गौ भक्त संत माधवदास



संत माधवदास का जन्म वि० सं० १६०१ में कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को सूरत के सौदागरगंज में हुआ था। इनके पिता का नाम करवत सिंह और माता का नाम हिरल देवी था। इनके पूर्वज मेवाड़ के केलवाड़ा नामक परगना के निवासी थे और प्रसिद्ध सिसोदिया वंश के सूर्यवंशी क्षत्रिय थे।
Gau Mata

बाल्यावस्था में माधवदास जी की मुखाकृति देखकर एक अवधूत महात्मा ने उनके पिता से कहा था कि यह बालक कोई महान् दिव्यात्मा होगा। ये बचपन से ही बड़ी उदार वृत्ति के थे और दरवाजे पर आये भिक्षुक को निराश नहीं जाने देते थे। जब ये मात्र पाँच वर्ष के ही थे, तभी इनके पिता का देहांत हो गया था। अतः इनका पालन-पोषण इनकी माता ने ही हुआ। माता ने इन्हें अच्छा विद्याभ्यास तो कराया ही, एक राजपूत वीर के लायक शस्त्रास्त्र की योग्यता भी इन्हें बचपन में ही प्राप्त हो गयी थी ।

एक बार ये भ्रमण करते हुए अहमदाबाद के पास पहुँचे। वहाँ इन्होंने देखा कि कुछ मुसलमान ग्वालों से उनकी गायें छीनकर ले जा रहे हैं। ईद का त्यौहार था और हाकिम की आज्ञा थी, इसलिए कोई कुछ बोल भी नहीं सकता था। पचास मुसलमान सैनिकों की एक टुकड़ी गायों को घेर कर लेकर चल दी, मुसलमानी शासन में ग्वाले भला रोने के अतिरिक्त और कर ही क्या सकते थे? गाय रंभा रही थीं, चाबुक की मार खा रही थीं, उनकी आँखों से आँसुओं की धारा बह रही थी। यह सब माधवदास जी से देखा न गया। उनका राजपूती रक्त उबल पड़ा। वे तलवार लेकर उन पर टूट पड़े। एक तरफ अकेले माधवदास और दूसरी ओर पचास सैनिक! पर सिंह सिंह होता है, मांसलोभी सैकड़ों सियारों का झुंड उस की एक दहाड़ और भाग खड़ा होता है।

माधवदास में सत्साहस था, गौमाता के प्रति प्रेम था, उधर सैनिकों में था सत्ता का अभिमान। माधवदास ने उन यवन सिपाहियों को गाजर-मूली की तरह काटना प्रारम्भ किया। सिपाहियों की जान पर बन आयी। कुछ तो मारे गये और कुछ भाग गये। सिसोदिया वंश के उस वीर ने सब गायें छुड़ा ली और रोते हुए ग्वालों के सुपुर्द कर दी।

माता की प्रेरणा से माधवदास जी ने सद्गुरु की शरण ली। वे समर्थदास नामक एक योगी के शिष्य हो गये। संत माधव दास जी सच्चे संत थे, उनका अधिकांश समय तीर्थाटन में ही बीतता था। गौमाता के प्रति उनकी अद्भुत भक्ति थी। उन्होंने दिल्ली के शाही कसाई खाने के जल्लाद हाशम को अपने उपदेश से भगवान की भक्ति में लगा दिया। मुलतान के मुस्लिम सूबेदार ने उन्हें तरह तरह से प्रताड़नाएं देने की कोशिश की, परंतु माधवदास जी सिद्ध संत थे, वह उनका बाल भी बाँका न कर सका और अंत में उनके चरणों में गिरकर क्षमा याचना की और भविष्य में किसी को न सताने की कसम खाई।

वि० सं० १६५२ में आप इस नश्वर शरीर को त्याग कर अविनाशी परब्रह्म प्रभु के स्वरूप में अवस्थित हो गये। धन्य हैं ऐसे संत रत्न और गौ भक्त माधवदास जी और धन्य है भारत-धरा ऐसे सपूत को प्राप्त करके।


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प्रेरक प्रसंग - सच्ची कृपा



एक निर्धन ब्राह्मण के मन में धन पाने की तीव्र कामना हुई। वह सकाम यज्ञ की विधि जानता था, किंतु धन ही नहीं तो यज्ञ कैसे हो? वह धन की प्राप्ति के लिये देवताओं की पूजा और व्रत करने लगा। कुछ समय एक देवता की पूजा करता, परंतु उससे कुछ लाभ नहीं दिखायी पड़ता तो दूसरे देवता की पूजा करने लगता और पहले को छोड़ देता। इस प्रकार उसे बहुत दिन बीत गये। अंत में उसने सोचा-'जिस देवता की आराधना मनुष्य ने कभी न की हो, मैं अब उसी की उपासना करूँगा। वह देवता अवश्य मुझपर शीघ्र प्रसन्न होगा।'


ब्राह्मण यह सोच ही रहा था कि उसे आकाश में कुण्डधार नामक मेघ के देवता का प्रत्यक्ष दर्शन हुआ। ब्राह्मण ने समझ लिया कि 'मनुष्य ने कभी इनकी पूजा न की होगी। ये बृहदाकार मेघ देवता देव लोक के समीप रहते हैं, अवश्य ये मुझे धन देंगे।' बस, बड़ी श्रद्धा-भक्ति से ब्राह्मण ने उस कुंड धार मेघ की पूजा प्रारम्भ कर दी।

ब्राह्मण की पूजा से प्रसन्न होकर कुण्डधारने देवताओं की स्तुति की, क्योंकि वह स्वयं तो जल के अतिरिक्त किसी को कुछ दे नहीं सकता था। देवताओं की प्रेरणा से यक्ष श्रेष्ठ मणिभद्र उसके पास आकर बोले-'कुंड धार! तुम क्या चाहते हो?'

कुण्डधार - 'यक्षराज! देवता यदि मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरे उपासक इस ब्राह्मण को वे सुखी करें।'

मणिभद्र-'तुम्हारा भक्त यह ब्राह्मण यदि धन चाहता हो तो इसकी इच्छा पूर्ण कर दो। यह जितना धन माँगेगा, वह मैं इसे दे दूंगा।'

कुण्डधार - 'यक्षराज! मैं इस ब्राह्मण के लिये धन की प्रार्थना नहीं करता। मैं चाहता हूँ कि देवताओं की कृपा से यह धर्मपरायण हो जाए। इसकी बुद्धि धर्म में लगे।'

मणिभद्र-'अच्छी बात ! अब ब्राह्मण की बुद्धि धर्म में ही स्थित रहेगी।' उसी समय ब्राह्मण ने स्वप्न में देखा कि उसके चारों ओर कफन पड़ा हुआ है। यह देखकर उसके । हृदय में वैराग्य उत्पन्न हुआ।वह सोचने लगा - 'मैंने इतने । देवताओं की और अंत में कुण्डधार मेघ की भी धन के लिये आराधना की, किंतु इनमें कोई उदार नहीं दिखता। इस प्रकार धन की आस में ही लगे हुए जीवन व्यतीत करने से । क्या लाभ! अब मुझे परलोक की चिंता करनी चाहिये।'

ब्राह्मण वहां से वन में चला गया। उसने अब तपस्या करना प्रारम्भ किया। दीर्घकाल तक कठोर तपस्या करने के कारण उसे अद्भुत सिद्धि प्राप्त हुई। वह स्वयं आश्चर्य करने लगा-'कहाँ तो मैं धन के लिये देवताओं की पूजा करता था और उसका कोई परिणाम नहीं होता था और कहाँ अब मैं स्वयं ऐसा हो गया कि किसी को धनी होने का आशीर्वाद दे दूँ तो वह नि:संदेह धनी हो जाएगा!'

ब्राह्मण का उत्साह बढ़ गया। तपस्या में ही उसकी श्रद्धा बढ़ गयी। वह तत्परतापूर्वक तपस्या में ही लगा रहा। एक दिन उसके पास वही कुण्डधार मेघ आया। उसने कहा ब्रह्मन् ! तपस्या के प्रभाव से आपको दिव्य दृष्टि प्राप्त हो गयी है। अब आप धनी पुरुषों तथा राजाओं की गति देख सकते हैं।' ब्राह्मण ने देखा कि धन के कारण गर्व से आकर लोग नाना प्रकार के पाप करते हैं और घोर नरक में गिरते हैं।

कुण्डधार बोला-'भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करके आप यदि धन पाते और अंत में नरक की यातना भोगते तो मुझसे आपको क्या लाभ होता? जीव का लाभ तो कामनाओं का त्याग करके धर्माचरण करने में ही है। उन पर सच्ची कृपा तो उन्हें धर्म में लगाना ही है। उन्हें धर्म में लगाने वाला ही उनका सच्चा हितैषी है।'

ब्राह्मण ने मेघ के प्रति कृतज्ञता प्रकट की और कामनाओं का त्याग करके अंत में मुक्त हो गया।

(महाभारत के शान्तिपर्व से)


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