जानिये पैन कार्ड के बारे में (Know About PAN Card)



परमानेंट अकाउंट नम्बर कार्ड (PAN) आयकर विभाग द्वारा निर्गत 10 अंकों के अल्फा न्युमेरिक नम्बर युक्त एक फोटो पहचान पत्र है, जिसमें प्रत्येक कार्डधारी के लिए आवंटित की जाती है। आयकर के समुचित प्रबंधन के साथ साथ पैन टैक्स की चोरी और ब्लैकमनी पर नियंत्रण लगाने के लिए सबसे असरदार हथियार साबित हुआ है। इसका इसका विधयिक नियन्त्र भारत सरकार के वित्त मंत्रालय द्वारा किया जाता है और आयकर रिटर्न फ़ाइल करते समय पैन नंबर का उल्लेख करना आवश्यक होता है। इसके अलावे, पैन का उपयोग बैंक में खाता खुलवाने, पासपोर्ट बनवाने, ट्रेन में ई-टिकट के साथ यात्रा करते समय पहचान पत्र के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।
नया पैन कार्ड (PAN card) बनवाने जा रहे लोगों के लिए अच्‍छी और बड़ी खबर है कि अब पैनकार्ड के लिए 15 से 20 दिनों का इंतजार करने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी। अब मात्र 3 से 4 दिनों के भीतर आवेदनकर्ता को पैनकार्ड मिल जाएगा। इसके लिए पैन नंबर को आधार कार्ड से जोड़ा जा रहा है। जिसके चलते अब पैन कार्ड के लिए एप्‍लाई करने वाले व्‍यक्ति की जानकारी आधार कार्ड के जरिए तुरंत वैरिफाई कर ली जाएगी। अभी पैन कार्ड बनवाने में 15 से 20 दिन का समय लगता है। अब एनएसडीएल और यूटीआईएसएल की वेबसाइट पर पैन नंबर के लिए आवेदन देने पर उसे आधार नंबर के जरिए वेरिफाई किया जा सकेगा। ऐसा करने से समय की बचत होगी और आवेदकों को उनका पैन नंबर जल्द से जल्द मिल सकेगा।
जानिये पैन कार्ड के बारे में (Know About <abbr title="Permanent Account Number">PAN</abbr> Card)

पैन का उपयोग इन कार्यों के लिए अनिवार्य रूप से किया जाता है:
  • आयकर (आईटी) रिटर्न दाखिल करने के लिए,
  • शेयरों की खरीद-बिक्री हेतु डीमैट खाता खुलवाने के लिए,
  • एक बैंक खाता से दूसरे बैंक खाता में 50,000 रुपये या उससे अधिक की राशि निकालने अथवा जमा करने अथवा हस्तांतरित करने पर,
  • टीडीएस (टैक्स डिडक्शन एट सोर्स) जमा करने व वापस पाने के लिए।
  • अगर किसी की सालाना आमदनी टैक्सेबल है तो उसे पैन लेना अनिवार्य है। ऐसे लोग अगर एम्प्लॉयर को पैन उपलब्ध नहीं कराते हैं तो एम्प्लॉयर उनका स्लैब रेट या 20 फीसदी में से जो ज्यादा है, उस दर से टीडीएस काट सकता है।
  • आय यदि कर योग्य (टैक्सेबल) नहीं है, तो पैन लेना अनिवार्य नहीं है। फिर भी बैंकिंग और दूसरी तरह के फाइनैंशल ट्रांजैक्शन के मामलों (जैसे : बैंक अकाउंट खोलना, प्रॉपर्टी बेचना-खरीदना, इनवेस्टमेंट करना आदि) में पैन की जरूरत होती है, इसलिए पैन सभी को ले लेना चाहिए।
  • अब म्यूचुअल फंड के सभी निवेशकों को अपने पैन (परमानेंट एकाउंट नंबर) का ब्योरा अनिवार्य तौर पर देना होगा, भले ही निवेश का आकार कितना ही बड़ा या छोटा हो।
पैन कार्ड के लिए कौन आवेदन कर सकता है
  • पत्येक भारतीय नागरिक पैन कार्ड के लिए आवेदन कर सकता है। कोई भी व्यक्ति, फर्म या संयुक्त उपक्रम पैन कार्ड के लिए आवेदन कर सकता है।
  • आवेदक का किसी नौकरी, व्यवसाय या कारोबार से संलग्न रहना आवश्यक नही है
  • इसके लिए कोई न्यूनतम अथवा अधिकतम उम्र सीमा नहीं है। आयु, लिंग, शिक्षा, निवास स्थान पैन कार्ड आवेदन के लिए बाधक नहीं है।
  • बालको और नवजात बच्चों के लिए भी पैन कार्ड बनवाया जा सकता है।
पैन कार्ड आवेदन के लिए आवश्यक दस्तावेज और औपचारिकताये
  • अच्छी गुणवत्ता वाली पासपोर्ट आकार की दो रंगीन फोटो
  • शुल्क के रूप में 94 रुपये का डिमांड ड्राफ्ट या चेक
  • व्यक्तिगत पहचान के प्रमाण की छायाप्रति
  • आवासीय पता के प्रमाण की छायाप्रति
  • पैन कार्ड के लिए व्यक्तिगत पहचान व आवासीय पता पहचान दोनों सूची में से अलग-अलग दो दस्तावेज जमा करना होता है दोनों की सूची अलग से संलग्न है
व्यक्तिगत पहचान के लिए प्रमाण
  • विद्यालय परित्याग प्रमाणपत्र
  • मैट्रिक का प्रमाणपत्र
  • मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थान की डिग्री
  • डिपोजिटरी खाता विवरण
  • क्रेडिट कार्ड का विवरण
  • बैंक खाते का विवरण/ बैंक पासबुक
  • पानी का बिल
  • राशन कार्ड
  • संपत्ति कर मूल्यांकन आदेश
  • पासपोर्ट
  • मतदाता पहचान पत्र
  • ड्राइविंग लाइसेंस
  • सांसद अथवा विधायक अथवा नगरपालिका पार्षद अथवा राजपत्रित अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित पहचान प्रमाण पत्र। 
आवासीय पता के प्रमाण के लिए
  • बिजली बिल
  • टेलीफोन बिल
  • डिपोजिटरी खाता विवरण
  • क्रेडिट कार्ड का विवरण
  • बैंक खाता विवरण/ बैंक पास बुक
  • घर किराये की रसीद
  • नियोक्ता का प्रमाणपत्र
  • पासपोर्ट
  • मतदाता पहचान पत्र
  • संपत्ति कर मूल्यांकन आदेश
  • ड्राइविंग लाइसेंस
  • राशन कार्ड
  • सांसद अथवा विधायक अथवा नगरपालिका पार्षद अथवा राजपत्रित अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित पहचान प्रमाण पत्र।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि यदि आवासीय पता के प्रमाण के लिए क्रम संख्या 1 से 7 तक में उल्लिखित दस्तावेज का उपयोग जा रहा हो, तो वह जमा करने की तिथि से छः माह से अधिक पुराना नहीं होनी चाहिए।

पैन कार्ड के लिए शुल्क व भुगतान की प्रक्रिया
  • पैन आवेदन के लिए शुल्क 94 रुपये है (85.00 रुपये + 10.3% सेवा शुल्क)
  • शुल्क का भुगतान डिमांड ड्राफ्ट, चेक अथवा क्रेडिट कार्ड द्वारा किया जा सकता है,
  • डिमांड ड्राफ्ट या चेक NSDL- PAN के नाम से बना हों,
  • डिमांड ड्राफ्ट मुम्बई में भुगतेय होनी चाहिए और डिमांड ड्राफ्ट के पीछे आवेदक का नाम तथा पावती संख्या लिखा होना चाहिए,
चेक द्वारा शुल्क का भुगतान करनेवाले आवेदक देशभर में एचडीएफसी बैंक के किसी भी शाखा (दहेज को छोड़कर) पर भुगतान कर सकते हैं। आवेदक को जमा पर्ची पर NSDLPAN का उल्लेख करनी चाहिए। 

पैन कार्ड के लिए आवेदन की मानवीय प्रक्रिया 
  • यहाँ क्लिक कर आवेदन पत्र संख्या 49A प्राप्त करें,
  • आवेदन पत्र को काली स्याही वाले बॉल पेन से भरें और अपना रंगीन फोटो चिपकाकर दिए गए बॉक्स में हस्ताक्षर करें,
  • प्रपत्र संख्या 49 ए को भरने के लिए जरूरी मार्ग-निर्देश के लिए यहाँ क्लिक करें,
  • आवश्यक दस्तावेज (व्यक्तिगत पहचान व आवासीय पता का प्रमाणपत्र) तथा आवेदन शुल्क के लिए बैंक ड्राफ्ट या चेक फॉर्म के साथ नत्थी करें,
  • अपने निकटतम पैन जमा केन्द्र पर जाकर आवेदन जमा करें,
  • अपने नजदीकी पैन आवेदन संग्रह केन्द्र का पता जानने के लिए यहाँ क्लिककरें।
  • यदि आपने पूर्व में पैन आवेदन किया है तो उसकी वर्तमान स्थिति जानिय, अथवा NSDL TIN
  • यदि आपका पैन कार्ड खो गया है और आपको अपना पैन नम्बर नहीं पता है तो पुनः आवेदन हेतु अपना पुराना पैन नम्बर जानिये.

पैन कार्ड से संबंधित ऑनलाइन सेवाएँ
पैन कार्ड के लिए ऑनलाइन आवेदन: 


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मनुस्मृति वर्णित विवाह



वि’ उपसर्गपूर्वक ‘वह्’ प्रापणे धातु से घ प्रत्यय के योग से विवाह शब्द निष्पन्न होता है। विवाह अर्थात् विशिष्ट ढंग से कन्या को ले जाना। विवाह-सम्बन्धी शब्द परिणय या परिणयन (अग्नि की प्रदक्षिणा करना) एवं पाणिग्रहण कन्या का हाथ पकड़ना) विवाह सम्बन्धी शब्द है यद्यपि ये शब्द विवाह संस्कार का केवल एक-एक तत्व बताते हैं। संस्कार शब्द पहले स्पष्ट किया जा चुका है विवाह संस्कार अर्थात् वर व वधू के शरीर व आत्मा को सुविचारों से अलंकृत कर इस योग्य बनाना कि वो गृहस्थाश्रम का निर्वहण कर सकें। आज विवाह संस्कार एक संस्कार न होकर परम्परा का निर्वहण मात्र रह गया है। इस संस्कार की मर्यादा आज छिन्न-भिन्न हो गयी है परिणामतः गृहस्थ जीवन में स्वर्ग जैसा सुख अब दिखाई नहीं पड़ता।  गृह्यसूत्रों, धर्मसूत्रों एवं स्मृतियों के काल से ही विवाह आठ प्रकार के कहे गये हैं- 
ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथाऽसुरः।
गान्धर्वोराक्षश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः।। मनुस्मृति 3/21
अर्थात् ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गन्धर्व, राक्षस, पैशाच ये विवाह आठ प्रकार के होते हैं। 
महर्षि मनु द्वारा वर्णित विवाह पद्दतियां इस प्रकार हैं-
चतुर्णामपि वर्णानां प्रेत्य चेह हिताहितान |
अश्ताविमान्स मासेन सत्रीविवाहान्निबोधत ||
चारों वर्णों के लिए हित तथा अहित करने वाले इन आठ प्रकार के स्त्रियों से होने वाले विवाहों को संक्षेप से जानो, सुनो


ब्राह्म अथवा स्वयंवर विवाह 
आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुतिशीलवते स्वयं
आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्म: प्रकीर्तित:
कन्या के योग्य सुशील, विद्वान पुरुष का सत्कार करके कन्या को वस्त्रादि से अलंकृत करके उत्तम पुरुष को बुला अर्थात जिसको कन्या ने प्रसन्न भी किया हो उसको कन्या देना - वह 'ब्राह्म' विवाह कहलाता है

दैव विवाह
यज्ञे तु  वितते सम्यगृत्विजे कर्म कुर्वते 
अलं कृत्य सुतादानं दैवं धर्मं प्रचक्षते
विस्तृत यज्ञ में बड़े बड़े विद्वानों का वरण कर उसमे कर्म करने वाले विद्वान् को वस्त्र आभूषण आदि से कन्या को सुशोभित करके देना 'दैव विवाह' कहा जाता है
विशेष टिपण्णी - ऋत्विक  शब्द का अर्थ प्रसंग के अनुकूल किया जाता है और यहाँ प्रसंग के अनुसार विवाह के लिए आए सभी विद्वानों से है न कि  केवल ब्राह्मणों के लिए

आर्ष विवाह
एकं गोमिथुनं द्वे वा वरादादाय धर्मत:
कन्या प्रदानं विधिवदार्षो धर्म: स उच्यते
जो वर से धर्मानुसार एक गाय बैल का जोड़ा अथवा दो जोड़े लेकर विधि अनुसार कन्या का दान करना है वह आर्ष विवाह कहा जाता है

प्राजापत्य विवाह 
सहोभौ चरतां धर्ममिति वाचानुभाष्य च
कन्याप्रदानमभ्यचर्य प्राजापत्यो विधि: स्मृत:
कन्या और वर को, यज्ञशाला में विधि करके सब के सामने 'तुम दोनों मिलके गृहाश्रम के कर्मों को यथावत करो', ऐसा कहकर दोनों की प्रसन्नता पूर्वक पाणिग्रहण होना - वह प्राजापत्य विवाह कहाता है

आसुर विवाह 
ज्ञातिभ्यो द्रविणं दत्त्वा कन्यायै चैव शक्तितः।
कन्याप्रदानं स्वाच्छन्द्यासुरो धर्म उच्यते ।।
वर की जाति वालों और कन्या को यथाशक्ति धन दे कर अपनी इच्छा से अर्थात वर अथवा कन्या की प्रसन्नता और इच्छा की उपेक्षा कर ,के होम आदि विधि कर कन्या देना 'आसुर विवाह' कहलाता है ।

गान्धर्व विवाह 
इच्छयाअन्योन्यसन्योग: कन्यायाश्च यरस्य च। 
गान्धर्व: स तू विज्ञेयी मैथुन्य: कामसंभव: ।।
वर और कन्या की इच्छा से दोनों का संयोग होना और अपने मन में यह मान लेना कि हम दोनों स्त्री पुरुष हैं, ऐसा काम से उत्पन्न विवाह 'गान्धर्व विवाह कहलाता है।

राक्षस विवाह 
हत्वा छित्त्वा च भित्त्वा च क्रोशन्तीं रुदतीं गृहात। 
प्रसह्य कन्याहरणं राक्षसो विधिरुच्यते।।
हनन छेदन अर्थात कन्या के रोकने वालों का विदारण कर के, रोती, कांपती और भयभीत कन्या का घर से बलात अपहरण करके विवाह करना राक्षस विवाह कहा जाता है।

पिशाच विवाह 
सुप्तां मत्तां प्रमत्तां वा रहो यत्रोपगच्छति ।
स पापिष्ठो विवाहानां पैशाचश्चाष्टमोअधम: ।।
जो सोती, पागल हुई अथवा नशे में उन्मत्त हुई कन्या को एकांत पाकर दूषित कर देना है, यह सब विवाहों में नीच से नीच विवाह 'पिशाच विवाह' कहा जाता है।

प्रथम चार विवाह उत्तम हैं
ब्राह्मादिषु विवाहेषु च्तुष् र्वेवानुपूर्वशः।
ब्रह्मवर्चस्विनः पुत्रा जायन्ते शिष्टसंमता ॥
ब्रह्म, दैव, आर्ष तथा प्राजापत्य ; इन चार विवाहों में पाणिग्रहण किए हुए स्त्री पुरुषों से जो सन्तान उत्पन्न होती है वह वेदादि विद्या से तेजस्वी, आप्त पुरुषों के संगति से अत्युत्त्म होती है।

रूपसत्तवोवुणोपेता धनवन्तो यशस्विनः।
पर्याप्तभोगा धर्मिष्ठा जीवन्ति च शतं समाः॥
वे सन्तानें सुन्दर रूप, बल - पराक्रम, शुद्ध बुद्धि आदि उत्तम गुणों से युक्त, बहुधन युक्त, कीर्तिमान और पूर्ण भोग के भोक्ता धर्मात्मा हो कर सौ वर्ष तक जीते हैं।

अन्य चार विवाह अधम अथवा निंदनीय हैं
इतरेषु तु शिष्टेषु नृशंसानृतवादिनः।
जायन्ते दुर्विवाहेषु ब्रह्मधर्मद्विषः सुताः॥
उपरोक्त चार विवाहों से इतर जो अन्य चार - आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच विवाह हैं, इन चार दुष्ट विवाहों से उत्पन्न हुए सन्तान निन्दित कर्मकर्ता, मिथ्यावादी, वेद धर्म के द्वेषी अत्यन्त नीच स्वभाववाले होते हैं ।



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॥ श्री राम चालीसा ॥ (in Hindi Script)



श्री रघुवीर भक्त हितकारी ।  सुन लीजै प्रभु अरज हमारी ।।
निशिदिन ध्यान धरै जो कोई ।  ता सम भक्त और नहिं होई ।।

ध्यान धरे शिवजी मन माहीं ।  ब्रहृ इन्द्र पार नहिं पाहीं ।।
दूत तुम्हार वीर हनुमाना ।  जासु प्रभाव तिहूं पुर जाना ।।

तब भुज दण्ड प्रचण्ड कृपाला ।  रावण मारि सुरन प्रतिपाला ।।
तुम अनाथ के नाथ गुंसाई ।  दीनन के हो सदा सहाई ।।

ब्रहादिक तव पारन पावैं ।  सदा ईश तुम्हरो यश गावैं ।।
चारिउ वेद भरत हैं साखी ।  तुम भक्तन की लज्जा राखीं ।।

गुण गावत शारद मन माहीं ।  सुरपति ताको पार न पाहीं ।।
नाम तुम्हार लेत जो कोई ।  ता सम धन्य और नहिं होई ।।

राम नाम है अपरम्पारा ।  चारिहु वेदन जाहि पुकारा ।।
गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो ।  तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो ।।

शेष रटत नित नाम तुम्हारा ।  महि को भार शीश पर धारा ।।
फूल समान रहत सो भारा ।  पाव न कोऊ तुम्हरो पारा ।।

भरत नाम तुम्हरो उर धारो ।  तासों कबहुं न रण में हारो ।।
नाम शक्षुहन हृदय प्रकाशा ।  सुमिरत होत शत्रु कर नाशा ।।

लखन तुम्हारे आज्ञाकारी ।  सदा करत सन्तन रखवारी ।।
ताते रण जीते नहिं कोई ।  युद्घ जुरे यमहूं किन होई ।।

महालक्ष्मी धर अवतारा ।  सब विधि करत पाप को छारा ।।
सीता राम पुनीता गायो ।  भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो ।।

घट सों प्रकट भई सो आई ।  जाको देखत चन्द्र लजाई ।।
सो तुमरे नित पांव पलोटत ।  नवो निद्घि चरणन में लोटत ।।

सिद्घि अठारह मंगलकारी ।  सो तुम पर जावै बलिहारी ।।
औरहु जो अनेक प्रभुताई ।  सो सीतापति तुमहिं बनाई ।।

इच्छा ते कोटिन संसारा ।  रचत न लागत पल की बारा ।।
जो तुम्हे चरणन चित लावै ।  ताकी मुक्ति अवसि हो जावै ।।

जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरुपा ।  नर्गुण ब्रहृ अखण्ड अनूपा ।।
सत्य सत्य जय सत्यव्रत स्वामी ।  सत्य सनातन अन्तर्यामी ।।

सत्य भजन तुम्हरो जो गावै ।  सो निश्चय चारों फल पावै ।।
सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं ।  तुमने भक्तिहिं सब विधि दीन्हीं ।।

सुनहु राम तुम तात हमारे ।  तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे ।।
तुमहिं देव कुल देव हमारे ।  तुम गुरु देव प्राण के प्यारे ।।

जो कुछ हो सो तुम ही राजा ।  जय जय जय प्रभु राखो लाजा ।।
राम आत्मा पोषण हारे ।  जय जय दशरथ राज दुलारे ।।

ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरुपा ।  नमो नमो जय जगपति भूपा ।।
धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा ।  नाम तुम्हार हरत संतापा ।।

सत्य शुद्घ देवन मुख गाया ।  बजी दुन्दुभी शंख बजाया ।।
सत्य सत्य तुम सत्य सनातन ।  तुम ही हो हमरे तन मन धन ।।

याको पाठ करे जो कोई ।  ज्ञान प्रकट ताके उर होई ।।
आवागमन मिटै तिहि केरा ।  सत्य वचन माने शिर मेरा ।।

और आस मन में जो होई ।  मनवांछित फल पावे सोई ।।
तीनहुं काल ध्यान जो ल्यावै ।  तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै ।।

साग पत्र सो भोग लगावै ।  सो नर सकल सिद्घता पावै ।।
अन्त समय रघुबरपुर जाई ।  जहां जन्म हरि भक्त कहाई ।।

श्री हरिदास कहै अरु गावै ।  सो बैकुण्ठ धाम को पावै ।।


।। दोहा ।।

सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय ।  हरिदास हरि कृपा से, अवसि भक्ति को पाय ।।
राम चालीसा जो पढ़े, राम चरण चित लाय ।  जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्घ हो जाय ।।

इन्हें भी पढ़े:

श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भव भय दारुणं ।


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श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भव भय दारुणं ।



Shri Raam -Balak Raam with his mother



श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भव भय दारुणं ।
नवकंज-लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुणं ॥
कन्दर्प अगणित अमित छवि नवनील-नीरद सुन्दर ।
पटपीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं ॥

भजु दीन बन्धु दिनेश दानव दैत्यवंश-निकन्दनं ।
रघुनन्दन आनन्द कंद कौशलचन्द दशरथ्-नन्दनं ॥
सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारु अंग विभूषणं ।
आजानु-भुज-शर-चाप-धर- संग्राम जित-खरदूषणं ॥

इति वदति तुलसीदास शंकर-शेष-मुनि-मन-रंजन ।
मम हृदय-कंज निवास कुरु कामादि खलदल-गंजन ॥
मनु हाहिं राचेऊ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो ।
करुणा निधाअन सुजान सील सनेह जानत रावरो ॥

एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषी अली ।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली ॥


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उच्च न्यायालय न्यायाधीश का स्थानान्तरण अवधि तक बहिष्कार



उत्तर प्रदेश में अधिवक्ताओ के उत्पीड़न व हत्या के विरोध में उ० प्र० बार कौंसिल के द्वारा आहूत कि गयी हड़ताल के दौरान इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायाधीश सुनील अम्बानी द्वारा विरुद्ध कोर्ट रूम में अधिवक्ताओं के विरुद्ध अपशब्दों का उपयोग किया गया.. जिसके खिलाफ़ हाई कोर्ट बार एसोशिएशन द्वारा निम्न प्रस्ताव पारित किया गया.
  • न्यायाधीश सुनील अम्बानी की अदालत का उनके स्थानान्तरण अवधि तक बहिष्कार किया जायेगा.
  • न्यायाधीश सुनील अम्बानी के खिलाफ़ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही किया जायेगा.
  • उनकी सम्पत्ति की सीबीआई जाँच हो.
  • उनके परिवार के सदस्यों की सम्पत्ति की सीबीआई जाँच हो.
किसी न्यायाधीश द्वारा अधिवक्ताओं अपमान करना अनुचित व विधि विरूद्ध है, यह प्रस्ताव खुले मंच पर सर्व सम्मति से अधिवक्ताओं द्वारा पारित किया..


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करवा चौथ (Karwa Chauth)



करवा चौथ की पौराणिक कथा केअनुसार एक समय की बात है, जब नीलगिरी पर्वत पर पांडव पुत्र अर्जुन तपस्या करने गए। तब किसी कारणवश उन्हें वहीं रूकना पड़ा। उन्हीं दिनों पांडवों पर गहरा संकट आ पड़ा। तब चिंतित व शोकाकुल द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान किया तथा कृष्‍ण के दर्शन होने पर पांडवों के कष्टों के निवारण हेतु उपाय पूछा।

तब कृष्ण बोले- हे द्रौपदी!मैं तुम्हारी चिंता एवं संकट का कारण जानता हूं। उसके लिए तुम्हें एक उपाय करना होगा। जल्दी ही कार्तिक माह की कृष्ण चतुर्थी आने वाली है, उस दिन तुम पूरे मन से करवा चौथ का व्रत रखना। भगवान शिव, गणेश एवं पार्वती की उपासना करना, तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जाएंगे तथा सबकुछ ठीक हो जाएगा।

कृष्ण की आज्ञा का पालन कर द्रोपदी ने वैसा ही करवा चौथ का व्रत किया। तब उसे शीघ्र ही अपने पति के दर्शनहुए और उसकी सारी चिंताएं दूर हो गईं।

जब मां पार्वती द्वारा भगवान शिव से पति की दीर्घायु एवं सुख-संपत्ति की कामना की विधि पूछी तब शिव ने 'करवा चौथ व्रत’ रखनेकी कथा सुनाई थी। करवा चौथ का व्रत करने के लिए श्रीकृष्ण ने दौपदी को निम्न कथा का उल्लेख किया था।

पुराणों के अनुसार करवा नाम की एक पतिव्रता धोबिन अपने पति के साथ तुंगभद्रा नदी के किनारे स्थित गांव में रहती थी। उसका पति बूढ़ा और निर्बल था। एक दिनजब वह नदी के किनारे कपड़े धो रहा था तभी अचानक एक मगरमच्छ वहां आया, और धोबी के पैर अपने दांतों में दबाकर यमलोक की ओर ले जाने लगा। वृद्ध पति यह देख घबराया और जब उससे कुछ कहतेनहीं बना तो वह करवा..! करवा..! कहकर अपनी पत्नी को पुकारने लगा।

ND पति की पुकार सुनकर धोबिन करवा वहां पहुंची, तो मगरमच्छ उसके पति को यमलोक पहुंचाने ही वाला था। तब करवा ने मगर को कच्चे धागे से बांध दिया और मगरमच्छ कोलेकर यमराज के द्वार पहुंची। उसने यमराज से अपने पति की रक्षा करने की गुहार लगाई और साथ ही यह भीकहा की मगरमच्छ को उसके इस कार्य के लिए कठिन से कठिन दंड देने का आग्रह किया और बोली- हे भगवन्! मगरमच्छ नेमेरे पति के पैर पकड़ लिए है। आप मगरमच्छ को इस अपराधके दंड-स्वरूप नरक भेज दें।

करवा की पुकार सुन यमराज नेकहा- अभी मगर की आयु शेष है, मैं उसे अभी यमलोक नहींभेज सकता। इस पर करवा ने कहा- अगर आपने मेरे पति को बचाने में मेरी सहायता नहीं कि तो मैं आपको श्राप दूंगी और नष्ट कर दूँगी।

करवा का साहस देख यमराज भी डर गए और मगर को यमपुरी भेजदिया। साथ ही करवा के पति को दीर्घायु होने का वरदान दिया। तब से कार्तिक कृष्ण की चतुर्थी को करवा चौथ व्रत का प्रचलन में आया। जिसे इस आधुनिक युग में भी महिलाएं अपने पूरी भक्ति भाव के साथ करती है और भगवान से अपनी पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं।


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अध्धयन के लिए दिशा विचार



पढ़ाई की दिशा उत्तर-पूर्व
वर्तमान युग प्रतियोगिता का है यहाँ छोटी से छोटी कक्षा से लेकर बड़े से बड़े व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में कड़ी प्रतिस्पर्धा है। पढ़ाई और मेहनत तो सभी करते हैं लेकिन पढ़ाई में यदि हम उचित दिशा का ज्ञान भी शामिल कर लें तो बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। पर बच्चों को पढ़ाई के लिए बैठाते समय हम इस महत्वपूर्ण बात को भूल ही जाते हैं कि उसे किस दिशा की ओर मुँह कर के पढ़ने बैठाना है। साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पढ़ाई का स्थान कहाँ होना चाहिए जिससे पढ़ाई सुचारु रुप से व निर्विघ्न संपन्न हो और परीक्षा में उत्तम से उत्तम परिणाम आएँ।
 
जो युवक-युवतियाँ पश्चिम की ओर मुंँह कर के पढ़ते हैं, देखा गया है कि उनका पढ़ाई में मन नहीं लगता। यदि वे पढ़ते भी हैं तो उत्तम परिणाम नहीं मिल पाते। पश्चिम दिशा ढलती हुई शाम की तरह चेतना में सुस्तपन को विकसित करती है। दक्षिण दिशा भी पढ़ाई हेतु उपयुक्त नहीं रहती, क्योंकि यह दिशा हमेशा निराशा का संचार कराती है। मन बेचैन रहता है, पढ़ने में भी मन नहीं लगता। परिणाम तो वे लोग भलीभाँति जानते होंगे जो दक्षिण ओर मुँह करके पढ़ते हैं।
 
उचित प्रकाश में ठंडे पानी से हाथ-मुँह धो कर जहाँ तक हो सके खुशबूदार अगरबत्ती लगाकर उत्तर की ओर मुँह करके पढ़ने से एक तो पढ़ाई के क्षेत्र में उन्नति होती है वहीं पढ़ा हुआ भी याद रहता है। और फिर परिणाम तो उत्तम ही रहेंगे। यदि सदा ही पूर्व दिशा की ओर मुँह करके पढ़ाई की जाए तो सदैव उत्तम परिणाम के साथ-साथ आगे बढ़ने के अवसर भी आते हैं।
 
पूर्व दिशा से ही नई चेतना व स्फूर्ति का संचार होता है और सूर्योदय इसी दिशा में होने के कारण सूर्य की तरह उन्नति पाने के योग बनते हैं। साथ ही उत्तर दिशा शीतलता भी प्रदान करती है और हम जानते ही हैं कि पढ़ाई के लिए दिमाग ठंडा होना आवश्यक है। जब मन स्थिर होगा तो पढ़ाई में अच्छी तरह से ध्यान केंद्रित होगा। इस प्रकार हम अध्ययन के लिए बैठक व्यवस्था उत्तर-पूर्व की ओर रखें तो निश्चित ही उत्तम परिणाम पाएँगे और हमारी मेहनत भी रंग लाएगी।


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श्री जगन्नाथ जी की आरती




आरती श्री जगन्नाथ मंगलकारी,
परसत चरणारविन्द आपदा हरी।
निरखत मुखारविंद आपदा हरी,
कंचन धूप ध्यान ज्योति जगमगी।
अग्नि कुण्डल घृत पाव सथरी। आरती..
देवन द्वारे ठाड़े रोहिणी खड़ी,
मारकण्डे श्वेत गंगा आन करी।
गरुड़ खम्भ सिंह पौर यात्री जुड़ी,
यात्री की भीड़ बहुत बेंत की छड़ी। आरती ..
धन्य-धन्य सूरश्याम आज की घड़ी। आरती ..


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श्री कृष्ण की आरती



आरती कुंजविहारी की। श्रीगिरधर कृष्णमुरारी की।
गले में बैजंतीमाला, बजावै मुरली मधुर वाला।
श्रवन में कुण्डल झलकाला, नंदके आनंद नंदलाला। श्री गिरधर ..
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली,
लतनमें ठाढ़े बनमाली।
भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सो झलक,
ललित छवि स्यामा प्यारी की। श्री गिरधर ..
कनकमय मोर-मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसे,
गगन सो सुमन राशि बरसै,
बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालनी संग,
अतुल रति गोपकुमारी की। श्री गिरधर ..
जहां ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा,
स्मरन ते होत मोह-भंगा,
बसी शिव सीस, जटा के बीच, हरै अध कीच,
वरन छवि श्रीबनवारीकी। श्री गिरधर ..
चमकती उ"वल तट रेनू, बज रही वृन्दावन बेनू,
चहूं दिसि गोपी ग्वाल धेनू,
हँसत मृदु नँद, चाँदनी चंद, कटत भव-फंद,
टेर सुनु दीन भिखारी की। श्री गिरधर ..
आरती कुंजबिहारी की। श्री गिरधर कृष्णमुरारी की।


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श्री गणेश चालिसा (Shri Ganesh Chalisa)




जय गणपति सदगुण सदन,
कविवर बदन कृपाल,
विघ्न हरण मंगल करन,
जय जय गिरिजालाल

जय जय जय गणपति गणराजू,
मंगल भरण करण शुभः काजू,
जय गजबदन सदन सुखदाता,
विश्व विनायका बुद्धि विधाता

वक्रतुंडा शुची शुन्दा सुहावना,
तिलका त्रिपुन्दा भाल मन भावन,
राजता मणि मुक्ताना उर माला,
स्वर्ण मुकुता शिरा नयन विशाला

पुस्तक पानी कुथार त्रिशूलं,
मोदक भोग सुगन्धित फूलं,
सुन्दर पीताम्बर तन साजित,
चरण पादुका मुनि मन राजित

धनि शिव सुवन शादानना भ्राता,
गौरी लालन विश्व-विख्याता,
रिद्धि सिद्धि तव चंवर सुधारे,
मूषका वाहन सोहत द्वारे

कहूं जन्मा शुभ कथा तुम्हारी,
अति शुची पावन मंगलकारी,
एक समय गिरिराज कुमारी,
पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा,
तब पहुँच्यो तुम धरी द्विजा रूपा,
अतिथि जानी के गौरी सुखारी,
बहु विधि सेवा करी तुम्हारी

अति प्रसन्ना हवाई तुम वरा दीन्हा,
मातु पुत्र हित जो टाप कीन्हा,
मिलही पुत्र तुही, बुद्धि विशाला,
बिना गर्भा धारण यही काला

गणनायक गुण ज्ञान निधाना,
पूजित प्रथम रूप भगवाना,
असा कही अंतर्ध्याना रूप हवाई,
पालना पर बालक स्वरूप हवाई

बनिशिशुरुदंजबहितुम थाना,
लखी मुख सुख नहीं गौरी समाना,
सकल मगन सुखा मंगल गावहीं,
नाभा ते सुरन सुमन वर्शावाहीं

शम्भू उमा बहुदान लुतावाहीं,
सुरा मुनिजन सुत देखन आवहिं,
लखी अति आनंद मंगल साजा,
देखन भी आए शनि राजा

निज अवगुण गाणी शनि मन माहीं,
बालक देखन चाहत नाहीं,
गिरिजा कछु मन भेद बढायो,
उत्सव मोरा न शनि तुही भायो

कहना लगे शनि मन सकुचाई,
का करिहौ शिशु मोहि दिखायी,
नहीं विश्वास उमा उर भयू,
शनि सों बालक देखन कह्यौ

पदताहीं शनि द्रिगाकोना प्रकाशा,
बालक सिरा उडी गयो आकाशा,
गिरजा गिरी विकला हवाई धरणी,
सो दुख दशा गयो नहीं वरनी


हाहाकार मच्यो कैलाशा,
शनि कीन्हों लखी सुत को नाशा,
तुरत गरुडा चढी विष्णु सिधाए,
काटी चक्र सो गजशिरा लाये

बालक के धड़ ऊपर धारयो,
प्राण मंत्र पढ़ी शंकर दारयो,
नाम’गणेशा’शम्भुताबकीन्हे,
प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे

बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा,
पृथ्वी कर प्रदक्षिना लीन्हा,
चले शदानना भरमि भुलाई,
रचे बैठी तुम बुद्धि उपाई

चरण मातु-पितु के धारा लीन्हें,
तिनके सात प्रदक्षिना कीन्हें
धनि गणेशा कही शिव हिये हरष्यो,
नाभा ते सुरन सुमन बहु बरसे

तुम्हारी महिमा बुद्धि बढाई,
शेष सहसा मुख सके न गई,
मैं मति हीन मलीना दुखारी,
करहूँ कौन विधि विनय तुम्हारी

भजता ‘रामसुन्दर’ प्रभुदासा,
जगा प्रयागा ककरा दुर्वासा,
अब प्रभु दया दीना पर कीजै,
अपनी भक्ति शक्ति कुछा दीजै

ll दोहा ll

श्री गणेशा यह चालीसा, पाठा कर्रे धरा ध्यान l
नीता नव मंगल ग्रह बसे, लहे जगत सनमाना ll
सम्बन्ध अपना सहस्र दश, ऋषि पंचमी दिनेशा l
पूर्ण चालीसा भयो, मंगला मूर्ती गणेशा ll



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श्री गणेश जी की आरती




Shri Ganesh
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
लडुअन के भोग लागे, सन्त करें सेवा। जय ..
एकदन्त, दयावन्त, चार भुजाधारी।
मस्तक सिन्दूर सोहे, मूसे की सवारी॥ जय ..
अन्धन को आंख देत, कोढि़न को काया।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥ जय ..
हार चढ़े, पुष्प चढ़े और चढ़े मेवा।
सब काम सिद्ध करें, श्री गणेश देवा॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
विघ्न विनाशक स्वामी, सुख सम्पत्ति देवा॥ जय ..
पार्वती के पुत्र कहावो, शंकर सुत स्वामी।
गजानन्द गणनायक, भक्तन के स्वामी॥ जय ..
ऋद्धि सिद्धि के मालिक मूषक सवारी।
कर जोड़े विनती करते आनन्द उर भारी॥ जय ..
प्रथम आपको पूजत शुभ मंगल दाता।
सिद्धि होय सब कारज, दारिद्र हट जाता॥ जय ..
सुंड सुंडला, इन्द इन्दाला, मस्तक पर चंदा।
कारज सिद्ध करावो, काटो सब फन्दा॥ जय ..
गणपत जी की आरती जो कोई नर गावै।
तब बैकुण्ठ परम पद निश्चय ही पावै॥ जय .॥




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श्रीमद्भागवत आरती




आरती अतिपावन पुरान की,
धर्मभक्ति विज्ञान खान की। आरती ..
महापुराण भागवत निर्मल।
शुक मुख विगलित निगम कल्प फल।
परमानन्द सुधा रसमय कल।
लीला रति रस रसनिधान की। आरती ..
कलिमय मथनि त्रिताप निवारिणि।
जन्म मृत्युमय, भव-भयहारिणि।
सेवत सतत सकल सुखकारिणि।
सुमहौषधि हरि चरित गान की। आरती ..
विषय विलास विमोह विनासिनि।
विमल विराग विवेक विकासिनि।
भगवत् तत्व रहस्य प्रकासिनि।
परम ज्योति परमात्मज्ञान की। आरती ..
परमहंस मुनिमन उल्लासिनि।
रसिक हृदय, रसरासि विलासिनि।
मुक्ति-मुक्ति रति प्रेम सुदासिनि।
कथा अकि†चन प्रिय सुजान की। आरती ..


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श्री पार्वती माता की आरती




जय पार्वती माता, जय पार्वती माता।
ब्रह्म सनातन देवी, शुभ फल की दाता॥ जय..
अरिकुल पद्म विनासनि जय सेवक त्राता।
जग जीवन जगदम्बा, हरिहर गुण गाता॥ जय..
सिंह को वाहन साजे, कुण्डल है साथा।
देव वधू जह गावत, नृत्य करत ता था॥ जय..
सतयुग रूपशील अतिसुन्दर, नाम सती कहलाता।
हेमांचल घर जन्मी, सखियन संगराता॥ जय..
शुम्भ निशुम्भ विदारे, हेमांचल स्याता।
सहस्त्र भुज तनु धरि के, चक्र लियो हाथा॥ जय..
सृष्टि रूप तुही है, जननी शिवसंग रंगराता।
नन्दी भृङ्गी बीन लही सारा मदमाता॥ जय..
देवन अरज करत हम चित को लाता।
गावत दे दे ताली, मन में रङ्गराता॥ जय..
श्री प्रताप आरती मैया की, जो कोई गाता।
सदासुखी नित रहता सुख सम्पत्ति पाता॥ जय..


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श्री दुर्गा जी की आरती




जगजननी जय! जय! माँ! जगजननी जय! जय!
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय। जगजननी ..
तू ही सत्-चित्-सुखमय, शुद्ध ब्रह्मरूपा।
सत्य सनातन, सुन्दर पर-शिव सुर-भूपा॥ जगजननी ..
आदि अनादि, अनामय, अविचल, अविनाशी।
अमल, अनन्त, अगोचर, अज आनन्दराशी॥ जगजननी ..
अविकारी, अघहारी, अकल कलाधारी।
कर्ता विधि, भर्ता हरि, हर संहारकारी॥ जगजननी ..
तू विधिवधू, रमा, तू उमा महामाया।
मूल प्रकृति, विद्या तू, तू जननी जाया॥ जगजननी ..
राम, कृष्ण तू, सीता, ब्रजरानी राधा।
तू वा†छाकल्पद्रुम, हारिणि सब बाघा॥ जगजननी ..
दश विद्या, नव दुर्गा नाना शस्त्रकरा।
अष्टमातृका, योगिनि, नव-नव रूप धरा॥ जगजननी ..
तू परधामनिवासिनि, महाविलासिनि तू।
तू ही श्मशानविहारिणि, ताण्डवलासिनि तू॥ जगजननी ..
सुर-मुनि मोहिनि सौम्या, तू शोभाधारा।
विवसन विकट सरुपा, प्रलयमयी, धारा॥ जगजननी ..
तू ही स्नेहसुधामयी, तू अति गरलमना।
रत्नविभूषित तू ही, तू ही अस्थि तना॥ जगजननी ..
मूलाधार निवासिनि, इह-पर सिद्धिप्रदे।
कालातीता काली, कमला तू वरदे॥ जगजननी ..
शक्ति शक्तिधर तू ही, नित्य अभेदमयी।
भेद प्रदर्शिनि वाणी विमले! वेदत्रयी॥ जगजननी ..
हम अति दीन दु:खी माँ! विपत जाल घेरे।
हैं कपूत अति कपटी, पर बालक तेरे॥ जगजननी ..
निज स्वभाववश जननी! दयादृष्टि कीजै।
करुणा कर करुणामयी! चरण शरण दीजै॥ जगजननी .. (द्बद्ब)
अम्बे तू है जगदम्बे, काली जय दुर्गे खप्पर वाली।
तेरे ही गुण गाएं भारती॥


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शास्त्रोक्त धर्म



स्वयम्भू मनु ने धर्म के दस लक्षण बताये हैं:

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो , दशकं धर्म लक्षणम् ॥
( धृति (धैर्य) , क्षमा (दूसरों के द्वारा किये गये अपराध को माफ कर देना, क्षमाशील होना) , दम (अपनी वासनाओं पर नियन्त्रण करना) , अस्तेय (चोरी न करना), शौच (अन्तरङ्ग और बाह्य शुचिता), इन्द्रिय निग्रहः (इन्द्रियों को वश मे रखना), धी (बुद्धिमत्ता का प्रयोग) , विद्या (अधिक से अधिक ज्ञान की पिपासा) , सत्य (मन वचन कर्म से सत्य का पालन) और अक्रोध (क्रोध न करना) ; ये दस धर्म के लक्षण हैं।)
जो अपने अनुकूल न हो वैसा व्यवहार दूसरे के साथ न करना चाहिये - यह धर्म की कसौटी है।

श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चैव अनुवर्त्यताम् ।
आत्मनः प्रतिकूलानि , परेषां न समाचरेत् ॥
(धर्म का सर्वस्व क्या है, सुनो और सुनकर उस पर चलो ! अपने को जो अच्छा न लगे, वैसा आचरण दूसरे के साथ नही करना चाहिये । )



धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यः मानो धर्मो हतोवाधीत् ॥

(धर्म उसका नाश करता है जो उसका (धर्म का ) नाश करता है | धर्म उसका रक्षण करता है जो उसके रक्षणार्थ प्रयास करता है | अतः धर्मका नाश नहीं करना चाहिए | ध्यान रहे धर्मका नाश करनेवालेका नाश, अवश्यंभावी है। )

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मधुराष्टकं Madhurashtakam




madhurashtakam

अधरं मधुरं वदनं मधुरं, नयनं मधुरं हसितं मधुरं।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥१॥

अधर, वदन नयना अति मधुरा, स्मित मधुर, हृदय अति मधुरा
चाल मधुर, सब कुछ मधु मधुरा, हे मधुराधिपते! मधु मधुरा

वचनं मधुरं चरितं मधुरं, वसनं मधुरं वलितं मधुरं ।
चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥२॥

चरित मधुर, वचनं अति मधुरा, भेष मधुर, वलितं अति मधुरा
चाल मधुर अति, भ्रमण भी मधुरा, हे मधुराधिपते! मधु मधुरा

वेणुर्मधुरो रेनुर्मधुरः, पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ ।
नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥३॥

मधुरं वेणु , चरण रज मधुरा, पाद पाणि दोनों अति मधुरा
मित्र मधुर मधु, नृत्यं मधुरा, हे मधुराधिपते! मधु मधुरा

गीतं मधुरं पीतं मधुरं, भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरं ।
रूपं मधुरं तिलकं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥४॥

गायन मधुर, पीताम्बर मधुरा, भोजन मधुरम, शयनं मधुरा
रूप मधुरतम, तिलकं मधुरा, हे मधुराधिपते! मधु मधुरा

करणं मधुरं तरणं मधुरं, हरणं मधुरं रमणं मधुरं ।
वमितं मधुरं शमितं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥५॥

करम मधुरतम, तारण मधुरा, हरण, रमण दोनों अति मधुरा
परम शक्तिमय मधुरम मधुरा, हे मधुराधिपते! मधु मधुरा

गुंजा मधुरा माला मधुरा, यमुना मधुरा वीचीर्मधुरा ।
सलिलं मधुरं कमलं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥६॥

कुसुम माल, गुंजा अति मधुरा, यमुना मधुरा, लहरें मधुरा
यमुना जल, जल कमल भी मधुरा, हे मधुराधिपते! मधु मधुरा

गोपी मधुरा लीला मधुरा, युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरं।
दृष्टं मधुरं सृष्टं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥७॥

मधुर गोपियाँ, लीला मधुरा, मिलन मधुर भोजन अति मधुरा
हर्ष मधुरतम, शिष्टं मधुरा, हे मधुराधिपते! मधु मधुरा

गोपा मधुरा गावो मधुरा, यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा ।
दलितं मधुरं फ़लितं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥८॥

ग्वाले मधुरम, गायें मधुरा, अंकुश मधुरम, सृष्टिम मधुरा
दलितं मधुरा, फलितं मधुरा, हे मधुराधिपते! मधु मधुरा

- श्री श्री वल्लभाचार्य


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ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।



ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुंडरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतरः शुचिः॥
(हरिभक्तिविलस ३।३७, गरुड़ पुराण)

Whether all places are permeated with purity or with impurity,
whosoever remembers the lotus-eyed Lord (Vishnu, Rama, Krishna) gains inner and outer purity.

चाहे (स्नानादिक से) पवित्र हो अथवा (किसी अशुचि पदार्थ के स्पर्श से) अपवित्र हो, (सोती, जागती, उठती, बैठती, चलती) किसी भी दशा में हो, जो भी कमल कमल नयनी (विष्णु, राम, कृष्ण) भगवान का स्मरण मात्र से वह (उस समय) बाह्म (शरीर) और अभ्यन्तर (मन) से पवित्र होता है |


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महाकालेश्वर मंदिर उज्जैन Mahakaleshwar Temple Ujjain



महाकालेश्वर मंदिर भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मध्यप्रदेश राज्य के उज्जैन नगर में स्थित, महाकालेश्वर भगवान का प्रमुख मंदिर है। पुराणों, महाभारत और कालिदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में इस मंदिर का मनोहर वर्णन मिलता है। स्वयंभू, भव्य और दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव की अत्यंत पुण्यदायी महत्ता है।

मान्यता है कि इसके दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। सावन में तो इसकी छटा देखते ही बनती है। कांवड़ियों के जयकारों और मंदिरों के घंटो से ऐसा प्रतित होता है कि जैसे हम किसी शिवलोक में आ गए हैं।

बम बम भोले के जयकारे
इतिहास से पता चलता है कि उज्जैन में सन् 1107 से 1728 ई. तक यवनों का शासन था। इनके शासनकाल में अवंति की लगभग 4500 वर्षों में स्थापित हिन्दुओं की प्राचीन धार्मिक परंपराएं प्राय: नष्ट हो चुकी थी। लेकिन 1690 ई. में मराठों ने मालवा क्षेत्र में आक्रमण कर दिया और 29 नवंबर 1728 को मराठा शासकों ने मालवा क्षेत्र में अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया।

इसके बाद उज्जैन का खोया हुआ गौरव पुनः लौटा और सन 1731 से 1801 तक यह नगरी मालवा की राजधानी बनी रही। मराठों के शासनकाल में यहाँ दो महत्त्वपूर्ण घटनाएँ घटीं - पहला, महाकालेश्वर मंदिर का पुनिर्नर्माण और ज्योतिर्लिंग की पुनर्प्रतिष्ठा तथा सिंहस्थ पर्व स्नान की स्थापना, जो एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। आगे चलकर राजा भोज ने इस मंदिर का विस्तार कराया।


सावन में लगता है कावड़ियों का मेला
महाशिवरात्रि एवं श्रावण मास में हर सोमवार को इस मंदिर में अपार भीड़ होती है। मंदिर से लगा एक छोटा-सा जलस्रोत है जिसे कोटितीर्थ कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इल्तुत्मिश ने जब मंदिर को तुड़वाया तो शिवलिंग को इसी कोटितीर्थ में फिकवा दिया था। बाद में इसकी पुनर्प्रतिष्ठा करायी गयी। सन 1968 के सिंहस्थ महापर्व के पूर्व मुख्य द्वार का विस्तार कर सुसज्जित कर लिया गया था। इसके अलावा निकासी के लिए एक अन्य द्वार का निर्माण भी कराया गया था।

लेकिन दर्शनार्थियों की अपार भीड़ को दृष्टिगत रखते हुए बिड़ला उद्योग समूह के द्वारा 1980 के सिंहस्थ के पूर्व एक विशाल सभा मंडप का निर्माण कराया। हाल ही में इसके 198 शिखरों पर 16 किलो स्वर्ण की परत चढ़ाई गई है। अब मंदिर में दान के लिए इंटरनेट सुविधा भी चालू की गई है।कहते हैं भोलेनाथ सब की सुनते हैं, इसलिए महाकालेश्वर मंदिर से कोई बी खाली हाथ नहीं लौटता।


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कैलाश मानसरोवर



 
मानसरोवर तिब्बत में स्थित एक झील है। यह झील लगभग 320 वर्ग किलोमाटर के क्षेत्र में फैला हुआ है । इसके उत्तर में कैलाश पर्वत तथा पश्चिम मे रक्षातल झील है । यह समुद्रतल से लगभग 4556 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है । इसकी परिमिति लगभग 88 किलोमीटर है और औसत गहराई 90 मीटर ।


हिन्दू धर्म में इसे लिए पवित्र माना गया है । इसके दर्शन के लिए हज़ारों लोग प्रतिवर्ष कैलाश मानसरोवर यात्रा में भाग लेते है । हिन्दू विचारधारा के अनुसार यह झील सर्वप्रथम भगवान ब्रह्मा के मन में उत्पन्न हुआ था । संस्कृत शब्द मानसरोवर, मानस तथा सरोवर को मिल कर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है - मन का सरोवर । यहां देवी सती के शरीर का दांया हाथ गिरा था। इसलिए यहां एक पाषाण शिला को उसका रूप मानकर पूजा जाता है। यहां शक्तिपीठ है।

अमरनाथ मंदिर के बाद कैलाश मानसरोवर को भगवान शिव का धाम माना गया है. अमरनाथ मंदिर के दर्शनों की तरह यह स्थल भी बेहद दुर्गम स्थान पर स्थित है। मानसरोवर को दूसरा कैलाश पर्वत कहा गया है. भगवान शिव के निवास स्थल के नाम से प्रख्यात यह स्थल अपनी अपरम्पार महिमा के लिये प्रसिद्ध है. यह पर्वत कुल मिलाकर 48 किलोमीटर में फैला हुआ है. कैलाश मानसरोवर की यात्रा अत्यधिक कठिन यात्राएं में से एक यात्रा मानी जाती है. इस यात्रा का सबसे अधिक कठिन मार्ग भारत के पडौसी देश चीन से होकर जाता है। यहां की यात्रा के विषय में यह कहा जाता है, कि इस यात्रा पर वहीं लोग जाते है, जिसे भगवान भोलेनाथ स्वयं बुलाते है. यह यात्रा प्रत्येक वर्ष मई से जून माह के मध्य अवधि में होती है. कैलाश मानसरोवर यात्रा की अवधि 28 दिन की होती है।

कैलाश मानसरोवर स्थल धरती पर किसी स्वर्ग से कम नहीं है। इस स्थल के विषय में यह मान्यता है, कि जो व्यक्ति इस स्थल का पानी पी लेता है. उसके लिये भगवान शिव के बनाये स्वर्ग में प्रवेश मिल जाता है. एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान ब्रह्मा जी ने मानसरोवर का निर्माण स्वयं किया था। माता के 51 शक्तिपीठों के अनुसार, इस स्थान पर माता सती का एक हाथ गिरा था। जिसके बाद ही यह झील बनी है. तभी से यह स्थान मात के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।

कैलाश मानसरोवर मंदिर समुद्र स्थल से 4 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है. इतनी ऊंचाई पर होने के कारण यहां के गौरी नामक कुण्ड में सदैव बर्फ जमी रहती है. इस मंदिर के दर्शनों को आने वाले तीर्थयात्री इस बर्फ को हटाकर इस कुंड में  स्नान करना विशेष रुप से शुभ मानते है.  यहां भगवान शिव बर्फ के शिवलिंग के रुप में विराजित है। इस स्थान से भारत में जाने वाली कई महत्वपूर्ण नदियां निकलती है। कैलाश मानसरोवर के जल का पानी पीकर, गौरी कुण्ड में स्थान अवश्य किया जाता है।

इस धार्मिक स्थल की यात्रा करने वाले यात्रियों में न केवल हिन्दू धर्म के श्रद्वालु आते है, बल्कि यहां पर बौद्ध व अन्य धर्म के व्यक्ति भी कैलाश मानसरोवर में स्थित भगवान शिव के दर्शनों के लिये आते है, और पुन्य कमा कर जाते है। इसी स्थान पर एक ताल है, जो राक्षस ताल के नाम से विख्यात है. इस ताल से जुडी एक पौराणिक कथा प्रचलित है, कि यहां पर रावण ने भगवान शिव कि आराधना की थी। रावण राक्षस कुल के थें, इसी कारण इस ताल का नाम "राक्षस ताल" पडा है।

कैलाश मानसरोवर के विषय में कहा जाता है, कि देव ब्रह्मा जी ने सृ्ष्टि की रचना इसी स्थान पर की थी। यहां पर गंगा नदी कैलाश पर्वत से निकलते हुए चार नदियों का रुप लेती है। जिसके उसके चार नाम हो जाते है। मानसरोवर की यात्रा का दृ्श्य बडा ही मनोरम है. यहां पर प्रकृ्ति का रंग गहरा नीला और बेह्द बर्फीला हो जाता है। कैलाश मानसरोवर की यात्रा करने वाले श्रद्वालु यहां आकर कैलाश जी की परिक्रमा अवश्य करते है। कैलाश की परिक्रम करने के बाद मानसरोवर की परिक्रमा की जाती है। यहां के सौन्दर्य को देख कर सभी को इस तथ्य पर विश्वास हो गया कि इस स्थान को ब्रह्माण्ड का मध्य स्थान क्यों कहा जाता है।



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बनें हम धर्मके योगी





बनें हम धर्मके योगी, धरेंगे ध्यान संस्कृति का
उठाकर धर्मका झंडा, करेंगे उत्थान संस्कृति का ।। धृ ||
गलेमें शीलकी माला, पहनकर ज्ञानकी कफनी
पकडकर त्यागका झंडा, रखेंगे मान संस्कृति का ||१||
जलकर कष्टकी होली, ऊठाकर ईष्तकी झोली
जमाकर संतकी टोली, करें ऊत्थान संस्कृति का ||२||
हमारे जन्मका सार्थक, हमारे मोक्षका साधन
हमारे स्वर्गका साधन, करें ऊत्थान संस्कृति का ||3||


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उ.प्र. सरकार का मुस्लिम कब्रिस्तानों की चहारदीवारी शासनादेश वापस



अखिलेश सरकार का एक बार फिर बैक गेयर उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के कब्रिस्तानों की चहारदीवारी बनाकर सुरक्षा करने के लिए राज्य सरकार द्वारा 200 करोड़ स्वीकृत किए जाने के खिलाफ दाखिल जनहित याचिका के बाद उत्तर प्रदेश सरकार याचिका के भावी असर और भद्द पीटने के डर से पूर्व में जारी शासनादेश वापस ले लिया, इससे पहले याची के अधिवक्ता बी एन सिंह ने उक्त जनहित याचिका की नोटिस 5 अक्टूबर को प्रदेश सरकार को दिया था, इस नोटिस के बाद प्रदेश सरकार के अधिवक्ता ने न्यायालय को बताया की
उ.प्र. सरकार का मुस्लिम कब्रिस्तानों की चहारदीवारी शासनादेश वापस
सरकार ने 11 अप्रैल,12 के शासनादेश को रद्द कर 8 अक्टूबर, 12 को नया शासनादेश जारी कर मुस्लिमो के आलावा अल्पसंख्यक समुदाय के सभी कब्रिस्तानों व मरघटों की सुरक्षा को शामिल कर लिया गया है।
सरकार के जवाब के बाद इस मामले की सुनवाई कर रहे कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश अमिताव लाला तथा न्यायमूर्ति अशोक श्रीवास्तव की खंडपीठ ने शासनादेश वापस लिए जाने के बाद बलिया की संघट प्रबंध समिति की जनहित याचिका को अर्थहीन करार दिया। याचिका पर अधिवक्ता बी एन सिंह तथा प्रदेश सरकार के मुख्य स्थायी अधिवक्ता (द्वितीय) कमरुल हसन सिद्दीकी ने पक्ष रखा। याची का कहना था कि सरकार धर्म विशेष के कब्रगाहों की सुरक्षा के लिए सरकारी धन खर्च नहीं कर सकती है प्रदेश सरकार क यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 27 का उल्लंघन है।


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सती शिव की कथा



दक्ष प्रजापति की अनेको पुत्रियां थी। सभी पुत्रियां गुणवती थीं किन्तु  दक्ष के मन में संतोष नहीं था। वे चाहते थे, उनके घर में एक ऐसी पुत्री का जन्म हो, जो शक्ति-संपन्न हो। सर्व-विजयिनी हो। दक्ष एक ऐसी पुत्री के लिए तप करने लगे। तप करते-करते अधिक दिन बीत गए, तो भगवती आद्या ने प्रकट होकर कहा, 'मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूं। मैं स्वयं पुत्री रूप में तुम्हारे यहाँ जन्म लूगीं, मेरा नाम होगा सती। मैं सती के रूप में जन्म लेकर अपनी लीलाओं का विस्तार करूंगी।' फलतः भगवती आद्या ने सती रूप में दक्ष के यहाँ जन्म लिया। सती दक्ष की सभी पुत्रियों में अलौकिक थीं। उन्होंने बाल्यकाल में ही कई ऐसे अलौकिक कृत्य कर दिखाए थे, जिन्हें देखकर स्वयं दक्ष को भी विस्मय की लहरों में डूब जाना पड़ा।

जब सती विवाह योग्य हुई, तो दक्ष को उनके लिए वर की चिंता हुई। उन्होंने ब्रह्मा जी से परामर्श किया। ब्रह्मा जी ने कहा, 'सती आद्या का अवतार हैं। आद्या आदिशक्ति और शिव आदि पुरुष हैं। अतः सती के विवाह के लिए शिव ही योग्य और उचित वर हैं।' दक्ष ने ब्रह्मा जी की बात मानकर सती का विवाह भगवान शिव के साथ कर दिया। सती कैलाश में जाकर भगवान शिव के साथ रहने लगीं। यद्यपि भगवान शिव के दक्ष के जामाता थे, किंतु एक ऐसी घटना घटी जिसके कारण दक्ष के ह्रदय में भगवान शिव के प्रति बैर और विरोध पैदा हो गया। *घटना इस प्रकार थी— एक बार ब्रह्मा ने धर्म के निरूपण के लिए एक सभा का आयोजन किया था। सभी बड़े-बड़े देवता सभा में एकत्र थे। भगवान शिव भी एक ओर बैठे थे। सभा मण्डल में दक्ष का आगमन हुआ। दक्ष के आगमन पर सभी देवता उठकर खड़े हो गए, पर भगवान शिव खड़े नहीं हुए। उन्होंने दक्ष को प्रणाम भी नहीं किया। फलतः दक्ष ने अपमान का अनुभव किया। केवल यही नहीं, उनके ह्रदय में भगवान शिव के प्रति ईर्ष्या की आग जल उठी। वे उनसे बदला लेने के लिए समय और अवसर की प्रतीक्षा करने लगे। भगवान शिव को किसी के मान और किसी के अपमान से क्या मतलब? वे तो समदर्शी हैं। उन्हें तो चारों ओर अमृत दिखाई पड़ता है। जहां अमृत होता है, वहां कडुवाहट और कसैलेपन का क्या काम?

भगवान शिव कैलाश में दिन-रात राम-राम कहा करते थे। सती के मन में जिज्ञासा उत्पन्न हो उठी। उन्होंने अवसर पाकर भगवान शिव से प्रश्न किया, 'आप राम-राम क्यों कहते हैं? राम कौन हैं?' भगवान शिव ने उत्तर दिया, 'राम आदि पुरुष हैं, स्वयंभू हैं, मेरे आराध्य हैं। सगुण भी हैं, निर्गुण भी हैं।' किंतु सती के कंठ के नीचे बात उतरी नहीं। वे सोचने लगीं, अयोध्या के नृपति दशरथ के पुत्र राम आदि पुरुष के अवतार कैसे हो सकते हैं? वे तो आजकल अपनी पत्नी सीता के वियोग में दंडक वन में उन्मत्तों की भांति विचरण कर रहे हैं। वृक्ष और लताओं से उनका पता पूछते फिर रहे हैं। यदि वे आदि पुरुष के अवतार होते, तो क्या इस प्रकार आचरण करते? सती के मन में राम की परीक्षा लेने का विचार उत्पन्न हुआ। सीता का रूप धारण करके दंडक वन में जा पहुंची और राम के सामने प्रकट हुईं। भगवान राम ने सती को सीता के रूप में देखकर कहा, 'माता, आप एकाकी यहाँ वन में कहां घूम रही हैं? बाबा विश्वनाथ कहां हैं?' राम का प्रश्न सुनकर सती से कुछ उत्तर देते न बना। वे अदृश्य हो गई और मन ही मन पश्चाताप करने लगीं कि उन्होंने व्यर्थ ही राम पर संदेह किया। राम सचमुच आदि पुरुष के अवतार हैं। सती जब लौटकर कैलाश गईं, तो भगवान शिव ने उन्हें आते देख कहा, 'सती, तुमने सीता के रूप में राम की परीक्षा लेकर अच्छा नहीं किया। सीता मेरी आराध्या हैं। अब तुम मेरी अर्धांगिनी कैसे रह सकती हो! इस जन्म में हम और तुम पति और पत्नी के रूप में नहीं मिल सकते।' शिव जी का कथन सुनकर सती अत्यधिक दुखी हुईं, पर अब क्या हो सकता था। शिव जी के मुख से निकली हुई बात असत्य कैसे हो सकती थी? शिव जी समाधिस्थ हो गए। सती दुख और पश्चाताप की लहरों में डूबने उतारने लगीं।

उन्हीं दिनों सती के पिता कनखल में बहुत बड़ा यज्ञ कर रहे थे। उन्होंने यज्ञ में सभी देवताओं और मुनियों को आमन्त्रित किया था, किंतु शिव जी को आमन्त्रित नहीं किया था, क्योंकि उनके मन में शिव जी के प्रति ईर्ष्या थी। सती को जब यह ज्ञात हुआ कि उसके पिता ने बहुत बड़े यज्ञ की रचना की है, तो उनका मन यज्ञ के समारोह में सम्मिलित होने के लिए बैचैन हो उठा। शिव जी समाधिस्थ थे। अतः वे शिव जी से अनुमति लिए बिना ही वीरभद्र के साथ अपने पिता के घर चली गईं।

कहीं-कहीं सती के पितृगृह जाने की घटना का वर्णन एक दूसरे रूप में इस प्रकार मिलता है— एक बार सती और शिव कैलाश पर्वत पर बैठे हुए परस्पर वार्तालाप कर रहे थे। उसी समय आकाश मार्ग से कई विमान कनखल कि ओर जाते हुए दिखाई पड़े। सती ने उन विमानों को दिखकर भगवान शिव से पूछा, 'प्रभो, ये सभी विमान किसके है और कहां जा रहे हैं?'
भगवान शकंर ने उत्तर दिया, 'आपके पिता ने यज्ञ की रचना की है। देवता और देवांगनाएं इन विमानों में बैठकर उसी यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए जा रहे हैं।'
सती ने दूसरा प्रश्न किया, 'क्या मेरे पिता ने आपको यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए नहीं बुलाया?'
भगवान शंकर ने उत्तर दिया, 'आपके पिता मुझसे बैर रखते है, फिर वे मुझे क्यों बुलाने लगे?'
सती मन ही मन सोचने लगीं, फिर बोलीं, 'यज्ञ के अवसर पर अवश्य मेरी बहनें आएंगी। उनसे मिले हुए बहुत दिन हो गए। यदि आपकी अनुमति हो, तो मैं भी अपने पिता के घर जाना चाहती हूं। यज्ञ में सम्मिलित हो लूंगी और बहनों से भी मिलने का सुअवसर मिलेगा।'
भगवान शिव ने उत्तर दिया,'इस समय वहां जाना उचित नहीं होगा। आपके पिता मुझसे जलते हैं,हो सकता है वे आपका भी अपमान करें। बिना बुलाए किसी के घर जाना उचित नहीं होता'
भगवान शिव ने उत्तर दिया,'हां, विवाहिता लड़की को बिना बुलाए पिता के घर नहीं जाना चाहिए, क्योंकि विवाह हो जाने पर लड़की अपने पति की हो जाती है। पिता के घर से उसका संबंध टूट जाता है।' किंतु सती पीहर जाने के लिए हठ करती रहीं। अपनी बात बार-बात दोहराती रहीं। उनकी इच्छा देखकर भगवान शिव ने पीहर जाने की अनुमति दे दी। उनके साथ अपना एक गण भी कर दिया, उस गण का नाम वीरभद्र था। सती वीरभद्र के साथ अपने पिता के घर गईं, किंतु उनसे किसी ने भी प्रेमपूर्वक वार्तालाप नहीं किया। दक्ष ने उन्हें देखकर कहा,'तुम क्या यहाँ मेरा अपमान कराने आई हो? अपनी बहनों को तो देखो, वे किस प्रकार भांति-भांति के अलंकारों और सुंदर वस्त्रों से सुसज्जित हैं। तुम्हारे शरीर पर मात्र बाघंबर है। तुम्हारा पति श्मशानवासी और भूतों का नायक है। वह तुम्हें बाघंबर छोड़कर और पहना ही क्या सकता है।' दक्ष के कथन से सती के ह्रदय में पश्चाताप का सागर उमड़ पड़ा। वे सोचने लगीं, ‘उन्होंने यहाँ आकर अच्छा नहीं किया। भगवान ठीक ही कह रहे थे, बिना बुलाए पिता के घर भी नहीं जाना चाहिए। पर अब क्या हो सकता है? अब तो आ ही गई हूं।'
पिता के कटु और अपमानजनक शब्द सुनकर भी सती मौन रहीं। वे उस यज्ञमंडल में गईं जहां सभी देवता और ॠषि-मुनि बैठे थे तथा यज्ञकुण्ड में धू-धू करती जलती हुई अग्नि में आहुतियां डाली जा रही थीं। सती ने यज्ञमंडप में सभी देवताओं के तो भाग देखे, किंतु भगवान शिव का भाग नहीं देखा। वे भगवान शिव का भाग न देखकर अपने पिता से बोलीं, 'पितृश्रेष्ठ! यज्ञ में तो सबके भाग दिखाई पड़ रहे हैं, किंतु कैलाशपति का भाग नहीं है। आपने उनका भाग क्यों नहीं दिया?' दक्ष ने गर्व से उत्तर दिया, 'मै तुम्हारे पति कैलाश को देवता नहीं समझता। वह तो भूतों का स्वामी, नग्न रहने वाला और हड्डियों की माला धारण करने वाला है। वह देवताओं की पंक्ति में बैठने योग्य नहीं हैं। उसे कौन भाग देगा।
सती के नेत्र लाल हो उठे। उनकी भौंहे कुटिल हो गईं। उनका मुखमंडल प्रलय के सूर्य की भांति तेजोद्दीप्त हो उठा। उन्होंने पीड़ा से तिलमिलाते हुए कहा,'ओह! मैं इन शब्दों को कैसे सुन रहीं हूं, मुझे धिक्कार है। देवताओ, तुम्हें भी धिक्कार है! तुम भी उन कैलाशपति के लिए इन शब्दों को कैसे सुन रहे हो, जो मंगल के प्रतीक हैं और जो क्षण मात्र में संपूर्ण सृष्टि को नष्ट करने की शक्ति रखते हैं। वे मेरे स्वामी हैं। नारी के लिए उसका पति ही स्वर्ग होता है। जो नारी अपने पति के लिए अपमानजनक शब्दों को सुनती है, उसे नरक में जाना पड़ता है। पृथ्वी सुनो, आकाश सुनो और देवताओं, तुम भी सुनो! मेरे पिता ने मेरे स्वामी का अपमान किया है। मैं अब एक क्षण भी जीवित रहना नहीं चाहती।' सती अपने कथन को समाप्त करती हुई यज्ञ के कुण्ड में कूद पड़ी। जलती हुई आहुतियों के साथ उनका शरीर भी जलने लगा। यज्ञमंडप में खलबली पैदा हो गई, हाहाकार मच गया। देवता उठकर खड़े हो गए। वीरभद्र क्रोध से कांप उटे। वे उछ्ल-उछलकर यज्ञ का विध्वंस करने लगे। यज्ञमंडप में भगदड़ मच गई। देवता और ॠषि-मुनि भाग खड़े हुए। वीरभद्र ने देखते ही देखते दक्ष का मस्तक काटकर फेंक देया। समाचार भगवान शिव के कानों में भी पड़ा। वे प्रचंड आंधी की भांति कनखल जा पहुंचे। सती के जले हुए शरीर को देखकर भगवान शिव ने अपने आपको भूल गए। सती के प्रेम और उनकी भक्ति ने शंकर के मन को व्याकुल कर दिया। उन शंकर के मन को व्याकुल कर दिया, जिन्होंने काम पर भी विजय प्राप्त की थी और जो सारी सृष्टि को नष्ट करने की क्षमता रखते थे। वे सती के प्रेम में खो गए, बेसुध हो गए।
भगवान शिव ने उन्मत की भांति सती के जले हिए शरीर को कंधे पर रख लिया। वे सभी दिशाओं में भ्रमण करने लगे। शिव और सती के इस अलौकिक प्रेम को देखकर पृथ्वी रुक गई, हवा रूक गई, जल का प्रवाह ठहर गया और रुक गईं देवताओं की सांसे। सृष्टि व्याकुल हो उठी, सृष्टि के प्राणी पुकारने लगे— पाहिमाम! पाहिमाम! भयानक संकट उपस्थित देखकर सृष्टि के पालक भगवान विष्णु आगे बढ़े। वे भगवान शिव की बेसुधी में अपने चक्र से सती के एक-एक अंग को काट-काट कर गिराने लगे। धरती पर इक्यावन स्थानों में सती के अंग कट-कटकर गिरे। जब सती के सारे अंग कट कर गिर गए, तो भगवान शिव पुनः अपने आप में आए। जब वे अपने आप में आए, तो पुनः सृष्टि के सारे कार्य चलने लगे।

धरती पर जिन इक्यावन स्थानों में सती के अंग कट-कटकर गिरे थे, वे ही स्थान आज शक्ति के पीठ स्थान माने जाते हैं। आज भी उन स्थानों में सती का पूजन होता हैं, उपासना होती है। धन्य था शिव और सती का प्रेम। शिव और सती के प्रेम ने उन्हें अमर बना दिया है, वंदनीय बना दिया है।


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वेद- Veda



वेद(४)

1. ऋग्वेद,
2. यजुर्वेदवेद,
3. सामवेद,
4.अथर्ववेद
वेद शब्द संस्कृत भाषा के "विद्" धातु से बना है जिसका अर्थ है: जानना, ज्ञान इत्यादि। वेद हिन्दू धर्म के प्राचीन पवित्र ग्रंथों का नाम है । वेदों को श्रुति भी कहा जाता है, क्योकि पहले मुद्रण की व्यवस्था न होने से इनको एक दुसरे से सुन- सुनकर याद रखा गया इसप्रकार वेद प्राचीन भारत के वैदिक काल की वाचिक/श्रुति = श्रवण परम्परा की अनुपम कृति है जो पीढी दर पीढी पिछले चार-पाँच हजार वर्षों से चली आ रही है । वेद ही हिन्दू धर्म के सर्वोच्च और सर्वोपरि धर्मग्रन्थ हैं ।

वेदों का प्रधान लक्ष्य आध्यात्मिक ज्ञान देना ही है। अतः वेद में कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड - इन दोनों विषयों का सर्वांगीण निरुपण किया गया है। वेदों का प्रारम्भिक भाग कर्मकाण्ड है और वह ज्ञानकाण्ड वाले भाग से अधिक है। जिन अधिकारी वैदिक विद्वानों को यज्ञ कराने का यजमान द्वारा अधिकार प्राप्त होता है, उनको ‘ऋत्विक’ कहते हैं। श्रौतयज्ञ में इन ऋत्विकों के चार गण हैं। (१) होतृगण, (२) अध्वर्युगण, (३) उद्गातृगण तथा (४) ब्रह्मगण। उपर्युक्त चारों गणों के लिये उपयोगी मन्त्रों के संग्रह के अनुसार वेद चार हुए हैं।

(१) ऋग्वेद- इसमें होतृवर्ग के लिये उपयोगी मन्त्रों का संकलन है। इसमें ‘ऋक्’ संज्ञक (पद्यबद्ध) मन्त्रों की अधिकता के कारण इसका नाम ऋग्वेद हुआ। इसमें होतृवर्ग के उपयोगी गद्यात्मक (यजुः) स्वरुप के भी कुछ मन्त्र हैं।

(२) यजुर्वेद- इसमें यज्ञानुष्ठान सम्बन्धी अध्वर्युवर्ग के उपयोगी मन्त्रों का संकलन है। इसमें ‘गद्यात्मक’ मन्त्रों की अधिकता के कारण इसका नाम ‘यजुर्वेद’ है। इसमें कुछ पद्यबद्ध, मन्त्र भी हैं, जो अध्वर्युवर्ग के उपयोगी हैं। यजुर्वेद के दो विभाग हैं- (क) शुक्लयजुर्वेद और (ख) कृष्णयजुर्वेद।

(३) सामवेद- इसमें यज्ञानुष्ठान के उद्गातृवर्ग के उपयोगी मन्त्रों का संकलन है। इसमें गायन पद्धति के निश्चित मन्त्र होने के कारण इसका नाम सामवेद है।

(४) अथर्ववेद- इसमें यज्ञानुष्ठान के ब्रह्मवर्ग के उपयोगी मन्त्रों का संकलन है। अथर्व का अर्थ है कमियों को हटाकर ठीक करना या कमी-रहित बनाना। अतः इसमें यज्ञ-सम्बन्धी एवं व्यक्ति सम्बन्धी सुधार या कमी-पूर्ति करने वाले मन्त्र भी है। इसमें पद्यात्मक मन्त्रों के साथ कुछ गद्यात्मक मन्त्र भी उपलब्ध है। इस वेद का नामकरण अन्य वेदों की भाँति शब्द-शैली के आधार पर नहीं है, अपितु इसके प्रतिपाद्य विषय के अनुसार है। इस वैदिक शब्दराशि का प्रचार एवं प्रयोग मुख्यतः अथर्व नाम के महर्षि द्वारा किया गया। इसलिये भी इसका नाम अथर्ववेद है।



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शिव शून्य हैं



प्रायः हम प्रकाश को सत्य, ज्ञान , शुभ, पून्य तथा सात्विक शक्तियों का द्योतक समझते हैं तथा अंधकार की तुलना अज्ञान, असत्य जैसे अवगुणों से करते हैं| फिर शिव "रात्रि" क्यों? क्यों शिव को अंधकार पसंद है? क्यों महाशिवरात्रि शिव भक्तों के लिए सर्वाधिक महत्व रखता है?

वस्तुतः अंधकार की तुलना अज्ञान तथा अन्य असात्विक गुणों से करना ही सबसे बडी भ्रांति है| वास्तव में अंधकार एवं प्रकाश एक दु्सरे के पुरक हैं जैसे शिव और उनकी सृष्टी | अंधकार शिव हैं, प्रकाश सृष्टी | जो भी हम देखते हैं … धरती, आकाश, सूर्य, चंद्र, ग्रह नक्षत्र, जिव, जंतु, वृक्ष, पर्वत, जलाशय, सभी शिव की सृष्टी हैं, जो नहीं दिखता है वह शिव हैं| जिस किसी का भी श्रोत होता है, आदि होता है, उसकी एक निरधारित आयू होती है तथा उसका अंत भी होता है| प्रकाश का एक श्रोत होता है | प्रकाशित होने के लिए श्रोत स्वयं को जलता है तथा कुछ समय के उपरांत उसकी अंत भी होता है| यह महत्वपूर्ण नहीं है कि प्रकाश का श्रोत क्या है, वह सुर्य सामान विशाल है या दीपक सामान छोटा, अथवा उसकी आयू कितनी है| महत्वपूर्ण यह है कि उसकी एक आयू है| क्योंकि प्रकाश का श्रोत होता है, श्रोत के आभाव में प्रकाश का भी आभाव हो जाता है| आँख के बंद कर लेने से अथवा अन्य उपायों से व्यवधान उत्पन्‍‌न कर पाने कि स्थिति में प्रकाश आलोपित हो सकता है| क्योंकि प्रकाश कृतृम है|

अंधकार अनादि है, अनंन्त है, सर्वव्यापी है| अंधकार का कोई श्रोत नहीं होता अतः उसका अंत भी नहीं होता| कृतृम उपचारों से प्रकाश की उपस्थिति में हमें अंधकार के होने का आभास नहीं होता, पर जैसे ही प्रकाश की आयू समाप्त होती है हम अंधकार को स्थितिवत पाते हैं| अंधकार का क्षय नहीं होता| वह अक्षय होता है| अंधकार स्थायी है| अंधकार शिव तुल्य है|

अंधकार को प्रायः अज्ञान का पार्याय भी गिना जाता है| वास्तव में प्रकाश को हम ज्ञान का श्रोत मानते हैं क्योंकि प्रकाश हमें देखने की शक्ति देता है| पर अगर ध्यान दिया जाय तो प्रकाश में हम उतना ही ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं जितना की प्रकाश की परीधि| विज्ञान प्रकाश है| यही कारण है कि जो विज्ञान नहीं देख सकता उसे वह मानता भी नहीं है| वह तब तक किसी तथ्य को स्वीकार नहीं करता जब तक वह उसके प्रकाश की परीधि में नहीं आ जाती| पर यह तो सिद्ध तथ्य है कि विज्ञान अपने इस विचारधारा के कारण हर बार अपनी ही जीत पर लज्जित हुआ है| क्योंकि हर बार जब विज्ञान ने कुछ ऐसा नया खोजा है जिसे खोज के पहले उसने ही नकारा था तो वस्तुतः उसने स्वयं की विचारधारा की खामियों को ही उजागर किया है| हर खोज विज्ञान की पूरानी धारणा को गलत सिद्ध करती हूई नईं धारणा को प्रकाशित करती है जिसे शायद कूछ समयोपरांत कोई नईं धारणा गलत सिद्ध कर दे| क्या यह भ्रातीं मृगतृष्णा (Mirage) नहीं है? स्मरण रहे मृगतृष्णा (Mirage) प्रकाश अथवा दृष्टी का ही दोष है| अंधकार में देखना कठीन अवश्य है पर उसमें दृष्टी दोष नहीं होता| प्रकाश में देखने में अभ्यस्त हमारी आँखें अंधकार मे सही प्रकार देख नहीं सकतीं पर अंधकार में देखने में अभ्यस्त आँखें प्रकाश में स्वतः ही देख सकती हैं| निर्णय?

जब हमरी मंजिल भौगोलिक होती है नजदीक होती है तो प्रकाश सहायक होता है| पर हिन्दू धर्म, तथा प्रायः हर धर्म एवं आस्था के अनुसार मानव जाति की सर्वोच्च ईच्छा मोक्ष (Salvation) होती है| मोक्ष क्या है? ईच्छाओं का अन्‍त | जब कोई ईच्छा नहीं, कोई मंजिल नहीं कोई जरूरत नहीं तो वहां क्या होगा| अंधकार| सर्वव्यापी एवं अनन्त अंधकार| तब हम शिव को प्राप्त कर लेते हैं| यह तो विज्ञान भी मानेगा की अनेक महत्वपूर्ण खोज स्वपन में हुए हैं | तथा वहाँ अंधकार का सामराज्य है|

सृष्टी विस्तृत है| हमारी विशाल धरती सौर्यमंडल का एक छोटा सा कण मात्र है| सूर्य में सैकडों पृथ्वी समाहित हो सकती हैं| पर सूर्य अपने नवग्रहों तथा उपग्रहों के साथ आकाश गंगा (Milky way galaxy) का एक छोटा तथा गैर महत्वपूर्ण सदस्य मात्र है| आकाश गंगा में एसे सहस्रों तारामंडल विद्यमान हैं| वे सारे विराट ग्रह, नक्षत्र जिनका समस्त ज्ञान तक उपलब्द्ध नहीं हो पाया है शिव की सृष्टी है| पर प्रश्‍न यह है कि यह विशाल सामराज्य स्थित कहाँ है? वह विशाल शून्य क्या है जिसने इस समूचे सृष्टी को धारण कर रखा है? वह विशाल शून्य वह अंधकार पिण्ड शिव है| शिव ने ही सृष्टी धारण कर रखी है| वे ही सर्वसमुद्ध कारण हैं| वे ही संपूर्ण सृष्टी के मूल हैं, कारण हैं|

सहायक होता है| पर हिन्दू धर्म, तथा प्रायः हर धर्म एवं आस्था के अनुसार मानव जाति की सर्वोच्च ईच्छा मोक्ष (Salvation) होती है| मोक्ष क्या है? ईच्छाओं का अन्‍त | जब कोई ईच्छा नहीं, कोई मंजिल नहीं कोई जरूरत नहीं तो वहां क्या होगा| अंधकार| सर्वव्यापी एवं अनन्त अंधकार| तब हम शिव को प्राप्त कर लेते हैं| यह तो विज्ञान भी मानेगा की अनेक महत्वपूर्ण खोज स्वपन में हुए हैं | तथा वहाँ अंधकार का सामराज्य है| सृष्टी विस्तृत है|

हमारी विशाल धरती सौर्यमंडल का एक छोटा सा कण मात्र है| सूर्य में सैकडों पृथ्वी समाहित हो सकती हैं| पर सूर्य अपने नवग्रहों तथा उपग्रहों के साथ आकाश गंगा (Milky way galaxy) का एक छोटा तथा गैर महत्वपूर्ण सदस्य मात्र है| आकाश गंगा में एसे सहस्रों तारामंडल विद्यमान हैं| वे सारे विराट ग्रह, नक्षत्र जिनका समस्त ज्ञान तक उपलब्द्ध नहीं हो पाया है शिव की सृष्टी है| पर प्रश्‍न यह है कि यह विशाल सामराज्य स्थित कहाँ है? वह विशाल शून्य क्या है जिसने इस समूचे सृष्टी को धारण कर रखा है? वह विशाल शून्य वह अंधकार पिण्ड शिव है| शिव ने ही सृष्टी धारण कर रखी है| वे ही सर्वसमुद्ध कारण हैं| वे ही संपूर्ण सृष्टी के मूल हैं, कारण हैं| ईश्वर एक हैं| वे तीन त्रिदेवों अथवा ३३ करोड देवताओं में ही नहीं, अपितू संपूर्ण सृष्टी के कण कण में व्याप्‍त हैं| वे हमारे नश्‍‍वर शरीर के अन्दर की आत्मा हैं| वे हमारे सदविचार हैं|

ब्रह्मा कर्ता हैं, विष्णू कार्य तथा कार्यफल हैं, शिव कारण हैं| त्रिदेव एक वृक्ष के सामन हैं| ब्रह्म उस वृक्ष के तना हैं, विष्णु उस वृक्ष के विस्तार है, डालिया, पत्ते, पूष्प तथा फल सामान हैं| सदाशिव उस वृक्ष के जड हैं| शिव जी की आरती इसी तत्व को संबोधित है| वास्तव में ये त्रिगूण शिव जी की आरती है जिसमे स्पष्ट शब्दों में उलेखित है …

ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव जानत अविवेका|
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका|


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महान संतों और व्यक्तियों की उक्तियाँ एवं अनमोल वचन



  • अगर किसी को कुछ देना है तो उसे अच्छा वक्त दो। क्योंकि आप हर चीज़ वापिस ले सकते हो, मगर किसी को दिया हुआ अच्छा वक्त वापिस नही ले सकते।
  • जिन्दगी में कभी समझौता करना पड़े तो कभी हिचकिचाहट मत रखो, झुकता वही है जिसमें जान होती है, अकड़ ही तो मुर्दे की पहचान होती है।
  • जब छोटे थे तब बड़े होने की बड़ी चाहत थी, पर अब पता चला कि: अधूरे एहसास और टूटे सपनों से, अधूरे होमवर्क और टूटे खिलौने अच्छे थे।
  • जब लोग किसी को पसंद करते हैं, तो उसकी बुराईयाँ भूल जाते हैं, और जब किसी से नफरत करते हैं, तो उसकी अच्छाईयां भूल जाते हैं।
  • इंसान की फितरत को समझते हैं सिर्फ परिंदे..जितना भी मोहब्बत से बुलाओ, मगर पास नहीं आते।
  • इंसान जब तरक्की की चरम सीमा पर होता है, तो लोगों को भूल जाता है और जब बरबादी की चरम सीमा तक आता है, तब तक लोग उसे भूल जाते हैं।
  • हर किसी को अपने ज्ञान का तो अभिमान होता है, मगर अपने अभिमान का ज्ञान नही होता।
  • ज़रा सी देर में, दिल में उतरने वाले लोग; ज़रा सी देर में, दिल से उतर भी जाते हैं।
  • अगर दूसरों को दु:खी देखकर, तुम्हें भी दुःख होता है, तो समझ लो, की भगवान ने तुम्हें इंसान बनाकर कोई गलती नही की है।
  • गर्मी में लड़के ने जब पसीना गर्लफ्रेंड के दुपट्टे से पोंछा, तो वह बोली दुपट्टा गंदा न करोऔर जब लड़के ने माँ के आँचल से पोंछा, तो माँ बोली ये गंदा है साफ़ देती हूँ।
  • इंसान को बादाम खाने से नही, जिन्दगी में ठोकर खाने से अक्ल आती है।
  • यूँ ही रखते रहे बचपन से दिल साफ़ हम अपना, पता नहीं था की कीमत तो चेहरों की होती है।
  • दुनिया में सिर्फ दिल ही है जो बिना आराम किये काम करता है, इसलिए उसे खुश रखो चाहे वो अपना हो या अपनों का।
  • इंसान को इंसान धोखा नहीं देता बल्कि वो उमीदें धोखा देती हैं जो वो दूसरों से रखता है।
  • अगर आप अपनी जिम्मेदारी खुद ले लेते हैं तो आप में अपने सपने सच करने की चाहत अपने आप विकसित हो जाएगी।
  • सच वह दौलत है जिसे पहले खर्च करो और ज़िंदगी भर आनंद करो, झूठ वह क़र्ज़ है जिससे क्षणिक सुख पाओ और ज़िंदगी भर चुकाते रहो।
  • किसी की दृष्टि खराब हो जाये तो उसका उपचार संभव है, किन्तु अगर दृष्टिकोण ही खराब हो जाये तो उसका उपचार संभव नही।
  • यदि आप गुस्से के एक क्षण में धैर्य रखते हैं तो आप दुःख के सौ दिन से बच सकते हैं।
  • ज़िंदगी में जो हम चाहते हैं वो आसानी से नहीं मिलता, लेकिन ज़िंदगी का यह भी एक सच है कि जो हम चाहते वो आसान नहीं होता।
  • इत्र से कपड़ों को महकाना बड़ी बात नहीं, मज़ा तो तब है जब मेरे किरदार से खुशबु आये।
  • अपनी कीमत उतनी रखिये जो अदा हो सके अगर अनमोल हो गए तो तनहा हो जाओगे।
  • लोग प्यार करने के लिए होते हैं और चीज़ें इस्तेमाल करने के लिए, लेकिन असल में हम चीज़ों से प्यार कर रहे हैं का इस्तेमाल!


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नवग्रहस्तोत्रम् (अर्थ सहित) Navgrah Stotram With Meaning




नवग्रहस्तोत्रम्

 जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम् ।

तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम् ..१..

दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम्  ।

नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम् ..२..

धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्.। 

कुमारं शक्ति हस्तं तं मंगलं प्रणमाम्यहम् ..३..

प्रियंगुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम् । 

सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् ..४..

देवानां च ऋषीणां च गुरुं कांचनसन्निभम् । 

बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् ..५..

हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् । 

सर्वशास्त्र प्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् ..६..

नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् । 

छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम् ..७..

अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्यविमर्दनम् । 

सिंहिकागर्भसम्भूतं तं राहुं प्रणमामयम् ..८..

पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम् । 

रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् ..९..

इति व्यासमुखोद्गीतं यः पठेत्सुसमाहितः । 

दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्नशान्तिर्भविष्यति ..१०..

नरनारीनृपाणां च भवेद्दःस्वप्ननाशनम् । 

ऐश्वर्यमतुलं तेषामारोग्यं पुष्टिवर्द्धनम् ..११..

ग्रहनक्षत्रजाः पीडा स्तस्कराग्नि समुद्भवाः .। 

ताः सर्वाः प्रशमं यान्ति व्यासो ब्रूते न संशयः .. १२..

इति श्री वेद व्यास विरचितं नवग्रह स्तोत्रं सम्पूर्णम् । 

अर्थ-
जपा के फूल की तरह जिनकी कान्ति है, कश्यप से जो उत्पन्न हुए हैं,
अन्धकार जिनका शत्रु है, जो सब पापों को नष्ट कर देते हैं, उन सूर्य भगवान् को मैं प्रणाम करता हूँ.१
दही, शंख अथवा हिम के समान जिनकी दीप्ति है, जिनकी उत्पत्ति क्षीर-समुद्र से है, जो शिवजी के मुकुट पर अलंकार की तरह विराजमान रहते हैं, मैं उन चन्द्रदेव को प्रणाम करता हूँ.२ 
 पृथ्वी के उदर से जिनकी उत्पत्ति हुई है, विद्युत्पुंज के समान जिनकी प्रभा है, जो हाथों में शक्ति धारण किये रहते हैं, उन मंगल देव को मैं प्रणाम करता हूँ. ३  
प्रियंगु की कली की तरह जिनका श्याम वर्ण है, जिनके रूप की कोई उपमा नहीं है, उन सौम्य और गुणों से युक्त बुध को मैं प्रणाम करता हूँ. ४
जो देवताओं और ऋषियों के गुरु हैं, कंचन के समान जिनकी प्रभा है, जो बुद्धि के अखण्ड भण्डार और तीनों लोकों के प्रभु हैं, उन बृहस्पति को मैं प्रणाम करता हूँ. ५
तुषार, कुन्द अथवा मृणाल के समान जिनकी आभा है, जो दैत्यों के परम गुरु हैं, उन सब शास्त्रों के अद्वितीय वक्ता शुक्राचार्यजी को मैं प्रणाम करता हूँ. ६
नील अंजन के समान जिनकी दीप्ति है, जो सूर्य भगवान् के पुत्र तथा यमराज के बड़े भ्राता हैं, सूर्य की छाया से जिनकी उत्पत्ति हुई है, उन शनैश्चर देवता को मैं प्रणाम करता हूँ. ७  जिनका केवल आधा शरीर है, जिनमें महान् पराक्रम है, जो चन्द्र और सूर्य को भी परास्त कर देते हैं, सिंहिका के गर्भ से जिनकी उत्पत्ति हुई है, उन राहु देवता को मैं प्रणाम करता हूँ. ८
पलाश के फूल की तरह जिनकी लाल दीप्ति है, जो समस्त तारकाओं में श्रेष्ठ हैं, जो स्वयं रौद्र रूप और रौद्रात्मक हैं, ऐसे घोर रूपधारी केतु को मैं प्रणाम करता हूँ. ९
व्यास के मुख से निकले हुए इस स्तोत्र का जो सावधानतापूर्वक दिन या रात्रि के समय पाठ करता है, उसकी सारी विघ्नबाधायें शान्त हो जाती हैं. १०
संसार के साधारण स्त्री पुरुष और राजाओं के भी दुःस्वप्न जन्य दोष दूर हो जाते हैं. ११
किसी भी ग्रह, नक्षत्र, चोर तथा अग्नि से जायमान पीड़ायें शान्त हो जाती हैं. इस प्रकार स्वयं व्यासजी कहते हैं, इसलिए इसमें कोई संशय नहीं करना चाहिए.१२


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मंगल की मंगलमय भौमवती अमावस्या



जब मंगलवार के दिन अमावस्या आयें, तो उसे भौमवती अमावस्या के नाम से जाना जाता है, अमावस्या तिथि प्रत्येक धर्म कार्य के लिए अक्षय फल देने वाली व अत्यंत पवित्र होती है, साथ ही पितरों की शान्ति के लिये भी अमावस्या व्रत पूजन का विशेष महत्व है। मंगलवार को आने वाली अमावस्या पर पितरों के ऋण पूरे हो जाते हैं और पितर देवता प्रसन्न होकर आशीष देते हैं। उन्होंने बताया कि भौमवती अमावस्या पर गंगा स्नान करने से मंगल ग्रह से ग्रसित जातकों को भी लाभ मिलेगा।
मंगल की मंगलमय भौमवती अमावस्या
मंगलवार को बजरंग बली हनुमान का भी दिवस है। सो, बजरंग बली भी प्रसन्न होंगे। यानी कि भौमवती अमावस्या पर पितरों के निमित पिंडदान और तर्पण को भी खास है। मंगल ग्रह से ग्रसित जातकों के लिए भी और बजरंग बली के भक्तों के लिए भी।


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झासी की रानी की आज पुण्यतिथि (१८ जून) है



अकेले दम पर अंग्रेजो को नाको चने चबवाने वाली झासी की रानी की आज पुण्यतिथि (१८ जून) है, जिन्होंने देश की आजादी की लड़ाई के लिए एक रौशनी दी, वीरांगना रानी झासी को यह देश अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि आर्पित करता है..



आओ झासी की रानी की वीरता को याद करते हुए सुभद्राकुमारी चौहान की निम्न पंक्तिया गुनगुनाए.. 

झाँसी की रानी

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

चमक उठी सन् सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।

वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़|

महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आयी थी झांसी में,

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फ़ौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।

अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात?
जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
'नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।

हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी,

जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।

लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में।

ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।

पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।








Rani Lakshmibai Photo



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महामृत्युंजय मंत्र -- मृत्युंजय महादेव त्राहिमाम शरणागतम् .Maha Mrityunjaya Mantra



महामृत्युंजय (महादेव मंत्र ) का वेदोक्त मंत्र निम्नलिखित है-

त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। 
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌ ॥

इस मंत्र में 32 शब्दों का प्रयोग हुआ है और इसी मंत्र में ॐ' लगा देने से 33 शब्द हो जाते हैं। इसे 'त्रयस्त्रिशाक्षरी या तैंतीस अक्षरी मंत्र कहते हैं। श्री वशिष्ठजी ने इन 33 शब्दों के 33 देवता अर्थात्‌ शक्तियाँ निश्चित की हैं जो कि निम्नलिखित हैं।

इस मंत्र में 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य 1 प्रजापति तथा 1 वषट को माना है। मंत्र विचार : इस मंत्र में आए प्रत्येक शब्द को स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि शब्द ही मंत्र है और मंत्र ही शक्ति है। इस मंत्र में आया प्रत्येक शब्द अपने आप में एक संपूर्ण अर्थ लिए हुए होता है और देवादि का बोध कराता है।
शब्द बोधक शब्द बोधक 'त्र' ध्रुव वसु 'यम' अध्वर वसु 'ब' सोम वसु 'कम्‌' वरुण 'य' वायु 'ज' अग्नि 'म' शक्ति 'हे' प्रभास 'सु' वीरभद्र 'ग' शम्भु 'न्धिम' गिरीश 'पु' अजैक 'ष्टि' अहिर्बुध्न्य 'व' पिनाक 'र्ध' भवानी पति 'नम्‌' कापाली 'उ' दिकपति 'र्वा' स्थाणु 'रु' भर्ग 'क' धाता 'मि' अर्यमा 'व' मित्रादित्य 'ब' वरुणादित्य 'न्ध' अंशु 'नात' भगादित्य 'मृ' विवस्वान 'त्यो' इंद्रादित्य 'मु' पूषादिव्य 'क्षी' पर्जन्यादिव्य 'य' त्वष्टा 'मा' विष्णु 'ऽ' दिव्य 'मृ' प्रजापति 'तात' वषट

इसमें जो अनेक बोधक बताए गए हैं। ये बोधक देवताओं के नाम हैं।
शब्द की शक्ति- शब्द वही हैं और उनकी शक्ति निम्न प्रकार से है-
शब्द शक्ति शब्द शक्ति 'त्र' त्र्यम्बक, त्रि-शक्ति तथा त्रिनेत्र 'य' यम तथा यज्ञ 'म' मंगल 'ब' बालार्क तेज 'कं' काली का कल्याणकारी बीज 'य' यम तथा यज्ञ 'जा' जालंधरेश 'म' महाशक्ति 'हे' हाकिनो 'सु' सुगन्धि तथा सुर 'गं' गणपति का बीज 'ध' धूमावती का बीज 'म' महेश 'पु' पुण्डरीकाक्ष 'ष्टि' देह में स्थित षटकोण 'व' वाकिनी 'र्ध' धर्म 'नं' नंदी 'उ' उमा 'र्वा' शिव की बाईं शक्ति 'रु' रूप तथा आँसू 'क' कल्याणी 'व' वरुण 'बं' बंदी देवी 'ध' धंदा देवी 'मृ' मृत्युंजय 'त्यो' नित्येश 'क्षी' क्षेमंकरी 'य' यम तथा यज्ञ 'मा' माँग तथा मन्त्रेश 'मृ' मृत्युंजय 'तात' चरणों में स्पर्श

यह पूर्ण विवरण 'देवो भूत्वा देवं यजेत' के अनुसार पूर्णतः सत्य प्रमाणित हुआ है।
महामृत्युंजय के अलग-अलग मंत्र हैं। आप अपनी सुविधा के अनुसार जो भी मंत्र चाहें चुन लें और नित्य पाठ में या आवश्यकता के समय प्रयोग में लाएँ। मंत्र निम्नलिखित हैं-
तांत्रिक बीजोक्त मंत्र-ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ ॥
संजीवनी मंत्र अर्थात्‌ संजीवनी विद्या-ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ भूर्भवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनांन्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जूं ह्रौं ॐ ।
महामृत्युंजय का प्रभावशाली मंत्र-ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जूं ह्रौं ॐ ॥

शिव को अति प्रसन्न करने वाला मंत्र है महामृत्युंजय मंत्र। जन साधारण की धारणा है कि इसके जाप से व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती परंतु यह पूरी तरह सही अर्थ नहीं है। महामृत्युंजय का अर्थ है महामृत्यु पर विजय अर्थात् व्यक्ति की बार-बार मृत्यु ना हो। वह मोक्ष को प्राप्त हो जाए। उसका शरीर स्वस्थ हो, धन एवं मान की वृद्धि तथा वह जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाए। शिवपुराण में भी महामृत्युंजय मंत्र की महिमा के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है। इसी मंत्र के लगातार जाप से कई असाध्य रोगों से भी लाभ पहुंचता है। महामृत्युंजय मेंत्र के पहले तथा बाद उसके बीज मंत्र ú हौं जूँ स: का उच्चारण आवश्यक माना गया है। जिस तरह बिना बीज के जीवन उत्पन्न नहीं होता है उसी तरह बिना बीज मंत्र के महामृत्युंजय मंत्र फलित नहीं होता है। जो पूरे मंत्र का जाप नहीं सकते वे केवल बीज मंत्र के सतत जाप से सभी अभिष्ट फल प्राप्त कर सकते हैं।महामृत्युंजय मंत्र का एक लाख जाप करने पर शरीर की शुद्धि होती है। दो लाख जाप करने पर पूर्वजन्म का स्मरण होता है। तीन लाख जाप करने पर इच्छित वस्तु की प्राप्ति हो जाती है। चार लाख जाप करने पर स्वप्न में भगवान शिव प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं। पांच लाख जाप करने पर भगवान शिव प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं। दस लाख जाप करने पर संपूर्ण फल की सिद्धि होती है।मंत्र जाप आसन पर बैठकर रुद्राक्ष की माला से पूर्ण पवित्र होकर करें। जो असहाय बीमार हो वह कैसी भी अवस्था में लेटे-बैठे, बगैर स्नान किए, किसी भी समय, किसी भी उम्र में बीज मंत्रों का जाप कर सकते हैं। उन्हें शिव की कृपा से निरोगता प्राप्त होगी।

महादेव मंत्र


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सद्विचार दर्शन



  • संसार में इससे बढ़कर हंसी की दूसरी बात नहीं हो सकती कि जो दुर्जन हैं, वे स्वयं ही सज्जन पुरुषों को "दुर्जन" कहते हैं। - वेदव्यास (महाभारत, आदिपर्व, 74/95)
  • यदि जगत् में कोई पाप है, तो वह है दुर्बलता। दुर्बलता ही मृत्यु है, दुर्बलता ही पाप है, इसलिए सब प्रकार से दुर्बलता का त्याग कीजिए। - स्वामी विवेकानन्द (युवकों के प्रति, पृष्ठ 27)
  • संसार का एक भी आदमी जब तक भूखा है, जानो कि संसार का प्रत्येक मनुष्य तब तक अपराधी है। - विमल मित्र (साहब बीबी गुलाम, पृष्ठ 101)
  • उत्साह-शून्य, दु:खी, कमजोर और शत्रुओं को आनंदित करने वाले पुत्र को कोई भी जननी जन्म न दे। - नारायण पंडित (हितोपदेश, पृष्ठ 2/7)
  • सफलता का एक ही मंत्र - जितना मिले, उससे ज्यादा लौटाओ - शिव खेड़ा


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आदित्यहृदय स्तोत्रम् (आदित्यहृदयम्) - Aditya Hrudayam (ādityahṛdayam) - Hindi and Sanskrit



Surya ( सूर्य Sūrya, "the Supreme Light"), also known as Aditya, Bhanu or Ravi Vivasvana in Sanskrit, and in Avestan Vivanhant. Aditya is the chief solar deity in Hinduism and generally refers to the Sun.
Ādityahṛdayam (आदित्यहृदयम्, ), is a devotional hymn associated with Aditya or Surya and was recited by the sage Agastya to Rāma on the battlefield before fighting the demon king Rāvana. This historic hymn starts at the beginning of the duel between Rāma and Rāvana. rishi Agastya teaches Rām, who is fatigued after the long battle with various warriors of Lanka, the procedure of worshiping the Sun God for strength to defeat the enemy. These verses belong to Yuddha Kānda (Book 6) Canto 107, in the Rāmāyana as composed by Agastya and compiled by Vālmīki


॥ आदित्यहृदयम्॥  .. ādityahṛdayam .. आदित्यहृदय स्तोत्रम्

जब भगवान् राम रावण के साथ युद्ध करते-करते क्लान्त हो गए, तब ऋषि अगस्त्य ने आकर भगवान् राम से कहा कि ‘३ बार जल का आचमन कर, इस ‘आदित्य-हृदय’ का तीन बार पाठ कर रावण का वध करो ।’ भगवान श्री राम ने इसी प्रकार किया, जिससे उनकी क्लान्ति मिट गई और नए उत्साह का सञ्चार हुआ । भीषण युद्ध में रावण मारा गया ।

सूर्य देव आराधना

भगवान भाष्कर की आराधना आरोग्य मात्र ही नहीं प्रदान करती। यह व्यक्ति की विजय भी सुनिश्चित करती है। सूर्यपूजा यश कीर्ति प्रदायी है। विजय की प्राप्ति और शत्रुनाश के लिए भगवान सूर्य को समर्पित आदित्यहृदय स्तोत्रम् एक अचूक अस्त्र है। आदित्य हृदय स्तोत्र के पाठ से मिर्गी, ब्लड प्रैशर मानसिक रोगों में सुधार होने लगता है। आदित्य हृदय स्तोत्र के पाठ से नौकरी में पदोन्नति, धन प्राप्ति, प्रसन्नता, आत्मविश्वास में वृद्धि होने के साथ-साथ समस्त कार्यों में सफलता व सिद्धि मिलने की संभावना बढ़ जाती है।


पूजन विधि

आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ आरम्भ करने के लिए शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार का दिन शुभ माना गया है। इस दिन प्रातः काल जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत होकर सूर्योदय के समय सूर्य देवता के सामने पूर्व की ओर खड़े होकर एक ताम्बे के कलश में जल भरकर उसमे लाल कुमकुम,अक्षत, लाल पुष्प एवं मोली डालकर निम्न मंत्र का जप करते हुये अर्ग्य देना चाहिए एवं तत्पश्चात पूजा क्क्ष में सूर्य यन्त्र के सामने बैठकर आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करना चाहिए। इसके बाद आने वाले प्रत्येक रविवार को यह पाठ करते रहना चाहिए। बीज मंत्र निम्न प्रकार है :-
" ॐ घ्रणी सूर्याय नम: "



ध्यानम्
नमस्सवित्रे जगदेक चक्षुसे, जगत्प्रसूति स्थिति नाशहेतवे
nmah svitre jagtaik chakchhushe,
त्रयीमयाय त्रिगुणात्म धारिणे, विरिंचि नारायण शंकरात्मने


ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।
tato yuddhapariśrāntaṃ samare chintayā sthitam
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्॥ १॥
rāvaṇaṃ cāgrato dṛṣṭvā yuddhāya samupasthitam .. 1 ..

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्।
daivataiśca samāgamya draṣṭumabhyāgato raṇam
उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवान् ऋषिः॥ २॥
upāgamyābravīdrāmamagastyo bhagavān ṛṣiḥ .. 2 ..

राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम्।
rāma rāma mahābāho śṛṇu guhyaṃ sanātanam
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि॥ ३॥
yena sarvānarīn vatsa samare vijayiṣyasi .. 3 ..

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।
ādityahṛdayaṃ puṇyaṃ sarvaśatruvināśanam
जयावहं जपेन्नित्यम् अक्षय्यं परमं शिवम्॥ ४॥
jayāvahaṃ japennityam akṣayyaṃ paramaṃ śivam .. 4 ..

सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम्।
sarvamaṅgalamāṅgalyaṃ sarvapāpapraṇāśanam
चिन्ताशोकप्रशमनम् आयुर्वर्धनमुत्तमम्॥ ५॥
cintāśokapraśamanam āyurvardhanamuttamam .. 5 ..

रश्मिमंतं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्।
raśmimaṃtaṃ samudyantaṃ devāsuranamaskṛtam
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्॥ ६॥
pūjayasva vivasvantaṃ bhāskaraṃ bhuvaneśvaram .. 6 ..

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः।
sarvadevātmako hyeṣa tejasvī raśmibhāvanaḥ
एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः॥ ७॥
eṣa devāsuragaṇām̐llokān pāti gabhastibhiḥ .. 7 ..

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः।
eṣa brahmā ca viṣṇuśca śivaḥ skandaḥ prajāpatiḥ
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः॥ ८॥
mahendro dhanadaḥ kālo yamaḥ somo hyapāṃ patiḥ .. 8 ..

पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः।
pitaro vasavaḥ sādhyā hyaśvinau maruto manuḥ
वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः॥ ९॥
vāyurvahniḥ prajāprāṇa ṛtukartā prabhākaraḥ .. 9 ..

आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान्।
ādityaḥ savitā sūryaḥ khagaḥ pūṣā gabhastimān
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः॥ १०॥
suvarṇasadṛśo bhānurhiraṇyaretā divākaraḥ .. 10 ..

हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान्।
haridaśvaḥ sahasrārciḥ saptasaptirmarīcimān
तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्ताण्ड अंशुमान्॥ ११॥
timironmathanaḥ śambhustvaṣṭā mārtāṇḍa aṃśumān .. 11 ..

हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः।
hiraṇyagarbhaḥ śiśirastapano bhāskaro raviḥ
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः॥ १२॥
agnigarbho'diteḥ putraḥ śaṅkhaḥ śiśiranāśanaḥ .. 12 ..

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः।
vyomanāthastamobhedī ṛgyajuḥsāmapāragaḥ
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः॥ १३॥
ghanavṛṣṭirapāṃ mitro vindhyavīthīplavaṅgamaḥ .. 13 ..

आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः।
ātapī maṇḍalī mṛtyuḥ piṅgalaḥ sarvatāpanaḥ
कविर्विश्वो महातेजाः रक्तः सर्वभवोद्भवः॥ १४॥
kavirviśvo mahātejāḥ raktaḥ sarvabhavodbhavaḥ .. 14 ..

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः।
nakṣatragrahatārāṇāmadhipo viśvabhāvanaḥ
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते॥ १५॥
tejasāmapi tejasvī dvādaśātman namo'stu te .. 15 ..

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः।
namaḥ pūrvāya giraye paścimāyādraye namaḥ
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः॥ १६॥
jyotirgaṇānāṃ pataye dinādhipataye namaḥ .. 16 ..

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः।
jayāya jayabhadrāya haryaśvāya namo namaḥ
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः॥ १७॥
namo namaḥ sahasrāṃśo ādityāya namo namaḥ .. 17 ..

नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः।
nama ugrāya vīrāya sāraṅgāya namo namaḥ
नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः॥ १८॥
namaḥ padmaprabodhāya mārtāṇḍāya namo namaḥ .. 18 ..

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे।
brahmeśānācyuteśāya sūryāyādityavarcase
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः॥ १९॥
bhāsvate sarvabhakṣāya raudrāya vapuṣe namaḥ .. 19 ..

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।
tamoghnāya himaghnāya śatrughnāyāmitātmane
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः॥ २०॥
kṛtaghnaghnāya devāya jyotiṣāṃ pataye namaḥ .. 20 ..

तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे।
taptacāmīkarābhāya vahnaye viśvakarmaṇe
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे॥ २१॥
namastamo'bhinighnāya rucaye lokasākṣiṇe .. 21 ..

नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः।
nāśayatyeṣa vai bhūtaṃ tadeva sṛjati prabhuḥ
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः॥ २२॥
pāyatyeṣa tapatyeṣa varṣatyeṣa gabhastibhiḥ .. 22 ..

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः।
eṣa supteṣu jāgarti bhūteṣu pariniṣṭhitaḥ
एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्॥ २३॥
eṣa evāgnihotraṃ ca phalaṃ caivāgnihotriṇām .. 23 ..

वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च।
vedāśca kratavaścaiva kratūnāṃ phalameva ca
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः॥ २४॥
yāni kṛtyāni lokeṣu sarva eṣa raviḥ prabhuḥ .. 24 ..

॥ फलश्रुतिः॥

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।
enamāpatsu kṛcchreṣu kāntāreṣu bhayeṣu ca
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव॥ २५॥
kīrtayan puruṣaḥ kaścinnāvasīdati rāghava .. 25 ..

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्।
pūjayasvainamekāgro devadevaṃ jagatpatim
एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि॥ २६॥
etat triguṇitaṃ japtvā yuddheṣu vijayiṣyasi .. 26 ..

अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि।
asmin kṣaṇe mahābāho rāvaṇaṃ tvaṃ vadhiṣyasi
एवमुक्त्वा तदागस्त्यो जगाम च यथागतम्॥ २७॥
evamuktvā tadāgastyo jagāma ca yathāgatam .. 27 ..

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा।
etacchrutvā mahātejā naṣṭaśoko'bhavattadā
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान्॥ २८॥
dhārayāmāsa suprīto rāghavaḥ prayatātmavān .. 28 ..

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान्।
ādityaṃ prekṣya japtvā tu paraṃ harṣamavāptavān
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्॥ २९॥
trirācamya śucirbhūtvā dhanurādāya vīryavān .. 29 ..

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत्।
rāvaṇaṃ prekṣya hṛṣṭātmā yuddhāya samupāgamat
सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत्॥ ३०॥
sarvayatnena mahatā vadhe tasya dhṛto'bhavat .. 30 ..

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं
atha raviravadannirīkṣya rāmaṃ
मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः।
muditamanāḥ paramaṃ prahṛṣyamāṇaḥ
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा
niśicarapatisaṃkṣayaṃ viditvā
सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति॥ ३१॥
suragaṇamadhyagato vacastvareti .. 31 ..

॥ इति आदित्यहृदयम् मन्त्रस्य॥  ..
iti ādityahṛdayam mantrasya ..


इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मिकीये आदिकाव्ये युद्दकांडे पंचाधिक शततम सर्गः ॥

 आदित्य हृदय स्त्रोतम

इस स्तोत्र का संबंध राम-रावण युद्ध से है। इस स्त्रोत का उल्लेख वाल्मीकि कृत रामायण के लंका कांड में हुआ है। राम-रावण युद्ध के अंतिम चरण में भीषण युद्ध होने के बावजूद रावण की पराजय के कोई संकेत नहीं मिल रहे थे। वह मायावी शक्तियों का प्रयोग कर भगवान राम की सेना को भयभीत कर रहा था। राम उसकी हर शक्ति को निष्प्रभावी कर रहे थे,लेकिन रावण को नुकसान नहीं पहुंचा पा रहे थे। इस स्थिति में राम-रावण युद्ध का कोई अंत होता नहीं दिख रहा था। यहीं से आदित्यहृदय स्तोत्रम् की पूर्वपीठिका प्रारंभ होती है। श्रीरामचन्द्रजी युद्ध से थककर चिन्ता करते हुए रणभूमि में खड़े थे। इतने में रावण भी युद्ध के लिये उनके सामने उपस्थित हो गया। यह देख अगस्त्य मुनि, जो युद्ध देखने के लिये देवताओं के साथ आये थे, श्रीराम के पास जाकर बोले कि हे राम ! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो। वत्स ! इसके जप से तुम युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं पर विजय पा सकोगे। यह गोपनीय स्तोत्र आदित्यहृदयं परम पवित्र और सम्पूर्ण शत्रुओं का नाश करने वाला है। इसके जप से सदा विजय प्राप्त होती है। यह नित्य अक्षय और परम कल्याणमय स्तोत्र है। इससे समस्त पापों का नाश हो जाता है। यह चिन्ता और शोक को मिटाने तथा आयु को बढ़ाने वाला उत्तम साधन है। "भगवन सूर्य अपनी अनंत किरणों से शुशोभित है। ये नित्य उदय होने वाले देवताओ और असुरो से नमस्कृत , विवस्वान नाम से प्रसिद्द , प्रभा का विस्तार करने वाले और संसार के स्वामी है। तुम इनका पूजन करो। सम्पूर्ण देवता इन्ही के स्वरूप है। ये तेज की र्राशी तथा किरणों से जगत को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाले है। ये ही अपनी रश्मियों का प्रसार करके देवता और असुरो सहित सम्पूर्ण लोको का पालन करते है। ये ही ब्रम्हा , विष्णु , शिव , स्कन्द , प्रजापति , इंद्रा , कुबेर , काल , यम , चन्द्रमा , वरुण , पितर , वसु , साध्य , अश्विनी कुमार , मरुद्रण , मनु वायु , अग्नि , प्रजा , प्राण , ऋतुओ को प्रकट करने वाले तथा प्रभा के पुंज है। इन्ही के नाम आदित्य , सविता , सूर्य , खग , पुषा , गभास्तिमान , सुवर्ण सदृश , भानु , हिरण्यरेता , दिवाकर , हरिदश्व , सहस्त्रार्ची , सप्तसप्ति , मरीचिमान , तिमिरोन्मथन , शम्भू , त्वष्टा , मार्तन्डक, अंशुमान , हिरण्यगर्भ , शिशिर , तपन , अहस्कर रवि , अग्निगर्भ , अदितिपुत्र , शंख , शिशिरनाशन , व्योमनाथ , तमोभेदी , ऋग , यजु और सामवेद के पारगामी , घनवृष्टि , अपामित्र , विन्ध्यावी पल्लवगम , आतापी , मंडली , मृत्यु , पिगल , सर्वतापन , कवि , विश्व , महातेजस्वी , रक्त , सर्वभावोद्द्व , नक्षत्र , गृह और तारो के स्वामी , विश्वभावन , तेजस्वियो में भी अति तेजस्वी तथा द्वादशात्मा है। आपको नमस्कार है। 'पुर्वगिरी उदयाचल तथा पश्चिमगिरी अस्ताचल के रूप में आपको नमस्कार है। ज्यतिर्गाणो के स्वामी तथा दिन के अधिपति आपको प्रणाम है। आप जय स्वरूप तथा विजय और कल्याण के दाता है। आपके रथ में हरे रंग के घोड़े जुते रहते है। आपको बारम्बार नमस्कार है। सहस्त्रो किरणों से सुशोभित भगवान सूर्य ! आपको बारम्बार प्रणाम है। आप अदिति के पुत्र होने के कारण आदित्य नाम से प्रसिद्द है। आपको नमस्कार है। उग्र , वीर और सारंग सूर्यदेव को नमस्कार है। कमलो को विकसित करने वाले प्रचंड तेजधारी मार्तंड को प्रणाम है। आप ब्रम्हा , विष्णु , शिव के भी स्वामी है। सूर आपकी संज्ञा है , यह सूर्यमंडल आपका ही तेज है , आप प्रकाश से परिपूर्ण है , सबको स्वाहा कर देने वाला अग्नि आपका ही स्वरूप है , आप रोद्र रूप धारण करने वाले है , आपको नमस्कार है। आप अज्ञान और अन्धकार के नाशक जड़ता एवं शीत के निवारक तथा शत्रु का नाश करने वाले है , सम्पूर्ण ज्योतियों के स्वामी और देवस्वरूप है , आपको नमस्कार है। आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्ण के सामान है , आप हरि और विश्वकर्मा है , तम के नाशक , प्रकाश स्वरूप और जगत के साक्षी है , आपको नमस्कार है। रघुनन्दन ! ये भगवान सूर्य ही सम्पूर्ण भूतो का संहार , सृष्टि और पालन करते है। ये ही अपनी किरणों से गर्मी पहुचते है और वर्षा करते है। ये सब भूतो में अंतर्यामी रूप से स्थित हॉकर उनके सो जाने पर भी जागते रहते है। ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्र पुरुषो को मिलाने वाले फल है। देवता , यज्ञ और यज्ञो के फल भी ये ही है। सम्पूर्ण लोको में जितनी क्रियाये होती है , उन सबका फल देने में ये ही पूर्ण समर्थ है। राघव ! विपत्ति में , कष्ट में , दुर्गम मार्ग में तथा और किसी भय के अवसर पर जो कोई पुरुष इन सूर्य देव का कीर्तन करता है , उसे दुःख नहीं भोगना पडता। इसलिए तुम एकाग्रचित होकर इन देवाधिदेव जगदीश्वर की पूजा करो। इस आदित्य ह्र्दय का तीन बार जप करने से कोई भी युद्ध में विजय प्राप्त कर सकता है। महाबाहो ! तुम इसी क्षण रावन का वध कर सकोगे। यह कहकर अगस्त्यजी जैसे आये थे , उसी प्रकार चले गये। अगत्स्य का उपदेश सुनकर सुनकर श्रीरामचंद्र का शोक दूर हो गया। उन्होंने प्रसन्न होकर शुद्ध चित्त से आदित्यहृदय को धारण किया और तीन बार आचमन करके भगवान् सूर्य को देखते हुए इसका तीन बार जप किया। इससे उनमें उत्साह का नवसंचार हुआ। इसके पश्चात भगवान राम ने पूर्ण उत्साह के साथ रावण पर आक्रमण कर उसका वध कर दिया। आदित्यहृदय एक ऐसा स्तोत्र है जिसका अवलंबन विजय प्राप्त करने के लिए भगवान श्रीराम ने स्वयं किया। इसलिए ,इस स्तोत्र का प्रभाव असंदिग्ध है।


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