नास्तिक की भक्ति



हरिराम नामक एक आदमी शहर की एक छोटी-सी गली में रहता था। वह एक मेडिकल स्टोर का मालिक था। सारी दवाइयों की उसे अच्छी जानकारी थी। दस साल का अनुभव होने के कारण उसे अच्छी तरह पता था कि कौन-सी दवाई कहाँ रखी है। वह इस पेशे को बड़े ही शौक से, बहुत ही निष्ठा से करता था उसकी दुकान में सदैव भीड़ लगी रहती थी, वह ग्राहकों को वांछित दवाइयाँ सावधानी से और पूरे इत्मीनान के साथ देता था। पर उसे भगवान पर कोई भरोसा नहीं था। वह एक नास्तिक था। भगवान के नाम से ही वह चिढ़ने लगता था। घर वाले उसे बहुत समझाते, पर वह उनकी एक न सुनता था। खाली वक्त मिलने पर वह अपने दोस्तों के संग मिलकर घर या दुकान में ताश खेलता था।

एक दिन उसके दोस्त उसका हालचाल पूछने दुकान में आये और अचानक बहुत जोरसे बारिश होने लगी, बारिश की वजह से दुकान में भी कोई नहीं था। बस फिर क्या, सब दोस्त मिलकर ताश खेलने लगे। तभी एक छोटा लड़का उसकी दुकान में दवाई लेने के लिये पर्चा लेकर आया। उसका पूरा शरीर भीगा था। हरिराम ताश खेलने में इतना मशगूल था कि बारिश में आये हुए उस लड़के पर उसकी नजर ही नहीं पड़ी। ठण्ड से ठिठुरते हुए उस लड़के ने दवाई का पर्चा बढ़ाते हुए कहा-'साहब जी! मुझे ये दवाइयाँ चाहिये, मेरी माँ बहुत बीमार है, उसको बचा लीजिये, बाहर और सब दुकानें बारिश की वजह से बंद हैं। आपकी दूकान को देखकर मुझे विश्वास हो गया कि मेरी माँ बच जायगी। यह दवाई उनके लिये बहुत जरूरी है।'
इसी बीच लाइट भी चली गयी और सब दोस्त जाने लगे। बारिश भी थोड़ा थम चुकी थी, उस लड़के की पुकार सुनकर ताश खेलते-खेलते ही हरिराम ने दवाई के उस पर्चे को हाथ में लिया और दवाई लेने को उठा। ताश के खेल को पूरा न कर पाने के कारण अनमने मन से अपने अनुभव के आधार पर अँधेरे में ही दवाई की
उस शीशी को झट से निकाल कर उसने लड़के को दे दिया। उस लड़के ने दवाई का दाम पूछा और उचित दाम देकर बाकी के पैसे भी अपनी जेब में रख लिये। लड़का खुशी-खुशी दवाई की शीशी लेकर चला गया। वह आज दूकान को जल्दी बन्द करने की सोच रहा था। थोड़ी देर बाद लाइट आ गयी और वह यह देखकर दंग रह गया कि उसने दवाई की शीशी समझकर उस लड़के को जो दिया था, वह चूहे मारने वाली जहरीली दवा है, जिसे उसके किसी ग्राहक ने थोड़ी ही देर पहले लौटाया था और ताश खेलने की धुन में उसने अन्य दवाइयों के बीच यह सोचकर रख दिया था कि ताश की बाजी के बाद फिर उसे अपनी जगह पर वापस रख देगा।
अब उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसकी दस साल की नेकी पर मानो जैसे ग्रहण लग गया। उस लड़के के बारे में सोचकर वह तड़पने लगा। सोचा यदि यह दवाई वह अपनी बीमार माँ को देगा, तो वह अवश्य मर जाएगी। लड़का भी बहुत छोटा होने के कारण उस दवाई को तो पढ़ना भी नहीं जानता होगा। उस पल वह अपनी इस भूल को कोसने लगा और उसने ताश खेलने की अपनी आदत को छोड़ने का निश्चय कर लिया। पर यह बात तो बाद में देखी जाएगी। अब क्या किया जाय? उस लड़के का पता-ठिकाना भी तो वह नहीं जानता। कैसे उस बीमार माँ को बचाया जाय? सच, कितना विश्वास था उस लड़के की आँखों में। हरिराम को कुछ सूझ नहीं रहा था। घर जाने की उसकी इच्छा अब ठंडी पड़ गयी। दुविधा और बेचैनी उसे घेरे हुए थी। घबराहट में वह इधर-उधर देखने लगा।
पहली बार उसकी दृष्टि दीवार के उस कोने में पड़ी, जहाँ उसके पिता ने जिद करके भगवान श्रीकृष्ण की तस्वीर दूकान के उद्घाटन के वक्त लगायी थी। हरिराम से हुई बहस में एक दिन उसके पिता ने हरिराम से भगवान को कम से कम एक शक्ति के रूप मानने और पूजा की मिन्नत की थी। उन्होंने कहा था कि भगवान की भक्ति में बड़ी शक्ति होती है, वह हर जगह व्याप्त है और हमें सदैव अच्छे कार्य करने की प्रेरणा देता है। हरिराम को यह सारी बात याद आने लगी। आज उसने इस अद्भुत शक्ति को आज़माना चाहा। उसने कई बार अपने पिता को भगवान की तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर, आँखें बन्द करके ध्यान करते हुए देखा था। उसने भी आज पहली बार कमरे के कोने में रखी उस धूल भरी कृष्ण की तस्वीर को देखा और आँखें बन्द कर दोनों हाथों को जोड़कर वहीं खड़ा हो गया। इसके थोड़ी ही देर बाद वह छोटा लड़का फिर दूकान में आया। हरिराम को पसीना छूटने लगा। वह बहुत अधीर हो उठा। पसीना पोंछते हुए उसने कहा क्या बात है बेटा! तुम्हें क्या चाहिये?
लड़के की आँखों से पानी छलकने लगा। उसने रुकते-रुकते कहा-बाबूजी" बाबूजी! माँ को बचाने के लिये मैं दवाई की शीशी लिये भागा जा रहा था, घर के करीब पहुंच भी गया था, बारिश की वजह से आँगन में पानी भरा था और मैं फिसल गया। दवाई की शीशी गिरकर टूट गया। क्या आप मुझे वही दवाई की दूसरी शीशी दे सकते हैं बाबूजी? लड़के ने उदास होकर पूछा।
हाँ! हाँ! क्यों नहीं? हरिरामने राहत की साँस लेते हुए कहा। लो, यह दवाई! पर उस लड़के ने दवाई की शीशी लेते-लेते हिचकिचाते हुए बड़े ही भोलेपन से कहा 'बाबूजी! मेरे पास दवा के लिये पूरे पैसे अभी नहीं हैं।' हरिराम को उस बेचारे पर दया आयी। वह बोला 'कोई बात नहीं- तुम यह दवाई ले जाओ और अपनी माँ को बचाओ। जाओ, जल्दी करो और हाँ, अबकी बार जरा सँभल के जाना।'
लड़का 'अच्छा बाबूजी!' कहता हुआ खुशी से चल पड़ा। अब हरिराम की जान में जान आयी। वह भगवान को धन्यवाद देता हुआ अपने हाथों से उस धूल भरी तस्वीर को लेकर अपनी धोती से पोंछने लगा और उसे अपने सीने से लगा लिया। अपने भीतर हुए इस परिवर्तन को वह सबसे पहले अपने घरवालों को सुनाना चाहता था, इसलिये जल्दी से दुकान बन्द करके वह घर को रवाना हुआ। उसकी नास्तिकता की घोर अँधेरी रात भी अब बीत गयी थी और अगले दिन की नयी सुबह एक नये हरिराम की प्रतीक्षा कर रही थी।


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प्रेम ही ईश्वर है



सरल विश्वास और निष्कपटता रहने से भगवत प्राप्ति का लाभ होता है। एक व्यक्ति की किसी साधु से भेंट हुई। उसने साधु से उपदेश देने के लिये विनय पूर्वक प्रार्थना की। साधू ने कहा-'भगवान से ही प्रेम करों तब उस व्यक्ति ने कहा भगवान को न तो मैंने कभी देखा है और न उनके विषय में कुछ जानता ही हूँ, फिर उनसे कैसे प्रेम करूँ?' साधु ने पूछा 'अच्छा, तुम्हारा किससे प्रेम है ?' उसने कहा-'इस संसार में मेरा कोई नहीं है, केवल एक *मेढ़ा है, उसी को मैं प्यार करता हूँ।' साधु बोले-'उस मेढ़े के भीतर ही नारायण विद्यमान हैं, यह जानकर उसी की जी लगाकर सेवा करना और उसी को हृदय से प्रेम करना।' इतना कहकर साधु चले गये।

 
उस आदमी ने भी, उस मेड में नारायण है, यह विश्वास कर तन मन से उसकी सेवा करना शुरू कर दिया। बहुत दिनों बाद उस रस्ते से लौटते समय साधु ने उस आदमी को खोज कर उससे पूछा- क्यों जी, अब कैसे हो? उस आदमी ने प्रणाम कर के कहा- गुरुदेव! आपकी कृपा से मैं बहुत अच्छा हूँ आपने जो कहा था, उसके अनुसार भावना रखने से मेरा बहुत कल्याण हुआ है। मैं मेड के भीतर कभी- कभी एक अपूर्व मूर्ति देखता हूँ- उसके चार हाथ है, उस विष्णु रूपा चतुर्भुज मूर्ति का दर्शन कर परमानन्द में डूब जाता हूँ कहा भी गया है- हरि व्यापक सर्वत्र सामना। प्रेम ते प्रगट होहिं मैं जाना।।

* मेढ़ा - सींग वाला एक चौपाया जो लगभग डेढ़ हाथ ऊँचा और घने रोयों से ढका होता है ।


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प्रेरक कहानी - कर्म की जड़ें



एक हरा-भरा चरागाह था, जहाँ भगवान श्री कृष्ण की गाय चरा करती थीं। आश्चर्य की बात यह थी कि उस चरागा हमें अन्य कोई अपने पशु लेकर नहीं जाता था। यदि कोई अपने पशु लेकर वहाँ जाता, तो वहाँ की सारी घास भूरी हो जाती और सूख जाती। फलत: ऐसी घास को पशु न खाते। इन पशुओं के स्वामी भी निराश होते, जब वे देखते कि हरी घास न मिलने के कारण उनके पशु दूध नहीं दे रहे हैं। एक दिन श्रीकृष्ण के गायों से ईर्ष्या रखने वाले कुछ लोग उनकी गायों के पीछे-पीछे चरागाह चले गये। वहाँ श्री कृष्ण अपने सखाओं के साथ बातचीत करते हुए एक वृक्ष के नीचे बैठे हुए थे पशुओं के पीछे जाते हुए इन लोगों ने वहाँ एक चमत्कार देखा।

Krishna Balaram milking cows

उन्होंने देखा कि श्री कृष्ण की गौएँ घास की पत्तियों के साथ बातचीत कर रही हैं। घास की पत्तियाँ गायों से कह रही थीं-'प्यारी गायों, हमें खाओ, हमें चबाओ, हमारे दूध को मक्खन में बदल दो, ताकि यशोदा और गोपियाँ श्रीकृष्ण के सामने उसे खाने के लिये अर्पित करें। घास की पत्तियों की बातें सुनकर गौएँ भी बड़ी उत्सुक हुई और उनसे बोली 'हम कितनी घास खा सकती हैं, तुम तो बड़ी जल्दी उगती हो।' घास की पत्तियों ने इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए कहा-'हम इस तरह उगकर अपनी जड़ तक पहुँचना चाहती हैं। हम इतनी जल्दी उगकर यह चाहती हैं कि श्रीकृष्ण के लिये हम अर्पित हो जाये। हमारा जीवन शीघ्र ही समाप्त हो जाय और फिर बाद में हमें जीने की आवश्यकता न हो। यही कारण है कि हम श्रीकृष्ण की गायों की प्रतीक्षा करती हैं; क्योंकि श्रीकृष्ण गोशाला में अपनी प्रत्येक गाय का दूध पीते हैं।'

Sri Krishna Balaram

श्रीकृष्ण की गाय का पीछा करनेवाले लोग पहले स्तब्ध रह गये, किंतु बाद में उन्हें बोध हुआ। हे परमेश्वर! हमें भी घास की हरी-भरी पत्तियाँ बना दो। हम अपने को बिना किसी भेदभाव के आपके श्रीचरणों में पूर्णतया समर्पित कर देंगे। आप हमारे कर्मों की जड़ों पर इस तरह प्रहार करें कि जीवन के उपवन या चरागाह की हमें फिर कोई आवश्यकता न पड़े। आपके बिना हमारा जीवन नीरस है, निष्फल है, भूरा और सूखा है। जब आप हमारे साथ होंगे, तब हम हरे-भरे प्रकाश मान होकर आपके श्रीचरणों में विनयावनत हो जाएंगे।


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प्रेरक प्रसंग - माया का मुखौटा



रामपुर नामक गाँव नगर से कुछ मील की दूरी पर स्थित था। दिसंबर का उत्तरार्ध चल रहा था। हर साल की तरह इस साल भी हरि रामपुर में आया हुआ था। वह बहुरूपिये का काम करता था। प्रतिदिन अपराह्न का समय वह विभिन्न प्रकार के वेश धारण करके गांव में निकलता किसी दिन संन्यासी का, तो किसी दिन भिखारी का, किसी दिन राजा का तो किसी दिन सिपाही का विशेष कर बच्चों में उसका अभिनय बड़ा ही लोकप्रिय था। वह अपने पास तरह-तरह के पोशाक, मुखौटे तथा रंग रखता था। दिसम्बर माह के अंतिम रविवार को रामपुर के दो प्रमुख स्कूलों-मॉडल स्कूल और आदर्श स्कूल के बीच क्रिकेट-मैच आयोजित हुआ था। दोनों टीमें तगड़ी थीं और मैच के संभावित नतीजे को लेकर छात्रों में बड़ी उत्सुकता फैली हुई थी। मैच में बच्चों का इतना आकर्षण देखकर उस दिन हरि ने भी छुट्टी मनाने की सोची। आखिरकार मैच समाप्त हुआ। मॉडल स्कूल की जीत हुई थी। तब तक संध्या का धुंधलका भी घिरने लगा था। मॉडल स्कूल के छात्र अपनी टीम की सफलता पर फूले नहीं समा रहे थे। उनमें से कुछ लड़के अँधेरा हो जाने तक मैदान में खुशी मनाते रहे। विपिन बाकी बच्चों से थोड़ा बड़ा था। उसने बच्चों को घर लौट जाने की सलाह दी। बच्चे तब भी मैच की ही चर्चा में मशगूल होकर मैदान के कोने की एक झाड़ी के पास से होकर गुजर रहे थे।

सहसा विपिन ने देखा कि चमकीली आँखों और बड़े बड़े पंजों वाला एक धारी दार बाघ झाड़ियों में छिपा बैठा है। वह चिल्ला उठा-'ठहरो! बाघ है!' निश्चय ही वह किसी असावधान राहगीर को पकड़ने के लिये वहाँ घात लगाये बैठा है। कुछ लड़के सहमकर वहीं बैठ गये, कुछ भागने लगे और कुछ वहीं जड़ी भूत होकर खड़े रह गये। उस पूरी टोली में यतीन सबसे साहसी था। वह सबके पीछे-पीछे आ रहा था, इसलिये उसने थोड़ी दूरी से सारा वाक़या देखा। उसे सूर्यास्त के बाद इतनी जल्दी बाघ का निकलना थोड़ा अस्वाभाविक-सा लगा। अपनी सुरक्षित दूरी से उसने ध्यान पूर्वक उस जानवर का निरीक्षण किया। उसने देखा कि बाघ के पाँवों के पीछे मनुष्य के हाथ-पांव छिपे हुए हैं। साहस जुटा कर वह तत्काल झाड़ी के पास जा पहुँचा और हरि से अपना मुखौटा उतार देने को कहा। झाड़ी की ओर से जोरकी हँसी की आवाज आयी। अब सभी बच्चों ने हरि का खेल समझ लिया था। अब उन्हें पूरी घटना इतनी मजेदार लग रही थी कि हँसते-हँसते उनके पेट में बल पड़ गये। हरि का खेल पूरा हो चुका था। अब लड़कों को और डराना सम्भव नहीं था, इसलिये वह चलता बना। यही खेल माया का है, एक बार यदि हम माया का खेल समझ जायँ, तो वह हमें दोबारा बुद्धू नहीं बना सकती।


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एक तत्त्वबोधक प्रेरक कथा



 प्रतिष्ठानपुर नामक एक अत्यन्त विख्यात नगर था। वहॉ पर पृथ्वीरूप नामक एक अत्यन्त सुन्दर राजा था। एक बार वहाँ से कोई तत्त्वज्ञ भिक्षु जा रहा था। उसने पृथ्वीरूप राजा को देखा। उसको अत्यन्त सुन्दर देखकर उसने विचार किया कि इसके लायक ही कोई लड़की मिले और यह उससे ही विवाह करे तो ठीक होगा। उसने राजा के लोगों से कहा-'मैं राजा से मिलना चाहता हूँ, समय बता दिया जाय।' वह राजा से मिला तो राजा ने कहा- 'आपको क्या चाहिए?' उसने समझा कि भिक्षु है, कुछ लेने आया होगा। भिक्षु ने  कहा-'राजन्! मुझे तो कुछ नहीं चाहिए, परंतु तुम्हें कुछ बताने आया हूँ। तुम्हारे लायक एक कन्या है। उसका नाम है 'रूपलता' और वह अद्वितीय सुन्दरी है। वह मुक्तिपुर में रहती है। उसके पिता का नाम रूपधर' है और माता का नाम 'हेमलता' है वही तुम्हारी रानी बनने योग्य है; क्योंकि जैसी तुम्हारी सुन्दरता है, वैसी ही उसकी सुन्दरता है।'

राजा उसकी बात से प्रभावित हो गया। राजा ने मुक्तिपुर का पता लगाकर उस लड़की के साथ बात करने के लिये अपने मंत्रियों से कहा मुक्तिपुर  समुद्र का एक टापू था, अत: बहुत ढूँढ़ने के बाद ही उसका पता लग सका। उधर वह ज्ञानी भिक्षु विचारने लगा कि जैसे ही उस राजा की तरफ से मुक्तिपुर में विवाह-प्रस्ताव आयेगा तो क्या पता! रूप लता और यहाँ के लोग स्वीकार करें या न करें। वह भिक्षु एक सिद्धहस्त चित्रकार भी था। उसने राजा पृथ्वीरूप का बड़ा सुन्दर आकर्षक चित्र बनाया और मुक्तिपुर जाकर रूप लता को दिखा दिया और कह दिया-'यह प्रतिष्ठान पुरका राजा है और तुम्हारे लायक यही पति है।' इस पर रूपलता ने भी उससे ही विवाह करने की अपनी चाह माता-पिता को बता दी। इधर राजाने भी मुक्तिपुर का पता लगाकर अपने विवाह प्रस्ताव वहाँ भिजवाया। रूपलता तो उसका चित्र पहले ही देख चुकी थी। माता-पिता ने भी प्रस्ताव को स्वीकार कर रूपलता का विवाह पृथ्वीरूप राजा के साथ कर दिया। वहाँ से विवाह कर नवविवाहिता पत्नी को लेकर राजा जब प्रतिष्ठानपुर आया तो देखा कि प्रतिष्ठानपुर की जितनी युवतियाँ थीं, वे नाराज हुई बैठी हैं, वे कहती थीं कि क्या हमारे यहाँ कोई सुन्दर स्त्री नहीं है, जो हम सबको छोड़कर राजा दूर देश से विवाह करके आ रहे हैं?' परंतु हाथी पर बैठकर जब उसकी सवारी नवविवाहिता पत्नी के साथ निकली, तो सारी स्त्रियों का गर्व समाप्त हो गया और उन्होंने कहा कि राजा ने ठीक ही किया। तब दोनों सुख से रहने लगे।

प्रसंग का भावार्थ - इस दृष्टान्त का अर्थ यह है कि वह 'प्रतिष्ठानपुर' कोई नगर विशेष नहीं है, अपितु जिसमें सब चीजें प्रतिष्ठित हैं, उसका ही नाम प्रतिष्ठानपुर है और उसमें 'पृथ्वीरूप' राजा यह जीव है-यह पार्थिव देहवाला है। पृथ्वी के विकार का यह शरीर धारण किये हुए है, इसलिये यह पृथ्वीरूप राजा है। उससे वेदरूप भिक्षु जब मिलता है तो वह कहता है कि 'हे जीव! तेरे प्राप्त करने लायक पराविद्या अर्थात् ब्रह्मविद्या ही है, वही तुम्हारी पत्नी (जीवनसंगिनी) बनने योग्य है। इस पृथ्वीलोक के अन्दर जितने भी पदार्थ हैं, पार्थिव पदार्थ हैं, वे तेरे योग्य नहीं हैं, क्योंकि तेरी सुन्दरता चेतन की सुन्दरता है, मुक्तिपुर में रहनेवाली रूपलता ही तुम्हारी पत्नी बनने के योग्य है। पराविद्या ही रूपलता है। तत्त्वज्ञ भिक्षु (सद्गुरु) दोनों को मिलाने का काम करता है, सो यह साधन स्वरूप बुद्धि ही तत्व वेत्ता भिक्षु है, जिससे वेद के अर्थ का ज्ञान होता है। बुद्धि के द्वारा जिसको समझा जाय अर्थात् शुद्ध बुद्धि के द्वारा प्राप्त किया जाय, वही शास्त्र ज्ञान है। ब्रह्मविद्या तो पहले से ही जानती है कि मैं किसका विषय हूँ अर्थात् चेतन का ही विषय हूँ, इसलिये यह कभी नहीं समझना चाहिये कि मैं तो ब्रह्मविद्या को चाहता हूँ, क्या पता वह मुझे वरण करे या न करे परंतु जब तक तुम उसके समक्ष नहीं जाओगे, तब तक विवाह तो होगा नहीं। रास्ते में अनेक विघ्न आयेंगे, जैसे प्रतिष्ठानपुर की कोई स्त्री नहीं चाहती कि राजा दूसरे देश में जाएँ और वहां की लड़की से विवाह करें। उसी प्रकार तुम्हारे अन्तःकरण में रहने वाले जितने काम, क्रोध, मोह, मद, मात्सर्य आदि विकार हैं, वे भी कोई नहीं चाहते कि तुम उनसे विमुख होकर शुद्ध ब्रह्मविद्या (पराविद्या) प्राप्त करो। परंतु एक बार पराविद्या आ गयी, तो ये काम, क्रोध, मोह, मद, मात्सर्य आदि जो विकृतियाँ हैं, उनका गर्व समाप्त हो जायगा अर्थात् ये विकृतियाँ म्लान हो जाएगी। आत्मज्ञान के उदय होने पर तो ये सारे विकार सर्वथा म्लान हो जाते हैं। इनमें फिर कोई सामर्थ्य नहीं रहती। एक बार जहाँ पराविद्या की प्राप्ति हो गयी, वहाँ हमेशा के लिये सारे दुःखों से निवृत्ति हो जाती है अर्थात् अन्त:करण निर्मल हो जाता है।

#बोध_कथा #प्रेरक_प्रसंग


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मोह में दुःख



रामनगर के एक शाहजी ने एक सफेद चूहा पाल रखा था। उसे वे बड़े प्यार से खिलाते-पिलाते तथा देख भाल किया करते थे। शाहजी जब दुकानपर जाते, तो उसे अपने साथ ही ले जाते और जब वे दुकान से घर लौटते, तो उसे भी लौटा लाते थे। शाहजी की दुकान आटा-दाल की थी। उनकी दुकान में चूहे बहुत पैदा हो गये थे, इसलिये चूहों को मारने के वास्ते शाहजी ने एक बिल्ली पाल ली। जब बिल्ली बड़ी हुई, तब दुकान के चूहों का शिकार करने लगी, 4-6 चूहे नित्य मारकर खा जाती थी। शाहजी उसके चूहा पकड़ने पर बड़े प्रसन्न होते थे।
एक दिन की बात है कि बिल्ली को शिकार करने के लिये एक भी चूहा न मिला। बिल्ली भूखी थी, उसे अपने-बिराने का ज्ञान तो था ही नहीं। उसने झट शाहजी का पाला हुआ सफेद चूहा मारकर खा लिया। शाहजी अब करते क्या, देखते रह गये। जब बिल्ली को मारने दौड़े, तब वह भाग गयी। शाहजी दुःख में निमग्न बैठे कुछ सोच रहे थे कि इतने में उधर से उनके गुरु महाराज आ निकले। शाहजी को चिन्तित देखकर बोले-'क्यों, क्या हुआ? कुशल तो है?' शाहजी बोले महाराज! वैसे तो आपकी कृपा से सब कुशल-मंगल है, परंतु मेरे एक पाले हुए सफेद चूहे को बिल्ली खा गया।' गुरुजी ने कहा कि 'जब तुमने चूहा पाला था तो फिर बिल्ली क्यों पाल ली?' शाहजी ने कहा कि 'मैंने तो बिल्ली को दुकान से चूहों को मारने के वास्ते पाला था।' महात्मा जी ने कहा कि 'क्या और चूहों में जान नहीं थी?' तब शाहजी बोले 'हुआ करे जान, मुझे क्या, मुझे तो इसी चूहे से प्रेम था। मैंने इसे बड़ी मोहब्बत से पाला था। तब महात्माजी ने कहा कि 'भाई! तुम्हारे दुख का कारण चूहा नहीं है, बल्कि ममता है (यह मेरा है ऐसा भाव)।' शाहजी ने कहा-'हाँ महाराज!'
महात्माजी ने कहा कि संसार की समस्त वस्तुएँ नाशवान् हैं और प्रत्येक प्राणी को मृत्यु रूपी बिल्ली अवश्य खायेगी। यदि तुम सांसारिक पदार्थों में ममता करोगे तो दुःख से सताये जाओगे इन पदार्थों और स्त्री, पुत्र, धन आदि की ममता (मोह) छोड़कर अपने कर्तव्य का धैर्य के साथ पालन करो और सब में आत्मवत् भाव करो तभी दुख से छुटकारा पा सकोंगे।
यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद् विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥
जिस ज्ञानी मनुष्य की दृष्टि में सभी प्राणी अपनी आत्मा के तुल्य हो जाते हैं, उसको फिर शोक, मोह नहीं होता।

#बोध_कथा #प्रेरक_प्रसंग


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रस्सी में सर्प का भ्रम



घड़ी ने अभी-अभी नौका घण्टा बजाया था। हिरेन 'सुन्दरवन के बाघ' फिल्म देखने के बाद वापस अपने घर लौट रहा था। रॉयल बंगाल बाघों के अंचल में जाकर इस फिल्म का निर्माण किया गया था। हिरेन उस फिल्म के दृश्यों के बारे में सोचता हुआ चला जा रहा था। चलते-चलते वह सहसा चौंक गया। सामने सड़क पर एक सांप लेटा हुआ था। उस पर उसका पाँव पड़ते-पड़ते रह गया था। बड़े भाग्य से ही उसकी जान बच गयी थी। वह थोड़ा पीछे हटकर और भी अच्छी तरह सांप को देखने लगा। यह एक वैसा ही नाग लग रहा था, जैसा कि उसने कुछ दिनों पूर्व सँपेरे की टोकरी में देखा था।

हिरेन ने सांप से बचने के लिये बगल का एक दूसरा रास्ता पकड़ने की सोची। तभी उसने देखा कि एक व्यक्ति हाथ में टार्च लिये उस सांप की ओर ही चला जा रहा है।हिरेन चिल्लाया-'उधरसे मत जाओ, सड़क पर एक नाग लेटा है।'
वह व्यक्ति बोला-'डरो मत। मेरे साथ आओ। घण्टे भर पहले मैं इसी सड़क से होकर गया था। मैंने तुम्हारे साँप को देख लिया है। वह नाग नहीं, रस्सी का एक टुकड़ा मात्र है।' वह हीरेन को उस जगह ले गया। हिरेन ने टार्च से आलोकित सड़क को स्पष्ट रूपसे देखा तो उसे पता चला कि वहाँ कोई नाग नहीं, बल्कि एक रस्सी पड़ी है। दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े। हिरेन का भय जा चुका था।
कभी-कभी हम एक वस्तु को कुछ दूसरा समझ बैठते हैं और इस कारण हम भ्रमित या भयभीत हो जाते हैं। वेदान्त की मतानुसार रस्सी में सर्प के भय के समान ही हमारे सुख-दुःख, हमारी समस्या, आशंका और चिन्ताएँ एक तरहके भ्रम पर आधारित होती हैं। मूलत: हम पूर्ण और आनन्दमय हैं, तथापि हम अपनेको श्मशान की ओर अग्रसर हो रहे एक लाचार मत्स्य प्राणी के रूपमें देखते हैं। हम लोग ऐसा व्यवहार करते हैं, मानो हमपर जादू कर दिया गया हो और इसीको वेदान्त में माया कहते हैं। जब मायाका जादू टूट जाता है, तब हमें अपने वास्तविक स्वरूपका ज्ञान होता है।

#बोध_कथा #प्रेरक_प्रसंग


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12 राशि नाम और अक्षर - 12 Rashi Naam



 Rashi Name | 12 Rashi Akshar | 12 Rashi Name | 12 Rashi Ke Naam.

इसे साफ़ एवं व्यवस्थित सारणी के रूप में इस प्रकार लिखा जा सकता है—

क्रमांकराशिअंग्रेज़ी नामनाम का प्रथम अक्षर
1मेषAriesअ, ल, ई
2वृषभTaurusब, व, उ
3मिथुनGeminiक, छ, घ
4कर्कCancerड, ह
5सिंहLeoम, ट
6कन्याVirgoप, ठ, ण
7तुलाLibraर, त
8वृश्चिकScorpioन, य
9धनुSagittariusफ, ध, भ, ढ
10मकरCapricornख, ज
11कुंभAquariusग, स, श, ष
12मीनPiscesद, च, झ, थ

राशि अनुसार नाम का प्रथम अक्षर

  • मेष राशि – अ, ल, ई

  • वृषभ राशि – ब, व, उ

  • मिथुन राशि – क, छ, घ

  • कर्क राशि – ड, ह

  • सिंह राशि – म, ट

  • कन्या राशि – प, ठ, ण

  • तुला राशि – र, त

  • वृश्चिक राशि – न, य

  • धनु राशि – फ, ध, भ, ढ

  • मकर राशि – ख, ज

  • कुंभ राशि – ग, स, श, ष

  • मीन राशि – द, च, झ, थ

नोट: पारंपरिक वैदिक ज्योतिष में राशि निर्धारण सामान्यतः जन्म नक्षत्र और चंद्र राशि के आधार पर किया जाता है। नाम का प्रथम अक्षर संबंधित नक्षत्र के चरण (पाद) के अनुसार निर्धारित किया जाता है।Rashi Name | 12 Rashi Akshar | 12 Rashi Name | 12 Rashi Ke Naam.

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वेदों और श्रुतियों की जननी देवी गायत्री की जयंती और अवतरण



Gayatri Mantra

गायत्री माता : स्वरूप, अवतरण और महिमा

कौन हैं गायत्री माता? कैसे हुआ उनका अवतरण?

मान्यता है कि चारों वेद, शास्त्र और श्रुतियाँ सभी गायत्री से उत्पन्न हुई हैं। वेदों की उत्पत्ति का कारण होने से इन्हें वेदमाता कहा जाता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश—तीनों देवताओं की आराध्या भी इन्हें ही माना जाता है, इसलिए इन्हें देवमाता भी कहा जाता है। समस्त ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण गायत्री को ज्ञान-गंगा भी कहा जाता है। इन्हें भगवान ब्रह्मा की दूसरी पत्नी के रूप में भी स्वीकार किया गया है।

मान्यता है कि सृष्टि के आदि काल में ब्रह्माजी पर गायत्री मंत्र प्रकट हुआ। मां गायत्री की कृपा से ब्रह्माजी ने गायत्री मंत्र की व्याख्या अपने चारों मुखों से चार वेदों के रूप में की। प्रारंभ में गायत्री का ज्ञान केवल देवताओं तक सीमित था, किन्तु जिस प्रकार राजा भगीरथ कठोर तपस्या द्वारा गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाए, उसी प्रकार महर्षि विश्वामित्र ने भी कठिन साधना करके गायत्री मंत्र की महिमा को जन-जन तक पहुँचाया।

मां गायत्री को पंचमुखी माना गया है

हिंदू धर्म में मां गायत्री को पंचमुखी माना गया है। इसका तात्पर्य यह है कि समस्त ब्रह्मांड जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि (तेज) और आकाश—इन पाँच तत्वों से निर्मित है। संसार के सभी प्राणियों का शरीर भी इन्हीं पाँच तत्वों से बना है।

इस पृथ्वी पर प्रत्येक जीव के भीतर गायत्री प्राणशक्ति के रूप में विद्यमान हैं। यही कारण है कि गायत्री को समस्त शक्तियों का आधार माना गया है। भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रतिदिन गायत्री उपासना को अत्यंत कल्याणकारी माना गया है।

गायत्री जयंती

पुराणों के अनुसार गायत्री जयंती ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। कहा जाता है कि महर्षि विश्वामित्र ने पहली बार गायत्री मंत्र का उच्चारण इसी दिन किया था। इसलिए यह तिथि गायत्री जयंती के रूप में प्रसिद्ध हुई।

अधिकांश वर्षों में गायत्री जयंती गंगा दशहरा के अगले दिन पड़ती है। कुछ परंपराओं में इसे श्रावण पूर्णिमा के अवसर पर भी मनाया जाता है। मान्यता है कि गायत्री जयंती के दिन श्रद्धापूर्वक गायत्री मंत्र का जप करने से यश, कीर्ति, धन, ऐश्वर्य तथा आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है। यदि गायत्री मंत्र का जप विधिपूर्वक, पूर्ण श्रद्धा एवं पवित्रता के साथ किया जाए, तो इसका विशेष फल प्राप्त होता है।

गायत्री माता की महिमा

हिंदू धर्म में मां गायत्री को वेदमाता कहा गया है, क्योंकि सभी वेदों की उत्पत्ति इन्हीं से मानी जाती है। पुराणों में गायत्री देवी को ब्रह्मा, विष्णु और महेश—त्रिमूर्ति के समतुल्य सम्मान दिया गया है। उन्हें समस्त देवताओं की माता तथा देवी सरस्वती, महालक्ष्मी और पार्वती का संयुक्त स्वरूप माना गया है।

गायत्री माता के पाँच मुख और दस भुजाएँ मानी जाती हैं। उनके चार मुख चारों वेदों के प्रतीक हैं, जबकि पाँचवाँ मुख परम दिव्य शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। वे कमलासन पर विराजमान रहती हैं। उनकी दस भुजाएँ दिव्य शक्तियों और भगवान विष्णु के संरक्षणकारी स्वरूप का प्रतीक मानी जाती हैं।

भारतीय संस्कृति में गायत्री माता को संस्कृति की जननी भी कहा गया है। धर्मशास्त्रों के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मां गायत्री का अवतरण हुआ था और इसी स्मृति में गायत्री जयंती मनाई जाती है।

मान्यता है कि मां गायत्री की उपासना से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं तथा जीवन में किसी प्रकार की कमी नहीं रहती। अथर्ववेद में गायत्री उपासना से प्राप्त होने वाले सात प्रमुख प्रतिफलों का उल्लेख मिलता है—आयु, प्राण, प्रजा, पशुधन, कीर्ति, धन और ब्रह्मवर्चस्

ऋषि-मुनियों और महापुरुषों की दृष्टि में गायत्री

गायत्री की महिमा का वर्णन प्राचीन ऋषि-मुनियों से लेकर आधुनिक विचारकों तक ने किया है। वेद, शास्त्र और पुराण तो गायत्री माता की महिमा से परिपूर्ण हैं ही, अथर्ववेद में उन्हें आयु, प्राण, शक्ति, कीर्ति, धन और ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली देवी कहा गया है।

महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास कहते हैं कि जिस प्रकार पुष्पों में मधु और दूध में घी साररूप होता है, उसी प्रकार समस्त वेदों का सार गायत्री है। यदि गायत्री सिद्ध हो जाए, तो वह समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाली दिव्य कामधेनु के समान है।

जिस प्रकार गंगा शरीर और मन को पवित्र करती है, उसी प्रकार गायत्री रूपी ब्रह्मगंगा आत्मा को निर्मल और प्रकाशित करती है।

महर्षि विश्वामित्र का कथन है कि ब्रह्माजी ने तीनों वेदों का सार निकालकर गायत्री मंत्र के रूप में मानवता को प्रदान किया है। गायत्री से बढ़कर पवित्र करने वाला कोई मंत्र नहीं है। जो व्यक्ति नियमित रूप से गायत्री मंत्र का जप करता है, वह पापों से उसी प्रकार मुक्त हो जाता है, जैसे केंचुल छोड़ने पर सर्प।

गायत्री माता के भक्त उन्हें आदिशक्ति के रूप में पूजते हैं। प्रतीकात्मक रूप से गायत्री ज्ञान, विवेक और चेतना की अधिष्ठात्री देवी हैं। उनकी कृपा से अज्ञान का अंधकार दूर होता है और जीवन में प्रकाश, ज्ञान तथा आध्यात्मिक जागृति का उदय होता है। महर्षि विश्वामित्र ने इसी दिव्य ज्ञान को सम्पूर्ण मानवता तक पहुँचाने का महान कार्य किया।


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क्यों कहा जाता है वेदमाता?

गायत्री संहिता के अनुसार— “भासते सततं लोके गायत्री त्रिगुणात्मिका” अर्थात् गायत्री माता सरस्वती, लक्ष्मी और काली—इन तीनों दिव्य शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। ज्ञान, समृद्धि और शक्ति के इन त्रिविध स्वरूपों से ही वेदों के दिव्य ज्ञान का प्रादुर्भाव माना गया है। इसी कारण गायत्री को वेदमाता कहा जाता है।

गायत्री मंत्र के विषय में शास्त्रों में कहा गया है— “सर्वदेवानां गायत्री सारमुच्यते” अर्थात् गायत्री मंत्र समस्त वेदों का सार है। इसलिए गायत्री माता को वेदों की जननी और वेदमाता के रूप में सम्मानित किया गया है।

मां गायत्री का उल्लेख ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, तैत्तिरीय संहिता तथा अन्य वैदिक ग्रंथों में प्राप्त होता है। अनेक उपनिषदों में सावित्री और गायत्री को एक ही शक्ति का स्वरूप बताया गया है। मान्यता है कि वे किसी समय सविता देव (सूर्य) की पुत्री के रूप में प्रकट हुई थीं, इसलिए उनका नाम सावित्री पड़ा। कहा जाता है कि उनका प्रादुर्भाव सविता के मुख से हुआ था। भगवान सूर्य ने उन्हें ब्रह्माजी को समर्पित किया, जिसके कारण वे ब्रह्माणी नाम से भी प्रसिद्ध हुईं।

गायत्री ज्ञान और विज्ञान की मूर्तिमान शक्ति हैं। वे ब्राह्मणों की आराध्य देवी मानी जाती हैं तथा उन्हें परब्रह्मस्वरूपिणी कहा गया है। वेदों, उपनिषदों, पुराणों तथा अन्य धर्मग्रंथों में उनकी महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है।

देवी गायत्री के विवाह की कथा

एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान ब्रह्मा एक महायज्ञ का आयोजन कर रहे थे। शास्त्रों के अनुसार किसी भी यज्ञ, पूजा अथवा धार्मिक अनुष्ठान में विवाहित व्यक्ति को अपनी पत्नी के साथ बैठकर ही कर्म करना चाहिए। पति-पत्नी के संयुक्त रूप से यज्ञ में सहभागी होने पर उसका फल पूर्ण एवं शीघ्र प्राप्त होता है।

यज्ञ के समय किसी कारणवश ब्रह्माजी की पत्नी सावित्री के आने में विलंब हो गया। यज्ञ का शुभ मुहूर्त निकला जा रहा था। ऐसी स्थिति में यज्ञ की पूर्णता के लिए ब्रह्माजी ने गायत्री देवी के साथ विवाह किया और उन्हें अपने साथ यज्ञ में आसन ग्रहण कराया। इसके पश्चात यज्ञ का शुभारंभ हुआ।

इस कथा के कारण गायत्री देवी को भगवान ब्रह्मा की पत्नी तथा ब्रह्माणी के रूप में भी पूजा जाता है। विभिन्न पुराणों में इस प्रसंग के अनेक रूप और विवरण मिलते हैं, किन्तु सभी में गायत्री की दिव्य शक्ति और उनके आध्यात्मिक महत्व का ही प्रतिपादन किया गया है।

गायत्री मंत्र और उसका अर्थ

गायत्री मंत्र

ॐ भूर्भुवः स्वः।
तत्सवितुर्वरेण्यं।
भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥

मंत्र का अर्थ

हम उस परम दिव्य, पवित्र और तेजस्वी परमात्मा (सविता देव) के श्रेष्ठ प्रकाश का ध्यान करते हैं, जो समस्त संसार का सृजनकर्ता, पालनकर्ता और प्रेरणास्रोत है। वह परम दिव्य शक्ति हमारी बुद्धि को प्रकाशित करे, हमें सत्य मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे तथा हमारे जीवन को ज्ञान, विवेक और सद्गुणों से आलोकित करे।

गायत्री मंत्र को वेदों का सार माना गया है। यह केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि ज्ञान, चेतना, आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उत्थान का महान साधन है। नियमित श्रद्धापूर्वक इसके जप से मन, बुद्धि और आत्मा का परिष्कार होता है तथा व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।

Gayatri Mantra

गायत्री मंत्र

ॐ भूर्भुवः स्वः ।
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि ।
धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

अर्थ – हम उस सृष्टिकर्ता, प्रकाशमान, परम तेजस्वी परमात्मा का ध्यान करते हैं। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे।

इस मंत्र के जप से ज्ञान की प्राप्ति होती है तथा मन शांत और एकाग्र रहता है। ललाट पर तेज और आभा का विकास होता है। गायत्री माता के विभिन्न स्वरूपों का उनके मंत्रों सहित जप करने से दरिद्रता, दुःख और कष्टों का नाश होता है तथा निःसंतानों को संतान-प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है।

गायत्री मंत्र के चौबीस अक्षर

गायत्री मंत्र में चौबीस (24) अक्षर हैं। ऋषियों ने इन अक्षरों में बीजरूप से विद्यमान उन शक्तियों को पहचाना है जिन्हें चौबीस अवतार, चौबीस ऋषि, चौबीस शक्तियाँ तथा चौबीस सिद्धियाँ कहा जाता है। गायत्री मंत्र के ये चौबीस अक्षर चौबीस शक्ति-बीज माने गए हैं। गायत्री मंत्र की उपासना से इन शक्तियों और सिद्धियों का लाभ प्राप्त होता है।

1. तत्

देवता – गणेश
शक्ति – सफलता शक्ति
फल – कठिन कार्यों में सफलता, विघ्नों का नाश, बुद्धि की वृद्धि।

2. स

देवता – नरसिंह
शक्ति – पराक्रम शक्ति
फल – पुरुषार्थ, वीरता, शत्रुनाश तथा आक्रमणों से रक्षा।

3. वि

देवता – विष्णु
शक्ति – पालन शक्ति
फल – संरक्षण, आश्रितों की रक्षा तथा योग्यताओं की वृद्धि।

4. तु

देवता – शिव
शक्ति – कल्याण शक्ति
फल – अनिष्ट का विनाश, कल्याण, आत्मपरायणता एवं निश्चय शक्ति।

5. व

देवता – श्रीकृष्ण
शक्ति – योग शक्ति
फल – कर्मयोग, सौन्दर्य, सरसता, अनासक्ति एवं आत्मनिष्ठा।

6. रे

देवी – राधा
शक्ति – प्रेम शक्ति
फल – प्रेमभाव, द्वेष का नाश।

7. णि

देवी – लक्ष्मी
शक्ति – धन शक्ति
फल – धन, पद, यश एवं भौतिक समृद्धि।

8. यं

देवता – अग्नि
शक्ति – तेज शक्ति
फल – तेज, प्रतिभा, सामर्थ्य और शक्ति की वृद्धि।

9. भ

देवता – इन्द्र
शक्ति – रक्षा शक्ति
फल – रोग, शत्रु, चोर एवं अन्य भय से रक्षा।

10. र्गो

देवी – सरस्वती
शक्ति – बुद्धि शक्ति
फल – मेधा, विवेक, दूरदर्शिता एवं ज्ञान-वृद्धि।

11. दे

देवी – दुर्गा
शक्ति – दमन शक्ति
फल – विघ्नों पर विजय, दुष्टों का दमन।

12. व

देवता – हनुमान
शक्ति – निष्ठा शक्ति
फल – निर्भयता, कर्तव्यपरायणता एवं ब्रह्मचर्य।

13. स्य

देवी – पृथ्वी
शक्ति – धारण शक्ति
फल – धैर्य, सहनशीलता, गंभीरता और स्थिरता।

14. धी

देवता – सूर्य
शक्ति – प्राण शक्ति
फल – आरोग्य, दीर्घायु, विकास एवं विचारों का शोधन।

15. म

देवता – श्रीराम
शक्ति – मर्यादा शक्ति
फल – संयम, सौम्यता, मैत्री एवं मर्यादा-पालन।

16. हि

देवी – श्रीसीता
शक्ति – तप शक्ति
फल – पवित्रता, नम्रता, शील एवं सात्त्विकता।

17. धि

देवता – चन्द्र
शक्ति – शान्ति शक्ति
फल – चिंता, क्रोध, लोभ और मोह का नाश।

18. यो

देवता – यम
शक्ति – काल शक्ति
फल – समय का सदुपयोग, जागरूकता एवं निर्भयता।

19. यो

देवता – ब्रह्मा
शक्ति – उत्पादक शक्ति
फल – सृजन क्षमता एवं संतान-वृद्धि।

20. नः

देवता – वरुण
शक्ति – रस शक्ति
फल – सरलता, करुणा, माधुर्य एवं कलाप्रेम।

21. प्र

देवता – नारायण
शक्ति – आदर्श शक्ति
फल – उच्च चरित्र, आदर्श जीवन एवं नेतृत्व क्षमता।

22. चो

देवता – हयग्रीव
शक्ति – साहस शक्ति
फल – उत्साह, वीरता एवं विपत्तियों से संघर्ष की क्षमता।

23. द

देवता – हंस
शक्ति – विवेक शक्ति
फल – सत्-असत् का निर्णय, आत्मसंतोष एवं सत्संगति।

24. यात्

देवता – तुलसी
शक्ति – सेवा शक्ति
फल – लोकसेवा, सत्यनिष्ठा, आत्मशान्ति एवं परोपकार।

गायत्री उपासना से हर कार्य संभव

गायत्री, गीता, गंगा और गौ—ये भारतीय संस्कृति की चार आधारशिलाएँ मानी गई हैं। श्रीकृष्ण ने गीता में भी मनुष्य के कल्याण के लिए गायत्री और ॐ के महत्व का संकेत दिया है। वेदों में गायत्री को आयु, प्राण, शक्ति, कीर्ति, धन और ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली देवी कहा गया है। उनकी उपासना से साधक को इन दिव्य गुणों की प्राप्ति होती है।

गायत्री मंत्र का लाभ

महर्षि वेदव्यास कहते हैं कि जैसे पुष्पों में मधु और दूध में घृत साररूप होता है, वैसे ही समस्त वेदों का सार गायत्री है। यदि गायत्री साधना सिद्ध हो जाए तो वह कामधेनु के समान सभी उचित इच्छाओं को पूर्ण करने वाली बन जाती है।

गायत्री मंत्र का श्रद्धापूर्वक एवं नियमित जप करने से—

  • आध्यात्मिक चेतना का विकास होता है।

  • बुद्धि एवं स्मरण शक्ति बढ़ती है।

  • मन की शुद्धि होती है।

  • दुःख एवं कष्टों का निवारण होता है।

  • आत्मबल और तेज में वृद्धि होती है।

  • साधक के चारों ओर आध्यात्मिक संरक्षण का कवच निर्मित होता है।

देवी-देवताओं के गायत्री मंत्र

काली गायत्री
ॐ कालिकायै च विद्महे, श्मशानवासिन्यै धीमहि, तन्नो घोरा प्रचोदयात्॥

कृष्ण गायत्री
ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे, वासुदेवाय धीमहि, तन्नः कृष्णः प्रचोदयात्॥

गणेश गायत्री
ॐ एकदन्ताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥

दुर्गा गायत्री
ॐ कात्यायन्यै विद्महे, कन्याकुमार्यै धीमहि, तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्॥

राम गायत्री
ॐ दशरथाय विद्महे, सीतावल्लभाय धीमहि, तन्नो रामः प्रचोदयात्॥

रुद्र गायत्री
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे, महादेवाय धीमहि, तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥

लक्ष्मी गायत्री
ॐ महादेव्यै विद्महे, विष्णुपत्न्यै धीमहि, तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्॥

विष्णु गायत्री
ॐ नारायणाय विद्महे, वासुदेवाय धीमहि, तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥

सरस्वती गायत्री
ॐ वाग्देव्यै विद्महे, ब्रह्मपत्न्यै धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात्॥

हनुमान गायत्री
ॐ आञ्जनेयाय विद्महे, वायुपुत्राय धीमहि, तन्नो हनुमान् प्रचोदयात्॥

इस प्रकार करें गायत्री मंत्र का जप

गायत्री मंत्र का जप सूर्योदय से लगभग दो घंटे पूर्व से लेकर सूर्यास्त के एक घंटे बाद तक किया जा सकता है। मानसिक (मौन) जप किसी भी समय किया जा सकता है। सामान्यतः प्रातः और सायं संध्या का समय सर्वोत्तम माना गया है।

नियमित रूप से 108 बार गायत्री मंत्र का जप करने से—

  • बुद्धि प्रखर होती है।

  • स्मरण शक्ति बढ़ती है।

  • अध्ययन में एकाग्रता आती है।

  • व्यक्तित्व में तेज और आकर्षण बढ़ता है।

  • विवेक एवं निर्णय क्षमता का विकास होता है।

स्वामी विवेकानन्द ने गायत्री को “सद्बुद्धि का मंत्र” कहा है और इसे मंत्रों का मुकुटमणि बताया है।

गायत्री जयंती पर क्या करें?

  1. अन्न का दान करें।

  2. भंडारा या अन्नक्षेत्र का आयोजन करें।

  3. लोगों को शीतल जल पिलाएँ।

  4. पक्षियों के लिए जल-पात्र रखें।

  5. गायत्री मंत्र जप एवं हवन करें।

  6. गुड़ और गेहूँ का दान करें।

  7. धार्मिक पुस्तकों का दान करें।

  8. पवित्र नदी में स्नान करें।

  9. फलाहार व्रत रखें।

  10. श्री आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें।

  11. सत्य भाषण का संकल्प लें।

  12. सूर्य देव की उपासना करें।

जय माँ गायत्री। 🙏🌺



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