ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।




ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुंडरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतरः शुचिः॥
(हरिभक्तिविलस ३।३७, गरुड़ पुराण)

Om Apavitrah Pavitro Vaa Sarva-Avasthaam Gato-[A]pi Vaa |
 Yah Smaret-Punnddariikaakssam Sa Baahya-Abhyantarah Shucih ||

Whether all places are permeated with purity or with impurity,
whosoever remembers the lotus-eyed Lord (Vishnu, Rama, Krishna) gains inner and outer purity.

चाहे (स्नानादिक से) पवित्र हो अथवा (किसी अशुचि पदार्थ के स्पर्श से) अपवित्र हो, (सोती, जागती, उठती, बैठती, चलती) किसी भी दशा में हो, जो भी कमल कमल नयनी (विष्णु, राम, कृष्ण) भगवान का स्मरण मात्र से वह (उस समय) बाह्म (शरीर) और अभ्यन्तर (मन) से पवित्र होता है |


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15 टिप्‍पणियां:

S S Bhatia ने कहा…

सुन्दर व्याख्या ।

Unknown ने कहा…

बहुत पावन मंत्र

Unknown ने कहा…

Bahut achhe

Unknown ने कहा…

Good

Unknown ने कहा…

बहुत सुंदर

GYANGUNSAGAR ने कहा…

देखो कर्मकाण्ड भी कहता है की भगवन को स्मरण करने मात्र से मनुष्य शुद्ध हो जाता है लेकिन कोई ब्राम्हण इसका मतलब बताय बिना ही पूजा सम्पन्न करा देता है।

GYANGUNSAGAR ने कहा…

देखो कर्मकाण्ड भी कहता है की भगवन को स्मरण करने मात्र से मनुष्य शुद्ध हो जाता है लेकिन कोई ब्राम्हण इसका मतलब बताय बिना ही पूजा सम्पन्न करा देता है।

Unknown ने कहा…

अद्भुत अति सुंदर

Dinesh sharma ने कहा…

जय हो राम नाम की जय

Unknown ने कहा…

Bahut Sahi,radhe radhe

Unknown ने कहा…

Is mantr ka Hindi m Kya mtlab hota h

Unknown ने कहा…

Aacha

Unknown ने कहा…

Wah barahman janta nahi hai eska matlab kya hota hai wah to paisa kamane ke liye puja karake chala jata hai.aaj jo sanatan dharm ko kahi kahi badnam kiya ja raha hai.wah jankari ka abhaw hai.esliye sabhi log dharmik kitab ko padhiye.🙏🙏🙏🙏🙏

Dilesu ने कहा…

Very good

Swastik ने कहा…

ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय।।