विद्यापति का जीवन परिचय एवं उनकी साहित्यिक विशेषताएं



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विद्यापति : जीवन-परिचय

मैथिली साहित्य के अमर कवि तथा "कवि कोकिल" के नाम से विख्यात विद्यापति का पूरा नाम विद्यापति ठाकुर था। वे बिसइवार वंश के विष्णु ठाकुर की आठवीं पीढ़ी में उत्पन्न हुए थे। उनके पिता का नाम गणपति ठाकुर तथा माता का नाम गंगा देवी था। कुछ विद्वान, विशेषकर रामवृक्ष बेनीपुरी, उनकी माता का नाम हांसिनी देवी बताते हैं, किंतु विद्यापति के पदों की भनिता से स्पष्ट होता है कि हांसिनी देवी महाराज देवसिंह की पत्नी थीं, न कि विद्यापति की माता।

जनश्रुति के अनुसार, गणपति ठाकुर ने कपिलेश्वर महादेव की कठोर आराधना की थी, जिसके फलस्वरूप उन्हें विद्यापति जैसे प्रतिभाशाली पुत्र की प्राप्ति हुई। कपिलेश्वर महादेव का यह प्रसिद्ध मंदिर वर्तमान बिहार के मधुबनी जिले में स्थित है।

विद्यापति के जन्म-स्थान को लेकर लंबे समय तक विवाद बना रहा। कुछ विद्वानों ने उन्हें बंगाल का कवि सिद्ध करने का प्रयास किया। इसका मुख्य कारण उनकी राधा-कृष्ण विषयक पदावली की अत्यधिक लोकप्रियता थी, जो मिथिला से निकलकर बंगाल तक पहुँच गई थी। उन दिनों बंगाल के अनेक विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने हेतु मिथिला आते थे। इसी क्रम में विद्यापति के पद बंगाल पहुँचे और महान वैष्णव संत चैतन्य महाप्रभु उनके काव्य से अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने विद्यापति के पदों का कीर्तन के रूप में व्यापक प्रचार किया। फलस्वरूप बंगाल में भी विद्यापति की ख्याति अत्यधिक बढ़ गई।

बाद में कुछ लोगों ने इस आधार पर उन्हें बंगाली कवि सिद्ध करने का प्रयास किया, किंतु महा-महोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री, जस्टिस शारदाचरण मित्र, नगेन्द्रनाथ गुप्त तथा डॉ. जॉर्ज एब्राहम ग्रियर्सन जैसे विद्वानों ने प्रमाणों के आधार पर स्पष्ट किया कि विद्यापति मिथिला के निवासी थे और उनकी भाषा मैथिली थी।

विद्यापति का जन्म बिहार के वर्तमान मधुबनी जिले के बिस्फी ग्राम में हुआ था। यह गाँव बाद में मिथिला के राजा शिवसिंह द्वारा उन्हें दानस्वरूप प्रदान किया गया था। उनके जन्मकाल के संबंध में विद्वानों में मतभेद है, तथापि सामान्यतः उनका जन्म चौदहवीं शताब्दी के मध्य में माना जाता है।

विद्यापति बचपन से ही अत्यंत मेधावी, प्रतिभाशाली तथा साहित्य-प्रेमी थे। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा प्रसिद्ध विद्वान महामहोपाध्याय हरि मिश्र के निर्देशन में हुई। हरि मिश्र के भतीजे तथा सुप्रसिद्ध दार्शनिक पक्षधर मिश्र उनके सहपाठी थे। अल्पायु से ही वे अपने पिता के साथ राजदरबारों में जाने लगे थे, जिससे उन्हें तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों को निकट से देखने का अवसर मिला।

उनकी प्रारम्भिक रचना ‘कीर्तिलता’ मानी जाती है, जिसमें चौदहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मिथिला की सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों का सजीव चित्रण मिलता है। इस कृति में कवि का आत्मविश्वास, भाषा पर अधिकार तथा साहित्यिक प्रतिभा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

विद्यापति के पारिवारिक जीवन के संबंध में उनके पदों से जानकारी प्राप्त होती है। उनके एक पद— "भनइ विद्यापति सुनु मंदाकिनि"— से ज्ञात होता है कि उनकी पत्नी का नाम मंदाकिनी था। इसी प्रकार "दुल्लहि तोहर कतए छथि माए" पद से उनकी पुत्री दुल्लहि का उल्लेख मिलता है। उनके पुत्र का नाम हरपति तथा पुत्रवधू का नाम चंद्रकला था।

विद्यापति का जीवन साहित्य, भक्ति और लोकमंगल की भावना से परिपूर्ण था। उन्होंने संस्कृत, अवहट्ट और मैथिली तीनों भाषाओं में उत्कृष्ट साहित्य की रचना की। उनकी राधा-कृष्ण विषयक पदावली ने उन्हें अमर बना दिया। उनकी काव्यधारा में श्रृंगार और भक्ति का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।

सामान्यतः माना जाता है कि महाकवि विद्यापति का निधन लगभग 1448 ईस्वी के आसपास हुआ। उनके निधन से संबंधित अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि उनके दाह-संस्कार स्थल पर शिवलिंग प्रकट हुआ था, जहाँ आज भी एक मंदिर स्थित है और प्रतिवर्ष श्रद्धालुओं का आगमन होता है।

भारतीय साहित्य के इतिहास में विद्यापति का स्थान अत्यंत गौरवपूर्ण है। उन्होंने मैथिली भाषा को साहित्यिक गरिमा प्रदान की तथा अपनी काव्य-प्रतिभा से सम्पूर्ण भारतीय साहित्य को समृद्ध किया। इसी कारण उन्हें मैथिली साहित्य का शिरोमणि तथा "कवि कोकिल" कहा जाता है।


विद्यापति भारतीय साहित्यक भक्ति परंपरा क प्रमुख स्तंभ म सँ एकटा आओर मैथिली के सर्वोपरि कवि क रूप म जानल जैत अछि

विद्यापति का समय और रचना-संसार

महाकवि विद्यापति का युग न केवल मिथिला, बल्कि सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत संक्रमणशील और उथल-पुथल भरा काल था। उस समय देश निरंतर विदेशी आक्रमणों और राजनीतिक संघर्षों से जूझ रहा था। दिल्ली से लेकर बंगाल तक का विस्तृत भूभाग सत्ता-संघर्ष, विजय-पराजय और राजनीतिक अस्थिरता का साक्षी बन रहा था। इन परिस्थितियों का प्रतिकूल प्रभाव सामान्य जनजीवन पर भी पड़ता था। युद्धों और आक्रमणों के कारण जनता सदैव भय, असुरक्षा और अनिश्चितता के वातावरण में जीवन व्यतीत करती थी।

उस काल में विभिन्न राजवंशों, सामंतों और शासकों के बीच सत्ता एवं वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा चल रही थी। जाति-व्यवस्था अपेक्षाकृत अधिक कठोर होती जा रही थी, किन्तु सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर परिवर्तन के संकेत भी दिखाई देने लगे थे। हिंदू और मुस्लिम समाजों के बीच आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक संपर्क बढ़ रहे थे। परिणामस्वरूप परस्पर समझ, सहअस्तित्व और संवाद की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी। ऐसे समय में साहित्य, कला और संस्कृति ने समाज को जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

विद्यापति की रचनाओं ने इस ऐतिहासिक आवश्यकता की पूर्ति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। विशेष रूप से उनकी ‘पदावली’ ने प्रेम, भक्ति और मानवीय संवेदनाओं के माध्यम से समाज में सौहार्द और सांस्कृतिक एकता का संदेश दिया। उनकी भाषा की मधुरता, पदों की गेयता, भावों की सहजता और काव्य की सरसता ने विभिन्न भाषाओं, प्रदेशों, सम्प्रदायों तथा सामाजिक वर्गों के लोगों को समान रूप से आकर्षित किया। परिणामस्वरूप उनके पद मिथिला की सीमाओं से निकलकर बंगाल, उड़ीसा, असम और उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में लोकप्रिय हो गए।

विद्यापति के पदों का प्रभाव इतना व्यापक था कि महान वैष्णव संत चैतन्य महाप्रभु भी उनके पदों का गायन करते समय भाव-विभोर हो जाते थे। विद्यापति के श्रृंगारिक पदों में भी भक्ति और आध्यात्मिकता का ऐसा अद्भुत समन्वय मिलता है कि वे केवल लौकिक प्रेम की अभिव्यक्ति न रहकर दिव्य प्रेम का प्रतीक बन जाते हैं।

विद्यापति ने ओइनवार (ओइनेवार) वंश के अनेक राजाओं के दरबार में रहते हुए शासन-व्यवस्था, राजनीति और समाज को निकट से देखा था। वे दरबारी कवि अवश्य थे, किन्तु मात्र प्रशस्ति-गायक नहीं थे। उन्होंने अपने युग की सामाजिक समस्याओं, जनजीवन की पीड़ाओं तथा मानवीय भावनाओं को गहराई से समझा और उन्हें अपनी रचनाओं में अभिव्यक्ति प्रदान की।

विदेशी आक्रमणों और राजनीतिक अस्थिरता से उत्पन्न भय तथा निराशा के वातावरण में उन्होंने प्रेम, सौंदर्य और भक्ति को अपनी रचनात्मक साधना का केंद्र बनाया। उनका विश्वास था कि समाज को जोड़ने और मनुष्य के भीतर आशा तथा संवेदना को जीवित रखने का सबसे प्रभावी माध्यम प्रेम है। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में प्रेम और भक्ति का अत्यंत मार्मिक तथा कलात्मक चित्रण मिलता है।

विद्यापति संस्कृत, अवहट्ट तथा मैथिली भाषाओं के प्रकाण्ड विद्वान थे। उन्हें धर्मशास्त्र, दर्शन, न्यायशास्त्र, सौंदर्यशास्त्र, संगीतशास्त्र तथा लोकजीवन का व्यापक ज्ञान था। उनकी रचनाओं में जहाँ एक ओर श्रृंगार और भक्ति के सूक्ष्म भावों का चित्रण मिलता है, वहीं दूसरी ओर राजनीति, नीति, धर्म, समाज और लोकाचार से संबंधित महत्वपूर्ण विचार भी व्यक्त हुए हैं। उनके साहित्य में शास्त्रीय ज्ञान और लोकानुभव का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

विद्यापति की प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ

साहित्यिक कृतियाँ

  • कीर्तिलता

  • कीर्तिपताका

  • भूपरिक्रमा

  • पुरुष परीक्षा

  • लिखनावली

  • गोरक्ष विजय

  • मणिमंजरी नाटिका

  • पदावली

धर्मशास्त्रीय कृतियाँ

  • शैवसर्वस्वसार

  • शैवसर्वस्वसार-प्रमाणभूत संग्रह

  • गंगावाक्यावली

  • विभागसार

  • दानवाक्यावली

  • दुर्गाभक्तितरंगिणी

  • वर्षकृत्य

  • गयापत्तालक

इन सभी कृतियों में ‘पदावली’ को सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रभावशाली रचना माना जाता है। इस कृति ने विद्यापति को अमर ख्याति प्रदान की। उनकी पदावली में राधा-कृष्ण प्रेम, भक्ति, श्रृंगार, विरह तथा मानवीय संवेदनाओं का ऐसा कलात्मक और मधुर चित्रण मिलता है, जो आज भी पाठकों और श्रोताओं को समान रूप से आकर्षित करता है।

इस प्रकार विद्यापति केवल मैथिली साहित्य के ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारतीय साहित्य के ऐसे युगप्रवर्तक कवि हैं, जिन्होंने अपने युग की सांस्कृतिक चेतना को स्वर प्रदान किया और प्रेम, भक्ति तथा मानवता के शाश्वत मूल्यों को साहित्य के माध्यम से प्रतिष्ठित किया।

मैथिल कोकिल कवि - विद्यापति

विद्यापति के काव्य में श्रृंगार

विद्यापति की 'पदावली' के पद दो तरह के हैं—श्रृंगारिक पद और भक्ति-पद। इसके अलावा कुछ ऐसे पद भी हैं, जिनमें प्रकृति, समाज, नीति, संगीत आदि जीवन-मूल्यों को रेखांकित किया गया है। श्रृंगारिक पदों में वयःसंधि, नायिका-भेद, नख-शिख वर्णन, मिलन-अभिसार, मान-मनुहार, संयोग-वियोग, विरह-प्रवास आदि का विलक्षण चित्र उकेरा गया है। ऐसे पदों की संख्या साढ़े सात सौ से अधिक है। उल्लेखनीय है कि अपने प्रिय सखा राजा शिवसिंह के तिरोधान (1406 ई.) के बाद से विद्यापति ने कोई श्रृंगारिक पद नहीं रचा; बाद के समय की उनकी सारी ही रचनाएँ भक्ति-प्रधान पद हैं, या फिर नीति, शास्त्र, धर्म और आचार से संबंधित विचार। भक्ति-प्रधान पदों की संख्या लगभग अस्सी है, जिसमें शिव-पार्वती लीला, नचारी, राम-वंदना, कृष्ण-वंदना, दुर्गा, काली, भैरवी, भवानी, जानकी तथा गंगा-वंदना आदि शामिल हैं। शेष पदों में ऋतु-वर्णन, बेमेल विवाह, सामाजिक जीवन-प्रसंग, रीति-नीति, संभाषण और शिक्षा आदि रेखांकित हैं।

उनके श्रृंगारिक पदों के प्रेम और सौंदर्य-विवेचन का आधार राधा-कृष्ण विषयक पद हैं। गौरतलब है कि पूरे भारतीय वाङ्मय में राधा-कृष्ण की उपस्थिति पौराणिक गरिमा और विष्णु के अवतार कृष्ण की अलौकिक शक्ति एवं लीला के साथ है। परंतु विद्यापति के राधा-कृष्ण अलौकिक नहीं हैं, वे पूरी तरह लौकिक हैं। उनके प्रेम-व्यापार के सारे प्रसंग सामान्य नागरिक की तरह हैं। पूरी 'पदावली' में प्रेम और सौंदर्य-वर्णन के किसी बिंदु पर वे आत्मलीन नहीं दिखाई देते। हर पद में रसज्ञ और रसभोक्ता के रूप में किसी न किसी राजा या सुलतान की दुहाई देते हैं अथवा नायक-नायिका को प्रबोधन और उपदेश देते हैं।

पूरी 'पदावली' में प्रेम-व्यापार के हर उपक्रम—विभाव, अनुभाव, दर्शन, श्रवण, अनुरक्ति, संभाषण, स्मरण, अभिसार, विरह, सुरति-वेदना, मिलन, उल्लास, सुरति-चर्चा, बाधा, आशा-निराशा—या फिर सौंदर्य-वर्णन के हर स्वरूप—नायिका-भेद, वयःसंधि, सद्यःस्नाता, कामदग्धा, नवयौवना, प्रगल्भा, आरूढ़ा, स्वकीया, परकीया आदि—को रेखांकित करते हुए विद्यापति सतत तटस्थ ही दिखते हैं। पूरी 'पदावली' में विद्यापति भगवद्गीता-उपदेशक कृष्ण की तरह लिप्त होकर भी निर्लिप्त प्रतीत होते हैं।

हर समय वे अपने नायक-नायिका के मनोभावों को रेखांकित कर एक संदेश देते हुए दिखाई देते हैं। जीवन में सौंदर्य और प्रेम के शिखरस्थ स्वरूप को रेखांकित करते हुए वे सभी पदों में जीवन-मूल्य का संदेश देते प्रतीत होते हैं। नागरिक मन से हताशा मिटाने और राजाओं-सुलतानों के हृदय में मानवीय कोमलता भरने का इससे बेहतर उपाय संभवतः उस दौर में और कुछ नहीं हो सकता था। इसलिए विद्यापति रचित 'पदावली' के अनुशीलन की पद्धति उसमें चित्रित प्रेम-प्रसंगों और सौंदर्य-निरूपण में कामुकता से पराङ्मुख होकर जीवन-मूल्यों की तलाश करनी चाहिए।

आम नागरिक की तरह उनकी नायिका विरह में व्यथित-व्याकुल होती है और नायक का स्मरण करती है। उन्हें पाने का उद्यम करती है। किसी प्रकार की अलौकिकता उनके प्रेम को छूती तक नहीं। उसे चंदन-लेप भी विष-बाण की तरह दाहक लगता है, गहने बोझ प्रतीत होते हैं, सपने में भी कृष्ण दर्शन नहीं देते और उसे अपने जीने की कोई स्थिति शेष नहीं दिखाई देती। अंत में कवि नायिका को गुणवती बताकर मिलन की सांत्वना के साथ प्रबोधन देते हैं।

मिलन की स्थिति में प्रेमातुर नायिका सभी प्रकार के सुख का अनुभव करती है। भावोल्लास से भरी नायिका अपने प्रियतम की उपस्थिति का सुख विभिन्न इंद्रियों के माध्यम से प्राप्त करती है—वह उसका रूप निहारती है, उसकी वाणी सुनती है, वसंत की मादक गंध का अनुभव करती है, यत्नपूर्वक क्रीड़ा-सुख में लीन होती है तथा रसिकजनों के रसभोग का अनुमान करती है।

जाहिर है कि योजनाबद्ध ढंग से अपनी रचनाशीलता में आगे बढ़ रहे कवि को अपने उद्देश्य की प्राप्ति हेतु विलक्षण रूप से संपन्न भाषा के साथ-साथ अभिव्यक्ति के सभी अवयवों पर पूर्ण अधिकार था।

विद्यापति के काव्य में भक्ति

भक्ति और श्रृंगार—भले ही दो भाव हों, पर दोनों का मर्म एक ही है। दोनों का मूल अनुराग और समर्पण है। दोनों ही भाव व्यक्ति के मन में प्रेम से प्रारम्भ होते हैं। वैसे तो आज भी कुछ लोग मिल जाएँगे जो भक्ति और प्रेम को दो भिन्न दिशाओं का व्यापार मानते हैं। वे सोचते हैं कि जब तक मनुष्य को ज्ञान नहीं होता, युवावस्था के उन्माद में वह स्त्री के रूप-जाल में मोहवश फँसा रहता है और भोग में लिप्त रहता है; जब उसकी आँखें खुलती हैं, ज्ञान-चक्षु जागृत होते हैं, तब वह भक्ति-भाव से ईश्वर की ओर मुड़ता है। परंतु ऐसा सोचना सर्वथा उचित नहीं है।

वास्तविक अर्थों में दोनों ही उपक्रमों का प्रस्थान-बिंदु एक ही है, उनका व्यापार-क्रम भी एक ही है। दोनों का क्रिया-व्यापार प्रेम के कारण ही होता है और दोनों में समर्पण तथा स्वीकार का भाव विद्यमान रहता है। प्रेम में प्रेमिका, प्रेमी के प्रति समर्पित होती है अथवा प्रेमी, प्रेमिका के प्रति; ठीक इसी प्रकार भक्ति में भक्त भगवान के प्रति समर्पित होता है। मीराबाई की काव्य-साधना का उदाहरण हमारे सामने है। उन्हें कृष्ण की प्रिया मानें अथवा कृष्ण की भक्त, संशय दोनों ही स्थितियों में बना रहेगा।

विद्यापति की 'पदावली' में भक्ति और श्रृंगार के बीच की विभाजक रेखा को समझना थोड़ा कठिन है। माधव की प्रार्थना— "तोहि जनमि पुनु तोहि समाओत, सागर लहरि समाना"— में भक्ति और श्रृंगार के इस सघन भाव को समझा जा सकता है। मूल में विलीन हो जाने का यह एकात्म भाव, आत्मा और परमात्मा की यह एकता, उनके यहाँ श्रृंगारिक पदों में बड़ी सहजता से मिलती है। अपने प्रेम-इष्ट के प्रति उपासिका का समर्पण भी इसी प्रकार का भक्तिपूर्ण समर्पण है।

भक्तिकालीन कवियों की भाँति विद्यापति के यहाँ न तो स्पष्ट एकेश्वरवाद दिखाई देता है और न ही अन्य श्रृंगारिक कवियों की तरह लोलुप भोगवाद। एक डूबे हुए काव्य-रसिक के इस समर्पण में ऐसी जीवनानुभूति है कि कहीं भक्ति श्रृंगार पर और अधिकांश स्थानों पर श्रृंगार भक्ति पर हावी दिखाई देता है। उनके यहाँ भक्ति और श्रृंगार की धाराएँ अनेक दिशाओं में प्रवाहित होकर उनके जीवनानुभव को विस्तृत करती हैं और कवि के विराट अनुभव-संसार को उद्घाटित करती हैं।

भक्ति और श्रृंगार के जो मानदंड आज के विद्वानों की दृष्टि में प्रचलित हैं, उनके आधार पर यदि महाकवि विद्यापति के काव्य-संसार का वर्गीकरण किया जाए, तो राधा-कृष्ण विषयक अधिकांश गीत श्रृंगारिक हैं। वहीं उनके प्रमुख भक्ति-गीतों में शिव-स्तुति, गंगा-स्तुति, काली-वंदना, कृष्ण-प्रार्थना आदि का विशेष स्थान है।

वस्तुतः भक्ति और श्रृंगार के विषय में हमने कुछ धारणाओं को रूढ़ रूप में स्वीकार कर लिया है। विद्यापति के नख-शिख वर्णनों के कारण कुछ लोगों को उनकी भक्ति-भावना पर संदेह होने लगता है। किंतु विद्यापति के काव्य को समझने के लिए तत्कालीन काव्य-परंपरा और उसकी मर्यादाओं को समझना आवश्यक है।

विद्यापति के यहाँ अनेक भक्तिपरक पदों में श्रृंगार और भक्ति का अंतर्द्वंद्व भी परिलक्षित होता है। श्रृंगारिक गीतों में सौंदर्य, समर्पण, रमण, विलास, विरह और मिलन के विविध पक्षों में तल्लीन रहने वाले विद्यापति, "कि यौवन पिय दूरे" जैसे पदों के रचयिता होकर भी भक्तिपरक गीतों में अत्यंत विनीत हो जाते हैं। वे पूर्व में किए गए रमण-विलास को निरर्थक बताते हुए "तोहे भजब कोन बेला" कहकर पश्चाताप व्यक्त करते हैं तथा "तातल सैकत वारि बिंदु सम सुत्त-मित-रमणि समाजे" कहकर सांसारिक आकर्षणों की क्षणभंगुरता का बोध कराते हैं।

श्रृंगारिक गीतों की नायिका के मनोवेगों को स्वर देने वाले विद्यापति उसी "रमणि" को तप्त बालू पर जल-बिंदु के समान क्षणिक बताकर भगवान की शरण ग्रहण करते हैं। "अमृत त्यजि किए हलाहल पीउल" कहकर महाकवि स्वयं श्रृंगार और भक्ति के समस्त द्वैत को समाप्त कर देते हैं। यहाँ कवि की शालीनता और आध्यात्मिक परिपक्वता स्पष्ट दिखाई देती है।

दो भिन्न कालखंडों और दो भिन्न मनःस्थितियों में एक ही रचनाकार के इस भिन्न रचना-धर्म को कवि का पश्चाताप नहीं, बल्कि उसकी पूर्ण तल्लीनता माना जाना चाहिए। वह जहाँ भी है, जिस भाव में है, सम्पूर्णता के साथ उपस्थित है।

विद्यापति के काव्य में लोक-जीवन

विद्यापति का रचना-फलक अत्यंत बहुआयामी था। जीवन-व्यवहार के प्रत्येक पक्ष पर उनकी दृष्टि सजग और संवेदनशील थी। दरबार-संपोषित होने के बावजूद उनका कोई भी रचनात्मक उपक्रम चारण-धर्म तक सीमित नहीं रहा। प्रत्येक रचना में उन्होंने समकालीन चिंतक, सामाजिक अभिकर्ता और राजकीय सलाहकार की प्रखर नैतिकता का निर्वाह किया।

लोक-जीवन की व्यावहारिकता, लालित्यपूर्ण अर्थ-विस्तार तथा अद्भुत सांगीतिकता से युक्त उनके पद सामान्य जनजीवन में अत्यंत लोकप्रिय हुए। उनकी 'पदावली' में व्यक्ति के सामाजिक जीवन के अनेक प्रसंग—जन्म, नामकरण, मुंडन, उपनयन, विवाह, पूजा-पाठ, लोकोत्सव आदि—का सजीव चित्रण मिलता है।

आज भी मैथिल जनजीवन का कोई प्रमुख उत्सव विद्यापति के गीतों के बिना सम्पन्न नहीं होता। यद्यपि उनके पदों के रचनाकाल की सुनिश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है, तथापि यह कहा जा सकता है कि वे एक दीर्घ कालावधि में रचे गए हैं।

मिथिला सहित समूचे पूर्वांचल—बंगाल, असम और उड़ीसा—में वैष्णव साहित्य के विकास में विद्यापति की 'पदावली' का अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। भाव-माधुर्य और भाषा-सौंदर्य के कारण उनके पद व्यापक रूप से लोकप्रिय हुए। वैष्णव भक्तों के प्रयास से इन गीतों का प्रचार-प्रसार मथुरा और वृंदावन तक हुआ।

प्राप्त जानकारी के अनुसार उनके पदों की संख्या लगभग नौ सौ मानी जाती है। राजा शिवसिंह के तिरोधान के बाद उन्होंने नेपाल की तराई के सांस्कृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्र राजबनौली में कई वर्षों तक निवास किया और वहीं रहकर अपने रचनाकर्म को आगे बढ़ाया।

विद्यापति की भाषा और काव्य-सौंदर्य

'पदावली' की भाषा मैथिली है, जबकि उनकी अन्य रचनाओं की भाषा संस्कृत एवं अवहट्ठ है। पदों का संकलन तीन भिन्न-भिन्न भाषिक समाजों—मिथिला, बंगाल और नेपाल—के लिखित एवं मौखिक स्रोतों से हुआ है। भाषिक संरचना के गुणसूत्रों से परिचित सभी लोग इस बात से सहमत होंगे कि रचनाकार से मुक्त हुई गेयधर्मी रचना लोक-कंठ में वास करती हुई अनचाहे में भी कुछ-न-कुछ अपने मूल स्वरूप से भिन्न हो जाती है और फिर संकलन तक आते-आते उसमें स्थानीयता के अनेक अपरिहार्य रंग चढ़ जाते हैं। लोक-कंठ से संकलित सामग्री का तो यह अनिवार्य विधान है। विद्यापति की 'पदावली' भी इसका अपवाद नहीं है।

चौदहवीं से बीसवीं शताब्दी तक के लगभग छह सौ वर्षों की यात्रा में इन पदों में कब, कहाँ और किसके प्रयास से क्या जुड़ा और क्या छूटा, यह निश्चित रूप से जान पाना कठिन है। इसके अतिरिक्त एक तथ्य यह भी है कि इन पदों के प्रारंभिक संकलनकर्ताओं की मातृभाषा मैथिली नहीं थी। इसलिए ध्वनियों, शब्दों, पदों और संदर्भ-संकेतों को लिखित रूप में व्यक्त करते समय निश्चय ही कुछ परिवर्तन आ गए होंगे।

फिर भी यह तथ्य उल्लेखनीय है कि विद्यापति के जीवनकाल में ही 'पदावली' की अनेक पंक्तियाँ मुहावरों और कहावतों की तरह लोकजीवन में प्रचलित हो गई थीं। जीवनोपयोगी विषयों तथा सांगीतिकता के अतिरिक्त 'पदावली' की लोकप्रियता में उसकी लोक-रंजक भाषा की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उनके एक-एक पद अनेक रागों में गाए जाते हैं।

विद्यापति के सभी पद मात्रिक समछंदों में रचित हैं। अधिकांश पदों की रचना एक ही छंद में हुई है, किंतु अनेक पदों में मिश्रित छंदों का भी प्रयोग मिलता है। अर्थात् दो, तीन अथवा अधिक छंदों के चरणों का समन्वय किया गया है।

उन्होंने अहीर, लीला, महानुभाव, चंडिका, हाकलि, चौपई, चौपाई, चौबोला, पद्धरि, सुखदा, उल्लास, रूपमाला, नाग, सरसी, सार, मरहठा, माधवी, झूलना आदि छंदों का स्वतंत्र रूप से प्रयोग किया है। इसके अतिरिक्त अखंड, निधि, शशिवदना, मनोरम, कज्जल, रजनी, गीता, गीतिका, विष्णुपद, हरिगीतिका, ताटंक, वीर छंद तथा समान सवैया जैसे छंदों के चरणों को अन्य छंदों के साथ जोड़कर भी प्रयोग किया गया है।

उल्लेख मिलता है कि उल्लास, नाग, रंजनी तथा गीता छंद के प्रवर्तक स्वयं विद्यापति थे, क्योंकि उनसे पूर्व किसी रचनाकार के यहाँ इन चारों छंदों का प्रयोग उपलब्ध नहीं होता। यह तथ्य उनकी छंद-साधना और काव्य-कौशल का प्रमाण है।

इस प्रकार विद्यापति की भाषा में लोकजीवन की सहजता, माधुर्य और संगीतात्मकता का अद्भुत समन्वय मिलता है। उनकी काव्य-भाषा भावों के अनुरूप, सरस, प्रवाहपूर्ण और अत्यंत प्रभावशाली है। यही कारण है कि उनकी 'पदावली' केवल साहित्यिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि भाषिक और सांगीतिक दृष्टि से भी भारतीय काव्य-परंपरा की अमूल्य धरोहर मानी जाती है।



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आयु वृद्धि के साथ रोग से छुटकारा प्राप्त करने का मंत्र




आयु वृद्धि एवं रोग शांति के लिए महामृत्युंजय मंत्र

महामृत्युंजय मंत्र

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

महामृत्युंजय मंत्र को भगवान शिव का अत्यंत प्रभावशाली और कल्याणकारी मंत्र माना गया है। सनातन परंपरा में इसका जप स्वास्थ्य, मानसिक शांति, रोग निवारण, आयु वृद्धि तथा संकटों से रक्षा के लिए किया जाता है।

हवन विधि

मंत्र-जप की पूर्णता के पश्चात हवन करना शुभ माना गया है। सामान्य हवन सामग्री में निम्न वस्तुएँ सम्मिलित की जा सकती हैं—

  • बिल्व फल

  • तिल

  • चावल

  • चन्दन

  • पंचमेवा

  • जायफल

  • गुग्गुल

  • गुड़

  • सरसों

  • धूप

  • घी

इन सभी सामग्री को मिलाकर महामृत्युंजय मंत्र के साथ आहुति दें।

विभिन्न उद्देश्यों के लिए विशेष हवन सामग्री

रोग शांति हेतु

  • दूर्वा

  • गुडूची (गिलोय) का लगभग चार इंच का टुकड़ा

  • घी

श्री एवं समृद्धि प्राप्ति हेतु

  • बिल्व फल

  • कमल बीज

  • खीर

ज्वर शांति हेतु

  • अपामार्ग

मृत्यु-भय निवारण हेतु

  • जायफल एवं दही

शत्रु बाधा निवारण हेतु

  • पीली सरसों

पूर्णाहुति

हवन के अंत में सूखे नारियल में घी भरकर तथा खीर के साथ पूर्णाहुति प्रदान करें।

तर्पण एवं मार्जन

हवन के पश्चात तर्पण और मार्जन किया जाता है।

  • कांसे या पीतल के पात्र में जल और गौ-दूध मिलाएँ।

  • अंजलि द्वारा तर्पण करें।

  • तर्पण के समय मूल मंत्र के अंत में "तर्पयामि" जोड़ें।

  • मार्जन के समय मूल मंत्र के अंत में "मार्जयामि" जोड़ें।

दशांश नियम

शास्त्रीय विधान के अनुसार—

  • जप का दशांश हवन।

  • हवन का दशांश तर्पण।

  • तर्पण का दशांश मार्जन।

  • मार्जन का दशांश शिवभक्तों एवं ब्राह्मणों को भोजन।

ब्राह्मण एवं शिवभक्त भोजन

सामर्थ्य के अनुसार 1, 3, 5, 9 या 11 ब्राह्मणों अथवा शिवभक्तों को भोजन कराकर उनका आशीर्वाद ग्रहण करना शुभ माना गया है।

विशेष टिप्पणी

महामृत्युंजय मंत्र के जप से पूर्व या नित्य रूप से महामृत्युंजय कवच का पाठ भी किया जा सकता है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा, नियम और विश्वासपूर्वक किए गए मंत्र-जप एवं उपासना से मानसिक शांति, आध्यात्मिक बल तथा स्वास्थ्य लाभ की प्राप्ति होती है।

नोट: रोग की स्थिति में मंत्र-जप एवं धार्मिक अनुष्ठान आध्यात्मिक सहारा प्रदान कर सकते हैं, किन्तु इन्हें चिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। उचित चिकित्सा और चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।



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यौन पहचान - Sexual Identity



पुरुष, महिला, दोनों अथवा दोनों के मिश्रित रूप के रूप में स्वयं के बारे में व्यक्ति की आंतरिक समझ को लिंग पहचान (Gender Identity) कहा जाता है। यह इस बात को व्यक्त करती है कि व्यक्ति स्वयं को किस रूप में समझता है और स्वयं को किस नाम या पहचान से संबोधित करता है। किसी व्यक्ति की लिंग पहचान जन्म के समय निर्धारित किए गए उसके लिंग के समान भी हो सकती है और उससे भिन्न भी।

मनुष्य स्वाभाविक रूप से लिंग पहचान, लिंग अभिव्यक्ति, यौनिकता तथा रोमांटिक आकर्षण की अत्यंत विविध अवस्थाओं में पाए जाते हैं। फिर भी संयुक्त राज्य अमेरिका सहित विश्व के अनेक देशों में लोगों को उनकी यौन अभिविन्यास (Sexual Orientation) और लिंग पहचान के आधार पर भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार तथा कभी-कभी हिंसा का भी सामना करना पड़ता है।

अपनी यौन पहचान को समझने और स्वीकार करने की प्रक्रिया से गुजर रहे युवाओं के लिए अपने माता-पिता या परिवार के सामने अपनी पहचान व्यक्त करना अक्सर सबसे बड़ी चुनौती होती है। दूसरी ओर, जिन लोगों की वे परवाह करते हैं, उनसे स्वीकृति और समर्थन प्राप्त होना उनके लिए राहत, आत्मविश्वास और मानसिक शक्ति का महत्वपूर्ण स्रोत बन सकता है।

यौन अभिविन्यास (Sexual Orientation) से तात्पर्य उस भावनात्मक, रोमांटिक या यौन आकर्षण से है, जो किसी व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों के प्रति अनुभव होता है तथा जिनके साथ वह संबंध स्थापित करना चाहता है। यौन अभिविन्यास के प्रमुख रूपों में विषमलैंगिक (Heterosexual), समलैंगिक (Gay), लेस्बियन (Lesbian), उभयलिंगी (Bisexual) तथा अलैंगिक (Asexual) शामिल हैं।

Sexual Identity

विभिन्न यौन अभिविन्यास एवं पहचानें

समलैंगिकता (Homosexuality)

समलैंगिकता (Homosexuality) समान लिंग के व्यक्तियों के प्रति भावनात्मक, रोमांटिक अथवा यौन आकर्षण के पैटर्न को दर्शाती है। Lesbian शब्द का प्रयोग सामान्यतः उन महिलाओं के लिए किया जाता है जो अन्य महिलाओं के प्रति आकर्षित होती हैं, जबकि Gay शब्द का प्रयोग सामान्यतः उन पुरुषों के लिए किया जाता है जो अन्य पुरुषों के प्रति आकर्षित होते हैं। यद्यपि कई संदर्भों में Gay शब्द का उपयोग समलैंगिक महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए भी किया जाता है।

उभयलैंगिकता (Bisexuality)

उभयलैंगिकता (Bisexuality) एक से अधिक लिंगों अथवा पुरुषों और महिलाओं दोनों के प्रति भावनात्मक, रोमांटिक या यौन आकर्षण को व्यक्त करती है। उभयलैंगिक पहचान का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति दोनों लिंगों के प्रति समान रूप से आकर्षित हो। सामान्यतः ऐसे व्यक्ति, जिनकी किसी एक लिंग के प्रति विशेष लेकिन अनन्य (Exclusive) प्राथमिकता नहीं होती, स्वयं को उभयलैंगिक के रूप में पहचान सकते हैं।

अलैंगिकता (Asexuality)

अलैंगिकता (Asexuality) से तात्पर्य दूसरों के प्रति यौन आकर्षण की अनुपस्थिति अथवा यौन गतिविधियों में बहुत कम या बिल्कुल रुचि न होने से है। यह एक व्यापक स्पेक्ट्रम है, जिसके अंतर्गत अनेक उप-पहचानें आती हैं। अलैंगिकता को यौन संयम (Abstinence) या ब्रह्मचर्य (Celibacy) से अलग माना जाता है, क्योंकि यह व्यक्ति की यौन अभिविन्यास से संबंधित पहचान है, न कि कोई स्वैच्छिक जीवन-शैली।

अरोमांटिकता (Aromanticism)

अरोमांटिकता (Aromanticism) उस स्थिति को दर्शाती है जिसमें व्यक्ति दूसरों के प्रति बहुत कम या कोई रोमांटिक आकर्षण अनुभव नहीं करता। ऐसे व्यक्तियों में रोमांटिक संबंध बनाने की इच्छा या प्रवृत्ति अत्यंत सीमित अथवा अनुपस्थित हो सकती है।

पैनसेक्सुअलिटी (Pansexuality)

पैनसेक्सुअलिटी (Pansexuality) किसी व्यक्ति के प्रति उसकी लिंग पहचान या जैविक लिंग की परवाह किए बिना आकर्षण को दर्शाती है। पैनसेक्सुअल व्यक्ति स्वयं को कभी-कभी "लिंग-अंधा" (Gender-blind) भी कहते हैं, अर्थात् उनके लिए किसी व्यक्ति का लिंग या सेक्स रोमांटिक अथवा यौन आकर्षण का निर्णायक कारक नहीं होता। कुछ विद्वान पैनसेक्सुअलिटी को उभयलैंगिकता का विस्तृत रूप भी मानते हैं।

बहुलैंगिकता (Polysexuality)

बहुलैंगिकता (Polysexuality) का अर्थ कई, किंतु सभी नहीं, लिंगों के प्रति आकर्षण होना है। इस पहचान का उपयोग कुछ लोग उभयलैंगिकता (Bisexuality) के विकल्प के रूप में करते हैं, क्योंकि उनके अनुसार "उभयलैंगिक" शब्द दो लिंगों की अवधारणा तक सीमित माना जा सकता है। बहुलैंगिक व्यक्ति अनेक लिंगों के प्रति आकर्षित हो सकते हैं, परंतु आवश्यक नहीं कि वे सभी लिंगों के प्रति आकर्षण अनुभव करें।

सैपियोसेक्सुअलिटी (Sapiosexuality)

सैपियोसेक्सुअलिटी (Sapiosexuality) किसी व्यक्ति की बुद्धिमत्ता (Intelligence) के प्रति आकर्षण को दर्शाती है। इस शब्द का उपसर्ग Sapio- लैटिन भाषा से लिया गया है, जिसका संबंध ज्ञान और बुद्धि से है। सैपियोसेक्सुअल व्यक्ति समलैंगिक, विषमलैंगिक अथवा उभयलैंगिक भी हो सकते हैं। सामान्यतः इसे स्वतंत्र यौन अभिविन्यास के बजाय आकर्षण की एक विशेष प्रवृत्ति माना जाता है।

यह शब्द 2014 में व्यापक चर्चा में आया, जब डेटिंग वेबसाइट OkCupid ने इसे अपने उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्ध पहचान विकल्पों में शामिल किया। इसके बाद इस अवधारणा पर व्यापक बहस हुई। कुछ आलोचकों ने इसे अभिजात्यवादी (Elitist), भेदभावपूर्ण या दिखावटी भी बताया।

संबंध अराजकता (Relationship Anarchy)

संबंध अराजकता (Relationship Anarchy) एक संबंध-दर्शन (Relationship Philosophy) है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता और स्वैच्छिक संबंधों पर बल देता है। यह पारंपरिक संबंध संरचनाओं तथा पूर्वनिर्धारित सामाजिक अपेक्षाओं को चुनौती देता है। इसके अंतर्गत मित्रता और प्रेम-संबंधों के बीच कठोर पदानुक्रम को स्वीकार नहीं किया जाता तथा प्रत्येक संबंध को उसके प्रतिभागियों द्वारा निर्धारित मानदंडों के आधार पर विकसित होने दिया जाता है।

विषमलैंगिकता (Heterosexuality)

विषमलैंगिकता (Heterosexuality) विपरीत लिंग के व्यक्तियों के प्रति भावनात्मक, रोमांटिक अथवा यौन आकर्षण को दर्शाती है। सामान्यतः Straight शब्द का प्रयोग विषमलैंगिक व्यक्तियों के लिए किया जाता है। विश्वभर में विषमलैंगिकता सबसे व्यापक रूप से पाई जाने वाली यौन अभिविन्यास श्रेणी मानी जाती है।



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भीष्म द्वादशी महत्व, पूजन विधि एवं मंत्र




भीष्म द्वादशी

भीष्म द्वादशी माघ मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को आती है। मान्यता है कि इस दिन व्रत करने से उत्तम संतान की प्राप्ति होती है और यदि संतान है तो उसकी प्रगति होती है। इसके साथ ही सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होकर सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। भीष्म द्वादशी को गोविंद द्वादशी भी कहते हैं।

धर्म एवं ज्योतिष के अनुसार माघ मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को भीष्म द्वादशी का व्रत किया जाता है। इस दिन विशेष रूप से भगवान विष्णु का तिल से पूजन किया जाता है तथा पवित्र नदियों में स्नान और दान करने का विधान है। इससे मनुष्य को शुभ फलों की प्राप्ति होती है।

हमारे धार्मिक ग्रंथ पद्मपुराण में माघ मास के माहात्म्य का वर्णन किया गया है, जिसमें कहा गया है कि पूजा करने से भी भगवान श्रीहरि को उतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी माघ मास में स्नान करने मात्र से होती है। अतः सभी पापों से मुक्ति और भगवान वासुदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को माघ-स्नान अवश्य करना चाहिए।

महाभारत में उल्लेख है कि जो मनुष्य माघ मास में तपस्वियों को तिल का दान करता है, वह कभी नरक का दर्शन नहीं करता। माघ मास की द्वादशी तिथि को दिन-रात उपवास करके भगवान माधव की पूजा करने से मनुष्य को राजसूय यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। इस प्रकार माघ मास के स्नान और दान की अपूर्व महिमा बताई गई है।

यह भी मान्यता है कि भीष्म द्वादशी का व्रत करने से सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। शास्त्रों में माघ मास की प्रत्येक तिथि को पर्व माना गया है। यदि असमर्थता के कारण पूरे मास का नियम न निभाया जा सके, तो तीन दिन अथवा एक दिन का माघ-स्नान व्रत भी किया जा सकता है। इस माह की भीष्म द्वादशी का व्रत यदि पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और पवित्रता के साथ किया जाए, तो यह मनुष्य के सभी कार्य सिद्ध करके उसे पापों से मुक्ति प्रदान करता है। अतः इस दिन के पूजन-अर्चन का विशेष महत्व है।

भीष्म द्वादशी की पौराणिक कथा

भीष्म द्वादशी के संबंध में प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार राजा शांतनु की रानी गंगा ने देवव्रत नामक पुत्र को जन्म दिया। पुत्र के जन्म के पश्चात गंगा, पूर्व प्रतिज्ञा के अनुसार, राजा शांतनु को छोड़कर चली गईं। गंगा के वियोग में राजा शांतनु अत्यंत दुखी रहने लगे।

कुछ समय बाद राजा शांतनु गंगा नदी पार करने के लिए मत्स्यगंधा नामक कन्या की नाव में बैठे और उसके रूप-सौंदर्य पर मोहित हो गए। उन्होंने उसके पिता के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। परंतु मत्स्यगंधा के पिता ने शर्त रखी कि उनकी पुत्री से उत्पन्न संतान ही हस्तिनापुर की उत्तराधिकारी बनेगी। यही मत्स्यगंधा आगे चलकर सत्यवती के नाम से प्रसिद्ध हुई।

राजा शांतनु इस शर्त को स्वीकार नहीं कर सके, किंतु वे चिंता में रहने लगे। जब देवव्रत को पिता की चिंता का कारण ज्ञात हुआ, तब उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा कर ली। पुत्र की इस महान प्रतिज्ञा से प्रसन्न होकर राजा शांतनु ने उन्हें इच्छा-मृत्यु का वरदान दिया। इसी भीषण प्रतिज्ञा के कारण देवव्रत आगे चलकर भीष्म पितामह के नाम से विख्यात हुए।

महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह कौरवों की ओर से युद्ध कर रहे थे। उनके अद्वितीय युद्ध-कौशल के कारण कौरवों का पलड़ा भारी पड़ने लगा। तब भगवान श्रीकृष्ण ने शिखंडी को उनके सामने खड़ा कर दिया। अपनी प्रतिज्ञा के कारण भीष्म ने शिखंडी पर शस्त्र नहीं उठाया और अपने अस्त्र-शस्त्र त्याग दिए। अवसर पाकर अन्य योद्धाओं ने उन पर बाणों की वर्षा कर दी, जिससे वे शर-शय्या पर लेट गए।

कहा जाता है कि सूर्य के दक्षिणायन होने के कारण भीष्म पितामह ने तत्काल प्राण नहीं त्यागे। उन्होंने सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की और तत्पश्चात अपने प्राण त्यागे। उनके सम्मान में माघ मास की द्वादशी तिथि को विशेष पूजन का विधान किया गया, इसलिए यह तिथि भीष्म द्वादशी कहलाती है।

मान्यता है कि भगवान विष्णु ने स्वयं यह व्रत भीष्म पितामह को बताया था और उन्होंने इसका पालन किया था। इसी कारण इसका नाम भीष्म द्वादशी पड़ा। यह व्रत एकादशी के अगले दिन द्वादशी को किया जाता है। यह व्रत रोगों का नाश करने वाला तथा समस्त पापों को हरने वाला माना गया है।

भीष्म द्वादशी व्रत का महत्व

माघ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को भीष्म द्वादशी अथवा गोविंद द्वादशी कहा जाता है। इस व्रत को करने से संतान-सुख, धन-धान्य, सौभाग्य तथा समृद्धि की प्राप्ति होती है।

पद्मपुराण में वर्णित है कि माघ मास में स्नान करने से भगवान श्रीहरि विशेष रूप से प्रसन्न होते हैं। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को माघ-स्नान अवश्य करना चाहिए।

इस दिन प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लें। भगवान विष्णु का केले के पत्ते, पंचामृत, सुपारी, पान, तिल, मौली, रोली, कुमकुम तथा फलों से पूजन करें। दूध, शहद, केला, गंगाजल, तुलसी-पत्र और मेवा मिलाकर पंचामृत तैयार करें तथा भगवान को भोग लगाएँ। इसके पश्चात भीष्म द्वादशी की कथा सुनें अथवा पढ़ें।

भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी का पूजन एवं स्तुति करें। पूजन के बाद चरणामृत और प्रसाद का वितरण करें। ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा और तिल का दान अवश्य दें। ब्राह्मण-भोजन के पश्चात ही स्वयं भोजन करें। इस दिन "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः" मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है।

पूजा-विधि

  1. भीष्म द्वादशी के दिन प्रातः स्नान आदि करके व्रत का संकल्प लें।

  2. भगवान विष्णु का केले के पत्ते, फल, पंचामृत, सुपारी, पान, तिल, मौली, रोली, कुमकुम एवं दूर्वा से पूजन करें।

  3. दूध, शहद, केला, गंगाजल, तुलसी-पत्र तथा मेवा मिलाकर पंचामृत तैयार करें और भगवान को अर्पित करें।

  4. भीष्म द्वादशी की कथा सुनें अथवा पढ़ें।

  5. माता लक्ष्मी सहित अन्य देवताओं की स्तुति करें।

  6. पूजा के पश्चात चरणामृत एवं प्रसाद का वितरण करें।

  7. ब्राह्मणों को भोजन कराएँ तथा दक्षिणा दें।

  8. ब्राह्मण-भोजन के पश्चात ही स्वयं भोजन करें।

  9. परिवार के कल्याण, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति की प्रार्थना करें।

मान्यता

मान्यता है कि भीष्म द्वादशी का व्रत करने से सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना करनी चाहिए। ब्राह्मणों को भोजन कराकर सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा देनी चाहिए। इस दिन स्नान-दान करने से सुख, सौभाग्य, धन और संतान की प्राप्ति होती है। ब्राह्मणों को भोजन कराने के पश्चात ही स्वयं भोजन करना चाहिए। यह उपवास समस्त पापों का नाश करता है तथा जीवन में संतोष, शांति और समृद्धि प्रदान करता है।



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जया एकादशी पौराणिक कथा, महत्व, व्रत व पूजा विधि




जया एकादशी पौराणिक कथा
कथा के अनुसार एक समय नंदन वन में उत्सव मनाया जा रहा था। उस उत्सव में सभी देवता और ऋषि मुनि शामिल हुए। उत्सव में गंधर्व गाने रहे थे और अप्सराएं नृत्य कर रही थी। गंधर्व में से एक गंधर्व जिनका नाम माल्यवान था। उनके गाने को सुनकर पुष्पवती नाम की अप्सरा मोहित हो गई। वह मल्लवान को अपनी और आकर्षित करने के लिए प्रयत्न करने लगी। पुष्पवती के ऐसा करने से मल्लवान का सुर ताल खराब होने लगा। सपर ताल खराब होने की वजह से महोत्सव का आनंद फीका पड़ गया।
यह देख कर सभी देवताओं को बहुत खराब लगा। तब देवों के राजा इंद्र ने क्रोध में आकर दोनों को श्राप दे दिया। जिसके कारण वह दोनों स्वर्ग लोक से मृत्युलोक आ गए। मृत्युलोक में आने के बाद उन दोनों हिमालय के जंगल में पिशाचों की तरह जीवन व्यतीत करने लगें। अपनी इस जीवन को देखकर वह दोनों बहुत दुखी थे। एक बार की बात है। माघ शुक्ल की जया एकादशी के दिन उन्होंने कुछ नहीं खाया था ना कुछ पिया था। वह पूरे दिन फल फूल खाकर अपना गुजारा कर रहे थे। भूख से व्याकुल होकर वह दोनों एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर अपनी पूरी रात गुजारी।
अपने हालत देखकर उन्हें अपनी गलती का पछतावा हो रहा था। उन्होंने अपनी गलती को सुधारने के लिए प्रण किया। अगली सुबह उन दोनों की मृत्यु हो गई। जिस दिन उनकी मृत्यु हुई उस दिन जया एकादशी था। अनजाने में उन्होंने इस व्रत को बिना खाए पिए किया था, इस वजह से पिशाच योनि से मुक्त मिल गई और वह स्वर्ग लोक में चले गए। स्वर्ग लोक में उन्हें देखकर इंद्र को बहुत आश्चर्य हुआ। तब उन्होंने उनसे श्राप मुक्ति के बारे में पूछा।
तब दोनों ने जया एकादशी व्रत के प्रभाव के बारे में भगवान इंद्र को बताया। उन्होंने बताया कि वह अनजाने में जया एकादशी का व्रत किया था, जिसके प्रभाव से मोक्ष की प्राप्ति हुई और हम स्वर्ग लोक में आ गए। इससे साफ पता चलता है कि जया एकादशी व्रत करने से हमें मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।

एकादशी का महत्व
हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व है, जो कि हर माह के दोनों पक्षों में आती है। लेकिन इनमें जया एकादशी खास मानी गई है, जिसे समस्त पापों का हरण करने वाली तिथि माना गया है। ये दिन श्री हरि यानी कि भगवान विष्णु को समर्पित होता है। यह अपने नाम के अनुरूप फल भी देती है। इस दिन व्रत धारण करने से व्यक्ति को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है व जीवन के हर क्षेत्र में विजय प्राप्त होती है। शास्त्रों के मुताबिक, इस दिन व्रत करने से स्वर्ण दान, भूमि दान, अन्न दान और गौ दान से अधिक पुण्य मिलता है। भगवान शिव ने महर्षि नारद को उपदेश देते हुए कहा कि एकादशी महान पुण्य देने वाला व्रत है। श्रेष्ठ मुनियों को भी इसका अनुष्ठान करना चाहिए। एकादशी व्रत के दिन का निर्धारण जहाँ ज्योतिष गणना के अनुसार होता है, वहीं उनका नक्षत्र आगे-पीछे आने वाली अन्य तिथियों के साथ संबंध व्रत का महत्व और बढ़ाता है। जया एकादशी का पावन व्रत इस दिन भगवान विष्णु की संपूर्ण विधि विधान से पूजा की जाती है। माघ मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को जया एकादशी के रूप में मनाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार जया एकादशी को, अन्नदा एकादशी और कामिका एकादशी के नामों से भी जाना जाता है। जया एकादशी के दिन भगवान विष्णु की जो भी व्यक्ति सच्ची श्रद्धा व संपूर्ण विधि विधान से पूजा करता है भगवान विष्णु उसकी सभी मनोकामना पूरी कर देते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं इस एकादशी का महत्व बताते हुए कहा है कि जो व्यक्ति इस व्रत को श्रद्धा पूर्वक रखता है, उसे ब्रह्म हत्या जैसे महापाप से भी मुक्ति मिल जाती है। भगवान विष्णु की कृपा से उसके सभी दुखों का अंत होता है और वो शख्स भूत, प्रेत और पिशाच जैसी नीच योनि से मुक्त हो जाता है।

व्रत व पूजा विधि
एकादशी से पहले दिन यानी दशमी को एक वेदी बनाकर उस पर सप्तधान रखें फिर अपनी क्षमतानुसार सोने, चांदी, तांबे या फिर मिट्टी का कलश बनाकर उस पर स्थापित करें। एकादशी के दिन पंचपल्लव कलश में रखकर भगवान विष्णु का चित्र या की मूर्ति की स्थापना करें और धूप, दीप, चंदन, फल, फूल व तुलसी आदि से श्री हरि की पूजा करें। द्वादशी के दिन ब्राह्मण को भोजन आदि कराएं व कलश को दान कर दें। इसके बाद व्रत का पारण करें। व्रत से पहली रात्रि में सात्विक भोजन ही ग्रहण करना चाहिए, ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। इस प्रकार विधिपूर्वक उपवास रखने से उपासक को कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी विजय प्राप्त होती है।

भगवान विष्णु का करें ध्यान
पूजा से पूर्व एक वेदी बनाकर उस पर सप्त धान रखें। वेदी पर जल कलश स्थापित कर, आम या अशोक के पत्तों से सजाएं। इस वेदी पर भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। पीले पुष्प, ऋतुफल, तुलसी आदि अर्पित कर धूप-दीप से आरती उतारें। भगवान श्री नारायण की उपासना करें। व्रत की सिद्धि के लिए घी का अखंड दीपक जलाएं।

एकादशी का फल
जया एकादशी व्रत करने वाले के पितृ, कुयोनि को त्याग कर स्वर्ग में चले जाते हैं। एकादशी व्रत करने वाले की पितृ पक्ष की दस पीढियां, मातृ पक्ष की दस पीढ़ियां और पत्नी पक्ष की दस पीढ़ियां भी बैकुंठ प्राप्त करती हैं। इस एकादशी व्रत के प्रभाव से पुत्र, धन और कीर्ति बढ़ती है।

जया एकादशी व्रत में क्या खा सकते हैं और क्या नहीं
  • एक समय फलाहारी भोजन ही किया जाता है। व्रत करने वाले को किसी भी तरह का अनाज सामान्य नमक, लाल मिर्च और अन्य मसाले नहीं खाने चाहिए।
  • कुट्टू और सिंघाड़े का आटा, रामदाना, खोए से बनी मिठाइयां, दूध-दही और फलों का प्रयोग इस व्रत में किया जाता है और दान भी इन्हीं वस्तुओं का किया जाता है।
  • एकादशी का व्रत करने के बाद दूसरे दिन द्वादशी को भोजन योग्य आटा, दाल, नमक,घी आदि और कुछ धन रखकर सीधे के रूप में दान करने का विधान है।
जया एकादशी व्रत में भूलकर भी न करें ये काम, हो सकता है अशुभ
  • जया एकादशी व्रत के नियम का पालन तीन दिनों तक चलता है। इसके नियम दशमी तिथि की शाम से शुरू होते हैं और द्वादशी तिथि तक चलते हैं।
  • दशमी के दिन मांस, मीट, लहसुन, प्याज, मसूर की दाल और चने की दाल वगैरह नहीं खाएं। सात्विक भोजन करें। द्वादशी के दिन व्रत का पारण करते समय भी इस बात का ध्यान रखें।
  • जया एकादशी के दिन घर पर चावल किसी को भी न खाने दें। जया एकादशी के दिन चावल खाने की मनाही है।
  • दशमी से लेकर द्वादशी तक संयम के साथ ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
  • एकादशी के दिन घर में झाड़ू नहीं लगाना चाहिए क्योंकि चींटी आदि सूक्ष्म जीवों की मृत्यु का भय रहता है। अगर लगाना ही है तो संभलकर लगाएं, जिससे किसी जीव को हानि न पहुंचे।
  • जया एकादशी का दिन बेहद पुण्य दायी और भगवान की आराधना का दिन होता है इसलिए इस दिन सुबह जल्दी उठ जाएं। शाम के समय सोना नहीं चाहिए। अगर संभव हो तो एकादशी की रात में भी जागरण करके भगवान के भजन और कीर्तन करने चाहिए।
  • व्रत का तात्पर्य है आपके मन की शुद्धि और इन्द्रियों पर नियंत्रण। इसलिए किसी के लिए भी मन में द्वेष की भावना न लाएं। न ही किसी की बुराई करें और न ही किसी का दिल दुखाए। किसी से झूठ न बोलें।
  • इस दिन बाल नहीं कटवाना चाहिए और न ही किसी से ज्यादा बात करनी चाहिए। ज्यादा बोलने से एनर्जी बर्बाद होती है, साथ ही कई बार गलत शब्द मुंह से निकलने का डर रहता है। ऐसे में मौन रहकर भगवान का मनन करें।
  • यदि संभव हो तो दिन में किसी समय गीता का पाठ करें या सुनें। द्वादशी के दिन स्नान के बाद किसी जरूरतमंद को भोजन खिलाएं और दान दक्षिणा दें, इसके बाद ही व्रत खोलें।


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खान पान से गंभीर से गंभीर बीमारी को कहें अलविदा



जब भी भोजन किया जाये तो भोजन का एक समय निश्चित होना चाहिए। ऐसा नहीं की कभी भी कुछ भी खा लिया। हमारा ये जो शरीर है वो कभी भी कुछ खाने के लिए नहीं है। इस शरीर में जठर (अमाशय) है, उसमें अग्नि प्रदीप्त होती है। जठर में जब अग्नि सबसे ज्यादा तीव्र हो उसी समय भोजन करें तो आपका खाया हुआ, एक एक अन्न का हिस्सा पाचन में जाएगा और रस में बदलेगा और इस रस में से मांस, मज्जा, रक्त, मल, मूत्र, मेद और आपकी अस्थियाँ इनका विकास होगा। सूर्योदय के लगभग ढाई घंटे तक जठरग्नि सबसे ज्यादा तीव्र होती है। सूर्य का उदय जैसे ही हुआ उसके अगले ढाई घंटे तक जठराग्नि सबसे ज्यादा तीव्र होती है। इस समय सबसे ज्यादा भोजन करें। इस समय आप कुछ भी खा सकते हैं।


अगर आप को आलू का पराठा खाना है तो सवेरे के खाने में खाइये, मूली का परांठा भी सुबह के खाने में खाइये। मतलब, आपको जो चीज सबसे ज्यादा पसंद है वह सुबह खाना चाहिये। रसगुल्ला, खाडी जलेबी, आपको पसंद है तो सुबह खाना चाहिये और सुबह पेट भरकर खाइये। पेट की संतुष्टि हुई, मन की भी संतुष्टि हो जाती है। पेट की संतुष्टि से ज्यादा मन की संतुष्टि महत्व की है। हमारा मन खास तरह की वस्तुये जैसे, हार्मोन्स, एंजाईम्स से संचालित है। मन को आज की भाषा में डॉक्टर पिनियल ग्लांड्स कहते हैं , हालाँकि वो है नहीं। पिनियल ग्लॅंड (मन) संतुष्टि के लिए सबसे आवश्यक है । अगर भोजन आपको अगर तृप्त करता है तो पिनियललॅंड आपकी सबसे ज्यादा सक्रिय है तो जो भी एंझाईम्स चाहिए शरीर को वो नियमित रूप में समान अंतर से निकलते रहते है। और जो भोजन से तृप्ति नहीं है तो पिनियल ग्लॅंड में गडबड होती है। और पिनियल ग्लॅंड की गडबड पूरे शरीर में पसर जाती है। और आपको तरह तरह के रोगो का शिकार बनाती है। अगर आप तृप्त भोजन नहीं कर पा रहे तो निश्चित 10-12 साल के बाद आपको मानसिक क्लेश होगा और रोग होंगे। मानसिक रोग बहुत खराब है। आप सिजोफ्रेनिया डिप्रेशन के शिकार हो सकते है आपको कई सारी बीमारियाँ आ सकती है। कभी भी भोजन करें तो, पेट भरे ही ,मन भी तृप्त हो। ओर मन के भरने और पेट के तृप्त होने का सबसे अच्छा समय सवेरे का है। दोपहर को भूख लगे है तो थोडा और खा लीजीए। लेकिन सुबह का खाना सबसे ज्यादा। दोपहर का भोजन थोडा कम करिए नाश्ते (सुबह के भोजन) से एक तिहाई कम कर दीजिए और रात का भोजन दोपहर के भोजन का एक तिहाई कर दीजिए। अगर आप सवेरे 6 रोटी खाते है तो दोपहर को 4 रोटी और शाम को 2 रोटी खाईए। ।भारत में आजकल उल्टा चक्कर चल रहा है। लोग नाश्ता कम करते हैं। लंच थोडा ज्यादा करते हैं और डिनर सबसे ज्यादा करते हैं। भोजन करने का यह तरीका सर्वाधिक नुकसानदायक है। वैदिक नियम है - नाश्ता सबसे ज्यादा लंच थोडा कम और डिनर सबसे कम करना चाहिए। हमें अंग्रेजों की नकल बंद करनी होगी अंग्रेजों की जलवायु भारत की जलवायु से भिन्न है। वे अपनी जलवायु के हिसाब से नाश्ता कम करते हैं क्योंकि वहां पर सूरज के दर्शन कम होते हैं और उनकी जठराग्नि मंद होती है। भारी नाश्ता उनकी प्रकृति के विरुद्ध है। भारत में तो सूर्य हजारों सालो से निकलता है और अगले हजारों सालों तक निकलेगा! जलवायु के हिसाब से हमारी जठराग्नि बहुत तीव्र है। बिना अधिक कसरत किये हमारी जठराग्नि तीव्र रहती है। इसलिए सुबह का खाना आप भरपेट खाईए।


मनुष्य को छोडकर जीव जगत का हर प्राणी इस सूत्र का पालन कर रहा है। आप चिड़िया को देखो, कितने भी तरह की चिड़िया सवेरे सूरज निकलते ही उनका खाना शुरू हो जाता है, और भरपेट खाती है। 6 बजे के आसपास राजस्थान, गुजरात में जाओ सब तरह की चिड़िया अपने काम पर लग जाती है। खूब भरपेट खाती है और पेट भर गया तो चार घंटे बाद ही पानी पीती है। गाय को देखिए सुबह उठते ही खाना शुरू हो जाता है। भैंस, बकरी ,घोड़ा सब सुबह उठते ही खाना खाना शुरू करेंगे और पेट भरकर खाएंगे। फिर दोपहर को आराम करेंगे तो यह सारे जानवर, जीव जंतु जो हमारी आँखो से दिखते है और नहीं भी दिखते ये सबका भोजन का समय सवेरे का हैं। सूर्योदय के साथ ही थे सब भोजन करते है। इसलिए, थे हमसे ज्यादा स्वस्थ रहते है।
तो सुबह के खाने का समय तय कीजिये। सूरज उगने के ढाई घंटे तक। यानी 9.30 बजे तक, ज्यादा से ज्यादा 10 बजे तक आपका भोजन हो जाना चाहिए। और ये भोजन तभी होगा जब आप नाश्ता बंद करेंगे। आप बाहर निकलिए घर के तो सुबह भोजन कर के ही निकलिए। दोपहर एक बजे में जठराग्नी की तीव्रता कम होना शुरू होता है तो उस समय थोडा हलका खाए यानी जितना सुबह खाना उससे कम खाए तो अच्छा है। ना खाए तो और भी अच्छा। खाली फल खाएं, जूस दही मट्ठा पिये। शाम को फिर खाये।
शाम का भोजन भी जठराग्नि के अनुसार ही करना चाहिए। जठराग्नी सुबह सुबह बहुत तीव्र होगी और शाम को जब सूर्यास्त होने जा रहा है, तभी तीव्र होगी। इसलिए शाम का खाना सूरज छिपने से पहले खा लेना चाहिए क्योंकि सूरज अस्त होने के बाद जठराग्नि भी मंद हो जाती है इसलिए सूरज डूबने के पहले 5.30 बजे - 6 बजे खाना चाहिये। उसके बाद अगर रात को भूख लगे तो दूध पीजिये। दूध के अतिरिक्त कुछ भी न लें। इसका कारण यह है की शाम को सूरज डूबने के बाद हमारे पेट में जठर स्थान में कुछ हार्मोन और रस या एंजाइम पैदा होते है जो दूध को पचाते है। इसलिए सूर्य डूबने के बाद जो चीज खाने लायक है वो दूध है। तो रात को दूध पी लीजिए। उसके बाद जितना जल्दी हो सके सो जाइये।
भोजन के बाद विश्राम के नियम: सुबह और दोपहर के भोजन के बाद 20 से 40 मिनट की झपकी लें। लेकिन शाम का खाना खाने के बाद कम से कम 500 कदम टहलना चाहिए।


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घरेलू धनिये के सर्वश्रेष्ठ औषधीय फायदे



धनिये के फायदे और नुकसान
Coriander (Dhaniya) In Hindi
घरेलू धनिये के सर्वश्रेष्ठ औषधीय फायदे

भारतीय भोजन को स्वादिष्ट बनाने के लिए जितने महत्वपूर्ण मसाले होते हैं, उतना ही योगदान सब्जी, दाल और सलाद को जायकेदार बनाने के लिए गार्निशिंग का होता है। गार्निशिंग के लिए वैसे तो बहुत सारी चीजों का इस्तेमाल किया जा सकता है। मगर सबसे प्रमुख धनिया के पत्ते होते हैं। बाजार में मात्र 5 से 10 रुपए में मिल जाने वाली धनिया खाने के स्वाद को दोगुना कर देती है, साथ ही इसमें सेहत का रस भी घोल देती है। इतना ही नहीं, धनिया की हरी चटनी भी लगभग हर कोई खाना पसंद करता है। ऐसे में देखा जाए तो धनिया के पत्ते भारतीय भोजन को स्वादिष्ट बनाने का मुख्‍य इंग्रीडिएंट हैं। लेकिन धनिया के पत्ते खाने का स्वाद तब ही बढ़ा पाएंगे जब आप बाजार से अच्छी, ताजी और हरी-भरी धनिया लेकर आएंगी। बहुत सारे लोग यह बात नहीं जानते हैं कि बाजार में आपको कई वैरायटी की धनिया पत्ती मिल जाती हैं। मगर खाने को स्वादिष्ट केवल देसी धनिया के पत्ते ही बना सकते हैं।
धनिया एक जड़ी-बूटी के रूप में अपने आप उगने वाला प्राकृतिक पौधा होता है जिसकी पत्तियां और बीजों का प्रयोग हर घर में किया जाता है। धनिया एक हर जगह पर खाने में प्रयोग की जाने वाली हरी पत्तियों की टहनियां होती हैं जो खाने में प्रयोग की जाती हैं। इनसे बहुत ही हल्की और सुगंधित महक आती है जिससे खाने का स्वाद बढ़ता है और खाना सुगंधित भी हो जाता है। इसे सभी जगहों पर प्रयोग किया जाता है। धनिया का प्रयोग सब्जी को सजाने और मसाले के रूप में किया जाता है क्योंकि इसके प्रयोग से सब्जी में स्वाद बढ़ जाता है। धनिये के बीज को सुखाकर सूखे मसाले के रूप में प्रयोग किया जाता है। धनिया जितना खाना का स्वाद बढ़ाने के लिए फायदेमंद होता है उतना ही स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद होता है। धनिया हर प्रकार से यहाँ तक की धनिया का पानी भी स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है। खाने में भले ही मिर्च-मसले न हो लेकिन अगर उसकी धनिया से सजावट की जाये तो उसके स्वाद में चार-चाँद लग जाते हैं।
घरेलू धनिये के सर्वश्रेष्ठ औषधीय फायदे

धनिया की तासीर (Dhaniya Ki Taseer)
धनिया की तासीर ठंडी होती है। धनिया में बहुत से पोषक तत्व जैसे – फॉस्फोरस, आयरन, कैरोटीन, थियामिन, मैगनीज, जिंक, पोटैशियम, फाइबर, कैल्शियम, आयरन, विटामिन बी6, मैग्नीशियम, विटामिन ए, विटामिन सी, सोडियम पाए जाते हैं।

धनिये के औषधीय फायदे -(Medicinal Benefits of Coriander In Hindi) :
  1. एनीमिया में फायदेमंद (Dhaniya Goods For Anemia)
    अगर किसी व्यक्ति को किसी कारण वश खून की कमी हो जाती है तो उसके लिए धनिया के बीजों का सेवन बहुत अधिक लाभदायक होता है क्योंकि धनिया में आयरन की मात्रा पाई जाती है जो खून में हीमोग्लोबिन बनाता है इसलिए धनिया के बीजों के सेवन से खून की कमी नहीं होती है।
  2. ऑस्टियोपोरोसिस में फायदेमंद (Dhaniya Goods For Osteoporosis)
    आप धनिया के पानी के सेवन से ऑस्टियोपोरोसिस के होने से बच सकते हैं क्योंकि धनिया के पानी में विटामिन ए और विटामिन के पाई जाती हैं जो कैल्शियम संश्लेषण में मदद करती हैं। इसके सेवन से हड्डियों को कैल्शियम मिल जाता है और हम ऑस्टियोपोरोसिस रोग के खतरे से बच जाते हैं।
  3. कोलेस्ट्रोल कम करने में फायदेमंद (Dhaniya Goods For Reduce Cholesterol)
    आज के समय में बहुत से ऐसे कारण होते हैं जिसकी वजह से हमारे शरीर में कोलेस्ट्रोल की मात्रा बहुत अधिक बढ़ जाती है और हमें बहुत से रोगों का शिकार होना पड़ जाता है लेकिन आप धनिया का प्रयोग करके खराब कोलेस्ट्रोल को कम कर सकते हैं जिससे बहुत से रोगों के होने का खतरा भी कम हो जाता है। विशेषज्ञों के एक प्रयोग से यह पता चला है कि धनिया के बीज में ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो कोलेस्ट्रोल को कम कर सकते हैं। अगर आपको हाई कोलेस्ट्रोल की समस्या है तो आप धनिया के बीजों को पानी में उबालकर उस पानी को छानकर पिएं। इस पानी को पीने से हाई कोलेस्ट्रोल की समस्या ठीक हो जाएगी।
  4. डायबिटीज में फायदेमंद-(Dhaniya Goods For Diabetes)
    जिन लोगों को डायबिटीज की समस्या होती है उनके लिए धनिया का सेवन बहुत अधिक लाभकारी होता है क्योंकि धनिया का सेवन शरीर में शुगर लेवल को कम कर देता है और इंसुलिन की मात्रा को बढ़ा देता है जिससे हमारे शरीर का शुगर लेवल नियंत्रण में रहता है और हमें कोई परेशानी नहीं होती। आप धनिया का सेवन अपना भोजन पकाते समय भोजन में कर सकते हैं इससे भी बहुत लाभ होगा।
  5. थायराइड में फायदेमंद-(Dhaniya Good For Thyroid)
    अगर आपको थायराइड की समस्या है तो आप धनिया का सेवन कर सकते हैं। आप रात के समय धनिया को पानी में भिगोकर रख दें और सुबह के समय उस पानी को पी लें इससे आपकी थायराइड की समस्या ठीक हो जाएगी।
  6. पाचन तंत्र के लिए फायदेमंद-(Dhaniya Goods For Digestive System)
    किसी व्यक्ति का पूरा शरीर उसके पाचन तंत्र पर निर्भर करता है क्योंकि पाचन तंत्र की वजह से ही शरीर को पूरी ऊर्जा मिलती है और अगर वह सही तरह से काम न करें तो बहुत सी समस्याएं हो जाती हैं जैसे कब्ज, गैस, अपच, पेट दर्द, उल्टी, दस्त आदि। ऐसे में धनिया का सेवन आपके लिए बहुत अधिक फायदेमंद होता है क्योंकि धनिया के सेवन से बहुत सी बीमारियों को दूर किया जा सकता हैं। आप थोडा सा धनिया पाउडर लें और उसमें हींग और काला नमक मिला लें। अब इस मिश्रण को एक गिलास पानी में घोलकर पिएं इससे आपकी पाचन तंत्र से जुड़ी समस्याएं ठीक हो जाएंगी।
  7. मासिक धर्म में फायदेमंद-(Dhaniya Goods For Menstrual Cycle)
    जब किसी महिला को मासिक धर्म से संबंधित कोई परेशानी होती है या मासिक धर्म बहुत अधिक होता है तो वह धनिया का सेवन करें यह उसके लिए बहुत अधिक लाभकारी होगा। आप थोड़े से धनिया का बिज लें और उन्हें पानी में डालकर उबालें। अब उस पानी को छान लें और उसमें अपने हिसाब से चीनी मिलाकर सेवन करें। इस पानी के सेवन से मासिक धर्म की समस्या ठीक हो जाएगी।
  8. वजन कम करने में फायदेमंद-(Dhaniya Goods For Weight Loss)
    अगर आपका वजन बहुत अधिक है और आप अपना वजन कम करना चाहते हैं तो आप धनिया का सेवन कर सकते हैं क्योंकि धनिया का सेवन करने से आपका वजन बहुत कम हो जाएगा। अपने वजन को कम करने के लिए सबसे पहले आप धनिया के कुछ बीज लें। अब इन बीजों को एक गिलास पानी में डाल दें और गैस पर उबालने के लिए रख दें। जब पानी की मात्रा आधे गिलास के बराबर हो जाए तो उसे छान लें और इस पानी ओ दिन में दो बार पिएं। इसके सेवन से आपका वजन बहुत अधिक कम हो जाएगा।
  9. सर्दी जुकाम में फायदेमंद-(Dhaniya Goods For Cold)
    सर्दियों और बरसात के मौसम में अक्सर देखा जाता है कि लोगों को सर्दी जुकाम की समस्या हो जाती है जो कुछ जीवाणुओं की वजह से होती है अगर आपको भी यह समस्या है तो आप धनिया का सेवन कर सकते हैं क्योंकि धनिया में जीवाणुरोधी गुण पाए जाते हैं जो जीवाणुओं से हमारी रक्षा करते हैं।
हरा धनिया अपनी डेली डायट में शामिल करने के तीन आसान तरीके हैं
  1. आप दाल और सब्जी में हरा धनिया के पत्तियां महीन काटकर मिलाएं। ध्यान रखें सब्जी बनने और दाल पकने के बाद धनिया मिलाया जाता है। धनिया मिलाकर इन्हें नहीं पकाते हैं। क्योंकि ऐसा करने से धनिया के प्राकृतिक गुणों में कमी आती है।
  2. धनिए की चटनी बनाकर खाएं। हरा धनिया के साथ प्याज और हरी मिर्च को पीसकर चटनी तैयार करें बाद में इसमें स्वादानुसार नमक मिलाकर इसका सेवन करें। यह पाचन को दुरुस्त करती है और गैस, बदहजमी जैसी समस्याओं से बचाती है।
  3. तीसरी विधि है कि आप हरे धनिए का रायता बनाकर खाएं। इसे पीसकर रायते में मिला लें। या फिर पिसे हुए हरे धनिया को छाछ, जलजीरा, आम पना इत्यादि में मिलाकर इसका सेवन करें।
सूजन में फायदेमंद (Dhaniya Goods For Swelling)
अगर आपके किसी अंग पर किसी वजह से सूजन आ गई है तो धनिया का प्रयोग आपके लिए बहुत फायदेमंद होगा क्योंकि धनिया में सूजन को कम करने के गुण पाए जाते हैं । आप धनिया के एशेंशियल ऑइल का प्रयोग सूजन वाले भाग पर करें इससे आपकी सूजन कम हो जाएगी।

धनिये के अन्य फायदे -(Dhaniya Ke Fayde) :
  1. अनिद्रा के लिए : आप नींद लाने वाली दवाइयों के सेवन की जगह पर धनिया का सेवन कर सकते हैं क्योंकि इससे आपको नींद भी आ जाएगी और आपको किसी भी तरह की कोई मानसिक हानि नहीं होगी जबकि दवाइयों का प्रयोग करने से मानसिक रोग होने का खतरा रहता है इसलिए आपके लिए दवाइयों की जगह पर धनिया का प्रयोग करना बहुत लाभकारी होता है।
  2. आँखों के लिए : धनिया में विटामिन ए की भरपूर मात्रा पाई जाती है जो आँखों की रौशनी बढ़ाने में मदद करती है। आप धनिया को अपने खाने में मिलाकर सेवन कर सकते हैं इससे आपको बहुत अधिक फायदा होगा।
  3. कमजोरी के लिए : धनिया का सेवन करने से कमजोरी और चक्कर आने की समस्या दूर हो जाती है। आप रात के समय में धनिया पाउडर और आंवला पाउडर को पानी में भिगोकर रख दें और सुबह के समय उसका सेवन करें।
  4. जलन के लिए : जब किसी वजह से आपकी आँखों हाथों और पैरों में जलन होती है तो आपको धनिया का सेवन करना चाहिए इससे आपको आँखों, पेट, हाथों और पैरों में जलन होनी बंद हो जाएगी। सबसे पहले आप सौंफ, मिश्री और साबुत धनिया को समान मात्रा में लें और उन्हें पीस लें। भोजन करने के बाद आप एक चम्मच या दो चम्मच उस पाउडर का सेवन करें इससे आपकी जलन की समस्या बिलकुल ठीक हो जाएगी।
  5. त्वचा के लिए : धनिया के सेवन से हमारी त्वचा साफ होने के साथ-साथ ग्लो भी करने लगती है। धनिया का सेवन करके आप त्वचा के बहुत से रोगों से छुटकारा पा सकते हैं क्योंकि धनिया में कीटाणुनाशक, एंटीऑक्सीडेंट और एंटीसेप्टिक गुण पाए जाते हैं जो त्वचा के रोगों को दूर करते हैं।
  6. नकसीर के लिए : हरे धनिये की बीस से इक्कीस ग्राम पत्तियां लें और उसमें चुटकी भर कपूर को मिला लें और पीस लें। इसे पिसने के बाद इसका रस निकालकर छान लें। अब इस रस को एक-एक बूंद करके अपने नाक में डालें इससे आपकी नाक से निकलने वाला खून रुक जाएगा और नकसीर की समस्या ठीक हो जाएगी।
  7. पथरी के लिए : धनिया के प्रयोग से पथरी को आसानी से बाहर निकाला जा सकता है। आप सुबह के समय हरे धनिया को पानी में उबाल लें और ठंडा होने पर उसे छान लें। आप इस पानी का सेवन प्रतिदिन सुबह के समय खाली पेट करें। इस पानी के सेवन से पथरी यूरिन के साथ बाहर निकल जाएगी और आपकी पथरी की समस्या ठीक हो जाएगी।
  8. पेट की बिमारियों के लिए : धनिया के कुछ पत्ते और जीरा लेकर थोड़े से पानी में डालें। इसके थोड़ी देर बाद उसमें चाय की पत्ती और सौंफ डाल दें और अपने स्वादनुसार उसमें चीनी और अदरक डालें। इसे थोड़ी देर उबालने के बाद ठंडा होने के लिए रख दें। हल्का गर्म रहने पर आप इस काढ़े का सेवन करें इससे आपकी पेट से संबंधित समस्या जैसे गैस ठीक हो जाएगी।
  9. मुंह के छालों के लिए : धनिया में किट्रोनेलोल नाम का एक एंटीसेप्टिक पाया जाता है जो मुंह के छालों और घावों को ठीक करने में मदद करता है। धनिया का प्रयोग बहुत से टूथपेस्ट में भी किया जाता है क्योंकि यह आपको खुलकर सांस लेने में बहुत मदद करता है और मुंह से बदबू को भी समाप्त कर देता है।
  10. मुंहासों के लिए : आप धनिया का जूस बनाकर उसमें हल्दी पाउडर मिलाकर लेप बना लें अब इस लेप को दिन में दो बार अपने चेहरे पर लगाएं और कुछ देर बाद इसे पानी से धो दें। इस क्रिया को करने से आपके चेहरे के दाग-धब्बे और मुंहासे ठीक हो जाएंगे और आपके चेहरे का ग्लो भी वापस आ जाएगा। अगर आपको घमोरिया हो गया है तो आप धनिया का पानी लेकर उससे स्नान करें आपकी घमोरिया की परेशानी ठीक हो जाएगी।
  11. रक्तचाप के लिए : धनिया हमारे शरीर के नर्वस सिस्टम की सहायता से रक्तचाप को कम करने में मदद करता है। धनिया रक्तचाप में दवा की तरह काम करता है जिसकी वजह से बहुत से रोगों से छुटकारा मिल जाता है।
  12. संक्रमण के लिए : धनिया के प्रयोग से बहुत से संक्रमण के कणों को अपने शरीर से दूर रखा जा सकता है। जब आप प्रतिदिन धनिया का सेवन करते हैं तो आपकी संक्रमण रोगों से रक्षा होती है क्योंकि इसके सेवन में पेट में होने वाले कीड़े और बैक्टीरिया मर जाते हैं जिससे पेट को आराम और ठंडक मिलती है।
  13. सेमोलिना बैक्टीरिया के लिए : धनिया में कुछ ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो इस बैक्टीरिया को दूर रखने में मदद करते हैं। आप धनिया का प्रयोग अपने भोजन में कर सकते हैं इससे भी आपको लाभ होगा।
  14. हृदय के लिए : धनिया का सेवन करने से कोलेस्ट्रॉल का स्तर नियंत्रण में रहता है और रक्तचाप भी ठीक रहता है जिससे हृदय की बहुत सी बीमारियों से हमारा बचाव होता है। धनिया में ऐसे पोषक तत्व पाए जाते हैं जो हृदय के लिए बहुत ही लाभकारी होते हैं। धनिया के सेवन से दिल के दौरे की समस्या भी ठीक हो जाती है।
धनिया के नुकसान-(Coriander Side Effects In Hindi)
  1. एलर्जी : हो सकता है कि धनिया का सेवन करने से आपको चक्कर, सूजन, रैशेज, साँस लेने में कठिनाई आदि समस्याएं हो सकती हैं इसलिए धनिया का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए।
  2. कैंसर : धनिया का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इसके सेवन से त्वचा पर सनबर्न की समस्या हो जाती है जिसके लंबे समय तक होने पर कैंसर का कारण भी बन सकती है।
  3. गर्भवती महिला : जब धनिया का सेवन अधिक हो जाता है तो शरीर की ग्रंथिय प्रभावित हो जाती है इसलिए गर्भवती महिलाएं और दूध पिलाने वाली महिलाओं को इसका सेवन नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से उनके भ्रूण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
  4. लीवर : एक नजर से देखा जाए तो धनिया हमारे शरीर के लिए बहुत लाभकारी होता है लेकिन जब धनिया का जरूरत से ज्यादा सेवन किया जाता है तो उससे पित्त पर दवाब पड़ता है जिससे लीवर की परेशानी हो सकती है।
Disclaimer: इस लेख में बताई विधि, तरीक़ों व दावों को केवल सुझाव और जानकारी के रूप में लें, इस तरह के किसी भी उपचार/दवा/डाइट पर अमल करने से पहले डॉक्टर/वैद्य/चिकित्सक की सलाह जरूर लें।


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परमवीर चक्र विजेता अब्‍दुल हमीद



अब्दुल हमीद

अब्दुल हमीद का जन्म 1 जुलाई, 1933 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में स्थित धरमपुर नामक छोटे से गाँव में एक गरीब मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम मोहम्मद उस्मान था। परिवार की आजीविका चलाने के लिए कपड़ों की सिलाई का कार्य किया जाता था। लेकिन अब्दुल हमीद का मन इस काम में बिल्कुल नहीं लगता था। उनका मन तो कुश्ती, दंगल और दाँव-पेंचों में रमता था, क्योंकि पहलवानी उन्हें विरासत में मिली थी। उनके पिता और नाना दोनों ही प्रसिद्ध पहलवान थे।

बचपन से ही लाठी चलाना, कुश्ती लड़ना, बाढ़ के समय नदी पार करना, फौज और युद्ध के सपने देखना तथा गुलेल से सटीक निशाना लगाना उनकी विशेषताओं में शामिल था। वे इन सभी कार्यों में अपने साथियों से आगे रहते थे।

उनका एक गुण सबसे उल्लेखनीय था—दूसरों की सहायता करना, जरूरतमंद लोगों के काम आना तथा अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना। वे अन्याय को किसी भी स्थिति में सहन नहीं करते थे।

ऐसी ही एक घटना उनके गाँव में घटी। एक गरीब किसान की फसल को जबरन काटकर ले जाने के लिए वहाँ के एक जमींदार ने लगभग पचास गुंडों को भेजा। जब अब्दुल हमीद को इस बात का पता चला, तो उन्हें यह अन्याय सहन नहीं हुआ। वे अकेले ही उन गुंडों से भिड़ गए। उनके साहस और दृढ़ता के सामने सभी गुंडों को पीछे हटना पड़ा और अंततः उस गरीब किसान की फसल बच गई।

एक अन्य अवसर पर उन्होंने अपने प्राणों की परवाह किए बिना गाँव में आई भीषण बाढ़ के दौरान डूब रही दो युवतियों की जान बचाई। इस प्रकार उन्होंने अदम्य साहस, परोपकार और मानवता का परिचय दिया।



अब्दुल हमीद का बचपन

अब्दुल हमीद की बचपन से ही इच्छा एक वीर सैनिक बनने की थी। वे अपनी दादी से अक्सर कहा करते थे—“मैं फौज में भर्ती होऊँगा।” जब उनकी दादी कहतीं—“अपने पिता की सिलाई की मशीन चलाओ,” तब वे दृढ़ता से उत्तर देते—“हम जइब फौज में! तोहरे रोकले ना रुकब हम, समझलू।”

दादी को उनकी जिद के आगे झुकना पड़ता और कहना पड़ता—“अच्छा-अच्छा, जइय फौज में।” यह सुनकर हमीद बहुत प्रसन्न हो जाते। इसी प्रकार वे अपने पिता मोहम्मद उस्मान से भी सेना में भर्ती होने की जिद करते थे और कपड़ा सिलने के पारिवारिक व्यवसाय को अपनाने से इंकार कर देते थे।

सेना में भर्ती

इक्कीस वर्ष की आयु में अब्दुल हमीद जीविका की तलाश में रेलवे में भर्ती होने के लिए गए, किंतु उनके संस्कार और देशभक्ति की भावना उन्हें सेना में भर्ती होकर राष्ट्र-सेवा करने के लिए प्रेरित कर रही थी। अतः उन्होंने वर्ष 1954 में एक सैनिक के रूप में अपने सैन्य जीवन की शुरुआत की।

27 दिसम्बर, 1954 को उन्हें ग्रेनेडियर्स इन्फैंट्री रेजिमेंट में शामिल किया गया। जम्मू-कश्मीर में तैनाती के दौरान वे पाकिस्तान से आने वाले घुसपैठियों पर कड़ी निगरानी रखते थे और उन्हें करारा जवाब देते थे।

इसी दौरान उन्होंने इनायत अली नामक एक कुख्यात घुसपैठिये और डाकू को पकड़ने में सफलता प्राप्त की। उनके इस साहसिक कार्य से प्रभावित होकर सेना ने उन्हें पदोन्नति प्रदान की और वे लांस नायक बना दिए गए।

वर्ष 1962 में जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया, उस समय अब्दुल हमीद पूर्वोत्तर सीमांत क्षेत्र (नेफा—वर्तमान अरुणाचल प्रदेश) में तैनात थे। यद्यपि उस युद्ध में उन्हें अपनी वीरता का व्यापक प्रदर्शन करने का अवसर नहीं मिल सका, फिर भी उनके मन में सदैव यह आकांक्षा बनी रही कि वे युद्धभूमि में असाधारण पराक्रम दिखाकर शत्रु को परास्त करें और मातृभूमि की रक्षा में अपना सर्वोच्च योगदान दें।

1965 का युद्ध

8 सितम्बर 1965 की रात पाकिस्तान द्वारा भारत पर आक्रमण किए जाने पर भारतीय सेना के जवान उसका मुकाबला करने के लिए डटकर खड़े हो गए। वीर अब्दुल हमीद तरनतारन जिले के खेमकरण सेक्टर में सेना की अग्रिम पंक्ति में तैनात थे।

पाकिस्तान ने उस समय के लगभग अपराजेय माने जाने वाले अमेरिकी पैटन टैंकों के साथ खेमकरण सेक्टर के असल उताड़ गाँव पर हमला कर दिया। भारतीय सैनिकों के पास न तो पर्याप्त टैंक थे और न ही अत्याधुनिक भारी हथियार, किंतु उनके पास मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर कर देने का अदम्य साहस था। भारतीय सैनिक अपनी साधारण .303 रायफल और एल.एम.जी. के सहारे पैटन टैंकों का सामना कर रहे थे।

हवलदार वीर अब्दुल हमीद के पास एक "गन-माउंटेड जीप" थी, जो विशाल पैटन टैंकों की तुलना में मानो एक खिलौना प्रतीत होती थी। किंतु उन्होंने असाधारण साहस और युद्ध-कौशल का परिचय देते हुए अपनी जीप पर लगी गन से पैटन टैंकों के कमजोर हिस्सों पर सटीक निशाना साधना प्रारम्भ किया और एक-एक करके उन्हें ध्वस्त करने लगे।

अब्दुल हमीद के इस अद्वितीय पराक्रम को देखकर अन्य सैनिकों का भी उत्साह बढ़ गया। देखते ही देखते पाकिस्तानी सेना में भगदड़ मच गई। वीर अब्दुल हमीद ने अपनी गन-माउंटेड जीप से सात पाकिस्तानी पैटन टैंकों को नष्ट कर दिया। कुछ ही समय में भारत का असल उताड़ गाँव पाकिस्तानी पैटन टैंकों की कब्रगाह बन गया।

किन्तु पीछे हटती पाकिस्तानी सेना का पीछा करते समय उनकी जीप पर एक गोला आकर गिरा, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए। अगले दिन, 9 सितम्बर 1965 को उन्होंने वीरगति प्राप्त की। हालांकि, उनके निधन की आधिकारिक घोषणा 10 सितम्बर को की गई।

सम्मान और पुरस्कार

1965 के भारत-पाक युद्ध में असाधारण वीरता और अद्वितीय साहस का परिचय देने के लिए हवलदार अब्दुल हमीद को मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से अलंकृत किया गया।

28 जनवरी 2000 को भारतीय डाक विभाग ने वीरता पुरस्कार विजेताओं के सम्मान में पाँच डाक टिकटों का एक विशेष सेट जारी किया, जिसमें वीर अब्दुल हमीद के सम्मान में तीन रुपये मूल्य का एक सचित्र डाक टिकट भी शामिल था। इस डाक टिकट पर जीप पर सवार होकर रिकॉइललेस राइफल से निशाना साधते हुए वीर अब्दुल हमीद का चित्र अंकित किया गया है।

चौथी ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट ने उनकी स्मृति में उनकी कब्र पर एक समाधि का निर्माण कराया है। प्रत्येक वर्ष उनकी शहादत दिवस पर वहाँ मेले का आयोजन किया जाता है। असल उताड़ गाँव के निवासी उनके नाम पर एक डिस्पेंसरी, पुस्तकालय और विद्यालय का संचालन करते हैं।

सैन्य डाक सेवा ने भी 10 सितम्बर 1979 को उनके सम्मान में एक विशेष आवरण (Special Cover) जारी किया था। वीर अब्दुल हमीद की वीरता, राष्ट्रभक्ति और बलिदान आज भी देशवासियों को प्रेरित करते हैं। समूचा राष्ट्र उनके अद्वितीय साहस को श्रद्धापूर्वक नमन करता है।


अब्दुल हमीद प्रश्नोत्तरी

अब्दुल हमीद ने कितने टैंक तोड़े थे?

परमवीर चक्र विजेता अब्दुल हमीद ने 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध (1965 Indo-Pak War) में अपना पराक्रम दिखाया था। 'असल उत्तर की लड़ाई' (Battle of Asal Uttar) में हमीद ने अकेले ही पाकिस्तान के आठ पैटन टैंक बर्बाद कर दिए। पंजाब के तरनतारन जिले में एक गाँव है—असल उताड़।

अब्दुल हमीद ने दुश्मन के टैंकों को कैसे नष्ट किया?

इस बार हमीद ने देर न करते हुए अपनी जीप संभाली और टैंकों की ओर निकल पड़े। सामने से फायरिंग भी हो रही थी, लेकिन हमीद को कपास की खड़ी फसल का लाभ मिला और दुश्मन उन्हें सीधे निशाने पर नहीं ले सका। हमीद ने पहले प्रमुख टैंक को नष्ट किया और फिर अपनी स्थिति बदलकर दो और टैंकों को ध्वस्त कर दिया।

वीर अब्दुल हमीद कैसे शहीद हुए थे?

साल 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान वीर अब्दुल हमीद ने पाकिस्तानी दुश्मनों के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी थी। उन्होंने पाकिस्तान के सात पैटन टैंकों के परखच्चे उड़ा दिए थे। इसी दौरान वे शहीद हो गए थे।

अब्दुल हमीद कब शहीद हुए थे?

युद्धक्षेत्र में ही 10 सितम्बर, 1965 को अब्दुल हमीद शहीद हुए, लेकिन तब तक वे अप्रतिम शौर्य की अविस्मरणीय दास्तान लिख चुके थे। इससे पहले कि अब्दुल हमीद की जाँबाज़ी का किस्सा याद करें, आइए उनके निजी जीवन के बारे में जानते हैं। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के धरमपुर गाँव में 1 जुलाई, 1933 को हमीद का जन्म हुआ था।

अब्दुल हमीद को परमवीर चक्र कब मिला?

10 सितम्बर, 1965 को अब्दुल हमीद ने देश पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। मरणोपरांत परमवीर चक्र (भारत का सर्वोच्च वीरता पदक) से सम्मानित अब्दुल हमीद को 'टैंक डिस्ट्रॉयर' के नाम से जाना जाता है।

1965 के युद्ध में शहीद वीर अब्दुल हमीद को कौन-से वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया?

उनकी नज़र 4 ग्रेनेडियर्स के कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद के पोस्टर पर पड़ी। अब्दुल हमीद को 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में खेमकरण सेक्टर में पाकिस्तान के कई पैटन टैंकों को नष्ट करने के लिए परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

अब्दुल हमीद को परमवीर चक्र क्यों मिला?

अविचलित रहकर सी.क्यू.एम.एच. अब्दुल हमीद ने लगातार गोलीबारी जारी रखी और गंभीर रूप से घायल होने से पहले अपनी टुकड़ी को पाकिस्तान के सात टैंकों को नष्ट करने के लिए प्रेरित किया। उनकी विशिष्ट बहादुरी, प्रेरक नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।



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एक अंग्रेज जिलाधिकारी पर श्री राम कृपा



मधुरांतकम चेंगलपेट जिले का एक छोटा-सा शहर है, जो मद्रास (वर्तमान में चेन्नई) से पांडिचेरी के रास्ते पर है। वहां पर श्री रामचन्द्र जी का एक छोटा-सा मंदिर है। उस मंदिर के नजदीक एक बड़ी झील भी है। मद्रास से पांडिचेरी जाने वालों को उसी सड़क से जाना पड़ता है, जो मधुरांतकम की उस झील के बांध पर है। वह झील इतनी सुन्दर और काफी बड़ी है कि जिन लोगों को उस रास्ते पर जाना पड़ता है, उन लोगों का मन उस झील की तरफ आकर्षित हो जाता है और वे लोग उस झील के सुन्दर और मनोहर दृश्य को कभी भूल नहीं सकते।
उपर्युक्त झील और श्री रामचन्द्र जी के मंदिर के बारे में एक विचित्र लेकिन सच्ची कहानी प्रचलित है, जिससे मालूम होता है कि एक ईसाई अंग्रेज साहब भी श्री रामचन्द्र जी के भक्त बन सके और उनको भगवान के दर्शन भी मिले थे।
bhagwan shri ram


बात १८८२ ई० की है। उस समय लियानल प्राइस साहब चेंगलपेट जिले के कलक्टर थे। उनको मधुरांतकम की झील देखने की बड़ी इच्छा हुई। झील इतनी बड़ी थी कि उसके आस-पास के कई गाँवों की खेती बारी के लिये उसका जल पर्याप्त था। लेकिन दुर्भाग्य से हर साल बरसात में जब झील भर जाती थी, तब उसका बाँध टूटकर सारा पानी बाहर चला जाता था और झील हमेशा सूखी-की-सूखी ही रह जाती थी।
इलाके वाले प्रतिवर्ष गर्मी के दिनों में उस झील के बांध की मरम्मत करते थे। हर साल मरम्मत के समय मि० प्राइस खुद वहाँ आकर पड़ाव डालते और अपनी मौजूदगी में ही सारा काम कराते थे। बरसात में बाढ़ से इसका बाँध हर साल टूट जाया करता था। कलक्टर साहब की झील की बड़ी चिंता होती थी। सन् १८८२ में भी सदा की तरह झील की मरम्मत शुरू हुई। स्वयं कलेक्टर साहब उसका निरीक्षण कर रहे थे। एक बार आप मंदिर के पास से निकले। उनकी इच्छा हुई कि चलकर मन्दिर देख आवें।
वे मंदिर में आये। ब्राह्मणों ने उनको मंदिर दिखाया। साहब ने देखा कि एक स्थान पर ढेरों पत्थर जमा हैं। साहब ने ब्राह्मणों से पत्थरों के जमा कर रखने का कारण पूछा। ब्राह्मणों ने जवाब दिया- 'साहब! श्री सीता जी का मंदिर बनाना है। लेकिन उसके लिये हम लोग सिर्फ पत्थर ही जमा कर सके हैं। शेष काम के लिये काफी धन जमा करने में हम असमर्थ हैं। ऐसे सत्कार्य के सफलतापूर्वक सिद्ध होने में धन का अभाव ही एक बाधा हो रही है। ' 'मुझे भी तुम्हारी देवी जी से एक प्रार्थना करने दो।'
वहां के भक्त ब्राह्मण अपनी-अपनी मनोवृत्ति के अनुसार भगवान श्री रामचंद्र जी और माता सीताजी के गुणों और महिमाओं का वर्णन करने लगे। उसे सुनकर साहब ने उन लोगों से पूछा- 'क्या तुम लोग विश्वास करते हो कि तुम्हारी देवी भक्तों की मनोकामना पूरी करेंगी ?"
ब्राह्मणों ने दृढ़तापूर्वक जवाब दिया- 'निस्सन्देह।' कलक्टर साहब ने फिर पूछा-'अच्छा, यदि मैं भी तुम्हारी देवी जी से कुछ प्रार्थना करूं तो मेरी भी इच्छा उनकी कृपा से पूरी होगी?' ब्राह्मणों ने जवाब दिया जरूर।' तब साहब ने उन लोगों से कहा, 'यदि तुम लोगों की बात सच हो तो मैं भी तुम्हारी देवी जी से प्रार्थना करता हूँ कि इस झील की रक्षा, जिसकी मरम्मत हर साल हो रही है और पीछे जिसका नाश भी होता आ रहा है, यदि तुम्हारी देवी जी की कृपा से हो जाये, तो तुम्हारी देवी जी का मंदिर बनाने का भार मैं अपने ऊपर लूँगा।' प्रार्थना करके साहब वहां से लौट गए। मरम्मत का काम पूरा हो जाने के बाद साहब अपने घर चले गये।
फिर वर्षा शुरू हुई। साहब को बड़ी चिंता लगी। अबकी बार साहब घर में चुप न बैठ सके। उन्होंने मधुरांतकम में अपना पड़ाव डाला। एक रात को बहुत जोर से पानी बरस रहा था। इतने जोर से वृष्टि हो रही थी कि उस समय बाहर निकलना भी बहुत कठिन था। साहब बहुत अधीर हो उठे। उनको जरा भी चैन न मिला। वे तुरंत हाथ में छतरी लेकर झील की तरफ लपके। उनके दो नौकर, जो उस समय जाग रहे थे, पीछे-पीछे चले। उनको साहब के काम पर बड़ा अचरज हो रहा था।
साहब झील के बांध पर आकर खड़े हो गये। आकाश से मूसलाधार वृष्टि हो रही थी। रह-रहकर बिजली चमकती थी। बिजली के प्रकाश में साहब ने देखा कि झील पानी से ठसाठस भरी है। अब यदि थोड़ा भी जल उसमें ज्यादा पड़ जाएगा तो बस, सारा परिश्रम व्यर्थ हो जायेगा।
साहब घबड़ाये हुए वहाँ आकर खड़े हो गये, जहाँ हर साल बांध टूटता था। लेकिन वहाँ उन्हें कहीं टूट जाने का कोई लक्षण नहीं दिखाई पड़ा। अकस्मात् वहाँ बिजली की रोशनी दीख पड़ी। उस तेज:पुंज के बीच में श्याम और गौर वर्ण के दो सुन्दर युवक हाथ में धनुष-बाण लिए खड़े नजर आये। उन दोनों के सुन्दर और सुदृढ़ शरीर और उनके अनुपम रूप-लावण्य को देखकर साहब को बड़ा अचंभा हुआ। एक साथ आश्चर्य और भय का अनुभव होने लगा। वे एकाग्र दृष्टि से उसी तरफ देखने लगे, जहाँ दोनों वीर खड़े थे। अब साहब को पक्का विश्वास हो गया कि वे दोनों अलौकिक और अतुलनीय हैं। साहब अपनी छतरी और टोपी दूर फेंक कर उन करुणा मूर्तियों के पैरों पर गिर पड़े और हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगे।
नौकरों को साहब का यह अद्भुत आचरण देखकर संदेह हुआ कि कहीं हमारे साहब पागल तो नहीं हो गये। वे दोनों दौड़कर साहब के पास आये और घबड़ाये हुए से पूछने लगे– 'साहब! आपको क्या हो गया?" साहब उन लोगों से गद्गद स्वर में कहने लगे- 'नादानो। उधर देखते नहीं हो ?' देखो उधर, उधर ! कैसे सुन्दर दो सुन्दर और बलवान् युवक हाथों में धनुष-बाण लिये खड़े हैं। उनके चारों ओर बिजली की रोशनी सी  फैल रही है। उनमें एक हैं श्याम वर्ण के और दूसरे गौर वर्ण के। उनकी आँखों से करुणा की मानो वर्षा हो रही है। उनको देखते ही हमारी व्यग्रता मिटती जा रही है। अभी उन दोनों को देख लो। उधर देखो, उधर !!!'
नौकरों को कुछ भी दिखाई नहीं पड़ा। साहब को पूरा विश्वास हो गया कि स्वयं श्री रामचन्द्रजी और लक्ष्मण जी ने ही झील की रक्षा की। दूसरे दिन सवेरे ही मधुरांतकम के लोगों ने पहली बार देखा कि झील पानी से परिपूर्ण है। लोगों के आनन्द की कोई सीमा न थी। साहब ने अपने कथनानुसार दूसरे ही दिन से श्रीसीताजी के मंदिर का काम शुरू कर दिया। जब तक मंदिर का काम पूरा न हुआ, तब तक वे वहीं रहे। जिस दिन झील की रक्षा हुई, उस दिन से वहाँ के श्री रामचंद्र जी का नाम पड़ा 'एरि कात्त पेरुमाल' अर्थात 'भगवान जिसने झील की रक्षा की है।'
श्री जानकी जी के मंदिर में एक पत्थर पर तमिल में यह बात खुदी हुई है, जिसके माने यह है कि, 'यह धर्म कार्य जान कंपनी की जागीर - कलेक्टर लियानल प्राइसका है।' इस विचित्र घटना से हम लोगों को मालूम होता है कि एक अंग्रेज ईसाई सज्जन श्री रामचंद्र जी के भक्त बनकर उनके दर्शन पा सके और श्रीसीता जी के मन्दिर के निर्माता बने। जो मनुष्य भगवान का सच्चा भक्त है और भगवान पर विश्वास करके उनको मानता है, वह चाहे जिस कुल का भी क्यों न हो, उसपर दया सिन्धु भगवान की पूर्ण रूप से अनुकम्पा रहती है।

संकलन


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