काबा और भगवान शिव
'काबा' अरब का प्राचीन मंदिर है, जो मक्का नगर में स्थित है। विक्रम की प्रथम शताब्दी के आरम्भ में रोम के इतिहासकार 'द्यौद्रस् सलस्' ने लिखा है— "यहाँ इस देश में एक मंदिर है, जो अरबों के लिए अत्यंत पूजनीय है।"
इस कथन से इस बात को बल मिलता है कि काबा और भगवान शिव का कोई-न-कोई प्राचीन जुड़ाव अवश्य रहा होगा। पूरा विश्व आज काबा के सत्य को जानने के लिए उत्सुक है, किंतु वर्तमान परिदृश्य में काबा में गैर-इस्लामिक अथवा गैर-मुस्लिम व्यक्तियों का प्रवेश प्रतिबंधित है। इस कारण काबा के भीतर क्या है तथा उसके इतिहास और वास्तविक स्वरूप से संबंधित अनेक तथ्यों का आज तक पूर्ण रूप से खुलासा नहीं हो पाया है।
क्या मक्का पहले मक्केश्वर महादेव शिवलिंग था
मक्का मदीना का सच
Makkeshwar Shivling मक्केश्वर शिवलिंग Makka Madina Shivling
इस्लामिक मान्यता से इतर काबा शरीफ का इतिहास
संपूर्ण विश्व ही नहीं, भारत के लोगों को भी यह स्वीकार करना चाहिए कि इतिहास के विभिन्न कालखंडों में अनेक धार्मिक संघर्ष हुए, जिनके परिणामस्वरूप कई मंदिरों, पूजा-स्थलों तथा अन्य धार्मिक संरचनाओं को क्षति पहुँची या उनका स्वरूप परिवर्तित हुआ। मक्का और काबा के इतिहास के संबंध में भी समय-समय पर अनेक मत प्रस्तुत किए जाते रहे हैं। तक्षशिला विश्वविद्यालय और सोमनाथ मंदिर जैसे ऐतिहासिक स्थलों के विध्वंस के उदाहरणों को देखते हुए कुछ लोग यह प्रश्न उठाते हैं कि मक्का और काबा के प्राचीन स्वरूप के साथ इतिहास में क्या हुआ होगा। किंतु इस विषय में बिना पर्याप्त अध्ययन और प्रमाण के कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।
कुछ लेखकों और शोधकर्ताओं ने यह मत व्यक्त किया है कि इस्लाम के उदय से पूर्व अरब में अनेक प्रकार की धार्मिक मान्यताएँ प्रचलित थीं तथा वहाँ विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा होती थी। उनके अनुसार मुहम्मद साहब और प्रारम्भिक मुस्लिम अभियानों के बाद मक्का और मदीना के आसपास का धार्मिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य व्यापक रूप से परिवर्तित हो गया।
कुछ वैकल्पिक इतिहासकारों, विशेषकर पी. एन. ओक ने यह दावा किया है कि मक्का का काबा मूलतः मक्केश्वर महादेव का मंदिर था तथा हजरे अस्वद (संगे अस्वद) वास्तव में एक प्राचीन शिवलिंग का अवशेष है। उनके अनुसार मुसलमानों का प्रमुख तीर्थस्थल मक्का प्राचीन काल में एक शिव मंदिर था, जहाँ काले पत्थर के रूप में एक विशाल शिवलिंग स्थापित था, जो बाद में खंडित अवस्था में भी विद्यमान रहा। उनके मतानुसार हज यात्रा के दौरान जिस संगे अस्वद (संग अर्थात पत्थर, अस्वद अर्थात काला) का सम्मान और स्पर्श किया जाता है, वह उसी परंपरा का अवशेष है।
काबा में शिव और मक्का-मदीना का रहस्य
द्वारिका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का मत था कि मक्का में कभी मक्केश्वर महादेव का मंदिर था। उनके अनुसार पैगम्बर मुहम्मद के समय से पूर्व अरब में शैव परंपराओं का प्रभाव विद्यमान था। यह भी कहा जाता है कि अरब में मुहम्मद से पूर्व शिवलिंग को 'लात' कहा जाता था।
कुछ विद्वानों का मत है कि मक्का के काबा में स्थित जिस काले पत्थर की पूजा की जाती है, उसका उल्लेख भविष्य पुराण में मक्केश्वर के रूप में हुआ है। यह भी दावा किया जाता है कि इस्लाम के प्रसार से पूर्व उस क्षेत्र के कुछ समुदाय उसकी पूजा करते थे।
इराक और सीरिया में सुबी नामक एक जाति अथवा समुदाय का उल्लेख मिलता है, जिन्हें कुछ लोग साबिईन से जोड़ते हैं। अरब के लोग इन्हें बहुदेववादी मानते थे। कुछ परंपराओं के अनुसार साबिईन समुदाय को नूह (हज़रत नूह) की कौम से भी जोड़ा जाता है।
यह भी कहा जाता है कि प्राचीन काल में भारतीय मूल के लोग बड़ी संख्या में यमन क्षेत्र में बसे हुए थे, जहाँ आज भी श्याम और हिन्द नामक किलों का उल्लेख मिलता है। कुछ लेखकों के अनुसार सऊदी अरब के मक्का स्थित काबा में प्राचीन काल में 'मुक्तेश्वर' नामक शिवलिंग था, जिसे बाद में 'मक्केश्वर' कहा जाने लगा।

अरब के मक्का नामक स्थान पर स्थित है 'मक्केश्वर लिंग' (मक्केश्वर महादेव)
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| मक्का के गेट पर साफ-साफ लिखा था कि काफिरों का अंदर जाना गैर-कानूनी है। कहा जा रहा है अब इस बोर्ड को उतार दिया गया है और लिख दिया है नॉन-मुस्लिम्स का अंदर जाना माना है। इसका मतलब है कि ईसाई, जैनी या बौद्ध धर्म को भी मानने वाले इसके अंदर नहीं जा सकते हैं। |
मक्का-मदीना और काबा के संबंध में प्रचलित मत
मक्का के प्रवेश मार्ग पर पहले ऐसे संकेत-पट्ट लगाए जाते थे, जिनमें यह स्पष्ट किया जाता था कि गैर-मुसलमानों का प्रवेश निषिद्ध है। वर्तमान समय में भी मक्का नगर में केवल मुसलमानों को प्रवेश की अनुमति है। इस कारण अन्य धर्मों—जैसे हिन्दू, जैन, बौद्ध, ईसाई आदि—के अनुयायी वहाँ प्रवेश नहीं कर सकते।
कुछ लेखकों और वैकल्पिक इतिहास के समर्थकों का मत है कि मक्का-मदीना तथा काबा के इतिहास से जुड़े अनेक तथ्य अभी भी पूर्ण रूप से प्रकाश में नहीं आए हैं। उनके अनुसार इस्लाम-पूर्व अरब में विभिन्न प्रकार की मूर्तिपूजक परंपराएँ प्रचलित थीं और काबा में अनेक मूर्तियाँ स्थापित थीं।
ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, पैगम्बर मुहम्मद द्वारा मक्का विजय के बाद काबा में स्थापित मूर्तियों को हटाया गया। अनेक स्रोतों में उल्लेख मिलता है कि काबा में लगभग 360 मूर्तियाँ थीं, जिन्हें नष्ट कर दिया गया और केवल काला पत्थर (हजरे अस्वद) सुरक्षित रखा गया। आज भी मुस्लिम श्रद्धालु हज और उमरा के दौरान हजरे अस्वद के प्रति विशेष श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
कुछ वैकल्पिक मतों के अनुसार यह काला पत्थर किसी प्राचीन शैव परंपरा अथवा शिवलिंग से संबंधित हो सकता है, किंतु इस दावे के समर्थन में मुख्यधारा के इतिहासकारों द्वारा स्वीकार किए गए निर्णायक ऐतिहासिक या पुरातात्त्विक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए इसे स्थापित ऐतिहासिक तथ्य के बजाय एक मत या परिकल्पना के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
ऐतिहासिक स्रोतों में यह भी उल्लेख मिलता है कि इस्लाम-पूर्व अरब में अल-लात, अल-उज्जा और मनात नामक देवियों की पूजा होती थी। इस्लाम के उदय के पश्चात इन पूजा-परंपराओं का क्रमशः लोप हो गया और उनके मंदिर भी समाप्त हो गए।
कुछ लेखक यह भी इंगित करते हैं कि हिन्दू धार्मिक परंपराओं और हज यात्रा की कुछ बाहरी विधियों—जैसे बिना सिले वस्त्र धारण करना—में समानताएँ दिखाई देती हैं। उदाहरणस्वरूप, हज के दौरान पुरुष श्रद्धालु एहराम नामक बिना सिले श्वेत वस्त्र धारण करते हैं, जबकि हिन्दू धर्म में भी अनेक धार्मिक अनुष्ठानों एवं तीर्थयात्राओं के समय बिना सिले वस्त्र धारण करने की परंपरा मिलती है। हालाँकि, ऐसी समानताएँ अपने-आप में किसी प्रत्यक्ष ऐतिहासिक संबंध का प्रमाण नहीं मानी जातीं।
इस प्रकार मक्का, मदीना और काबा के प्राचीन इतिहास के संबंध में अनेक मत और धारणाएँ प्रचलित हैं, जिन पर शोध और विमर्श आज भी जारी है।
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मक्का-मदीना का सचजिस प्रकार हिन्दू धर्म में गंगाजल को अत्यंत पवित्र माना जाता है, उसी प्रकार इस्लाम धर्म में आबे-जमजम (ज़मज़म का जल) को पवित्र एवं बरकत वाला माना जाता है। जैसे हिन्दू गंगा-स्नान के पश्चात गंगाजल अपने घर ले जाते हैं, उसी प्रकार मुस्लिम श्रद्धालु हज या उमरा के दौरान आबे-जमजम का जल अपने साथ घर लाते हैं। इस आधार पर कुछ लोग दोनों परंपराओं में समानता देखते हैं। मक्का-मदीना का इतिहास और वैकल्पिक मतकुछ वैकल्पिक इतिहासकारों का मत है कि इस्लाम के उदय से पूर्व मक्का और उसके आसपास के क्षेत्रों में मूर्तिपूजा प्रचलित थी तथा वहाँ विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा की जाती थी। इसी संदर्भ में स्वर्गीय पी. एन. ओक ने अपनी पुस्तक ‘वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास’ में यह मत व्यक्त किया है कि मक्का और उसके आसपास के क्षेत्र में इस्लाम के आगमन से पूर्व हिन्दू परंपराओं से मिलती-जुलती धार्मिक मान्यताएँ विद्यमान थीं। उन्होंने यह दावा भी किया कि काबा में स्थित काला पत्थर किसी प्राचीन शैव परंपरा से संबंधित हो सकता है तथा काबा का संबंध भगवान शिव से रहा होगा। उनके अनुसार पैगम्बर मुहम्मद के समय मक्का में स्थापित अनेक मूर्तियों को हटाया गया था। कुछ विद्वान यह भी तर्क देते हैं कि प्राचीन काल में यूनान, भारत तथा मध्य-पूर्व की सभ्यताओं के बीच सांस्कृतिक संपर्क रहे होंगे, जिसके कारण कुछ धार्मिक प्रतीकों एवं परंपराओं में समानताएँ दिखाई देती हैं। इसी आधार पर कुछ लोग काबा में पूर्वकाल में मूर्तिपूजा होने की संभावना व्यक्त करते हैं। हज करने वाले श्रद्धालु काबा के पूर्वी कोने में स्थापित हजरे अस्वद (काला पत्थर) के दर्शन को पवित्र मानते हैं। वैकल्पिक मत रखने वाले कुछ लेखक इसे प्राचीन शिवलिंग से जोड़ते हैं, जबकि मुख्यधारा के इतिहासकार इस मत को प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में स्वीकार नहीं करते। काबा के अंदर क्या है?काबा एक घनाकार संरचना है, जिसके भीतर एक साधारण कक्ष है। सामान्यतः इसका आंतरिक भाग आम लोगों के लिए खुला नहीं रहता। समय-समय पर विशेष अवसरों पर इसकी सफाई और रखरखाव किया जाता है। काबा के आंतरिक स्वरूप, इतिहास और इस्लाम-पूर्व काल से संबंधित विषयों पर विभिन्न मत और धारणाएँ प्रचलित हैं, जिन पर आज भी शोध और विमर्श जारी है। काबा और भगवान शिवकाबा और भगवान शिव के संबंध में विभिन्न लेखकों और शोधकर्ताओं द्वारा अनेक दावे किए गए हैं। कुछ लोग काबा को ‘मक्केश्वर महादेव’ से जोड़ते हैं, जबकि अन्य इतिहासकार इन दावों को पर्याप्त ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक प्रमाणों के अभाव में स्वीकार नहीं करते। अतः इस विषय को स्थापित इतिहास की अपेक्षा एक वैकल्पिक ऐतिहासिक मत के रूप में देखा जाना चाहिए। मक्का शिव मंदिरकुछ लेखकों द्वारा यह दावा किया जाता है कि मक्का में कभी एक प्राचीन शिव मंदिर था, जिसे बाद में काबा के रूप में जाना जाने लगा। यह मत मुख्यतः वैकल्पिक इतिहास पर आधारित है और इसे लेकर इतिहासकारों एवं शोधकर्ताओं के बीच व्यापक मतभेद विद्यमान हैं। इसलिए इस प्रकार के दावों को अंतिम ऐतिहासिक सत्य के रूप में नहीं, बल्कि एक विचारधारा या शोधपरक मत के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। |

काबा और पवित्र गंगा संबंधी मान्यता
एक प्रसिद्ध मान्यता के अनुसार काबा में "पवित्र गंगा" की अवधारणा विद्यमान है। कहा जाता है कि इसका संबंध महापंडित रावण से है। रावण भगवान शिव का परम भक्त था। वह शिव के साथ गंगा और चंद्रमा के महात्म्य को भी समझता था तथा यह मानता था कि शिव और गंगा का संबंध अविभाज्य है। जहाँ शिव की उपासना होगी, वहाँ किसी-न-किसी रूप में पवित्र गंगा की अवधारणा भी अवश्य विद्यमान होगी।
काबा के निकट भी एक पवित्र जलस्रोत स्थित है, जिसका जल अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस जलस्रोत को आबे ज़मज़म कहा जाता है। मान्यता है कि इस्लाम-पूर्व काल में भी इसका जल पवित्र माना जाता था।
पौराणिक कथा के अनुसार रावण की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे एक शिवलिंग प्रदान किया और उसे लंका में स्थापित करने का निर्देश दिया। कहा जाता है कि जब रावण उस शिवलिंग को लेकर आकाश मार्ग से लंका जा रहा था, तब मार्ग में ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं कि उसे शिवलिंग को कुछ समय के लिए भूमि पर रखना पड़ा। बाद में उसने उसे पुनः उठाने का प्रयास किया, किंतु बहुत प्रयास करने पर भी वह शिवलिंग अपने स्थान से नहीं हिला।
वेंकटेश पंडित के अनुसार यह स्थान वर्तमान सऊदी अरब के मक्का क्षेत्र में स्थित था। इस मत के समर्थक यह भी उल्लेख करते हैं कि सऊदी अरब के निकट यमन नामक क्षेत्र है, जिसका उल्लेख भारतीय परंपराओं और पुराणों में विभिन्न संदर्भों में मिलता है। कुछ लेखक इसे श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित कालयवन प्रसंग से भी जोड़ने का प्रयास करते हैं।
हालाँकि, यह उल्लेखनीय है कि उपर्युक्त विवरण मुख्यतः परंपरागत मान्यताओं, वैकल्पिक व्याख्याओं और कुछ लेखकों के मतों पर आधारित हैं। इनके समर्थन में मुख्यधारा के इतिहासकारों द्वारा सर्वमान्य ऐतिहासिक या पुरातात्त्विक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। अतः इन्हें स्थापित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि एक मान्यता अथवा वैकल्पिक दृष्टिकोण के रूप में देखा जाना चाहिए।
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| मक्का मदीना की फोटो जिसमें मक्केश्वर महादेव है |
राजा भोज और मक्केश्वर महादेव
कुछ परंपराओं एवं वैकल्पिक ऐतिहासिक मतों के अनुसार राजा भोज ने मक्का जाकर वहाँ स्थित मक्केश्वर महादेव का पूजन किया था। इस संदर्भ में भविष्य पुराण में निम्नलिखित श्लोक उद्धृत किए जाते हैं—
नृपश्चैव महादेवं मरुस्थल-निवासिनम्।
गंगाजलैश्च संस्नाप्य पञ्चगव्य-समन्वितैः॥
चन्दनादिभिरभ्यर्च्य तुष्टाव मनसा हरम्।
इति श्रुत्वा स्वयं देवः शब्दमाह नृपाय तम्॥
गन्तव्यं भोजराजेन महाकालेश्वरस्थले॥
इन श्लोकों के आधार पर कुछ लेखक यह मत व्यक्त करते हैं कि मरुस्थल में स्थित किसी शिवलिंग अथवा शिव-मंदिर का संबंध मक्का क्षेत्र से रहा होगा। उनके अनुसार राजा भोज ने वहाँ जाकर गंगाजल तथा पंचगव्य से भगवान शिव का अभिषेक किया था।
चित्रों की प्रमाणिकता एवं शिवलिंग-मक्का संबंधी दावे
मक्का, काबा और शिवलिंग के संबंध में अनेक चित्र, लेख तथा दावे समय-समय पर प्रस्तुत किए जाते रहे हैं। इन चित्रों और दावों की प्रमाणिकता को लेकर विद्वानों एवं इतिहासकारों में मतभेद हैं। कुछ लेखक इन्हें प्राचीन शैव परंपरा के प्रमाण के रूप में देखते हैं, जबकि मुख्यधारा के इतिहासकार इन दावों के समर्थन में पर्याप्त ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक साक्ष्य उपलब्ध न होने की बात कहते हैं।
मक्का स्थित प्रचीन शिव लिंग
मक्का की आन्तरिक संरचना और भगवान शिव लिंग
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