जीवन परिचय (Biography)
घनानंद रीतिकाल की रीतिमुक्त स्वच्छंद काव्यधारा के सुप्रसिद्ध कवि हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के मतानुसार इनका जन्म संवत् 1746 में दिल्ली में हुआ था और संवत् 1817 में वृंदावन में इनका देहावसान हुआ। ये दिल्ली के रहने वाले एक कायस्थ थे तथा सम्राट मुहम्मद शाह के मीर मुंशी थे।
महाकवि घनानंद के विभिन्न नामों के प्रति विद्वानों में मतैक्य नहीं है। ये नाम निम्नलिखित हैं— घनानंद, आनंदघन, आनंद के घन, आनंदनिधान तथा आनंद। ये तीनों एक ही व्यक्ति के नाम हैं अथवा अलग-अलग व्यक्तियों के, यह प्रश्न विवादास्पद है। 'आनंदनिधान' नाम के लिए निम्नलिखित उदाहरण प्रस्तुत है—
वहै मुसक्यानि, वहै मृदु बतरानि, वहै,
लड़कीली बानि उर ते अरति है।
वहै गति लैन, औ बजावनि ललित बैन,
वहै छैलताई न छिनक बिसरति है।
आनंदनिधान प्रान-प्रीतम सुजान जू की,
सुधि सब भाँतिन सो बेसुधि करती है।।
घनानंद के समय को लेकर भी विवाद है। शिवसिंह सरोज के रचयिता शिवसिंह सेंगर के मत से घनानंद का समय संवत् 1617 है। वे 'आनंदघन' नाम को मानकर यह समय निर्धारित करते हैं। जनश्रुति एवं विद्वानों के आधार पर यह कहा जाता है कि घनानंद जी का जन्म संवत् 1746 के आसपास हुआ था। कतिपय विद्वान इनका जन्म संवत् 1715, 1630 तथा 1683 मानते हैं। आज इनका जन्म संवत् 1746 सप्रमाण स्वीकार किया गया है। अन्य तीनों जन्म-संवत् संदिग्ध माने जाते हैं।
आपका जन्म-स्थान दिल्ली अथवा उसके आसपास माना जाता है। अधिकांश विद्वान इसी मत के समर्थक हैं। कुछ विद्वान इनके जन्म-स्थान को वृंदावन एवं बुलंदशहर के निकट का क्षेत्र मानते हैं। आपका जन्म भटनागर कायस्थ परिवार में हुआ। आपकी शिक्षा का प्रारंभ फारसी भाषा से हुआ था। बचपन से ही आपकी रुचि विद्याध्ययन की ओर विशेष थी।
जनश्रुति के आधार पर आप अबुल फ़ज़ल के शिष्य माने जाते हैं। इन्होंने अपनी असाधारण प्रतिभा एवं बुद्धिमत्ता के बल पर शीघ्र ही फारसी का अच्छा ज्ञान अर्जित कर लिया था। इसके बाद आप सम्राट मुहम्मद शाह 'रंगीले' के मीर मुंशी पद पर नियुक्त हो गए। आपने अपनी आकर्षक बुद्धि एवं प्रतिभा-संपन्नता के कारण शीघ्र ही उन्नति प्राप्त कर ली और धीरे-धीरे सम्राट के 'खास कलम', अर्थात् प्राइवेट सेक्रेटरी, बन गए।
घनानंद की मृत्यु के संबंध में विद्वानों के दो मत हैं। प्रथम मत के अनुसार नादिर शाह के आक्रमण के समय मथुरा में सैनिकों द्वारा घनानंद की मृत्यु हुई; किंतु इस मत का खंडन इस आधार पर हो जाता है कि नादिर शाह द्वारा किया गया कत्लेआम दिल्ली में हुआ था, मथुरा में नहीं। दूसरे, इस आक्रमण और घनानंद की मृत्यु के समय में भी अंतर है।
द्वितीय मत अब अधिक मान्य है। इसके अनुसार संवत् 1817 (लगभग 1760 ई.) में अहमद शाह दुर्रानी ने जब दूसरी बार मथुरा में कत्लेआम किया, उसी दौरान घनानंद की मृत्यु हुई।
नोट: मूल पाठ में "अब्दुल शाह दुर्रानी" तथा "सन् 1660 ई." मुद्रित है, जबकि ऐतिहासिक रूप से प्रचलित नाम अहमद शाह दुर्रानी तथा समय 1760 ई. के आसपास माना जाता है। यदि आप केवल भाषिक शुद्धि चाहते हैं तो मूल रूप भी रखा जा सकता है।
घनानंद का वियोग-वर्णन
संयोग और वियोग प्रेम के दो छोर हैं। सच्चा प्रेमी इनके बीच अपने को पाता है। कभी वह संयोग-सुख में अपनी अनुभूति को तरोताज़ा करता है, तो कभी वियोग में अपने प्रेम की परीक्षा के दौर से गुजरता है। इसीलिए वियोग को प्रेम की कसौटी कहा गया है। जो प्रेमी इस कसौटी पर खरा उतरता है, वही सच्चा प्रेमी माना जाता है। प्रेम की सात्त्विकता और सघनता विरह में ही दिखाई देती है, जबकि संयोग प्रेम का सुखद रूप है। संयोग से प्रेमी वासना का शिकार बना रहता है, जबकि वियोग में वह वासना से ऊपर उठकर मानसिक स्थिति को प्राप्त कर लेता है। वियोग ही प्रेमी की दृढ़ता का परिचायक होता है। वियोग ही उसकी निष्ठा एवं उत्कंठा का द्योतक होता है और वियोग ही एक प्रेमी की प्रिय के प्रति उत्कट चाह, तीव्र आकांक्षा, सुदृढ़ लालसा एवं उद्दाम आकुलता का अनुभावक होता है। घनानंद भी ऐसे ही वियोगी कवि हैं, जिनके हृदय में अपनी प्रेमिका 'सुजान' की उत्कट विरह-भावना भरी हुई है।
रीतिकालीन काव्य में बिना वियोग-श्रृंगार के संयोग का न तो पूर्ण रूपेण आस्वाद ही प्राप्त होता है और न उसके मूल्यों का अंकन किया जा सकता है। प्रेम की आध्यात्मिक परिणति वियोग-श्रृंगार द्वारा ही संभव है। विरह को काव्य की कसौटी माना जाता है। विरह एक ऐसा साधन है, जिसके द्वारा मन शुद्ध हो जाता है, उसमें से शारीरिक वासनात्मकता समाप्त हो जाती है। प्रेम के मन से स्वार्थ-भावना नष्ट हो जाती है। वियोगी कवि की भावना पहाड़ी जलप्रपात की तरह बह निकलती है और वही काव्य का रूप धारण कर पाठक के हृदय को स्पर्श कर उसे प्रेम की रसानुभूति कराती है।
संयोग की मधुर स्मृतियाँ वियोगी के लिए बेचैन करती रहती हैं। घनानंद का वियोग उनके हृदय की पीड़ा का प्रतिफल है। उसमें पाठक के हृदय को स्पर्श करने की शक्ति है। वह अपनी सुध-बुध खो देता है। जब पाठक घनानंद का काव्य पढ़ता है, तब उसकी इतनी विशाल हृदय-बोधक रसानुभूति कराने की क्षमता का अनुभव होता है। अपनी प्रेयसी की सुधि में घनानंद स्वयं तो खो गए, परंतु साथ में पाठक को भी विरह की अनन्तोदधि में डुबो दिया। विरह के रस में डूबने का मज़ा तो घनानंद के साथ ही मिलता है।
घनानंद के काव्य में विरह की भी कोई एक दशा नहीं है। वियोगी प्रेमी सोते, उठते-बैठते और हर समय अपनी प्रेयसी को पुकार उठता है। वही बातें, जो हृदय में उमड़ती-घुमड़ती रहती हैं, उनको प्रत्यक्ष रूप से अभिव्यक्त करने का अवसर जागते हुए नहीं मिलता, तो उसके सोते समय 'स्वप्न' में चित्र-सा गतिमान होने लगता है। घनानंद लिखते हैं कि चलो, इस बहाने मन ही बहला लें कि—
जगि सोवनि में लगिये रहे,
चाह वहै गरराय उठै रतियाँ।
भरि अंक निःसंक हियै भेटन कौं,
अभिलाष अनेक भरी छतियाँ।।
सलोनी स्याम-मूरति फिरै आगे,
कटाछैं बान से उर आन-आन लागे।।
मुकुट को लटक हिय में आय हालै,
चितवानी बंक जियरा बीच सालै।।
घनानंद के काव्य में विरह असीम हो गया है। इस दशा में विरहिणी कैसे अपने प्रियतम को पत्र लिख सकती है? ऐसी विरहिणी तो है नहीं, जो आँसुओं की स्याही में डुबो-डुबोकर पत्र लिख डाले। वह अपनी विवशता प्रकट करती है कि—
लिखै कैसे पियारे प्रेम-पाती,
लगै अँसुअन भरी हिय हूंक छाती।।
विरहिणी नायिका सोचती है कि इससे तो अच्छा होता कि नायक गुणवान न होता। कम-से-कम विरहाग्नि में वह उसे इस प्रकार याद आकर उसके हृदय को नोचता तो नहीं। पर क्या करे, उसे याद आ ही जाती है अपने—
"रावरे रूप की मोहिनी सूरत"
उसके आकर्षण का कारण भी तो यही है।
रावरे रूप की रीति अनूप,
नयो-नयो लागत ज्यों-ज्यों निहारिये।
नायिका बेचारी अपने प्रेमी के गुणों और रूप-स्मृति में रो रही है। उसकी मुश्किल यह है कि उसके प्रेमी का रूप उसकी आँखों से ओझल नहीं होता—
छवि को सदन, मोह-मंडित बदन-चंद,
तृषनि चखन लाल! कब धौं दिखाय हो।।
विरहिणी नायिका की निस्वार्थ प्रीति का उत्कर्ष यह है कि वह एक ओर तड़प रही है अपने प्रिय के लिए, परंतु उसके मन से प्रिय के लिए दुआ ही निकलती है कि उसका प्रिय सुख और आनंद से रहे—
घनानंद जीवन-प्रान सुजान,
तिहारिये बातनि लीजिये जू।
नित नीकै रहो, चातु कहाइ,
असीस हमारियौ लीजिये जू।।
वियोग-श्रृंगार में इस प्रकार की त्याग-भावना रीतिकाल के अन्य किसी कवि में इतने उत्कट रूप से नहीं मिलती। उसे अपने प्रेमी के सम्मान का कितना ध्यान है! वह कृष्ण को ठगिया नहीं कहती और न उन्हें कुछ बुरा-भला कहती है। विरह है तो घनानंद की विरहिणी केवल आत्म-निवेदन करती है कि इतनी निष्ठुरता क्यों अपनाई है—
पहलै अपनाय सुजान सनेह सों,
क्यों फिर तेह कै तोरिये।।
घनानंद के यहाँ विरहिणी की विचित्र दशा चित्रित की गई है—
कारी कूर कोकिला! कहाँ कौ बैर काढ़ति री,
कूक-कूक अब ही करेजौ किन कोरिली।
पैंडे परे पापी ये कलापी निसि घोस ज्यों ही,
चातक घातक त्यों ही तू ही कान फोरिली।।
आनंद के घन प्रान-जीवन सुजान बिन,
जानि कै अकेली सब घेरौ दल जोरि लै।
जौलों कहै आवन विनोद बरसावन वे,
तौलों रे ठरारे वजमारे घन घोरिलै।।
रूपासक्ति की प्रधानता
प्रेम का मूलाधार रूपासक्ति ही होता है। यही बात वियोग में पीड़ा को घना कर देती है। घनानंद के उत्कट विरह का मूल कारण यह है कि उनकी 'अलबेली सुजान' अनिंद्य सुंदरी थी। उसमें उन्हें अलौकिक सौंदर्य के दर्शन हुए थे और वे उस सौंदर्य को नित्य देखते रहना चाहते थे। कारण यह था कि वह रूप नित्य नया-नया प्रतीत होता था और उस रूप पर उन्होंने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। परंतु दुर्भाग्य से वह रूप उनकी आँखों से ओझल हो गया, उन्हें फिर देखने को नहीं मिला और वे अपनी पागल रीझ (मोह-प्रेम) के हाथों बिककर रात-दिन वियोग की आग में जलते रहे—
रावरे रूप की रीति अनूप, नयो-नयो लागत ज्यौं-ज्यौं निहारियै।
त्यौं इन आँखिन बानि अनोखी, अघानि कहूँ नहि आन तिहारियै।।
एक ही जीव हुतो सु तौ वार्यो, सुजान! संकोच और सोच सहारियै।
रोकी रहे न, दहै घनानंद, बावरी रीझ के हाथनि हारियै।।
घनानंद के प्रेम में रूपलिप्सा का योग तो है, परंतु साहचर्य का उतना व्यापक वर्णन नहीं मिलता, जितना सूर के काव्य में है। कृष्ण की लीलाओं को उतना स्थान नहीं दिया गया, जितना सूर ने दिया है और न यौवनकालीन क्रीड़ाओं को ही विशेष महत्त्व दिया है। घनानंद ने कृष्ण की रूप-माधुरी का वर्णन उसी मार्मिकता, तन्मयता एवं तल्लीनता के साथ किया है, जितना अन्य कृष्ण-भक्त कवियों ने किया है, यथा—
मोर-चन्द्रिका सिर धरें, गरें गुंज की माल।
धातु-चित्र कटि पीत पट, मोहन मदन गोपाल।।
अति कामनीय किशोर बपु, गोपीनाथ उदार।
कमल-नैन क्रीड़ा-निपुण, कान्हर गोप-कुमार।।
कमल-केलि-क्रीड़ा-कुशल, कलानाथ रसवंत।
गोवर्धन-वासी सदा, गोप-कामिनी-कंत।।
लहलहाति जीवन उदय, ब्रजमोहन अंग-अंग।
महारूप-सागर उमगि, उठति अमोघ तरंग।।
इसी प्रकार राधा के रूप-सौंदर्य का भी वर्णन किया है। घनानंद की गोपियाँ कृष्ण के रूप-लावण्य पर आकर्षित हैं तथा मुरली की पावन पंचम-ध्वनि सुनते ही पुलकित हो उठती हैं। राधा का चारुतम रूप-माधुर्य भी कृष्ण को अपनी ओर आकृष्ट करता है और राधा कृष्ण के प्रति 'सैन-नैन' चलाती हैं। राधा का रूप-वर्णन करते हुए कवि कहता है—
लाजनि लपेटी चितवनि भेद-भाव भरी,
लसति ललित लोल चख तिरछानि में।
छवि को सदन, गोरो बदन, रुचिर माल,
रस निरचुरत मीठी मृदु मुसक्यान में।
दसन-दमक फैलि हियें मोती-माल होति,
पिय सों लड़कि प्रेम-पगी बतरानि में।
आनंद की निधि जगमगति छबीली बाल,
अंग-अंग अनंग-रंग ढुरि मुरजानि में।।
हृदय की मौन पुकार की अधिकता
घनानंद का विरह बौद्धिक नहीं है, वह उनके हृदय की सच्ची अनुभूति है। जहाँ विरह बौद्धिक होता है, वहाँ प्रदर्शन एवं आडंबर का आधिक्य देखा जाता है; किंतु जहाँ हृदय की अनुभूति होती है, वहाँ प्रदर्शन और आडंबर कहाँ! वहाँ तो हृदय की टीस, प्राणों की तड़पन एवं आकुलता बाहर सुनाई नहीं पड़ती, क्योंकि हृदय बोल नहीं पाता, वह मौन रहकर ही धड़कता रहता है—
अंतर-आँच उसास तचै अति, अंत उसीजै उदेग की आवस।
ज्यौं कहलाय मसोसनि ऊमस, क्यों हूँ कहूँ सुधरैं नहीं थावस।।
प्रियजन्य निष्ठुरता
घनानंद के विरह की तीव्रता एवं उत्कटता का मूल कारण यह है कि उनका प्रिय बड़ा कठोर, निर्दयी, निष्ठुर तथा विश्वासघाती है। उसे इसकी तनिक भी परवाह नहीं है। वह इनकी दुर्दशा देखकर तनिक भी नहीं पसीजता और अब उसने जान-पहचान भी मिटा डाली है। वह निष्ठुरता एवं कठोरता का व्यवहार करके अब रात-दिन जलाता रहता है—
भए अति निठुर मिटाय पहिचानि डारी,
याही दुख हमैं जक लागी हाय-हाय है।
तुम तो निपट निरदई, गई भूमि-सुधि,
हमैं सूल-सेलनि सों क्यों हूँ न भुलाय है।।
प्रेमगत विषमता
घनानंद के विरह में सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह एकांगी है, सम नहीं, अपितु विषम है। जो तड़पन, चीत्कार, जलन और धड़कन है, वह केवल एक ओर ही है। प्रेमी का हृदय अपनी प्रेयसी 'सुजान' के विरह में रात-दिन तड़पता रहता है, लेकिन प्रिय के हृदय में विरह की तनिक भी आग नहीं है। परंतु प्रेमी घनानंद को इसकी चिंता नहीं है कि उनका प्रिय उनके प्रति कैसा भाव रखता है। वे तो अपने प्रिय के अनन्य प्रेमी हैं—
चाहौ अनचाहौ जान प्यारे पै आनंदघन,
प्रीति-रीति विषम सु रोम-रोम रमी है।।
उपालम्भ की तीव्रता
घनानंद के विरह में उपालम्भ अत्यंत गूढ़ता एवं गंभीरता के साथ दृष्टिगोचर होता है। इस उपालम्भ में प्रेम की निष्ठा भी है, उत्कटता भी है और प्रिय की उदासीनता भी भरी हुई है। इसी कारण विरही स्वयं को दीन, हीन, दुखी एवं अनन्य प्रेमी कहता है तथा प्रिय को कपटी, विश्वासघाती और निर्मोही—
अति सूधो सनेह को मारग है, जहाँ नेक सयानप बाँक नहीं।
तहाँ साँचे चलै तजि आपुनपौ, झिझकै कपटी जे निसाँक नहीं।।
अंग-प्रत्यंग की आकुलता
घनानंद के विरह में आँख, कान, हृदय, प्राण आदि अंग-प्रत्यंगों की अत्यधिक आकुलता, बेचैनी एवं दयनीय स्थिति का चित्रण हुआ है। इसका कारण यह है कि विरही घनानंद के सारे शरीर में विरह का विष फैला हुआ है। अंग-प्रत्यंग में विरह की आग लगी हुई है, जिससे उनके प्राण नित्य दहकते रहते हैं। नेत्र मदमाते होकर आँसू बहाते रहते हैं—
जिनकों नित नीके निहारति ही आँखियाँ, अब रोवति हैं।
पल-पाँवड़े पायनि सों अँसुबानि की धारनि धोवति हैं।।
प्रकृतिजन्य उद्दीपन
घनानंद की विरह-वेदना को तीव्र से तीव्रतर बनाने में प्रकृति का भी अत्यधिक हाथ रहा है। कारण यह है कि प्रकृति के ये उपादान विरही पर कहर ढाने का कार्य करते हैं। कभी पुरवैया हवा चलकर, कभी बादल घिरकर, कभी बिजली चमककर, कभी पुष्प अपनी सुगंध से और कभी कोकिला कूककर विरही को रात-दिन सताते हैं—
कारी कूर कोकिल! कहाँ कौ बैर काढ़ति री,
कूकि-कूकि अबही करेजो किन कोरि ले।।
संदेश-प्रेषणीयता
घनानंद के विरह में एक सबसे बड़ी विशेषता यह भी है कि इसमें विरही अपने विरह का संदेश बड़े अनूठे ढंग से अपने प्रिय के पास भेजता है। उसने इस दूत-कार्य के लिए ऐसे धीर-गंभीर मेघ को चुना है, जो उसी की तरह विरह की आग को अपने हृदय में छिपाए हुए है, जो उसी की तरह प्रिय के वियोग में मत्त होकर घूमता रहता है, जो दूसरों के लिए ही अपना शरीर धारण किए हुए है और जो परजन्य (बादल) कहलाता है। ऐसे धीर-गंभीर सज्जन से दूत-कार्य कराना सर्वथा उचित है—
पर काजहिं देह को धारि फिरौं, परजन्य जथारथ है दरसौ।
निधि-नीर सुधा के समान करौ, सबही विधि सज्जनता सरसौ।
घनआनंद जीवन-दायक हौ, कुछ मेरीयों पीर हियै परसौ।
कबहूँ वा विसासी सुजान के आँगन मो अँसुवानि हुलै बरसौ।।
सात्त्विकता एवं आध्यात्मिकता
घनानंद के विरह की अंतिम और सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमें तनिक भी वासना की गंध नहीं है। कहीं भी अश्लीलता नहीं है, किसी भी स्थल पर कामुकता नहीं है और कोई भी उक्ति काम-परक नहीं है। यहाँ प्रत्येक पद में सात्त्विकता है, प्रत्येक पद में प्रेम की पवित्रता है, प्रत्येक छंद में प्रेम की दिव्यता है और प्रत्येक उक्ति में कामजन्य वासना से सर्वथा परे आध्यात्मिक वंदना की शुद्धता है—
लहा छेह कहाधौं मचाय रहे, ब्रजमोहन हौ उत नींद भरे हौ।
मिली होति न भेंट, दूरे उधरौ, ठहरै ठहरानि क लाभ परे हौ।।
घनानंद छाय रहौ नित हो, हित-प्यासनि चातक ज्ञात परे हौ।।
घनानंद की विरहानुभूति में शुद्ध एवं सात्त्विक विरह की व्यंजना हुई है। इसमें हृदय की गहराई अधिक है। अपनी यथार्थता, सात्त्विकता, पवित्रता एवं आध्यात्मिकता के कारण ही घनानंद की विरहानुभूति सर्वोत्कृष्ट है और अपनी इसी सात्त्विक विरह-भावना के कारण घनानंद हिन्दी के सर्वोत्कृष्ट विरही कवि हैं।
घनानंद का अनुभूति पक्ष या भावपक्ष
घनानंद के अनुभूति पक्ष अथवा भावपक्ष का सम्यक् अनुशीलन करने के लिए उनके काव्य में यह देखना आवश्यक है कि उन्होंने विविध वस्तुओं का वर्णन कैसे किया है, विविध भावों के निरूपण में कैसा कौशल दिखाया है, विविध रसों की अभिव्यंजना में कैसी दक्षता प्रकट की है और विविध सौंदर्य-चित्रों को अंकित करने में अपनी जो कला-चातुरी व्यक्त की है, उसे निम्न भागों में विभक्त किया जा सकता है—
वस्तु-वर्णन
घनानंद ने ब्रज प्रदेश के प्रति अपनी गहन आस्था एवं असीम श्रद्धा व्यक्त की है। इसी कारण उन्होंने ब्रज के गाँवों, यमुना, वृंदावन आदि का अत्यंत सजीव निरूपण किया है—
जमुना तीर गाँव राजनि,
कहा कहौं गोकुल-छवि-छाजनि।।
गोकुल-छवि आँखिन हीं भावै,
रही न सकै, रस न कछु गावै।।
इसी प्रकार ब्रज के अन्य स्थानों का वर्णन करते हुए घनानंद ने सर्वाधिक वृंदावन की मंजुल छवि का निरूपण किया है—
वृंदावन-छवि कहत न आवै,
सो कैसे कहि कोऊ गावै।।
तीर-भूमि बनि रह्यौ सदावन,
जै जमुना, जै जै वृंदावन।।
इसी प्रकार घनानंद ने ब्रज के घर, गाँव, गली, गलियारे, घाट, पनघट, गोप, ग्वाल-बाल, गाय, वृंदावन, बरसाना, गोवर्धन आदि का अत्यंत विस्तृत वर्णन किया है।
प्रकृति-चित्रण
घनानंद ने प्रकृति के अत्यंत रमणीय चित्र अंकित किए हैं। वे सच्चे प्रकृति-प्रेमी थे और प्रकृति के साथ उनका साहचर्य भी अधिक रहा था। इसलिए उन्होंने प्रकृति के अनेक सुंदर एवं सजीव चित्र अंकित किए हैं—
घुमड़ि पराग लता-तरु भोए,
मधु-ऋतु-सौंज-समोए।।
वन बसंत बरनत मन फूल्यौ,
लता-लता झूलनि संग झूल्यौ।।
प्रकृति के आलंबन-रूप की अपेक्षा घनानंद ने प्रकृति के उद्दीपन-रूप का चित्रण अधिक सरसता एवं मार्मिकता के साथ किया है, क्योंकि उनका काव्य विरह-प्रधान है और विरह में प्रकृति प्रायः विरही जनों के भावों को उद्दीप्त करती हुई दिखाई जाती है—
लहकि-लहकि आवै ज्यौं पुरवाई पौन,
दहकि-दहकि त्यौं-त्यौं तन तावरे तवै।
बहकि-बहकि जात बदरा बिलोकें हियौ,
गहकि-गहकि गहबरनि गरै मचै।
चहकि-चहकि डारै चपला चखनि चाहैं,
कैसे घनानंद सुजान बिन ज्यौं बचै।।
भाव-निरूपण
घनानंद की कविता भावों का भंडार है, क्योंकि घनानंद ने ऐसे मार्मिक भावों का चित्रण किया है कि देखते ही बनता है और एक साधारण कवि जहाँ तक पहुँच नहीं सकता। घनानंद की इस भाव-निरूपण पद्धति पर सर्वत्र उनके गहन प्रेम की छाप है। इसी कारण उनके सभी भाव-चित्र इतने मनोरंजक एवं आकर्षक बन पड़े हैं कि पाठक एवं श्रोता उन्हें पढ़कर तथा सुनकर आनंद के सागर में डुबकियाँ लगाने लगते हैं—
नैन कहैं, सुनि रे मन! कान दै, क्यों इतनी गुन मोहि दयौ है।
सुंदर प्यारे सुजान कौ मंदिर, बावरे! तू हम ही ते भयौ है।।
लोभी तिन्हें तन कों न दिखावत, ऐसो महामद छाकि गयौ है।
कीजिए जू घनानंद! आय कै पायै परौ, यह न्याय नयौ है।।
इसी प्रकार घनानंद ने उपालम्भ के द्वारा स्मृति का चित्र अंकित करते हुए आवेग, अमर्ष, उग्रता, ग्लानि आदि भावों का बड़ा ही मार्मिक निरूपण किया है—
क्यों हँसि हेरि हर्यो हियरा, अरु क्यों हित कै चित्त चाह बढ़ाई।
काहे को बोलि सुधासने बैननि, चैननि मैन-निसैन चढ़ाई।।
सो सुधि मोहिय मैं घनानंद सालति, क्यों हूँ कढ़ै न कढ़ाई।
मीत सुजान अनीति की पाटी, इतै पै न जानियै कौने पढ़ाई।।
रस-निरूपण
घनानंद ने मुख्यतः संयोग-श्रृंगार, वियोग-श्रृंगार एवं भक्ति-रस का निरूपण किया है। इनमें भी वे वियोग-श्रृंगार के ही कवि हैं, वियोग के अद्वितीय चितेरे हैं। उनके काव्य में वियोग-श्रृंगार का परिपक्व, मार्मिक एवं सजीव चित्रण मिलता है।
वे अपनी संजीवन-मूर्ति ‘सुजान’ के वियोग में रात-दिन व्यथित रहते हैं। सोने पर भी सो नहीं पाते, जागने पर भी चैन नहीं मिलता। विचित्र-सी पीड़ा नित्य आँखों में रह-रहकर आती है। अमृत विषतुल्य प्रतीत होता है, फूल शूल जैसे लगते हैं, चंद्रमा अंधकार उगलता हुआ जान पड़ता है, पानी अंगों को जलाता है, राग-रागिनियाँ अच्छी नहीं लगतीं, गुण दोष में बदल गए हैं और औषधियाँ भी रोग बढ़ाने वाली हो गई हैं। इस प्रकार ‘सुजान’ के मन फेर लेने से उनके दिन भी फिर गए हैं—
सुधा तें स्त्रवत विष, फूल में जगत सूल,
तम उगलत चंदा, भई नई रीति है।
जल जारै अंग, और राग कर सुर-भंग,
संपति विपति पारै, बड़ी विपरीत है।।
सहगुन गहै दोषैं, औषधि हूँ रोग पोषै,
ऐसे जान रस माहि बिरस अनीति है।
दिनन को फेर मोहिं तुम मन फेरि डार्यो,
एहो घनानंद! न जानौं कैसे बीति है।।
सौंदर्य-चित्रण
घनानंद ने रूप-सौंदर्य के अनेक मनोहारी चित्र अंकित किए हैं, जिनमें उनकी प्राणप्रिया ‘सुजान’ की विविध रूप-छवियाँ अत्यंत माधुर्य एवं गांभीर्य के साथ विद्यमान हैं। उन्होंने आँख, नाक, कान आदि अंगों का पृथक-पृथक वर्णन करने की अपेक्षा समग्र व्यक्तित्व की रमणीयता को चित्रित करने का प्रयास किया है।
स्याम घटा लपटी थिर बीज कि सोहै अमावस-अंग उज्यारी।
धूम के पुंज में ज्वाल की माल-सी, पै दृग-सीतलता-सुखकारी।।
कै छवि छायौं सिंगार निहारि सुजान-तिया-तन-दिपति प्यारी।
कैसी फबी घनानंद! चोपानि सों पहिरी चुनि साँवरी सारी।।
इसी प्रकार घनानंद ने अंग-अंग में द्युति की तरंग उठने वाले पार्थिव रूप-सौंदर्य को बड़ी तन्मयता एवं तत्परता के साथ शब्दों में बाँधकर अंकित किया है।
घनानंद का अभिव्यक्ति पक्ष अथवा कला-पक्ष
किसी कवि के अभिव्यक्ति-पक्ष से तात्पर्य उसकी उस वर्णन-पद्धति से है, जिसमें वह अपनी अनुभूति को अभिव्यक्त करता है। इसके लिए वह अनेक उपकरणों का सहारा लेता है तथा उनके माध्यम से अपनी अनुभूति को कलात्मक रूप प्रदान करता है। भाषा, अलंकार, गुण, वृत्ति, शब्द-शक्ति, छंद आदि सभी तत्व अभिव्यक्ति-पक्ष के अंतर्गत आते हैं।
भाषा
घनानंद ने ब्रजभाषा में अपनी सरस काव्यधारा प्रवाहित की है। उनकी ब्रजभाषा में सर्वत्र स्वच्छता, एकरूपता एवं सुघड़ता के दर्शन होते हैं। वे ब्रजभाषा के अत्यंत प्रवीण कवि थे। इसी कारण उनकी भाषा भावों के अनुकूल चलने की अपूर्व शक्ति रखती है। वह नई-नई भंगिमाओं के माध्यम से भावों को प्रस्तुत करने में अत्यंत सक्षम प्रतीत होती है।
घनानंद का भाषा पर इतना अधिक अधिकार था कि वह कवि की वशवर्तिनी होकर उनके संकेत पर चलती दिखाई देती है। ऐसा जान पड़ता है कि वे ब्रजभाषा की नाड़ी पहचानते थे, उसके प्रयोगों से भली-भाँति परिचित थे और उसकी प्रत्येक क्षमता का उपयोग करना जानते थे।
उनकी भाषा साफ-सुथरी, निखरी हुई तथा भावों के निरूपण की अनंत शक्ति से युक्त है।
शब्द-शक्ति
शब्द की तीन शक्तियाँ मानी गई हैं— अभिधा, लक्षणा और व्यंजना। जिन शब्दों में ये शक्तियाँ होती हैं, वे क्रमशः वाचक, लक्षक और व्यंजक कहलाते हैं।
घनानंद के काव्य में लक्षणा और व्यंजना का विशेष महत्त्व है। उन्होंने उक्ति-वैचित्र्य के लिए, भावों को गहन बनाने के लिए तथा सरसता उत्पन्न करने के लिए लाक्षणिक प्रयोगों का अधिक सहारा लिया है। इसीलिए उनका काव्य अभिधा की अपेक्षा लक्षणा और व्यंजना-प्रधान माना जाता है।
अलंकार
काव्य में अलंकारों का प्रयोग कथन में चारुता एवं भव्यता लाने के लिए किया जाता है। अलंकार भावों की तीव्रता बढ़ाते हैं तथा वस्तुओं के रूप, गुण और क्रिया को अधिक प्रभावपूर्ण बना देते हैं।
घनानंद के काव्य में जहाँ रस और भावों की प्रचुरता है, वहीं अलंकारों ने उन्हें और अधिक सजीवता तथा प्रभावशीलता प्रदान की है। उन्होंने शब्दालंकार और अर्थालंकार दोनों का सफल प्रयोग किया है।
गुण
काव्य के तीन प्रमुख गुण माने गए हैं— माधुर्य, ओज और प्रसाद।
माधुर्य — हृदय को द्रवित करने वाला।
ओज — चित्त में उत्साह एवं स्फूर्ति उत्पन्न करने वाला।
प्रसाद — सहजता से अर्थबोध कराने वाला।
घनानंद के काव्य में सर्वाधिक माधुर्य गुण की प्रधानता है, क्योंकि उन्होंने मुख्यतः विप्रलंभ (वियोग) श्रृंगार का चित्रण किया है—
रैन-दिना धुटिबौ करें, प्रान झरैं अखियाँ झरना सो।
प्रीतम की सुधि अंतर में कसकै, सखी! ज्यों पँसुरीन में गाँसी।।
छंद
यद्यपि काव्य का छंद से नित्य संबंध नहीं है, तथापि छंद काव्य को विशेष प्रभावशीलता प्रदान करता है। घनानंद का संपूर्ण काव्य छंदों की रस-माधुरी से ओत-प्रोत है।
उन्होंने अनेक प्रकार के छंदों का प्रयोग किया है, जैसे—
सवैया
कवित्त
त्रिलोकी
ताटंक
निसाती
सुमेरु
शोभन
त्रिभंगी
दोहा
चौपाई
घनाक्षरी पद
इनमें विशेष रूप से सवैया और कवित्त छंदों का प्रयोग अत्यंत प्रभावशाली ढंग से किया गया है। सवैया छंद पर उनका असाधारण अधिकार था, इसलिए उन्हें सवैया का सिरताज कहा जाता है।
रीतिमुक्त स्वच्छंद काव्यधारा में घनानंद का स्थान
हिन्दी की संपूर्ण स्वच्छंद प्रेम-काव्यधारा का अनुशीलन करने पर ज्ञात होता है कि इस धारा के प्रमुख कवियों में रसखान, आलम, घनानंद, ठाकुर और बोधा के नाम उल्लेखनीय हैं। ये सभी कवि प्रेम-काव्य के प्रमुख प्रणेता हैं और इन्होंने स्वच्छंदता के साथ प्रेमानुभूति का बड़ा ही मर्मस्पर्शी वर्णन किया है। परंतु इनमें घनानंद सर्वश्रेष्ठ कवि हैं, क्योंकि घनानंद के काव्य में रसखान की-सी प्रेम की अनिर्वचनीयता भी है। परंतु इन सबसे बढ़कर घनानंद में कुछ ऐसे असाधारण काव्य-सौष्ठव के दर्शन होते हैं, जो न रसखान में हैं, न आलम में, न ठाकुर में और न बोधा में।
घनानंद ने 'सुजान' को आलंबन बनाकर अपनी इस लौकिक प्रेयसी के रूप-सौंदर्य का इतना मार्मिक एवं मनोरंजक वर्णन किया है कि देखते ही बनता है। सुजान की तिरछी चितवन, धूमते कटाक्ष, रसीली हँसी, मृदु मुस्कान, अरुण होठ, कान्तिमंडित दंतावली, केशराशि, वक्रिम भौंहें, विशाल नेत्र, गर्वीली मुद्रा, उन्नत यौवन आदि पर मुग्ध घनानंद ने उसकी रूप-निकाई के अनेक संश्लिष्ट चित्र अंकित किए हैं। जहाँ उन्होंने अपनी प्रेम-विभोरता का परिचय दिया है, वहीं मुहम्मदशाह रंगीले के दरबार की इस नर्तकी के प्रति ऐसा प्रणय-निवेदन किया है, जो हिन्दी-काव्य की स्थायी संपत्ति बन गया है।
घनानंद की श्रेष्ठता का सबसे बड़ा कारण यह है कि उनके हृदय में सुजान के प्रति उत्कृष्ट प्रेम एवं असीम व्यामोह भरा हुआ था। उनके मन में सुजान की अक्षय रूप-राशि समाई हुई थी। इसीलिए घनानंद का काव्य प्रेम की गूढ़ता से भरा हुआ है, अतृप्ति की अनंतता से भरा हुआ है, अंतर्द्वंद्व की अलौकिकता से भरा हुआ है, वेदना की अक्षयता से भरा हुआ है और तीव्र अनुभूति की अखंडता से भरा हुआ है।
घनानंद जैसा उक्ति-वैचित्र्य अन्य कोई कवि नहीं दिखा सका। उनकी-सी लाक्षणिक मूर्तिमत्ता किसी अन्य रचनाकार में दृष्टिगोचर नहीं होती और उनका-सा प्रयोग-वैचित्र्य कहीं ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलता। निःसंदेह वे प्रेम के जितने बड़े धनी थे, उतने ही भाषा के भी धनी थे और उतने ही अभिव्यंजना-कौशल के भी। इसी कारण हिन्दी काव्य की रीतिमुक्त स्वच्छंद प्रेमधारा में घनानंद का शीर्षस्थ स्थान है।
घनानंद की रचनाएँ
घनानंद द्वारा लिखित अनेक ग्रंथ उपलब्ध हैं। सबसे पहले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 'सुजान शतक' नामक पुस्तक में घनानंद की कविताओं का संकलन किया। इसके अतिरिक्त 'सुजानहित' तथा 'सुजान सागर' नामक संकलन भी प्रकाश में आए।
इस क्षेत्र में आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा घनानंद पर किया गया शोध-कार्य अत्यंत सार्थक सिद्ध हुआ। उन्होंने घनानंद की कविताओं को संकलित कर तीन पुस्तकें प्रकाशित कीं।
प्रथम 'घनानंद कवित्त' नामक संकलन था, जिसमें 502 कवित्त संग्रहित हैं। द्वितीय संकलन सन् 1945 में प्रकाशित हुआ, जिसमें कवित्त-सवैयों के अतिरिक्त घनानंद के लगभग 500 पद तथा उनकी 'वियोग-बेलि', 'यमुना-यश', 'प्रीति-पावस' तथा 'प्रेम-पत्रिका' रचनाओं का संग्रह है।
इसके पश्चात् सन् 1952 में घनानंद की अन्य 36 कृतियों का संकलन करते हुए 'घनानंद ग्रंथावली' का प्रकाशन हुआ।
काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा संवत् 2000 तक की खोज के आधार पर निम्नलिखित कृतियाँ घनानंद की मानी गई हैं—
घनानंद कवित्त
आनंदघन के कवित्त
कवित्त
स्फुट कवित्त
आनंदघन जू के कवित्त
सुजानहित
सुजानहित प्रबंध
कृपाकंद निबंध
वियोग-बेला
इश्कलता
जमुना-यश
आनंदघन जी की पदावली
प्रीति-पावस
सुजान-विनोद
कविता-संग्रह
रस-केलि-वल्ली
वृंदावन-सत
निष्कर्ष
घनानंद रीतिकाल के सर्वश्रेष्ठ स्वच्छंद प्रेम-कवि माने जाते हैं। उनकी कविता में प्रेम की गहन अनुभूति, विरह की तीव्र वेदना, भाषा की मधुरता, अभिव्यक्ति की मार्मिकता तथा अनुभूति की सच्चाई का अद्भुत समन्वय मिलता है। इसीलिए उन्हें हिन्दी साहित्य में "प्रेम और विरह का सर्वाधिक मार्मिक कवि" कहा जाता है। उनकी काव्य-साधना रीतिमुक्त काव्यधारा की सर्वोच्च उपलब्धियों में गिनी जाती है।
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