कहानी एवं उपन्यास में अंतर



कहानी और उपन्यास हिन्दी साहित्य की विधा के दो प्रमुख आयाम है। कहानियाँ जिस प्रकार अपने युग की पहचान होती है, आपको कुछ सोचने पर मजबूर करती है, आपकी आत्मा को झकझोरती है इतना ही नहीं अपने वातावरण के रंग में सराबोर कर देती है। दूसरे शब्दों में यह हमारी भावनाओं और दैनिक जीवन का सच्चा इतिहास बयान करती है। वहीं उपन्यास जीवन के विविध पहलूओं को अपने में समेटे एक विशाल फलक को केनवास पर उतारते हैं। जिसमें उपन्यासकार यथार्थ जीवन को कल्पना से जोड़कर घटना को एक नयी दिशा प्रदान करते हैं। इस दृष्टि से कहानी और उपन्यास दोनों ही साहित्य में महती भूमिका अदा करते हैं। दोनों का ही रचना क्षेत्र मानव जीवन है। कहानी जहाँ जीवन के एक छोटे से हिस्से की व्याख्या करती है वहीं उपन्यास संपूर्ण जीवन की व्याख्या करता है दोनों में ही गतिशीलता, परिवर्तनशीलता एवं विकासमान का गुण होता है। दोनों के लेखन की अपनी कला है किन्तु प्रेमचंद एक मात्र ऐसे साहित्यकार थे जिन्हें दोनों ही क्षेत्र में महारथ हासिल थी। प्रस्तुत इकाई में कहानी और उपन्यास के भेद को स्पष्ट करते हुए प्रेमचंद द्वारा रचित उपन्यास ‘गबन’ का विवरण प्रस्तुत किया गया है।

गद्य साहित्य की अनेक विधाओं में कहानी और उपन्यास का विशेष महत्व है। कारण समस्त विधाओं में सबसे पहले कहानी का प्रदुर्भाव हुआ, दादी, नानी, परदादी, परनानी और उनसे भी पहले की कई पीढ़ियों में इस विधा का जन्म हुआ था जब संभवतः विज्ञान के कोई भी ऐसे संसाधन आमजन को उपलब्ध नहीं थे जिससे वे अपना मनोरंजन कर सकें। अतः कल्पनालोक में खोकर बुनी गई कथा, कहानियां ही व्यक्ति के मनोरंजन का प्रमुख साधन बनी। जिन्हें केवल श्रवणेन्द्रियों के बल व्यक्ति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तातंरित करती रही। जब एक कहानी के आसपास और भी कई सह-कहानियाँ बुनती और जुड़ती चली गईं तो कहानी का क्षेत्र व्यापक बन गया। निःसंदेह इसे कंठस्थ रख पाना आसान नहीं था किन्तु जब तक टंकण और मुद्रण व्यवस्था लोगों को उपलब्ध हुई और इन कहनियों के व्यापक स्वरूप को सहेज पाना आसान हुआ। जिसे उपन्यास विधा के रूप में जाना गया। ये सच है कि उपन्यास कहानी का ही विस्तृत रूप है किन्तु कहानी और उपन्यास के अंतर को हम प्रेमचंद के इन शब्दों बेहतर समझ सकते है - ‘‘गल्प (कहानी) वह रचना है जिसमें जीवन के किसी एक मनोभाव को प्रदर्शित करना ही लेखक का उद्देश्य रहता है उसे चित्र, उसकी शैली, उसका कथाविन्यास सब उसी एक भाव को पुष्ट करते हैं। उपन्यास की भांति उसमें मानव जीवन का संपूर्ण तथा वृहद रूप दिखाने का प्रयास नहीं किया जाता न ही उसमें उपन्यास की भांति सभी रसों का समिश्रण होता है। वह ऐसा रमणीय उद्यान नहीं जिसमें भांति-भांति के फूल बेल-बूटे सजे हुए हैं, अपितु एक गमला


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और डॉ. मुरली मनोहर जोशी का बंगला बिक गया..



प्रयाग त्याग की भूमि है जहां भगवान ऋषभदेव सबसे पहले जेनैश्वरी दीक्षा धारण की और त्याग की परंपरा प्रारंभ की और कन्नौजाधिप महाराज हर्ष का प्रति पांचवें वर्ष प्रयाग के मेले में जाकर सर्वस्व दान कर देने मान्यता है..

इसी कड़ी में संघ के पूर्व सरसंघ चालक पूज्य रज्जू भैया और विहिप के संस्थापक स्व. सिंहल जी का नाम भी दर्ज है जिन्होंने राष्ट्र निर्माण में न सिर्फ अपना शारीरिक योगदान दिया अपितु अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति भी राष्ट्र को समर्पित कर दिया..
डा. जोशी जी के बंगले के बिकने की खबर उद्द्वेलित कर देने वाली थी, ऐसी नहीं था कि डा. जोशी को धनाभाव में अपना बंगला अंगिरस को बेचना पड़ा हो, सांसद न होते हुए भी आजीविका के रूप में उनके पास प्रतिमाह सांसद और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो. के रूप में लाखों रूपये की पेंशन आ रही है...
डॉ. जोशी की दो बेटियां हैं जो आज अच्छे परिवारों में विकसित और पल्लवित हो रही है. उनके समक्ष कोई ऐसी मजबूरी नहीं थी की उनको यह बंगला बेचना मजबूरी ररहा हो, अगर वह चाहते तो अपने इस धरोहर को राष्ट्र निर्माण में समर्पित कर सकते थे जिसका सामाजिक उपयोग होता, अगर ऐसा किया जाता डॉ. जोशी, पूज्य रज्जू भैया और स्व. सिंहल महान त्यागी महापुरुषों की कड़ी में गिने जाते..
डॉ. जोशी की संपत्ति जो उनको जो करना था सो कर दिया, किन्तु उच्च शिक्षित व्यक्ति जरूर थे किन्तु जमीन से जुड़े व्यक्ति कतई नहीं थे...
"देश हमें देता है सब कुछ. देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें" संघ शाखाओ पर आप भले कितना आप कितना चिल्ल्वा कर यह गीत गवा लो किंतु आत्मसात करना बड़ों बड़ों के लिए कठिन है..


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