सिकरवार वंश का इतिहास
1527 ईस्वी में राव धामदेव सिंह सिकरवार ने खानवा के युद्ध में महाराणा संग्राम सिंह (राणा सांगा) की ओर से बाबर के विरुद्ध युद्ध में सहयोग किया। युद्ध के पश्चात अपने वंश की सुरक्षा के लिए सिकरवार वंश के अनेक परिवार सीकरी क्षेत्र छोड़कर अन्य स्थानों की ओर चले गए।
राव जयराज सिंह सिकरवार के तीन पुत्र थे—
कामदेव सिंह सिकरवार (दलपति)
धामदेव सिंह सिकरवार
विराम सिंह सिकरवार
कामदेव सिंह सिकरवार, जो आगे चलकर दलखू बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुए, मध्य प्रदेश के वर्तमान मुरैना जिले में जाकर बस गए और वहीं अपने वंश का विस्तार किया।
कामदेव (दलखू बाबा) सिकरवार की वंशावली
चंबल घाटी के सिकरवार स्वयं को राव दलपत सिंह (दलखू बाबा) का वंशज मानते हैं। दलखू बाबा द्वारा स्थापित अथवा उनसे संबंधित प्रमुख ग्राम इस प्रकार बताए जाते हैं—
सिरसैनी — स्थापना विक्रम संवत 1404
भैंसरोली — स्थापना विक्रम संवत 1465
पहाड़गढ़ — स्थापना विक्रम संवत 1503
सिहौरी — स्थापना विक्रम संवत 1606
परगना जौरा में इनके कुल लगभग 70 ग्राम बताए जाते हैं।
दलखू बाबा की प्रथम पत्नी से उत्पन्न पुत्र रतनपाल के अधिकार में बर्रेड़, पहाड़गढ़, चिन्नौनी, हुसैनपुर, कोल्हेरा, बाल्हेरा, सिकरौदा, पनिहारी आदि 29 ग्राम रहे।
भैरोंदास एवं त्रिलोकदास के अधिकार में सिहौरी, भैंसरोली, खांडोली आदि 11 ग्राम रहे।
हैबंत रूपसेन के अधिकार में तोर, तिलावली, पंचमपुरा, बागचीनी, देवगढ़ आदि 22 ग्राम रहे।
दलखू बाबा की दूसरी पत्नी की संतानें— गोरे, भागचंद, बादल, पोहपचंद एवं खानचंद के वंशज कोटड़ा तथा मिलौआ परगना सहित जौरा क्षेत्र के अनेक ग्रामों में आबाद हुए।
गोरे और बादल अपने समय के प्रसिद्ध योद्धा माने जाते हैं।
राव दलपत सिंह (दलखू बाबा) के वंशजों की प्रमुख जागीरें—
कोल्हेरा
बाल्हेरा
हुसैनपुर
चिन्नौनी (चिलौनी)
पनिहारी
सिकरौदा
मुरैना जिले में सिहौरी से बर्रेड़ तक सिकरवार राजपूतों की उल्लेखनीय आबादी पाई जाती है। कहा जाता है कि सिकरवारों ने विक्रम संवत 1606 में सिहौरी की अंतिम गढ़ी पर विजय प्राप्त की और इसके बाद मुंगावली तथा आसपास के क्षेत्रों में अपना प्रभाव स्थापित किया। इनके आखेट एवं युद्धकौशल से संबंधित अनेक लोककथाएँ एवं वृत्तांत प्रचलित हैं।
पहाड़गढ़ रियासत की सिकरवार राजगद्दी
मुरैना जिले की पहाड़गढ़ रियासत के सिकरवार शासकों की वंशावली इस प्रकार बताई जाती है—
राव धन सिंह — विक्रम संवत 1503 से 1560
राव भारतीचंद — विक्रम संवत 1560 (उसी वर्ष देहावसान)
राव नारायण दास — विक्रम संवत 1560 से 1597
राव पत्रखान सिंह — 1597 से 1641
राव जगत सिंह — 1641 से 1670
राव वीर सिंह — 1670 से 1703
राव दलेल सिंह — 1703 से 1779
राव कुँवर राय — 1779 से 1782
राव बसंत सिंह — 1782 से 1791
राव पृथ्वीपाल सिंह — 1791 से 1801
राव विक्रमादित्य — 1801 से 1824
राव अपरवल सिंह — 1824 से 1860
राव मनोहर सिंह — 1860 से 1899
राव गणपत सिंह — 1899 से 1905 (चिन्नौनी से दत्तक पुत्र)
राव अजमेर सिंह — 1905 से 1973 (निसंतान, दत्तक परंपरा)
राजा पंचम सिंह — 1973 से 2004
इसके पश्चात जमींदारी एवं जागीरदारी प्रथा समाप्त हो गई तथा अधिकांश भू-स्वामी कृषक बन गए।
राजा पंचम सिंह सिकरवार की प्रथम रानी से निहाल सिंह, पद्म सिंह तथा एक पुत्री का जन्म हुआ। पद्म सिंह का विवाह राय सिंह तोमर की पुत्री से हुआ। दूसरी रानी (सिरसावाली) से हरी सिंह का जन्म हुआ। हरी सिंह का विवाह कश्मीरी डोगरा राजपूत परिवार में हुआ।
सिकरवार क्षत्रियों की कुलदेवी : कालिका माता
भवानीपुर ग्राम में कालिका माता का एक प्राचीन मंदिर स्थित है। क्षेत्र के सिकरवार क्षत्रियों ने कालिका माता को अपनी कुलदेवी के रूप में स्वीकार किया है।
भवानीपुर कोथावां ब्लॉक का एक प्रमुख ग्राम है। सिकरवार क्षत्रियों के घरों में होने वाले मांगलिक अवसरों पर आज भी सर्वप्रथम कालिका माता का स्मरण किया जाता है।
यह मंदिर नैमिषारण्य से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। स्थानीय परंपराओं के अनुसार कभी गोमती नदी मंदिर के समीप बहती थी, परंतु समय के साथ उसने अपना मार्ग परिवर्तित कर लिया। नदी की पुरानी धारा आज भी एक झील के रूप में विद्यमान है।
नवरात्र के अवसर पर यहाँ विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें भवानीपुर, जियनखेड़ा, महुआखेड़ा, काकूपुर, जरौआ, अटिया तथा कोथावां सहित अनेक गाँवों के श्रद्धालु सम्मिलित होते हैं। इस अवसर पर सिकरवार क्षत्रिय विशेष रूप से एकत्र होकर माता कालिका की आराधना करते हैं।
स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार पराजय के पश्चात पेशवा बाजीराव द्वितीय ने अपने जीवन का एक कालखंड गोमती तट के इस क्षेत्र में व्यतीत किया था। वे देवी-उपासक थे, इसलिए इस क्षेत्र का नाम भवानीपुर प्रचलित हुआ। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने नैमिषारण्य स्थित देव-देवेश्वर मंदिर के जीर्णोद्धार में योगदान दिया था। मंदिर परिसर में उनकी स्मृति से जुड़ी एक समाधि भी विद्यमान बताई जाती है।
सिकरवारों की वीरता और स्वतंत्रता-प्रियता
सिकरवार राजपूत अपनी वीरता, स्वाभिमान और स्वतंत्रता-प्रिय स्वभाव के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। इतिहास और लोकपरंपराओं में वर्णित है कि उन्होंने सदैव अपने सम्मान और स्वाधीनता की रक्षा के लिए संघर्ष किया। खानवा के युद्ध के बाद भी सिकरवारों ने पराधीनता स्वीकार करने के बजाय विभिन्न क्षेत्रों में जाकर नई बस्तियाँ बसाईं और अपने पराक्रम तथा परिश्रम से पुनः प्रतिष्ठा प्राप्त की। यही कारण है कि आज भी सिकरवार वंश के लोग अपने गौरवशाली अतीत, युद्ध कौशल और क्षत्रिय परंपराओं के लिए जाने जाते हैं।
सिकरवारों की सामाजिक पहचान
सिकरवार राजपूत समाज में शिक्षा, सैन्य सेवा, कृषि तथा प्रशासनिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भारतीय सेना, पुलिस, न्यायिक सेवा तथा विभिन्न प्रशासनिक पदों पर सिकरवार वंश के अनेक व्यक्तियों ने उल्लेखनीय सेवाएँ प्रदान की हैं। समाज में संगठन, अनुशासन और परंपराओं के संरक्षण की भावना आज भी इस वंश की विशेष पहचान मानी जाती है।
सिकरवारों की धार्मिक आस्था
सिकरवार वंश में शक्ति उपासना की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। माता कालिका, माँ कामाख्या, दुर्गा और भवानी के प्रति विशेष श्रद्धा रखी जाती है। नवरात्रि, दशहरा तथा अन्य धार्मिक अवसरों पर कुलदेवी की पूजा का विशेष महत्व है। अनेक सिकरवार परिवार आज भी किसी शुभ कार्य के प्रारंभ से पूर्व कुलदेवी का स्मरण करना आवश्यक मानते हैं।
सिकरवारों का आदर्श वाक्य
लोक परंपराओं में सिकरवारों को "शौर्य, स्वाभिमान और धर्मरक्षा" का प्रतीक माना गया है। उनके इतिहास में मातृभूमि, धर्म और कुल-मर्यादा की रक्षा के लिए संघर्ष और बलिदान की अनेक गाथाएँ सुनने को मिलती हैं।