कैलाश गौतम: जीवन और साहित्य
हिन्दी और भोजपुरी बोली के रचनाकार कैलाश गौतम का जन्म चन्दौली जनपद के डिग्घी गांव में 8 जनवरी 1944 को हुआ। शिक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और प्रयाग विश्वविद्यालय में हुई। लगभग 37 वर्षों तक इलाहाबाद आकाशवाणी में विभागीय कलाकार के रूप में सेवा करते रहे। व्यक्तित्व को देखें तो कैलाश गौतम एक सावधान लेखन-कर्मी के रूप में कौशल के साथ विनम्र, प्रेरक सहायक होने का सकारात्मक परिचय देते हैं। वे चक्रव्यूह में घिरे योद्धा की तरह जीवन-समर में जूझते हुए नज़र आये। इलाहाबाद में भी अन्दर ही अन्दर लोग उनसे बरबस ईर्ष्या रखते थे। हिन्दुस्तानी अकादमी में उनकी नियुक्ति के समय ही नहीं, बल्कि अनेक अवसरों पर उन्हें अकारण ही ईर्ष्या का सामना करना पड़ा। लेकिन, वे सारे व्यूह-जालों को काटते हुए अपनी मंज़िलें पार करते गए।
कर्तव्य की दृष्टि से देखें तो कैलाश गौतम के पांच आयाम स्पष्ट दिखाई देते हैं- खड़ी बोली में आंचलिक लोकतत्व को जिस रूप और परिमाण में कैलाश गौतम ने समेटा है, अन्य किसी रचनाकार में यह क्षमता नज़र नहीं आती। खड़ी बोली में ही दोहे की पुनर्स्थापना 'धर्मयुग' के माध्यम से कैला
कैलाश गौतम के सर्जक का बड़ा प्रखर रूप उनके नवगीतों में द्रष्टव्य है। उनके नवगीत जहां एक ओर सामाजिक यथार्थ को स्वर देते हैं, वहीं मानसिक रागभाव की तरलता को भी बरकरार रखते हैं। लोकतत्व का छौंक नवगीतों को एक अलग सौंधापन देता है। रंगमय चाक्षुषबिम्ब अमूर्त को मूर्त रूप प्रदान करते हैं। यह विज्ञानपरक आधुनिकता का द्योतक है। व्यंग्यकार के रूप में कैलाश गौतम की रचनाएं उन्हें जन-समूह से जोड़ती हैं। उनके व्यंग्यों का तीखापन जैसा खड़ी बोली में रहता है, वैसा ही भोजपुरी में भी। सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और मानसि
रेडियो-लेखन कैलाश के आशु-सृजन की ऐसी मंजूषा है जो केन्द्रीय योजनाओं की तात्कालिक अपेक्षा की पूर्ति के रूप में प्रचुर सामग्री प्रस्तुत करती है। इसमें रूपक, नाटक, झलकियां आदि सभी द्रष्टव्य हैं। छंदेतर कविताएं युगीन यथार
कवि कैलाश गौतम उत्सवधर्मी रचनाकार थे। जीवन की रागानुभूतियां उन्हें भीतर तक उत्तेजित और प्रेरित करती थीं। इसीलिए भौजी, सियाराम, राग-रंग से भरे स्नेह सम्बन्ध, मेले-ठेले, पर्व उनके गीतों की अनुभूति में समाये हुए थे। मंच संचालन में विनोदप्रियता तथा चुटीली टिप्पणियां उनके व्यक्तित्व से जुड़ी हुई थीं जो गोष्ठियों को गरिमा प्रदान करती थीं। बेहद सहज, आत्मीय और बेबाक संवेदनशील कवि कैलाश गौतम जी मूलतः नवगीत के चितेरे थे। डिग्घी गांव में जन्मे कैलाश गौतम जी शिक्षा के लिए इलाहाबाद आये और यहीं के होकर रह गये। उनका पूरा जीवन साहित्य को समर्पित था। प्रयाग की गंगा-जमुनी संस्कृति उनके रग-रग में समाई थी। जिस सरलता और सहजता के साथ आम आदमी के दुख और सुखों को कविता में संजोया, वह अत्यंत मर्मस्पर्शी था।
गांव की कच्ची मिट्टी की महक और उनके गीतों में जिजीविषा थी। आज की चकाचौंध भरी ज़िन्दगी से अलग 'चना और चबेना' में कविता का सौन्दर्य शास्त्र तलाशता यह कवि सभी से हटकर था। वह सहृदयता, ज़िन्दादिली, सहजता, आत्मीयता और संजीदगी का मिला-जुला अक्स थे। ऊर्जा से भरे हुए लोगों से गपियाते, ठहाका लगाते, आज यहां तो कल वहां, हमेशा ही जल्दी में लेकिन संजीदा। हर किसी को महत्वपूर्ण बनाते हुए, जो कोई भी मिला उनका गहरा आत्मीय बन गया; सबको लगता गौतम जी उनके सबसे निकट हैं। इतना लोकप्रिय, इतना ज़िन्दादिल शख्स कभी
प्रयाग की माटी में पनपे कैलाश गौतम यहां की साहित्यिक विरासत के पुरजोर नुमाइंदे थे। पंत, महादेवी, निराला, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, उपेन्द्र नाथ अश्क जैसे स्तम्भों के साथ एक नाम और जुड़ गया। भले ही आज साहित्यिक जगत, मित्रों और आत्मीयों के बीच एक वीरानगी है, पर जनकवि अपने शब्दों, कृतियों और गीतों के बीच इतना कुछ छोड़ गये हैं जो साहित्यिक चिंतकों के बीच विरासत का काम करेगा और प्रयाग की धरती उसकी सुगंध से महकती रहेगी। वह ज़मीन से जुड़े हुए रचनाकार ही नहीं, बल्कि एक सच्चे मनुष्य थे जिन्होंने 'मानुष सत्य' को जाना था और आम आदमी की संवेदना को छोटे-छोटे सपनों में बुना था। वे अपनी कविताओं में चरित्रों को गढ़ते हुए आमजन से रूबरू होते रहे।
दरअसल लोकजीवन ही उनका अपना जीवन था। चाहे आम बात-व्यवहार हो, जिस इंसानी जज़्बे के साथ वह मुखातिब होते थे, उसके पीछे उनका यह गहरा लोक संस्कार ही था। मंचीय कविता में उनकी जीवंत उपस्थिति के साथ-साथ पेशे के रूप में आकाशवाणी के ग्रामीण कार्यक्रमों में उनकी अत्यंत लोकप्रिय भागीदारी इसके ज्वलंत साक्ष्य हैं। रेडियो नाटक, पटकथा लेखन, गीतों के अलावा हास्य व्यंग्य और अखबारों में स्तम्भ-लेखन उनकी अभिव्यक्ति के ऐसे ही अन्य माध्यम थे। जब कवि सम्मेलनों की परम्परा में गिरावट आयी थी, तो उसे उन्होंने स्वस्थ हास्य और कुशल संचालन से जैसे उबार लिया हो। बड़ी बात यह है कि उसकी संकीर्ण रसिकता पर अंकुश लगाते हुए उन्होंने सामान्य सुख-दुख के साथ प्रखर जन-पक्षधरता का भी समावेश किया। कहीं विडम्बनाओं में निर्ममता से नश्तर लगाये तो कहीं सुन्दर बहुरंगी लोक-छवियों के गुलदस्ते सजा दिये।
अपने जीवन के अंतिम समय में आकाशवाणी से रिटायरमेंट के बाद कैलाश गौतम इलाहाबाद में हिंदुस्तानी एकेडमी के अध्यक्ष पद पर कार्यरत थे। ग्रामीण जीवन के बिम्बों के इस प्रयोगधर्मी कवि का निधन 9 दिसंबर 2006 को हुआ। उन्हें अखिल भारतीय मंचीय कवि परिषद की ओर से 'शारदा सम्मान', महादेवी वर्मा साहित्य सहकार न्यास की ओर से 'महादेवी वर्मा सम्मान', उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का 'राहुल सांकृत्यायन सम्मान' सहित मुम्बई का 'परिवार सम्मान', 'लोक भूषण सम्मान', 'सुमित्रानन्दन पंत सम्मान' और 'ऋतुराज सम्मान' से भी सम्मानित किया गया। अपने वाराणसी प्रवास के दौरान कैलाश गौतम 'आज' और 'गांडीव' जैसे दैन
कैलाश गौतम की मशहूर कविता- पप्पू के दुल्हिन
पप्पू के दुल्हिन पप्पू के रखै अपने अंडर में
पप्पुवा इंटर फेल और दुलहिया बीए पास हौ भाई जी
औ पप्पू अस लद्धड़ नाहीं, एडवांस हौ भाई जी
कहे ससुर के पापा जी औ कहे सास के मम्मी जी
माई डियर कहे पप्पू के, पप्पू कहैं मुसम्मी जी
बहु सुरक्षा समिति बनउले हौ अपने कॉलोनी में
बहुतन के ई सबक सिखौले हौ अपने कॉलोनी में
औ कॉलोनी के कुल दुल्हनिया एके प्रेसिडेंट कहैंली
और एकर कहना कुल मानेली एकर कहना तुरंत करैली
पप्पू के दुल्हिन के नक्शा कालोनी में हाई हौ
ढंग एकर बेढब हौ सबसे रंग एके एकजाई हो
औ कॉलोनी के बुढ़िया बुढ़वा दूरे से परनाम करैले
भीतरे भीतर सास डरैले भीतरे भीतर ससुर डरैले
दिन में सूट रात में मैक्सी, न घुंघटा न अँचरा जी
देख देख के हसं पड़ोसी मिसराइन औ मिसरा जी
अपने एक्को काम न छुए कुल पप्पु से करवावैले
पप्पुओ जान गयल हौ काहें माई डियर बोलावैले
छूट गइल पप्पू के बीड़ी औ चौराहा छूट गइल
छूट गइल मंडली रात के ही ही हा हा छूट गइल
हरदम अप टू डेट रहैले मेकअप दोनों जून करैले
रोज बिहाने मलै चिरौंजी गाले पे निम्बुवा रगरै
पप्पू ओके का छेड़िहैं ऊ खुद छेड़ेले पप्पू के
जइसे फेरे पान पनेरिन ऊ फेरेले पप्पू के
पप्पू के जेबा एक दिन लव लेटर ऊ पाई गइल
लव लेटर ऊ पाई गइल, पप्पू के शामत आई गइल
मुंह पर छीटा मारै उनके आधी रात जगावैले
इ लव लेटर केकर हउवे ओनही से पढ़वावैले
लव लेटर के देखते पप्पुवा पहिले तो सोकताइ गइल
झपकी जैसे फिर से आइल पप्पुवा उहै गोताई गइल
मेहर छींटा मारे फिर फिर पप्पुवा आँख न खोलत हौ
संकट में कुकरे के पिल्ला जैसे कूँ कूँ बोलत हौ
जैसे कत्तो घाव लगल हौ हाँफ़त औ कराहत हौ
इम्तहान के चिट एस चिटिया मुंह में घोंटल चाहत हौ
सहसा हँसे ठठाकर पप्पुवा फिर गुरेर के देखलस
अँधियारन में एक तीर ऊ खूब साधकर मरलस
अच्छा देखा एहर आवा बात सुना तू अइसन हउवे
लव लेटर लिखै के हमरे कॉलेज में कम्पटीसन हउवे
हमरो कहना मान मुसमिया रात आज के बीतै दे
सबसे बढ़िया लव लेटर पे पुरस्कार हौ, जीतै दे
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