जीवन-परिचय अमर शहीद पं. रामप्रसाद बिस्मिल



शहीद पं. रामप्रसाद बिस्मिल के पूर्वजों का मूल निवास स्थान 'तोमर धार' में चम्बल नदी के किनारे स्थित ग्राम बरवाई था। तोमर धार में चम्बल नदी के किनारे पर दो ग्राम आबाद थे- रूअर ग्राम तथा बरवाई ग्राम, ये दोनों ही ग्राम ग्वालियर राज्य में प्रसिद्ध थे। इनकी प्रसिद्धी का कारण था इन ग्रामों के निवासियों का उद्दण्ड होना। ग्राम बरवाई बिस्मिल जी का पैतृक ग्राम है। यह ग्राम चम्बल संभाग में ग्वालियर के पास मुरैना, अम्बाह से 9 कि.मी. दूर उत्तर दिशा में स्थित है। रूअर ग्राम और बरवाई ग्राम में दूरी पाँच कि.मी. की है। दोनों ही ग्राम 'तोमर' बाहुल्य, दोनों ही एक पुरखे की संतान तथा दोनों ग्रामों के वीर निवासियों के कारण दूर-दूर तक विख्यात थे। ''यह ग्राम बरवाई 550 वर्ष पूर्व सनाढ्य ब्राह्मणों बरोलियों द्वारा बसाया हुआ ग्राम है। पहले यह वीरबाई के नाम से जाना जाता था। वीरबाई से विरबाई व अब बरवाई के नाम से सुप्रसिद्ध है।" मुरैना जिले की पहचान पहले तंवरधार अथवा तोमरधार जिले के रूप में थी। तोमरधार में स्थित इन दोनों ग्रामों के निवासी बड़े ही स्वतंत्र प्रकृति तथा स्वाभिमानी स्वभाव के थे। ये राज्य की सत्ता की चिन्ता नहीं करते थे। यहाँ के जमींदार भी इच्छा होने पर राज्य को भूमि-कर देते थे और इच्छा न होने पर मालगुजारी देने से साफ इन्कार कर देते थे। यदि राज्य का कोई अधिकारी या तहसीलदार आता तो ये बीहड़ों में छिप जाते, वहीं अपने पशु ले जाते तथा भोजनादि की व्यवस्था भी बीहड़ में कर लेते। उनके घर पर कुछ भी ऐसे कीमती सामान न रह जाते, जिसकी नीलामी से मालगुजारी वसूल की जा सके। इन जमींदारों के इस उद्दण्ड व्यवहार के संबंध में कई कथाएँ प्रचलित थीं। बिस्मिल जी एक ऐसे ही जमींदार के विषय में लिखते हैं कि ''एक जमींदार के सम्बन्ध में कथा प्रचलित है कि मालगुजारी न देने के कारण ही उनको कुछ भूमि माफी में मिल गई। पहले तो कई साल तक भागे रहे। एक बार धोखे से पकड़ लिए गए तो तहसील के अधिकारियों ने उन्हें बहुत सताया। कई दिन तक बिना खाना-पानी के बंधा रहने दिया। अन्त में जलाने की धमकी दे, पैरों पर सूखी घास डालकर आग लगवा दी। किन्तु उन जमींदार महोदय ने भूमि-कर देना स्वीकार न किया और यही उत्तर दिया कि ग्वालियर महाराज के कोष में मेरे कर न देने से ही घाटा न पड़ जायेगा। संसार क्या जानेगा कि अमुक व्यक्ति उद्दण्डता के कारण ही अपना समय व्यतीत करता है। राज्य को लिखा गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि उतनी ही भूमि उन महाशय को माफी में दे दी गई।" इसी प्रकार की एक और प्रचलित कथा के विषय में बिस्मिल जी लिखते हैं कि इसी प्रकार एक समय इन ग्रामों के निवासियों को एक अद्भुत खेल सूझा। उन्होंने महाराज के रिसाले के साठ ऊँट चुराकर बीहड़ों में छिपा दिए। राज्य को लिखा गया, जिस पर राज्य की ओर से आज्ञा हुई कि दोनों ग्राम तोप लगवाकर उड़वा दिए जाएं। न जाने किस प्रकार समझाने-बुझाने से वे ऊँट वापस किए गए और अधिकारियों को समझाया गया कि इतने बड़े राज्य में थोड़े से वीर लोगों का निवास है, इनका विध्वंस न करना ही उचित होगा। तब तोपें लौटाई गईं और ग्राम उड़ाए जाने से बचे। ये लोग अब राज्य-निवासियों को तो अधिक नहीं सताते, किन्तु बहुधा अंग्रेजी राज्य में आकर उपद्रव कर जाते थे और अमीरों के मकानों पर छापा मारकर रात ही रात बीहड़ में दाखिल हो जाते थे। बीहड़ में पहुँच जाने पर पुलिस या फौज कोई भी उनका बाल बाँका नहीं कर सकती।

ऐसे वीरों के निवास स्थान थे- ग्राम रूअर तथा ग्राम बरवाई। ये दोनों ग्राम तत्कालीन समय में अंग्रेजी राज्य की सीमा से 15 मील दूर चम्बल नदी के तट पर बसे थे। इसी ग्राम बरवाई में पं. रामप्रसाद बिस्मिल जी के दादा जी श्री नारायण लाल जी का जन्म हुआ। बिस्मिल जी के दादा जी नारायण लाल जी के दो भाई ठा. अमान सिंह तथा ठा. समान सिंह थे। ये तोमर राजपूत ठाकुर थे। इन भाईयों में ठाअमान सिंह सबसे ज्येष्ठ, उनके बाद ठा. समान सिंह तथा सबसे छोटे भाई ठानारायण लाल जी थे। इन तीनों भाइयों का विवाह हुआ। बिस्मिल जी के दादा जी श्री नारायण लाल जी तथा उनकी पत्नी श्रीमती विचित्रा देवी थीं। बिस्मिल के दादा जी श्री नारायण लाल जी तथा उनकी पत्नी श्रीमती विचित्रा देवी कौटुम्बिक कलह तथा अपनी भाभी के असहनीय दुर्व्यहार के कारण मजबूर होकर अपनी जन्मभूमि ग्राम बरवाई छोड़कर चले गये। नारायणलाल जी अपनी पत्नी तथा बेटों के साथ दर-दर भटकते रहे। उस समय उनके पुत्र मुरलीधर की आयु आठ वर्ष तथा कल्याणमल की आयु छः वर्ष थी। ''पितामह नारायण सिंह आजीविका की तलाश में काफी दिन इधर-उधर भटकते रहे। अन्त में हार मानकर वे अपने एक परिचित के पास शाहजहाँपुर (उत्तर प्रदेश) के पास अहरिया नामक एक ग्राम में पहुँचे, जहाँ वे गोपाल राम मुन्सिफ के घर रहने लगे। गोपाल राम इनके (श्री नारायणलाल) साथ पशुओं का क्रय-विक्रय पहले हाट बाजारों में साथ-साथ करते थे। यही छोटी पहचान अवलम्बन बन गई। मानों किसी डूबते को तिनके का सहारा मिल गया हो। यह घटना सन् 1889 के आसपास की है, तब श्री नारायणलाल जी की आयु भी 30-32 वर्ष की रही होगी।"

जिस समय बिस्मिल जी के दादा श्री नारायणलाल जी शाहजहाँपुर में आए, तब वहाँ दुर्भिक्ष का भयंकर प्रकोप था। नारायणलाल जी तथा उनका परिवार बड़ी दयनीय अवस्था में थे। नारायणलाल जी के पास कोई काम भी नहीं था जिससे परिवार का भरण-पोषण उचित ढंग से कर पाते। अनेक प्रयत्न करने के पश्चात् श्री नारायणलाल जी को शाहजहाँपुर में एक अत्तार महोदय की दुकान पर तीन रूपये मासिक वेतन की नौकरी मिली। भयंकर दुर्भिक्ष के समय नारायणलाल जी का अपने परिवार का निर्वाह करना मुश्किल हो गया। अपने दादा जी एवं दादी जी की विपत्तियों के विषय में बिस्मिल जी अपनी आत्मकथा में लिखते हैं 4''दादी जी ने बहुत प्रयत्न किया, कि अपने आप केवल एक समय आधे पेट भोजन करके बच्चों का पेट पाला जाए, किन्तु फिर भी निर्वाह न हो सका। बाजरा, कुकनी, सामा, ज्वार इत्यादि खाकर दिन काटने चाहे, किन्तु फिर भी गुजारा न हुआ तब आधा बथुआ, चना या कोई दूसरा साग, जो सबसे सस्ता हो उसको लेकर, सबसे सस्ता अनाज उसमें आधा मिलाकर थोड़ा-सा नमक डालकर उसे स्वयं खातीं, लड़कों को चना या जौं की रोटी देती और इसी प्रकार दादाजी भी समय व्यतीत करते थे। बड़ी कठिनता से आधे पेट खाकर दिन तो कट जाता, किन्तु पेट में घोंटू दबाकर रात काटना कठिन हो जाता। यह तो भोजन की अवस्था थी, वस्त्र तथा रहने के स्थान का किराया कहाँ से आता?" इस कठिन विपत्ति में दादी जी ने काफी प्रयत्न किया कि किसी भले घर में मजदूरी या अनाज पीसने का काम कर लिया जाए, किन्तु नई जगह में सबसे अनजान, भिन्न भाषा वाले लोगों के बीच उन्हें कौन काम देता? भले घरों के लोग सहसा कैसे विश्वास करते? फिर भी दादी जी ने प्रयत्न जारी रखा। परंतु ''कोई मजदूरी पर अनाज भी पीसने को न देता था। डर था कि दुर्भिक्ष का समय है, खा लेगी। बहुत प्रयत्न करने के बाद एक-दो महिलाएँ अपने घर पर अनाज पिसवाने पर राजी हुईं, किन्तु पुरानी काम करने वालियों को कैसे जवाब दें? इसी प्रकार अड़चनों के बाद पाँच-सात सेर अनाज पीसने को मिल जाता, जिसकी पिसाई उस समय एक पैसा प्रति पसेरी थी। बड़े कठिनता से आधे पेट एक समय भोजन करके तीन-चार घण्टों तक पीसकर एक पैसा या डेढ़ पैसा मिलता।" इतनी मजदूरी करने के बाद बिस्मिल जी की दादी जी घर का ढेर सारा कार्य भी करतीं, बच्चों के लिए भोजन भी पकातीं। दो-तीन वर्ष तक इसी प्रकार दादी जी ने तथा दादा जी ने अपने परिवार का किसी प्रकार निर्वाह किया। अनेक बार नारायणलाल जी अपनी पत्नी से अपने पैतृक ग्राम वापस चलने के लिए कहते, परंतु विचित्रा देवी (बिस्मिल जी की दादी जी) बड़ी स्वाभिमानी स्त्री थीं, वे कष्ट सहने को तत्पर थीं परंतु अपना स्वाभिमान त्याग करना उन्हें मंजूर न था। जब भी नारायणलाल जी वापस पैतृक ग्राम लौटने की बात करते, विचित्रा देवी यही उत्तर देतीं ''कि जिनके कारण देश छूटा, धन-सामग्री सब नष्ट हुई और ये दिन देखने पड़े अब उन्हीं के पैरों में सिर रखकर दासत्व स्वीकार करने से इसी प्रकार प्राण दे देना कहीं श्रेष्ठ है, ये दिन सदैव न रहेंगे।" प्रत्येक प्रकार के कष्ट सहने के पश्चात् भी विचित्रा देवी अपने संकल्प पर कायम रहीं।

जब नारायणलाल जी को शाहजहाँपुर में रहते हुए चार-पाँच वर्ष हो गए, तब कुछ सज्जन उनसे परिचित हो गए। आस-पास की स्त्रियों ने भी समझा कि विचित्रा देवी भली महिला है, समय के फेर से इस दीन-दशा को प्राप्त हुईं हैं। तब बहुत सी महिलाएँ उन पर विश्वास करने लगीं, उनसे मेल-जोल भी रखने लगीं। दुर्भिक्ष का समय भी समाप्त हो गया। ''आर्थिक स्थितियों के कारण नारायण सिंह (दादाजी) ने ब्राह्मण वृत्ति के साथ-साथ आर्य समाज मंदिर में पूजा-अर्चना तथा यज्ञ कराना प्रारम्भ कर दिया। तभी से वहाँ के लोग इनको पंडित कहने लगे थे।" कभी-कभी किसी सज्जन व्यक्ति के यहाँ से कुछ दान प्राप्त हो जाता था, तो कभी कोई ब्राह्मण भोज करा देता था। इसी प्रकार समय व्यतीत होता गया तथा परिस्थितियों में भी धीरे-धीरे सुधार होने लगा। चूँकि नारायणलाल जी सात्विक प्रकृति के इन्सान थे तथा पूजा-पाठ, नियम-धर्म का पालन करते थे, साथ ही साथ ब्राह्मण वृत्ति भी करने लगे, यज्ञ-हवन करने लगे, इसलिए नारायणलाल जी को सभी पंडित कहने लगे। यह पंडित उपाधि उनके परिवार के साथ जुड़ गया। इस प्रकार से नारायणलाल जी की थोड़ी बहुत दशा सुधरी, पर कई महानुभाव जो संपत्तिवान थे परंतु उनके कोई सन्तान न थी, वे लोग नारायणलाल जी को प्रलोभन दिया करते थे कि वे अपना एक लड़का उन्हें देकर जितना चाहे धन प्राप्त कर लें परंतु दादी जी आदर्श तथा स्वाभिमानी महिला थी, उन्होंने किसी प्रकार के प्रलोभनों पर किंचित मात्र भी ध्यान न दिया। अभाव में ही सही, किसी न किसी प्रकार से वे अपने बच्चों का पालन-पोषण करती रहीं।

बिस्मिल जी की दादी जी अत्यंत साहसी महिला थीं। उनकी मेहनत-मजदूरी तथा दादा जी की ब्राह्मण-वृत्ति से कुछ पूँजी एकत्रित हो गई। कुछ सज्जन लोगों के सुझाव पर नारायणलाल जी ने बिस्मिल जी के पिताजी पं. मुरलीधर को शिक्षा प्राप्त करने के लिए पाठशाला में प्रवेश दिलवाया। दादा जी ने कुछ प्रयास तथा मेहनत की जिससे उनका वेतन बढ़कर सात रूपये मासिक हो गया। कुछ समय पश्चात् श्री नारायणलाल ने नौकरी छोड़ दी। उन्होंने पैसे, दुअन्नी, चवन्नी इत्यादि बेचने की दुकान शुरू कर दी। इससे उन्हें पाँच-सात आने रोज मिलने लगे। जो कष्टदायक समय था वह दूर होने लगा। इन सबका श्रेय दादी जी को था जिन्होंने अत्यंत भीषण कष्ट सहकर भी अपना साहस न खोया तथा परिवार को हिम्मत बंधायी। जिस धैर्य से उन्होंने कार्य किया वह उन पर किसी दैवीय शक्ति की कृपा ही कही जाएगी। दादी जी जिस जगह की रहने वाली थी वह पूर्ण रूप से रूढ़िवादी थी। वहाँ प्रत्येक हिन्दू प्रथा का पूर्णतया पालन किया जाता था इसलिए दादी जी साक्षर न हो सकीं, फिर भी उन्होंने स्वयं की मेहनत से अपरिचित जगह में मेहनत मजदूरी कर अपने बच्चों का पालन-पोषण किया तथा उन्हें शिक्षित बनाया। दादी जी ऐसे परिवार ऐसे समाज से आयीं थी, जहाँ उन्होंने कभी घर से बाहर कदम भी न रखा था। तत्कालीन समय में देश में जिस प्रकार रूढ़िवादिता, प्रथाओं के नाम पर नारी पर अनेक बन्धन तथा छुआछूत के रोग की पराकाष्ठा थी, ऐसी परिस्थितियों का वर्णन करते हुए बिस्मिल जी लिखते हैं, 8''ऐसी परिस्थितियों में जबकि उसने (दादी जी) कभी अपने जीवन में घर से बाहर पैर न रखा हो और जो ऐसे कट्टर देश की रहने वाली हो कि जहाँ पर प्रत्येक हिन्दू प्रथा का पूर्णतया पालन किया जाता हो, जहाँ के निवासी अपनी प्रथाओं की रक्षा के लिए प्राणों की किंचित मात्र भी चिन्ता न करते हों। किसी ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य की कुलवधु का क्या साहस, जो डेढ़ हाथ का घूंघट निकाले बिना एक घर से दूसरे घर पर चली जाए। शूद्र जाति की वधुओं के लिए भी यही नियम है कि वे रास्ते में बिना घंूघट निकाले न जाएं। शूद्रों का पहनावा ही अलग है, ताकि उन्हें देखकर ही दूर से पहचान लिया जाए कि यह किसी नीची जाति की स्त्री है। ये प्रथाएं इतनी प्रचलित हैं कि उन्होंने अत्याचार का रूप धारण कर लिया है। एक समय किसी चमार की वधु, जो अंग्रेजी राज्य से विवाह करके गई थी, कुल प्रथानुसार जमींदार के घर पैर छूने के लिए गई। वह पैरों में बिछुवे (नुपूर) पहने हुए थी और सब पहनावा चमारों का पहने थी। जमींदार महोदय की निगाह उसके पैरों पर पड़ी। पूछने पर मालूम हुआ कि चमार की बहू है। जमींदार साहब जूता पहनकर आए और उसके पैरों पर खड़े होकर इतने जोर से दबाया कि उसकी अंगुलियाँ ही कट गईं। उन्होंने कहा कि यदि चमारों की बहुऐं बिछुवा पहनेंगी तो ऊँची जाति के घर की स्त्रियाँ क्या पहनेंगी? ये लोग नितान्त अशिक्षित तथा मूर्ख हैं किन्तु जाति-अभिमान में चूर रहते हैं। गरीब से गरीब अशिक्षित ब्राह्मण या क्षत्रिय, चाहे वह किसी आयु का हो, यदि शूद्र जाति की बस्ती में से गुजरे तो चाहे कितना ही धनी या वृद्ध कोई शूद्र क्यों न हो, उसको उठकर पालागन या जुहार करनी ही पड़ेगी। यदि ऐसा न करे तो उसी समय वह ब्राह्मण या क्षत्रिय उसे जूतों से मार सकता है और सब उस शूद्र का दोष बताकर उसका तिरस्कार करेंगे। यदि किसी कन्या या बहू पर व्यभिचारिणी होने का सन्देह किया जाए तो उसे बिना किसी विचार के मारकर चम्बल में प्रवाहित कर दिया जाता है। इसी प्रकार यदि किसी विधवा पर व्यभिचार या किसी प्रकार आचरण-भ्रष्ट होने का दोष लगाया जाए तो वह गर्भवती ही क्यों न हो, उसे तुरंत ही काटकर चम्बल में पहुँचा दें और किसी को कानों-कान भी खबर न होने दें। वहाँ के मनुष्य भी सदाचारी होते हैं। दूसरे की बहू-बेटी को अपनी बहू-बेटी समझते हैं। स्त्रियों की मान-मर्यादा की रक्षा के लिए प्राण देने में भी कभी नहीं हिचकिचाते।" ऐसे क्षेत्र में विवाहित होकर आयीं बिस्मिल जी की दादी जी ने इतना साहस दिखाया कि स्वयं मजदूरी कर अपने परिवार का निर्वहन किया। इसी समय ''परिवार पर दूसरा संकट सामने आ गया और उन्हीं दिनों तपेदिक से छोटे बेटे कल्याणमल की मृत्यु हो गई। परिवार को इस घटना से असहनीय कष्ट हुआ। पूरा परिवार अन्दर ही अन्दर टूट चुका था।" ईश्वरीय कृपा से नारायणलाल जी के परिवार के कष्ट समाप्त हो गए। पं. मुरलीधर भी उचित शिक्षा प्राप्त कर चुके थे। इसी समय श्री नारायणलाल जी ने शाहजहाँपुर के खिरनी बाग मोहल्ले में एक मकान खरीद लिया। दर-दर भटकने वाले परिवार को रहने के लिए स्वयं का निवास-स्थान मिल गया। सारी परिस्थितियाँ अच्छी हो गई, इसलिए श्री नारायणलाल जी ने अपने ज्येष्ठ पुत्र पं. मुरलीधर का विवाह करने का विचार किया। श्रीमती विचित्रा देवी ने पण्डित मुरलीधर का ''सम्बन्ध पक्का कर लिया। स्वयं तोमर ठाकुर और माँ भदौरिया गौत्र की होने से अपने गाँव जोधपुरा के परिहारों की लड़की मूलवती देवी से सम्बन्ध जोड़ लिया। यह गाँव आगरा जिले की बाह तहसील में है। इसी बाह तहसील के गाँव छदामीपुरा में पं. मुरलीधर का विवाह सम्पन्न हुआ। बाद में कुछ दिन ननिहाल में रहकर पं. मुरलीधर अपनी 11 वर्षीय नववधु को लेकर शाहजहाँपुर लौट आए। श्री नारायणलाल के घर में सात्विक वातावरण था। वे स्वयं तो ईश्वर भक्त थे ही, बेटा मुरलीधर भी अपने पिता की भांति सात्विक विचारों के बन गए।"

विवाह के पश्चात् पं. मुरलीधर को म्युनिसिपैलिटी में पन्द्रह रूपये मासिक वेतन की नौकरी लग गई। पं. मुरलीधर को 11"यह नौकरी पसन्द न आई। उन्होंने एक-दो साल के बाद नौकरी छोड़ कर स्वतन्त्र व्यवसाय आरम्भ करने का प्रयत्न किया और कचहरी में सरकारी स्टाम्प बेचने लगे। उनके जीवन का अधिक भाग इसी व्यवसाय में व्यतीत हुआ। साधारण श्रेणी के गृहस्थ बनकर उन्होंने इसी व्यवसाय द्वारा अपनी सन्तानों को शिक्षा दी, अपने कुटुम्ब का पालन किया और अपने मुहल्ले के गणमान्य व्यक्तियों में गिने जाने लगे। वह रूपये का लेन-देन भी करते थे। उन्होंने तीन बैलगाड़ियाँ भी बनाई थीं, जो किराये पर चलती थीं।" पं. मुरलीधर ने अपने पिता की भांति कठोर परिश्रम किया तथा अपने परिवार के सम्मान को बढ़ाया, अपने माता-पिता के लिए वे सच्चे सपूत थे। पं. मुरलीधर व्यायाम से प्रेम करते थे। नियमित व्यायाम करने से उनका शरीर स्वस्थ्य एवं सुडौल था। वे नियमित रूप से अखाड़े में कुश्ती लड़ते थे।

कुछ समय के पश्चात मूलवती देवी ने एक पुत्र को जन्म दिया, कुछ दिनों के पश्चात् उसकी मृत्यु हो गई। ''यह समय ज्यादा न चला, पुनः मूलवती देवी के उदर में किसी बच्चे की हलचल होने लगी तो गुनी पंडितों की बात मानकर दादा नारायण सिंह ने अपनी पुत्रवधु को प्रसव हेतु मायके पहुँचा दिया। जहाँ 11 जून सन् 1897 ई. यानी ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष निर्जला एकादशी विक्रम सम्वत 1954 को पं. मुरलीधर की धर्मपत्नी ने द्वितीय पुत्र को जन्म दिया। उस समय प्रकृति भी ऐसे पुत्र के लिए मेहरबान हुई। दादी विचित्रा देवी ने इसे भगवान श्री राम का प्रसाद मानकर इस नवजात शिशु का नाम रामप्रसाद रख दिया।" इस प्रकार पं. रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म अपने ननिहाल आगरा जिले की बाह तहसील में ग्राम छदामीपुरा में हुआ था। इस विषय में अपवाद स्वरूप कई लेखकों का मानना है कि बिस्मिल जी का जन्म शाहजहाँपुर में हुआ था।

चूँकि पं. मुरलीधर का पहला पुत्र रोग से ग्रस्त होकर कुछ ही दिनों में चल बसा था इसलिए दादी विचित्रा देवी ने रामप्रसाद बिस्मिल जी के लिए अनेकों मन्नतें मानीं, गंडे, ताबीज तथा कवचों द्वारा अपने पौत्र रामप्रसाद के शरीर की रक्षा हेतु प्रयत्न किए। कुछ ही समय पश्चात् बिस्मिल जी को सूखा रोग हो गया। एक-दो मास पश्चात् ही उनकी शारीरिक अवस्था भी पहले बालक के समान होने लगी। तब किसी ने झाड़-फूंक की सलाह दादी विचित्रा देवी को दी। तब झाड़-फूंक द्वारा बिस्मिल जी का उपचार किया गया। इस उपचार के विषय में बिस्मिल जी लिखते हैं, "किसी ने बताया कि सफेद खरगोश को मेरे शरीर पर घुमाकर जमीन पर छोड़ दिया जाये, यदि बीमारी होगी तो खरगोश तुरन्त मर जायेगा। कहते हैं हुआ भी ऐसा ही। एक सफेद खरगोश मेरे शरीर पर से उतारकर जैसे ही जमीन पर छोड़ा गया, वैसे ही उसने तीन चार चक्कर काटे और मर गया। मेरे विचार में किसी अंश में यह सम्भव भी है, क्योंकि औषधि तीन प्रकार की होती हैं - (1) दैविक (2) मानुषिक (3) पैशाचिक। पैशाचिक औषधियों में अनेक प्रकार के पशु या पक्षियों के मांस अथवा रूधिर का व्यवहार होता है, जिनका उपयोग वैद्यक के ग्रन्थों में पाया जाता है। इसमें से एक प्रयोग बड़ा ही कौतुहलोत्पादक तथा आश्चर्यजनक यह है कि जिस बच्चे को जभोखे (सूखा) की बीमारी हो गई हो, यदि उसके सामने चमगादड़ चीरकर लाया जाये तो एक-दो मास का बालक चमगादड़ को पकड़कर उसका खून चूस लेगा और बीमारी जाती रहेगी। यह बड़ी उपयोगी औषधि है और एक महात्मा की बतलाई हुई है।" बिस्मिल की दादी जी तथा माता जी ने उनकी खूब देखभाल की जिससे वे जल्दी ही स्वस्थ्य होने लगे।

जब बिस्मिल जी सात वर्ष के थे तब पं. मुरलीधर ने उन्हें शिक्षा प्रदान करने का निर्णय लिया। पं. मुरलीधर घर में ही बिस्मिल जी को हिन्दी अक्षरों का बोध कराने लगे। उर्दू पढ़ने के लिए बिस्मिल जी को एक मौलवी साहब के मकतब में भेजा जाने लगा। पं. मुरलीधर बिस्मिल जी की शिक्षा पर अत्यधिक ध्यान देते थे, शिक्षा के विषय में तनिक भी लापरवाही उन्हें सहन न थी इसलिए पढ़ाई में जरा सी भूल हो जाने पर बिस्मिल जी की बहुत पिटाई होती थी। इस विषय में बिस्मिल जी लिखते है "मुझे अब भी भली भांति स्मरण है कि जब मैं नागरी (देवनागिरी हिन्दी) के अक्षर लिखना सीख रहा था तो मुझे 'उ' लिखना न आया। मैंने बहुत प्रयत्न किया। पर जब पिताजी कचहरी चले गये तो मैं भी खेलने चला गया। पिताजी ने कचहरी से आकर मुझसे 'उ' लिखवाया तो मैं न लिख सका। उन्हें मालूम हो गया कि मैं खेलने चला गया था, इस पर उन्होंने मुझे बन्दूक के लोहे के गज से इतना पीटा कि गज टेढ़ा पड़ गया। भागकर दादी जी के पास चला गया, तब बचा।'' बिस्मिल जी बचपन में बहुत उद्दण्ड थे। अपने मित्रों के साथ मिलकर बहुत अठखेलियाँ व शैतानियाँ किया करते थे। पं. मुरलीधर पर्याप्त अनुशासन रखते थे, पर फिर भी बिस्मिल जी उद्दण्डता करते रहते थे। अपनी इसी प्रकार की उद्दण्डता का वर्णन करते हुए स्वयं बिस्मिल जी लिखते हैं "एक समय किसी के बाग में जाकर आडू के वृक्षों में से सब आडू तोड़ डाले। माली पीछे दौड़ा किन्तु मैं उनके हाथ न आया। माली ने सब आडू पिताजी के सामने ला रखे। उस दिन पिताजी ने मुझे इतना पीटा कि मैं दो दिन तक उठ न सका। इसी प्रकार खूब पिटता था, किन्तु उद्दण्डता अवश्य करता था। शायद उस बचपन की मार से ही यह शरीर बहुत कठोर तथा सहनशील बन गया।'' इतनी मार खाने के पश्चात् भी बिस्मिल जी अपनी जिद पूरी अवश्य करते थे। इसी स्वभाव के कारण वे भारत माता के स्वतंत्रता संघर्ष में अनेक कष्ट सहकर भी स्वराज्य प्राप्ति के लिए बलिदान हो गए।

इसी समय पं. मुरलीधर जो कि व्यायाम के शौकीन तथा नियमित कुश्ती लड़ने वाले, बलिष्ठ शरीर, अपने से दो गुने व्यक्ति को भी उठाकर पटक देने वाले, एक मित्र महोदय की संगत में नशे की विसंगति में फंस गये। बिस्मिल जी इस घटना के विषय में लिखते हैं। 16"पिताजी का एक बंगाली (श्री चटर्जी) महाशय से प्रेम हो गया। चटर्जी महाशय की अंग्रेजी की दवा की दुकान थी। वह बड़े भारी नशेबाज थे। एक समय में आधा छटांक चरस की चिलम उड़ाया करते थे। उन्हीं की संगति में पिताजी ने भी चरस पीना सीख लिया, जिसके कारण उनका शरीर नितान्त नष्ट हो गया। दस वर्ष में ही सम्पूर्ण शरीर सूखकर हड्डियाँ निकल आईं। चटर्जी महाशय सुरापान भी करने लगे। अतःएव उनका कलेजा बढ़ गया और उसी से उनका शरीरांत हो गया। मेरे बहुत कुछ समझाने के बाद पिताजी ने चरस पीने की आदत को छोड़ा, किन्तु बहुत दिनों के बाद।"

बिस्मिल जी के पश्चात् उनकी पाँच बहनों और तीन भाईयों का जन्म हुआ। बिस्मिल जी के कुल की प्रथा थी कि कन्याओं को जन्म लेते ही मार दिया जाता था। जब बिस्मिल जी की बहनों का जन्म हुआ, तब दादी विचित्रा देवी ने कुल परम्परानुसार कन्याओं को मारने के लिए कहा किन्तु बिस्मिल जी की माता मूलवती देवी ने विरोध किया। माता मूलवती ने अपनी पुत्रियों की प्राण रक्षा की तथा ऐसी कुप्रथा के विरूद्ध आवाज उठाई। बिस्मिल जी अपनी माता के इस साहस के विषय में लिखते हैं "माताजी ने इसका विरोध किया और कन्याओं के प्राणों की रक्षा की। मेरे कुल में यह पहला ही समय था कि कन्याओं का पोषण हुआ। पर इनमें से दो बहनों और दो भाईयों का देहान्त हो गया। शेष एक भाई जो इस समय (1927 ई.) दस वर्ष का है और तीन बहनें बची।" माता मूलवती के प्रयासों ने उनकी पुत्रियों की रक्षा की। पाँच बहनों में से दो का देहान्त हो गया बिस्मिल जी की तीन बहनें- शास्त्री देवी, ब्रह्मा देवी तथा भागवती देवी बचीं। तीन भाईयों में से दो का देहान्त हो गया जिसके पश्चात् एक भाई श्री सुशीलचन्द्र बचे। माता मूलवती के प्रयासों से बिस्मिल जी की तीनों बहनों को अच्छी शिक्षा दी गई और उनके विवाह बड़ी धूमधाम से किए गए। इससे पूर्व बिस्मिल जी के कुल की कन्याएँ किसी को ब्याही न गयीं थीं। क्योंकि उन्हें जीवित ही नहीं रखा जाता था। बिस्मिल जी अपनी बहनों से बहुत स्नेह करते थे। उन्होंने सदैव उन्हें शिक्षित होने तथा साहसी बनाने का प्रोत्साहन दिया। बिस्मिल जी ने कुल में चलने वाली कुप्रथा का विरोध किया। अपनी बहनों को वे अपने समकक्ष ही मानते थे। बिस्मिल जी के बहनों के प्रति अति स्नेह के विषय में बिस्मिल जी की बहन शास्त्री देवी कहती हैं 18"मेरा (शास्त्री देवी) जन्म सन् 1901 में हुआ था। भाई रामप्रसाद बिस्मिल के चार साल बाद मैं पैदा हुई थी। भाई जी मुझ पर बहुत स्नेह रखते थे। मेरे पिता के खानदान में लड़कियों को पैदा होते ही मार डालते थे। मुझे मारने के लिए बाबा और दादी ने मेरी माता जी को कहा मगर माता जी ने नहीं मारा। भाई बहुत रोते थे कि बिटिया को मत मारो। मैं तीन महीने की हो गई थी तब दादी ने माता जी से ताना मारकर कहा कि क्या लड़का है, जो इतनी हिफाजत करती है? माता जी ने बाबा के पास से अफीम मंगाकर मुझे पिला दी। पड़ोस में थानेदार का मकान था। उनकी पत्नी हमारे घर आती थीं। उन्होंने मेरी खराब हालत देखी और कहा कि इसे क्या दे दिया? मैं दरोगा जी से कहूँगी। उन्होंने दरोगा जी से भी कह दिया। दरोगा जी ने दादी को बुलाकर कहा कि मैं सबको गिरफ्तार करा दूँगा। तुम लोगों ने कन्या की हत्या क्यों की? तब मेरा इलाज किया गया। तीसरे दिन मुझे होश आया फिर माँ को दूध नहीं पिलाने दिया। कभी-कभी गाय का दूध माताजी छिपाकर पिला देती थीं। तीन साल तक अफीम के नशे में रखा। एक मुंसिफ साहब पड़ोस में रहते थे। उनके कोई बच्चा न था। मुंसिफ की पत्नी हमारे ही घर से दूध लेकर मुझे पिलाती रही। मैं चंगी होती गई। दो साल के बाद उनके बालक हुआ, मगर वह मेरी हिफाजत करती रहीं। कहने लगीं, इसी कन्या के भाग्य से मेरे पुत्र हुआ। उनकी बदली हुई, तो मुझे माँगा और कहा, मैं ही शादी करूंगी, मगर घर वालों ने नहीं दिया। भाई ने रोना शुरू कर दिया कि मैं अपनी बिटिया को नहीं दूँगा। भाई को स्त्री-समाज से बहुत प्रेम हो गया। मुझे बराबर साथ-साथ संध्या हवन सिखाया।" बिस्मिल अपनी बहनों से बेटियों के समान स्नेह करते थे। बिस्मिल जी इस बात के पक्षधर थे कि नारी उत्थान से ही देश का विकास संभव है। नारी को देश के कार्यों में बढ़ चढ़कर भाग लेना चाहिए।

बिस्मिल जी के ''दादा जी बड़ी सरल प्रकृति के मनुष्य थे। जब तक वे जीवित रहे, पैसे बेचने का ही व्यवसाय करते रहे। उनको गाय पालने का बहुत बड़ा शौक था। स्वयं ग्वालियर जाकर बड़ी-बड़ी गायें खरीद लाते थे। वहाँ की गायें काफी दूध देती हैं। अच्छी गाय दस या पन्द्रह सेर दूध देती है। ये गायें बड़ी सीधी भी होती हैं। दूध दोहन करते समय उनकी टांगे बांधने की आवश्यकता नहीं होती और जब जिसका जी चाहे बिना बच्चे के दूध दोहन कर सकता है। बचपन में रामप्रसाद बिस्मिल बहुधा जाकर गाय के थन में मुँह लगाकर दूध पिया करते थे। वास्तव में वहाँ की गायें दर्शनीय होती है।" श्री नारायणलाल को एक प्रकार का पुराने समय का खेल अट्ठारह गोटी जिसे बघिया बग्घा भी कहा जाता था, खेलने का बहुत शौक था। श्री नारायणलाल ईश्वर भक्त इंसान थे। नित्य प्रति संध्या समय में वे शिव-मन्दिर में जाकर दो घण्टे तक परमात्मा का भजन करते थे। साथ में अपने पौत्र बिस्मिल जी को भी ले जाते थे। श्री नारायणलाल जी की ईश्वर भक्ति तथा संस्कार ही पं. मुरलीधर तथा बिस्मिल में भी थे। श्री नारायणलाल का लगभग पचपन वर्ष की आयु में देहान्त हो गया। दादा जी का स्नेहपूर्ण हाथ अवश्य ही उठ गया परंतु उनका आशीर्वाद संस्कार रूप में बिस्मिल जी में सदैव बने रहे। पं. मुरलीधर के कठोर अनुशासन तथा शिक्षा के प्रति उनकी सचेतता के कारण बिस्मिल जी ने उर्दू की चैथी कक्षा उत्तीर्ण कर ली तथा पाँचवे दर्जे में प्रवेश कर लिया। इसी समय बिस्मिल कुछ गलत मित्रों की संगत में पड़कर कुसंगति का शिकार हो गए। वे अपने पिताजी के संदूक से रूपये-पैसे चुराने लगे। इन पैसों से वे उर्दू के उपन्यास खरीदकर पढ़ा करते थे। बिस्मिल जी में नशे की आदत भी लग गई। वे सिगरेट पीने लगे तथा कभी-कभी भांग का नशा भी करते थे। इस कुमारावस्था में हाथ में पैसा आ जाने से तथा उर्दू के प्रेमरसपूर्ण रोमांस के उपन्यास तथा गजलें पढ़कर उनके आचरण में कुछ और भी त्रुटियाँ आ गईं। जिस पुस्तक विक्रेता से बिस्मिल जी उपन्यास की पुस्तकें खरीदा करते थे। वे महाशय पं. मुरलीधर को जानते थे, अतः उन्होंने पं. मुरलीधर से बिस्मिल जी के इस प्रकार की पुस्तकों के खरीदने के विषय में सारी बातें बता दी। जिससे पं. मुरलीधर ने बिस्मिल जी के क्रियाकलापों पर निगरानी रखनी शुरू कर दी। एक दिन बिस्मिल जी को पं. मुरलीधर ने पैसे चुराते रंगे हाथों पकड़ लिया। इस घटना का वर्णन करते हुए बिस्मिल जी लिखते हैं। "घुन लगना आरम्भ ही हुआ था कि परमात्मा ने बड़ी सहायता की। मैं एक रोज भंग पीकर पिताजी की संदुकची में से रूपये निकालने गया। नशे की हालत में होश ठीक न रहने के कारण संदूकची खटक गई। माताजी को संदेह हुआ। उन्होंने मुझे पकड़ लिया। चाभी पकड़ी गई। मेरे सन्दूक की तलाशी ली गई, बहुत से रूपये निकले और सारा भेद खुल गया। मेरी किताबों में अनेक उपन्यासादि पाए गए जो उसी समय फाड़ डाले गये।" इसके पश्चात् पं. मुरलीधर ने अपनी संदूकची का ताला बदल दिया। इसके पश्चात् बिस्मिल जी ने रूपये चुराने की बहुत कोशिश की परंतु असफल रहे। कोई मार्ग न रह जाने पर बिस्मिल जी को जब तब कभी मौका मिल जाता तो माताजी के रूपयों पर हाथ फेर देते थे। इन्हीं कुसंगतियों में फंसे रहने के कारण बिस्मिल जी दो बार उर्दू की मिडिल परीक्षा में अनुत्तीर्ण रहे। इससे पंमुरलीध् ार को काफी रोष हुआ। इसके पश्चात् बिस्मिल जी ने अंग्रेजी पढ़ने की इच्छा प्रकट की। बिस्मिल जी के ''पिताजी चाहते थे कि जब ठीक पढ़ता ही नहीं तो अब पढ़ाई त्यागकर किसी धन्धे में इन्हें (बिस्मिल जी) लगाया जाए। किन्तु मां और दादी मां उन्हें उच्च शिक्षा दिलाना चाहती थीं। परिणाम यह निकला कि पिताजी को उनकी बात माननी पड़ी और रामप्रसाद जी अंग्रेजी पढ़ने भेजे गये।" जब बिस्मिल जी दूसरे वर्ष की मिडिल परीक्षा में असफल हुए, तभी पड़ोस के देव मंदिर में, जिसकी दीवार बिस्मिल जी के घर की दीवार से लगी हुई थी, एक पुजारी जी आ गए। वे बहुत ही सच्चरित्र तथा सज्जन व्यक्ति थे। बिस्मिल बहुत पहले से ही अपने दादा जी के साथ मंदिर जाया करते थे। मंदिर में इन्हीं सच्चरित्र पुजारी जी से बिस्मिल जी का संपर्क हुआ। बिस्मिल जी उनके पास उठने बैठने लगें। पुजारी जी के सम्पर्क में आने से बिस्मिल जी के जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ। वे उन कुसंगतियों से बाहर निकलने लगे, जिन्होंने उनके जीवन में पतन का मार्ग प्रषस्त किया था। स्वयं बिस्मिल जी लिखते हैं "मैं मंदिर आने जाने लगा। कुछ पूजा पाठ भी सीखने लगा। पुजारी जी के उपदेशों का बड़ा उत्तम प्रभाव हुआ। मैं अपना अधिकतर समय स्तुति-पूजन तथा पढ़ने में व्यतीत करने लगा। पुजारी जी मुझे ब्रह्मचर्य पालन का खूब उपदेश देते थे। वे मेरे पथ-प्रदर्शक बनें। मैंने एक दूसरे सज्जन की देखा-देखी व्यायाम करना भी प्रारम्भ कर दिया। अब तो मुझे भक्ति-मार्ग में कुछ आनन्द प्राप्त होने लगा और चार-पाँच महीने में ही व्यायाम भी खूब करने लगा। मेरी सब बुरी आदतें और कुभावनाऐं जाती रहीं।" पुजारी जी के सत्संग से बिस्मिल जी के सब कुटेवों (बुरी आदतें) का अंत हो गया; किन्तु वे सिगरेट की आदत को न छोड़ सके। इसी समय बिस्मिल जी के स्कूलों की छुट्टियां समाप्त हो गई और मिशन स्कूल के अंग्रेजी के पाँचवे दर्जे में प्रवेष दिला दिया गया। सिगरेट की बुरी लत से बिस्मिल जी को दुःख भी होता था, परन्तु वे उसे छोड़ ही नहीं पा रहे थे। वे एक दिन में कई-कई सिगरेट पी लेते थे। बिस्मिल जी इस दुःख के विषय में लिखते हैं कि "मैं सिगरेट बहुत पीता था। एक दिन में पचास-साठ सिगरेट पी डालता था। मुझे बड़ा दुःख होता था कि मैं इस जीवन में सिगरेट पीने की कुटेव को न छोड़ सकूँगा। स्कूल में भर्ती होने के थोड़े दिनों बाद ही एक सहपाठी श्रीयुत सुशील चन्द्र सेन से कुछ विशेष स्नेह हो गया।" बिस्मिल जी तथा श्री सुशील चन्द्र सेन बहुत अच्छे मित्र बन गए थे। श्री सुशील चन्द्र के स्नेह पूर्ण समझाइश तथा आग्रह के कारण बिस्मिल जी ने सिगरेट पीने की वो लत छोड़ दी जिसे वे चाहकर भी न छोड़ पा रहे थे।

बिस्मिल जी के सभी बुराइयों को छोड़कर नियमित व्यायाम तथा पूजा-पाठ करने से उनका शरीर स्वस्थ्य तथा मन स्वच्छ रहने लगा। बिस्मिल जी देव-मन्दिर नियमित रूप से जाते थे। उनकी स्तुति-पूजा तथा धार्मिक निष्ठा को देखकर श्री मुंशी इन्द्रजीत जी ने संध्या करने का उपदेश दिया। मुंशी इन्द्रजीत उसी मंदिर में रहने वाले किसी सज्जन से मिलने आया करते थे। मुंशी इन्द्रजीत ने ही बिस्मिल जी को आर्य समाज के सिद्धांतों से परिचित कराया। जिससे बिस्मिल जी भी आर्य समाज में सम्मिलित हो गए। बिस्मिल जी इसका वर्णन करते हुए लिखते हैं "व्यायामादि के कारण मेरा शरीर बड़ा सुगठित हो गया था और रंग निखर गया था। मैंने जानना चाहा कि संध्या क्या वस्तु है। मुंशी जी ने आर्य-समाज संम्बधी कुछ उपदेश दिये। इसके बाद मैंने सत्यार्थ प्रकाश पढ़ा। इससे तख्ता ही पलट गया। सत्यार्थ प्रकाश के अध्ययन ने मेरे जीवन के इतिहास में नवीन पृष्ठ खोल दिया।" बिस्मिल जी ने स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा रचित 'सत्यार्थ प्रकाश' का अध्ययन किया। उस पुस्तक के ज्ञान तथा उसमें उल्लिखित ब्रह्मचर्य व्रत के नियमों के अध्ययन से बिस्मिल जी के जीवन तथा दिनचर्या में अभूतपूर्व परिवर्तन आया। इस परिवर्तन के विषय में बिस्मिल जी लिखते हैं कि "मैंने उसमें (सत्यार्थ प्रकाष पुस्तक) उल्लिखित ब्रह्मचर्य के कठिन नियमों का पालन करना आरम्भ कर दिया।

मैं कम्बल को तख्त पर बिछाकर सोता और प्रातः काल चार बजे से ही शैया-त्याग कर देता। स्नान-सन्ध्यादि से निवृत्त होकर व्यायाम करता, परन्तु मन की वृत्तियाँ ठीक न होती। मैंने रात्रि के समय भोजन करना त्याग दिया। केवल थोड़ा सा दूध ही रात को पीने लगा। सहसा ही बुरी आदतों को छोड़ा था, इस कारण कभी-कभी स्वप्न दोष हो जाता। तब किसी सज्जन के कहने से मैंने नमक खाना भी छोड़ दिया। केवल उबालकर साग या दाल से एक समय भोजन करता था। मिर्च-खटाई तो छूता भी न था। इस प्रकार पाँच वर्ष तक बराबर नमक न खाया। नमक न खाने से शरीर के दोष दूर हो गए और मेरा स्वास्थ्य दर्शनीय हो गया। सब लोग मेरे स्वास्थ्य को आश्चर्य की दृष्टि से देखा करते थे।" बिस्मिल जी की बड़ी बहन शास्त्री देवी की पुत्रवधु श्रीमती रामश्री के अनुसार "बिस्मिल जी को दलिया और जौं की रोटी बहुत पसन्द थी, बचपन के बाद नमक, मिर्च-मसाला उन्होंने कभी प्रयोग नहीं किया। गूलर का फल पिसवाकर घी और शहद में मिलाकर खाया करते थे। रामप्रसाद बिस्मिल हमेशा ठंडी चीजों का ही प्रयोग करते थे। एक दिन पण्डित रामप्रसाद जी शाहजहाँपुर में नदी में स्नान करने गए, वहाँ उन्हें सांप ने काट लिया था। पण्डित जी जब घर लौटे तो उन्हें थूक में खून आया, मां ने पूछा कि यह खून कैसा तो दूसरे दिन वहीं नदी के किनारे जाकर मरे हुए सांप को लाकर दिखा दिया कि इसकी वजह से खून आया था चूँकि सांप बिस्मिल जी को काटने के बाद वहीं मर गया था।" इस प्रकार बिस्मिल जी ने आर्य-समाज के सिद्धांतों तथा कठोर नियमों का पालन करना अपनी नियमित दिनचर्या का मुख्य हिस्सा बना लिया था। इससे बिस्मिल जी में एक योगी की भाँति शारीरिक व मानसिक शक्ति व संयम आ गया।

थोड़े ही दिनों के पश्चात् बिस्मिल जी आर्य-समाज के सच्चे कार्यकर्ता बन गए। वे कट्टर आर्य-समाजी बन गए। बिस्मिल जी आर्यसमाज के प्रत्येक अधिवेशन में जाते थे। आर्य-समाज में आने वाले प्रत्येक सन्यासी-महात्मा के उपदेश सुनते। बिस्मिल जी सन्यासी-महात्माओं की प्रत्येक प्रकार से सेवा करते थे। बिस्मिल जी की प्राणायम सीखने की उत्कट इच्छा थी। इसलिए बिस्मिल जी "जिस सन्यासी का नाम सुनते, शहर से तीन-चार मील उसकी सेवा के लिए जाते, फिर वह सन्यासी चाहे जिस मत का अनुयायी होता।" एक बार शाहजहाँपुर में आर्य-समाजियों तथा सनातन धर्मी पण्डितों के बीच शास्त्रार्थ हुआ, जिसमें आर्यसमाजी हार गये। बिस्मिल जी ने इस शास्त्रार्थ कार्यक्रम में आर्यसमाजी होने के कारण एक सच्चे कार्यकर्ता की भाँति सहयोगपूर्ण कार्य किया। इस बात की शिकायत कुछ लोगों ने पं. मुरलीधर से कर दी। पं. मुरलीधर सनातनधर्मी होने के कारण बिस्मिल से रुष्ट हो गए तथा उन्हें आर्य-समाज छोड़ने के लिए कहा। जब बिस्मिल जी न मानें तो उन्हें घर से निकल जाने को कहा, बिस्मिल जी घर छोड़कर चले गए। दो दिन बाद जब पं. मुरलीधर को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ तब वे बिस्मिल जी को मनाकर वापस घर ले आए। बिस्मिल जी इस घटना का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि "जब मैं अंग्रेजी के सातवें दर्जे में था तब सनातनधर्मी पण्डित जगतप्रसाद जी शाहजहाँपुर पधारे उन्होंने आर्यसमाज का खण्डन करना प्रारम्भ किया। आर्य समाजियों ने भी उनका विरोध किया और पं. अखिलानंद जी को बुलाकर शास्त्रार्थ कराया। शास्त्रार्थ संस्कृत में हुआ। जनता पर अच्छा प्रभाव हुआ। मेरे कामों को देखकर मुहल्ले वालों ने पिताजी से मेरी शिकायत की। पिताजी ने मुझसे कहा कि आर्य-समाजी हार गये, अब तुम आर्य-समाज से अपना नाम कटा दो। मैंने पिताजी से कहा कि आर्य-समाज के सिद्धान्त सार्वभौमिक हैं, उन्हें कौन हरा सकता है? अनेक वाद-विवाद के पश्चात् पिताजी जिद्द पकड़ गए कि आर्य-समाज से त्यागपत्र न देगा तो घर छोड़ दे। मैंने भी विचारा कि पिताजी का क्रोध बढ़ गया और उन्होंने मुझ पर कोई वस्तु ऐसी दे पटकी कि जिससे बुरा परिणाम हुआ तो अच्छा न होगा। अतएव घर त्याग देना ही उचित है। मैं केवल एक कमीज पहने खड़ा था और पाजामा उतारकर धोती पहन रहा था। पाजामे के नीचे लंगोट बंधा था। पिताजी ने हाथ से धोती छीन ली और कहा 'घर से निकल'। मुझे भी क्रोध आ गया। मैं पिताजी के पैर छूकर गृह त्याग कर चला गया। कहाँ जाऊँ कुछ समझ में न आया। शहर में किसी से जान-पहचान न थी कि जहाँ छिपा रहता। मैं जंगल की ओर भाग गया। एक रात और एक दिन बाग में पेड़ पर बैठा रहा। भूख लगने पर खेतों में से हरे चने तोड़कर खाए, नदी में स्नान किया और जलपान किया। दूसरे दिन संध्या समय पं. अखिलानन्द जी का व्याख्यान आर्य-समाज मंदिर में था। मैं आर्य-समाज मंदिर में गया। एक पेड़ के नीचे एकान्त में खड़ा व्याख्यान सुन रहा था कि पिताजी दो मनुष्यों को लिए आ पहुंचे और मैं पकड़ लिया गया। वह उसी समय स्कूल के हैड मास्टर के पास ले गए। हैड मास्टर साहब ईसाई थे। मैंने उन्हें सब वृतान्त कह सुनाया। उन्होंने पिताजी को समझाया कि समझदार लड़के को मारना-पीटना ठीक नहीं। मुझे भी बहुत कुछ उपदेश दिया।" उस दिन के पश्चात् पं. मुरलीधर ने बिस्मिल जी पर कभी हाथ न उठाया। बिस्मिल के घर से जाने के बाद पूरा परिवार चिन्ताग्रस्त हो गया था। पं. मुरलीधर को काफी धक्का लगा था। सब परिवारजन बुरी आशंकाओं में डूब गए थे कि कहीं बेटा अकेला कहीं नदी में न डूब गया हो, कहीं रेल से कट न गया हो। इन सब आशंकाओं से पं. मुरलीधर तथा सभी परिवार वाले आशंकित हो गए थे इसलिए जब बिस्मिल जी मिल गए तो पं. मुरलीधर ने कभी भविष्य में अपने पुत्र पर अधिक क्रोध न करने का संकल्प ले लिया तथा उस दिन से वे बिस्मिल जी की प्रत्येक बात सहन कर लेते थे।

जब बिस्मिल जी आठवें दर्जे में आए तब उनके जीवन में स्वामी सोमदेव का आगमन हुआ। स्वामी सोमदेव बिस्मिल जी के गुरू तथा पथ-प्रदर्शक थे। स्वामी सोमदेव की शिक्षाओं तथा उपदेशों का बिस्मिल जी के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पडा़ । बिस्मिल जी ने उनकी बहुत सेवा की। बिस्मिल जी लिखते है "स्वामी श्री सोमदेव जी सरस्वती, आर्य-समाज शाहजहाँपुर में पधारे। उनके व्याख्यानों का जनता पर बड़ा अच्छा प्रभाव हुआ। कुछ सज्जनों के अनुरोध से स्वामी जी कुछ दिनों के लिए शाहजहाँपुर आर्य-समाज मन्दिर में ठहर गए। स्वामी जी की तबियत भी कुछ खराब थी। इसी कारण शाहजहाँपुर का जलवायु लाभदायक देखकर वहाँ ठहरे थे। मैं उनके पास आया-जाया करता था। प्राणपण से मैंने स्वामी जी महाराज की सेवा की और इसी सेवा के परिणामस्वरूप मेरे जीवन में नवीन परिवर्तन हो गया। मैं रात को दो-तीन बजे तक और दिन-भर उनकी सेवा शुश्रूषा में उपस्थित रहता।" उनके प्रकार से स्वामी सोमदेव का उपचार किया गया, अनेक सज्जनों ने विभिन्न प्रकार की औषधियों का सेवन करने की सलाह दी, अनेक प्रयत्नों के पश्चात् भी स्वामी जी के रोग का शमन न हो सका। बिस्मिल जी ने दिन-रात उनकी सेवा की। स्वामी जी ने भी बिस्मिल जी को आध्यात्मिक तथा राष्ट्रीय चेतना संम्बधी उपदेश दिए। उनकी शिक्षाओं ने बिस्मिल जी में आध्यात्मिक बल तथा हृदय में छिपी देश भक्ति की भावना को बाहर निकाला। बिस्मिल जी का अधिकांश समय आर्यसमाज मंदिर में ही व्यतीत होने लगा था।

बिस्मिल जी ने कुछ नवयुवकों के साथ मिलकर आर्य समाज मंदिर में 'आर्य कुमार सभा' का गठन किया। यह बिस्मिल का पहला संगठन था। बिस्मिल जी की इस आर्य कुमार सभा का प्रत्येक सप्ताह अधिवेशन होता था। यहाँ पठन-पाठन, वाद-विवाद तथा लेखन इत्यादि कार्य होता था। आर्य कुमार सभा कुछ ही दिनों में अपने अधिवेशन तथा कार्यों के कारण प्रसिद्ध हो गया। यह आर्य कुमार सभा राष्ट्रीय चेतना तथा ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध तथा स्वदेश प्राप्ति की भावना का प्रचार करती थी। यह कार्य आर्य कुमार सभा में अप्रत्यक्ष रूप से किया जाता था फिर भी मुख्यतः इसका कार्य आर्य समाज के सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार करना था। बिस्मिल जी आर्य कुमार सभा के विषय में संक्षेप में बताते हुए लिखते है "आर्य समाज मंदिर में आर्य कुमार सभा खोली थी जिनके साप्ताहिक अधिवेशन प्रत्येक शुक्रवार को हुआ करते थे। वहीं पर धार्मिक पुस्तकों का पाठन, विषय-विशेष पर निबन्ध लेखन और पाठन तथा वाद-विवाद होता था। कुमार सभा से ही मैंने जनता के सम्मुख बोलने का अभ्यास किया। बहुधा कुमार सभा के नवयुवक मिलकर शहर के मेलों में प्रचारार्थ जाया करते थे। बाजारों में व्याख्यान देकर आर्य-समाज के सिद्धांतों का प्रचार करते थे। ऐसा करते-करते मुसलमानों से मुबाहसा होने लगा अतएव पुलिस ने झगड़े का भय देखकर बाजारों में व्याख्यान देना बन्द करवा दिया। आर्य समाज के सदस्यों ने कुमार सभा के प्रयत्न को देखकर उस पर अपना शासन जमाना चाहा, किन्तु कुमार किसी का अनुचित शासन कब मानने वाले थे। आर्य समाज के मंदिर में ताला डाल दिया गया कि कुमार-सभा वाले आर्यसमाज मंदिर में अधिवेषन न करें। यह भी कहा गया कि यदि वे वहाँ अधिवेशन करेंगे, तो पुलिस को बुलाकर मंदिर से निकलवा दिया जायेगा। कई महीनों तक हम लोग मैदान में अपनी सभा के अधिवेशन करते रहे, किन्तु बालक ही तो थे, कब तक इस प्रकार के कार्य चला सकते थे? कुमार सभा टूट गई। तब आर्य समाजियों को शांति हुई।" बिस्मिल जी की आर्य कुमार सभा ने अपने अधिवेशन तथा कार्यों के माध्यम से कम समय में अत्याधिक प्रसिद्धी प्राप्त कर ली थी। चूँकि आर्य कुमार सभा का गठन आर्य समाज मंदिर में हुआ तथा इस सभा का मुख्य कार्य आर्य समाज के सिद्धांतों का प्रचार प्रसार करना था। अतःएव आर्य-समाज के सदस्यों ने इस सभा को अपने आधिपत्य में रखने का विचार किया, जिसे आर्य कुमार सभा के सदस्यों ने पूर्ण न होने दिया। इससे आर्य-समाजियों ने उस सभा का विरोध किया। अंततः कुमार सभा इस अलगाव व विरोध के कारण टूट गई। परंतु आर्य कुमार सभा ने सक्रिय कार्यों तथा अधिवेशन के द्वारा देश भर में नाम कमाया। इसी कारण शाहजहाँपुर की आर्य कुमार सभा को सम्मानित किया गया। ''जब लखनऊ में कांग्रेस हुई तो भारतवर्षीय कुमार सम्मेलन का भी वार्षिक अधिवेशन वहाँ हुआ। उस अवसर पर सबसे अधिक पारितोषिक लाहौर और शाहजहाँपुर की कुमार सभाओं ने पाए थे। जिनकी प्रशंसा समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई थी।"

इन्हीं दिनों बिस्मिल जी का परिचय मिशन स्कूल में एक विद्यार्थी से हुआ। यह सज्जन कभी-कभी कुमार सभा में जाया करते थे। कुमार सभा में बिस्मिल जी के दिए गए भाषणों का उन पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ा। उन सज्जन का निवास बिस्मिल जी के घर के निकट ही था। वे सज्जन और बिस्मिल में धीरे-धीरे, उठने-बैठने से आपस में स्नेह तथा लगाव बढ़ गया। वे सज्जन एक ऐसे ग्राम के निवासी थे जो बंदूके तथा तमंचे बनाने के लिए प्रसिद्ध था। उस ग्राम के अधिकांश निवासियों के पास बंदूके आदि रहती थीं। ये बंदूके टोपीदार होती थी। उन महाशय के पास भी एक नाली का छोटा सा पिस्तौल था जिसे वह अपने साथ शहर में ही रखते थे। बिस्मिल जी की प्रारम्भ से ही इस प्रकार का हथियार रखने की उत्कट इच्छा थी। एक बार उन सज्जन ने प्रेमवष बिस्मिल जी को वह हथियार रखने को दिया। इस विषय में बिस्मिल जी लिखते हैं। 32"जब मुझसे अधिक प्रेम बढा़ तो उन्होंने वह पिस्तौल मुझे रखने के लिए दिया। इस प्रकार के हथियार रखने की मेरी इच्छा थी, क्योंकि मेरे पिता के कई शत्रु थे, जिन्होंने अकारण ही पिताजी पर लाठियों का प्रहार किया था। मैं चाहता था कि यदि पिस्तौल मिल जाए तो मैं पिताजी के शत्रुओं को मार डालूं। मैंने उसे चलाकर देखा तो वह नितान्त बेकार सिद्ध हुआ। मैंने उसे ले जाकर एक कोने में डाल दिया।" बिस्मिल से वे सज्जन इतने अधिक प्रभावित थे कि दिनों दिन बिस्मिल जी तथा उन सज्जन में प्रेम बढ़ता गया। बिस्मिल जी अपना भोजन ले जाकर उन्हीं के साथ उन्हीं के मकान पर साथ भोजन करते थे। वे सज्जन बिस्मिल जी के साथ स्वामी सोमदेव के पास भी जाया करते थे। जब उन सज्जन के पिताजी ग्राम से शहर आए तो उन्हें अपने बेटे के साथ बिस्मिल जी का मेलजोल पसंद न आया। उन्होंने बिस्मिल जी को चेतावनी के साथ अपने बेटे से मिलने अथवा उसे कहीं भी ले जाने से मना किया तथा न मानने पर बिस्मिल जी को ग्राम से आदमी लाकर पिटवाने की धमकी भी दी। बिस्मिल जी ने उनके पिता की बात का मान रखकर उन सज्जन से मिलना व उनके पास आना-जाना त्याग दिया, परन्तु वे सज्जन बिस्मिल जी से मिलने आते जाते रहे। बिस्मिल जी का अद्भुत व्यक्तित्व का उन सज्जन पर इतना अधिक प्रभाव था कि उन्होंने अपने पिता की चेतावनी की भी परवाह न की।

बिस्मिल जी का जीवन नियमों तथा शुद्ध आचरण पर आधारित था। बिस्मिल जी सदैव सत्य कहना ही पसंद करते थे, चाहे परिणाम जो भी हो। ये सारे नियम व संस्कारों का पालन बिस्मिल जी ने आजीवन किया। बिस्मिल जी लिखते हैं कि "लगभग अट्ठारह वर्ष की उम्र तक मैं रेल पर न चढ़ा था। मैं इतना दृढ़, सत्य वक्ता हो गया था कि एक समय रेल पर चढ़कर तीसरे दर्जे का टिकट खरीदा, पर इण्टर क्लास में बैठकर दूसरों के साथ-साथ चला गया। इस बात से मुझे बड़ा खेद हुआ। मैंने अपने साथियों से अनुरोध किया कि यह तो एक प्रकार की चोरी है। सबको मिलकर इण्टर क्लास का भाड़ा स्टेशन मास्टर को देना चाहिए। एक समय मेरे पिता जी दीवानी में किसी पर दावा करके वकील से कह गए थे कि जो काम हो वह मुझसे (रामप्रसाद जी) करा लें। कुछ आवश्यकता पड़ने पर वकील साहब ने मुझे बुला भेजा और कहा कि मैं पिताजी के हस्ताक्षर वकालतनामें पर कर दूं। मैंने तुरन्त उत्तर दिया कि यह तो धर्म के विरूद्ध होगा, इस प्रकार का पाप मैं कदापि नहीं कर सकता। वकील साहब ने बहुत कुछ समझाया कि एक सौ रूपये से अधिक का दावा है, मुकदमा खारिज हो जायेगा। किन्तु मुझ पर कुछ भी प्रभाव न हुआ, मैंने हस्ताक्षर न किए। अपने जीवन में सर्वप्रकार से सत्य का आचरण करता था, चाहे कुछ हो जाए, सत्य बात कह देता था।" बिस्मिल जी आजीवन सत्य व्रत का पालन करते रहे। बड़ी से बड़ी कठिनाई को झेलने के पश्चात् भी उन्होंने सत्य का मार्ग न छोड़ा।

बिस्मिल जी, जो सत्यवक्ता, दृढ़-निष्चयी तथा आत्म-बल व नियमों के दृढ़ आदि सदुगुणों से परिपूर्ण थे। ये सब उनकी माता मूलवती के संस्कार तथा उनके कठोर परिश्रम का फल था। बिस्मिल जी की माता जी एक वीरांगना माँ थीं जिन्होंने बिस्मिल जी के प्रत्येक कार्य में उनका सहयेाग किया। बिस्मिल जी को सदैव प्रोत्साहन दिया। माता मूलवती बिस्मिल जी के धार्मिक कार्यो व शिक्षादि कार्यो में बहुत सहायता करती थी। बिस्मिल जी नित्यप्रति प्रातः काल चार बजे उठकर हवन किया करते थे इसलिए माता मूलवती उन्हें प्रातः काल 4 बजे जगा दिया करती थीं। जब बिस्मिल की छोटी बहन का विवाह हुआ तब बिस्मिल जी विवाह में सम्मिलित न हुए क्योंकि उन्हें यह ज्ञात हुआ कि बारात में वेश्या आई है। ब्रह्मचारी बिस्मिल जी को यह सब न भाता था। बिस्मिल जी उस समय माता जी से रूपये लेकर हथियार लेने चले गए। बिस्मिल जी की माता जी उनके लिए आदर्श थी, इस लिए बिस्मिल जी प्रत्येक नारी का सम्मान करते थे। अपनी बहन की वैवाहिक घटना का वर्णन करते हुए बिस्मिल जी लिखते हैं कि "मेरी छोटी बहन का विवाह करने के निमित्त माता जी और पिताजी ग्वालियर गए। मैं और श्री दादाजी शाहजहाँपुर में ही रह गए, क्योंकि मेरी वार्षिक परीक्षा थी। मुझे ग्राम के बाहर ही मालूम हो गया था कि बारात में वेष्या आई है। मैं घर न गया और न बारात में सम्मिलित हुआ। मैंने विवाह में कोई भाग न लिया। मैंने माता जी से थोड़े से रूपये मांगे। माताजी ने मुझ लगभग 125 रूपये दिये जिनको लेकर मैं ग्वालियर गया। यह अवसर रिवाल्वर खरीदने का अच्छा हाथ लगा। मैंने सुना था कि रियासत में बड़ी आसानी से हथियार मिल जाते हैं। बड़ी खोज की टोपीदार बन्दूक तथा पिस्तौल तो मिले थे, किन्तु कारतूसी हथियार का कहीं कोई पता नहीं लगा। पता लगा भी तो एक महाशय ने मुझे ठग लिया और 75 रूपये में पांच फायर करने वाला एक रिवाल्वर दिया। रियासत की बनी हुई बारूद और थोड़ी सी टोपियाँ दे दी। मैं इसी को लेकर बड़ा प्रसन्न हुआ। सीधा शाहजहाँपुर पहुंचा। रिवाल्वर को भर कर चलाया तो गोली केवल पन्द्रह से बीस गज पर ही गिरी, क्योंकि बारूद अच्छी न थी। मुझे बड़ा खेद हुआ। माताजी भी जब शाहजहाँपुर आई, तो पूछा क्या लाये? मैंने कुछ कहकर टाल दिया। रूपये सब खर्च हो गये, शायद एक गिन्नी बची थी, सो मैंने माता जी को लौटा दी।" माता मूलवती जी ने सदैव बिस्मिल जी को एक परछाई की भांति साथ दिया। जब बिस्मिल जी को धन की आवश्यकता होती तो वे अपनी माता जी से लेते। माता मूलवती कभी उन्हें धन देने से इन्कार न करती। यथासंभव सहयोग करती। बिस्मिल जी का स्कूल एक मील दूर था। तब बिस्मिल जी अंग्रेजी के नवे दर्जे में थे। बिस्लिम जी ने माता मूलमती से साईकिल खरीदने की इच्छा जताई। माता जी ने बिस्मिल जी को सौ रूपये दिए जिससे बिस्मिल जी साईकिल खरीद सके। बिस्मिल जी को धार्मिक तथा देश से संबंधित मुद्दों की पुस्तकें पढ़ने का बहुत शौक था। ऐसी पुस्तकें खरीदने के लिए बिस्मिल जी माता जी से रूपये लेते। बिस्मिल जी को एक समय लखनऊ कांग्रेस में जाने की इच्छा हुई परन्तु पं. मुरलीधर तथा दादा नारायणलाल ने वहां जाने का विरोध किया तब बिस्मिल जी को माता मूलवती ने खर्च देकर भेजा। बिस्मिल जी में प्रारम्भ से देश की समस्याओं के प्रति चिन्ता तथा देश भक्ति का भाव था इसलिए जब शाहजहाँपुर में सेवा समिति का प्रारम्भ हुआ तब बिस्मिल जी ने पूर्ण उत्साह के साथ सेवा समिति में सहयोग दिया। पं. मुरलीधर तथा दादाजी को बिस्मिल जी के इस प्रकार के कार्य अच्छे न लगते थे परंतु माता मूलवती बिस्मिल जी के उत्साह को खत्म न होने देतीं थीं। इस कारण अनेक बार माता मूलवती को पं. मुरलीधर की डांट-फटकार तथा दंड भी सहन करना पड़ता था। बिस्मिल जी की माता मूलवती तथा उनके गुरूदेव स्वामी सोमदेव उनके आदर्ष तथा जीवन के पथ-प्रदर्षक थे। बिस्मिल जी स्वयं लिखते हैं। "वास्तव में मेरी माता जी स्वर्गीय देवी हैं। मुझ में जो कुछ जीवन तथा साहस आया, वह मेरी माता जी तथा गुरूदेव श्री स्वामी सोमदेव जी की कृपाओं का ही परिणाम है।" दादी विचित्रा देवी तथा पिता पं. मुरलीधर बिस्मिल जी को विवाह करने को कहते परन्तु माता मूलवती सदैव कहती कि बिना उचित शिक्षा प्राप्त किए विवाह करना ठीक नहीं। माता मूलवती के प्रोत्साहन तथा सद्व्यवहार ने बिस्मिल जी के जीवन में वह दृढ़ता प्रदान की कि किसी आपत्ति तथा संकट के आने पर भी बिस्मिल जी ने अपने संकल्प को न त्यागा।

बिस्मिल जी के जीवन की प्रथम गुरू व उनकी जीवनदायिनी उनकी माता मूलवती, बिस्मिल जी के लिए ईष्वर के समान पूज्यनीय तथा सर्वोपरि थीं। माता मूल्वती जी ग्यारह वर्ष की आयु में विवाह कर शाहजहाँपुर आई थीं। उस समय वे अशिक्षित तथा ग्रामीण कन्या के सदृष भोली तथा मासूम थीं। चूकि माता मूलवती की आयु कम थी इसलिए दादी विचित्रा देवी ने अपनी बहन को बुला लिया। दादी जी की बहन ने माता मूलवती को गृहकार्य की शिक्षा दी। कुछ ही समय पश्चात् माता मूलवती जी ने घर के सब कार्यों में दक्षता प्राप्त कर ली तथा भोजनादि की ठीक-ठीक व्यवस्था करने लगीं। बिस्मिल जी के जन्म के पाँच या सात वर्ष बाद माता मूलवती ने हिन्दी का अध्ययन प्रारम्भ किया। वे एक जागरूक महिला थी इसलिए घर में पड़ोस की सखी-सहेलियों के आने पर वे उनमें से शिक्षित महिलाओं से हिन्दी के अक्षर-बोध करतीं। दिन का संपूर्ण गृहकार्य समाप्त करने के पश्चात् जो समय मिलता, उसमें माता मूलवती अध्ययन एवं लेखन कार्य करतीं। उन्होंने अपने परिश्रम से थोड़े ही दिनों में देवनागरी पुस्तकों का अध्ययन प्रारम्भ कर दिया। माता मूलवती ने अपने परिश्रम से स्वयं ही पढ़ना न सीखा अपितु अपनी पुत्रियों को छोटी आयु में उन्होंने ही शिक्षा प्रदान की। जब बिस्मिल जी ने आर्य समाज में प्रवेष किया तब माता मूलवती तथा बिस्मिल जी में खूब परिचर्चा होती थी। बिस्मिल जी लिखते हैं "यदि मुझे ऐसी माता जी न मिलती तो मैं भी अति साधारण मनुष्यों की भांति संसार चक्र में फंसकर जीवन निर्वाह करता। शिक्षादि के अतिरिक्त क्रांतिकारी जीवन में भी उन्होंने मेरी वैसी ही सहायता की जैसी मेजिनी की माता ने की थी।'' "माता जी का सबसे बड़ा आदेश मेरे लिए यह था कि किसी की प्राण हानि न हो। उनका कहना था कि अपने शत्रु को भी कभी प्राण दण्ड न देना। उनके इस आदेश की पूर्ति के लिए मुझे मजबूरन दो-एक बार अपनी प्रतिज्ञा भंग भी करनी पड़ी थी।" माता मूलवती के उत्साह ने बिस्मिल जी को भारतीय राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम का क्रांतिकारी सेनानी बनाया। माता मूलवती मात्र इतना चाहती थी कि बिस्मिल जी कभी नैतिक पथ का त्याग न करें, कभी किसी निर्दोष के प्राण संकट में न डालें और न ही प्राण लें। बिस्मिल जी ने माता मूलवती की इस इच्छा तथा शिक्षा का आजीवन पालन किया।

बिस्मिल जी की माता जी ने उन्हें व्यक्तिगत जीवन में ही नहीं अपितु क्रांतिकारी जीवन में भी पूर्ण सहयोग प्रदान किया। सदैव बिस्मिल जी के देशभक्ति की भावना को उत्साह तथा सहयोग प्रदान किया। बिस्मिल जी का रोम-रोम अपनी माता का ऋणी था क्योंकि उनकी माता ने उन्हें एक साधारण इन्सान से एक वीर देशभक्त क्रांतिकारी बनाया। बिस्मिल जी ने अपनी माता जी के प्रति अपने हृदय के उद्गार को कुछ इस प्रकार अभिव्यक्त किया है। 38"जन्मदात्री जननी। इस दिषा में तो तुम्हारा ऋण-प्रतिशोध करने के प्रयत्न का अवसर न मिला। इस जन्म मैं तो क्या यदि अनेक जन्मों में भी सारे जीवन प्रयत्न करूं तो भी मैं तुम से उऋण नहीं हो सकता। जिस प्रेम तथा दृढ़ता के साथ तुमने इस तुच्छ जीवन का सुधार किया है, वह अवर्णनीय है। मुझे जीवन की प्रत्येक घटना का स्मरण है कि तुमने किस प्रकार अपनी देव वाणी का उपदेश करके मेरा सुधार किया है। तुम्हारी दया से ही मैं देश - सेवा में संलग्न हो सका। धार्मिक जीवन में भी तुम्हारे ही प्रोत्साहन ने सहायता दी। जो कुछ शिक्षा मैंने ग्रहण की उसका श्रेय तुम्हीं को है। जिस मनोहर रूप से तुम मुझे उपदेश करती थीं, उसका स्मरण कर तुम्हारी मंगलमयी मूर्ति का ध्यान आ जाता है और मस्तक नत हो जाता है। तुम्हे यदि मुझे ताड़ना भी देनी हुई, तो बड़े स्नेह से हर बात को समझा दिया। यदि मैंने धृष्टतापूर्ण उत्तर दिया तब तुमने प्रेम भरे शब्दों में यही कहा कि तुम्हें जो अच्छा लगे, वह करो, किन्तु ऐसा करना ठीक नहीं, इसका परिणाम अच्छा न होगा। जीवनदात्री! तुम ने इस शरीर को जन्म देकर केवल पालन-पोषण ही नहीं किया किन्तु आत्मिक तथा सामाजिक उन्नति में तुम्ही मेरी सदैव सहायक रहीं। जन्म-जन्मान्तर परमात्मा ऐसी माता दें।

महान से महान संकट में भी तुमने मुझे अधीर न होने दिया। सदैव अपनी प्रेम भरी वाणी को सुनाते हुए मुझे सान्त्वना देती रहीं। तुम्हारी दया की छाया में मैंने अपने जीवन भर में कोई कष्ट अनुभव न किया। इस संसार में मेरी किसी भी भोग-विलास तथा ऐष्वर्य की इच्छा नहीं। केवल एक तृष्णा है, वह यह कि एक बार श्रद्धापूर्वक तुम्हारे चरणों की सेवा करके अपने जीवन को सफल बना लेता। किन्तु यह इच्छा पूर्ण होती नहीं दिखाई देती और तुम्हें मेरी मृत्यु का दुःख-संवाद सुनाया जायेगा। माँ! मुझे विश्वास है कि तुम यह समझ कर धैर्य धारण करोगी कि तुम्हारा पुत्र माताओं की माता-भारत माता-की सेवा में अपने जीवन की बलि-वेदी की भेंट कर गया और उसने तुम्हारी कुक्ष को कलंकित न किया, अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहा। जब स्वाधीन भारत का इतिहास लिखा जायेगा, तो उसके किसी पृष्ठ पर उज्जवल अक्षरों में तुम्हारा भी नाम लिखा जायेगा। गुरू गोविन्दसिंह की धर्मपत्नी ने जब अपने पुत्रों की मृत्यु का सम्वाद सुना था, तो बहुत हर्षित हुई थी और गुरू के नाम पर धर्मरक्षार्थ अपने पुत्रों के बलिदान पर मिठाई बांटी थी।

जन्मदात्री! वर दो कि अन्तिम समय भी मेरा हृदय किसी प्रकार विचलित न हो और तुम्हारे चरण कमलों को प्रणाम कर मैं परमात्मा का स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करूं।" साहसी तथा वीरांगना माता मूलवती के ही संस्कारों की छवि पं रामप्रसाद जी में थी। सदैव अपनी माता के प्रोत्साहन तथा स्नेह से आत्मिक बल प्राप्त बिस्मिल जी ने भय को मीलों दूर भगा कर क्रांति की राह पर अपना सर्वस्व बलिदान किया। यदि ऐसी साहसी तथा देशभक्त माता मूलवती न होती तो देश को अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल जी जैसे दिलजले युवा क्रांतिकारी न मिलते जिन्होंने अपनी माता के कष्टों से पहले भारत माता के कष्टों के निवारण के लक्ष्य को प्राथमिकता प्रदान की।

बिस्मिल जी में क्रांति की राह पर चलने की भावना को जगाने का तथा उसे प्रबल बनाने का श्रेय बिस्मिल जी के गुरू स्वामी सोमदेव जी को जाता है। बिस्मिल जी ने उनके शाहजहाँपुर आने पर उनकी बहुत सेवा की। बिस्मिल जी स्वामी सोमदेव जी के उपदेशों के साथ-साथ देश से संबंधित मुद्दों पर चर्चा करते थे। बिस्मिल जी के जीवन में माता मूलवती के पश्चात् उनके गुरू स्वामी सोमदेव जी का प्रमुख स्थान था। बिस्मिल जी की माता जी तथा उनके गुरू स्वामी सोमदेव, दोनों ही उनके जीवन के वे सम्बल थे जिस पर उनका जीवन सार्थक दिषा में आगे बढ़ा। बिस्मिल जी ने अपनी आत्मकथा में अपने गुरूदेव स्वामजी सोमदेव के विषय में विस्तार से वर्णन किया, इसे समझे बिना बिस्मल जी के क्रांतिकारी आंदोलन में उनकी भूमिका को समझना अपूर्ण ही है। बिस्मिल जी ने अपने गुरू स्वामी सोमदेव के जीवन परिचय का वर्णन इस प्रकार किया है। "माता जी के अतिरिक्त जो कुछ जीवन शिक्षा मैंने प्राप्त की वह पूज्यवाद श्री स्वामी सोमदेव जी की कृपा का परिणाम है। आपका (स्वामी सोमदेव) नाम श्रीयुत ब्रजलाल चोपड़ा था। पंजाब के लाहौर शहर में आपका जन्म हुआ था। आपका कुटुम्ब प्रसिद्ध था, क्योंकि आपके दादा महाराजा रणजीत सिंह के मंत्रियों में से एक थे। आपके जन्म के कुछ समय पश्चात् आपकी माता का देहान्त हो गया था। आपकी दादी जी ने ही आपका पालन-पोषण किया था। आप अपने पिता की अकेली सन्तान थे। जब आप बढ़े तो चाचियों ने दो-तीन बार आपको जहर देकर मारने का प्रयत्न किया, ताकि उनके लड़कों को ही जायदाद का अधिकार मिल जाये। आपके चाचा आप पर बड़ा स्नेह रखते थे और शिक्षादि की ओर विशेष ध्यान देते थे। अपने चचेरे भाईयों के साथ-साथ आप श्री अंग्रेजी स्कूल में पढ़ते थे। जब आपने एण्ट्रेन्स की परीक्षा दी तो परीक्षा फल प्रकाशित होने पर आप यूनिवर्सिटी में प्रथम आये और चाचा के लड़के फेल हो गये। घर में बड़ा शोक मनाया गया। दिखाने के लिए भोजन तक न बना। आपकी प्रशंसा तो दूर, किसी ने उस दिन भोजन करने को भी न पूछा और बड़ी उपेक्षा की दृष्टि से देखा। आपका हृदय पहले से ही घायल था, इस घटना से आपके जीवन को और भी बड़ा आघात पहुँचा। चाचा जी के कहने-सुनने पर काॅलेज में नाम लिख तो लिया, किन्तु बड़े उदासीन रहने लगे। आपके हृदय में दया बहुत थी। बहुधा अपनी किताबें तथा कपड़े दूसरे सहपाठियों को बाँट दिया करते थे। एक बार चाचा जी से दूसरे लोगों ने कहा कि ब्रजलाल को कपड़े भी आप बनवा नहीं देते, जो वह पुराने फटे कपड़े पहने फिरता है। चाचा जी को बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि उन्होंने कई जोड़े कपड़े थोड़े दिन पहले ही बनवाये थे। आपके संदूकों की तलाशी ली गई। उनमें दो-चार जोड़ी पुराने कपड़े निकले, तब चाचा जी ने पूछा तो मालूम हुआ कि वे नये कपड़े निर्धन विद्यार्थियों को बाँट दिया करते हैं। चाचा जी ने कहा कि जब कपड़े बाँटने की इच्छा हो तो कह दिया करो, हम विद्यार्थियों को कपड़े बनवा दिया करेंगे, अपने कपड़े न बांटा करो। आप बहुधा निर्धन विद्यार्थियों को अपने घर पर ही भोजन कराया करते थे। चाचियों तथा चचाजात भाईयों के व्यवहार से आपको बड़ा क्लेष होता था। इसी कारण से आपने विवाह न किया। घरेलू दुव्र्यवहार से दुःखी होकर आपने घर त्याग देने का निश्चय कर लिया और एक रात को जब सब सो रहे थे, चुपचाप उठकर घर से निकल गये। कुछ सामान साथ में लिया। बहुत दिनों तक इधर-उधर भटकते रहे। भटकते-भटकते आप हरिद्वार पहुँचे। वहाँ एक सिद्ध योगी से भेंट हुई। श्री ब्रजलाल को जिस वस्तु की इच्छा थी, वह प्राप्त हो गई। उसी स्थान पर रहकर श्री ब्रजलाल ने योग विद्या पूर्ण शिक्षा पाई। योगिराज की कृपा से आप 15-20 घण्टे की समाधि लगाने लगे। कई वर्ष तक आप वहाँ रहे। इस समय आपको योग का इतना अभ्यास हो गया था कि अपने शरीर को आप इतना हल्का कर लेते थे कि पानी पर पृथ्वी के समान चले जाते थे। जब आपको देश भ्रमण का अध्ययन करने की इच्छा हुई। अनेक स्थानों से भ्रमण करते हुए अध्ययन करते रहे। जर्मनी तथा अमेरिका से बहुत सी पुस्तकें मंगवाई जो शास्त्रों के सम्बन्ध में थी। जब लाला-लाजपतराय को देश-निर्वासन का दण्ड मिला था, उस समय आप लाहौर में थे। वहाँ आपने एक समाचार-पत्र की सम्पादकीय के डिक्लेरेशन दाखिल किया। डिप्टी कमिश्नर उस समय किसी के भी समाचार पत्र के कमिश्नर को स्वीकार न करता था। जब आपसे भेंट हुई तो वह बड़ा प्रभावित हुआ और उसने डिक्लेरेशन मंजूर कर लिया। अखबार का पहला ही अग्रलेख 'अंग्रेजों को चेतावनी' के नाम से निकला। लेख इतना उत्तेजनापूर्ण था कि थोड़ी देर में ही समाचार-पत्र की सब प्रतियाँ बिक गईं और जनता के अनुरोध पर उसी अंक का दूसरा संस्करण प्रकाशित करना पड़ा। डिप्टी कमिश्नर बड़ा क्रुद्ध था। लेख को पढ़कर काँपता और क्रोध में आकर मेज पर हाथ दे मारता था। किन्तु अंतिम शब्दों को पढ़कर चुप हो जाता। उस लेख के शब्द यों थे कि ''यदि अंग्रेज अब भी न समझेंगे तो वह दिन दूर नहीं कि सन् 1857 के दृश्य के बच्चों को कत्ल किया जाये, उनकी रमणियों की बेइज्जती हो इत्यादि। किन्तु यह सब स्वप्न है, यह सब स्वप्न है।" इन्हीं शब्दों को पढ़कर डिप्टी कमिष्नर कहता कि हम तुम्हारा कुछ नहीं कर सकते।

स्वामी सोमदेव भ्रमण करते हुए बम्बई पहुंचे। वहां पर आपके उपदेशों को सुनकर जनता पर बड़ा प्रभाव पड़ा। एक व्यक्ति जो श्रीयुत अबुल कलाम आजाद के बड़े भाई थे, आपका व्याख्यान सुनकर मोहित हो गए। वह आपको अपने घर ले गये। इस समय तक आप गेरूआ कपड़ा न पहनते थे। केवल एक लुंगी और कुर्ता पहनते थे और साफा बांधते थे। श्री अबुल कलाम आजाद के पूर्वज अरब के निवासी थे। आपके पिता के बम्बई में बहुत से मुरीद थे और कथा की तरह कुछ धार्मिक ग्रन्थ पढ़ने पर हजारों रूपये चढ़ावे में आया करते थे। वह सज्जन इतने मोहित हो गए कि उन्होंने धार्मिक कथाओं का पाठ करने के लिए जाना ही छोड़ दिया। वह दिन-रात आपके पास ही बैठे रहते। जब आप उनसे कहीं जाने को कहते तो वह रोने लगते और कहते कि मैं आपके आत्मिक ज्ञान के उपदेशों पर मोहित हूँ। मुझे संसार में किसी वस्तु की इच्छा नहीं। आपने एक दिन नाराज होकर उनको धीरे से चपत मार दी जिससे वे दिन भर रोते रहे। उनको घर वालों तथा शिष्यों ने बहुत समझाया किन्तु वह धार्मिक कथा कहने न जाते। यह देखकर उनके मुरीदों को बड़ा क्रोध आया कि हमारे धर्मगुरू एक काफिर के चक्कर में फंस गए हैं। एक सन्ध्या को स्वामी जी अकेले समुद्र तट पर भ्रमण करने गए थे कि कई मुरीद बन्दूक लेकर स्वामी जी को मार डालने के लिए मकान पर आये। यह समाचार जानकर उन्होंने स्वामी जी के प्राणों का भय देखकर स्वामी जी से बम्बई छोड़ने की प्रार्थना की। प्रातःकाल एक स्टेशन पर स्वामी जी को तार मिला कि आपके अबुल कलाम आजाद के भाई साहब ने आत्महत्या कर ली। तार पढ़कर आपको बड़ा क्लेष हुआ। जिस समय आपको इन बातों का स्मरण हो आता था तो बड़े दुःखी होते थे। मैं एक सन्ध्या के समय आपके निकट बैठा था, अंधेरा काफी हो गया था। स्वामी जी ने बड़ी गहरी ठंडी सांस ली। मैंने चेहरे की ओर देखा तो आंखों से आंसू बह रहे थे। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैंने कई घण्टे प्रार्थना की, तब आपने उपरोक्त विवरण सुनाया।

अंग्रेजी की योग्यता आपकी बड़ी उच्चकोटि की थी। आपका शास्त्र विशयक ज्ञान बड़ा गम्भीर था। आप बड़े निर्भीक वक्ता थे। आपकी योग्यता को देखकर एक मद्रास की कांग्रेस कमेटी ने आपको अखिल भारतवर्षीय कांग्रेस का प्रतिनिधि चुनकर भेजा था। आगरा की आर्य मित्र-सभा के वार्षिकोत्सव पर आपके व्याख्यानों को श्रवण कर राजा महेन्द्र प्रताप भी बड़े मुग्ध हुए थे। राजा साहब ने आपके पैर छुए और आपको अपनी कोठी पर लिवा ले गए। उस समय से राजा साहब बहुधा आपके उपदेश सुना करते और अपना गुरू मानते थे। इतना साफ निर्भीक बोलने वाला मैंने आज तक नहीं देखा। सन् 1913 ई. में मैंने पहला व्याख्यान शाहजहाँपुर में सुना था। आर्यसमाज के वार्षिकोत्सव पर आप पधारे थे। उस समय आप बरेली में निवास करते थे। आपका शरीर बहुत कृष था, क्योंकि आपको एक अजीब रोग हो गया था। आप जब शौच जाते थे, तब आपको खून गिरता था। कभी दो छटांक, कभी चार छटांक और कभी-कभी तो एक सेर तक खून गिर जाता था। बवासीर आपको नहीं थी। ऐसा कहते थे कि किसी प्रकार की योग की क्रिया बिगड़ जाने से पेट की आँत में कुछ विकार उत्पन्न हो गया। आँत सड़ गई। पेट चिरवाकर आँत कटवानी पड़ी और तभी से यह रोग हो गया था। बड़े-बड़े वैद्य-डाॅक्टरों की औषधि की किन्तु कुछ लाभ न हुआ। इतने कमजोर होने पर भी जब व्याख्यान देते तब इतने जोर से बोलते कि तीन-चार फर्लांग से आपका व्याख्यान साफ सुनाई देता था। दो-तीन वर्ष तक आपको हर साल आपको आर्यसमाज के वार्षिकोत्सव पर बुलाया जाता। सन् 1915 ई में कतिपय सज्जनों की प्रार्थना पर आप आर्यसमाज मंदिर में ही निवास करने लगे। इसी समय से मैंने आपकी सेवा-सुश्रुषा में समय व्यतीत करना आरम्भ कर दिया। स्वामी जी मुझे धार्मिक तथा राजनैतिक उपदेश देते थे और इसी प्रकार की पुस्तकें पढ़ने का भी आदेश करते थे। राजनीति में भी आपका ज्ञान उच्च कोटि का था। लाला हरदयाल का आपसे बहुत परामर्श होता था। एक बार महात्मा मुंशी राम जी को आपने पुलिस के प्रकोप से बचाया। आचार्य रामदेव जी तथा श्रीयुत कृष्णजी से आपका बड़ा स्नेह था। राजनीति में आप मुझसे अधिक न खुलते थे। आप मुझसे बहुधा कहा करते थे कि एण्ट्रेंस पास कर लेने के बाद यूरोप की यात्रा अवश्य करना। इटली जाकर महात्मा मेजिनी की जन्मभूमि के दर्शन अवश्य करना।" "यद्यपि आप आर्य-समाज के सिद्धांतों को सर्वप्रकारेण मानते थे, किन्तु परमहंस रामकृष्ण, स्वामी रामतीर्थ तथा महात्मा कबीरदास के उपदेशों का वर्णन प्रायः किया करते थे।

'कबिरा' शरीर सराय है भाड़ा दे के बस।
जब भठियारी खुश रहै तब जीवन का रस।। 1।।
'कबिरा क्षुधा है कूकरी करत भजन में भंग।
याको टुकरा डारि के सुमिरन करो निषंक।। 2।।
नींद निसानी नीच की उट्ठ 'कबिरा' जाग।
और रसायन त्याग के नाम रसाय चाख।। 3।।
चलना है रहना नहीं चलना बिसवें बीस।
'कबिरा' ऐसे सुहाग पर कौन बँधावे सीस।। 4।।
अपने अपने चोर को सब कोई डारे मारि।
मेरा चोर जो मोहिं मिले सरवस डारूँ वारि।। 5।।
कहे सुने की है नहीं देखा देखी बात।
दुल्हा दुल्हिन मिलि गए सूनी परी बारात।। 6।।
नैनन की करि कोठरी पुतरी पलँग बिछाय।
पलकन की चिक डारि के पीतम लेहु रिझाय।। 7।।
प्रेम पियाला जो पिये सीस दच्छिना देय।
लोभी सीस न दै सके, नाम प्रेम का लेय।। 8।।
सीस उतारे भुँइ धरै तापे राखै पाँव।
दास 'कबिरा' यूं कहै ऐसा होय तो आव।। 9।।
निन्दक नियरे राखिये आंखन कुई छबाय।
बिन पानी साबुन बिना उज्जवल करे सुभाय।। 10।।"

एक सच्चे गुरू के बिना परमात्मा की प्राप्ति संभव नहीं, एक सच्चे मार्गदर्शक के बिना जीवन की सही राह खोजना संभव नहीं। इन दोनों ही उलझनों से बिस्मिल जी को निकालने वाले थे उनके गुरू तथा मार्गदर्षक स्वामी सोमदेव जी महाराज। बिस्मिल जी ने भी अपने गुरू के उपदेशों तथा नियमों का सदैव दृढ़तापूर्वक पालन किया।
अपने गुरू के बताए गए नियमों में एक था ब्रह्मचर्य व्रत का पालन। बिस्मिल जी को ब्रह्मचर्य का ज्ञान तो मंदिर के पुजारी जी ने ही दे दिया था परंतु आर्य-समाज तथा स्वामी सोमदेव के संपर्क में आने पर बिस्मिल जी ने अखण्ड ब्रह्मचर्य की महिमा को समझा। बिस्मिल जी ने जब 'सत्यार्थ प्रकाष' का अध्ययन किया तब उन्होंने ब्रह्मचर्य के कठिन नियमों का पालन करना प्रारम्भ दिया था। बिस्मिल जी देश की तत्कालीन परिस्थितियों से दुःखी थे। देश की जनता विषेषकर युवा वर्ग पश्चात जीवन शैली के प्रभाव के चलते अनियमित तथा अनैतिक जीवन जीने लगा था जिसमें मूल्यों तथा सच्चरित्रता का स्थान नगण्य रह गया था। बिस्मिल जी का मानना था कि ब्रह्मचर्य तथा अनुषासित जीवन देश के युवा वर्ग के लिए अतिआवश्यक है। इसलिए बिस्मिल जी देश की परिस्थितियाँ सुधारने के लिए देशवासियों को सर्वप्रथम स्वयं का जीवन सुधारने की बात कहते थे। बिस्मिल जी देश की जनता तथा युवा वर्ग को विशेषता: स्वस्थ्य तथा नैतिक जीवन जीने की सलाह देते हुए लिखते हैं कि 41''वर्तमान समय में इस देश की कुछ ऐसी दुर्दषा हो रही है कि जितने धनी तथा गणमान्य व्यक्ति हैं उनमें 99 प्रतिषत ऐसे हैं जो अपनी सन्तान-रूपी अमूल्य धन-राषि को अपने नौकर तथा नौकरानियों के हाथ में सौंप देते हैं। उनकी जैसी इच्छा हो, वे उन्हें बनावें। मध्यम श्रेणी के व्यक्ति भी अपने व्यवसाय तथा नौकरी इत्यादि में फंसे होने के कारण सन्तान की ओर अधिक ध्यान नहीं दे सकते। सस्ता कामचलाऊ नौकर या नौकरानी रखते हैं और उन्हीं पर बाल-बच्चों का भार सौंप देते हैं, ये नौकर बच्चों को नष्ट करते हैं। यदि कुछ भगवान की दया हो गई और बच्चे नौकर-नौकरानियों के हाथ से बच गए तो मोहल्ले की गन्दगी से बचना बड़ा कठिन है। रहे-सहे स्कूल में पहुंचकर पारंगत हो जाते हैं। कालिज पहुँचते-पहुँचते आजकल के नवयुवकों के सोलहों संस्कार हो जाते हैं। कालिज में पहुँचकर ये लोग समाचार-पत्रों में दिए औषधियों के विज्ञापन देख-देखकर दवाइयों को मँगा-मँगाकर धन नष्ट करना आरम्भ करते हैं। 95 प्रतिशत की आँखें खराब हो जाती हैं। कुछ को शारीरिक दुर्बलता तथा कुछ को फैशन के विचार से ऐनक लगाने की बुरी आदत पड़ जाती है शायद ही कोई विद्यार्थी ऐसा हो जिसकी प्रेम कथा-कथाएं प्रचलित न हो। ऐसी अजीब-अजीब बातें सुनने में आती हैं कि जिनका उल्लेख करने से भी ग्लानि होती हैं। यदि कोई विद्यार्थी सच्चरित्र बनने का प्रयास भी करता है और स्कूल या कालिज में उसे कुछ अच्छी शिक्षा भी मिल जाती है, तो परिस्थितियाँ जिनमें उसे निर्वाह करना पड़ता है, उसे सुधरने नहीं देतीं। वे विचारते हैं कि थोड़ा सा आनन्द ले लें, यदि कुछ खराबी पैदा हो गई तो दवाई खाकर या पौष्टिक पदार्थों का सेवन करके दूर कर लेंगे। यह उनकी बड़ी भारी भूल है। दवाईयाँ कोई लाभ नहीं पहुँचाती। अण्डों का जूस, मछली के तेल, मांस आदि पदार्थ भी व्यर्थ सिद्ध होते हैं। सबसे आवश्यक बात चरित्र सुधारना ही होती है। विद्यार्थियों तथा उनके अध्यापकों को उचित है कि वे देश की दुर्दषा पर दया करें और अपने चरित्र को सुधारने का प्रयत्न करें। सार में ब्रह्मचर्य ही संसारी शक्तियों का मूल है। बिन ब्रह्मचर्य-व्रत पालन किए मनुष्य जीवन, नितान्त शुष्क तथा नीरस प्रतीत होता है। संसार में जितने बड़े आदमी हैं, उनमें से अधिकतर ब्रह्मचर्य व्रत के प्रताप से बड़े बने और सैकड़ों-हजारों वर्ष बाद भी उनका यषगान करके मनुष्य अपने आपको कृतार्थ करते हैं। ब्रह्मचर्य की महिमा यदि जानना हो तो परषुराम, राम, लक्ष्मण, कृष्ण, भीष्म, ईसा, मेजिनीबंदा, रामकृष्ण, दयानन्द तथा राममूर्ति की जीवनियों का अध्ययन करो। जिन विद्यार्थियों को बाल्यावस्था में कुटेव की बान पड़ जाती है, या जो बुरी संगत में पड़कर अपना आचरण बिगाड़ लेते हैं और फिर अच्छी शिक्षा पाने पर आचरण सुधारने का प्रयत्न करते हैं, परन्तु सफल मनोरथा नहीं होते, उन्हें भी निराष नहीं होना चाहिए। मनुष्य-जीवन अभ्यासों का एक समूह है। मनुष्य के मन में भिन्न-भिन्न प्रकार के अनेक विचार तथा भाव उत्पन्न होते रहते हैं। क्रिया के बार-बार होने से उसमें एच्छिक भाव निकल जाता है और उसमें तात्कालिक प्रेरणा उत्पन्न हो जाती है। इन तात्कालिक प्रेरक क्रियाओं को, जो पुनरावृत्ति का फल है, 'अभ्यास' कहते हैं। मानवी चरित्र इन्हीं अभ्यासों द्वारा बनता है। अभ्यास से तात्पर्य आदत, स्वभाव, वान है। अभ्यास अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के होते हैं। यदि हमारे मन में निरन्तर अच्छे विचार उत्पन्न हों, तो उनका फल अच्छे अभ्यास होंगे और यदि बुरे विचार में लिप्त रहेंगे, तो निश्चय रूपेण अभ्यास बुरे होंगे। मन इच्छाओं का केन्द्र है। उन्हीं की पूर्ति के लिए मनुष्य को प्रयत्न करना पड़ता है। अभ्यासों के बनने में पैतृक संस्कार अर्थात् माता-पिता के अभ्यासों के अनुकरण ही बच्चों के अभ्यास का सहायक होता है। दूसरे, जैसी परिस्थितियों में निवास होता है, वैसे ही अभ्यास भी पड़ते हैं। तीसरे, प्रयत्न से भी अभ्यासों का निर्माण होता है, यह शक्ति इतनी प्रबल हो सकती है कि इसके द्वारा मनुष्य पैतृक संसार तथा परिस्थितियों को भी जीत सकता है। हमारे जीवन का प्रत्येक कार्य अभ्यासों के अधीन है। यदि अभ्यासों द्वारा हमें कार्य में सुगमता न प्रतीत होती, तो हमारा जीवन बड़ा दुःखमय प्रतीत होता। लिखने का अभ्यास, वस्त्र पहनना, पठन-पाठन इत्यादि इनके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। यदि हमें प्रारम्भिक समय की भाँति सदैव सावधानी से काम लेना हो, तो कितनी कठिनता प्रतीत हो। इसी प्रकार बालक का खड़ा होना और चलना भी है कि उस समय वह कितना कष्ट अनुभव करता है, किन्तु एक मनुष्य मीलों तक चला जाता है। बहुत लोग तो चलते-चलते नींद भी ले लेते हैं। जैसे जेल में बाहरी दीवार पर घड़ी में चाबी लगाने वाले, जिन्हें बराबर छः घंटे चलना होता है, वे बहुधा चलते-चलते सो लिया करते हैं। मानसिक भावों को शुद्ध रखते हुए अन्तःकरण को उच्च विचारों में बलपूर्वक संलग्न करने का अभ्यास करने से अवष्य सफलता मिलेगी। प्रत्येक विद्यार्थी या नवयुवक को, जो कि ब्रह्मचर्य के पालन की इच्छा रखता है, उचित है कि अपनी दिनचर्या निष्चित करे। खान-पानादि का विषेष ध्यान रखे। महात्माओं के जीवन-चरित्र तथा चरित्र-संगठन सम्बन्धी पुस्तकों का अवलोकन करे। प्रेमालाप तथा उपन्यासों से समय नष्ट न करे। खाली समय अकेला न बैठे। जिस समय कोई बुरे विचार उत्पन्न हों, तुरन्त शीतल जल-पान कर घूमने लगे या किसी अपने से बड़े के पास जाकर बातचीत करने लगे। अश्लील गजलों, शेरों तथा गानों को न पढ़ें और न सुनें। स्त्रियों के दर्शन से बचता रहे। माता तथा बहन से भी एकान्त में न मिलें। सुन्दर सहपाठियों या अन्य विद्यार्थियों से स्पर्श तथा आलिंगन की भी आदत न डालें।"

बिस्मिल जी का जीवन उतार-चढ़ाव तथा संघर्षों भरा रहा। जहाँ कुछ अपनों का प्यार तथा समर्पण उन्हें मिला तो वहीं अपने कुछ मित्रों तथा सहयोगियों की उपेक्षा तथा विश्वासघात भी प्राप्त हुआ। देश की तात्कालिक दुर्दशा ने भी बिस्मिल जी के मन को उद्वेलित कर दिया था। मन की इन्हीं सब व्यथाओं को बिस्मिल जी ने अपनी कविताओं में शब्दों के माध्यम से व्यक्त किया। "बिस्मिल जी ने कविता की धारा में स्वयं को साधक पाया। 'मन की लहर' के आत्म-निवेदन में कहा है कि मेरा कई बार का अनुभव है, जब कभी मैं संसार की यातनाओं प्रेमवासियों तथा विश्वासघातियों की चालों से दुखित हुआ हूँ और बहुत ही निकट (संभव) था कि सर्वनाष कर लेता, किन्तु प्राण प्यारी रचनाओं ने ही मुझे धैर्य बंधाकर संसार यात्रा की कठिन राह चलने के लिए उत्साहित किया।" पं. रामप्रसाद बिस्मिल अद्वितीय कवि थे। वे 'बिस्मिल' उपनाम से कविता लिखा करते थे। "देश और समाज की दषा को देखकर ही शायद उन्होंने अपने नाम के सामने 'बिस्मिल' शब्द का प्रयोग किया। वे बहुत अच्छे शायर थे। 'बिस्मिल' का शाब्दिक अर्थ है 'घायल'। बिस्मिल देश की दुर्दशा, आपसी फूट, भारत-वासियों के गिरे हुए मनोबल को देखकर बिस्मिल (घायल) थे।" अपने दुखों को किसी से न कहने वाले बिस्मिल जी ने उन्हें कविताओं का स्वरूप दिया। बिस्मिल जी ने "लिखा है कि मैं कोई कवि नहीं और न कविताओं के कार्य को ही जानता हूँ- जिस युवा कवि के दिल में देश की आजादी के सपने थे, जिसने आजादी के लिए हाथों में रिवाल्वर के सिवाय कुछ नहीं पकड़ा हो उसी सपूत ने हल की मुठियाँ के साथ-साथ कलम के जादुई चमत्कार से अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए। 'मन की लहर' रचना संग्रह में कवि श्री रामप्रसाद बिस्मिल जी ने 'आह्वान', 'आर्य क्यों दुःखी हैं,' 'युवा-सन्यासी', 'धर्महित मरना', 'हकीकत के वचन', 'मेरी भावना', बलिदेवी का संदेश आदि रचनाओं में जहाँ देशभक्ति का संदेश दिया है, वहीं कवि बिस्मिल जी ने समाज की रूढ़िवादी परम्पराओं के विरूद्ध संघर्ष की चेतावनी दी है।" बिस्मिल जी ने अपनी कविताओं के माध्यम से राष्ट्रीय एकता तथा देशभक्ति का संदेश दिया। जैसा कि बिस्मिल जी ने इन पंक्तियों में लिखा था कि-
''मुरझा तन था निश्छल मन था, जीवन ही केवल वन था।
मुसलमान हिन्दू मन छोड़ा, बस निर्मल अपना-पन था।
मंदिर में था चाँद चमकता, मस्जिद में मुरली की तान,
मक्का हो चाहे वृदांवन, होते आपस में कुर्बान।।"

बिस्मिल जी ने 'मेरा जन्म', जीवित जोष, 'स्वाधीन कैदी', 'मेरी प्रतिज्ञा', 'मातृभूमि', 'मातृवन्दना', 'वियोग' इत्यादि रचनाओं में राष्ट्र प्रेम, जेल में बिताये यातना पूर्ण दिन तथा मातृभूमि के लिए शहीद की भावना व युवाओं के लिए संदेश है। जैसा कि उन्होंने लिखा है-
''तेरे ही काम आऊँ तेरा ही मंत्र गाऊं।
मन और देह तुझ पर बलिदान चढ़ाऊँ।।"

''बिस्मिल जी ने प्रकृति के प्राकृतिक सौन्दर्य ''फूल" कविता के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। 'कफन', 'स्वतंत्र गाना', 'आहे-सर्द', मातम, 'कैदी बुल-बुल की फरियाद' आदि रचनाओं से क्रांति का शंख नाद परिलक्षित किया है। बिस्मिल जी ने देश की यातनापूर्ण जीवन को सरलतम शब्दों में व्यक्त किया है। ईश्वर विनय में बिस्मिल जी ने लिखा है-
बरसें हजारों बीती, दुःख सहते-सहते हमको,
क्या भाग्य में हमारे, बिल्कुल दया नहीं है।
हम गिर गये है इतने, हस्ती मिटी हमारी,
क्यों हाथ वह दया का, अब तक उठा नहीं है।

बिस्मिल जी ने सम्पूर्ण देश की स्थिति की प्रार्थना ईष्वर से की, उन्होंने ईष्वरवादी क्रांतिकारी पुरूष के रूप में लिखा है- ''क्या भाग्य में हमारे, ही एक बदी गुलामी, सदियों से जन्मभूमि, जो दुःख उठा रही है। उन्होंने 'भारत' मेरा कौल (प्रतिज्ञा) में लिखा है-
गुनहगारों में शामिल है, गुनाहों से नहीं वाकिफ,
सजा को जानते हैं हम,
खुदा जाने खता क्या है।
''न" बिस्मिल हूँ मैं वाकिफ नहीं, रस्में शहादत से,
तादें अब तू ही जालिम, तड़पने की अदा क्या है।
उम्मीद मिल गई मिट्टी में
दर्द जब्त आखिर है
सदाऐं गैब (आकाशवाणी) बतलाऐं
मुझे हुक मैं, खुदा क्या है।

अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल जी ने आप बीती; 'आहे-सर्द', 'बलिदान' शीर्षक रचनाओं में इधर हमारे उधर, 'हिन्दोस्तां हमारा', विश्वास के अन्त, 'मादरे हिन्द की आवाज' आदि रचनाओं में अत्याचार, उपद्रवी, राज्य सत्ता, ईष्र्या पर तीखी कलम लिखी है। अंग्रेजी हूकूमत को कोसा ही नहीं है बल्कि उनकी कलम ने लिखा है-
उन्हें मैंने दूध पिला दिया,
बसे आस्तीन के सांप वो,
कोई मेरे बच्चे को डस गया,
कोई मुझ पे जहर उगल गया।

उनकी कलम फिर गजल की तरफ बड़ी और उसमें उन्होंने दुखानंद, सच्ची प्रतिज्ञा, मौजूदा हालात, विष्वासघात, देश प्रेम, दर्दे दिल, नार ए गम, हिन्दोस्तां हमारा आदि गजलें लिखीं जो उस जमाने में प्रत्येक क्रांतिकारी की जुवां पर गुनगुनाती थी। जिसमें बिस्मिल जी ने समाज व देश की स्थिति का चिंतन पूरी निष्ठा व ईमानदारी से किया है-
'जो हवाऐं दहर बदल गईं तो,
जहां का रंग बदल गया'
जा दरख्वत फूल के फल गया"
झूठ जो चीज है उससे मोहब्बत कैसी,
खाक हो गये दम भर में वह सूरत कैसी,
न था मालूम वह जालिम, हमें इतना सतायेगा
फंसा कर दामें उल्फत में, हमें बन्दी बनायेगा।
छुड़ा करके वतन हमसे, बनायेगा हमें कैदी,
दिखाकर आवोदाने को, कफरा में हमको फंसायेगा,
बनाने को हमें कैदी, बनेगा बाग का माली,
छिपाकर शक्ल असली को, शक्ल दीगर दिखायेगा।
मझकर नातुर्बा हमको, करेगा इतनी जल्लादी।
जलाकर बालों पर सारे, हमें बिस्मिल बनायेगा।"

इस प्रकार बिस्मिल जी ने साहित्य जगत में अपने लेख व कविताओं के माध्यम से सोये हुए भारतीयों के आत्मसम्मान तथा पराधीनता के विरूद्ध जागरूकता की अलख जगाने का कार्य किया। साहित्य ही समाज का आईना होता है। बिस्मिल जी भारत के वासी तथा कवि व लेखक होने के अपने दोनों कर्तव्यों का निर्वाह किया। यही तत्कालीन समय की आवष्यकता थी। एक कवि व लेखक का अपने राष्ट्र तथा राष्ट्रवासियों के प्रति कुछ कर्तव्य होता है। बिस्मिल जी ने यह कर्तव्य भी निभाया तथा भारत माता के चरणों में प्राण त्यागकर भारत के सपूत होने का कर्तव्य पूर्ण किया। बिस्मिल जी 30 वर्ष जीवित रहे, छोटे से जीवन काल में इतना साहित्य व काव्य समाज को देना बड़ा मुश्किल कार्य है। अन्त में (बिस्मिल जी) आपका जन्म ज्येष्ठ शुक्ल निर्जला एकादशी और महाप्रयाण भी पौष कृष्ण एकादशी सोमवार को हुआ है। अतः आपका जन्म-मरण दोनों ही एकादशी की पवित्र तिथि को हुए हैं, जो बड़े-बड़े सन्त महात्माओं के लिए भी दुर्लभ हैं।

रामप्रसाद बिस्मिल पर निबंध ~ रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा ~ राम प्रसाद बिस्मिल के कार्य ~ राम प्रसाद बिस्मिल की शायरी ~ पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की जीवनी ~ रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां
राम प्रसाद बिस्मिल के विचार ~ राम प्रसाद बिस्मिल की मृत्यु


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