पत्नी पर होने वाली निर्दयता के विरुद्ध उपबंध - Provisions against the cruelty towards wife




भारतीय समाज में विवाह को एक पवित्र संस्था माना जाता है, किन्तु अनेक मामलों में विवाहिता महिलाओं को पति अथवा उसके रिश्तेदारों द्वारा शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। विशेष रूप से दहेज की मांग को लेकर महिलाओं के साथ की जाने वाली प्रताड़ना को रोकने तथा उन्हें कानूनी सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से भारतीय दण्ड संहिता, 1860 में धारा 498A का प्रावधान किया गया था।

धारा 498A के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति, जो किसी स्त्री का पति है अथवा पति का रिश्तेदार (Relative) है, उस स्त्री के साथ क्रूरता (Cruelty) का व्यवहार करता है, तो वह दण्ड का भागी होगा। इस अपराध के लिए तीन वर्ष तक के कारावास तथा जुर्माने का प्रावधान है।

इस धारा के अंतर्गत “क्रूरता” का अर्थ केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसा कोई भी आचरण इसमें सम्मिलित है जिससे महिला को आत्महत्या के लिए प्रेरित होने की स्थिति उत्पन्न हो जाए या उसके जीवन, अंग अथवा मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य को गंभीर क्षति पहुँचे। दहेज की अवैध मांग को लेकर की जाने वाली प्रताड़ना भी इसी श्रेणी में आती है।

इस संबंध में वजीर चन्द्र बनाम हरियाणा राज्य (AIR 1989 SC 378) का निर्णय उल्लेखनीय है। इस मामले में नवविवाहिता से उसके पति, सास और ससुर द्वारा बार-बार दहेज एवं अन्य वस्तुओं की मांग की जाती थी तथा उसे प्रताड़ित किया जाता था। उच्चतम न्यायालय ने इसे धारा 498A के अंतर्गत क्रूरता माना और अभियुक्तों को दोषी ठहराया।

दूसरी ओर, बालकृष्ण नायडू बनाम राज्य (AIR 1992 SC 1581) के मामले में यह प्रश्न उठा कि संतान न होने के कारण पत्नी को परेशान करना क्या धारा 498A के अंतर्गत आएगा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक प्रकार का वैवाहिक विवाद स्वतः धारा 498A के अंतर्गत नहीं आता। यदि परिस्थितियाँ दहेज या विधिक रूप से परिभाषित क्रूरता से संबंधित नहीं हैं, तो मामला अन्य उपयुक्त धाराओं, जैसे धारा 304 या अन्य प्रासंगिक प्रावधानों के अंतर्गत विचारणीय हो सकता है।

अतः धारा 498A का मूल उद्देश्य विवाहिता महिलाओं को दहेज-उत्पीड़न एवं वैवाहिक क्रूरता से संरक्षण प्रदान करना है। यह प्रावधान महिलाओं की गरिमा, सुरक्षा और सम्मान की रक्षा के लिए भारतीय दण्ड कानून का एक महत्वपूर्ण अंग है तथा समाज में महिलाओं के प्रति होने वाले अन्याय को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।



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दहेज मृत्यु - Dowry Death



दहेज से मृत्यु भारतीय दण्ड संहिता की धारा 304 ख के अन्तर्गत दहेज से मृत्यु के सम्बन्ध में प्रावधान है। यह प्रावधान दहेज निषेध (संशोधन) अधिनियम, 1986 की धारा 10 द्वारा भारतीय दण्ड संहिता में निविष्ट किया गया है। यह धारा यह प्रावधान करती है-

धारा 304 (ख). जहाँ किसी, स्त्री की मृत्यु-उसके विवाह होने के सात वर्ष के अन्दर जलने या किसी शारीरिक क्षति होने अथवा सामान्य परिस्थितियों के अंतर्गत जैसी मृत्यु होती है, उससे अन्यथा प्रकार से होती है और यह दिखाया जाता है कि अपनी मृत्यु के तुरंत पूर्व वह अपने पति या अपने पति के किसी संबंधी की निर्दयता या प्रताड़ना का शिकार बनी थी अथवा ऐसी मृत्यु दहेज की किसी मांग के सम्बन्ध में हुई थी तो ऐसी मृत्यु दहेज से मृत्यु ऐसे पति या सम्बन्धी द्वारा कारित हुई समझी जाएगी।

रविन्द्र त्रिम्बक बनाम महाराष्ट्र राज्य [(1996) 4 S.C.C. 148] के मामले में 25,000 रु० की दहेज मांग पूरी न होने पर पत्नी को मार डाला। उच्चतम न्यायालय ने भी निर्धारित किया कि यह दहेज मृत्यु है, इस पर रोक लगने के लिए कठोर सजा देनी चाहिए। क्योंकि यह समाज में घृणित अपराध है।




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नमामि शमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपं - शिव रुद्राष्टकम



Shiv Rudrashtkam - Namami Shamishan

शिव रुद्राष्टकम
नमामि शमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपं।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेहं॥1॥

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।
करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोहं॥2॥

तुषाराद्रि संकाश गौरं गम्भीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥3॥

चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालं।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥4॥

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्।
त्रय: शूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेहं भवानीपतिं भावगम्यं॥5॥

कलातीत कल्याण कल्पांतकारी। सदासज्जनानन्ददाता पुरारी।
चिदानन्द संदोह मोहापहारी। प्रसीद-प्रसीद प्रभो मन्मधारी॥6॥

न यावद् उमानाथ पादारविंदं। भजंतीह लोके परे वा नराणां।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥7॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यं।
जराजन्म दु:खौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्न्मामीश शम्भो ॥8॥

" रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।
ये पठन्ति नरा भक्तया तेषां शम्भु: प्रसीदति॥ "


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