी नागदेवता की पूजा का प्रमुख पर्व है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि नागदेवता को समर्पित मानी जाती है। इस दिन व्रत रखकर नागदेव का विधिपूर्वक पूजन किया जाता है।

नाग जाति का विशेष स्थान सनातन धर्म में वर्णित है। शेषनाग भगवान विष्णु की शय्या हैं, वहीं भगवान शिव अपने कंठ में नाग धारण करते हैं। भगवान गणेश, देवी दुर्गा तथा अन्य अनेक देवी-देवताओं के आभूषणों में भी नागों का उल्लेख मिलता है।

सर्प जाति को अत्यंत साहसी एवं स्वाभिमानी माना गया है। इस संबंध में एक प्रसिद्ध उक्ति है—

“सिंहानां महती निद्रा, सर्पाणां च महद्भयम्।
ब्राह्मणानां न चैकत्वं, तस्माज्जीवन्ति जन्तवः॥”

अर्थात् सिंह अत्यधिक निद्रा लेते हैं, सर्प सदैव सावधान और भययुक्त रहते हैं तथा ब्राह्मणों में एकता का अभाव होता है; इसी कारण अन्य जीव-जन्तु भी इस पृथ्वी पर सुरक्षित रह पाते हैं।

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण में वर्णित कथा

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण में नागपंचमी की कथा का वर्णन मिलता है। इस कथा को सुमन्त मुनि ने पाण्डववंशीय राजा शतानीक को सुनाया था।

देवताओं और असुरों द्वारा समुद्रमंथन से प्राप्त चौदह रत्नों में से एक उच्चैःश्रवा नामक दिव्य अश्व था। एक दिन उसे आकाशमार्ग से जाते देखकर नागमाता कद्रू और उनकी सहपत्नी विनता के मध्य विवाद उत्पन्न हो गया।

कद्रू ने विनता से पूछा, “बताओ बहन, इस अश्व के बाल किस रंग के हैं?”

विनता ने उत्तर दिया, “इसके बाल श्वेत हैं।”

कद्रू ने कहा, “नहीं, इसके बाल चितकबरे हैं।”

दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़ गईं और शर्त लग गई कि जिसकी बात असत्य सिद्ध होगी, वह दूसरी की दासी बन जाएगी।

कद्रू ने अपने पुत्र नागों को आदेश दिया कि वे बालों के समान सूक्ष्म रूप धारण कर अश्व के शरीर पर फैल जाएँ, जिससे उसके बाल चितकबरे दिखाई दें। परंतु नागों ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। इससे क्रोधित होकर कद्रू ने उन्हें श्राप दे दिया कि राजा जनमेजय के नागयज्ञ में वे सब भस्म हो जाएँगे।

श्राप से भयभीत होकर नागराज वासुकि के नेतृत्व में सभी नाग ब्रह्माजी के पास पहुँचे और उनसे रक्षा का उपाय पूछा। तब ब्रह्माजी ने कहा कि यायावर वंश में उत्पन्न तपस्वी जरत्कारु से अपनी बहन का विवाह कराओ। उनके पुत्र आस्तिक मुनि ही भविष्य में तुम्हारी रक्षा करेंगे।

कहा जाता है कि ब्रह्माजी ने यह उपाय पंचमी तिथि को बताया था और आगे चलकर आस्तिक मुनि ने उसी परंपरा के अनुसार नागों को यज्ञाग्नि से बचाया। तभी से नागपंचमी का पर्व मनाया जाने लगा।

नागपंचमी व्रत एवं पूजन-विधि

हमारे ऋषि-मुनियों ने नागोपासना के अनेक व्रत एवं पूजन-विधान बताए हैं। श्रावण शुक्ल पंचमी के दिन नागदेवता को गोदुग्ध से स्नान कराया जाता है तथा श्रद्धापूर्वक पूजन किया जाता है।

इस दिन व्रती को एक समय भोजन करने का नियम बताया गया है। पूजन के समय भूमि पर नागों का चित्र बनाया जाता है अथवा स्वर्ण, रजत, काष्ठ या मिट्टी से निर्मित नागमूर्ति का पूजन किया जाता है। पुष्प, धूप, गंध, अक्षत एवं नैवेद्य अर्पित कर नागदेवता का सम्मानपूर्वक पूजन किया जाता है।

पूजन के समय यह मंत्र पढ़ा जाता है—

सर्वे नागाः प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथिवीतले।
ये च हेलिमरीचिस्था येऽन्तरे दिविसंस्थिताः॥

ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिनः।
ये च वापीषु कूपेषु तेषु सर्वेषु वै नमः॥

भावार्थ :
जो नाग पृथ्वी, आकाश, स्वर्ग, सूर्य की किरणों, नदियों, सरोवरों, कुओं, बावड़ियों तथा अन्य जलाशयों में निवास करते हैं, वे सभी हम पर प्रसन्न हों। हम उन सभी नागदेवताओं को शत-शत नमन करते हैं।

भारत के अनेक पर्वतीय क्षेत्रों, वनवासी समाजों तथा राजस्थान सहित देश के विभिन्न भागों में नागदेवता की पूजा आज भी अत्यंत श्रद्धा एवं सम्मान के साथ की जाती है। नागों को अनावश्यक रूप से न मारने की परंपरा भी भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग है।

भारतीय दर्शन का मूल विचार—

“सर्वं खल्विदं ब्रह्म”

अर्थात् यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्मस्वरूप है— नागपूजन की परंपरा इसी सार्वभौमिक दृष्टि, प्रकृति-पूजन और समस्त प्राणियों के प्रति सम्मान की भावना को अभिव्यक्त करती है।

नागपंचमी और कालसर्प दोष

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में सभी ग्रह राहु और केतु के मध्य स्थित हो जाते हैं, तब कालसर्प योग या कालसर्प दोष बनता है। ऐसी मान्यता है कि इस योग के प्रभाव से व्यक्ति को अपने प्रयासों के अनुरूप सफलता प्राप्त करने में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। नागपंचमी का पर्व नागदेवता की आराधना और कालसर्प दोष की शांति के लिए विशेष रूप से शुभ माना गया है।

कालसर्प दोष की शांति के लिए नागपंचमी पर किए जाने वाले उपाय

  1. नागपंचमी के दिन भगवान शिव का अभिषेक करें तथा उन्हें चाँदी के नाग-नागिन का जोड़ा अर्पित करें। इससे कालसर्प दोष की शांति होने की मान्यता है।

  2. इस दिन श्रद्धापूर्वक रुद्राभिषेक कराने से भी कालसर्प दोष के प्रभाव को कम करने का विधान बताया गया है।

  3. नवनाग स्तोत्र का 108 बार पाठ करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।

  4. नागपंचमी के दिन बहते हुए जल में 11 नारियल प्रवाहित करने का भी विधान है।

  5. पीपल के वृक्ष के नीचे किसी पात्र में दूध अर्पित कर नागदेवता का स्मरण करें।

जप किए जाने वाले मंत्र

कालसर्प दोष से पीड़ित व्यक्तियों को नागपंचमी के दिन नागदेवता का विधिपूर्वक पूजन कर निम्न मंत्रों का जप करना चाहिए—

नाग गायत्री मंत्र :

ॐ नवकुलाय विद्महे विषदंताय धीमहि।
तन्नः सर्पः प्रचोदयात्॥

इसके अतिरिक्त—

ॐ नमः शिवाय॥

तथा

ॐ नागदेवताय नमः॥

मंत्रों की 11 या 21 माला जप करने का भी विशेष महत्व बताया गया है।

ध्यान दें : आधुनिक वन्यजीव संरक्षण कानूनों के अनुसार किसी जीवित नाग या अन्य वन्यजीव को पकड़ना, खरीदना या व्यापार करना अवैध हो सकता है। अतः नागों के संरक्षण हेतु उन्हें प्राकृतिक आवास में सुरक्षित रहने देना तथा वन्यजीव संरक्षण के नियमों का पालन करना ही उचित है।

नागपंचमी पूजन-विधि

नागपंचमी के दिन घर के मुख्य द्वार के दोनों ओर नाग का चित्र बनाएं अथवा नागदेवता की प्रतिमा स्थापित करें। इसके पश्चात् धूप, दीप, पुष्प, कच्चा दूध, खीर आदि से पूजन करें। नैवेद्य में गेहूँ, भूने हुए चने तथा जौ अर्पित किए जाते हैं। पूजन के उपरांत प्रसाद वितरित करें।

नागपंचमी से संबंधित लोकप्रिय कथाएँ

1. दूध की कटोरी से प्रसन्न हुई नागिन

आंध्र प्रदेश में प्रचलित कथा के अनुसार एक किसान अपने दो पुत्रों और एक पुत्री के साथ रहता था। एक दिन खेत जोतते समय हल के नीचे आकर नागिन के तीन बच्चे मर गए। अपने बच्चों की मृत्यु से दुखी नागिन ने बदला लेने का निश्चय किया और रात में किसान, उसकी पत्नी तथा दोनों पुत्रों को डस लिया।

अगली सुबह जब वह किसान की पुत्री को डसने पहुँची, तब कन्या ने उसके सामने दूध से भरा कटोरा रख दिया और हाथ जोड़कर क्षमा माँगने लगी। कन्या की विनम्रता से प्रसन्न होकर नागिन ने किसान, उसकी पत्नी और दोनों पुत्रों को पुनर्जीवित कर दिया। कहा जाता है कि वह दिन श्रावण मास की पंचमी तिथि थी। तभी से नागपूजन और नागपंचमी की परंपरा प्रचलित हुई।

2. नाग भाई ने बहन को दिए उपहार

एक धनवान सेठ के छोटे पुत्र की पत्नी अत्यंत बुद्धिमती और सदाचारी थी। उसका कोई भाई नहीं था। एक दिन जब घर की बहुएँ मिट्टी लेने गईं, तब एक नाग निकल आया। बड़ी बहू उसे मारने लगी, परंतु छोटी बहू ने नाग की रक्षा की।

नाग उसकी करुणा से प्रसन्न हुआ और स्वयं को उसका भाई मान लिया। कुछ समय बाद वह मनुष्य का रूप धारण कर उसके घर आया और उसे मायके ले जाने का आग्रह किया। विदा करते समय उसने बहन को बहुमूल्य आभूषण और धन दिया।

जब उन आभूषणों की चर्चा राजा तक पहुँची, तो रानी ने उसका एक हार पहन लिया। किंतु वह हार सर्प में परिवर्तित हो गया। बाद में छोटी बहू ने बताया कि यह हार केवल उसके लिए ही उपयुक्त है। सत्य जानकर राजा ने उसे सम्मानपूर्वक विदा किया। जिस दिन छोटी बहू ने नाग की रक्षा की थी, वह सावन कृष्ण पक्ष की पंचमी थी। तभी से नागपंचमी का पर्व मनाया जाने लगा।

3. नागपूजन से प्राप्त हुआ संतान सुख

एक राजा के सात पुत्र थे। छह पुत्रों के यहाँ संतान थी, किंतु सबसे छोटे पुत्र के यहाँ संतान नहीं थी। इस कारण उसकी पत्नी अत्यंत दुःखी रहती थी।

एक बार श्रावण मास की पंचमी की रात्रि में उसने स्वप्न देखा कि पाँच नाग उसके सामने प्रकट हुए हैं। उनमें से एक नाग ने कहा—

"पुत्री! संतान के लिए दुःखी मत हो। हमारी श्रद्धापूर्वक पूजा करो, तुम्हें संतान-सुख की प्राप्ति होगी।"

प्रातः उसने यह स्वप्न अपने पति को बताया। पति ने उसे स्वप्नानुसार नागपूजन करने की सलाह दी। उसने नागपंचमी का व्रत रखकर श्रद्धापूर्वक नागदेवता की पूजा की। कुछ समय बाद उसे संतान-सुख की प्राप्ति हुई। तभी से यह मान्यता प्रचलित हुई कि नागपंचमी के व्रत एवं पूजन से संतान-सुख, समृद्धि तथा पारिवारिक मंगल की प्राप्ति होती है।



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स्‍पीक एशिया का झूठ पर झूठ और रही जनता को लूट



 
युवाओं को बरगलाने वाली स्पीक एशिया ऑनलाइन पर सरकारी शिकंजा कसता जा रहा है। नई खबरों के मुताबिक सिंगापुर के यूनाइटेड ओवरसीज बैंक ने स्पीक एशिया के खातों को बंद कर दिया है। जबकि स्पीक एशिया ग्राहकों को बरगलाने मे कोई कसर नहीं छोड़ रही है, इस घटनाक्रम के बाद स्पीक एशिया ने एक बयान में कहा, ‘सिंगापुर में हमारे खातों को फ्रीज नहीं किया गया है, बल्कि हम सिर्फ कंपनी के खातों को दूसरे बैंक में ले जा रहे हैं।' कंपनी दूसरे बैंक मे खाता खोलने की बात कर रही है जबकि सिंगापुर में नया बैंक अकाउंट खोलने में छह माह से भी ज्यादा का समय लगेगा। ऐसे में किसी भी निवेशक को पैसे वापस नहीं किए जा सकते हैं।
जबकि भारत मे भी कड़ा कदम उठाते हुये रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के एजीएम आर माहेश्वरी ने साफ कर दिया है कि भारत में स्पीक एशिया को कारोबार करने या गैर बैंकिंग वित्तीय संस्था के रूप में काम करने की अनुमति नहीं दी गई है। शुक्रवार सुबह कंपनी के खाते फ्रीज किए जाने की खबर मिलते ही राजधानी के निवेशकों में खलबली मच गई।
 ग्राहकों को बरगलाने के मामले मे स्पीक एशिया जरा भी पीछे नही दिख रही है है, वह सार्वजनिक स्थानों पर झूठ पर झूठ बोले जा रही है। कंपनी ने कहा था कि आईसीआईसीआई, बाटा, एयरटेल, नेस्ले उसके ग्राहक, यह तथ्य झूठ पाए गए, भारत में तीन ऑफिस खुलने की बात कही जबकि अभी तक एक भी ऑफिस नहीं है। कई रिटेल कंपनियों के पार्टनर बनने की बात कही थी किन्तु हकीकत में ऐसा कुछ नहीं है। सिंगापुर में कारोबार करने की बात की थी किन्तु तथ्यों से मेल नहीं खाए।
स्पीक एशिया का भारत में करीब 19 लाख लोगों को डायरेक्ट एजेंट बना चुकी स्पीक-एशिया के खातों में 10 हजार करोड़ रुपए से अधिक की रकम जमा है और यह पूरा पैसा भारत से बाहर जा चुका है या जाने की प्रक्रिया में है। भारत के युवा वर्ग को इस प्रकार चालो मे फंसने से बचना चाहिए। और उद्यमिता की ओर रुख करना चाहिये।


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महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक रहस्य



भारतीय जन-मानस में यह मान्यता है कि शिव में सृजन और संहार की क्षमता है। उनकी यह भी मान्यता है कि शिव ‘आशुतोष' हैं अर्थात् जल्दी और सहज ही प्रसन्न हो जाने वाले हैं। इसी भावना को लेकर वे शिव पर जल चढ़ाते और उनकी पूजा करते हैं। परन्तु प्रश्न उठता है कि जीवन भर नित्य शिव की पूजा करते रहने पर भी तथा हर वर्ष श्रद्धापूर्वक शिवरात्रि पर जागरण, व्रत इत्यादि करने पर भी मनुष्य के पाप एवं संतान क्यों नहीं मिटते? उसे मुक्ति और जीवनमुक्ति अथवा शक्ति क्यों नहीं मिलती? उसे राज्य भाग्य का अमर वरदान क्यों नहीं प्राप्त होता? आखिर शिव को प्रसन्न करने की सहज विधि क्या है? शिवरात्रि का वास्तविक रहस्य क्या है? हम सच्ची शिवरात्रि कैसे मनाए? 'शिव' का ‘रात्रि' के साथ क्या सम्बन्ध है जबकि अन्य देवताओं की पूजा-अर्चना दिन में होती है। शिवरात्रि से जुड़े इन प्रश्नों का उत्तर इसके आध्यात्मिक रहस्य का उद्घाटन करते हैं।
Mahashivratri 2023
महारात्रि अज्ञानता और पापाचार की सूचक है ‘शिवरात्रि' फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अंतिम रात्रि (अमावस्या) से एक दिन पहले मनाई जाती है। परमपिता परमात्मा शिव का अवतरण इस लोक में कलियुग के पूर्णान्त से कुछ ही वर्ष पहले हुआ था जबकि सारी सृष्टि अज्ञान अन्धकार में थी। इसलिए 'शिव' का सम्बन्ध ‘रात्रि' से जोड़ा जाता है और परमात्मा शिव की रात्रि में पूजा को अधिक महत्व दिया जाता है। श्री नारायण तथा श्रीराम आदि देवताओं का पूजन तो दिन में होता है क्योंकि श्री नारायण और श्री राम का जन्म क्रमश: सतयुग एवं त्रेता युग में हुआ था। मन्दिरों में उन देवताओं को रात्रि में 'सुला' दिया जाता है और दिन में ही उन्हें जगाया जाता है। परन्तु परमात्मा शिव की पूजा के लिए तो भक्त लोग स्वयं भी रात्रि को जागरण करते हैं।
आज पूर्व लिखित रहस्य को न जानने के कारण कई लोग कहते हैं कि 'शिव' तमोगुण के अधिष्ठाता (आधार) है इसलिए शिव की पूजा रात्रि को होती है और इसकी याद में शिवरात्रि मनाई जाती है। क्योंकि 'रात्रि' तमोगुण की प्रतिनिधि है परन्तु उनकी यह मान्यता बिल्कुल गलत है क्योंकि वास्तव में शिव तमोगुण के अधिष्ठाता नहीं है बल्कि तमोगुण के संहारक अथवा नाशक है। यदि शिव तमोगुण के अधिष्ठाता होते तो उन्हें शिव अर्थात कल्याणकारी, पापकटेश्वर एवं मुक्तेश्वर आदि कहना ही निरर्थक हो जाता। 'शिव' का अर्थ है- 'कल्याणकारी।' शिव का कर्तव्य आत्माओं का कल्याण करना है जबकि तमोगुण का अर्थ अकल्याणकारी होता है। यह पाप वर्धक एवं मुक्ति में बाधक है। अत: वास्तव में 'शिवरात्रि' इसलिए मनाई जाती है क्योंकि परमात्मा शिव ने कल्प के अंत में अवतरित होकर अज्ञानता, दु:ख और अशांति को समाप्त किया था।
Mahashivratri 2023
महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व महाशिवरात्रि के बारे में एक मान्यता तो यह भी है कि इस रात्रि को परमपिता परमात्मा शिव ने महासंहार कराया था और दूसरी मान्यता यह है कि इसी रात्रि को अकेले ईश्वर ने अम्बा इत्यादि शक्तियों से सम्पन्न होकर रचना का कार्य प्रारम्भ किया था। परन्तु प्रश्न उठता है कि शिव तो ज्योर्तिलिंगम् और अशरीरी हैं। वह संहार कैसे और किस द्वारा कराते हैं और नई दुनिया स्थापना की स्पष्ट रूपरेखा क्या है?
ज्योतिस्वरूप परमपिता परमात्मा शिव प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा सतयुगी सतोप्रधान सृष्टि की स्थापना और शंकर द्वारा कलियुगी तमोप्रधान सृष्टि का महाविनाश करते हैं। कलियुग के अन्त में ब्रह्मा के तन में प्रवेश करके उसके मुख द्वारा ज्ञान-गंगा बहाते हैं। इसलिए शिव को 'गंगाधर' भी कहते हैं और ‘सुधाकर' अर्थात् 'अमृत देने वाला' भी कहते हैं। प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा जो भारत-माताएं और कन्याएं ‘गंगाधर' शिव की ज्ञान-गंगा में स्नान करती अथवा ज्ञान सुधा (अमृत) का पान करती हैं, वे ही शिव-शक्तियां अथवा अम्बा, सरस्वती इत्यादि नामों से विख्यात होती हैं। ये चैतन्य ज्ञान-गंगाएं अथवा ब्रह्मा की मानस पुत्रियां ही शिव का आदेश पाकर भारत के जन-मन को शिव-ज्ञान द्वारा पावन करती हैं इसलिए शिव 'नारीश्वर' और 'पतित-पावन' अथवा 'पाप-कटेश्वर' भी कहलाते हैं क्योंकि मनुष्यात्माओं को शक्ति-रूपा नारियों अथवा माताओं द्वारा ज्ञान देकर पावन करते हैं तथा उनके विकारों रूपी हलाहल को पीकर उनका कल्याण करते हैं और उन्हें सहज ही मुक्ति तथा जीवन मुक्ति का वरदान देते हैं। वे सभी मनुष्यात्माओं को शरीर से मुक्त करके शिवलोक को ले जाते हैं। इसलिए वे मुक्तेश्वर भी कहलाते हैं। परन्तु ये दोनों कार्य कलियुग के अन्त में अज्ञान रूपी रात्रि के समय शिव के द्वारा ही सम्पन्न होते हैं।
Mahashivratri 2023

इसलिए स्पष्ट है कि ‘शिवरात्रि' एक अत्यन्त महत्वपूर्ण वृत्तांत का स्मरणोत्सव है। यह सारी सृष्टि की समस्त मनुष्यात्माओं के पारलौकिक परमपिता परमात्मा के दिव्य जन्म का दिन है और सभी की मुक्ति और जीवन मुक्ति रूपी सर्वश्रेष्ठ प्राप्ति की याद दिलाती है। इस कारण से शिवरात्रि सभी जन्मोत्सवों अथवा जयन्तियों की भेंट में सर्वोत्कृष्ट है क्योंकि अन्य सभी जन्मोत्सव तो मनुष्य आत्माओंअथवा देवताओं के जन्म दिन की याद में मनाये जाते हैं जबकि शिवरात्रि मनुष्य को देवता बनाने वाले, देवों के भी देव, धर्म पिताओं के भी पिता, सद्गति दाता, परम प्रिय, परमपिता परमात्मा के दिव्य और परम कल्याणकारी जन्म का स्मरणोत्सव है। इसे सारी सृष्टि के सभी मनुष्यों को बड़े उत्साह से मनाना चाहिए परन्तु आज मनुष्य आत्माओं को परमपिता परमात्मा का यथार्थ परिचय न होने के कारण अथवा परमात्मा शिव को नाम-रूप से न्यारा मानने के कारण शिव जयन्ति का महात्म्य बहुत कम हो गया है और लोग धर्म के नाम पर ईर्ष्या और लड़ाई करते हैं।
Mahashivratri 2023
सच्ची शिवरात्रि मनाने की रीति भक्त लोग शिवरात्रि के दिन होने वाले उत्सव पर सारी रात्रि जागरण करते हैं और यह सोचकर कि खाना खाने से आलस्य, निद्रा और मादकता का अनुभव होने लगता है, वे अन्न भी नहीं खाते हैं ताकि उनके उपवास से भगवान शिव प्रसन्न हों परन्तु मनुष्यात्माओं को तमोगुण में सुलाने वाली और रुलाने वाली मादकता तो पांच विकार हैं। जब तक मनुष्य इन विकारों का त्याग नहीं करता तब तक उसकी आत्मा का पूर्ण जागरण हो ही नहीं सकता और तब तक आशुतोष भगवान शिव भी उन पर प्रसन्न नहीं हो सकते हैं क्योंकि भगवान शिव तो स्वयं ‘कामारि' (काम के शत्रु) हैं, वे भला 'कामी' मनुष्य पर कैसे प्रसन्न हो सकते हैं? दूसरी बात यह है कि फाल्गुन के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी रात्रि को मनाया जाने वाला शिवरात्रि महोत्सव तो कलयुग के अंत के उन वर्षों का प्रतीक है, जिसमें भगवान शिव ने मनुष्यों को ज्ञान द्वारा पावन करके कल्याण का पात्र बनाया था। अत: शिवरात्रि का व्रत सारे वर्ष मनाना चाहिए क्योंकि वर्तमान संगमयुग में परमात्मा का अवतरण हो चुका है। इस कलियुगी सृष्टि के महाविनाश की सामग्री एटम, हाइड्रोजन, परमाणु बमों के रूप में तैयार हो चुकी है व परम प्रिय परमात्मा द्वारा विश्व नव-निर्माण का कर्तव्य भी सम्पन्न हो रहा है। अब महाविनाश के समय तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें ताकि मनोविकारों पर ज्ञान-योग द्वारा विजय प्राप्त कर सकें। यही महा व्रत है जो कि 'शिवव्रत' के नाम से प्रसिद्ध है और यही वास्तव में शिव का मन्त्र (मत) है जो कि 'तारक-मन्त्र' के नाम से प्रसिद्ध है क्योंकि इसी व्रत से अथवा मन्त्र से मनुष्यात्माएं इस संसार रूपी विषय सागर से तैर कर, मुक्त होकर शिवलोक को चली जाती हैं। इस वर्ष परमात्मा शिव को इस सृष्टि पर अवतरित हुए 81 वर्ष हो रहे हैं। परमात्मा शिव ईश्वरीय ज्ञान और राजयोग की शिक्षा से सर्व मनुष्यात्माओं को पावन बना रहे हैं। आप भी परमात्मा के साथ सच्ची शिवरात्रि मनाकर जन्मजन्मान्तर के लिए श्रेष्ठ भाग्य प्राप्त कर सकते हैं।


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