राठौड़ क्षत्रिय वंश की सभी शाखाओं का इतिहास



राठौड़ क्षत्रिय वंश की सभी शाखाओं का इतिहास


राठौड़ वंश के गोत्राचार
  1. वंश -सूर्यवंश
  2. गोत्र-गोतम
  3. गुरु- वशिष्ट
  4. निकास -अयोध्या
  5. ईष्ट -सीताराम ,लक्ष्मीनारायण
  6. नदी -सरयू
  7. पहाड़ -गांगेय
  8. कुण्ड -सूर्य
  9. वृक्ष-नीम
  10. पितृ -सोम
  11. कुलदेवी -नागणेचा
  12. भेरू-मंडोर, कोडमदेसर
  13. कुलदेवी स्थान -नागाणा जिला -बाड़मेर
  14. चिन्ह -चिल
  15. क्षेत्र -नारायण
  16. पूजा -नीम
  17. बड-अक्षय
  18. गाय-कपिला
  19. बिडद-रणबंका
  20. उपाधि -कमधज
  21. शाखा -तेरह में से दानेसरा राजस्थान में है
  22. निशान -पचरंगा
  23. घाट -हरिद्वार
  24. शंख -दक्षिणवर्त
  25. सिंहासन -चन्दन का
  26. खांडा-जगजीत
  27. तलवार -रणथली
  28. घोड़ा -श्यामकर्ण
  29. माला -रतन
  30. शिखा -दाहिनी
  31. बंधेज -वामी (बाया)
  32. पाट-दाहिना
  33. पुरोहित -सेवड
  34. चारण -रोहडिया
  35. भाट-सिगेंलिया
  36. ढोली-देहधड़ा
  37. ढोल -भंवर
  38. नगारा- रणजीत
राठोड़ों के प्रमुख राज्य
राजपुताना – जोधपुर, बीकानेर, कुशलगढ़, किशनगढ़ .
मालवा- रतलाम, सैलाना, अलीराजपुर, ईडर, झाबुआ, जोबेट, काछी, मुलयान, बड़ोदा व अमझेरा.
संयुक्त प्रान्त (उ प्र) – रायपुर (एटा), खिमशेपुर, विजयपुर, मांडा ढहिया.
बिहार – खरसवां, सिंगभूमि .
उड़ीसा – बोनई, रेसखोल.
हिमाचल – जुब्बल, चम्बा.
हरियाणा – जहाजगढ़.

राठौड़ वंश की सभी शाखाओं का इतिहास
राजपूतों के इतिहास में राठौड़ों का विशेष स्थान है। संस्कृत अभिलेखों, ग्रंथों आदि से राठौड़ों को राष्ट्रकूट लिखा है। कहीं-कहीं रट्ट या राष्ट्रोड भी लिखा है। राठौर राष्ट्रकूट का प्राकृत रूप है। चिन्तामणि विनायक वैद्य के अनुसार यह नाम न होकर एक सरकारी पद था। इस वंश का प्रवर्तक राष्ट्रकूट (प्रांतीय शासक) था।
राठौड़ अथवा राठौड एक राजपूत गोत्र है जो उत्तर भारत में निवास करते हैं। राठौड़ अपने को राम के कनिष्ठ पुत्र कुश का वंशज बताते हैं। इस कारण वे सूर्यवंशी हैं। वे पारम्परिक रूप से राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र मारवाड़ में शासन करते थे। इनका प्राचीन निवास कन्नौज और बदायू था। जहाँ से सीहा मारवाड़ में ई. सन् 1243 के लगभग आया। राजस्थान के सम्पूर्ण राठौड़ो के मूल पुरुष राव सीहा जी माने जाते है जिन्होंने पाली से राज प्रारम्भ किया उनकी छतरी पाली जिले के बिटु गांव में बनी हुई है।
सीहा के वंशज चूण्डा ने पहले मण्डोर पर और उसके पौत्र जोधा ने जोधपुर बसाकर वहाँ अपनी राजधानी स्थापित की। मुग़ल सम्राटों ने अपनी आधी विजयें ‘लाख तलवार राठोडान‘ अर्थात एक लाख राठोड़ी तलवारों के बल पर प्राप्त की थी क्योंकि युद्ध के लिए 50000 बन्धु बान्धव तो एक मात्र सीहाजी के वंशज के ही एकत्रित हो जाते थे। राठौड़ों का विरुद रणबंका है अर्थात वे लड़ने में बांके हैं। 1947 से पूर्व भारत में अकेले राठौड़ो की दस से ज्यादा रियासतें थी और सैकड़ों ताजमी ठिकाने थे जिनमें मुख्य जोधपुर, मारवाड़, किशनगढ़, बीकानेर, ईडर, कुशलगढ़, सैलाना, झाबुआ, सीतामऊ, रतलाम, मांडा, अलीराजपुर वही पूर्व रियासतों में मेड़ता, मारोठ और गोड़वाड़ घाणेराव मुख्य थे।
राठौड़ वंश की कुलदेवी नागणेचिया माता - राठौड़ो की कुलदेवी नाग चेचियाजी है जिसका पहले नाम राठेश्वरी था। नाग चेचियाजी का पुराना मंदिर नागाना तहसील पचपदरा में हैं। दुसरा मंदिर जोधपुर के किले में जनानी ड्योढ़ी में हैं। गांवों में नागनेचियाजी का थान सामान्यतः नीम के वृक्ष के नीचे होता है। इसी कारण राठौड़ नीम का पेड़ काटते या जलाते नहीं हैं।
राठौड़ वंश की शाखाएं – धांधल, भडेल, धूहड़िया, हटडिया, मालावत, गोगादेव, महेचा, राठौड़, बीका, मेडतिया, बीदावत, बाल चांपावत, कांधलोत, उदावत, देवराजोत, गहड़वाल, करमसोत, कुम्पावत, मंडलावत, नरावत आदि।

राठौड़ों का प्राचीन इतिहास वृत :- राम के पुत्र कुश के कुल में सुमित्र अयोध्या का अंतिम राजा था। नंद वंश के महापद्मनंद ने अयोध्या राज्य को मगध साम्राज्य में मिला लिया। सुमित्र के बाद यशोविग्रह तक के मुख्य व्यक्तियों के नाम ही बडुवों (बहीभट्टों) की बहियों से तथा अन्य साहित्यिक स्त्रोतों से प्राप्त होते हैं। अतः इन साधनों के आधार पर सुमित्र से आगे की वंश परम्परा दी जा रही है। सुमित्र के दो वंशजों में कूर्म के वंशज रोहितास (बिहार), निषिध, ग्वालियर और नरवर होते हुए राजस्थान में आये जो कछवाह कहलाते हैं। दूसरे वंशज विश्वराज के वंशधर क्रमशः मूलराय व राष्ट्रवर के नाम से इनके वंशज राष्ट्रवर (राठौड़) कहलाये। बाद के संस्कृत साहित्य में कहीं कहीं राष्ट्रवर (राठौड़ों) का संस्कृतनिष्ठ शब्द ‘राष्ट्रकूट’ या ‘राष्ट्रकूटियो’ भी लिखा है।

सूरज प्रकाश के लेखक करणीदान व टॉड के अनुसार तेरह खांपों की उत्पत्ति इस प्रकार हुई – (सूरजवंश प्रकाश-करणीदान पृ. 84 से 194)
  1. दानेश्वरा :- धर्मविम्ब एक दानी व्यक्ति हुआ। अतः इनके वंशज दानेश्वरा कहलाये। इनको कमधज भी कहा जाता था।
  2. अभैपुरा :- पुंज के दूसरे पुत्र भानुदीप कांगड़ा (हि. प्र.) के पास था। देवी ज्वालामुखी ने उसे अकाल के भय से रहित कर दिया अर्थात अभय बना दिया। इस कारण उसके वंशज अभयपुरा कहलाये।
  3. कपालिया :- पुंज के तीसरे पुत्र वीरचंद थे। इसने शिव को कपाल चढ़ा दिया था। इस कारण इनके वंशज कपालिया कहलाये।
  4. कुरहा :- पुंज के पुत्र अमरविजय ने परमारों से कुरहगढ़ जीता। संभवतः कुरह स्थान के नाम से कुरहा कहलाये।
  5. जलखेड़ा :- पुंज के पुत्र सजनविनोद ने तंवरों को परास्त किया और जलंधर की सहायता से जल प्रवाह में बहा दिया। अतः इसके वंशज जलखेड़ा कहलाये।
  6. बुगलाणा :- पुंज के पुत्र पदम ने बुगलाणा स्थान के नाम से बुगलाणा कहलाये।
  7. अहर :- पुंज के पुत्र अहर के वंशज ‘अहर’ कहलाये। बंगाल की तरफ चले गए।
  8. पारकरा :- पुंज के पुत्र वासुदेव ने कन्नौज के पास कोई पारकरा नामक नगर बसाया अतः उसके वंशज ‘पारकर’ कहलाये।
  9. चंदेल :- दक्षिण में पुंज के पुत्र उग्रप्रभ ने चंदी व चंदावर नगर बसाये अतः चंदी स्थान के नाम से चंदेल कहलाये। (चंदेल-चंद्रवंशी इनसे भिन्न हैं।)
  10. वीर :- सुबुद्धि या मुक्तामान बड़ा वीर हुआ। इसे वीर की उपाधि दी। इस कारण इनके वंशज वीर राठौड़ कहलाये।
  11. दरियावरा :- भरत ने बरियावर स्थान पर राज्य किया। स्थान के नाम से ये ‘बरियावर’ कहलाये।
  12. खरोदिया :- कृपासिंधु (अनलकुल) खरोदा स्थान के नाम से खरोदिया राठौड़ कहलाये।
  13. जयवंशी :- चंद्र व इसके वंशज जय पाने के कारण जयवंशी कहलाये।
राठौड़ों की खांपें और उनके ठिकाने
राठौड़ों की प्राचीन तेरह खांपें थी। राजस्थान में आने वाले सीहाजी राठौड़ दानेश्वरा खांप के राठौड़ थे। सींहाजी के वंशजों से जो खांपें चली वे इस प्रकार हैं –
  1. ईडरिया राठौड़ :- सोगन (पुत्र सीहा) ने ईडर पर अधिकार जमाया। अतः ईडर के नाम से सोगन के वंशज ईड़रिया राठौड़ कहलाये। (टॉड कृत राजस्थान-अनु केशवकुमार ठाकुर पृ. 356)
  2. हटुण्डिया राठौड़ :- सोगन के वंशज हस्तिकुण्डी (हटूंडी) में रहे। वे हटुण्डिया राठौड़ कहलाये। (अ) (टॉड) कृत राजस्थान-अनु. केशवकुमार ठाकुर पृ. 356) (ब) जोधपुर इतिहास में ओझा लिखते है कि सीहाजी से पहले हस्तिकुण्डी (हटकुण्डी) में राष्ट्रकूट बालाप्रसाद राज करता था। उसके वंशज हटुण्डिया राठौड़ है।
  3. बाढेल (बाढेर) राठौड़ :- सीहाजी के छोटे पुत्र अजाजी के दो पुत्र बेरावली और बिजाजी ने द्वारका के चावड़ों को बाढ़ कर (काट कर) द्वारका (ओखा मण्डल) पर अपना राज्य कायम किया।इस कारण बेरावलजी के वंशज बाढेल राठौड़ हुए। आजकल ये बाढेर राठौड़ कहलाते है। गुजरात में पोसीतरा, आरमंडा, बेट द्वारका बाढेर राठौड़ो के ठिकाने थे।
  4. बाजी राठौड़ :- बेरावलजी के भाई बीजाजी के वंशज बाजी राठौड़ कहलाते है। गुजरात में महुआ, वडाना आदि इनके ठिकाने थे। बाजी राठौड़ आज भी गुजरात में ही बसते है।
  5. खेड़ेचा राठौड़ :- सीहा के पुत्र आस्थान ने गुहिलों से खेड़ जीता। खेड़ नाम से आस्थान के वंशज खेड़ेचा राठौड़ कहलाते है। 
  6. धुहड़िया राठौड़ :- आस्थान के पुत्र धुहड़ के वंशज धुहड़िया राठौड़ कहलाते है।
  7. धांधल राठौड़ :- आस्थान के पुत्र धांधल के वंशज धांधल राठौड़ कहलाये। पाबूजी राठौड़ इसी खांप के थे। इन्होंने चारणी को दिये गये वचनानुसार पाणिग्रहण संस्कार को बीच में छोड़ चारणी की गायों को बचाने के प्रयास में शत्रु से लड़ते हुए वीर गति प्राप्त की। यही पाबूजी लोक देवता के रूप में पूजे जाते हैं।
  8. चाचक राठौड़ :- आस्थान के पुत्र चाचक के वंशज चाचक राठौड़ कहलाये।
  9. हरखावत राठौड़ :- आस्थान के पुत्र हरखा के वंशज।
  10. जोलू राठौड़ :- आस्थान के पुत्र जोपसा के पुत्र जोलू के वंशज।
  11. सिंघल राठौड़ :- जोपसा के पुत्र सिंघल के वंशज। ये बड़े पराक्रमी हुए। इनका जैतारण पर अधिकार था। जोधा के पुत्र सूजा ने बड़ी मुश्किल से उन्हें वहां से हटाया।
  12. ऊहड़ राठौड़ :- जोपसा के पुत्र ऊहड़ के वंशज।
  13. मूलू राठौड़ :- जोपसा के पुत्र मूलू के वंशज।
  14. बरजोर राठौड़ :- जोपसा के पुत्र बरजोर के वंशज।
  15. जोरावत राठौड़ :- जोपसा के वंशज।
  16. रैकवाल राठौड़ :- जोपसा के पुत्र राकाजी के वंशज है। ये मल्लारपुर, बाराबकी, रामनगर, बडनापुर, बैहराइच (जि. रामपुर) तथा सीतापुर व अवध जिले (उ.प्र.) में हैं। बोडी, रहका, मल्लापुर, गोलिया कला, पलवारी, रामनगर, घसेड़ी, रायपुर आदि गांव (उ.प्र.) में थे।
  17. बागड़िया राठौड़ :- आस्थानजी के पुत्र जोपसा के पुत्र रैका से रैकवाल हुए। नौगासा बांसवाड़ा के एक स्तम्भ लेख बैशाख वदि 1361 में मालूम होता है कि रामा पुत्र वीरम स्वर्ग सिधारा। ओझाजी ने इसी वीरम के वंशजों को बागड़िया राठौड़ माना जाता है (जोधपुर राज्य का इतिहास-ओझा पृ. 634) क्योंकि बांसवाड़ा का क्षेत्र बागड़ कहलाता था।
  18. छप्पनिया राठौड़ :- मेवाड़ से सटा हुआ मारवाड़ की सीमा पर छप्पन गांवों का क्षेत्र छप्पन का क्षेत्र है। यहाँ के राठौड़ छप्पनिया राठौड़ कहलाये। यह खांप बागड़िया राठौड़ों से ही निकली है। (जोधपुर का राज्य इतिहास-ओझा पृ. 134) उदयपुर रियासत के कणतोड़ गांव की जागीर थी। (राजपूताने का इतिहास प्रथम भाग-गहलोत पृ. 347)
  19. आसल राठौड़ :- आस्थान के पुत्र आसल के वंशज आसल राठौड़ कहलाये।
  20. खोपसा राठौड़ :-आस्थान के पुत्र जोपसा के पुत्र खीमसी के वंशज।
  21. सिरवी राठौड़ :- आस्थान के पुत्र धुहड़ के पुत्र शिवपाल के वंशज।
  22. पीथड़ राठौड़ :- आस्थान के पुत्र धुहड़ के पुत्र पीथड़ के वंशज।
  23. कोटेचा राठौड़ :- आस्थान के पुत्र धुहड़ के पुत्र रायपाल हुए। रायपाल के पुत्र केलण के पुत्र कोटा के वंशज कोटेचा हुए। बीकानेर जिले में करणाचण्डीवाल, हरियाणा में नाथूसरी व भूचामण्डी, पंजाब में रामसरा आदि इनके गांव है।
  24. बहड़ राठौड़ :- धुहड़ के पुत्र बहड़ के वंशज।
  25. ऊनड़ राठौड़ :- धुहड़ के पुत्र ऊनड़ के वंशज।
  26. फिटक राठौड़ :- रायपाल के पुत्र केलण के पुत्र थांथी के पुत्र फिटक के वंशज फिटक राठौड़ हुए। (जोधपुर राज्य की ख्यात जिल्द 1 पृ 21 )
  27. सुण्डा राठौड़ :- रायपाल के पुत्र सुण्डा के वंशज।
  28. महीपालोत राठौड़ :- रायपाल के पुत्र महिपाल के वंशज। (दयालदास की ख्यात जिल्द 1 पृ 54 )
  29. शिवराजोत राठौड़ :- रायपाल के पुत्र शिवराज के वंशज। (दयालदास की ख्यात जिल्द 1 पृ 54 )
  30. डांगी :-रायपाल के पुत्र डांगी के वंशज। (दयालदास की ख्यात जिल्द 1 पृ 54 ) ढोलिन से शादी की अतः इनके वंशज डांगी ढोली हुए।
  31. मोहणोत :- रायपाल के पुत्र मोहण ने एक महाजन की पुत्री से शादी की। इस कारण मोहण के वंशज मुहणोत वैश्य कहलाये। मुहणोत नैणसी इसी खांप से थे।
  32. मापावत राठौड़ :- रायपाल के वंशज मापा के वंशज।
  33. लूका राठौड़ :- रायपाल के वंशज लूका के वंशज।
  34. राजक :- रायपाल के वंशज राजक के वंशज।
  35. विक्रमायत राठौड़ :- रायपाल के पुत्र विक्रम के वंशज। (राजपूत वंशावली -ईश्वरसिंह मढाढ ने रादां, मूपा और बूला भी रायपाल के पुत्रों से निकली हुई खांपें मानी जाती है। )
  36. भोवोत राठौड़ :- रायपाल के पुत्र भोवण के वंशज। (नैणसी भाग 2 पृ. 476)
  37. बांदर राठौड़ :- रायपाल के पुत्र कानपाल हुए। कानपाल के जालण और जालण के पुत्र छाड़ा के पुत्र बांदर के वंशज बांदर राठौड़ कहलाये। घड़सीसर (बीकानेर राज्य) में बताये जाते है।
  38. ऊना राठौड़ :- रायपाल के पुत्र ऊना के वंशज। (नैणसी भाग 2 पृ. 476)
  39. खोखर राठौड़ :- 
  40. सिंहमकलोत राठौड़ :- छाड़ा के पुत्र सिंहल के वंशज। अलाउद्दीन के सातलेक के समय सिवाना पर चढ़ाई की।
  41. बीठवासा उदावत राठौड़ :- रावल तीड़ा के पुत्र कानड़दे के पुत्र रावल के पुत्र त्रिभवन के पुत्र उदा के ‘बीठवास’ जागीर था। अतः उदा के वंशज बीठवासिया उदावत कहलाये। उदाजी के पुत्र बीरमजी बीकानेर रियासत के साहुवे गांव से आये। जोधाजी ने उनको बीठवासिया गांव की जागीर दी। इस गांव के अतिरिक्त वेगडियो व धुनाडिया गांव भी इनकी जागीर में थे। (मा. प. वि. भाग तृतीय पृ. 496)
  42. सलखावत :- छांडा के पुत्र तीड़ा के पुत्र सलखा के वंशज सलखाखत राठौड़ कहलाये।
  43. जैतमालोत :- सलखा के पुत्र जैतमाल के वंशज जैतमालोत राठौड़ कहलाये। (जो. राज्य का इतिहास प्रथम भाग ओझा पृ.184 ) ये बीकानेर रियासत में भी कहीं 2 निवास करते है।
  44. जुजाणिया :- जैतमाल सलखावत के पुत्र खेतसी के वंशज है। गांव थापणा इनकी जागीर में था।
  45. राड़धडा :- जैतमाल के पुत्र खींवा ने राड़धडा पर अधिकार किया। अतः उनके वंशज राड़धडा स्थान के नाम से राड़धडा राठौड़ कहलाये। (जो. राज्य का इतिहास प्रथम भाग ओझा पृ. 184 )
  46. महेचा :- 
  47. बाढ़मेरा :- मल्लीनाथ के छोटे पुत्र अरड़कमल ने बाड़मेर इलाके नाम से इनके वंशज बाढ़मेरा राठौड़ कहलाये।
  48. पोकरण :- मल्लीनाथ के पुत्र जगमाल के जिन वंशजों का पोकरण इलाके में निवास हुआ। वे पोकरण राठौड़ कहलाये। नीमाज का इतिहास- पं. रामकरण आसोपा पृ. 4 क्ष. जा. सूची पृ. 22 )
  49. खाबड़िया :- मल्लीनाथ के पुत्र जगमाल के पुत्र भारमल हुए। भारमल के पुत्र खीमूं के पुत्र नोधक के वंशज जामनगर के दीवान रहे इनके वंशज कच्छ में है। भारमल के दूसरे पुत्र मांढण के वंशज माडवी (कच्छ) में रहते है वंशज, खाबड़ (गुजरात) इलाके के नाम से खाबड़िया राठौड़ कहलाये।
  50. कोटड़िया :- जगमाल के पुत्र कुंपा ने कोटड़ा पर अधिकार किया अतः कुंपा के वंशज कोटड़िया राठौड़ कहलाये। (जोधपुर राज्य का इतिहास प्रथम भाग ओझा पृ. 191 ) जगमाल के पुत्र खींवसी के वंशज भी कोटडिया राठौड़ कहलाये।
  51. गोगादे :- सलखा के पुत्र विराम के पुत्र गोगा के वंशज गोगादे राठौड़ कहलाते है। (जोधपार राज्य का इतिहास प्रथम भाग ओझा पृ. 195-197) केतु (चार गांव) सेखला (15 गांव) खिराज आदि इनके ठिकाने थे।
  52. देवराजोत :- बीरम के पुत्र देवराज के वंशज देवराजोत राठौड़ कहलाये। (जोधपुर राज्य का इतिहास प्रथम भाग ओझा पृ. 195-197) सेतरावों इनका मुख्य ठिकाना था। सुवालिया आदि भी इनके ठिकाने थे।
  53. चाड़देवोत :- वीरम के पौत्र व देवराज के पुत्र चाड़दे के वंशज चाड़देवोत राठौड़ हुए। जोधपुर परगने का देछु इनका मुख्य ठिकाना था। गीलाकोर में भी इनकी जागीर थी।
  54. जैसिधंदे :- वीरम के पुत्र जैतसिंह के वंशज।
  55. सतावत :- चुण्डा वीरमदेवोत के पुत्र सत्ता के वंशज।
  56. भींवोत :- चुण्डा के पुत्र भींव के वंशज। खाराबेरा (जोधपुर) इनका ठिकाना था।
  57. अरड़कमलोत :- चुण्डा के पुत्र अरड़कमल वीर थे। राठौड़ो और भाटियों के शत्रुता के कारण शार्दूल भाटी जब कोडमदे मोहिल से शादी कर लौट रहा था, तब अरड़कमल ने रास्ते में युद्ध के लिए ललकारा और युद्ध में दोनों ही वीरता से लड़े। शार्दूल भाटी ने वीरगति पाई और कोडमदे सती हुई। अरड़कमल भी उन घावों से कुछ दिनों बाद मर गए। इस अरड़कमल के वंशज अरड़कमलोत राठौड़ कहलाये।
  58. रणधीरोत :- चुण्डा के पुत्र रणधीर के वंशज है। फेफाना इनकी जागीर थी।
  59. अर्जुनोत :- राव चुण्डा के पुत्र अर्जुन वंशज। (राजपूत वंशावली – ठा. ईश्वरसिंह मढाढ पृ. 82 )
  60. कानावत :-चुण्डा के पुत्र कान्हा वंशज कानावत राठौड़ कहलाये।
  61. पूनावत :- चुण्डा के पुत्र पूनपाल के वंशज है। गांव खुदीयास इनकी जागीर में था।
  62. जैतावत राठौड़ :- राव रणमलजी के जयेष्ठ पुत्र अखैराज थे। इनके दो पुत्र पंचायण व महाराज हुए। पंचायण के पुत्र जैतावत कहलाते है।
    १.) पिरथीराजोत जैतावत :- जैताजी के पुत्र पृथ्वीराज के वंशज पिरथीराजोत जैतावत कहलाते हैं। बगड़ी (मारवाड़) व सोजत खोखरों, बाली आदि इनके ठिकाने थे।
    २.) आसकरनोत जैतावत :- जैताजी के पौत्र आसकरण देइदानोत के वंशज आसकरनोत जैतावत है। मारवाड़ में थावला, आलासण, रायरो बड़ों, सदामणी, लाबोड़ी मुरढावों आदि इनके ठिकाने थे।
    ३.) भोपतोत जैतावत :- जैताजी के पुत्र देइदानजी भोपत के वंशज भोपतोत जैतावत कहलाते हैं। मारवाड़ में खांडों देवल, रामसिंह को गुडो आदि इनके ठिकाने थे।
  63. कलावत राठौड़ :- राव रिड़मल के पुत्र अखैराज, इनके पुत्र पंचारण के पुत्र कला के वंशज कलावत राठौड़ कहलाते हैं। कलावत राठौड़ों के मारवाड़ में हूण व जाढ़ण दो गांवों के ठिकाने थे।
  64. भदावत :- राव रणमल के पुत्र अखैराज के बाद क्रमशः पंचायत व भदा हुए। इन्हीं भदा के वंशज भदावत राठौड़ कहलाये। देछु (जालौर) के पास तथा खाबल व गुडा (सोजत के पास) इनके मुख्य ठिकाने थे।
  65. पावत :- 
  66. जोधा राठौड़ :- 
  67. उदावत राठौड़ :- 
  68. बीदावत राठौड़ :- 
  69. मेड़तिया राठौड़ :- 
  70. चाँपावत राठौड़ :- 
  71. मण्डलावत राठौड़ :- राव रिड़मल के पुत्र मण्डलाजी ने वि. सं. 1522 में सारूंडा (बीकानेर राज्य) पर अधिकार कर लिया था। यह इनका मुख्य ठिकाना था। इन्हीं मण्डला के वंशज मण्डलावत राठौड़ है।
  72. खरोत :- बाला राठौड़ – राव रिड़मल (रणमल) के पुत्र भाखरसी के वंशज भाखरोत कहलाये। इनके पुत्र बाला बड़े बहादुर थे। इन्होनें कई युद्धों में वीरता का परिचय दिया। चित्तौड़ के पास कपासण में राठौड़ों और शीशोदियों में युद्ध हुआ। इस युद्ध में बाला घायल हुए। सिंघलों से वि. सं. 1536 में जोधपुर का युद्ध मणियारी नामक स्थान हुआ। इस युद्ध में चांपाजी मारे गए। बाला ने सिंघलो को भगाकर अपने काकाजी का बदला लिया। इन्हीं बाला के वंशज बाला राठौड़ कहलाये। मोकलसर (सिवाना) नीलवाणों (जालौर) माण्डवला (जालौर) इनके ताजमी ठिकाने थे। ऐलाणों, ओडवाणों, सीवाज आदि इनके छोटे छोटे ठिकाने थे।
  73. पाताजी राठौड़ :- राव रिड़मल के पुत्र पाता भी बड़े वीर थे। वि. सं. 1495 में कपासण (चित्तौड़ के पास) स्थान पर शीशोदियों व राठौड़ों में युद्ध हुआ। इस युद्ध में पाताजी वीरगति को प्राप्त हुआ। इनके पातावत राठौड़ कहलाये। पातावतों के आऊ (फलौदी- 4 गांव) करण (जोधपुर) पलोणा (फलौदी) ताजीम के ठिकाने थे। इनके अलावा अजाखर, आवलो, केरलो, केणसर, खारियों (मेड़ता) खारियों (फलौदी) घंटियाली, चिमाणी, चोटोलो, पलीणो, पीपासर भगुआने श्री बालाजी, मयाकोर, माडवालो, मिठ्ठियों भूंडासर, बाड़ी, रणीसीसर, लाडियो, लूणो, लुबासर, सेवड़ी आदि छोटे छोटे ठिकाने जोधपुर रियासत में थे।
  74. रूपावत राठौड़ :- राव रिड़मल के पुत्र रूपा ने बीका का उस समय साथ दिया जब वे जांगल देश पर अधिकार रहे थे। इन्हीं रूपा के वंशज रूपावत राठौड़ हुए। मारवाड़ में इनका चाखू एक ताजीमी ठिकाना था। दूसरा ताजीमी ठिकाना भादला (बीकानेर राज्य) था। इनके अतिरिक्त ऊदट (फलौदी) कलवाणी (नागौर) भेड़ (फलौदी) मूंजासर (फलौदी) मारवाड़ में तथा सोभाणो, उदासर आदि बीकानेर राज्य के छोटे छोटे ठिकाने थे।
  75. करणोत राठौड़ :- राव रिड़मल के पुत्र करण के वंशज करणोत राठौड़ कहलाये। इसी वंश में दुर्गादास (आसकरणोत) हुए। जिन पर आज भी सारा राजस्थान गर्व करता है। अनेकों कष्ट सहकर इन्होनें मातृभूमि की इज्जत रखी। अपनी स्वामिभक्ति के लिए ये इतिहास में प्रसिद्ध रहे है।
  76. माण्डणोत राठौड़ :- राव रिड़मल के पुत्र मांडण के वंशज माण्डणोत राठौड़ कहते हैं। मारवाड़ में अलाय इनका ताजीमी ठिकाना था। इनके अतिरिक्त गठीलासर, गडरियो, गोरन्टो, रोहिणी, हिंगवाणिया आदि इनके छोटे छोटे ठिकाने थे।
  77. नाथोत राठौड़ :- नाथा राव रिड़मल के पुत्र थे। राव चूंडा नागौर के युद्ध में भाटी केलण के हाथों मारे गए। नाथाजी ने अपने दादा का बेर केलण के पुत्र अक्का को मार कर लिया। इन्हीं नाथा के वंशज नाथोत राठौड़ कहलाते हैं। पहले चानी इनका ठिकाना था।नाथूसर गांव इनकी जागीर में था।
  78. सांडावत राठौड़ :- राव रिड़मल के पुत्र सांडा के वंशज।
  79. बेरावत राठौड़ :- राव रिड़मल के पुत्र बेरा के वंशज। दूधवड़ इनका गांव था।
  80. अडवाल राठौड़ :- राव रिड़मल के पुत्र अडवाल के वंशज। ये मेड़ता के गांव आछोजाई में रहे। राव रिड़मल के पुत्र ;-
  81. खेतसिंहोत राठौड़ :- राव रिड़मल के पुत्र जगमाल के पुत्र खेतसी के वंशज। इनको नेतड़ा गांव मिला था
  82. लखावत राठौड़ :- राव रिड़मल के पुत्र लखा के वंशज।
  83. डूंगरोज राठौड़ :- राव रिड़मल के पुत्र डूंगरसी के वंशज डूंगरसी को भाद्रजूण मिला था।
  84. भोजाराजोत राठौड़ :- राव रिड़मल के पौत्र भोजराज जैतमालोत के वंशज। इन्हें पलसणी गांव मिला था। (राव रिड़मल के पुत्र हापा, सगता, गोयन्द, कर्मचंद और उदा के वंशजों की जानकारी उपलब्ध नहीं। उदा के वंशज बीकानेर के उदासर आदि गांव में सुने जाते हैं )


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मुस्लिम संत हरिदास ठाकुर यवन की कृष्ण भक्ति



श्री हरिदास जी का जीवन-परिचय

श्री हरिदास जी का जन्म वर्तमान जैसोर जिले के बूढ़न नामक ग्राम में एक संभ्रांत मुसलमान परिवार में हुआ था। किसी पूर्व संस्कार के कारण बाल्यकाल से ही हरिदास जी को हरिनाम अत्यंत प्रिय लगता था। वे श्रीकृष्ण की लीलाओं को बड़े चाव से सुना करते थे।

धीरे-धीरे हरिदास जी का मन मुसलमानी मजहब से हट गया। (कुछ लोगों का यह भी कहना है कि हरिदास जी का जन्म हिन्दू कुल में हुआ था और बाद में वे मुसलमान हो गए थे।) अंततः उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन श्रीकृष्ण के चरणारविन्दों में समर्पित कर दिया और दिन-रात उच्च स्वर से हरिनाम-कीर्तन करने लगे।

उनका दृढ़ विश्वास था कि जो व्यक्ति भूल से भी हरिनाम ले लेता है अथवा सुन लेता है, वह नरक से बच जाता है। मनुष्य की तो बात ही क्या है, यदि नीच से नीच पशुओं के कानों में भी हरिनाम सुना दिया जाए, तो उनका भी उद्धार हो सकता है। इसी कारण वे ऊँचे स्वर में हरिनाम-संकीर्तन किया करते थे।

उनका मत था कि यही सच्ची शुद्धि है। जो व्यक्ति विश्वासपूर्वक, सच्चे मन से भगवद्भक्त होकर हिन्दू धर्म को मानना चाहता है, उसे जगत में कौन रोक सकता है?

अस्तु!



बेफायोल के वन में हरिदास जी ने कुटिया बना रखी थी। हरिनाम अधिक लेने के कारण इनका नाम हरिदास पड़ गया था। चारों ओर इस बात की ख्याति हो गयी थी।

भक्त की बड़ी कठिन परीक्षा हुआ करती है। इन्द्रिय-भोगों के बड़े-बड़े लुभावने पदार्थ उसके सामने आकर उसके मन को डिगाना चाहते हैं। इसी के अनुसार उस देश के दुरात्मा जमींदार रामचन्द्र खाँ के मन में हरिदास का तप नाश करने की प्रवृत्ति हुई और उसने इस काम के लिये एक परम सुन्दरी वेश्या को हरिदास की कुटिया पर भेजा।

वेश्या ने तीन रात तक लगातार बड़ी चेष्टा की, परन्तु वह हरिदास के हरि-चरण-लीन चित्त में जरा-सी भी चंचलता उत्पन्न नहीं कर सकी। जिसका मन एक बार उस अलौकिक रूप-सुधा का रसास्वादन कर चुका है, वह विलास-रसिका के रसालाप की ओर कैसे खिंच सकता है?

हरिदास जी प्रतिदिन तीन लाख नाम-जप किया करते थे। वेश्या ने तीन रात तक कीर्तन किया। उसके पापों का बहुत-सा संचित कर्म नष्ट हो गया। मन में शुभ स्फुरणा हुई।

वेश्या ने सोचा कि मेरे बिना बुलाये ही सैकड़ों मनुष्य मेरे रूप-दर्शन की लालसा से मेरे घर पर आकर मेरे रूप पर मोहित होकर अपना सर्वस्व दे जाते हैं। पता नहीं हरिदास किस रस में डूब रहा है, न मालूम किस अनुपम रूप पर मोहित हो रहा है, जो इतनी चेष्टा करने पर भी मेरी ओर नहीं ताकता। धन्य है इस हरिदास को, जो भोगों की वासना को इस प्रकार पददलित कर भगवन्नाम-अमृत-पान में उन्मत्त हो रहा है। मैंने तो अपना जीवन केवल पापों के बटोरने में लगाया, मेरी क्या गति होगी?

यों सोचते-सोचते वेश्या का अन्तःकरण पिघल गया। उसके नेत्रों से आँसू बहने लगे और वह तुरन्त दौड़कर संत के चरणों में गिर पड़ी और बोली— "प्रभो! बिना समझे, प्रमादवश मैंने बड़ा अपराध किया है, मेरा उद्धार कीजिये।"

वेश्या पर इतनी भगवत्-कृपा देखकर भक्त हरिदास का हृदय भर आया। उन्होंने उसे हरिनाम-मन्त्र देकर कहा कि "जाओ, अपनी धन-सम्पत्ति गरीबों को लुटा दो और इसी कुटिया में बैठकर साधन करो। मैं जाता हूँ।"

वेश्या साधन में लग गयी। उसका नरक-समान हृदय साक्षात् वैकुण्ठधाम बन गया। भगवान उसमें निवास करने लगे। साधु-संग से सूखा वृक्ष हरा-भरा हो गया। वेश्या परम भक्तिमती होकर परमात्मा को पा गयी।

वहाँ से हरिदास जी चाँदपुर के जमींदार के कुलपुरोहित बलरामाचार्य के घर पर आये। बलराम और उनके दोनों जमींदार शिष्य हरिदास जी की भक्ति देखकर मुग्ध हो गये और उनको गुरु-सदृश मानने लगे।

भक्त को कौन नहीं मानता? जिसको भगवान ने अपनाया, उसको जगत् ने अपना लिया।

गरल सुधा रिपु करै मिताई।
गोपद सिन्धु अनल सितलाई॥

जमींदार-पुत्र रघुनाथ ने इसी समय भक्ति प्राप्त की और आगे चलकर वे परम भक्त हुए। हरिदास जी एक दिन कह रहे थे कि हरिनाम से मुक्ति होती है, हरिनाम के आभास से ही मुक्ति होती है। इस बात को सुनकर गोपाल चक्रवर्ती नामक एक मनुष्य ने व्यंग्य करके कहा कि इसकी बात किसी को नहीं माननी चाहिए। जो फल योग और तप से नहीं मिलता, वह केवल हरिनाम से कभी नहीं मिल सकता। यदि ऐसा हो, तो मेरी नाक कट जाए।

हरिदास जी ने कहा कि "यदि ऐसा न होता होगा, तो मेरी नाक कट जाएगी।" बड़े आश्चर्य की बात है कि थोड़े ही दिनों बाद कुष्ठरोग से गोपाल की नाक गलकर गिर पड़ी।

हरिदास जी चाँदपुर से आकर फुलिया नामक ग्राम में रहने लगे। यहाँ के मुसलमान काजी को मालूम हुआ कि हरिदास मुसलमान होकर भी काफिरों के आचरण करता है। अतएव उसने हरिदास को अपने मत के अनुसार सीधे रास्ते पर लाना चाहा। हरिदास की दूसरी कठोर परीक्षा का प्रारम्भ हुआ।

हरिदास जी पकड़े जाकर विचार के लिये काजी साहब के सामने लाए गए। काजी ने कहा— "तूने मुसलमान होकर काफिरों का मजहब कैसे मंजूर किया? जाओ, इस बेवकूफी को छोड़कर फिर कलमा पढ़ लो, नहीं तो कड़ी से कड़ी सजा दी जाएगी।"

इन शब्दों को सुनकर हरिदास जी को जरा-सा भी भय नहीं हुआ। भयहारी भगवान के भक्त-सुलभ चरण-कमलों का आश्रित यमराज से भी नहीं डरता। प्राणों की आहुति तो वह पहले दे चुका होता है। भगवान ने गीता में कहा है—

"यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते।"

जिसमें स्थित होकर वह बड़े-से-बड़े दुःख से भी विचलित नहीं होता।

हरिदास जी ने निर्भयता, परन्तु स्वभाव-सुलभ नम्रता के साथ काजी से कहा— "भाई! ईश्वर एक है, अखण्ड और अव्यय है। वह हिन्दू-मुसलमान के लिये अलग-अलग नहीं होता। उसकी जैसी प्रेरणा होती है, मनुष्य वैसे ही करता है। मुझे कृष्ण-नाम प्यारा लगता है, इसी से मैं इसे लेता हूँ। इसमें तुम्हारा क्या बिगड़ता है?"

हरिदास जी की इन बातों से काजी कुछ नरम हुआ, परन्तु उसके मंत्रियों ने कहा कि यदि इसको दण्ड नहीं दिया जाएगा, तो इसकी देखा-देखी और भी मुसलमान हिन्दू हो जाएँगे। अतएव काजी ने हरिदास के बाइस बाजारों में बेंत लगाने का दण्ड दिया।

दुष्ट मंत्रियों ने सोचा कि बेंतों की मार से भी यदि हरिदास बच जाएगा और नाम नहीं छोड़ेगा, तब समझेंगे कि इसका हरिनाम सत्य है।

काजी ने हरिदास जी को फिर समझाकर हरिनाम छोड़ने के लिये कहा। परन्तु हरिदास ने स्वीकार नहीं किया। वे बोले—

टुकड़े-टुकड़े देह हो, प्राण जाएँ सुरधाम।
तब भी मैं छोड़ूँ नहीं, पावन हरि का नाम॥

काजी को यह सुनकर बड़ा क्रोध हुआ और उसने प्राण-दण्ड की आज्ञा दे दी। फाँसी पर चढ़ाकर या गोली मारकर प्राण लेने के स्थान पर निर्दयतापूर्वक बाजारों में घुमा-घुमाकर बेंत मार-मारकर प्राण लेने की व्यवस्था की गई।

हरिदास जी किंचित भी नहीं घबराए। एक बाजार में लाकर उनको बाँध दिया गया और बड़ी निर्दयता से उन पर कोड़े लगने लगे। परन्तु हरिदास जी का हरिनाम-संकीर्तन ज्यों-का-त्यों जारी रहा। उधर हरिदास जी बड़े जोर से बोलते— "हरि!" उधर दुष्ट बड़े जोर से बेंत मारता।

यों एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे करके बाइस बाजारों में हरिदास जी की पीठ पर बेंतें मारी गईं। चमड़ा उड़ गया, रक्त की धारा से सारा शरीर भीग गया और लाल हो गया। इधर प्रेमाश्रुओं की धारा भी बह चली। पीठ से काजी के पाप की नदी और आगे से भक्त के प्रेम की निर्मल नदी बहने लगी।

हरिदास जी नामोच्चारण और भी बड़े जोर-जोर से करने लगे। गाँव भर में हाहाकार मच गया। बड़ी भीड़ हो गई। सब लोग शाप देने लगे। कोई कहता था कि ईश्वर इस अन्याय को नहीं सहेंगे। कोई कहता था कि इस अन्याय से पृथ्वी काँप उठेगी। कोई कहता था कि काजी का समूल वंश नाश हो जाएगा।

इधर हरिदास जी का मन दूसरी ही चिंता में मग्न था। उन्हें अपने ऊपर मार पड़ने और कष्ट पाने के लिये क्षोभ नहीं था। उन्हें यह विश्वास था कि अभी ये लोग मुझ पर जितना अत्याचार कर रहे हैं, समय आने पर न्यायकर्ता परमेश्वर की ओर से इन लोगों को इससे भी अधिक कष्टदायक दण्ड भोगना पड़ेगा।

उनके भावी कष्ट की भावना से संत हरिदास का चित्त द्रवित हो गया। पापों से हटाने के लिये हरिदास जी ने उन लोगों से कहा— "भाई! शांत होओ। मुझे मारने से तुम्हें क्या लाभ होगा? तुम मुझे क्यों मार रहे हो? मैंने तुम्हारा कोई नुकसान नहीं किया। हिन्दू हो या मुसलमान, परन्तु यह तो सभी को मानना पड़ेगा कि निर्दोष जीव को सताना पाप है। भगवान साक्षी हैं, मैं ये बातें इसलिए नहीं कहता कि बेंतों की चोट से मुझे दर्द हो रहा है, परन्तु इसीलिए कहता हूँ कि तुम लोग भ्रमवश अपना भविष्य बड़ा दुःखमय बना रहे हो।"

हरिदास जी के इन शब्दों से उन लोगों पर कुछ असर तो हुआ, परन्तु उन्होंने अपना काम छोड़ा नहीं। हरिदास जी को बड़ी दया आई। उनके नेत्रों से आँसुओं की धारा बहने लगी। उन्होंने अपना हृदय खोलकर दयामय भगवान के सामने रखा और बड़े जोर से बोले—

"हे मेरे कृष्ण! हे मेरे स्वामी! हे दयासिन्धु! इन गरीबों पर दया करो। इनके इस अपराध को क्षमा कर दो। बेचारे भूले हुए जीव हैं, अपना भला-बुरा सोचने में असमर्थ हैं। इन पर कृपा करो।"

यों कहकर हरिदास जी रोने लगे। भीड़ के लोगों ने कहा— "हरिदास क्या कह रहे हैं? पागल तो नहीं हो गए? मारने वाले के लिये ईश्वर से क्षमा-याचना करना कहाँ का धर्म है?"

यूँ कहते-कहते लोग भक्त की महिमा से प्रेम में भर गए और हरिनाम लेकर नाचने लगे।

इधर हरिदास जी को प्रेम-मूर्छा हो गई। प्रेममत्त हरिदास जी के भावावेश से काजी के सेवकों ने समझा कि इनकी मृत्यु हो गई। इसलिये उसी अवस्था में उन्हें उठाकर गङ्गा जी में बहा दिया।

गंगा में बहते-बहते हरिदास जी को चेत हो गया और वे किनारे पर आकर बाहर निकल आए। लोगों की अपार भीड़ लगी हुई थी। काजी ने जब इनके जीवित होने की बात सुनी, तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। वह दौड़कर आया और संत हरिदास जी के चरणों में गिर पड़ा। उसने क्षमा-प्रार्थना की और अन्त में वह परम भक्त बन गया।

हरिदास जी हरिध्वनि करते हुए चल दिए।

इसके बाद श्री हरिदास जी नवद्वीप में आए और वहाँ अद्वैताचार्य से मिले। इसी समय नवद्वीप में भगवान चैतन्य प्रकट हुए और बंगाल को हरिभक्ति की सुधा-धारा में प्लावित कर दिया।

हरिदास जी का शेष जीवन श्री चैतन्य महाप्रभु के संग में बीता।

बोलो भक्त और उनके भगवान की जय!


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श्रीराम की पुनः लंका - यात्रा और सेतु भंग



पद्म पुराण के अनुसार एक समय भगवान श्रीराम को राक्षस राज विभीषण का स्मरण हो आया। उन्होंने सोचा कि ‘विभीषण धर्म पूर्वक शासन कर रहा है कि नहीं ? देव - विरोधी व्यवहार ही राजा के विनाश का सूत्र है। मैं विभीषण को लंका का राज्य दे आया हूँ, अब जाकर उसे सम्हालना भी चाहिए। कहीं राज मद में उससे अधर्माचरण तो नहीं हो रहा है। अतएव मैं स्वयं लंका जाकर उसे देखूँगा और हितकर उपदेश दूँगा, जिससे उसका राज्य अनन्त काल तक स्थायी रहेगा। ' श्रीराम यों विचार कर ही रहे थे कि भरतजी आ पहुँचे। भरत जी  के नम्रता से पूछने पर श्रीराम ने कहा -‘भाई ! तुमसे मेरा कुछ भी गोपनीय नहीं है, तुम और यशस्वी लक्ष्मण मेरे प्राण हो। मैंने निश्चय किया है कि मैं लंका जाकर विभीषण से मिलूँ, उसकी राज्य - पद्धति को देखूँ और उसे कर्तव्य का उपदेश दूँ। 'भरत ने कभी लंका नहीं देखी थी, इससे उसने भी साथ चलने की इच्छा प्रकट की, श्रीराम ने स्वीकार कर लिया और लक्ष्मण को सारा राज्य का कार्यभार सौंप कर दोनों भाई पुष्पक विमान पर चढ़ लंका के लिये विदा हुए।

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पहले भरत के दोनों पुत्रों की राजधानी में जाकर उनसे मिले और उनके कार्य का निरीक्षण किया, तदनंतर लक्ष्मण के पुत्रों की राजधानी में गये और वहाँ छः दिन ठहर कर सब कुछ देखा - भाला। इसके बाद भारद्वाज और अत्रि के आश्रमों को गये। फिर आगे चलकर श्रीराम ने चलते हुए विमान पर से वह सब स्थान दिखलाये जहाँ श्री सीताजी का हरण हुआ था, जटायु की मृत्यु हुई थी, कबन्ध को मारा था और बालि का वध किया था। तत्पश्चात किष्किंधापुरी में जाकर राजा सुग्रीव से मिले। सुग्रीव ने राजघराने के सब स्त्री पुरुषों, नगरी के समस्त नर नारियों समेत श्री राम और भरत का बड़ा भारी स्वागत किया। फिर सुग्रीव को साथ लेकर विमान पर से भरत को विभिन्न स्थान दिखाया और उनकी कथा सुनाते हुए लंका में जा पहुंचे, राजा विभीषण को उनके दूतों ने यह शुभ समाचार सुनाया।

श्री राम के लंका पधारने का संवाद सुनकर विभीषण को बड़ी प्रसन्नता हुई | सारा नगर बात की - बात में सजाया गया और अपने मंत्रियों को साथ लेकर विभीषण अगवानी के लिये चला। सुमेरु स्थित सूर्य की भांति विमानस्थ श्रीराम को देखकर साष्टांग प्रणाम पूर्वक विभीषण ने कहा —'प्रभो ! आज मेरा जन्म सफल हो गया, आज मेरे सारे मनोरथ सिद्ध हो गये। क्योंकि आज मैं जगद्बन्ध अनिन्द्य आप दोनों स्वामियों के चरण - दर्शन कर रहा हूँ। आज स्वर्गवासी देवगण भी मेरे भाग्य की श्लाघा कर रहे हैं। मैं आज अपने को त्रिदश पति इन्द्र की अपेक्षा भी श्रेष्ठ समझ रहा हूँ। ' सर्वरत्न सुशोभित उज्ज्वल भवन में महोत्तम सिंहासन पर श्रीराम विराजे, विभीषण अर्घ्य देकर हाथ जोड़ भरत और सुग्रीव की स्तुति करने लगा। लंका निवासी प्रजा की राम दर्शनार्थ भीड़ लग गयी। प्रजा ने विभीषण को कहलाया, ' प्रभो ! हमको इस अनोखी रूप माधुरी को देखे बहुत दिन हो गये। युद्ध के समय हम सब देख भी नहीं पाए थे। आज हम दीनों पर दया का हमारा हित करने के लिये करुणामय हमारे घर पधारे हैं, अतएव शीघ्र ही हम लोगों को उनके दर्शन कराइये। ' विभीषण ने श्रीराम से पूछा और दयामय की आज्ञा पाकर प्रजा के लिये द्वार खोल दिये। लंका के नर-नारी श्री राम-भरत की झांकी देखकर पवित्र और मुग्ध हो गये। यों तीन दिन बीते। चौथे दिन रावण माता कैकसी ने विभीषण को बुलाकर कहा, ' बेटा ! मैं भी श्रीराम के दर्शन करूँगी। उनके दर्शन से महामुनि गण भी महा पुण्य के भागी होते हैं। श्रीराम साक्षात् सनातन विष्णु हैं, वही यहाँ चार रूपों में अवतीर्ण हैं। सीता जी स्वयं लक्ष्मी हैं। तेरे भाई रावण ने यह रहस्य नहीं जाना। तेरे पिता ने कहा था कि रावण को मारने के लिये भगवान विष्णु रघुवंश में दशरथ के यहाँ प्रादुर्भूत होंगे। ' विभीषण ने कहा – ' माता ! आप नये वस्त्र पहन कर कंचन - थाल में चंदन, मधु, अक्षत, दधि, दूर्वा का अर्घ्य सजाकर भगवान श्रीराम का दर्शन करें। सरमा ( विभीषण - पत्नी ) को आगे कर और अन्यान्य देव कन्याओं को साथ लेकर आप श्रीराम के समीप जाये। मैं पहले ही वहां चला जाता हूँ।'
विभीषण ने श्रीराम के पास जाकर वहाँ से सब लोगों को बिल्कुल हटा दिया और श्रीराम से कहा, ‘देव ! रावण, कुम्भ कर्ण और मेरी माता कैकसी आपके चरण कमलों के दर्शनार्थ आ रही हैं, आप कृपापूर्वक उन्हें दर्शन देकर कृतार्थ करें। ' श्रीराम ने कहा, 'भाई ! तुम्हारी मां तो मेरी ' मां ' ही है। मैं ही उनके पास चलता हूँ, तुम जाकर उनसे कह दो, इतना कहकर विभु श्रीराम उठकर चले और कैकसी को देखकर मस्तक से उसे प्रणाम किया तथा बोले- आप मेरी धर्म माता हैं, मैं आपको प्रणाम करता हूँ। अनेक पुण्य और महान तप के प्रभाव से ही मनुष्य को आपके ( विभीषण - सदृश भक्तों की जननी के ) चरण - दर्शन का सौभाग्य मिलता है। आज मुझे आपके दर्शन से बड़ी प्रसन्नता हुई। जैसे श्री कौशल्या जी हैं, वैसे ही मेरे लिये आप हैं। ' बदले में कैकसी ने मातृ भाव से आशीर्वाद दिया और भगवान श्रीराम को विश्व पति जानकर उनकी स्तुति की। इसके बाद 'सरमा' ने भगवान की स्तुति की। भरत को सरमा का परिचय जानने की इच्छा हुई, उनके इशारे को समझ कर 'इङ्गित विद’ श्री राम ने भरत से कहा, ' यह विभीषण की साध्वी भार्या हैं, इनका नाम सरमा है। यह महाभागा सीता की प्रिय सखी हैं, और इनकी सखिता बहुत दृढ़ है। ' इसके बाद सरमा को समायोचित उपदेश दिया। फिर विभीषण को विविध उपदेश देकर कहा कि ' हे निष्पाप ! देवताओं का प्रिय कार्य करना, उनका अपराध कभी न करना। लंका में कभी मनुष्य आवे तो उनका कोई राक्षस वध न करने पावें। ' विभीषण ने आज्ञानुसार चलना स्वीकार किया।

तदनंतर वापस लौटने के लिये सुग्रीव और भरत सहित श्रीराम विमान पर चढ़े। तब विभीषण ने कहा ' प्रभु ! यदि लंका का पुल ज्यों - का - त्यों बना रहेगा तो पृथ्वी के सभी लोग यहाँ आकर हम लोगों को तंग करेंगे, इसलिए क्या करना चाहिये ? ' भगवान ने विभीषण की बात सुनकर पुलको बीच में से तोड़ डाला और दश योजन के बीच के टुकड़े के फिर तीन टुकड़े कर दिये। तदनंतर उस एक - एक टुकड़े के फिर छोटे - छोटे टुकड़े कर डाले, जिससे पुल टूट गया और यों लंका के साथ भारत का मार्ग पुनः विछिन्न हो गया।


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