उदय प्रकाश का जीवन परिचय एवं रचना



उदय प्रकाश : जीवन परिचय

उदय प्रकाश समकालीन हिन्दी साहित्य के प्रमुख कथाकार, कवि, निबंधकार तथा पत्रकार हैं। उनका जन्म 1 जनवरी 1952 को मध्य प्रदेश के तत्कालीन शहडोल जिले (वर्तमान अनूपपुर जिला) के सीतापुर ग्राम में एक क्षत्रिय परिवार में हुआ। यह क्षेत्र सोन और नर्मदा नदियों के निकट स्थित है तथा अपनी प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विशिष्टताओं के लिए प्रसिद्ध है। ग्रामीण एवं आदिवासी परिवेश में बीता उनका बचपन आगे चलकर उनकी रचनात्मक चेतना का महत्वपूर्ण आधार बना।

उदय प्रकाश ने स्वयं अपने ग्राम्य परिवेश का उल्लेख करते हुए कहा है कि नर्मदा और सोन दोनों नदियाँ उनके गाँव के निकट से प्रवाहित होती हैं तथा उसी प्राकृतिक वातावरण ने उनके संवेदनशील व्यक्तित्व को आकार दिया। एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि उनकी प्रारम्भिक शिक्षा और जीवनानुभव ऐसे क्षेत्र में हुए जहाँ गोंड, कोल तथा अन्य आदिवासी समुदायों की बड़ी आबादी निवास करती थी। इस परिवेश ने उनके साहित्य को व्यापक सामाजिक दृष्टि प्रदान की।

उदय प्रकाश का जन्म एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। उनके पिता श्री प्रेम कुमार सिंह साहित्यिक अभिरुचि वाले व्यक्ति थे तथा माता श्रीमती गंगा देवी धार्मिक एवं सांस्कृतिक संस्कारों से सम्पन्न थीं। परिवार में साहित्यिक वातावरण विद्यमान था। घर में नियमित रूप से साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ आती थीं, जबकि उनकी बुआ लोकगायन एवं भजन-लेखन में रुचि रखती थीं। इस प्रकार साहित्य, लोकसंस्कृति और अध्यात्म का प्रभाव उन्हें बचपन से ही प्राप्त हुआ।

उदय प्रकाश के व्यक्तित्व के निर्माण में उनकी माता का विशेष योगदान रहा। वे स्वयं स्वीकार करते हैं कि कविता और चित्रकला के प्रति उनकी रुचि का स्रोत उनकी माता थीं। माता के पास एक नोटबुक थी, जिसमें भोजपुरी लोकगीतों, कजरी, सोहर, चैती, फगुआ, विरहा और विदेसिया जैसे लोकगीतों के साथ-साथ पक्षियों और फूलों के चित्र भी अंकित थे। इन लोकगीतों और चित्रों ने बालक उदय प्रकाश की कल्पनाशक्ति को गहराई से प्रभावित किया।

किन्तु उनका जीवन प्रारम्भ से ही संघर्षों से भरा रहा। मात्र दस वर्ष की आयु में उनकी माता का कैंसर के कारण निधन हो गया। इस घटना ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला। बाद में सत्रह वर्ष की आयु में उन्होंने अपने पिता को भी खो दिया। माता-पिता की असामयिक मृत्यु ने उनके जीवन को गहरे दुःख और असुरक्षा से भर दिया। इन त्रासद अनुभवों का प्रभाव उनकी अनेक कहानियों और आत्मकथात्मक लेखों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

इन परिस्थितियों के बावजूद उदय प्रकाश ने अद्भुत साहस और संघर्षशीलता का परिचय दिया। व्यक्तिगत दुःखों, आर्थिक कठिनाइयों और मानसिक तनावों से जूझते हुए उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी की तथा साहित्य को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया। यही संघर्ष, संवेदना और जीवनानुभव आगे चलकर उनके कथा-साहित्य की प्रमुख शक्ति बने।


शिक्षा-दीक्षा

उदय प्रकाश की प्रारम्भिक शिक्षा उनके पैतृक ग्राम सीतापुर में सम्पन्न हुई। प्राथमिक स्तर की शिक्षा उन्होंने स्थानीय प्राथमिक विद्यालय से प्राप्त की। इसके बाद छठी से आठवीं कक्षा तक की पढ़ाई अनूपपुर स्थित दामोदर बहुउद्देशीय माध्यमिक विद्यालय में हुई। माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक शिक्षा उन्होंने शहडोल के शिक्षण संस्थानों से प्राप्त की।

पारिवारिक परिस्थितियों तथा व्यक्तिगत संघर्षों के बावजूद उन्होंने अपनी शिक्षा निरंतर जारी रखी। पिता के निधन के पश्चात उन्होंने सागर विश्वविद्यालय से विज्ञान संकाय में स्नातक (बी.एससी.) की शिक्षा प्राप्त की। इसके उपरान्त साहित्य के प्रति अपनी गहरी रुचि के कारण उन्होंने हिन्दी विषय में स्नातकोत्तर अध्ययन किया और वर्ष 1974 में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए प्रतिष्ठित आचार्य नंददुलारे वाजपेयी स्वर्ण पदक से सम्मानित हुए।

छात्र जीवन में ही उनकी वैचारिक चेतना विकसित हो चुकी थी। वे सामाजिक एवं वैचारिक आंदोलनों, विशेषकर वामपंथी विचारधारा से प्रभावित रहे। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से वे दिल्ली आए और वर्ष 1975 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जे.एन.यू.) में शोधकार्य हेतु प्रवेश लिया। इसी काल में उनका संपर्क देश के प्रमुख साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों तथा सामाजिक चिंतकों से हुआ, जिसने उनकी साहित्यिक दृष्टि को व्यापक बनाया।

पारिवारिक एवं दाम्पत्य जीवन

उदय प्रकाश का विवाह 9 जुलाई 1977 को गोरखपुर निवासी कुमकुम सिंह के साथ हुआ। यह प्रेम-विवाह था। श्रीमती कुमकुम सिंह उच्च शिक्षित हैं। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से फ्रांसीसी एवं स्पेनिश भाषाओं में उच्च शिक्षा प्राप्त की तथा इंडोनेशियाई भाषा में डिप्लोमा किया।

उदय प्रकाश के रचनात्मक जीवन में उनकी पत्नी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने न केवल पारिवारिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन किया, बल्कि साहित्यिक गतिविधियों में भी निरंतर सहयोग प्रदान किया। उदय प्रकाश के लेखन, प्रकाशन तथा साहित्यिक उपलब्धियों के पीछे कुमकुम सिंह का प्रेरणादायी योगदान उल्लेखनीय माना जाता है।

उनके दो पुत्र हैं—सिद्धार्थ और शांतनु। दोनों ने उच्च शिक्षा प्राप्त की तथा अपने-अपने क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल कीं। उदय प्रकाश सदैव शिक्षा, बौद्धिक विकास और सांस्कृतिक मूल्यों को पारिवारिक जीवन का आधार मानते रहे हैं।

वर्तमान में वे अपनी पत्नी के साथ गाजियाबाद स्थित वैशाली क्षेत्र में निवास करते हुए साहित्य, पत्रकारिता, व्याख्यान तथा स्वतंत्र लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। साहित्य और समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता आज भी पूर्ववत बनी हुई है।


आर्थिक पृष्ठभूमि

उदय प्रकाश का जीवन निरंतर संघर्ष और आत्मनिर्भरता का उदाहरण रहा है। उच्च शिक्षा प्राप्त करने तथा हिन्दी साहित्य में स्वर्ण पदक अर्जित करने के बावजूद उन्हें लंबे समय तक स्थायी रोजगार प्राप्त नहीं हो सका। परिणामस्वरूप उन्हें विभिन्न संस्थानों और माध्यमों में अस्थायी रूप से कार्य करना पड़ा।

वर्ष 1978 से 1980 तक उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक के रूप में अध्यापन कार्य किया। इसके पश्चात 1980 से 1982 तक मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग में विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में कार्यरत रहे। इसी अवधि में उन्होंने प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका पूर्वग्रह के सहायक संपादक का दायित्व भी संभाला।

वर्ष 1982 से 1990 तक वे दिनमान समाचार-पत्रिका के संपादकीय विभाग से जुड़े रहे। इस दौरान उन्होंने पत्रकारिता, संपादन और सामाजिक विश्लेषण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। बीच में वर्ष 1987 में उन्होंने टाइम्स रिसर्च फाउंडेशन के स्कूल ऑफ सोशल जर्नलिज्म में अध्यापन कार्य भी किया।

उदय प्रकाश ने दूरदर्शन, वृत्तचित्र निर्माण, पटकथा लेखन तथा स्वतंत्र पत्रकारिता के क्षेत्र में भी कार्य किया। आर्थिक अस्थिरता और रोजगार की अनिश्चितता के बावजूद उन्होंने लेखन को कभी नहीं छोड़ा। उनका मानना था कि साहित्य केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व का निर्वहन भी है।

उन्हें व्यापक साहित्यिक पहचान उनकी चर्चित कहानी "पीली छतरी वाली लड़की" से प्राप्त हुई। इस रचना ने न केवल उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाई, बल्कि आर्थिक रूप से भी एक नया आधार प्रदान किया। इसके बाद उनकी रचनाओं का विभिन्न भारतीय एवं विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ और वे समकालीन हिन्दी साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षरों में गिने जाने लगे।

विचारधारा

उदय प्रकाश की विचारधारा उनके जीवनानुभवों, सामाजिक सरोकारों और साहित्यिक दृष्टि से निर्मित हुई है। उनका साहित्य समाज के हाशिए पर खड़े लोगों, वंचित वर्गों, श्रमिकों, आदिवासियों तथा शोषित समुदायों की पीड़ा और संघर्ष को स्वर देता है।

बाल्यकाल से ही आदिवासी और ग्रामीण परिवेश में रहने के कारण उन्होंने समाज की असमानताओं को निकट से देखा। यही अनुभव आगे चलकर उनकी रचनाओं का आधार बने। उनके साहित्य में सामाजिक न्याय, मानवीय संवेदना, लोकतांत्रिक मूल्यों और सत्ता-विरोधी चेतना का स्पष्ट स्वर दिखाई देता है।

उदय प्रकाश पर मार्क्सवादी चिंतन का प्रभाव स्वीकार किया जाता है, किन्तु वे किसी राजनीतिक दल विशेष के समर्थक लेखक नहीं हैं। वे स्वतंत्र वैचारिक दृष्टि के पक्षधर हैं। उनका साहित्य पूंजीवाद, बाजारवाद, वैश्वीकरण, सामाजिक विषमता और राजनीतिक अवसरवाद की आलोचना करता है।

साहित्यिक दृष्टि से वे कबीर, निराला, मुक्तिबोध, नागार्जुन, निर्मल वर्मा तथा विश्व साहित्य के अनेक रचनाकारों से प्रभावित रहे हैं। चेखव, गाब्रिएल गार्सिया मार्केस, पाब्लो नेरूदा, जेम्स जॉयस तथा बुल्गाकोव जैसे साहित्यकारों के प्रभाव की झलक भी उनके लेखन में देखी जा सकती है।

उनका मानना है कि साहित्य समाज की सामूहिक स्मृति और चेतना का संवाहक है। इसलिए साहित्यकार का दायित्व केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि अपने समय के यथार्थ को अभिव्यक्ति देना भी है।

उदय प्रकाश की प्रमुख रचनाएँ

कहानी-संग्रह एवं चर्चित कहानियाँ

  • दरियाई घोड़ा

  • तिरिछ

  • और अंत में प्रार्थना

  • पॉल गोमरा का स्कूटर

  • पीली छतरी वाली लड़की

  • दत्तात्रेय के दुःख

  • अरेबा-परेबा

  • मोहनदास

  • मेंगोसिल

काव्य-संग्रह

  • सुनो कारीगर

  • अबूतर-कबूतर

  • रात में हारमोनियम

निबंध

  • ईश्वर की आँख

अनुवाद

  • अनुभव

  • इंदिरा गाँधी की आखिरी लड़ाई

  • लाल घास पर नीले घोड़े

  • रोम्याँ रोलाँ का भारत

उपसंहार

उदय प्रकाश समकालीन हिन्दी साहित्य के ऐसे रचनाकार हैं जिनके साहित्य में जीवन-संघर्ष, सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदना और वैचारिक प्रतिबद्धता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। व्यक्तिगत त्रासदियों, आर्थिक संघर्षों और सामाजिक विषमताओं का सामना करते हुए उन्होंने साहित्य को जनसरोकारों से जोड़ा। इसी कारण उनका साहित्य केवल साहित्यिक उपलब्धि नहीं, बल्कि अपने समय का एक महत्वपूर्ण सामाजिक दस्तावेज भी है।



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विद्यापति का जीवन परिचय एवं उनकी साहित्यिक विशेषताएं



मैथिल महाकवि विद्यापति का शिव प्रेममैथिल महाकवि विद्यापति का शिव प्रेम

विद्यापति : जीवन-परिचय

मैथिली साहित्य के अमर कवि तथा "कवि कोकिल" के नाम से विख्यात विद्यापति का पूरा नाम विद्यापति ठाकुर था। वे बिसइवार वंश के विष्णु ठाकुर की आठवीं पीढ़ी में उत्पन्न हुए थे। उनके पिता का नाम गणपति ठाकुर तथा माता का नाम गंगा देवी था। कुछ विद्वान, विशेषकर रामवृक्ष बेनीपुरी, उनकी माता का नाम हांसिनी देवी बताते हैं, किंतु विद्यापति के पदों की भनिता से स्पष्ट होता है कि हांसिनी देवी महाराज देवसिंह की पत्नी थीं, न कि विद्यापति की माता।

जनश्रुति के अनुसार, गणपति ठाकुर ने कपिलेश्वर महादेव की कठोर आराधना की थी, जिसके फलस्वरूप उन्हें विद्यापति जैसे प्रतिभाशाली पुत्र की प्राप्ति हुई। कपिलेश्वर महादेव का यह प्रसिद्ध मंदिर वर्तमान बिहार के मधुबनी जिले में स्थित है।

विद्यापति के जन्म-स्थान को लेकर लंबे समय तक विवाद बना रहा। कुछ विद्वानों ने उन्हें बंगाल का कवि सिद्ध करने का प्रयास किया। इसका मुख्य कारण उनकी राधा-कृष्ण विषयक पदावली की अत्यधिक लोकप्रियता थी, जो मिथिला से निकलकर बंगाल तक पहुँच गई थी। उन दिनों बंगाल के अनेक विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने हेतु मिथिला आते थे। इसी क्रम में विद्यापति के पद बंगाल पहुँचे और महान वैष्णव संत चैतन्य महाप्रभु उनके काव्य से अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने विद्यापति के पदों का कीर्तन के रूप में व्यापक प्रचार किया। फलस्वरूप बंगाल में भी विद्यापति की ख्याति अत्यधिक बढ़ गई।

बाद में कुछ लोगों ने इस आधार पर उन्हें बंगाली कवि सिद्ध करने का प्रयास किया, किंतु महा-महोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री, जस्टिस शारदाचरण मित्र, नगेन्द्रनाथ गुप्त तथा डॉ. जॉर्ज एब्राहम ग्रियर्सन जैसे विद्वानों ने प्रमाणों के आधार पर स्पष्ट किया कि विद्यापति मिथिला के निवासी थे और उनकी भाषा मैथिली थी।

विद्यापति का जन्म बिहार के वर्तमान मधुबनी जिले के बिस्फी ग्राम में हुआ था। यह गाँव बाद में मिथिला के राजा शिवसिंह द्वारा उन्हें दानस्वरूप प्रदान किया गया था। उनके जन्मकाल के संबंध में विद्वानों में मतभेद है, तथापि सामान्यतः उनका जन्म चौदहवीं शताब्दी के मध्य में माना जाता है।

विद्यापति बचपन से ही अत्यंत मेधावी, प्रतिभाशाली तथा साहित्य-प्रेमी थे। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा प्रसिद्ध विद्वान महामहोपाध्याय हरि मिश्र के निर्देशन में हुई। हरि मिश्र के भतीजे तथा सुप्रसिद्ध दार्शनिक पक्षधर मिश्र उनके सहपाठी थे। अल्पायु से ही वे अपने पिता के साथ राजदरबारों में जाने लगे थे, जिससे उन्हें तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों को निकट से देखने का अवसर मिला।

उनकी प्रारम्भिक रचना ‘कीर्तिलता’ मानी जाती है, जिसमें चौदहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मिथिला की सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों का सजीव चित्रण मिलता है। इस कृति में कवि का आत्मविश्वास, भाषा पर अधिकार तथा साहित्यिक प्रतिभा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

विद्यापति के पारिवारिक जीवन के संबंध में उनके पदों से जानकारी प्राप्त होती है। उनके एक पद— "भनइ विद्यापति सुनु मंदाकिनि"— से ज्ञात होता है कि उनकी पत्नी का नाम मंदाकिनी था। इसी प्रकार "दुल्लहि तोहर कतए छथि माए" पद से उनकी पुत्री दुल्लहि का उल्लेख मिलता है। उनके पुत्र का नाम हरपति तथा पुत्रवधू का नाम चंद्रकला था।

विद्यापति का जीवन साहित्य, भक्ति और लोकमंगल की भावना से परिपूर्ण था। उन्होंने संस्कृत, अवहट्ट और मैथिली तीनों भाषाओं में उत्कृष्ट साहित्य की रचना की। उनकी राधा-कृष्ण विषयक पदावली ने उन्हें अमर बना दिया। उनकी काव्यधारा में श्रृंगार और भक्ति का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।

सामान्यतः माना जाता है कि महाकवि विद्यापति का निधन लगभग 1448 ईस्वी के आसपास हुआ। उनके निधन से संबंधित अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि उनके दाह-संस्कार स्थल पर शिवलिंग प्रकट हुआ था, जहाँ आज भी एक मंदिर स्थित है और प्रतिवर्ष श्रद्धालुओं का आगमन होता है।

भारतीय साहित्य के इतिहास में विद्यापति का स्थान अत्यंत गौरवपूर्ण है। उन्होंने मैथिली भाषा को साहित्यिक गरिमा प्रदान की तथा अपनी काव्य-प्रतिभा से सम्पूर्ण भारतीय साहित्य को समृद्ध किया। इसी कारण उन्हें मैथिली साहित्य का शिरोमणि तथा "कवि कोकिल" कहा जाता है।


विद्यापति भारतीय साहित्यक भक्ति परंपरा क प्रमुख स्तंभ म सँ एकटा आओर मैथिली के सर्वोपरि कवि क रूप म जानल जैत अछि

विद्यापति का समय और रचना-संसार

महाकवि विद्यापति का युग न केवल मिथिला, बल्कि सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत संक्रमणशील और उथल-पुथल भरा काल था। उस समय देश निरंतर विदेशी आक्रमणों और राजनीतिक संघर्षों से जूझ रहा था। दिल्ली से लेकर बंगाल तक का विस्तृत भूभाग सत्ता-संघर्ष, विजय-पराजय और राजनीतिक अस्थिरता का साक्षी बन रहा था। इन परिस्थितियों का प्रतिकूल प्रभाव सामान्य जनजीवन पर भी पड़ता था। युद्धों और आक्रमणों के कारण जनता सदैव भय, असुरक्षा और अनिश्चितता के वातावरण में जीवन व्यतीत करती थी।

उस काल में विभिन्न राजवंशों, सामंतों और शासकों के बीच सत्ता एवं वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा चल रही थी। जाति-व्यवस्था अपेक्षाकृत अधिक कठोर होती जा रही थी, किन्तु सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर परिवर्तन के संकेत भी दिखाई देने लगे थे। हिंदू और मुस्लिम समाजों के बीच आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक संपर्क बढ़ रहे थे। परिणामस्वरूप परस्पर समझ, सहअस्तित्व और संवाद की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी। ऐसे समय में साहित्य, कला और संस्कृति ने समाज को जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

विद्यापति की रचनाओं ने इस ऐतिहासिक आवश्यकता की पूर्ति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। विशेष रूप से उनकी ‘पदावली’ ने प्रेम, भक्ति और मानवीय संवेदनाओं के माध्यम से समाज में सौहार्द और सांस्कृतिक एकता का संदेश दिया। उनकी भाषा की मधुरता, पदों की गेयता, भावों की सहजता और काव्य की सरसता ने विभिन्न भाषाओं, प्रदेशों, सम्प्रदायों तथा सामाजिक वर्गों के लोगों को समान रूप से आकर्षित किया। परिणामस्वरूप उनके पद मिथिला की सीमाओं से निकलकर बंगाल, उड़ीसा, असम और उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में लोकप्रिय हो गए।

विद्यापति के पदों का प्रभाव इतना व्यापक था कि महान वैष्णव संत चैतन्य महाप्रभु भी उनके पदों का गायन करते समय भाव-विभोर हो जाते थे। विद्यापति के श्रृंगारिक पदों में भी भक्ति और आध्यात्मिकता का ऐसा अद्भुत समन्वय मिलता है कि वे केवल लौकिक प्रेम की अभिव्यक्ति न रहकर दिव्य प्रेम का प्रतीक बन जाते हैं।

विद्यापति ने ओइनवार (ओइनेवार) वंश के अनेक राजाओं के दरबार में रहते हुए शासन-व्यवस्था, राजनीति और समाज को निकट से देखा था। वे दरबारी कवि अवश्य थे, किन्तु मात्र प्रशस्ति-गायक नहीं थे। उन्होंने अपने युग की सामाजिक समस्याओं, जनजीवन की पीड़ाओं तथा मानवीय भावनाओं को गहराई से समझा और उन्हें अपनी रचनाओं में अभिव्यक्ति प्रदान की।

विदेशी आक्रमणों और राजनीतिक अस्थिरता से उत्पन्न भय तथा निराशा के वातावरण में उन्होंने प्रेम, सौंदर्य और भक्ति को अपनी रचनात्मक साधना का केंद्र बनाया। उनका विश्वास था कि समाज को जोड़ने और मनुष्य के भीतर आशा तथा संवेदना को जीवित रखने का सबसे प्रभावी माध्यम प्रेम है। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में प्रेम और भक्ति का अत्यंत मार्मिक तथा कलात्मक चित्रण मिलता है।

विद्यापति संस्कृत, अवहट्ट तथा मैथिली भाषाओं के प्रकाण्ड विद्वान थे। उन्हें धर्मशास्त्र, दर्शन, न्यायशास्त्र, सौंदर्यशास्त्र, संगीतशास्त्र तथा लोकजीवन का व्यापक ज्ञान था। उनकी रचनाओं में जहाँ एक ओर श्रृंगार और भक्ति के सूक्ष्म भावों का चित्रण मिलता है, वहीं दूसरी ओर राजनीति, नीति, धर्म, समाज और लोकाचार से संबंधित महत्वपूर्ण विचार भी व्यक्त हुए हैं। उनके साहित्य में शास्त्रीय ज्ञान और लोकानुभव का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

विद्यापति की प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ

साहित्यिक कृतियाँ

  • कीर्तिलता

  • कीर्तिपताका

  • भूपरिक्रमा

  • पुरुष परीक्षा

  • लिखनावली

  • गोरक्ष विजय

  • मणिमंजरी नाटिका

  • पदावली

धर्मशास्त्रीय कृतियाँ

  • शैवसर्वस्वसार

  • शैवसर्वस्वसार-प्रमाणभूत संग्रह

  • गंगावाक्यावली

  • विभागसार

  • दानवाक्यावली

  • दुर्गाभक्तितरंगिणी

  • वर्षकृत्य

  • गयापत्तालक

इन सभी कृतियों में ‘पदावली’ को सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रभावशाली रचना माना जाता है। इस कृति ने विद्यापति को अमर ख्याति प्रदान की। उनकी पदावली में राधा-कृष्ण प्रेम, भक्ति, श्रृंगार, विरह तथा मानवीय संवेदनाओं का ऐसा कलात्मक और मधुर चित्रण मिलता है, जो आज भी पाठकों और श्रोताओं को समान रूप से आकर्षित करता है।

इस प्रकार विद्यापति केवल मैथिली साहित्य के ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारतीय साहित्य के ऐसे युगप्रवर्तक कवि हैं, जिन्होंने अपने युग की सांस्कृतिक चेतना को स्वर प्रदान किया और प्रेम, भक्ति तथा मानवता के शाश्वत मूल्यों को साहित्य के माध्यम से प्रतिष्ठित किया।

मैथिल कोकिल कवि - विद्यापति

विद्यापति के काव्य में श्रृंगार

विद्यापति की 'पदावली' के पद दो तरह के हैं—श्रृंगारिक पद और भक्ति-पद। इसके अलावा कुछ ऐसे पद भी हैं, जिनमें प्रकृति, समाज, नीति, संगीत आदि जीवन-मूल्यों को रेखांकित किया गया है। श्रृंगारिक पदों में वयःसंधि, नायिका-भेद, नख-शिख वर्णन, मिलन-अभिसार, मान-मनुहार, संयोग-वियोग, विरह-प्रवास आदि का विलक्षण चित्र उकेरा गया है। ऐसे पदों की संख्या साढ़े सात सौ से अधिक है। उल्लेखनीय है कि अपने प्रिय सखा राजा शिवसिंह के तिरोधान (1406 ई.) के बाद से विद्यापति ने कोई श्रृंगारिक पद नहीं रचा; बाद के समय की उनकी सारी ही रचनाएँ भक्ति-प्रधान पद हैं, या फिर नीति, शास्त्र, धर्म और आचार से संबंधित विचार। भक्ति-प्रधान पदों की संख्या लगभग अस्सी है, जिसमें शिव-पार्वती लीला, नचारी, राम-वंदना, कृष्ण-वंदना, दुर्गा, काली, भैरवी, भवानी, जानकी तथा गंगा-वंदना आदि शामिल हैं। शेष पदों में ऋतु-वर्णन, बेमेल विवाह, सामाजिक जीवन-प्रसंग, रीति-नीति, संभाषण और शिक्षा आदि रेखांकित हैं।

उनके श्रृंगारिक पदों के प्रेम और सौंदर्य-विवेचन का आधार राधा-कृष्ण विषयक पद हैं। गौरतलब है कि पूरे भारतीय वाङ्मय में राधा-कृष्ण की उपस्थिति पौराणिक गरिमा और विष्णु के अवतार कृष्ण की अलौकिक शक्ति एवं लीला के साथ है। परंतु विद्यापति के राधा-कृष्ण अलौकिक नहीं हैं, वे पूरी तरह लौकिक हैं। उनके प्रेम-व्यापार के सारे प्रसंग सामान्य नागरिक की तरह हैं। पूरी 'पदावली' में प्रेम और सौंदर्य-वर्णन के किसी बिंदु पर वे आत्मलीन नहीं दिखाई देते। हर पद में रसज्ञ और रसभोक्ता के रूप में किसी न किसी राजा या सुलतान की दुहाई देते हैं अथवा नायक-नायिका को प्रबोधन और उपदेश देते हैं।

पूरी 'पदावली' में प्रेम-व्यापार के हर उपक्रम—विभाव, अनुभाव, दर्शन, श्रवण, अनुरक्ति, संभाषण, स्मरण, अभिसार, विरह, सुरति-वेदना, मिलन, उल्लास, सुरति-चर्चा, बाधा, आशा-निराशा—या फिर सौंदर्य-वर्णन के हर स्वरूप—नायिका-भेद, वयःसंधि, सद्यःस्नाता, कामदग्धा, नवयौवना, प्रगल्भा, आरूढ़ा, स्वकीया, परकीया आदि—को रेखांकित करते हुए विद्यापति सतत तटस्थ ही दिखते हैं। पूरी 'पदावली' में विद्यापति भगवद्गीता-उपदेशक कृष्ण की तरह लिप्त होकर भी निर्लिप्त प्रतीत होते हैं।

हर समय वे अपने नायक-नायिका के मनोभावों को रेखांकित कर एक संदेश देते हुए दिखाई देते हैं। जीवन में सौंदर्य और प्रेम के शिखरस्थ स्वरूप को रेखांकित करते हुए वे सभी पदों में जीवन-मूल्य का संदेश देते प्रतीत होते हैं। नागरिक मन से हताशा मिटाने और राजाओं-सुलतानों के हृदय में मानवीय कोमलता भरने का इससे बेहतर उपाय संभवतः उस दौर में और कुछ नहीं हो सकता था। इसलिए विद्यापति रचित 'पदावली' के अनुशीलन की पद्धति उसमें चित्रित प्रेम-प्रसंगों और सौंदर्य-निरूपण में कामुकता से पराङ्मुख होकर जीवन-मूल्यों की तलाश करनी चाहिए।

आम नागरिक की तरह उनकी नायिका विरह में व्यथित-व्याकुल होती है और नायक का स्मरण करती है। उन्हें पाने का उद्यम करती है। किसी प्रकार की अलौकिकता उनके प्रेम को छूती तक नहीं। उसे चंदन-लेप भी विष-बाण की तरह दाहक लगता है, गहने बोझ प्रतीत होते हैं, सपने में भी कृष्ण दर्शन नहीं देते और उसे अपने जीने की कोई स्थिति शेष नहीं दिखाई देती। अंत में कवि नायिका को गुणवती बताकर मिलन की सांत्वना के साथ प्रबोधन देते हैं।

मिलन की स्थिति में प्रेमातुर नायिका सभी प्रकार के सुख का अनुभव करती है। भावोल्लास से भरी नायिका अपने प्रियतम की उपस्थिति का सुख विभिन्न इंद्रियों के माध्यम से प्राप्त करती है—वह उसका रूप निहारती है, उसकी वाणी सुनती है, वसंत की मादक गंध का अनुभव करती है, यत्नपूर्वक क्रीड़ा-सुख में लीन होती है तथा रसिकजनों के रसभोग का अनुमान करती है।

जाहिर है कि योजनाबद्ध ढंग से अपनी रचनाशीलता में आगे बढ़ रहे कवि को अपने उद्देश्य की प्राप्ति हेतु विलक्षण रूप से संपन्न भाषा के साथ-साथ अभिव्यक्ति के सभी अवयवों पर पूर्ण अधिकार था।

विद्यापति के काव्य में भक्ति

भक्ति और श्रृंगार—भले ही दो भाव हों, पर दोनों का मर्म एक ही है। दोनों का मूल अनुराग और समर्पण है। दोनों ही भाव व्यक्ति के मन में प्रेम से प्रारम्भ होते हैं। वैसे तो आज भी कुछ लोग मिल जाएँगे जो भक्ति और प्रेम को दो भिन्न दिशाओं का व्यापार मानते हैं। वे सोचते हैं कि जब तक मनुष्य को ज्ञान नहीं होता, युवावस्था के उन्माद में वह स्त्री के रूप-जाल में मोहवश फँसा रहता है और भोग में लिप्त रहता है; जब उसकी आँखें खुलती हैं, ज्ञान-चक्षु जागृत होते हैं, तब वह भक्ति-भाव से ईश्वर की ओर मुड़ता है। परंतु ऐसा सोचना सर्वथा उचित नहीं है।

वास्तविक अर्थों में दोनों ही उपक्रमों का प्रस्थान-बिंदु एक ही है, उनका व्यापार-क्रम भी एक ही है। दोनों का क्रिया-व्यापार प्रेम के कारण ही होता है और दोनों में समर्पण तथा स्वीकार का भाव विद्यमान रहता है। प्रेम में प्रेमिका, प्रेमी के प्रति समर्पित होती है अथवा प्रेमी, प्रेमिका के प्रति; ठीक इसी प्रकार भक्ति में भक्त भगवान के प्रति समर्पित होता है। मीराबाई की काव्य-साधना का उदाहरण हमारे सामने है। उन्हें कृष्ण की प्रिया मानें अथवा कृष्ण की भक्त, संशय दोनों ही स्थितियों में बना रहेगा।

विद्यापति की 'पदावली' में भक्ति और श्रृंगार के बीच की विभाजक रेखा को समझना थोड़ा कठिन है। माधव की प्रार्थना— "तोहि जनमि पुनु तोहि समाओत, सागर लहरि समाना"— में भक्ति और श्रृंगार के इस सघन भाव को समझा जा सकता है। मूल में विलीन हो जाने का यह एकात्म भाव, आत्मा और परमात्मा की यह एकता, उनके यहाँ श्रृंगारिक पदों में बड़ी सहजता से मिलती है। अपने प्रेम-इष्ट के प्रति उपासिका का समर्पण भी इसी प्रकार का भक्तिपूर्ण समर्पण है।

भक्तिकालीन कवियों की भाँति विद्यापति के यहाँ न तो स्पष्ट एकेश्वरवाद दिखाई देता है और न ही अन्य श्रृंगारिक कवियों की तरह लोलुप भोगवाद। एक डूबे हुए काव्य-रसिक के इस समर्पण में ऐसी जीवनानुभूति है कि कहीं भक्ति श्रृंगार पर और अधिकांश स्थानों पर श्रृंगार भक्ति पर हावी दिखाई देता है। उनके यहाँ भक्ति और श्रृंगार की धाराएँ अनेक दिशाओं में प्रवाहित होकर उनके जीवनानुभव को विस्तृत करती हैं और कवि के विराट अनुभव-संसार को उद्घाटित करती हैं।

भक्ति और श्रृंगार के जो मानदंड आज के विद्वानों की दृष्टि में प्रचलित हैं, उनके आधार पर यदि महाकवि विद्यापति के काव्य-संसार का वर्गीकरण किया जाए, तो राधा-कृष्ण विषयक अधिकांश गीत श्रृंगारिक हैं। वहीं उनके प्रमुख भक्ति-गीतों में शिव-स्तुति, गंगा-स्तुति, काली-वंदना, कृष्ण-प्रार्थना आदि का विशेष स्थान है।

वस्तुतः भक्ति और श्रृंगार के विषय में हमने कुछ धारणाओं को रूढ़ रूप में स्वीकार कर लिया है। विद्यापति के नख-शिख वर्णनों के कारण कुछ लोगों को उनकी भक्ति-भावना पर संदेह होने लगता है। किंतु विद्यापति के काव्य को समझने के लिए तत्कालीन काव्य-परंपरा और उसकी मर्यादाओं को समझना आवश्यक है।

विद्यापति के यहाँ अनेक भक्तिपरक पदों में श्रृंगार और भक्ति का अंतर्द्वंद्व भी परिलक्षित होता है। श्रृंगारिक गीतों में सौंदर्य, समर्पण, रमण, विलास, विरह और मिलन के विविध पक्षों में तल्लीन रहने वाले विद्यापति, "कि यौवन पिय दूरे" जैसे पदों के रचयिता होकर भी भक्तिपरक गीतों में अत्यंत विनीत हो जाते हैं। वे पूर्व में किए गए रमण-विलास को निरर्थक बताते हुए "तोहे भजब कोन बेला" कहकर पश्चाताप व्यक्त करते हैं तथा "तातल सैकत वारि बिंदु सम सुत्त-मित-रमणि समाजे" कहकर सांसारिक आकर्षणों की क्षणभंगुरता का बोध कराते हैं।

श्रृंगारिक गीतों की नायिका के मनोवेगों को स्वर देने वाले विद्यापति उसी "रमणि" को तप्त बालू पर जल-बिंदु के समान क्षणिक बताकर भगवान की शरण ग्रहण करते हैं। "अमृत त्यजि किए हलाहल पीउल" कहकर महाकवि स्वयं श्रृंगार और भक्ति के समस्त द्वैत को समाप्त कर देते हैं। यहाँ कवि की शालीनता और आध्यात्मिक परिपक्वता स्पष्ट दिखाई देती है।

दो भिन्न कालखंडों और दो भिन्न मनःस्थितियों में एक ही रचनाकार के इस भिन्न रचना-धर्म को कवि का पश्चाताप नहीं, बल्कि उसकी पूर्ण तल्लीनता माना जाना चाहिए। वह जहाँ भी है, जिस भाव में है, सम्पूर्णता के साथ उपस्थित है।

विद्यापति के काव्य में लोक-जीवन

विद्यापति का रचना-फलक अत्यंत बहुआयामी था। जीवन-व्यवहार के प्रत्येक पक्ष पर उनकी दृष्टि सजग और संवेदनशील थी। दरबार-संपोषित होने के बावजूद उनका कोई भी रचनात्मक उपक्रम चारण-धर्म तक सीमित नहीं रहा। प्रत्येक रचना में उन्होंने समकालीन चिंतक, सामाजिक अभिकर्ता और राजकीय सलाहकार की प्रखर नैतिकता का निर्वाह किया।

लोक-जीवन की व्यावहारिकता, लालित्यपूर्ण अर्थ-विस्तार तथा अद्भुत सांगीतिकता से युक्त उनके पद सामान्य जनजीवन में अत्यंत लोकप्रिय हुए। उनकी 'पदावली' में व्यक्ति के सामाजिक जीवन के अनेक प्रसंग—जन्म, नामकरण, मुंडन, उपनयन, विवाह, पूजा-पाठ, लोकोत्सव आदि—का सजीव चित्रण मिलता है।

आज भी मैथिल जनजीवन का कोई प्रमुख उत्सव विद्यापति के गीतों के बिना सम्पन्न नहीं होता। यद्यपि उनके पदों के रचनाकाल की सुनिश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है, तथापि यह कहा जा सकता है कि वे एक दीर्घ कालावधि में रचे गए हैं।

मिथिला सहित समूचे पूर्वांचल—बंगाल, असम और उड़ीसा—में वैष्णव साहित्य के विकास में विद्यापति की 'पदावली' का अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। भाव-माधुर्य और भाषा-सौंदर्य के कारण उनके पद व्यापक रूप से लोकप्रिय हुए। वैष्णव भक्तों के प्रयास से इन गीतों का प्रचार-प्रसार मथुरा और वृंदावन तक हुआ।

प्राप्त जानकारी के अनुसार उनके पदों की संख्या लगभग नौ सौ मानी जाती है। राजा शिवसिंह के तिरोधान के बाद उन्होंने नेपाल की तराई के सांस्कृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्र राजबनौली में कई वर्षों तक निवास किया और वहीं रहकर अपने रचनाकर्म को आगे बढ़ाया।

विद्यापति की भाषा और काव्य-सौंदर्य

'पदावली' की भाषा मैथिली है, जबकि उनकी अन्य रचनाओं की भाषा संस्कृत एवं अवहट्ठ है। पदों का संकलन तीन भिन्न-भिन्न भाषिक समाजों—मिथिला, बंगाल और नेपाल—के लिखित एवं मौखिक स्रोतों से हुआ है। भाषिक संरचना के गुणसूत्रों से परिचित सभी लोग इस बात से सहमत होंगे कि रचनाकार से मुक्त हुई गेयधर्मी रचना लोक-कंठ में वास करती हुई अनचाहे में भी कुछ-न-कुछ अपने मूल स्वरूप से भिन्न हो जाती है और फिर संकलन तक आते-आते उसमें स्थानीयता के अनेक अपरिहार्य रंग चढ़ जाते हैं। लोक-कंठ से संकलित सामग्री का तो यह अनिवार्य विधान है। विद्यापति की 'पदावली' भी इसका अपवाद नहीं है।

चौदहवीं से बीसवीं शताब्दी तक के लगभग छह सौ वर्षों की यात्रा में इन पदों में कब, कहाँ और किसके प्रयास से क्या जुड़ा और क्या छूटा, यह निश्चित रूप से जान पाना कठिन है। इसके अतिरिक्त एक तथ्य यह भी है कि इन पदों के प्रारंभिक संकलनकर्ताओं की मातृभाषा मैथिली नहीं थी। इसलिए ध्वनियों, शब्दों, पदों और संदर्भ-संकेतों को लिखित रूप में व्यक्त करते समय निश्चय ही कुछ परिवर्तन आ गए होंगे।

फिर भी यह तथ्य उल्लेखनीय है कि विद्यापति के जीवनकाल में ही 'पदावली' की अनेक पंक्तियाँ मुहावरों और कहावतों की तरह लोकजीवन में प्रचलित हो गई थीं। जीवनोपयोगी विषयों तथा सांगीतिकता के अतिरिक्त 'पदावली' की लोकप्रियता में उसकी लोक-रंजक भाषा की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उनके एक-एक पद अनेक रागों में गाए जाते हैं।

विद्यापति के सभी पद मात्रिक समछंदों में रचित हैं। अधिकांश पदों की रचना एक ही छंद में हुई है, किंतु अनेक पदों में मिश्रित छंदों का भी प्रयोग मिलता है। अर्थात् दो, तीन अथवा अधिक छंदों के चरणों का समन्वय किया गया है।

उन्होंने अहीर, लीला, महानुभाव, चंडिका, हाकलि, चौपई, चौपाई, चौबोला, पद्धरि, सुखदा, उल्लास, रूपमाला, नाग, सरसी, सार, मरहठा, माधवी, झूलना आदि छंदों का स्वतंत्र रूप से प्रयोग किया है। इसके अतिरिक्त अखंड, निधि, शशिवदना, मनोरम, कज्जल, रजनी, गीता, गीतिका, विष्णुपद, हरिगीतिका, ताटंक, वीर छंद तथा समान सवैया जैसे छंदों के चरणों को अन्य छंदों के साथ जोड़कर भी प्रयोग किया गया है।

उल्लेख मिलता है कि उल्लास, नाग, रंजनी तथा गीता छंद के प्रवर्तक स्वयं विद्यापति थे, क्योंकि उनसे पूर्व किसी रचनाकार के यहाँ इन चारों छंदों का प्रयोग उपलब्ध नहीं होता। यह तथ्य उनकी छंद-साधना और काव्य-कौशल का प्रमाण है।

इस प्रकार विद्यापति की भाषा में लोकजीवन की सहजता, माधुर्य और संगीतात्मकता का अद्भुत समन्वय मिलता है। उनकी काव्य-भाषा भावों के अनुरूप, सरस, प्रवाहपूर्ण और अत्यंत प्रभावशाली है। यही कारण है कि उनकी 'पदावली' केवल साहित्यिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि भाषिक और सांगीतिक दृष्टि से भी भारतीय काव्य-परंपरा की अमूल्य धरोहर मानी जाती है।



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आयु वृद्धि के साथ रोग से छुटकारा प्राप्त करने का मंत्र




आयु वृद्धि एवं रोग शांति के लिए महामृत्युंजय मंत्र

महामृत्युंजय मंत्र

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

महामृत्युंजय मंत्र को भगवान शिव का अत्यंत प्रभावशाली और कल्याणकारी मंत्र माना गया है। सनातन परंपरा में इसका जप स्वास्थ्य, मानसिक शांति, रोग निवारण, आयु वृद्धि तथा संकटों से रक्षा के लिए किया जाता है।

हवन विधि

मंत्र-जप की पूर्णता के पश्चात हवन करना शुभ माना गया है। सामान्य हवन सामग्री में निम्न वस्तुएँ सम्मिलित की जा सकती हैं—

  • बिल्व फल

  • तिल

  • चावल

  • चन्दन

  • पंचमेवा

  • जायफल

  • गुग्गुल

  • गुड़

  • सरसों

  • धूप

  • घी

इन सभी सामग्री को मिलाकर महामृत्युंजय मंत्र के साथ आहुति दें।

विभिन्न उद्देश्यों के लिए विशेष हवन सामग्री

रोग शांति हेतु

  • दूर्वा

  • गुडूची (गिलोय) का लगभग चार इंच का टुकड़ा

  • घी

श्री एवं समृद्धि प्राप्ति हेतु

  • बिल्व फल

  • कमल बीज

  • खीर

ज्वर शांति हेतु

  • अपामार्ग

मृत्यु-भय निवारण हेतु

  • जायफल एवं दही

शत्रु बाधा निवारण हेतु

  • पीली सरसों

पूर्णाहुति

हवन के अंत में सूखे नारियल में घी भरकर तथा खीर के साथ पूर्णाहुति प्रदान करें।

तर्पण एवं मार्जन

हवन के पश्चात तर्पण और मार्जन किया जाता है।

  • कांसे या पीतल के पात्र में जल और गौ-दूध मिलाएँ।

  • अंजलि द्वारा तर्पण करें।

  • तर्पण के समय मूल मंत्र के अंत में "तर्पयामि" जोड़ें।

  • मार्जन के समय मूल मंत्र के अंत में "मार्जयामि" जोड़ें।

दशांश नियम

शास्त्रीय विधान के अनुसार—

  • जप का दशांश हवन।

  • हवन का दशांश तर्पण।

  • तर्पण का दशांश मार्जन।

  • मार्जन का दशांश शिवभक्तों एवं ब्राह्मणों को भोजन।

ब्राह्मण एवं शिवभक्त भोजन

सामर्थ्य के अनुसार 1, 3, 5, 9 या 11 ब्राह्मणों अथवा शिवभक्तों को भोजन कराकर उनका आशीर्वाद ग्रहण करना शुभ माना गया है।

विशेष टिप्पणी

महामृत्युंजय मंत्र के जप से पूर्व या नित्य रूप से महामृत्युंजय कवच का पाठ भी किया जा सकता है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा, नियम और विश्वासपूर्वक किए गए मंत्र-जप एवं उपासना से मानसिक शांति, आध्यात्मिक बल तथा स्वास्थ्य लाभ की प्राप्ति होती है।

नोट: रोग की स्थिति में मंत्र-जप एवं धार्मिक अनुष्ठान आध्यात्मिक सहारा प्रदान कर सकते हैं, किन्तु इन्हें चिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। उचित चिकित्सा और चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।



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यौन पहचान - Sexual Identity



पुरुष, महिला, दोनों अथवा दोनों के मिश्रित रूप के रूप में स्वयं के बारे में व्यक्ति की आंतरिक समझ को लिंग पहचान (Gender Identity) कहा जाता है। यह इस बात को व्यक्त करती है कि व्यक्ति स्वयं को किस रूप में समझता है और स्वयं को किस नाम या पहचान से संबोधित करता है। किसी व्यक्ति की लिंग पहचान जन्म के समय निर्धारित किए गए उसके लिंग के समान भी हो सकती है और उससे भिन्न भी।

मनुष्य स्वाभाविक रूप से लिंग पहचान, लिंग अभिव्यक्ति, यौनिकता तथा रोमांटिक आकर्षण की अत्यंत विविध अवस्थाओं में पाए जाते हैं। फिर भी संयुक्त राज्य अमेरिका सहित विश्व के अनेक देशों में लोगों को उनकी यौन अभिविन्यास (Sexual Orientation) और लिंग पहचान के आधार पर भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार तथा कभी-कभी हिंसा का भी सामना करना पड़ता है।

अपनी यौन पहचान को समझने और स्वीकार करने की प्रक्रिया से गुजर रहे युवाओं के लिए अपने माता-पिता या परिवार के सामने अपनी पहचान व्यक्त करना अक्सर सबसे बड़ी चुनौती होती है। दूसरी ओर, जिन लोगों की वे परवाह करते हैं, उनसे स्वीकृति और समर्थन प्राप्त होना उनके लिए राहत, आत्मविश्वास और मानसिक शक्ति का महत्वपूर्ण स्रोत बन सकता है।

यौन अभिविन्यास (Sexual Orientation) से तात्पर्य उस भावनात्मक, रोमांटिक या यौन आकर्षण से है, जो किसी व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों के प्रति अनुभव होता है तथा जिनके साथ वह संबंध स्थापित करना चाहता है। यौन अभिविन्यास के प्रमुख रूपों में विषमलैंगिक (Heterosexual), समलैंगिक (Gay), लेस्बियन (Lesbian), उभयलिंगी (Bisexual) तथा अलैंगिक (Asexual) शामिल हैं।

Sexual Identity

विभिन्न यौन अभिविन्यास एवं पहचानें

समलैंगिकता (Homosexuality)

समलैंगिकता (Homosexuality) समान लिंग के व्यक्तियों के प्रति भावनात्मक, रोमांटिक अथवा यौन आकर्षण के पैटर्न को दर्शाती है। Lesbian शब्द का प्रयोग सामान्यतः उन महिलाओं के लिए किया जाता है जो अन्य महिलाओं के प्रति आकर्षित होती हैं, जबकि Gay शब्द का प्रयोग सामान्यतः उन पुरुषों के लिए किया जाता है जो अन्य पुरुषों के प्रति आकर्षित होते हैं। यद्यपि कई संदर्भों में Gay शब्द का उपयोग समलैंगिक महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए भी किया जाता है।

उभयलैंगिकता (Bisexuality)

उभयलैंगिकता (Bisexuality) एक से अधिक लिंगों अथवा पुरुषों और महिलाओं दोनों के प्रति भावनात्मक, रोमांटिक या यौन आकर्षण को व्यक्त करती है। उभयलैंगिक पहचान का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति दोनों लिंगों के प्रति समान रूप से आकर्षित हो। सामान्यतः ऐसे व्यक्ति, जिनकी किसी एक लिंग के प्रति विशेष लेकिन अनन्य (Exclusive) प्राथमिकता नहीं होती, स्वयं को उभयलैंगिक के रूप में पहचान सकते हैं।

अलैंगिकता (Asexuality)

अलैंगिकता (Asexuality) से तात्पर्य दूसरों के प्रति यौन आकर्षण की अनुपस्थिति अथवा यौन गतिविधियों में बहुत कम या बिल्कुल रुचि न होने से है। यह एक व्यापक स्पेक्ट्रम है, जिसके अंतर्गत अनेक उप-पहचानें आती हैं। अलैंगिकता को यौन संयम (Abstinence) या ब्रह्मचर्य (Celibacy) से अलग माना जाता है, क्योंकि यह व्यक्ति की यौन अभिविन्यास से संबंधित पहचान है, न कि कोई स्वैच्छिक जीवन-शैली।

अरोमांटिकता (Aromanticism)

अरोमांटिकता (Aromanticism) उस स्थिति को दर्शाती है जिसमें व्यक्ति दूसरों के प्रति बहुत कम या कोई रोमांटिक आकर्षण अनुभव नहीं करता। ऐसे व्यक्तियों में रोमांटिक संबंध बनाने की इच्छा या प्रवृत्ति अत्यंत सीमित अथवा अनुपस्थित हो सकती है।

पैनसेक्सुअलिटी (Pansexuality)

पैनसेक्सुअलिटी (Pansexuality) किसी व्यक्ति के प्रति उसकी लिंग पहचान या जैविक लिंग की परवाह किए बिना आकर्षण को दर्शाती है। पैनसेक्सुअल व्यक्ति स्वयं को कभी-कभी "लिंग-अंधा" (Gender-blind) भी कहते हैं, अर्थात् उनके लिए किसी व्यक्ति का लिंग या सेक्स रोमांटिक अथवा यौन आकर्षण का निर्णायक कारक नहीं होता। कुछ विद्वान पैनसेक्सुअलिटी को उभयलैंगिकता का विस्तृत रूप भी मानते हैं।

बहुलैंगिकता (Polysexuality)

बहुलैंगिकता (Polysexuality) का अर्थ कई, किंतु सभी नहीं, लिंगों के प्रति आकर्षण होना है। इस पहचान का उपयोग कुछ लोग उभयलैंगिकता (Bisexuality) के विकल्प के रूप में करते हैं, क्योंकि उनके अनुसार "उभयलैंगिक" शब्द दो लिंगों की अवधारणा तक सीमित माना जा सकता है। बहुलैंगिक व्यक्ति अनेक लिंगों के प्रति आकर्षित हो सकते हैं, परंतु आवश्यक नहीं कि वे सभी लिंगों के प्रति आकर्षण अनुभव करें।

सैपियोसेक्सुअलिटी (Sapiosexuality)

सैपियोसेक्सुअलिटी (Sapiosexuality) किसी व्यक्ति की बुद्धिमत्ता (Intelligence) के प्रति आकर्षण को दर्शाती है। इस शब्द का उपसर्ग Sapio- लैटिन भाषा से लिया गया है, जिसका संबंध ज्ञान और बुद्धि से है। सैपियोसेक्सुअल व्यक्ति समलैंगिक, विषमलैंगिक अथवा उभयलैंगिक भी हो सकते हैं। सामान्यतः इसे स्वतंत्र यौन अभिविन्यास के बजाय आकर्षण की एक विशेष प्रवृत्ति माना जाता है।

यह शब्द 2014 में व्यापक चर्चा में आया, जब डेटिंग वेबसाइट OkCupid ने इसे अपने उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्ध पहचान विकल्पों में शामिल किया। इसके बाद इस अवधारणा पर व्यापक बहस हुई। कुछ आलोचकों ने इसे अभिजात्यवादी (Elitist), भेदभावपूर्ण या दिखावटी भी बताया।

संबंध अराजकता (Relationship Anarchy)

संबंध अराजकता (Relationship Anarchy) एक संबंध-दर्शन (Relationship Philosophy) है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता और स्वैच्छिक संबंधों पर बल देता है। यह पारंपरिक संबंध संरचनाओं तथा पूर्वनिर्धारित सामाजिक अपेक्षाओं को चुनौती देता है। इसके अंतर्गत मित्रता और प्रेम-संबंधों के बीच कठोर पदानुक्रम को स्वीकार नहीं किया जाता तथा प्रत्येक संबंध को उसके प्रतिभागियों द्वारा निर्धारित मानदंडों के आधार पर विकसित होने दिया जाता है।

विषमलैंगिकता (Heterosexuality)

विषमलैंगिकता (Heterosexuality) विपरीत लिंग के व्यक्तियों के प्रति भावनात्मक, रोमांटिक अथवा यौन आकर्षण को दर्शाती है। सामान्यतः Straight शब्द का प्रयोग विषमलैंगिक व्यक्तियों के लिए किया जाता है। विश्वभर में विषमलैंगिकता सबसे व्यापक रूप से पाई जाने वाली यौन अभिविन्यास श्रेणी मानी जाती है।



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भीष्म द्वादशी महत्व, पूजन विधि एवं मंत्र




भीष्म द्वादशी

भीष्म द्वादशी माघ मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को आती है। मान्यता है कि इस दिन व्रत करने से उत्तम संतान की प्राप्ति होती है और यदि संतान है तो उसकी प्रगति होती है। इसके साथ ही सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होकर सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। भीष्म द्वादशी को गोविंद द्वादशी भी कहते हैं।

धर्म एवं ज्योतिष के अनुसार माघ मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को भीष्म द्वादशी का व्रत किया जाता है। इस दिन विशेष रूप से भगवान विष्णु का तिल से पूजन किया जाता है तथा पवित्र नदियों में स्नान और दान करने का विधान है। इससे मनुष्य को शुभ फलों की प्राप्ति होती है।

हमारे धार्मिक ग्रंथ पद्मपुराण में माघ मास के माहात्म्य का वर्णन किया गया है, जिसमें कहा गया है कि पूजा करने से भी भगवान श्रीहरि को उतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी माघ मास में स्नान करने मात्र से होती है। अतः सभी पापों से मुक्ति और भगवान वासुदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को माघ-स्नान अवश्य करना चाहिए।

महाभारत में उल्लेख है कि जो मनुष्य माघ मास में तपस्वियों को तिल का दान करता है, वह कभी नरक का दर्शन नहीं करता। माघ मास की द्वादशी तिथि को दिन-रात उपवास करके भगवान माधव की पूजा करने से मनुष्य को राजसूय यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। इस प्रकार माघ मास के स्नान और दान की अपूर्व महिमा बताई गई है।

यह भी मान्यता है कि भीष्म द्वादशी का व्रत करने से सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। शास्त्रों में माघ मास की प्रत्येक तिथि को पर्व माना गया है। यदि असमर्थता के कारण पूरे मास का नियम न निभाया जा सके, तो तीन दिन अथवा एक दिन का माघ-स्नान व्रत भी किया जा सकता है। इस माह की भीष्म द्वादशी का व्रत यदि पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और पवित्रता के साथ किया जाए, तो यह मनुष्य के सभी कार्य सिद्ध करके उसे पापों से मुक्ति प्रदान करता है। अतः इस दिन के पूजन-अर्चन का विशेष महत्व है।

भीष्म द्वादशी की पौराणिक कथा

भीष्म द्वादशी के संबंध में प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार राजा शांतनु की रानी गंगा ने देवव्रत नामक पुत्र को जन्म दिया। पुत्र के जन्म के पश्चात गंगा, पूर्व प्रतिज्ञा के अनुसार, राजा शांतनु को छोड़कर चली गईं। गंगा के वियोग में राजा शांतनु अत्यंत दुखी रहने लगे।

कुछ समय बाद राजा शांतनु गंगा नदी पार करने के लिए मत्स्यगंधा नामक कन्या की नाव में बैठे और उसके रूप-सौंदर्य पर मोहित हो गए। उन्होंने उसके पिता के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। परंतु मत्स्यगंधा के पिता ने शर्त रखी कि उनकी पुत्री से उत्पन्न संतान ही हस्तिनापुर की उत्तराधिकारी बनेगी। यही मत्स्यगंधा आगे चलकर सत्यवती के नाम से प्रसिद्ध हुई।

राजा शांतनु इस शर्त को स्वीकार नहीं कर सके, किंतु वे चिंता में रहने लगे। जब देवव्रत को पिता की चिंता का कारण ज्ञात हुआ, तब उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा कर ली। पुत्र की इस महान प्रतिज्ञा से प्रसन्न होकर राजा शांतनु ने उन्हें इच्छा-मृत्यु का वरदान दिया। इसी भीषण प्रतिज्ञा के कारण देवव्रत आगे चलकर भीष्म पितामह के नाम से विख्यात हुए।

महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह कौरवों की ओर से युद्ध कर रहे थे। उनके अद्वितीय युद्ध-कौशल के कारण कौरवों का पलड़ा भारी पड़ने लगा। तब भगवान श्रीकृष्ण ने शिखंडी को उनके सामने खड़ा कर दिया। अपनी प्रतिज्ञा के कारण भीष्म ने शिखंडी पर शस्त्र नहीं उठाया और अपने अस्त्र-शस्त्र त्याग दिए। अवसर पाकर अन्य योद्धाओं ने उन पर बाणों की वर्षा कर दी, जिससे वे शर-शय्या पर लेट गए।

कहा जाता है कि सूर्य के दक्षिणायन होने के कारण भीष्म पितामह ने तत्काल प्राण नहीं त्यागे। उन्होंने सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की और तत्पश्चात अपने प्राण त्यागे। उनके सम्मान में माघ मास की द्वादशी तिथि को विशेष पूजन का विधान किया गया, इसलिए यह तिथि भीष्म द्वादशी कहलाती है।

मान्यता है कि भगवान विष्णु ने स्वयं यह व्रत भीष्म पितामह को बताया था और उन्होंने इसका पालन किया था। इसी कारण इसका नाम भीष्म द्वादशी पड़ा। यह व्रत एकादशी के अगले दिन द्वादशी को किया जाता है। यह व्रत रोगों का नाश करने वाला तथा समस्त पापों को हरने वाला माना गया है।

भीष्म द्वादशी व्रत का महत्व

माघ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को भीष्म द्वादशी अथवा गोविंद द्वादशी कहा जाता है। इस व्रत को करने से संतान-सुख, धन-धान्य, सौभाग्य तथा समृद्धि की प्राप्ति होती है।

पद्मपुराण में वर्णित है कि माघ मास में स्नान करने से भगवान श्रीहरि विशेष रूप से प्रसन्न होते हैं। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को माघ-स्नान अवश्य करना चाहिए।

इस दिन प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लें। भगवान विष्णु का केले के पत्ते, पंचामृत, सुपारी, पान, तिल, मौली, रोली, कुमकुम तथा फलों से पूजन करें। दूध, शहद, केला, गंगाजल, तुलसी-पत्र और मेवा मिलाकर पंचामृत तैयार करें तथा भगवान को भोग लगाएँ। इसके पश्चात भीष्म द्वादशी की कथा सुनें अथवा पढ़ें।

भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी का पूजन एवं स्तुति करें। पूजन के बाद चरणामृत और प्रसाद का वितरण करें। ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा और तिल का दान अवश्य दें। ब्राह्मण-भोजन के पश्चात ही स्वयं भोजन करें। इस दिन "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः" मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है।

पूजा-विधि

  1. भीष्म द्वादशी के दिन प्रातः स्नान आदि करके व्रत का संकल्प लें।

  2. भगवान विष्णु का केले के पत्ते, फल, पंचामृत, सुपारी, पान, तिल, मौली, रोली, कुमकुम एवं दूर्वा से पूजन करें।

  3. दूध, शहद, केला, गंगाजल, तुलसी-पत्र तथा मेवा मिलाकर पंचामृत तैयार करें और भगवान को अर्पित करें।

  4. भीष्म द्वादशी की कथा सुनें अथवा पढ़ें।

  5. माता लक्ष्मी सहित अन्य देवताओं की स्तुति करें।

  6. पूजा के पश्चात चरणामृत एवं प्रसाद का वितरण करें।

  7. ब्राह्मणों को भोजन कराएँ तथा दक्षिणा दें।

  8. ब्राह्मण-भोजन के पश्चात ही स्वयं भोजन करें।

  9. परिवार के कल्याण, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति की प्रार्थना करें।

मान्यता

मान्यता है कि भीष्म द्वादशी का व्रत करने से सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना करनी चाहिए। ब्राह्मणों को भोजन कराकर सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा देनी चाहिए। इस दिन स्नान-दान करने से सुख, सौभाग्य, धन और संतान की प्राप्ति होती है। ब्राह्मणों को भोजन कराने के पश्चात ही स्वयं भोजन करना चाहिए। यह उपवास समस्त पापों का नाश करता है तथा जीवन में संतोष, शांति और समृद्धि प्रदान करता है।



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