सूक्ति और सद् विचार साहित्‍य से





देवता न बड़ा होता है, न छोटा; न शक्तिशाली होता है, न अशक्त। वह उतना ही बड़ा होता है, जितना बड़ा उसे उपासक बनाना चाहता है।
— हज़ारीप्रसाद द्विवेदी (पुनर्नवा, पृ. 22)

संसार में नाम और द्रव्य की महिमा को आज तक कोई ठीक-ठीक नहीं जान पाया है।
— शरतचंद्र चट्टोपाध्याय (शेष परिचय, पृ. 31)

परंपरा को स्वीकार करने का अर्थ बंधन नहीं, अपितु अनुशासन का स्वेच्छा से वरण करना है।
— विद्यानिवास मिश्र (परंपरा बंधन नहीं, पृ. 53)

असाधारण प्रतिभा को चमत्कारिक वरदान की आवश्यकता नहीं होती और साधारण व्यक्ति को अपनी त्रुटियों की इतनी पहचान नहीं होती कि वह किसी पूर्णता के वरदान के लिए साधना करे।
— महादेवी वर्मा (सप्तपर्णा, पृ. 49)

हम ऐसी भूल कभी न करें कि अपराध आकार में छोटा या बड़ा होता है।
— महात्मा गांधी (बापू के आशीर्वाद, पृ. 268)

मनुष्य का अहंकार ऐसा है कि प्रासादों का भिखारी भी कुटिया का अतिथि बनना स्वीकार नहीं करेगा।
— महादेवी वर्मा (दीपशिखा : चिंतन के कुछ क्षण)

केवल हृदय में अनुभव कर लेने मात्र से किसी वस्तु को भाषा में व्यक्त नहीं किया जा सकता। प्रत्येक वस्तु को सीखना पड़ता है और यह सीखना सदैव अपने आप नहीं होता।
— शरतचंद्र चट्टोपाध्याय (शरत पत्रावली, पृ. 60)

यदि सभी लोग हिंसा का त्याग कर दें, तो क्षात्रधर्म रहेगा ही कहाँ? और यदि क्षात्रधर्म नष्ट हो जाए, तो जनता का कोई त्राता नहीं रहेगा।
— लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक (गीतारहस्य, पृ. 32)

पश्चिम में आने से पहले मैं भारत से प्रेम करता था, किंतु अब तो भारत की धूलि भी मेरे लिए पवित्र है। भारत की वायु मेरे लिए पावन है; भारत अब मेरे लिए तीर्थ है।
— स्वामी विवेकानंद (विवेकानंद साहित्य, खंड 5, पृ. 203)

देश की सेवा करने में जो मिठास है, वह और किसी वस्तु में नहीं है।
— सरदार वल्लभभाई पटेल (सरदार पटेल के भाषण, पृ. 259)

अपने देश अथवा अपने शासक के दोषों के प्रति सहानुभूति रखना या उन्हें छिपाना देशभक्ति के नाम को लज्जित करना है। इसके विपरीत, देश के दोषों का विरोध करना ही सच्ची देशभक्ति है।
— महात्मा गांधी (सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय, खंड 41, पृ. 590)

देश-प्रेम हो और भाषा-प्रेम की चिंता न हो, यह असंभव है।
— महात्मा गांधी (गांधी वाङ्मय, खंड 19, पृ. 515)

प्रत्येक भारतवासी का यह भी कर्तव्य है कि वह ऐसा न समझे कि अपने और अपने परिवार के खाने-पहनने भर के लिए कमा लिया, तो सब कुछ कर लिया। उसे अपने समाज के कल्याण के लिए दिल खोलकर दान देने के लिए भी तत्पर रहना चाहिए।
— महात्मा गांधी (इंडियन ओपिनियन, अगस्त 1903)

गंगा की पवित्रता में विश्वास करने कोई नहीं जाता; किंतु गंगा के निकट पहुँच जाने पर अनायास ही वह विश्वास न जाने कहाँ से उत्पन्न हो जाता है।
— लक्ष्मीनारायण मिश्र (गरुड़ध्वज, पृ. 79)

सत्य, आस्था और लगन जीवन-सिद्धि के मूल आधार हैं।
— अमृतलाल नागर (अमृत और विष, पृ. 437)

उदारता और स्वाधीनता मिलकर ही जीवन-तत्त्व का निर्माण करती हैं।
— अमृतलाल नागर (मानस का हंस, पृ. 367)

जीवन अविकल कर्म है, न बुझने वाली पिपासा है। जीवन हलचल है, परिवर्तन है; और हलचल तथा परिवर्तन में सुख और शांति का कोई स्थान नहीं।
— भगवती चरण वर्मा (चित्रलेखा, पृ. 24)

साहित्य समाज का दर्पण है।
— मुंशी प्रेमचंद

मनुष्य क्रोध को प्रेम से, पाप को सदाचार से, लोभ को दान से और झूठ को सत्य से जीत सकता है।
— गौतम बुद्ध

देवता न बड़ा होता है, न छोटा; न शक्तिशाली होता है, न अशक्त। वह उतना ही बड़ा होता है, जितना बड़ा उसे उपासक बनाना चाहता है।
— हज़ारीप्रसाद द्विवेदी

संसार में नाम और द्रव्य की महिमा को आज तक कोई ठीक-ठीक नहीं जान पाया है।
— शरतचंद्र चट्टोपाध्याय

परंपरा को स्वीकार करने का अर्थ बंधन नहीं, अपितु अनुशासन का स्वेच्छा से वरण करना है।
— विद्यानिवास मिश्र

असाधारण प्रतिभा को चमत्कारिक वरदान की आवश्यकता नहीं होती और साधारण व्यक्ति को अपनी त्रुटियों की इतनी पहचान नहीं होती कि वह किसी पूर्णता के वरदान के लिए साधना करे।
— महादेवी वर्मा

हम ऐसी भूल कभी न करें कि अपराध आकार में छोटा या बड़ा होता है।
— महात्मा गांधी

मनुष्य का अहंकार ऐसा है कि प्रासादों का भिखारी भी कुटिया का अतिथि बनना स्वीकार नहीं करेगा।
— महादेवी वर्मा

केवल हृदय में अनुभव कर लेने मात्र से किसी वस्तु को भाषा में व्यक्त नहीं किया जा सकता। प्रत्येक वस्तु को सीखना पड़ता है और यह सीखना सदैव अपने आप नहीं होता।
— शरतचंद्र चट्टोपाध्याय

सत्य, आस्था और लगन जीवन-सिद्धि के मूल आधार हैं।
— अमृतलाल नागर

उदारता और स्वाधीनता मिलकर ही जीवन-तत्त्व का निर्माण करती हैं।
— अमृतलाल नागर

जीवन अविकल कर्म है, न बुझने वाली पिपासा है। जीवन हलचल है, परिवर्तन है; और हलचल तथा परिवर्तन में सुख और शांति का कोई स्थान नहीं।
— भगवती चरण वर्मा

मनुष्य की मनुष्यता उसके आचरण से प्रकट होती है, वाणी से नहीं।
— रामधारी सिंह 'दिनकर'

सच्चा साहित्य वही है, जो मनुष्य को ऊँचा उठाए और उसके भीतर करुणा, साहस तथा सत्य का संचार करे।
— मैथिलीशरण गुप्त

करुणा ही संस्कृति का मूल है।
— आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी

मनुष्य का जीवन तभी सार्थक होता है, जब वह दूसरों के सुख-दुःख में सहभागी बनता है।
— जैनेंद्र कुमार

सौंदर्य वहीं है, जहाँ सत्य और शिव का निवास है।
— जयशंकर प्रसाद

आत्मविश्वास ही सफलता की पहली सीढ़ी है।
— सुभद्रा कुमारी चौहान

जो मनुष्य संघर्ष से डरता है, वह जीवन के वास्तविक आनंद से वंचित रह जाता है।
— यशपाल

साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मनुष्य का निर्माण भी है।
— प्रेमचंद


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